बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 771–780
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
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[ अध्याय ३ - या विदेहका रहने-चढ़ाकर शत्रुओं को - खड़ा होता है, उसी होती हूँ; तुम मुझे ! ‘ पूछ ' ॥ २ ॥
-लने पर उसने याज्ञ-- ' मैं तुमसे दो प्रश्न इसका अन्वय है । वे हैं? ऐसी जिज्ञासा दिखलाने के लिये कि ना कठिन है, गार्गी क बतलाती है-! जिस प्रकार काश्य – ' काशि ' हुआ, काशि- प्रान्त-वालोंमें शूरवीरता वा वैदेह - विदेह-चदेह देशका राजा तो वीर वंशमें उत्पन्न - उज्ज्य— जिसकी उतार ली गयी है, पुनः ज्यायुक्त कर प्रत्यचा चढ़ा करके यहाँ ' बाण ' शब्दसे है कि शरके अग्र-का टुकड़ा लगाया बिना भी बाण ने ' बाणवान् ' यह या है, तात्पर्य यह ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ बाणवन्तौ शरौ, तयोरेव विशेषणं सपनातिव्याधिनौ शत्रोः पीडा-करावतिशयेन, हस्ते कृत्वोपो-तिष्ठेत् समीपत श्रात्मानं दर्शयेत् | एवमेवाहं त्वा त्वां शरस्थानी- । याभ्यां प्रश्नाभ्यां द्वाभ्यामुपोद-स्थां उत्थितवत्यस्मि त्वत्समीपे ।
तौ मे ब्रूहीति — ब्रह्मविच्चेत् ।
आहेतर: - पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥
७६१ । कि दो बाणवान् शर, इन्हींका विशेषण है ' सपत्नातिव्याधिनौ ', इसका अर्थ है – शत्रुओं को अत्यन्त पीडा देनेवाले, ऐसे बाणोंको हाथमें लेकर उपस्थित हो – अपनेको पास जाकर दिखाये, उसी प्रकार में शरस्थानीय दो प्रश्न लेकर तुम्हारे निकट उपस्थित हुई हूँ, अत: यदि तुम ब्रह्मवेत्ता हो तो उनका उत्तर दो । ' इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा – ' गार्गि! पूछ ' ॥ २ ॥
पहला प्रश्न सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथि-व्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्य च्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ३ ॥
वह बोली, ' हे याज्ञवल्क्य! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवी के मध्य में है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य - इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओत - प्रोत हैं? ' ॥ ३ ॥
सा होवाच- दूर्ध्वमुपरि दिवःअण्डकपालाद् यच्चावागधः पृथिव्या अधोऽण्डकपालात्, - यच्चान्तरा मध्ये द्यावापृथिवी । वह बोली, ' जो द्युलोकरूप अण्डकपालसे ऊर्ध्व — ऊपर है और जो पृथिवीसे यानी इस नीचेके अण्डकपालसे नीचे है तथा जो द्यावापृथिवीके मध्य-में है अर्थात् द्युलोक और
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७६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ द्यावापृथिव्योः अण्डकपालयोः, । इमे च द्यावापृथिवी, यद्भूतं यच्चातीतम्, भवच्च वर्तमानं स्वव्यापारस्थम्, भविष्यच्च वर्तमानादूर्ध्व कालभावि लिङ्ग - । गम्यम् — यत् सर्वमेतदा चक्षते कथयन्त्यागमतः – तत् सर्वं द्वैत जातं यस्मिन्नेकी भवती-त्यर्थः- तत् सूत्रसंज्ञं पूर्वोक्तं कस्मिन्नोतं च प्रोतं च पृथिवी -धातुरिवाप्सु ॥ ३ । पृथिवी - इन अण्डकपालोंके बीचमें है; एवं स्वयं जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जो कुछ भी भूत-यानी बीत चुका है, भवत् — वर्त-मान अर्थात् अपने व्यापार में स्थित और भविष्यत् - वर्तमानके बादके समयमें होनेवाला एवं अनुमानगम्य है - ऐसा जो यह सब आगमद्वारा कहा जाता है, वह सम्पूर्ण द्वैतवर्ग जिसमें एक हो जाता है, वह पहले बतलाया हुआ सूत्रसंज्ञक तत्त्व, जलमें पृथिवीतत्त्वके समान, किसमें ओत - प्रोत है? ' ॥ ३ ॥
याज्ञवल्क्यका उत्तर स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्याः यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्य-च्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे गार्गि! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्य में है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान एवं भविष्य - इस प्रकार कहते हैं, के सब आकाशमें ओतप्रोत हैं ' ॥ ४ ॥
स होवाचेतरः- हे गार्गि यत । उस इतर याज्ञवल्क्यने कहा,. स्वयोक्तम् ' ऊर्ध्वं दिवः ' इत्यादि, ' हे गागि! तूने जिसे द्युलोकसे ऊपर तत् सर्वं यत् सूत्रमाचक्षते इत्यादि कहकर बतलाया वह सब,. तत् जिसे कि ' सूत्र ' ऐसा कहते हैं - वह सूत्रम्, आकाशे तदोतं प्रोतं च, सूत्र आकाशमें ओतप्रोत है । यह.
