बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 761–770

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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[ अध्याय ३ और करण ( देह • उसके कर्मानुसार ही इस अन्तर्यामी त्र्यमुक्त होनेके कारण कर्म नहीं हैं । परार्थ-सरेके अर्थको करना का स्वभाव है, अतः और इन्द्रिय हैं; वे हैं, स्वतः इसके कोई नहीं है; इसी से श्रुति क जिसका पृथिवी देह और इन्द्रियों की साक्षिमात्र ईश्वरके नियमानुसार हुआ ऐसा नारायणसंज्ञक को - पृथिवीदेवताको करता है— पृथिवीके अपने नयुक्त करता है, यह मा है, तुम्हारा अर्थात् - मेरा समस्त प्राणियों -है— इस प्रकार ' ते यह कथन सबके उप-है । यही अन्तर्यामी विषय में तुमने पूछा है अमृत यानी सम्पूर्ण रहित है । ब्राह्मण ७ ] ७५१ 70 DA योऽप्सु तिष्ठन्नद्भोऽन्तरो यंमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥ योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः

शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ५५ ॥ योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न

वेद यस्यान्तरिक्षँ शरीरं योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यस्मृतः ॥ ६ ॥ यो वायौ तिष्ठन् वायोर-अन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो

यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥ यो दिवि

तिष्ठन् दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥

य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमतेरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥६ ॥ यो दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्योऽ-न्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो

दिशो ऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यस्मृतः ॥ १० ॥

` यश्चन्द्रतारके तिष्ठ ँश्चन्द्रतारकादन्तरीयं चन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्रतारक ँ शरीरं यश्चन्द्रतारकमन्तरो -यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यिमृतः ॥ ११॥ य आकाशे

तिष्ठन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्य-मृतः ॥ १२॥ यस्तमसि तिष्ठ स्तमसो ऽन्तरो यं तमो

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७५२ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥ यस्तेजसि तिष्ठ स्ते-जसोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं व

यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यत इत्य-त धिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥ भ

जो जल में रहनेवाला जलके भीतर है, जिसे जल नहीं जानता, जल जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर जलका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥४ ॥ जो अग्नि में रहनेवाला अग्निके व

भीतर है, जिसे अग्नि नहीं जानता, अग्नि जिसका शरीर है और जो अ भीतर रहकर अग्निका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥५ ॥ जो अन्तरिक्षमें रहनेवाला अन्तरिक्ष के भीतर है, जिसे अन्त-रिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर

अन्तरिक्षका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ६ ॥ जो वायुमें रहनेवाला वायुके भीतर है, जिसे वायु

नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वायुका उ नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ७ ॥

प्र जो द्युलोकमें रहनेवाला द्युलोक के भीतर है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर द्युलोक- ६ का नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ८ ॥ E

जो आदित्यमें रहनेवाला आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आदित्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १ ॥

जो दिशाओंमें रहनेवाला दिशाओंके भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं. जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं और जो भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी है ॥ १० ॥

जो चन्द्रमा और ताराओं में रहनेवाला चन्द्रमा और के भीतर । है, जिसे चन्द्रमा और ताराएँ नहीं जानतीं, चन्द्रमा और ताराएँ जिसका

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[ श्रध्याय ३ नरो यमयत्येष त नसि तिष्ठ स्ते-न्य तेजः शरीरं तर्याम्यतइत्य-जल नहीं जानता, जल नियमन करता है, वह नमें रहनेवाला अग्निके का शरीर है और जो म्हारा आत्मा अन्तर्यामी के भीतर है, जिसे अन्त-और जो भीतर रहकर आत्मा अन्तर्यामी भीतर है, जिसे वायु भीतर रहकर वायुका मी अमृत है ॥ ७ ॥

जिसे द्युलोक नहीं भीतर रहकर द्युलोक-तर्यामी अमृत है ॥ ८ ॥

है, जिसे आदित्य नहीं तर रहकर आदित्यका तर्यामी अमृत है ॥ ६ ॥

है, जिसे दिशाएं नहीं । तर रहकर दिशाओंका चमी अमृत है ॥ १० ॥

और ताराओंके भीतर दमा और ताराएँ जिसका ब्राह्मण ७ J शाङ्करभा ७५३ शरीर हैं और जो भातर रहकर चन्द्रमा और ताराओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ११ ॥ जो आकाशमें रहने-वाला आकाशके भीतर है, जिसे आकाश नहीं जानता, आकाश जिसका

शरीर है और जो भीतर रहकर आकाशका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १२ ॥ जो तममें रहनेवाला तमके

