बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 801–810

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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[ अध्याय ३ मासाः संवत्सर-ददाना यन्ति ते दित्या इति ॥५ ॥

ज्ञवल्क्य - ] ' संवत्सर के ये इस सबका आदान हैं ॥ ५ ॥

दत्य कौन हैं? " [ याज्ञ-- बारह महीने संवत्सररूप नवयव प्रसिद्ध हैं - वे ही हैं । सो किस प्रकार? ही पुनः पुनः परिवर्तित प्राणियोंकी आयु और T आदान -ग्रहण यानी करते हुए चलते हैं । के प्रकार इस सबका करते हुए चलते हैं, इस-आददाना यन्ति ' इस अनुसार आदित्य कह-।५ ॥ · हैं? तेरिति स्तनयित्नु-= स्तनयित्नुरित्य-इति ॥ ६ ॥

कौन है? ' [ याज्ञवल्क्य- ] पति है । ' [ शाकल्य - ] ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७ ९ १ ' स्तनयित्नु कौन है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' अशनि । ' [ शाकल्य - ] ' यज्ञ कौन A है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' पशुगण ' ॥ ६ ॥

कतम इन्द्रः कतमः प्रजापति- " इन्द्र कौन है और प्रजापति रिवि, स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः कौन है । ' ' स्तनयित्लु ही इन्द्र है प्रजापतिरिति, कतमः स्तन - और यज्ञ प्रजापति है । ' स्तनयित्नु यित्नुरित्यशनिरिति । श्रशनिर्वज्रं कौन है? ' ' अशनि । ' अशनिवज्र-वीर्य बलम्, यत् प्राणिनः प्रमाप-यति, स इन्द्रः; इन्द्रस्य हि तत् कर्म । कतमो यज्ञ इति पशव इति - यज्ञस्य हि साधनानि पशवः; यज्ञस्यारूपत्वात् पशु-साधनाश्रयत्वाच्च पशवो यज्ञ इत्युच्यते ॥ ६ ॥

वीर्यं अर्थात् बल, जो प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह अशनि इन्द्र है; इन्द्रका ही वह कर्म है । ‘ यज्ञ | कौन है? " ' पशुगण, ' क्योंकि पशु यज्ञके साधन हैं; यज्ञ रूपरहित है और पशुरूप साधनके अधीन है इसलिये पशु यज्ञ हैं - ऐसा कहा जाता है ॥ ६ ॥

छः देवताओंका विवरण कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेते हीद- सर्व षडिति ॥७ ॥

[ शाकल्य - ] ' छः देवगण कौन हैं? " [ याज्ञवल्क्य - ] ' अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक — ये छः देवगण हैं । ये वसु आदि तैंतीस देवताओंके रूपमें अग्नि आदि छः ही हैं ' ॥ ७ ॥

कतमे पडिति; त एवाग्न्या- ‘ छः देवगण कौन हैं? ' ' वे वसु दयो वसुत्वेनं पठिताचन्द्रमसं रूपसे पढ़े हुए अग्नि आदि हो नक्षत्राणि च वर्जयित्वा षड भव- चन्द्रमा और नक्षत्रोंको छोड़कर छः न्ति - पटसंख्याविशिष्टाः । एते अर्थात् षट्संख्या विशिष्ट होते हैं, हि यस्मात्, त्रयस्त्रिंशदादि यदुक्त- क्योंकि ये तैंतीस आदि बतलाये मिदं सर्वम्, एत एव षड् भवन्ति । हुए समस्त देवगण ये छः ही होते

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७ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वो हि वस्त्रादिविस्तर एतेष्वेव । हैं । तात्पर्य यह है कि यह वसु आदि सम्पूर्णं देवताओंका विस्तार इन छःमें षट्स्वन्तर्भवतीत्यर्थः ॥ ७ ॥ ही अन्तर्भूत हो जाता है ॥ ७ ॥

देवताओंकी तीन, दो और डेढ़ संख्याओं का विवरण कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु ही सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चै प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥८ ॥

[ शाकल्य - ] ' वे तीन देव कौन हैं? ' [ याज्ञवल्क्य -- ] ‘ ये तीन लोक ही तीन देव हैं । इन्हीं में ये सब देव अन्तर्भूत हैं । [ शाकल्य - ] ' वे दो देव कौन हैं? " [ याज्ञवल्क्य - ] ' अन्न और प्राण । ' [ शाकल्य - ] ' डेढ़ देव कौन हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जो यह बहता है ' ॥ ८ ॥