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[ अध्याय ३ ण्डकपालोंके बीच में लोक और जो कुछ भी भूत-है, भवत्वर्त-व्यापार में स्थित - वर्तमानके बादके -T एवं अनुमानगम्य वह सब आगमद्वारा वह सम्पूर्णं द्वैतवर्ग जाता है, वह पहले सूत्रसंज्ञक तत्त्व, व के समान, किसमें ॥ ३ ॥
दवाक् पृथिव्याः नवच्च भविष्य-चेति ॥ ४ ॥
ऊपर, पृथिवीसे नीचे जो ये द्युलोक और स प्रकार कहते हैं, वे याज्ञवल्क्यने कहा,. जिसे द्युलोक से ऊपर र बतलाया वह सब, ऐसा कहते हैं - वह ओतप्रोत है । यह: ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ. ७६३ 226 यदेतद् व्याकृतं सूत्रात्मकं जगद- | जो सूत्रस्वरूप व्याकृत जगत् है, वह व्याकृताकाशे, अप्स्विव पृथिवी- जलमें पृथिवीतत्त्वके समान उत्पत्ति स्थिति और लय तीनों धातुः, त्रिष्वपि कालेषु वर्तते कालोंमें अव्याकृत आकाशमें विद्य-उत्पत्तौ स्थितौ लये च ॥ ४ ॥ । मान है ' ॥ ४ ॥
सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥
वह बोली, ' हे याज्ञवल्क्य! आपको नमस्कार है, जिन्होंने
प्रश्नका उत्तर दे दिया; अब आप दूसरे प्रश्न के लिये तैयार हो जाइये ।
[ याज्ञवल्क्य - ] ' गागि! पूछ ' ॥ ५
पुनः सा होवाच; नमस्ते-s स्त्वित्यादि प्रश्नस्य दुर्वचत्व-प्रदर्शनार्थम्; यो मे ममैतं प्रश्नं | व्यवोचो विशेषेणापाकृतवानसि; एतस्य दुर्वचत्वे कारणम् - सूत्र-मैत्र यावदगम्यमितरैर्दुर्वाच्यम्, किमुत तत्, यस्मिन्नोतं च प्रोतं चेति श्रतो नमोऽस्तु नमोऽस्तु ते तुभ्यम् । अपरस्मै द्वितीयाय प्रश्नाय धारयस्व दृढीकुस्मान -मित्यर्थः । पृच्छ गार्गीतीतर आह ॥ ५ ॥
॥ उसने पुन: कहा; आपको नमस्कार है— इत्यादि कथन यह प्रदर्शित करनेके लिये है कि इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन था । ' जिन आपने मेरे इस प्रश्न की व्याख्या की है अर्थात् इसका विशेषरूपसे निराकरण किया है । इस प्रश्नको कठिनाई में कारण यह है कि प्रथम तो सूत्र ही अगम्य यानी किसी दूसरेके लिये दुर्वाच्य है, फिर जिसमें वह भी ओतप्रोत है, उसका तो कहना ही क्या है; इसलिये आपको नमस्कार है । अब अन्य यानी द्वितीय प्रश्नके लिये अपनेको तैयार यानी पक्का कर लीजिये । इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, ' गार्गि! पूछ ' ॥ ५ ॥
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७६४ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ३ उपक्रमसहित दूसरा प्रश्न सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथि-व्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥
वह बोली, ' हे याज्ञवल्क्य! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्य में है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य - इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं? ' ॥ ६ ॥
व्याख्यातमन्यत्; सा होवाच -यदुवं याज्ञवल्क्येत्यादिप्रश्नः
प्रतिवचनं च उक्तस्यवार्थस्याव-धारणार्थं पुनरुच्यते; न किञ्चि ।
दपूर्वमर्थान्तरमुच्यते ॥ ६ ॥
अन्य ( छठे मन्त्रके पदों ) की व्याख्या पहले ( तृतीय मन्त्रमें ) की जा चुकी है । ' यद्ध्वं याज्ञवल्क्य ' इत्यादि प्रश्न और इसका उत्तर पूर्वोक्त अर्थका ही निश्चय करनेके लिये पुनः कहा गया है; यहाँ कोई दूसरा अपूर्वं ( नूतन ) अर्थ नहीं कहा गया ॥ ६ ॥