भीतर है, जिसे तम नहीं जानता, तम जिसका शरीर है और जो भोतर रहकर तमका नियमन करता है वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है || १३ || जो तेजमें रहने वाला तेजके भीतर है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत अधिभूत - दर्शन है ॥ १४ ॥

समानमन्यत् । योऽप्सु तिष्ठन् -अग्नौ " अन्तरिक्षे, वायौं, दिवि, आदित्ये, दिक्षु, चन्द्रतारके, आकाशे, यस्तमस्यांवरणात्मके बाह्ये तमसि, तेजसि तद्विपरीते प्रकाश सामान्ये इत्येवमधिदैवतम् अन्तर्यामित्रिषयं दर्शनं देवतासु ।

प्रथाधिभूतं भूतेषु ब्रह्मादिस्त -म्त्रपर्यन्तेषु अन्तर्यामिदर्शन- ।

मधिभूतम् ॥ ४-१४ ॥

है, यह अधिदेवत - दर्शन हुआ, आगे शेष सव तृतीय मन्त्रके समान ही है । जो जलमें, अग्निमें, अन्तरिक्षमें, वायुमें, द्युलोकमें, आदित्य में, दिशाओंमें, चन्द्रमा एवं ताराओंमें और आकाशमें रहनेवाला है; जो तम अर्थात् आवरणात्मक बाह्य तममें, तेज अर्थात् तमसे वित सामान्य प्रकाशमें रहनेवाला है; इस प्रकार यह अन्तर्यामिविषयक अधिदेवत — देवतान्तर्गत दर्शन है, इससे आगे अधिभूत - दर्शन है, ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूतोंमें जो अन्तर्यामिदर्शन है, वह अधिभूत - दर्शन है ॥ ४-१४ ॥ यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः वृ ० उ ० ४८-

पृष्ठ 764

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७५४ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥ यः प्राणे तिष्ठन्

प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यस्मृतः ॥ १६ ॥

यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद यस्य वाक् शरीरं यो वाचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्त-र्याम्यसृतः ॥ १७ ॥ यश्चक्षुषि तिष्ठ ५ श्चक्षुषोऽन्तरो

यं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यम-यत्येष त आत्मान्तर्याम्यस्मृतः ॥ १८ ॥ यः श्रोत्रे

तिष्ठञ्छ्रोत्रादन्तरो यश्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्र शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ॥ यो मनसि तिष्ठन् मनसोऽन्तरो यं मनो न

वेद यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥ यस्त्वचि तिष्ठ ँ

स्त्वचो-ऽन्तरो यं त्वङ्न वेद यस्य त्वक् शरीरं यस्त्वचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥ यो

विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान, शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मा-न्तर्याम्यमृतः ॥ २२ ॥ यो रेतसि तिष्ठन् रेतसो ऽन्तरो

यतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽन्तरो यम-यत्येष तआत्मान्तर्याम्यमृतो ऽदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्यो-ऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति

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[ अध्याय ३ मान्तर्याम्यमृत प्राणे तिष्ठन् वाणः शरीरं यः न्यस्मृतः ॥ १६ ॥

न वेद यस्य त आत्मान्त-इचक्षुषो ऽन्तरो क्षुरन्तरो यम-॥ यः श्रोत्रे श्रोत्र शरीरं नान्तर्याम्यस्मृतः रोयं मनो न यमयत्येष त तिष्ठस्त्वचो -यस्त्वचमन्तरो ॥ २१ ॥ यो

नं न वेद यस्य न्त्येष त आत्मा-नरेतसो ऽन्तरो तोऽन्तरो यम-श्रुतः श्रोतामतो द्रष्टा नान्यो-नान्योऽतोऽस्ति ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५५ विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदातं ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥

जो समस्त भूतोंमें स्थित रहनेवाला समस्त भूतोंके भीतर है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर हैं और जो भीतर रहकर समस्त भूतोंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । यह अधिभूतदर्शन है, अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है ॥१५ ॥

जो प्राणमें रहनेवाला प्राणके भीतर है, जिसे प्राण नहीं जानता, प्राण जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर प्राणका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १६ ॥ जो वाणीमें रहनेवाला

वाणीके भीतर है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वाणोका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १७ ॥ जो नेत्रमें रहनेवाला नेत्रके भीतर है, जिसे

नेत्र नहीं जानता, नेत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर नेत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत हे ॥। १८ ॥ जो श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्रके भीतर है, जिसे श्रोत्र नहीं जानता, श्रोत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर श्रोत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १६ ॥ जो मनमें रहनेवाला मनके

