बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 781–790

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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[ अध्याय ३ नवा अक्षरस्य सन्ति यजमानं चन्द्रमा विशेषरूप से नक्षरके ही प्रशासन में रहते हैं । हे गागि! अर्धमास ( पक्ष ) एस्थित रहते हैं । हे _वं अन्य नदियां श्वेत जिस - जिस दिशाको हे गार्गि! इस अक्षरके देवगण यजमानका अक्षरस्य ' इत्यादि; बर साक्षात् अपरोक्ष जाना गया है, जो रहित आत्मा है, हे क्षरके प्रशासन में-के प्रशासन में राज्य नयमितरूपसे रहता कार इस अक्षर के सूर्याचन्द्रमसौ – सूर्यं दिन और रातके दीपक ही हैं और सिद्ध होनेवाले को जानने वाले प्रशा-- उद्देश्य की पतिके ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१ वता निर्मितौ च स्यातां । साधारण सर्व प्राणि प्रकाशोपकार-कत्वाल्लौकिकप्रदीपवत् । तस्मा-दस्ति तद् येन विघृतावीश्वरौ स्वतन्त्र सन्तौ निर्मितौ तिष्ठतो नियतदेशकालनिमिचोदयास्त-मयवृद्धिक्षयाभ्यां वर्तेते; तदस्त्ये-चमेतयोः प्रशासित्रतरम्, प्रदी-पकर्तृ विधारयितृवत् । एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यों द्यौश्च पृथिवी ` च सावयवत्वात् स्फुटनस्वभावे अपि सत्यौ गुरुत्वात् पतनस्व-भावे संयुक्तत्वाद् वियोगस्वभावे चेतनावदभिमानिदेवताधिष्ठि-तत्वात् स्वतन्त्रे अपि एतस्या-तरस्य प्रशासने वर्तेते विधृते तिष्ठतः; एतद्ध्यक्षरं सर्व-व्यवस्थासेतुः सर्वमर्यादावि-धरणम्, श्रतो नास्याक्षरस्य प्र-लिये रचा है, साधारणतया समस्त प्राणियोंका प्रकाशरूप उपकार करनेवाले होनेसे लौकिक दीपकोंके समान धारण किये हुए: स्थित हैं । अतः ये दोनों ( सूर्य और चन्द्र ) स्वतन्त्र ईश्वर होनेपर भी जिसके द्वारा निर्मित और विवृत होकर नियत देश, काल और [ प्राणियोंके अदृष्टरूप ] निमित्तसे उदय - अस्त एवं वृद्धि - क्षयको प्राप्त होते हुए विद्य-मान रहते हैं, वह अक्षर है तथा इस प्रकार वह अक्षर दीपकके कर्ता और विधारयिता के समान इन दोनोंका प्रशासनकर्ता है । हे गागि! इस अक्षरके ही प्रशासन में ' द्यावापृथिव्यौ ' - द्युलोक और पृथिवी सावयव होनेके कारण फूटनेके स्वभाववाले, भारी होनेके कारण गिरनेके स्वभाववाले, संयुक्त होनेके कारण वियुक्त होनेके स्वभाववाले और चेतनावान् अभिमानी देवतासे अधिष्ठित होने के कारण स्वतन्त्र होनेपर भी इस अक्षरके प्रशासनमें विघृत होकर स्थित हैं । यह अक्षर ही समस्त व्यवस्थाओंका सेतु - समस्त मर्यादाओंका विधारक है; अत: द्युलोक और पृथिवी इसके