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्य-च्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे गार्गि! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य — इस प्रकार कहते हैं, चे सब आकाशमें ही ओतप्रोत हैं । ' [ गार्गी - ] ' किंतु आकाश किसमें ओत-प्रोत है? ' ॥ ७ ॥
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[ अध्याय ३ बोयदवाक्पृथि-तं च भवच्च स्रोतं चेति ॥६ ॥
है, जो पृथिवीसे नीचे यं भी जो ये द्युलोक - इस प्रकार कहते मन्त्रके पदों ) की ( तृतीय मन्त्रमें ) की “ यदूध्वं याज्ञवल्क्य ' और इसका उत्तर ही निश्चय करने के गया है; यहाँ कोई नूतन ) अर्थ नहीं ॥ दवाक् पृथिव्या वच्च भविष्य-च प्रोतं चेति न ॥ ७ ॥
पर, पृथिवीसे नीचे जो ये द्युलोक और इस प्रकार कहते हैं, काश किसमें ओत-ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ सर्वं यथोक्तं गार्ग्या प्रत्युच्चार्य तमेव पूर्वोक्तमर्थमवधारितवाना-काश एवेति याज्ञवल्क्यः । गार्ग्याह – कस्मिन्नु खन्ना-काश श्रतश्च प्रोतश्चेति । श्राका-शमेव तावत् कालत्रयातीतस्वाद् दुर्वाच्यम्, ततोऽपि कष्टतर-मतरम्, यस्मिन्नाकाशमोतं च प्रोतं च, अतोऽवाच्यमिति कृत्वा, न प्रतिपद्यते सा अप्रतिपत्तिर्नाम निग्रहस्थानं तार्किकसमये; अथा-वाच्यमपि वक्ष्यति, तथापि विप्रतिपत्तिर्नाम निग्रहस्थानम्; विरुद्धा प्रतिपत्तिर्हि सा, यद-वाच्यस्य वदनम्; अतो दुर्वचनं प्रश्नं मन्यते गार्गी ॥ ७ ॥
७६५ गार्गी के पूर्वोक्त वाक्यको पुनः | कहकर याज्ञवल्क्यने ' आकाशमें ही ओतप्रोत है ' ऐसा कहकर पहले कही हुई बातकी ही पुष्टि की है । गार्गीने कहा, ' किंतु आकाश किसमें ओतप्रोत है! ' तीनों कालोंसे परे होने के कारण पहले तो आकाश-का ही बतलाना कठिन है, उससे भी क्लिष्टतर अक्षर है, जिसमें कि आकाश ओतप्रोत है; अतः यह समझकर कि वह अवाच्य है उसे कोई अनुभव नहीं कर सकता और अप्रतिपत्ति ( अनुभव न होना ) -यह तार्किकों के सिद्धान्त में निग्रह-स्थान माना जाता है; और यदि याज्ञवल्क्यने इस अवाच्य विषयका भी वर्णन किया तो यह विप्रति-पत्तिरूप ( विपरीत अनुभवरूप ) निग्रहस्थान होगा, क्योंकि अवाच्य-को कहना यह विरुद्ध प्रतिपत्ति ही है; इसलिये गार्गी इस प्रश्नका उत्तर वताना कठिन समझती है ॥ ७ ॥
याज्ञवल्क्यका उत्तर तद् दोषद्वयमपि परिजिहीर्ष- इन ( अप्रतिपत्ति और विप्रति-पत्ति ) दोनों दोषोंको निवृत्त करने-नाह— की इच्छासे याज्ञवल्क्य कहते हैं-
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७६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ स होवाचैतद् वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिव-दन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्व मदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छाय-मतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षुष्कम श्रोत्र--मवागमनोऽतेजस्कमप्राणम मुखममात्रमनन्तरम् बाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे गागि! उस इस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता -अक्षर कहते हैं; यह न मोटा है, न न लाल है, न द्रव है, न छाया है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है - वाणी है, नमन है, न तेज है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है, वह ' नहीं खाता ' ॥ ८ ॥
