बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 811–820

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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[ अध्याय ३ COSACA ? ' तब याज्ञवल्क्यने ही जिसका आयतन श्रोत्रमें रहनेवाला में भी जो प्रतिश्रवण-रूपसे रहता है, वह उसका देवता कौन [ याज्ञवल्क्यने ] कहा, कि दिशाओंसे ही यह पुरुष निष्पन्न होता - लोको मनो-त्मनः परायण अहं तं पुरुष चायं छायामयः य का देवतेति लोक है, मन ज्योति करणसमूहका परायण बिना जाने ही पण्डित • ] ' तुम जिसे समस्त हो, उस पुरुषको तो मैं यह है । हे शाकल्य! -? ' तब याज्ञवल्क्यने जिसका आयतन है । रात्रि आदिका अन्धकार ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०१ अध्यात्मं छायामयोऽज्ञानमयः । ग्रहण किया जाता है । अध्यात्म-पुरुषः । तस्य का देवतेति १ पक्षमें छायामय - अज्ञानमय पुरुष ही तम है । उसका कौन देवता मृत्युरिति होवाच । मृत्युरधि- है । ' मृत्यु ' ऐसा याज्ञवल्क्यने दैवतं तस्य निष्पत्तिकारणम् कहा । अधिदेवत मृत्यु ' ही उस ( छायामय पुरुष ) की निष्पत्तिका ॥ १४ ॥ कारण है ॥ १४ ॥

रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष ँ सर्वस्या-त्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्श पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥ १५ ॥

[ शाकल्य - ] ' रूप हो जिसका आयतन है, नेत्र लोक हे और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रह हो! ] । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदर्श ( दर्पण ) के भीतर पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य! और बोलो । ' [ शाकल्य - ] ' उसका देवता कौन है? ' तब याज्ञवल्क्यने ' असु ' ऐसा कहा ॥ १५ ॥

रूपाण्येव यस्यायतनम् । पूर्व रूप ही जिसका आयतन है । साधारणानि रूपाण्युक्तानि, इह तु पहले साधारण रूप कहे गये हैं, १. ' मृत्यु ' शब्दसे यहाँ ईश्वर ( अव्याकृत ) समझना चाहिये, जैसा कि यह श्रुति कहती है- ' मृत्युनैवेदमावृतमासीत् ' अर्थात् पहले यह मृत्युसे ही व्याप्त था । अविवेककी प्रवृत्ति ईश्वरके ही अधीन है, इसलिये वह अज्ञानमय आध्यात्मिक पुरुषकी उत्पत्तिका कारण है । वृ ० उ ० - ५१

पृष्ठ 812

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८०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ प्रकाशकानि विशिष्टानि रूपाणि । गृह्यन्ते । रूपायतनस्य देवस्य विशेषायतनं प्रतिबिम्बाधारमाद-शदि तस्य का देवतेति? असु-रिति होवाच । तस्य प्रतिबिम्बा-ख्यस्य पुरुषस्य निष्पत्तिरसोः प्राणात् ॥ १५ ॥

किंतु यहाँ प्रकाश करनेवाले विशिष्ट रूप ग्रहण किये जाते हैं । रूप जिसका आयतन ( आश्रय ) है, उस देवका विशेष आयतन प्रति-आधारभूत आदर्शादि हैं । उसका कौन देवता है? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा ' असु ' ( प्राण ) । अर्थात उस प्रतिबिम्ब - संज्ञक पुरुष-की निष्पत्ति असुर - प्राणसे होती हे ॥ १५ ॥

आप एव यस्यायतन हृदयं लोको मनो-ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण सवै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष ँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥

[ शाकल्य - ] ' जल ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य - करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो! ] । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिसे तुम सम्पूर्णं अध्यात्म कार्यं - करणसमूहका परायण बतलावे हो उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह जलमें पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य! और बोलो । ' [ शाकल्य- ] ‘ उसका कौन कौन दे देवता है! ' तब याज्ञवल्क्यने ' वरुण ' ऐसा कहा ॥ १६ ॥

१. प्राणद्वारा घर्षण करनेपर ही आदर्शादि प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके योग्य होते हैं; इसलिये असुको प्रतिबिम्बसंज्ञक पुरुषकी निष्पत्तिका कारण बतलाना उचित ही है ।

पृष्ठ 813

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[ अध्याय ३ प्रकाश करनेवाले हण किये जाते हैं । तन ( आश्रय ) है, शेष आयतन प्रति--भूत आदर्शादि हैं । देवता है? इसपर हा ' अ ' ( प्राण ) । तिबिम्ब - संज्ञक पुरुष-असुर - प्राणसे होती लोको मनो-नः परायण दवा अहं तं एवायमप्सु देवतेति वरुण हृदय लोक है और कार्य - करणसंघातका तुम तो बिना जाने ज्ञवल्क्य - ] ' जिसे हो उस पुरुषको है । शाकल्य! , तब याज्ञवल्क्यने ग्रहण करनेके योग्य तका कारण बतलाना ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ आप एव यस्य श्रायतनम् । साधारणाः सर्वा आप श्रायत-नम्; वापीकूपतडागाद्याश्रया-स्वप्सु विशेषावस्थानम् । तस्य का देवतेति १ - वरुण इति; वरु-णात् सङ्घातकत्र्र्योऽध्यात्ममाप एव वाप्याद्यर्पा निष्पत्तिकार -णम् ॥ १६ ॥