भीतर है, जिसे मन नहीं जानता, मन जिसका शरीर है और जो भीतर -रहकर मनका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ २० ॥ जो त्वक्में रहनेवाला त्वक्के भीतर है, जिसे त्वक् नहीं जानती,

त्वक् जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर त्वक्का नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ २१ ॥ जो विज्ञानमें रहनेवाला

विज्ञान के भीतर है, जिसे विज्ञान नहीं जानता, विज्ञान जिसका शरीर है । और जो भीतर रहकर विज्ञानका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥२२ ॥ जो वीर्यमें रहनेवाला वीर्यके भीतर है, जिसे

वीर्य नहीं जानता, वीर्यं जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वीर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । वह दिखायी न

पृष्ठ 766

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७५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन करनेवाला है और विशेषतया ज्ञात न होनेवाला किंतु विशेषरूप से जाननेवाला है । यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब नाशवान् है । इसके पश्चात् अरुण-का पुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया ॥ २३ ॥

अथाध्यात्मम् – यः प्राणे प्राणवायुसहिते घ्राणे, यो वाचि, चक्षुषि, श्रोत्रे, मनसि, स्वचि, त्रिज्ञाने, बुद्धौ, रेतसि प्रजनने । कस्मात् पुनः कारणात् पृथिव्यादिदेवता महाभागाः सत्यो मनुष्यादिवदात्मनि तिष्ठन्तमात्मनो नियन्तार- । मन्तर्यामिणं न विदुरित्यत आह- अदृष्टो न दृष्टो न विषयी -भूतः चक्षुर्दर्शनस्य कस्यचित्, स्वयं तु चक्षुषि सन्निहितत्वाद् दृशिस्वरूप इति द्रष्टा । तथाश्रुतः श्रोत्रगोचरत्वमना-पन्नः कस्यचित्, स्वयं त्वलुप्तश्रवण-शक्तिः सर्वश्रोत्रेषु सन्निहितत्वा-च्छ्रोता । तथामतो मनःसङ्कल्प-अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है – जो प्राणमें — प्राणवायुसहित घ्राणेन्द्रियमें, जो वाणीमें, नेत्रमें, श्रोत्रमें, मन में, त्वक्में, विज्ञान यानी बुद्धिमें तथा रेत ( वीर्यं ) — प्रजननेन्द्रियमें रहनेवाला है । किंतु पृथिवी आदि [ के अधिष्ठाता ] देवता बड़े प्रभावशाली होनेपर भी. मनुष्यादिके समान अपने भीतर रहनेवाले अपने नियामक अन्तर्यामी-को क्यों नहीं जानते? इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं- वह अदृष्ट-न देखा हुआ अर्थात् किसीकी भी नेत्रदृष्टिका विषयीभूत नहीं है, किंतु f स्वयं नेत्रमें सन्निहित होनेके कारण दर्शनस्वरूप है, इसलिये द्रष्टा है । इसी प्रकार वह अश्रुत- - किसीके भी श्रोत्रकी विषयताको अप्राप्त द किंतु स्वयं जिसकी श्रवण - शक्ति त लुप्त नहीं होती – ऐसा है और समस्त श्रोत्रोंमें सन्निहित होनेके कारण श्रोता है; ऐसे S ही वह अमत - मनके संकल्पोंकी