स होवाच याज्ञवल्क्यः -- एतद् वै तद् यत् पृष्टवत्यसि कस्मिन्नु खल्वाकाश श्रोतश्च प्रोतश्चेति किं तत्? अक्षरम् - यन्न क्षीयते न चरतीति वातरम् --तदक्षरं हे गार्गि ब्राह्मणा ब्रह्मविदोऽभि -वदन्ति । ब्राह्मणाभिवदनकथ-नेन - नाहमवाच्यं वक्ष्यामि न च न प्रतिपद्येयम् - इत्येवं दोष-द्वयं परिहरति । पतला है, न छोटा है, न बढ़ा है, न तम ( अन्धकार ) है, न वायु है, , न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न प्राण है, न सुख है, न माप है, कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी | 3 उस याज्ञवल्क्य ने कहा- तूने जिसके विषय में पूछा था कि यह आकाश किसमें ओतप्रोत है? वह यही है । वह क्या है? अक्षर, जो क्षीण नहीं होता अथवा क्षरित नहीं होता, वह अक्षर है, सो हे गार्गि! उसे ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं । ' ब्राह्मण कहते हैं ' इस कथन के द्वारा — मैं अवाच्यका वर्णन नहीं करूँगा, तथा यह भी नहीं कि मैं उसे नहीं जानता - इस प्रकार सूचित करके दोनों दोषोंका परिहार करते हैं ।
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[ अध्याय ३ ह्मणा अभिव-स्नेहमच्छाय-चक्षुष्कम श्रोत्र-अनन्तरमबाह्यं न ॥ ८ ॥
को तो ब्रह्मवेत्ता छोटा है, न बड़ा है, बार ) है, न वायु है, नेत्र है, न कान है, मुख है, न माप है, बाता, उसे कोई भी ज्ञवल्क्यने कहा- तूने में पूछा था कि यह ओतप्रोत है? वह क्या है? अक्षर, होता अथवा क्षरित वह अक्षर है, सो हे ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता कहते हैं । ' ब्राह्मण कथनके द्वारा- -मैं न नहीं करूंगा, नहीं कि मैं उसे नहीं नकार सूचित करके परिहार करते हैं । ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थं एवमपाकृते प्रश्ने पुनर्गाः प्रतिवचनं द्रष्टव्यम् — ब्रूहि कि तदक्षरम् १ यद् ब्राह्मणा अभि-चदन्ति, इत्युक्त आह— अस्थूलं तत् स्थूलादन्यत्, एवं तर्ह्यणु १ अणु, अस्तु तर्हि स्वम्, अहस्वम्; एवं तर्हि दीर्घम्, नापि दीर्घमदीर्घम्; एवमेतैश्चतुर्भिः परिमाणप्रतिषेधैर्द्रव्यधर्मः प्रति-षिद्धः, न द्रव्यं तदक्षरमित्यर्थः । अस्तु तर्हि लोहितो गुणः, ततोऽप्यन्यदलोहितम्, आग्नेयो गुणो लोहितः भवतु तर्ह्यां स्नेहनम् न, अस्नेहनम्;; अस्तु तर्हिच्छाया, सर्वथाप्य-निर्देश्यत्वात्, छायाया अध्य- । न्यदच्छायम्; अस्तु तर्हि तमः, अतमः भवतु वायु-स्तर्हि, अवायुः; भवेतर्ह्याकाशम्, । ७६७ इस प्रकार प्रश्नका निराकरण हो जानेपर फिर गार्गीका यह प्रश्न समझना चाहिये, ' अच्छा तो बताओ ब्रह्मवेत्ता लोग जिसका वर्णन करते हैं, वह अक्षर क्या है? ऐसा कहे जानेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं - वह अस्थूल - स्थूलसे भिन्न है; तो क्या अणु ( सूक्ष्म ) है? नहीं, अनण ( सूक्ष्मसे भिन्न ) है; अच्छा तो ह्रस्व ( छोटा ) होगा? – नहीं, वह ह्रस्व भी नहीं है; ऐसी बात है दीर्घं हो सकता है? नहीं, दीर्घं भी नहीं है, अदीर्घ है; इस प्रकार उसके स्थूलत्व ( मोटाई ) आदि परिमाण-का प्रतिषेध करनेवाले इन चार पदोंद्वारा द्रव्य - धर्म का निषेध किया गया है । तात्पर्य यह कि वह अक्षर द्रव्य नहीं है । तो फिर वह लोहित ( लाल ) गुण हो सकता है? नहीं उससे भी भिन्न अलोहित है; लोहित अग्निका गुण है; अच्छा तो जलका गुण स्नेहन ( द्रवीभाव ) होगा? नहीं, वह अस्नेह है; तो फिर वह छाया होगा? नहीं, सर्वथा ही अनिर्देश्य होनेके कारण छायासे भी भिन्न अच्छाय है; तो फिर तम होगा? नहीं, अतम है; अच्छा तो वह वायु होगा? नहीं, वह अवायु है; तो फिर आकाश
