बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 791–800

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800

पृष्ठ 791

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[ अध्याय३ अक्षर ) ही पराकाष्ठा गति है, यह परब्रह्म वही पृथिवीसे लेकर न्त समस्त सत्यका सत्य तदेव बहु मन्ये-' जातु युष्माक इ वाचक्नव्युप-इसीको बहुत मानें छुटकारा मिल जाय । जीतने वाला नहीं है । ' ॥ नी, ' हे भगवन् ( पूज-गो! मेरी बात सुनो; को बहुत समझो; सो ही कि तुम इन याज्ञ-नमस्कार के द्वारा ही ओ अर्थात् यदि इन्हें रके ही छुटकारा पा इसीको बहुत मानो; निकी तो मनसे भी करनी चाहिये, कार्य-की तो बात ही क्या क्योंकि आपमें से कोई याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्म-जीतनेवाला नहीं है । ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१ प्रश्नौ चेन्मह्यं वक्ष्यति, न जेता । भवितेति पूर्वमेव मया प्रतिज्ञा-तम्; अद्यापि ममायमेव निश्चयः– ब्रह्मोद्यं प्रत्येतत्तुल्यो न कश्चिद् विद्यत इति । ततो ह वाचक्नव्युपरराम । अत्र अन्तर्यामिब्राह्मणे एतद् प्रकरणार्थ- उक्तम् - यं पृथिवी परामर्शः न वेद, यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति च । यमन्तर्यामिणं न विदुर्ये च न विदुर्यच्च तदक्षरं दर्शनादिक्रिया-कर्तृत्वेन सर्वेषां चेतनाधातुरि-त्युक्तम् — कस्त्वेषां विशेषः, किं वा सामान्यमिति । तत्र केचिदाचक्षते - परस्य महासमुद्रस्थानीयस्य ब्रह्मणो -ऽक्षरस्य प्रचलितत्वरूपस्येष-त्प्रचलितावस्थान्तर्यामी; अत्यन्तप्रचलितावस्था क्षेत्रज्ञः, यस्तं न वेदान्तर्यामिणम्; तथान्याः पञ्चावस्थाः परि-कन्पयन्ति; तथा अष्टावस्था ब्रह्मणो भवन्तीति वदन्ति । मैं पहले ही प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि यदि ये मेरे दो प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमें से कोई भी विजयी नहीं होगा । आज भी मेरा यही निश्रय है कि ब्रह्मसम्बन्धी वादमें इनके समान कोई नहीं है । ' तद-नन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी । यहाँ अन्तर्यामिब्राह्मणमें यह कहा गया था कि जिसे पृथिवी नहीं जानती तथा जिसे सम्पूर्ण भूत नहीं जानते इत्यादि । इस प्रकार जिस अन्तर्यामीको नहीं जानते, जो नहीं जानते और जो वह अक्षर है, जिसे समस्त विषयोंकी दर्शनादि-क्रियाओंके कर्तारूपसे सबक चेतनाका धातु कहा गया है - इन सबमें क्या अन्तर है और क्या समानता है? यहाँ कोई - कोई कहते हैं - महा-समुद्रस्थानीय अविचलरूप अक्षर परब्रह्म की किञ्चिद् विचलित अव-स्थाका नाम अन्तर्यामी है और उसकी अत्यन्त विचलित अवस्था क्षेत्रज्ञ है, जो कि उस अन्तर्यामीको नहीं जानता; इनके सिवा वे उसकी [ पिण्ड, जाति, विराट्, सूत्र और दैव - इन ] अन्य पाँच अवस्थाओंकी भी कल्पना करते हैं; इस प्रकार वे कहते हैं कि ब्रह्म-की कुल आठ अवस्थाएं हैं ।