पृष्ठ 782

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७७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ शासनं द्यावापृथिव्यावतिक्रामतः तस्मात् सिद्धमस्यास्तित्वमक्षरस्य श्रव्यभिचारि हि तलिङ्गम्, यद् द्यावापृथिव्यौ नियते वर्तेते; चेतनावन्तं प्रशासितारम संसारिण-मन्तरेण नैतद् युक्तम् । “ येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा " इति मन्त्रवर्णात् । एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता इत्येते कालावयवाः सर्वस्य अतीताना-गतवर्तमानस्य जनिमतः कल-यितारः - यथा लोके प्रभुणा नियतो गणकः सर्वमायं व्ययं चाप्रमत्तो गणयति, तथा प्रभु-स्थानीय एषां कालावयवानां नियन्ता । तथा प्राच्यः प्रागञ्चनाः पूर्व-दिग्गमना नद्यः स्यन्दन्ते स्रवन्ति श्वेतेभ्यो हिमवदादिभ्यः पर्वतेभ्यो गिरिभ्यो गङ्गाद्या नद्यस्ताश्च यथा । BALALALALA, प्रशासनका अतिक्रमण नहीं सकते; इससे इस अक्षरका अस्तित्व सिद्ध होता है; द्युलोक और पृथिवी इसके द्वारा नियमित होकर विद्य मान हैं - यह इसकी सत्ताका अव्य-भिचारी लिङ्ग है; क्योंकि किसी चेतनावान् असंसारी शासकके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है; जैसा कि “ जिसके द्वारा द्युलोक उग्र और पृथिवी दृढ की गयी है " इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है । हे गार्गि! इस अक्षरके प्रशासन-में ही निमेष, मुहूर्त इत्यादि कालके अवयव उत्पन्न होनेवाले समस्त अतीत और अनागत पदार्थोंकी कलना ( गणना ) करनेवाले हैं; जिस प्रकार लोकमें स्वामीके द्वारा नियुक्त किया हुआ गणक ( मुनीम ) प्रमादशून्य रहकर समस्त आय और व्ययकी गणना करता है, उसी प्रकार इन कालावयवोंका नियन्ता भी इनका प्रभुरूप है । इसी तरह हिमालय आदि श्वेत पर्वतोंसे निकलनेवाली प्राच्य - पूर्वकी ओर बहनेवाली अर्थात् पूर्व - दिशाकी ओर गमन करनेवाली गङ्गा आदि नदियां, अन्य दिशामें प्रवृत्त होने का

पृष्ठ 783

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[ अध्याय ३ अतिक्रमण नहीं कर इस अक्षरका अस्तित्व द्युलोक और पृथिवी नयमित होकर विद्य सकी सत्ताका अव्य-= है; क्योंकि किसी सारी शासक के बिना भव नहीं है; जैसा रा द्युलोक उग्र और गयी है " इत्यादि होता है । इस अक्षर के प्रशासन-मुहूर्त इत्यादि कालके होनेवाले समस्त अनागत पदार्थोंकी ना ) करनेवाले हैं; कमें स्वामी के द्वारा हुआ गणक ( मुनीम ) हकर समस्त आय णना करता है, उसी लावयवोंका नियन्ता रूप है । हिमालय आदि श्वेत नेवाली प्राच्य- य - पूर्वकी अर्थात् पूर्व - दिशाकी रनेवाली गङ्गा आदि दिशामें प्रवृत्त होनेका ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७३ प्रवर्तिता एव नियताः प्रवर्तन्ते - | सामर्थ्य होनेपर भी, जिस ऽन्यथापि प्रवर्तितुमुत्सहन्त्य ओर नियुक्त कर दी गयी हैं, उसी ; ओर प्रवृत्त रहती हैं, यह भी उस तदेतल्लिङ्गं प्रशास्तुः । प्रतीच्यो- प्रशासनकर्ताकी सत्ताका लिङ्ग है । ऽन्याः प्रतीचीं दिशमञ्चन्ति सिन्धवाद्या नद्यः; अन्याश्च यां यां दिशमनुप्रवृत्तास्तां तां न व्यभिचरन्तिः तच्च लिङ्गम् । किञ्च ददतो हिरण्यादीन् प्रय-च्छत आत्मपीडां कुर्वतोऽपि प्रमाणज्ञा अपि मनुष्याः प्रशं-सन्ति तत्र यंच्च दीयते, ये च ददति, ये च प्रतिगृह्णन्ति, तेपा-मित्र समागमो विलयश्चान्वतो । दृश्यते; अदृष्टस्तु परः समागमः; तथापि मनुष्या ददतां दानफलेन संयोगं पश्यन्तः प्रमाणज्ञतया प्रशंसन्ति; तच्च, कर्मफलेन संयो-जयितरि कर्तुः कर्मफलविभागज्ञे प्रशास्तर्यसति न स्यात्; दान-क्रियायाः प्रत्यक्षविनाशित्वात्; । तथा अन्य सिन्धु आदि नदियाँ प्रतीच्य - प्रतीची ( पश्चिम ) दिशाको बहती हैं । अन्य नदियां भी जिस-जिस दिशा में अनुप्रवृत्त कर दी गयी. हैं, उस - उसको नहीं छोड़तीं; यह भी उस अक्षर प्रशास्ताके अस्तित्व-का लिङ्ग है । इसके सिवा अपनेको कष्ट देकर भी दान करनेवाले -सुवर्णादि देने-वाले पुरुषकी भी प्रमाणज्ञजन प्रशंसा करते हैं; सो जो कुछ दिया जाता है, जो देते हैं और जो ग्रहण करते हैं, उनका यहीं मिलना और बिछड़ना प्रत्यक्ष देखा जाता है; पारलौकिक समागम तो अदृष्ट है; तो भी दानीका दानके फलसे संयोग देखनेवाले पुरुष प्रमाणके ज्ञाता होने-के कारण उनकी प्रशंसा करते हैं; किंतु यह बात कर्मफलसे संयोग करानेवाले कर्ता और कर्मफलके ज्ञाता प्रशास्ताकी सत्ता न होनेपर होनी सम्भव नहीं थी, क्योंकि दान-क्रिया तो प्रत्यक्ष विनाशिनी है ।