कतमे ते त्रयो देवा इति इम एव त्रयो लोका इति -पृथिवीमग्निं चैकीकृत्यैको देवः, अन्तरिक्षं वायुं चैकीकृत्य द्वितीयः, दिवमादित्यं चैकीकृत्य तृतीयः - ते एव त्रयो देवा इति । एषु, हि यस्मात्, त्रिषु देवेषु सर्वे देवा अन्तर्भवन्ति तेन त एव देवास्त्रयः - – इत्येष नैरुक्तानां केषाञ्चित् पक्षः । कतमौ तौ द्वौ देवाविति — - अन्नं चैव । ' वे तीन देव कौन हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' ये तीन लोक ही तीन देव हैं । पृथिवी और अग्नि मिलाकर एक देव हैं, अन्तरिक्ष और वायु मिलाकर दूसरे देव हैं तथा द्युलोक और आदित्य मिलाकर तीसरे देव हैं । ' ते एव त्रयो देवाः ' इति— क्योंकि इन तीन देवोंमें ही समस्त देवोंका अन्तर्भाव होता है, इसलिये ये ही तीन देव हैं - ऐसा किन्हीं निरुक्तवेत्ताओंका पक्ष है । " ' वेदो देव कौन हैं? ' ' अन्न और प्राण-१. तात्पर्य यह है कि कुछ ही लोगोंका ऐसा मत है, दूसरे लोग ' त्रयो लोकाः ' इस पदसे ‘ भूः, भुवः, स्व: ' इन नामोंसे प्रसिद्ध तीन लोक ही ग्रहण करते हैं ।

पृष्ठ 803

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[ अध्याय ३ - यह है कि यह वसु आदि नाओंका विस्तार इन छःमें हो जाता है ॥ ७ ॥

का विवरण व त्रयो लोका एषु देवावित्यन्नं चैव - पवत इति ॥८ ॥

याज्ञवल्क्य -- ] ' ये तीन भूत हैं । [ शाकल्य - ] प्राण । ' [ शाकल्य - ] ता है ' ॥ ८ ॥

तीन देव कौन हैं? ' - ] ' ये तीन लोक ही हैं । पृथिवी और अग्नि एक देव हैं, अन्तरिक्ष और कर दूसरे देव हैं तथा आदित्य मिलाकर तीसरे एव त्रयो देवाः ' इति -- तीन देवोंमें ही समस्त तर्भाव होता है, इसलिये देव हैं - ऐसा किन्हीं ओंका पक्ष है । " ' वेदो ? ' ' अन्न और प्राण-है, दूसरे लोग ' त्रयो लोकाः ' क ही ग्रहण करते हैं । ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७ ९ ३ प्राणश्चैतौ द्वौ देवौ, अनयोः | ये दो देव हैं, इन्हीं में पूर्वोक्त सभी सर्वेषामुक्तानामन्तर्भावः । कतमो - देवताओंका अन्तर्भाव हो जाता ऽध्य इति - — योऽयं पवते है । ' ' डेढ़ देव कौन हैं? ' ' जो यह चायुः ॥ ८ ॥ वहता है, वह वायु डेढ़ देव है ' ॥

डेढ़ और एक देवका विवरण तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यस्मिन्निद ँ सर्वमध्यात्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥६ ॥

यहाँ ऐसा कहते हैं — ' यह जो वायु है, एकही - सा बहता है, फिर यह अध्यर्ध — डेढ़ किस प्रकार है? ' [ उत्तर- ] ' क्योंकि इसीमें यह सब ऋद्धिको प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यधं ( डेढ़ ) है । ' [ शाकल्य - ] " एक देव कौन है? ' [ याज्ञवल्क्य -ऐसा कहते हैं ' ॥ ६ ॥