पृष्ठ 792

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७८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ अन्येऽक्षरस्य शक्तय एता इति बदन्ति, अनन्तशक्तिमदत्तर-मिति च । अन्ये त्वक्षरस्य विकारा इति वदन्ति । अवस्था-शक्ती तावन्नोपपद्येते अक्षरस्य, अशनायादिसंसारधर्मातीतत्व-श्रुतेः । न ह्यशनायाद्यतीतत्वम-शनायादिधर्मवदवस्थावत्त्वं चैकस्य युगपदुपपद्यते; तथा शक्तिमत्त्वं च । विकारावयवत्वे च दोषाः प्रदर्शिताश्चतुर्थे । तस्मा -देता सत्याः सर्वाः कल्पनाः । कस्तर्हि भेद एषाम् १ उपा-धिकृत इति ब्रूमः न स्वत एषां भेदोऽभेदो वा, सैन्धव-घनवत् प्रज्ञानघनैकरसस्वाभा -व्यात्, " अपूर्व मनपरमनन्तरम-बाह्यम् ” ( बृ ० उ ० २ । ५ । १ ९ ) “ अयमात्मा ब्रह्म ” ( २ । ५ । १ ९ ) इति च श्रुतेः । " सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः " ( मु ० उ ० · २ । १ । २ ) इति इनसे भिन्न दूसरे लोग ऐस कहते हैं कि ये अक्षरकी शक्तियां हैं; और उनका यह भी कथन है कि वह अक्षर अनन्त शक्तिमान् है । इनके सिवा दूसरे लोग यह कहते हैं कि ये अक्षरके विकार हैं । किंतु इनका अक्षरकी अवस्था या शक्ति होना तो सम्भव नहीं है, क्योंकि वह क्षुधादि संसारधर्मोसे अतीत है - ऐसी श्रुति है । एक ही वस्तु-का एक साथ क्षुधादि धर्मोसे अतीत होना और क्षुधादि धर्मवाली अव-स्थाओंसे युक्त होना सम्भव नहीं है; इसी प्रकार उसका शक्तिमान् होना । भी असम्भव है । उसके विकार या अवयव माननेमें जो दोष हैं, वे चतुर्थ ब्राह्मणमें दिखाये जा चुके हैं । इसलिये ये सारी कल्पनाएँ असत्य हैं । तो फिर इनका भेद क्या है? हमारा कथन है कि इनका भेद उपाधिकृत है । स्वयं तो इनका भेद या अभेद कुछ भी नहीं है, क्योंकि ये सैन्धवघनके समान एकमात्र प्रज्ञानघन रसस्वरूप हैं 1 । जैसा कि " वह कारणसे भिन्न, कार्यसे भिन्न अन्तररहित और अबाह्य है " " यह आत्मा ब्रह्म है ” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा " वह बाहर - भीतरके सहित सर्वत्र बिद्य-| मान एवं अजन्मा है " ऐसा आथर्वण