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[ अध्याय ३ 2 किंतु सुननेवाला है, है और विशेषतया यह तुम्हारा आत्मा इसके पश्चात् अरुण-॥ मदर्शन कहा जाता में - प्राणवायुसहित तो वाणीमें, नेत्रमें, त्वक्में, विज्ञान या रेत ( वीर्य ) -बहनेवाला है । किंतु [ के अधिष्ठाता ] वशाली होनेपर भी. मान अपने भीतर नियामक अन्तर्यामी-जानते? इसपर हैं - वह अदृष्ट-नर्थात् किसीकी भी श्रीभूत नहीं है, किंतु हित होने के कारण इसलिये द्रष्टा है । वह अश्रुत - किसीके विषयताको अप्राप्त सकी श्रवण - शक्ति होती - ऐसा है श्रोत्रों में सन्निहित श्रोता है; ऐसे - मनके संकल्पोंकी ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५७ विषयतामनापन्नः दृष्टश्रुते एव हि सर्वः सङ्कल्पयति; अदृष्टत्वा-दश्रुतत्वादेवामतः; अलुप्तमनन-शक्तित्वात् सर्वमनःसु सन्निहित त्वाच्च मन्ता । तथाविज्ञातो नि-श्वयगोचरतामनापन्नो रूपादिवत् सुखादिवद्वा स्वयं त्वलुप्त -विज्ञानशक्तित्वात्तत्सन्निधानाच विज्ञाता । तत्र यं पृथिवी न वेद यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति चान्ये नियन्तव्या विज्ञातारोऽन्यो नियन्ता अन्तर्यामीति प्राप्तम्, तदन्यत्याशङ्क । निवृत्त्यर्थमुच्यते— नान्योऽतः, नान्यः श्रतोऽस्मा-दन्तर्यामिणो नान्योऽस्ति द्रष्टा, तथा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता, नान्योऽतोऽस्ति मन्ता, नान्यो-" तोऽस्ति विज्ञाता । विषयताको अप्राप्त है; क्योंकि सब लोग देखे - सुने पदार्थों का ही संकल्प करते हैं, अतः अदृष्ट और अश्रुत होनेके कारण ही वह अमत है; तथा मनन - शक्ति लुप्त न होनेसे और समस्त मनोंमें सन्निहित होने-के कारण वह मन्ता है । इसी तरह अविज्ञात – रूपादि अथवा सुखादि-के समान निश्चयको विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी विज्ञान-शक्ति लुप्त नहीं है - ऐसा एवं बुद्धिमें सन्निहित होनेके कारण विज्ञाता है । यहाँ ' जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसे समस्त भूत नहीं जानते ' इत्यादि कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि जिनका नियमन किया जाता है, वे विज्ञाता भिन्न हैं और उनका नियमन करनेवाला अन्त-र्यामी उनसे भिन्न है । उनके भिन्न-त्वकी आशङ्काको निवृत्त करने के लिये ' यह कहा जाता है- ' नान्यो-ऽतोऽस्ति द्रष्टा ' अर्थात् अत: - इस अन्तर्यामी से भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है । इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, तथा इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है ।

पृष्ठ 768

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७५८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ यस्मात् परो नास्ति द्रष्टा श्रोता । मन्ताः विज्ञाता, योऽदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, श्रमतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जितः सर्वसंसारि -णां कर्मफलविभागकर्ता— एष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः श्रस्मादीश्वरादात्मनोऽन्यदार्तम् ॥ ततो ह उद्दालक श्रारुणिरुप -रराम ॥ १५-२३ ॥ जिससे भिन्न कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है, जो दिखायी न देनेवाला किंतु देखने-वाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है; मनका अविषय किंतु मनन करनेवाला है, स्वयं अविज्ञात किंतु विज्ञाता है तथा अमृत- सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित एवं समस्त संसारियोंके कर्मफलोंका | विभाग करनेवाला है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है; इस ईश्वर आत्मासे भिन्न और सब आर्त ( विनाशी ) है । तब अरुण-का पुत्र उद्दालक निवृत्त हो गया ॥ १५–२३ ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये सप्तममन्तर्यामिब्राह्मणम् ॥ ७ ॥

अष्टम ब्राह्मण अतः परमशनायादिविनि- इससे आगे क्षुधादिरहित निरु-र्मुक्तं निरुपाधिकं साक्षादपरोक्षात् | पाधिक साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर संवन्तिरं ब्रह्म वक्तव्यमित्यत । ब्रह्मका निरूपण करना है, इसलिये आरम्भ: - आरम्भ किया जाता है-दो प्रश्न पूछने के लिये गार्गीका ग्राज्ञा माँगना अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ता-

पृष्ठ 769

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[ अध्याय ३ न कोई द्रष्टा, श्रोता, ज्ञाता नहीं है, जो वाला किंतु देखने-यी न देनेवाला किंतु ; मनका अविषय करनेवाला है, स्वयं विज्ञाता है तथा संसारधर्मोसे रहित रियोंके कर्मफलोंका बाला है, वह तुम्हारा मी अमृत है; इस से भिन्न और सब ती ) है । तब अरुण-क निवृत्त हो गया ध्याये ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५ ९ हमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥

फिर वाचक्नवीने कहा, ' पूजनीय ब्राह्मणगण! अब मैं इनसे दो प्रश्न पूछूंगी । यदि ये मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमें से कोई भी इन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वादमें नहीं गार्गि! पूछ ' ॥ १ ॥