रेत एव यस्यायतन ८०३ जल ही जिसका आयतन है । सभी साधारण जल जिसका आय-तन हैं; वापी, कूप और तडागादिमें रहनेवाले जलमें जिसकी विशेष स्थिति है । उसका देवता कौन है? | इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, ‘ वरुण ’ ’ क्योंकि वरुणके द्वारा संघात करने-वाला अध्यात्म जल ही वापी आदिके जलकी निष्पत्तिका कारण है ' ॥ १६ ॥

हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वैतं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायण स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष ँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजा-पतिरिति होवाच ॥ १७ ॥

[ शाकल्य - ] ' वीर्यं ही जिसका आयतन है, हृदय लोक हे और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो! ] ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्यं - करण - संघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह पुत्ररूप पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य! और बोलो । ' [ शाकल्य - ] ' उसका कौन देवता है? ' तब याज्ञवल्क्यने ' प्रजापति ' ऐसा कहा ॥ १७ ॥

१. वापी एवं कृपादिसे पिया हुआ जल जो शरीर में मूत्रादि संघातको करता है वह वरुणसे ही होता है । रश्मियोंद्वारा पृथिवीपर गिरा हुआ जल ' वरुण ' शब्दसे कहा जाता है; क्योंकि वह सूर्यकिरणोंसे पृथिवीपर गिरनेवाला जल ही पिये जानेवाले वापी - कूपादिके जलकी उत्पत्तिका कारण है, इसलिये वह जलमय G अध्यात्म पुरुषका भी कारण है ।

पृष्ठ 814

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८०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ रेत एव यस्यायतनम् । य एवायं पुत्रमयो विशेषायतनं रेत श्रायतनस्य पुत्रमय इति च अस्थिमज्जाशुक्राणि पितुर्जा-तानि । तस्य का देवतेति? प्रजापतिरिति होवाच । प्रजा-पतिः पितोच्यते, पितृतो हि पुत्रस्योत्पत्तिः ॥ १७ ॥

शाकल्यको अष्टधा देवलोक पुरुषमेदेन । त्रिधा त्रिधा आत्मानं प्रविभज्या -वस्थित एकैको देवः प्राणमेद एवोपासनार्थं व्यपदिष्टः । अधुना दिग्विभागेन पञ्चधा प्रविभक्तस्य आत्मन्युपसंहारार्थमाह । तूष्णी-म्भूतं शाकन्यं याज्ञवल्क्यो ग्रहेणेवावेशयन्नाह-शाकल्येति होवाच वीर्यं ही जिसका आयतन है । जो भी यह वीर्यरूप आयतनवाले पुरुषका पुत्ररूप विशेष आयतन है; पुत्रमय अर्थात् पितासे उत्पन्न हुए अस्थि मज्जा और शुक्र । उसका देवता कौन है? ' प्रजापति ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । ' प्रजापति ' पिताको कहते हैं, क्योंकि पितासे ही पुत्रकी उत्पत्ति होती है ॥ १७ ॥

चेतावनी एक - एक देवता ही अपनेको देवलोक और पुरुषभेदसे ' तीन - तीन भागों में विभक्त करके आठ प्रकार-से स्थित हुआ है; प्राणभेद अर्थात् पृथक् - पृथक् इन्द्रिय - समुदाय ही वह देवता है, उपासनाकी सुविधाके लिये यहाँ विभागपूर्वक उनका उप-देश किया गया है । अब विभिन्न दिशाओंके अनुसार पाँच भागोंमें विभक्त हुए उस प्राणभेदका आत्मा-में उपसंहार करनेके लिये श्रुति कहती है । अपने प्रश्नोंका उत्तर पाकर मौन हुए, शाकल्पको ग्रहा-विष्ट - सा करते हुए याज्ञवल्क्यने कहा-याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमकता ३ इति ॥ १८ ॥

१. लोकका यर्थ है — सामान्य आकार, पुरुषका ' अर्थ है — विशेष- विशेष आकार में स्थित चेतन तथा देवताका अर्थ है— इन दोनोंका कारण ।

पृष्ठ 815

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[ अध्याय ३ जिसका आयतन है । रूप आयतनवाले विशेष आयतन है; - पितासे उत्पन्न हुए और शुक्र । उसका है? ' प्रजापति ' ऐसा कहा । ' प्रजापति ' हैं, क्योंकि पितासे नत्ति होती है ॥ १७ ॥