पृष्ठ 793

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[ अध्याय ३ भिन्न दूसरे लोग ऐसा ये अक्षर की शक्तियां का यह भी कथन है क्षर अनन्त शक्तिमान् सिवा दूसरे लोग यह ये अक्षरके विकार हैं । अक्षरको अवस्था या तो सम्भव नहीं है, क्योंकि - संसारधर्मोसे अतीत ति है । एक ही वस्तु-क्षुधादि धर्मोसे अतीत सुधादि धर्मवाली अव-क होना सम्भव नहीं है; उसका शक्तिमान् होना - है । उसके विकार या नेमें जो दोष हैं, वे चतुर्थ दखाये जा चुके हैं । बारी कल्पनाएँ असत्य इनका भेद क्या है! न है कि इनका भेद है । स्वयं तो इनका भेद छ भी नहीं है, क्योंकि नके समान एकमात्र सस्वरूप हैं । जैसा कि से भिन्न, 1 कार्यं से भिन्न और अबाह्य है " ना ब्रह्म है " इत्यादि होता है तथा " वह रके सहित सर्वत्र विद्य-जन्मा है " ऐसा आथर्वण ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८३ चाथर्वणे । तस्मान्निरुपाधि- । कस्यात्मनो निरुपाख्यत्वान्नि-विशेषत्वादेकत्वाच्च “ नेति नेति " ( बृ ० उ ० ३ । ९ । २६ ) इति व्यपदेशो भवति । अविद्याकामकर्मविशिष्टकार्य-करणोपाधिरात्मा संसारी जीव उच्यते । नित्यनिरतिशयज्ञान-शक्त्युपाधिरात्मान्तर्यामीश्वर उच्यते, स एव निरुपाधिः केवलः शुद्धः स्वेन स्वभावेनातरं पर उच्यते, तथा हिरण्यगर्भाव्या-' कृतदेव ताजातिपिण्डमनुष्यतिर्य-क्प्रेतादिकार्य करणोपाधिभिर्विशि ' टस्तदाख्यस्तद्रूपो भवति । तथा “ तदेजति तन्नैजति " ( ईशा ० उ ० ५ ) इति व्याख्यातम् । तथा “ एष त आत्मा ” ( वृ ० उ ० ३ । ७ । ३ - २३ ) “ एष सर्वभूता-न्तरात्मा ” ( मु ० उ ० २ । १ । ४ ) " एष सर्वेषु भूतेषु गूढः " ( क ० उ ०१ । ३ । १२ ) “ तत्त्वमसि ' ( छा ० उ ० ६।८।१६ ) " अहमे -वेदं सर्वम् ” ( छा ० उ ० ७। २५ । १ ) " आत्मैवेदं सर्वम् " ( छा ० उ ० ७। २५ । २ ) “ नान्योऽतो-ऽस्ति द्रष्टा ' ( बृ ० उ ० ३ । ७ । २३ ) इत्यादिश्रुतयो न विरुध्यन्ते । कल्पनान्तरेष्वेताः श्रुतयो न श्रुतिमें कहा है 1 । अंतः उपाधिशून्य आत्मा अनिर्वचनीय, निर्विशेष और एक होनेके कारण उसका “ नेति नेति " इस प्रकार उपदेश किया जाता है । अविद्या, काम और कर्मविशिष्ट देह एवं इन्द्रियरूप उपाघिवाला आत्मा संसारी जीव कहा जाता है । तथा नित्य निरतिशय ज्ञान-शक्तिरूप उपाधिवाला आत्मा अन्तर्यामी ईश्वर कहा जाता है । वही उपाधिशून्य, केवल और शुद्ध होनेपर अपने स्वरूपसे अक्षर या पर कहा जाता है, तथा हिरण्य-गर्भ, अव्याकृत, देवता, जाति, पिण्ड,. मनुष्य, तिर्यक्, प्रेत एवं शरीर और इन्द्रियरूप उपाधियोंसे विशिष्ट होकर वह उन्हीं नाम और रूपोंवाला होता है । ऐसा ही “ वह चलता है, वह नहीं चलता ” इत्यादि श्रुतिमें व्याख्या किया किया गया गय है और इस प्रकार " यह तेरा आत्मा ”, " यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ", " यह समस्त भूतोंमें छिपा हुआ है ", " वह तू है ", " मैं ही यह सब हूँ ", " यह सब आत्मा ही है ", " इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है ” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध नहीं रहता । दूसरे प्रकारकी कल्पनाओंमें इन श्रुतियोंकी संगति नहीं लगती ।

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७८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ गच्छन्ति । तस्मादुपाधिमेदे । अतः उपाधिके भेदसे ही इनमें भेद नैव एषां मेदो नान्यथा । ' एक है, और किसी प्रकार नहीं; क्योंकि समस्त उपनिषदों में यही निश्वय मेवाद्वितीयम् ' इत्यवधारणात् किया गया है कि ' ब्रह्म एकमात्र सर्वोपनिषत्सु ॥ १२ ॥ अद्वितीय ही है ' ॥ १२ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये-ऽष्टममक्षरब्राह्मणम् ॥ ८ ॥