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७६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय रे अनाकाशम्; भवतु तर्हि सङ्गा त्मकं जतुवत्, श्रसङ्गम्; रसो-ऽस्तु तर्हि, अरसम्; तथा गन्धो-ऽस्त्वगन्धम्; अस्तु तर्हि चक्षुः, अचक्षुष्कम् - न हि चक्षुरस्य करणं विद्यतेऽतोऽचक्षुष्क्रम्; " पश्यत्यचक्षुः " ( श्वेता ० उ ० ३ । १ ९ ) इति मन्त्रवर्णात् । तथाश्रोत्रम्; " स शृणोत्य-कर्णः ” ( श्वेता ० उ ० ३ | १ ९ ) इति भवतु तर्हि वागवाकू; तथामनः; तथातेजस्कम् —-विद्यमानं तेजोऽस्य तदतेज-स्क्रम्; न हि तेजोऽग्न्यादि-प्रकाशवदस्य विद्यते; अप्राणम् -आध्यात्मिको वायुः प्रतिषिध्यते-ऽप्राणमिति मुखं तर्हि द्वारं तदमुखम्; अमात्रम् —मीयते येन तन्मात्रम् अमात्रं मात्रा -रूपं तन्न भवति, न तेन किश्चि- । न्मीयते; अस्तु तर्हिच्छिद्रवत्, अनन्तरम् — नास्यान्तरमस्ति; होगा? नहीं, अनाक फिर जतु ( लाक्षा ) के समान सङ्गवान् होगा? नहीं, वह असङ्ग है; तो रस होगा? नहीं, अरस है; अच्छा तो गन्ध होगा? नहीं, अगन्ध है; तो फिर चक्षु होगा? नहीं, अचक्षुष्क है; इसके चक्षु इन्द्रिय नहीं है; इसलिये यह अचक्षुष्क है; जैसा कि " यह चक्षुहीन होने-पर भी देखता है " इस मन्त्रवर्णसे, प्रमाणित होता है । इसी प्रकार " वह कर्णहीन होकर भी सुनता है " इस श्रुतिके अनुसार अश्रोत्र है; तो फिर वाकू होगा? नहीं, अवाक् है; तथा अमन है और इसी प्रकार अतेजस्क जिसमें तेज नहीं है, ऐसा अतेजस्क, है, क्योंकि अग्नि आदिके प्रकाशके समान इसमें तेज नहीं है; अप्राण-ऐसा कहकर शरीरान्तर्गत वायुका प्रतिषेध किया जाता है, अतः अप्राण है । तो फिर वह मुख यानी द्वार है? नहीं, वह अमुख है; वह अमात्र है, जिससे माप किया जाय उसे मात्र कहते हैं, वह अमात्र अर्थात् मात्रारूप नहीं है, उससे किसी का भी माप नहीं किया जाता; तो फिर वह छिद्रवान् होगा? नहीं, वह अनन्तर है, उसमें अन्तर ( छिद्र ) नहीं है; तो फिर उसका
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[ अध्याय ३ अनाकाश है; तो नाक्षा ) के समान ? नहीं, वह असङ्ग ? नहीं, अरस है;, न्ध होगा? नहीं, फिर चक्षु होगा? है; इसके चक्षु इन्द्रिय लिये यह अचक्षुष्क ' यह चक्षुहीन होने-" है " इस मन्त्रवर्णसे, है । कार " वह कर्णहीन ता है " इस श्रुतिके है; तो फिर वाक् अवाक् है; तथा इसी प्रकार अतेजस्क है, ऐसा अतेजस्क, न आदिके प्रकाशके ज नहीं है; अप्राण-रीरान्तर्गत वायुका जाता है, अतः फिर वह मुख यानी - वह अमुख है; वह से माप किया जाय हते हैं, वह अमात्र रूप नहीं है, उससे प नहीं किया जाता; छिद्रवान् होगा? तर है, उसमें अन्तर है; तो फिर उसका ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थं सम्भवेत् तहिं बहिस्तस्य, श्रबाह्यम्; अस्तु तर्हि भक्षयित तत् न तदश्नाति किञ्चन; भवे-तहिं भक्ष्यं कस्यचित्, न तद-श्नाति कश्चन सर्व विशेषणरहि-तमित्यर्थः; एकमेवाद्वितीयं हि तत् केन किं विशिष्यते ॥ ८ ॥!