अथ ह वाचक्नव्युवाच । पूर्वं याज्ञवल्क्येन निषिद्धा मूर्धपात-भयादुपरता सती पुनः प्रष्टु ब्राह्मणानुज्ञां प्रार्थयते - हे ब्राह्मणा भगवन्तः पूजावन्तः शृणुत मम वचः हन्ताहमिमं याज्ञवल्क्यं पुन प्रश्न प्रक्ष्यामि, यद्यनु-मतिर्भवतामस्ति; तौ प्रश्नौ चेद्यदि वक्ष्यति कथयिष्यति मे, कथञ्चिन्न वै जातु कदाचिद् युष्माकं मध्ये इमं याज्ञवल्क्यं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं ब्रह्मवदनं प्रति जेता न वै कश्चिद् भवेदिति । एवमुक्ता ब्राह्मणा अनुज्ञां प्रददुः - पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥

जीत सकेगा । ' [ ब्राह्मण- ] ' अच्छा फिर वाचक्नवीने कहा । पहले याज्ञवल्क्य के निषेध करनेपर मस्तक गिर जानेके भयसे मौन हुई वाच-क्नवी पुनः प्रश्न करनेके लिये ब्राह्मणोंसे आज्ञा माँगती है – - ' हे | भगवान् — पूजावान् ब्राह्मणगण! मेरी बात सुनिये; यदि आपलोंगोंकी अनुमति हो तो मैं इन याज्ञवल्क्यजो-से दो प्रश्न ओर पूछूंगी । यदि ये उन दो प्रश्नोंका मुझे उत्तर दे देंगे तो आपमें से कोई भी इन याज्ञवल्क्यजो-को ब्रह्मसम्बन्धो वादमें कभी किसी प्रकार भी जोतनेवाला नहीं हो सकेगा । इस प्रकार कहे जानेपर | ब्राह्मणोंने ' हे गार्गि! तू पूछ ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति दे दी ॥ १ ॥

गे क्षुधादिरहित निरु-न्तु अपरोक्ष सर्वान्तर ण करना है, इसलिये - जाता है -माँगना नगवन्तो हन्ता-साहोवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥

पृष्ठ 770

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७६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ वह बोली, ' हे याज्ञवल्क्य! जिस प्रकार काशी या विदेहका रहने-वाला कोई वीर - वंशज प्रत्यचाहीन धनुषपर प्रत्यचा चढ़ाकर शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले दो बाणवान् शर हाथमें लेकर खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं दो प्रश्न लेकर तुम्हारे सामने उपस्थित होती हूँ; तुम मुझे उनका उत्तर दो । ' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, गार्गि! ' पूछ ' ॥ २ ॥

लब्धानुज्ञा ह याज्ञवल्क्यं सा आज्ञा मिलने पर उसने याज्ञ-वल्क्यसे कहा- ' मैं तुमसे दो प्रश्न होवाच- अहं वै त्वा त्वां द्वो पूछूंगी ' ऐसा इसका अन्वय है । वे प्रश्न प्रक्ष्यामीत्यनुषज्यते; कौ प्रश्न कौन से हैं? ऐसी जिज्ञासा होनेपर यह दिखलाने के लिये कि ताविति जिज्ञासायां तयोर्दुरुत्तरत्वं उनका उत्तर देना कठिन है, गार्गी द्योतयितुं दृष्टान्तपूर्वकं तावाह -हे याज्ञवल्क्य यथा लोके काश्य: -काशिषु भवः काश्यः, प्रसिद्धं शौयं काश्ये, वैदेहो वा विदेहानां वा राजा, उग्रपुत्रःशूगन्वय इत्यर्थः, उज्ज्यम् अवतारितज्याकं धनुः पुनरधिज्यम् श्रारोपितज्याकं । कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ - बाणशब्देन शराग्रे यो वंशखण्डः सन्धीयते, तेन विनापि शरो भवतीत्यतो विशिनष्टि बाणवन्ताविति - द्वौ । उन्हें दृष्टान्तपूर्वक बतलाती है— ' हे याज्ञवल्क्य! जिस प्रकार लोकमें कोई काश्य - — ' काशि ' प्रान्तमें उत्पन्न हुआ, काशि - प्रान्त-में उत्पन्न होनेवालों में शूरवीरता प्रसिद्ध है अथवा वैदेह ' - विदेह -निवासी या विदेह देशका राजा उग्रपुत्र अर्थात् जो वीर वंशमें उत्पन्न हुआ है, वह उज्ज्य— जिसकी ज्या ( डोरी ) उतार ली गयी है, ऐसे धनुषको पुनः ज्यायुक्त कर अर्थात् उसकी प्रत्यचा चढ़ा करके दो बाणवान् - यहाँ ' बाण ' शब्दसे यह व्यक्त होता है कि शरके अग्र-भागोंमें जो बाँसका टुकड़ा लगाया जाता है, उसके बिना भी बाण होता है, इसीसे ' बाणवान् ' यह विशेषण दिया गया है, तात्पर्य यह