नवम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - शाकल्य - संवाद अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ । पृथिव्यादीनां सूक्ष्मता-रतम्यक्रमेण पूर्वस्य पूर्वस्य उत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन्नोतप्रोत -भावं कथयन् सर्वान्तरं ब्रह्म प्रकाशितवान्, तस्य च ब्रह्मणो व्याकृतविषये सूत्रमेदेषु नियन्तृत्वमुक्तम् व्याकृत-विषये व्यक्ततरं लिङ्गमिति । तस्यैव ब्रह्मणः साक्षादपरोक्षत्वे नियन्तव्यदेवताभेदसंकोचविका-' अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ ' । पृथिवी आदिके सूक्ष्मतार-तम्यक्रमसे पूर्वं - पूर्वं पदार्थका उत्तरो-तरवर्ती पदार्थमें ओत - प्रोतभाब बतलाते हुए, याज्ञवल्क्यने सर्वान्तर ब्रह्मको प्रकाशित किया है । और उस ब्रह्मका, नाम - रूपात्मक द्वैत-प्रपञ्चमें जो पृथिवी आदि भिन्न-भिन्न सूत्र हैं, उनमें नियन्तृत्व बतलाया गया है । व्याकृत विषयों-में ब्रह्मके नियन्ता होनेमें अत्यन्त स्पष्ट लिङ्ग है ' । उसी ब्रह्मका निय-न्तव्य देवताभेदके [ प्राणपर्यन्त ] संकोच ं और [ आनन्त्यपर्यन्त ] | विकासद्वारा साक्षात् एवं अपरोक्ष १. ' यः पृथिवीमन्तरो यमयति ' इत्यादि मन्त्रोंमें जो परतन्त्र पृथिवी आदिका ग्रहण किया है, इससे इनका नियम्य होना और ब्रह्मका नियामक होना सूचित होता है ।

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[ अध्याय३ धके भेदसे ही इनमें भेद सी प्रकार नहीं; क्योंकि मनिषदोंमें यही निश्चय है कि ' ब्रह्म एकमात्र है ' ॥ १२ ॥

याध्याये-I दइेनं विदग्धः शाकल्यः थिवी आदिके सूक्ष्मतार-र्व - पूर्वं पदार्थका उत्तरो-दार्थ ओत - प्रोतभाव . याज्ञवल्क्यने सर्वान्तर वशित किया है । और , नाम - रूपात्मक द्वैत-पृथिवी आदि भिन्न-हैं, उनमें नियन्तृत्व है । व्याकृत विषयों-यन्ता होनेमें अत्यन्त १। उसी ब्रह्मका निय-भेदके [ प्राणपर्यन्त ] - [ आनन्त्यपर्यन्त ] साक्षात् एवं अपरोक्ष परतन्त्र पृथिवी आदिका का नियामक होना सूचित ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१ सद्वारेणाधिगन्तव्ये इति तदर्थं । ज्ञान प्राप्त करना है, इसीलिये | आरम्भ किया शाकन्यब्राह्मणमारभ्यते- जाता है-देवताओंकी संख्या अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्र त्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञ-वल्क्येति त्रयस्त्रि ँशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञ-वल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञ-वल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्र ेति ॥ १ ॥

इसके पश्चात् इस याज्ञवल्क्यसे शाकल्य विदग्धने पूछा, ' हे याज्ञवल्क्य! कितने देवगण हैं? ' तब याज्ञवल्क्यने इस आगे कही जानेवाली निविसे ही उनकी संख्याका प्रतिपादन किया । ' जितने वैश्वदेवकी निविदुमें अर्थात् देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंमें बतलाये गये हैं । वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र ( तीन हजार तीन सौ छः ) हैं । ' [ तब शाकल्यने ] ' ठीक है ' ऐसा कहा । फिर पूछा, ' याज्ञवल्क्य! कितने देव है? ” याज्ञवल्क्यने कहा, ' तैंतीस ' । [ शाकल्यने ] ' ठीक है ' ऐसा कहा और पूछा, ' तो, याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' छः । ' [ शाकल्यने ] ' ठीक है ' ऐसा कहा और फिर पूछा, ' याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तीन! ' [ शाकल्यने ] ' ठीक है ' ऐसा कहा और पुन: पूछा, ' याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' दो । ' [ शाकल्य-वृ ० उ ० ५०-

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७८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ ने ] ' ठीक है ' ऐसा कहा और पूछा, ' याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं ? " [ याज्ञवल्क्य— ] ' डेढ़ । ' [ शाकल्यने ] ' ठीक है ' ऐसा कहा, और ! ' याज्ञवल्क्य! कितने देव हैं? ' [ याज्ञवल्क्य – ] ' एक । ' [ शाकल्यने पूछा, ] ' ठीक है ' ऐसा कहा और पूछा, ' वे तीन सहस्र देव कौन - से हैं? ' ॥ १ ॥