तत्तत्राहुभोदयन्ति — यदयं चायुरेक इवैव एक एव पवते; अथ कथमध्यर्ध इति १ यदस्मि-त्रिदं सर्वमध्यानत् — अस्मिन् वायौ सतीदं सर्वमध्यान-अधिऋद्धिं प्राप्नोति, तेनाध्यर्ध इति । कतम एको देव इति १ प्राण इति स प्राणो ब्रह्म - सर्वदेवात्म-कत्वान्महद् ब्रह्म, तेन स ब्रह्म त्य- । ] ' प्राण, वह ब्रह्म है, उसीको ' त्यत् ' इस विषय में कोई ऐसा प्रश्न करते हैं— ' यह जो वायु है ‘ एक इव ' - एक - सा ही चलता है, फिर | यह अध्यर्ध - डेढ़ क्यों है? ' [ उत्तर- ] ' क्योंकि इसीमें यह सब ' अध्यार्श्वोत् ( अधिऋद्धि प्राप्नोत् ) ' अर्थात् इस वायुके रहते ही यह सब अधिऋद्धि-को प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्य है । ' ' एक देव कौन है? ' ' प्राण ' वह प्राण ब्रह्म है, सर्वदेवरूप होनेके कारण वह महद् ब्रह्म है; इसलिये

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७ ९ ४. बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय दित्याचक्षते -त्यदिति तद् ब्रह्मा- । चक्षते परोक्षाभिधायकेन शब्देन । देवानामेतदेकत्वं नानात्वं च । अनन्तानां देवानां निवि-त्संख्याविशिष्टेष्वन्तर्भावः तेषा-मपि त्रयस्त्रिंशदादिषुत्तरोत्तरेषु यावदेकस्मिन् प्राणे | प्राणस्यैव चैकस्य सर्वोऽनन्तसङ्ख्यातो विस्तरः । एवमेकश्चानन्तश्च श्रवान्तरसंख्याविशिष्टश्च प्राण एव । तत्र च देवस्यैकस्य नामरूपकर्मगुणशक्तिभेदः, अधिकारमेदात् ॥ ९ ॥

३ वह ब्रह्म ' त्यत् ' है - ऐसा कहते हैं । अर्थात् उस ब्रह्मको ' त्यत् ' इ परोक्षवाचक शब्दसे कहते हैं । यही देवताओंका एकत्व और नानात्व है । अनन्त देवोंका निवित्संख्या विशिष्ट देवों में अन्तर्भाव है, और उनका भी तैंतीस आदि उत्तरोत्तर देवोंमें यहाँ अकेले प्राणमें ही अन्तर्भाव है । एक प्राणका ही यह सब अनन्त - संख्याके रूपमें विस्तार हुआ है । इस प्रकार एक, अनन्त तथा अन्यान्य संख्या-असे विशिष्ट एक प्राण ही है । वहाँ अधिकारभेदसे एक ही देवके नाम, रूप, कर्म, गुण और शक्तिका भेद है ॥ ε ॥ प्रारणब्रह्मके आठ प्रकारके भेद इदानीं तस्यैव प्राणस्य ब्रह्मणः अब उस प्राणब्रह्म ही आठ पुनरष्टधा भेद उपदिश्यते- - प्रकारके भेद बतलाये जाते हैं-पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवाय शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृत-मिति होवाच ॥ १० ॥

[ शाकल्य - ] ' पृथिवी हो जिसका आयतन है तथा अग्नि लोक ( दर्शनशक्ति ) और मन ज्योति ( संकल्प - विकल्पका साधन ) है, जो भी

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[ अध्याय ३ - ' है - ऐसा कहते हैं । ब्रह्मको ' त्यत् ' इस शब्दसे कहते हैं । I ताओंका एकत्व और अनन्त देवोंका विशिष्ट देवों में अन्तर्भाव - भी तैंतीस आदि वोंमें यहां तक कि ही अन्तर्भाव है । एक इ सब अनन्त - संख्याके - हुआ है । इस प्रकार था अन्यान्य संख्या-एक प्राण ही है । भेदसे एक ही देवके नं, गुण और शक्तिका द प्राणब्रह्म ही आठ बतलाये जाते हैं-मनो ज्योतियों सवै अहं तं पुरुष ँ वाय शारीरः देवतेत्यमृत-तथा अग्नि लोक साधन ) है, जो भी ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७ ९ ५ उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्यं करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता ( पण्डित ) है । याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो! ] । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिसे तुम सम्पूर्णं आध्यात्मिक कार्यकरणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । यह जो शारीर पुरुष है, [ शाकल्य - ] ' अच्छा, उसका देवता ऐसा कहा ॥ १० ॥