पृष्ठ 784

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७७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ तस्मादस्ति दानकर्तृणां फलेन । संयोजयिता । अपूर्वमिति चेत्? न, तत्सद्भावे प्रमाणानुपपत्तेः प्रशास्तुरपीति चेत् । न आगमतात्पर्यस्य सिद्ध-त्वात्; श्रवोचाम ह्यागमस्य वस्तुपरत्वम् । किञ्चान्यत्, अपूर्वकल्पनायां चार्थापत्तेः क्षयोऽन्यथैवोपपत्तेः । सेवाफल- । स्य सेव्यात् प्राप्तिदर्शनात् । सेवा-याश्च क्रियात्वात्, तत्सामान्याच्च यागदान होमादीनां सेव्याद् ईश्वरादेः फलप्राप्तिरुपपद्यते दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्य मपरित्यज्यैव १ जहाँ अन्यथा अनुपपत्ति होती हो माने बिना काम न चलता हो, सङ्गति न अतः दानकर्ताओंका फलसे संयोग करानेवाला कोई है ही । पूर्व ० - यदि कहें कि अपूर्व ही फलदाता है तो? सिद्धान्ती- नहीं, क्योंकि उसकी सत्तामें कोई प्रमाण नहीं है । पूर्व ० - सो तो प्रशास्ताकी सत्तामें भी नहीं है? सिद्धान्ती- नहीं, उसमें तो शास्त्र-का तात्पर्य सिद्ध हो चुका है; हम शास्त्रका आत्मवस्तुपरत्व प्रतिपादन कर चुके हैं; इसके सिवा एक बात और भी है - अपूर्वकी कल्पना करनेमें जिस अर्थापत्तिका आश्रय लिया जाता है, उसका क्षय तो अन्यथा उपपत्ति ( दूसरे प्रकार से भी फल-की सिद्धि ) होने से ही हो जाता है, क्योंकि सेवाके फलकी प्राप्ति सेव्यसे होती देखी जाती है; सेवा क्रिया है, अतः उसीके समान होनेके कारण याग, दान और होमादिके फलकी प्राप्ति भी ईश्वरादि सेव्योंसे ही होनी उचित है । क्रियाधर्मंके दृष्टसामर्थ्य-अर्थात् किसी एक वस्तु या सिद्धान्तको लगती हो, वहाँ ही ' अर्थापत्ति ' स्वीकार की जाती है; जैसे यज्ञादि क्रिया तो इस लोकमें हां समाप्त हो जाती है, कालान्तरमें मिलनेवाले स्वर्गादि फलका सम्बन्ध उस क्रियाके साथ क्योंकर माना जा सकता है? क्रिया तो नष्ट हो चुकी है, वह है ही कहाँ जो फल दे सके?