अथ हैनं विदग्ध इति नामतः शकलस्यापत्यं शाकल्यः पप्रच्छ – कतिसंख्याका देवा हे याज्ञवल्क्येति । स याज्ञवल्क्यः, हकिल, एतयैव वक्ष्यमाणया निविदा प्रतिपेदे संख्याम्, यां संख्यां पृष्टवाञ्शाकल्यः । । यावन्तो यावत्संख्याका देवा वैश्वदेवस्य शस्त्रस्य निविदि - निविन्नाम देवतासंख्यावा -चकानि मन्त्रपदानि कानिचिद् वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यन्ते तानि निवित्संज्ञकानि; तस्यां निविदि यावन्तो देवाः श्रूयन्ते ' तावन्तो देवा इति । का पुनः सा निविदिति तानि निवित्पदानि प्रदर्श्यन्ते - त्रयश्च त्री च शता - त्रयश्थ देवाः, तीन और तीन सौ तथा तीन और फिर इस याज्ञवल्क्यसे विदग्ध इस नामवाले शाकल्य —शकलके पुत्रने पूछा, ' हे याज्ञवल्क्य! देवगण कितनी संख्यावाले हैं? ' उस याज्ञवल्क्यने, जो संख्या शाकल्यने पूछी थी उस संख्याका इस आगे बतलायी जानेवाली निविसे निरूपण किया 1 । जितने - जितनी संख्यावाले देवता विश्वेदेवसम्बन्धी शस्त्रकी निविद ( मन्त्र- पद ) में बताये गये हैं ( उतने सब देव हैं ), निविद कहते हैं देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंको, विश्वेदेव-सम्बन्धी शस्त्रमें देवसंख्याप्रतिपादक कुछ मन्त्रपदोंका उपदेश किया गया है, वे ' सब ' निविद् ' कहलावे हैं । अतः तात्पर्य यह है कि उस निविदुमें जितने देवगण श्रुतिद्वारा बताये जाते हैं, उतने ही कुल देवता हैं । किंतु वह निविद् क्या है? वे निविदुके पद दिखलाये जाते हैं-' त्रयश्च त्री च शता ' अर्थात् देवगण

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[ अध्याय३ क्य! कितने देव हैं? " - ऐसा कहा, ओर पूछा, ] ' एक । ' [ शाकल्यने ] तीन सौ तथा तीन और इस याज्ञवल्क्यसे विदग्ध वाले शाकल्य - शकलके - ' हे याज्ञवल्क्य! देवगण संख्या वाले हैं? ' उस नि, जो संख्या शाकल्यने उस संख्याका इस आगे जानेवाली निविसे किया । जितने - जितनी देवता विश्वेदेवसम्बन्धी नविद् ( मन्त्र - पद ) में हैं ( उतने सब देव हैं ), हैं देवताओंकी संख्या मन्त्रपदोंको, विश्वेदेव-में देवसंख्याप्रतिपादक दोंका उपदेश किया सब ‘ निविद् ' कहलाते तात्पर्य यह है कि उस तने देवगण श्रुतिद्वारा हैं, उतने ही कुल ह निविद क्या है? वे द दिखलाये जाते हैं-- शता ' अर्थात् देवगण ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ देवानां त्री च त्रीणि च शतानि पुनरप्येवं त्रयश्च त्री च सहस्रा सहस्राणि - एतावन्तो देवा इति शाकम्योऽप्योमिति होवाच । एवमेषां मध्यमा संख्या सम्यक्तया ज्ञाता, पुनस्तेषामेव देवानां संकोचविषयां संख्यां पृच्छति — कत्येव देवा याज्ञ-वल्क्येति त्रयस्त्रिंशत्; षट्, त्रयः, द्वौ, अध्यर्धः, एक इति । देवतासंकोच विकासविषयां संख्यां पृष्ट्वा पुनः संख्येयस्वरूपं पृच्छति — कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च चत्रा त्री च सहस्त्रेति ॥ १ ॥