पृथिव्येव यस्य देवस्यायतन-माश्रयः, अग्निर्लोको यस्य -लोकयत्यनेनेति लोकः, पश्य-तीति — अग्निना पश्यतीत्यर्थः । मनोज्योतिः मनसा ज्योतिषा संकल्पविकल्पादिकार्यं करोति यः, सोऽयं मनोज्योतिः । पृथिवीशरीरोऽग्निदर्शनों मनसा संकल्पयिता पृथिव्यभिमानी कार्यकरणसंघातवान् देव इत्यर्थः । य एवं विशिष्टं वै तं पुरुषं विद्याद् विजानीयात् सर्वस्या-त्म आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातस्य आत्मनः परम-यनं पर आश्रयस्तं परायणम् । मातृजेन त्वङ्मांसरुधिररूपेण क्षेत्र स्थानीयेन बीज-स्थानीयस्य पितृजस्य अस्थि - । वही यह है । शाकल्य! और बोलो । ' कौन है? ' तब याज्ञवल्क्यने ' अमृत ' जिस दवका पृथिवी ही आय-तन अर्थात् आश्रय है, अग्नि ज लोक है - इसके द्वारा अवलोकन करता है, इसलिये यह इसका लोक है, ' लोकयति ' का अर्थ है— देखता हे अर्थात् वह अग्निसे देखता है । तथा मनोज्योति है— जो मनरूप ज्योतिसे संकल्प - विकल्पादि कार्य करता है, वह यह देव मनोज्योति है । तात्पर्य यह है कि यह पृथिवी--का अभिमानी कार्यकरणसंघात--वान् देव पृथिवीरूप शरीरवाला, अग्निरूप दर्शनशक्तिवाला और मनसे संकल्प करनेवाला है । जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त उस पुरुषको सम्पूर्ण आत्माका— आध्यात्मिक कार्य - करणसंघातरूप आत्माका परम अयन यानी परम आश्रय जानता है अर्थात् मातृ--जनित क्षेत्रस्थानीय त्वचा, मांस और रुधिररूपसे पितृजनित बीजस्थानीय अस्थि - मज्जा और

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७ ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ मज्जाशुक्ररूपस्य परमयनम्, करणात्मनश्च, स वै वेदिता स्यात् । य एतदेवं वेत्ति संवै चेदिता पण्डितः स्यादित्यभि -प्रायः । याज्ञवल्क्य त्वं तमजा -नन्नेव पण्डिताभिमानीत्यभि-प्रायः । यदि तद्विज्ञाने पाण्डित्यं लभ्यते, वेद वै अहं तं पुरुषं -सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ यं कथयसि तमहं वेद । तत्र -शाकल्यस्य वचनं द्रष्टव्यम्— -यदि त्वं वेत्थ तं पुरुषम्, ब्रूहि -किंविशेषणोऽसौ १ शृणु यद्वि-शेषणः सः -- य एवायं शारीरः - पार्थिवांशे शरीरे भवः शारीरो मातृजको शत्रयरूप इत्यर्थः, स एष देवः, यस्त्वया पृष्टः, हे शाकल्य | किन्त्वस्ति तत्र वक्तव्यं विशेषणान्तरम्, तद् वदैव पृच्चैवेत्यर्थः, हे शाकल्य । वीर्यंरूपका तथा इन्द्रियात्माका वह परम अयन है - ऐसा जानता है, वही जाननेवाला है । तात्पर्य यह है कि जो इसे इस प्रकार जानता है, वही वेत्ता यानी पण्डित है । ' हे याज्ञवल्क्य! तुम तो उसे बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान करते हो ' - ऐसा इसका अभिप्राय है । [ याज्ञवल्क्य - ] ' यदि उसके विज्ञानसे ही पाण्डित्यकी प्राप्ति होती है तो मैं उस पुरुषको तो जानता हूँ; तुम जिसे सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य - करणसंघातका परायण बतलाते हो उस पुरुषका मुझे पता है । ' यहाँ शाकल्यका यह वचन समझना चाहिये — ‘ यदि तुम उस पुरुषको जानते हो तो बताओ वह किन विशेषणोंवाला हे । ' [ याज्ञवल्क्य - ], अच्छा, वह जिन विशेषणोंसे युक्त है, सो सुनो-जो भी यह शारीर है- शरीररूप पार्थिवांश में होनेवालेको शारीर कहते हैं अर्थात् जो मातृजनित कोशत्रयरूप है, हे शाकल्य! वही वह देव है, जिसके विषयमें तुमने पूछा है । किंतु उसके विषयमें एक और विशेषण बतलाना आवश्यक है सो हे शाकल्य! उसको कहो अर्थात् उसके सम्बन्धमें पूछो । '