पृष्ठ 785

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[ अध्याय ३ ओंका फलसे संयोग कोई है ही । द कहें कि अपूर्व ही तो? - नहीं, क्योंकि उसकी माण नहीं है । - तो प्रशास्ताकी हीं है? — नहीं, उसमें तो शास्त्र-सिद्ध हो चुका है; हम वस्तुपरत्व प्रतिपादन इसके सिवा एक बात पूर्वकी कल्पना करने में त्तिका आश्रय लिया नका क्षय तो अन्यथा रे प्रकार से भी फल-से ही हो जाता है, फलकी प्राप्ति सेव्यसे ती है; सेवा क्रिया है, समान होनेके कारण र होमादिके फलकी रादि सेव्योंसे ही होनी व्याधर्मके दृष्टसामर्थ्य-एक वस्तु या सिद्धान्तको ही ' अर्थापत्ति ' स्वीकार हो जाती है, कालान्तरमें साथ क्योंकर माना जा हाँ जो फल दे सके? ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५ फलप्राप्तिकम्पनोपपत्तौ दृष्टक्रिया धर्मसामर्थ्य परित्यागो न न्याय्यः कल्पनाधिक्याच्च, ईश्वरः कल्प्योऽपूर्वं वा? तत्र क्रिया-याश्च स्वभावः सेव्यात् फलप्राप्ति -ईष्टा न त्वपूर्वात् न चापूर्व दृष्टम्; तत्रापूर्वमदृष्टं कल्पयि-तव्यं तस्य च फलदातृत्वे । सामर्थ्यम्, सामर्थ्ये च सति दानं चाभ्यधिकमिति । इह तु ईश्वरस्य सेव्यस्य सद्भावमात्रं कल्प्यम्, न तु फलदानसामर्थ्यं । इस प्रकार फलसिद्धिमें अनुपपत्ति देखकर को बिना त्यागे ही यदि फलप्राप्तिकी कल्पना उत्पन्न हो सकती है तो उस दृष्टक्रियाधसामर्थ्यका त्याग करना युक्तियुक्त नहीं है । इसके सिवा अपूर्वकी कल्पना करनेमें कल्पनाधिक्यका दोष भी होता है; विचार करो कि ईश्वरकी कल्पना करनी चाहिये या अपूर्व-की । किंतु क्रियाका स्वभाव तो सेव्यसे फल- प्राप्ति होना देखा गया है, अपूर्वसे नहीं और अपूर्वं दृष्ट भी नहीं है । अत: उस पक्षमें अदृष्ट अपूर्वकी कल्पना करनी पड़ती है और उसमें फल प्रदान करनेके सामर्थ्य की भी । इस प्रकार सामर्थ्यं स्वीकार करनेपर दानकी अधिक कल्पना की जाती है । किंतु इस पक्षमें केवल सेव्य ईश्वरको सत्ता-मात्र होकी कल्पना की जाती है, उसके फलदान के सामर्थ्य और मीमांसक लोग क्रियासे अपूर्वकी उत्पत्ति मानते हैं; वह अपूर्व ही कालान्तर में स्वर्गादि फलका जनक होता है । भाष्यकार अर्थापत्तिका खण्डन करते हुए कहते हैं - अन्यथा अनुपपत्ति हो तो ' अपूर्वं स्वीकार करनेमें ' हर्ज नहीं मगर यहाँ तो अन्यथा भी उपपत्ति हो जाती है, अपूर्व स्वीकार किये बिना भी क्रियाके फलकी सिद्धिमें कोई बाबा नहीं आती । जैसे सेवा एक क्रिया है, उसका मूल्य लोकमें स्वामी चुकाता है, उसी प्रकार दान और यज्ञ भी क्रिया हैं, इनका फल भी लौकिक स्वामोकी भाँति सेव्य परमेश्वर ही विचारकर दे सकते हैं । इस प्रकार अर्थापत्तिका यहाँ क्षय हो जाता है, क्योंकि यहाँ अन्यथा भी फलकी उपपत्ति ( सिद्धि ) होती है । ईश्वरको न मानकर अपूर्वकी कल्पनामें जो दोष आते हैं, उनको भाष्यकारने आगे भाष्य में बताया है ।