७८७ तीन हैं और तीन सौ हैं । तथा इसी प्रकार वे तीन और तीन सहस्र हैं । यानी सम्पूर्ण देव इतने हैं । इसपर शाकल्यने भी ' ठीक है ' ऐसा कहा । इस प्रकार इनकी मध्यमा संख्याका ठीक - ठीक पता लग गया । फिर शाकल्य उन्हीं देवताओंकी संकोचविषयिणी संख्या पूछता है, ' हे याज्ञवल्क्य! देव कितने हैं? " तब याज्ञवल्क्य क्रमशः ' तैंतीस, छः, तीन, दो, डेढ़ और एक ऐसा बतलाते हैं । इस प्रकार देवताओं-के संकोच और विकासविषयक पूछकर फिर संख्येयके स्वरूपके विषयमें पूछता है, ' वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन - से हैं? ' ॥१ ॥

तैंतीस देवताका विवरण स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रि ँशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रि शदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रि ँशाविति ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' ये तो इनकी महिमाएँ ही हैं । देवगण तो तैंतीस ही हैं । ' [ शाकल्य - ] ' वे तैंतीस देव कौन - से हैं? " [ याज्ञवल्क्य - ]. ' आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य — ये इकतीस देवगण हैं तथा इन्द्र और प्रजापतिके - सहित तैंतीस हैं ' ॥ २ ॥

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७८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 22 स होवाचेतरः - महिमानो विभूतयः, एषां त्रयस्त्रिंशतः देवानाम् एते त्रयश्च त्री च शतेत्यादयः परमार्थतस्तु त्रय -स्त्रिंशत्वेव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्युच्यते – अष्टौ वसवः एकादश रुद्राः, द्वादश आदि-त्यास्ते एकत्रिंशत्, इन्द्रश्चैत्र प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति त्रय-ख्रिशतः पूरणौ ॥ २ ॥

३ इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा- ये तीन और तीन सी आदि देवगण इन तैंतीस देवताओंकी महिमा - विभूति ही हैं । वस्तुतः तो तैंतीस ही देवगण हैं, वे तैंतीस देवगण कौन - से हैं? सो बतलाया जाता है - आठ वसु, ग्यारह ख और बारह आदित्य – ये इकतीस हुए तथा इन्द्र और प्रजापति — ये तैंतीसकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ २ ॥

वसु कौन हैं? कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु ही सर्व हितमिति तस्माद् वसव इति ॥ ३ ॥

[ शाकल्य - ] ' वसु कौन हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और नक्षत्र - ये वसु हैं; इन्हींमें यह सब जगत् निहित है, इसीसे ये वसु हैं ' ॥ ३ ॥

कतमे वसव इति तेषां स्वरूपं प्रत्येकं पृच्छयते; अग्निश्च पृथिवी चेति — अग्न्याद्या नक्षत्रान्ता एते वसवः — प्राणिनां कर्मफलाश्रय-स्वेन कार्यकरणसंघातरूपेण त-निवासत्वेन च विपरिणमन्तो जगदिदं सर्वं वासयन्ति वसन्ति ' वसु कौन है? ' इस प्रकार उनमें से प्रत्येकका स्वरूप पूछा जाता है 1 | अग्निश्च पृथिवी च ' -इस प्रकार अग्निसे लेकर नक्षत्र-पर्यन्त ये सब वसु हैं । प्राणियोंके कर्मफलके आश्रय होकर उनके निवासस्थान देहेन्द्रियसंघातरूपसे ' विपरिणामको प्राप्त होकर इस सम्पूर्णं जगत्को बसाये हुए हैं और स्वयं भी बसते हैं; [ यह

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[ अध्याय ३ = इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने तीन और तीन सौ आदि न तैंतीस देवताओंकी विभूति ही हैं । वस्तुतः ही देवगण हैं, वे तैंतीस न - से हैं? सो बतलाया आठ वसु, ग्यारह रुद्र व्ह आदित्य- ये इकतीस इन्द्र और प्रजापति - ये र्ति करनेवाले हैं ॥ २ ॥