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[ अध्याय ३ या इन्द्रियात्माका वह है - ऐसा जानता है, है । यह इस प्रकार जानता यानी पण्डित है | ' हे तुम तो उसे बिना होनेका अभिमान सा इसका अभिप्राय क्य - ] ' यदि उसके पाण्डित्य की प्राप्ति उस पुरुषको तो तुम जिसे सम्पूर्ण कार्य - करणसंघातका T ते हो उस पुरुषका ' यहाँ शाकल्यका कना चाहिये - ' यदि को जानते हो तो किन विशेषणोंवाला क्य -- ], अच्छा, वह से युक्त है, सो सुनो-शारीर है- शरीररूप नेवालेको शारीर त् जो मातृजनित हे शाकल्य! वही सके विषय में तुमने उसके विषय में एक बतलाना आवश्यक ल्य! उसको कहो में पूछो । ' ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ स एवं प्रक्षोभितोऽमर्षवशग आह - तोत्त्रार्दित इव गज: -तस्य देवस्य शारीरस्य का देवता? यस्मान्निष्पद्यते यः सा तस्य देवतेत्यस्मिन् प्रकरणे विवक्षितः; अमृतमिति होवाच । अमृतमिति यो भुक्तस्यान्नस्य रसो मातृजस्य लोहितस्य निष्प-त्तिहेतुः । तस्माद्ध्यन्नरसाल्लोहितं निष्पद्यते स्त्रियां श्रितम्, ततश्च

लोहितमयं शरीरं बीजाश्रयम् ।

समानमन्यत् ॥ १० ॥

७ ९ ७ इस प्रकार अत्यन्त क्षुभित किये जानेपर उसने अंकुशसे पीडित हुए हाथीके समान क्रोधके वशीभूत होकर पूछा, ' उस शरीरमें होनेवाले देवका देवता कौन है? ' जिसके द्वारा जो निष्पन्न होता है वही उसका देवता है - ऐसा इस प्रकरण-में बताना अभीष्ट है [ शाकल्यके किये हुए प्रश्नके उत्तर में ] ' वह अमृत है ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । खाये हुए अन्नका जो रस मातृ-जनित लोहितकी निष्पत्तिका कारण होता है, वही अमृत है । उस अन्नके रससे ही स्त्री में आश्रित लोहित निष्पन्न होता है । उसीसे बीजका आश्रयभूत लोहितमय शरीर बनता है । आगेके अन्य पर्यायोंका अर्थ भी इसीके समान है ॥ १० ॥

काम एव यस्यायतन ँ हृदयं लोको मनो-ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण ँ सवै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥

[ शाकल्य - ] ' काम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य - करण-

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७ ९ ८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अन्याय ३ समूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो! ] । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य - करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह काममय पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य! और बोलो । ' [ शाकल्य याज्ञवल्क्यने कहा — ' स्त्रियाँ ' ॥ ११ ॥

काम एव यस्यायतनम् ॥ -स्त्रीव्यतिकराभिलाषः कामः । कामशरीर इत्यर्थः । हृदयं लोको - हृदयेन बुद्धया पश्यति । य एवायं काममयः पुरुषोऽध्यात्म - । मपि काममय एव । तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच; स्त्रीतो हि कामस्य दीप्ति-जयते ॥ ११ ॥

- ] ' उसका कौन देवता है? ' तब काम ही जिसका आयतन है । स्त्रीप्रसङ्गकी अभिलाषाका नाम काम है, अतः तात्पर्य यह है कि जो काम-रूप शरीरवाला है । हृदय जिसका लोक है - जो हृदय यानी बुद्धिसे देखता है । जो भी यह काममय पुरुष है अर्थात् जो अध्यात्म भी काममय हो है । [ शाकल्य - ] ' उसका देवता कौन है? " याज्ञव-ल्क्यने ' स्त्रियाँ ' ऐसा कहा, क्योंकि स्त्रीसे ही कामका उद्दीपन होता है ॥ ११ ॥

रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतियों वैतं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष ँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥

[ शाकल्य- ] ' रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने हो

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[ अध्याय ३ -क्य! [ तुम तो बिना ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिसे बतलाते हो, उस पुरुष है, वही यह है । कौन देवता है? ' तव जिसका आयतन है | भिलाषाका नाम काम यह है कि जो काम-ला है । हृदय जिसका हृदय यानी बुद्धिसे जो भी यह काममय त् जो अध्यात्म भी है । [ शाकल्य - ] T कौन है? " याज्ञव-- ऐसा कहा, क्योंकि मका उद्दीपन होता मनोज्योतियों परायण स वै अहं तं पुरुषँ लावादित्ये पुरुषः तेति सत्यमिति चक्षु लोक है और म कार्य - करणसमूहका तुम तो बिना जाने ही ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ७ ९९ पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो! ] ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तुम सम्पूर्णं अध्यात्म कार्य - करणसमूहका परायण बतलाते जिसे तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदित्यमें हो, उस पुरुषको और बोलो पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य! । ' [ शाकल्य - ] ' उसका देवता कौन है? ' तब याज्ञवल्क्यने ' सत्य ' ऐसा कहा ॥ १२ ॥

रूपाण्येव यस्यायतनम् रूपाणि शुक्लकृष्णादीनि । य एवासावादित्ये पुरुषः – सर्वेषां हि रूपाणां विशिष्टं कार्यमादित्ये पुरुषः । तस्य का देवतेति १ सत्यमिति होवाच । सत्यमिति चक्षुरुच्यते, चक्षुषो ह्यध्यात्मतः आदित्यस्याधिदेवतस्य निष्पत्तिः ॥ १२ ॥

रूप ही जिसका आयतन हैं । रूप हैं शुक्ल कृष्ण आदि । जो भी | यह आदित्यमें पुरुष है — सम्पूर्ण रूपोंका जो विशिष्ट कार्य है वही आदित्यमें पुरुष है । उसका देवता कौन है? तब याज्ञवल्क्यने ' सत्य ' ऐसा कहा । सत्य - इस शब्दसे चक्षु कहा गया है, क्योंकि अध्यात्म - चक्षु-से ही अधिदैवत आदित्यकी निष्पत्ति होती है ॥ १२ ॥

आकाश एव यस्यायतन श्रोत्र लोको मनो-ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण ँ सवै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवाय ँ श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥

[ शाकल्य- ] ' आकाश ही जिसका आयतन है, श्रोत्र लोक हे और ' मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसमूहका ' परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही ' पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो! ] । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसमूहका परायण कहते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क पुरुष है, यही वह है, हे शाकल्य!

पृष्ठ 810

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८०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ और बोलो । ' [ शाकल्य - ] ' उसका ' दिशाएँ ' ऐसा कहा ॥ १३ ॥

आकाश एव यस्यायतनम् य एवायं श्रोत्रे भवः श्रौत्रः, तत्रापि प्रतिश्रवणवेलायां विशेषतो भवतीति प्रातिश्रुत्कः, तस्य का

देवतेति १ दिश इति होवाच ।

दिग्भ्यो ह्यसावाध्यात्मिको निष्प -द्यते ॥ १३ ॥

कौन देवता है? " तब ज्ञ आकाश ही जिसका आयतन है । जो भी यह श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्र और उसमें भी जो प्रतिश्रवण-के समय विशेषरूपसे रहता है, वह प्रातिश्रुत्क है, उसका देवता कौन है? इसपर [ याज्ञवल्क्यने ] कहा, ' दिशाएँ ' क्योंकि दिशाओंसे ही यह आध्यात्मिक पुरुष निष्पन्न होता है ॥ १३ ॥ हात

तम एव यस्यायतन ँ हृदयं लोको मनो-ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण सवैवेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥

[ शाकल्य - ] ' तम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है, मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है, याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो! ] । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तुम जिसे समस्त आध्यात्मिक कार्य - करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह छायामय पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य! और बोलो । ' [ शाकल्य - ] ' उसका कौन देवता है? ' तब याज्ञवल्क्यने ' मृत्यु ' ऐसा कहा ॥ १४ ॥

तम एव यस्यायतनम् । तम तम ही जिसका आयतन है । इति शार्वराद्यन्धकारः परिगृह्यते । । ' तम ' शब्दसे रात्रि आदिका अन्धकार