पृष्ठ 786

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७७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ दातृत्वं च, सेव्यात् फलप्राप्ति - | दातृत्वकी नहीं; क्योंकि सेव्यमें दर्शनात् । अनुमानं च दर्शितम् ' द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः ' इत्यादि । तथा च यजमानं देवा ईश्वराः सन्तो जीवनार्थेऽनुगताः, चरु पुरोडाश | धुपजीवन प्रयोजनेन, अन्यथापि जीवितुमुत्सहन्तः कृपण दीनां वृत्तिमाश्रित्य स्थिताः, तच्च प्रशास्तुः प्रशास-नात् स्यात् । तथा पितरोऽपि तदर्थं दवदवहोममन्त्रायता अनुगता इत्यर्थः समानं सर्व-मन्यत् ॥ ९ ॥

अक्षरके ज्ञान और इतश्चास्ति तदक्षरं यस्मा-तदज्ञाने नियता संसारोपपत्तिः । भवितव्यं तु तेन, यद्वि-ज्ञानात् तद्विच्छेदः, न्यायोप-पत्तेः । ननु क्रियात एव । - फलप्राप्ति होती देखी ही गयी है । इस विषय में ' द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए स्थित हैं ' - इत्यादि -रूपसे अनुमान भी दिखाया गया है । इसी प्रकार देवगण समर्थ होने पर भी जो जीवन के लिये - चरुपुरो-डाशादिके आश्रय जीवनयापनके प्रयोजनसे यजमानके अनुगत रहते | हैं, अर्थात् अन्य प्रकारसे जीवित रहनेमें समर्थ होनेपर भी वे जो इस कृपण - दीन वृत्तिको आश्रित करके स्थित रहते हैं, यह भी उस प्रशा-स्ताके प्रशासन से ही होना सम्भव है । इसी प्रकार पितृगण भी जीविकाके लिये दर्वीके अर्थात् पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले दर्वीहोमके अन्वायत्त - अनुगत हैं । शेष सब इसी के समान समझना चाहिये ॥ ६ ॥

अज्ञानके परिणाम इस अक्षरकी सत्ता इसलिये भी है; क्योंकि इसके अज्ञानसे ही नियमतः संसारकी उपपत्ति हो सकती है । जिसके विज्ञानसे उस ( संसार ) का विच्छेद हो सकता है, वह वस्तु होनी ही चाहिये क्योंकि यही न्यायोचित है । यदि

पृष्ठ 787

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[ अध्याय३ हीं; क्योंकि सेव्यसे ती देखी हो गयी है । ' लोक और पृथिवी हुए स्थित हैं ' - इत्यादि-भी दिखाया गया है । र देवगण समर्थ होने जीवन के लिये - चरुपुरो-वाश्रय जीवनयापनके मानके अनुगत रहते न्य प्रकार से जीवित होनेपर भी वे जो इस त्तिको आश्रित करके - यह भी उस प्रशा-ही होना सम्भव कार पितृगण भी ये दव अर्थात् यसे किये जानेवाले वायत्त - अनुगत हैं । के समान समझना गाम की सत्ता इसलिये इसके अज्ञान से ही रकी उपपत्ति हो सके विज्ञानसे उस विच्छेद हो सकता होनी ही चाहिये योचित है । यदि ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७ तद्विच्छित्तिः स्यादिति चेत् १ | कहो कि उसका विच्छेद कर्मसे ही हो जायगा तो ऐसा कहना उचित न– नहीं [ क्योंकि ] यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लो-कात्प्रेति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥

हे गागिं! जो कोई इस लोकमें इस अक्षरको न जानकर हवन करता, यज्ञ करता और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप करता है, उसका वह सब कर्म अन्तवान् ही होता है । जो कोई भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह कृपण ( अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर यो वा एतदक्षरं हे गार्गि अविदित्वा विज्ञाय श्रस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते यद्यपि बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवद् एवास्य तत् फलं भवति, तत्फलोपभोगान्ते क्षीयन्त एवास्य कर्माणि । अपि च यद्विज्ञानात् कार्पण्यात्ययः संसारविच्छेदः, यद्विज्ञानाभा-वाच्च कर्मकृत् कृपणः कृतफल-स्यैवोपभोक्ता जननमरणप्रबन्धा -रूढः संसरति, तदस्त्यक्षरं । दीन ) हे और हे गार्गि! जो इस जाता है, वह ब्राह्मण है ॥ १० ॥