च वायुश्चान्तरिक्षं चैते वसव एतेषु व इति ॥ ३ ॥

- ] ' अग्नि, पृथिवी, वायु, - ये वसु हैं; इन्हीं में यह कौन है? " इस प्रकार प्रत्येकका स्वरूप पूछा अग्निश्च पृथिवी च ' -अग्नि से लेकर नक्षत्र-सब वसु हैं । प्राणियों के आश्रय होकर उनके न देहेन्द्रियसंघातरूपसे ' को प्राप्त होकर इस गत्को बसाये हुए भी बसते हैं; [ यह ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८ ९ 22 च; ते यस्माद् वासयन्ति तस्माद् । उनका वसुत्व है ] । वे चूँकि वसव इति ॥ ३ ॥ [ दूसरोंको अपनेमें ] वसाये हुए हैं,

इसलिये वसु हैं ॥ ३ ॥

रुद्र कौन हैं? कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैका-दशस्ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्भुद्रा इति ॥ ४ ॥

[ शाकल्य - ] ' रुद्र कौन हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' पुरुषमें ये दश प्राण ( इन्द्रियाँ ) और ग्यारहवाँ आत्मा ( मन ) । ये जिस समय इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय रुलाते हैं; अतः उत्क्रमण-कालमें चूँकि अपने सम्बन्धियों को रुलाते हैं; इसलिये रोदनके कारण होनेसे ] “ रुद्र ' कहलाते हैं ’ ॥ ४ ॥

कतमे रुद्रा इति । दशेमे पुरुषे कर्मबुद्धीन्द्रियाणि प्राणा:, आत्मा मन एकादशः- एका-दशानां पूरण ते एते प्राणा यदा अस्माच्छरीरान्मर्थ्यात् । प्राणिनां कर्मफलोपभोगक्षये उत्क्रामन्ति - अथ तदा रोद-यन्ति तत्सम्बन्धिनः । वत्तत्र यस्माद्रोदयन्ति ते सम्बन्धिनः, तस्माद् रुद्रा इति ॥। ४ ॥ ' रुद्र कौन हैं? [ याज्ञवल्क्य - ] ' इस पुरुषमें कर्मेन्द्रिय और ज्ञाने-न्द्रिय- ये दश प्राण और ग्यारहवां आत्मा – मन, जो ग्यारह की पूर्ति करनेवाला है 1 । वे ये प्राण जिस समय प्राणियोंके कर्मफलोपभोगका क्षय हो जानेपर इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय ये उसके सम्बन्धियोंको रुलाते हैं । उस समय चूंकि ये सम्बन्धियोंको रुलाते हैं, इसलिये रोदनमें निमित्त होनेसे रुद्र कहलाते हैं ' ॥ ४ ॥

पृष्ठ 800

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७ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ आदित्य कौन हैं? कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सर-स्यैत आदित्या एते हीद ँ सर्वमाददाना यन्ति ते यदिद ँ सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥५ ॥

[ शाकल्य [ - - ] ' आदित्य कौन हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' संवत्सरके अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं; क्योंकि ये इस सबका आदान ( ग्रहण ) करते हुए चलते हैं, इसलिये आदित्य हैं ' ॥ ५ ॥

कतम श्रदित्या इति । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य कालस्याव-यत्राः प्रसिद्धाः, एते आदित्याः; कथम् १ एते हि यस्मात् पुनः पुनः परिवर्तमानाः प्राणिनामा यूंषि कर्मफलं च आददाना गृह्णन्त उपाददतो यन्ति गच्छन्ति - ते यद् यस्मादेव -मिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मा-दादित्या इति ॥ ५ ॥

' आदित्य कौन हैं? " [ याज्ञ-वल्क्य - ] ' बारह महीने संवत्सररूप कालके अवयव प्रसिद्ध हैं - वे ही आदित्य हैं । सो किस प्रकार? क्योंकि ये ही पुनः - पुनः परिवर्तित होते हुए प्राणियोंकी आयु और कर्मफलका आदान --- ग्रहण यानी उपादान करते हुए चलते हैं । वे चूंकि इस प्रकार इस सबका आदान करते हुए चलते हैं, इस-लिये ' आददाना यन्ति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार आदित्य कह-लाते हैं ' ॥ ५ ॥ ·

इन्द्र र प्रजापति कौन हैं? कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नु-रेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्य-शनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥

[ शाकल्य– ] ‘ इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है? ' [ याज्ञवल्क्य- ] स्तनयित्नु ( विद्युत् ) ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है । " [ शाकल्य- ]