७६ ९ | बाह्य तो सम्भव हो ही सकता है? नहीं, वह अबाह्य है, अच्छा तो वह भक्षण करनेवाला होगा? नहीं, वह कुछ भी नहीं खाता; तब वह स्वयं ही किसी दूसरेका भक्ष्य हो सकता है? नहीं; उसे कोई भी नहीं खाता; तात्पर्य यह है कि वह समस्त विशेषणोंसे रहित है; वह तो द्वितीयसे रहित अकेला ही है, फिर किससे किसको विशेषित किया जाय? ॥ ८ ॥
अनुमानप्रमारणद्वारा अक्षरका निरूपण अनेक विशेषणप्रतिषेधप्रयासा-दस्तित्वं तावदक्षरस्योपगमितं श्रुत्या; तथापि लोकबुद्धिमपेक्ष्या शङ्क्यते यतः, तोऽस्तित्वा-यानुमानं प्रमाणमुपन्यस्यति -! एतस्य वा अक्षरस्य श्रुतिने अनेक विशेषणोंके प्रति-षेवरूप प्रयासद्वारा तबतक उस अक्षरका अस्तित्व समझा दिया है; तो भी चूँकि लोकबुद्धिकी अपेक्षासे उसके अस्तित्वमें आशङ्का की जाती है, इसलिये इसके लिये अनुमान-प्रमाणका उल्लेख करती है— प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्र-मसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहो -रात्राण्यर्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रती-वृ ० उ०४६-
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७७० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ AAVAN च्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवा दर्वी पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ६ ॥
हे गार्गि! इस अक्षरके ही प्रशासन में सूर्य और चन्द्रमा विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गागि! इस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गागि! इस अक्षरके ही ' प्रशासनमें निमेष, मुहूर्त, दिन - रात, अर्धमास ( पक्ष ) मास, ऋतु और संवत्सर विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गागि! इस अक्षरके ही प्रशासन में पूर्ववाहिनी एवं अन्य नदियां श्वेत पर्वतोंसे बहती हैं तथा अन्य पश्चिमवाहिनी नदियां जिस - जिस दिशाको बहने लगती हैं, उसीका अनुसरण करती रहती हैं । हे गार्गि! इस अक्षरके ही प्रशासन में मनुष्य दाताकी प्रशंसा करते हैं तथा देवगण यजमानका और पितृगण दर्वीहोमका अनुवर्तन करते ६ ॥ एतस्य वा अक्षरस्य; यदेत-दधिगतमक्षरं सर्वान्तरं साक्षा-दपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा अश-नायादिधर्मातीतः, एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने — यथा राज्ञः प्रशासने राज्यमस्फुटितं नियतं वर्तते, एवमेतस्याक्षरस्य प्रशा-सने हे गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ, सूर्यश्च चन्द्रमाश्च सूर्याचन्द्रमसौ अहोरात्रयोर्लोकप्रदीपौ, ताद-न प्रशासित्रा ताभ्यां निर्वर्त्यमानलोकप्रयोजनविज्ञान - । ' एतस्य वा अक्षरस्य ' इत्यादि; यह जो सर्वान्तर साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्मरूप अक्षर जाना गया है, जो क्षुधादि धर्मोसे रहित आत्मा है, हे गागि! इस अक्षरके प्रशासनमें— जैसे कि राजाके प्रशासन में राज्य अखण्ड और नियमितरूपसे रहता है, इसी प्रकार इस अक्षरके प्रशासन में सूर्याचन्द्रमसी - सूर्य और चन्द्र, जो दिन और रात के समय लोकके दीपक ही हैं और जिन्हें उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले लोकके प्रयोजनको जाननेवाले प्रशा-सनकर्ताने उस उद्देश्य की पूर्तिके