हे गार्गि! इस लोकमें जो कोई इस अक्षरको न जानकर अर्थात् बिना जाने हवन, यज्ञ और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप भी करता है तो उसका वह फल अन्तवान् ही होता है; उस फल भोगके पश्चात् इसके कर्म क्षीण हो ही जाते हैं । इसके सिवा जिसके विज्ञानसे कृप-णताका अतिक्रमण और संसार-का विच्छेद होता है तथा जिसका विज्ञान न होनेसे कर्मकर्त्ता कृपण, किये हुए कर्मके फलका ही उपभोग करनेवाला और जन्म - मरणकी परम्परापर आरूढ होकर संसार-बन्धनको प्राप्त होता है, वह अक्षर ही

पृष्ठ 788

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७७८ वृहदारण्यकोपनिषद [ अध्याय प्रशासित; -वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणः, पणक्रीत इव दासादिः । 2001 अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैतिस ब्रह्मणः ॥ १० ॥

३ । प्रशास्ता है । इसीसे यह कहा जाता है - हे गार्गि! जो भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह पैसोंसे खरीदे हुए गुलाम आदिकी तरह कृपण ( दीन ) है । और हे गार्गि! जो कोई इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मर-कर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥१० ॥

10963530 अक्षरका स्वरूप, लक्षण और अद्वितीयत्व अग्नेर्दहनप्रकाशकत्ववत् स्वा- | [ प्रधानवादीका कथन है कि ] अग्नि के दहन और प्रकाशकत्वके. भाविकमस्य प्रशास्तृत्वमचेतन- समान यह अचेतन ही स्वाभाविक स्यैवेत्यत शासन करनेवाला है, इसीसे आह- याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-तद् वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्टृश्रुत श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतो-ऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रे. तस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥

हे गार्गि! यह अक्षर स्त्रयं दृष्टिका विषय नहीं, किंतु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं, किंतु श्रोता है, मननका विषय नहीं, किंतु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है । इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है,. इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है । हे गागि! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है ॥ ११ ॥

तद्वा एतदक्षरं गार्गि अदृष्टं! वह यह अक्षर अदृष्ट है, दृष्टिका विषय न न केनचिद् दृष्टम्, अविषयत्वात् होनेके कारण वह किसीके द्वारा | देखा नहीं गया है, किंतु

पृष्ठ 789

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[ अध्याय ३ इसीसे यह कहा जाता जो भी इस अक्षरको इस लोकसे मरकर इ पैसोंसे खरीदे हुए की तरह कृपण ( दीन ) गागि! जो कोई इस नकर इस लोकसे मर-वह ब्राह्मण है ॥१० ॥

का कथन है कि ] और प्रकाशकत्वके. चेतन ही स्वाभाविक नेवाला है, इसीसे कहते हैं-श्रुत श्रोत्रमतं इष्ट नान्यदतो-तोऽस्ति विज्ञात्रे तश्चेति ॥ ११ ॥

तु द्रष्टा है, श्रवणका ऋतु मन्ता है, स्वयं कोई द्रष्टा नहीं है,. = ता नहीं है, इससे अक्षरमें ही आकाश वह यह अक्षर ष्टिका विषय न वह किसीके द्वारा गया है, किंतु ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७ ९ 221 स्वयं तु द्रष्टृ दृष्टिस्त्ररूपत्वात् ॥ तथा श्रुतं श्रोत्राविषयत्वात्, स्वयं श्रोतृ श्रुतिस्वरूपत्वात् । तथामतं मनसोऽविषयत्वात्, स्वयं मन्तु मतिस्वरूपत्वात् । तथाविज्ञातं बुद्धेरविषयत्वात्, स्वयं विज्ञात् विज्ञानस्वरूपत्वात् । किश्च नान्यदतोऽस्मादत्तरा-दस्ति - नास्ति किञ्चिद् द्रष्टृ दर्शन क्रियाकर्तृ एतदेवात्तरं दर्शनक्रियाकर्तृ सर्वत्र । तथा नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ; तदेवाक्षरं श्रोतु सर्वत्र । नान्यदतोऽस्ति मन्तु तदेवाक्षरं मन्तृ सर्वत्र सर्वमनोद्वारेण । नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ विज्ञानक्रियाकर्तृ, तदे-वाक्षरं सर्वबुद्धिद्वारेण विज्ञान-क्रियाकर्तृ, नाचेतनं प्रधान-मन्यद् वा । एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्य-काश ओत प्रोतश्चेति । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा सर्वान्तरोऽशनायादि संसारधर्मा-तीतः, यस्मिन्नाकाश श्रोतश्च प्रोत स्वयं दृष्टिस्वरूप होनेके कारण द्रष्टा है । इसी प्रकार यह श्रोत्रका अविषय होनेके कारण सुना नहीं गया है, किंतु स्वयं श्रुतिस्वरूप होनेसे श्रोता है । तथा मनका अविषय होने के कारण यह मननका विषय नहीं होता, किंतु स्वयं मति-स्वरूप होनेसे मन्ता है । इसी तरह बुद्धिका अविषय होनेके कारण विज्ञात नहीं है; किंतु स्वयं विज्ञान-स्वरूप होनेसे विज्ञाता है । यही नहीं, इस अक्षरसे भिन्न कोई द्रष्टा - दर्शन - क्रियाका कर्ता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र दर्शन-क्रियाका कर्ता है; इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र श्रोता है | इससे भिन्न कोई मन्ता भी नहीं है; सम्पूर्ण मनोंके द्वारा सर्वत्र वह अक्षर ही मनन करनेवाला है और न इससे भिन्न कोई विज्ञाता — विज्ञान– क्रियाका कर्ता है, समस्त बुद्धियोंके द्वारा वह अक्षर ही विज्ञान क्रिया-का कर्ता है - अचेतन प्रधान अथवा कोई अन्य नहीं । हे गार्गि! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है । जो ही साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो क्षुधादि संसारधर्मोसे अतीत सर्वान्तर आत्मा है और जिसमें आकाश ओतप्रोत

पृष्ठ 790

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७८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय श्व, एषा पग काष्ठा, एषा परा गतिः, एतत् परं ब्रह्म, एतत् पृथिव्यादेराकाशान्तस्य सत्यस्य सत्यम् ॥ ११ ॥

३ है, वह ( यह अक्षर ) ही पराकाष्ठा है, यह परा गति है, यह परब्रह्म है और यही पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त समस्त सत्यका सत्य है ॥ ११ ॥

गार्गीका निर्णय सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्ये-ध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माक-मिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युप-रराम ॥ १२ ॥

उस गार्गीने कहा, ' पूज्य ब्राह्मणगण! आपलोग इसीको बहुत मानें कि इन याज्ञवल्क्यजीसे आपको नमस्कारद्वारा ही छुटकारा मिल जाय । आपमेंसे कोई भी कभी इन्हें ब्रह्मविषयक वादमें जीतनेवाला नहीं है । ' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी ॥ १२ ॥

साहोवाच - हे ब्राह्मणा भग-` चन्तः शृणुत मदीयं चचः; तदेव चहु मन्येध्वम्; किं तत् १ यद-स्माद् याज्ञवल्क्यान्नमस्कारेण मुच्येध्वम्-- अस्मै नमस्कारं कृत्वा तदेव बहु मन्यध्व-मित्यर्थः; जयस्त्वस्य मनसापि न प्रशंसनीयः, किमुत कार्यतः कस्मात् १ न वै युष्माकं मध्ये जातु कदाचिदपीमं याज्ञवन्क्यं ब्रह्मोद्यं प्रति जेता! वह बोली, ' हे भगवन् ( पूज-नीय ) ब्राह्मणो! मेरी बात सुनो; तुमलोग इसीको बहुत समझो; सो किसको? यही कि तुम इन याज्ञ-वल्क्यजीसे नमस्कारके द्वारा ही मुक्त हो जाओ अर्थात् यदि इन्हें नमस्कार करके ही छुटकारा पा जाओ तो इसोको बहुत मानो; इनको जीतने की तो मनसे भी आशा नहीं करनी चाहिये, कार्य-द्वारा जीतनेकी तो बात ही क्या है? क्यों? क्योंकि आपमेंसे कोई भी कभी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्म-सम्बन्धी वादमें जीतनेवाला नहीं है ।