देवता ही अपनेको पुरुषभेदसे ' तीन - तीन क्त करके आठ प्रकार-है; प्राणभेद अर्थात् इन्द्रिय - समुदाय ही वह उपासनाकी सुविधाके भागपूर्वक उनका उप-या है । अब विभिन्न ननुसार पांच भागों में स प्राणभेदका आत्मा-करनेके लिये श्रुति अपने प्रश्नोंका उत्तर हुए शाकल्पको ग्रहा-ते हुए याज्ञवल्क्यने यस्त्वां स्विदिमे ते ॥ १८ ॥

' अर्थ है — विशेष- विशेष का कारण । ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभ ८०५ ' शाकल्य! ' ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा, ' इन ब्राह्मणोंने निश्चय ही तुम्हें अंगारे निकालनेका चिमटा बना रखा है ' ॥ १८ ॥

शाकन्येति होवाच याज्ञव-क्क्यः । त्वां स्विदिति वितर्के, इमे नूनं ब्राह्मणाः, अङ्गारावत-यणम् — अङ्गारा अवतीयन्ते यस्मिन् सन्दंशादौ तदङ्गारावक्ष-यणम् - तद् नूनं त्वामक्रत कृतवन्तो ब्राह्मणाः, त्वं तु तन्न । बुध्यसे आत्मानं मया दह्यमानम् इत्यभिप्रायः ॥ १८ ॥

देवता और प्रतिष्ठासहित ' हे शाकल्य! ' ऐसा याज्ञ-वल्क्यने कहा । ' त्वां स्विद् ' इसमें स्विद् ' यह निपात वितर्क अर्थमें है, निश्चय ही इन ब्राह्मणोंने तुम्हें | अङ्गारावक्षयण - जिस चिमटे आदि-पर अंगारे अवक्षीण होते अर्थात् पड़ते हैं, उसे अङ्गारावक्षयण कहते हैं - सो निश्चय ही तुम्हें इन ब्राह्मणों-ने आगमें जलनेवाला चिमटा ही बना रखा है । अभिप्राय यह है कि मेरे द्वारा तुम्हारा दाह हो रहा है - किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है ॥ १८ ॥

दिशाओं के ज्ञानकी प्रतिज्ञा याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरु पञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १६ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा शाकल्यने कहा, यह जो तुम इन कुरुपाञ्चाल-देशीय ब्राह्मणोंपर आक्षेप करते हो सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता हो - ऐसा समझकर करते हो? ' [ याज्ञवल्क्य – मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि ] ' मैं देवता और प्रतिष्ठा के सहित दिशाओंका ज्ञान रखता हूँ । ' [ शाकल्य - ] ' यदि तुम देवता और प्रतिष्ठा के सहित दिशाओंको जानते हो ' ॥ १६ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यः -- ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा शाकल्यने यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा- कहा, ' तुमने जो यह कुरुपाञ्चाल-देशीय ब्राह्मणोंका अतिवाद - अति-नत्यवादी: - प्रत्युक्तवानसि - स्वयं भाषण ( आक्षेपद्वारा तिरस्कार ) किया

पृष्ठ 816

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८०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ MA भीतास्त्वामङ्गारावक्षयणं कृतवन्त इति - किं ब्रह्म विद्वान् सन्नेवमधि-चिपसि ब्राह्मणान्? याज्ञवल्क्य श्राह - ब्रह्म विज्ञानं तावदिदं मम, किं तत् १ दिशो वेद दिग्विषयं विज्ञानं जाने । तच्च न केवलं दिश एव, सदेवा देवैः सह दिग-धिष्ठातृभिः किञ्च सप्रतिष्ठाः । प्रतिष्ठाभिश्च सह । इतर आह— यद् यदि दिशो वेत्थ सदेवाः, सप्रतिष्ठा इति, सफलं यदि विज्ञानं त्वया प्रतिज्ञांतम् ॥ १ ९ ॥ है कि ' ये स्वयं भयग्रस्त होने के कारण तुम्हें अंगारे निकालने का चिमटा बनाये हुए हैं ' सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता होनेके कारण इस प्रकार ब्राह्मणोंका तिरस्कार करते हो? ' याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरा ब्रह्मज्ञान तो यह है, क्या है? कि मैं दिशाओं-को जानता हूँ, मुझे दिशासम्बन्धी विज्ञानका ज्ञान है । वह भी केवल दिशाओंका ही नहीं, देवा तथा सप्रतिष्ठा दिशाओंका ज्ञान है अर्थात् दिशाओंके अधिष्ठाता देव-ताओंके साथ और दिशाओंके अधिष्ठानसहित उन दिशाओंका मुझे ज्ञान है । इसपर शाकल्यने कहा, ' ' तुम ' देव और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओं को जानते हो— यदि तुमने फलसहित विज्ञानकी प्रतिज्ञा की है तो ' ॥ १६ ॥

देवता और प्रतिष्ठासहित पूर्वदिशाका वर्णन किन्देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥

पृष्ठ 817

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[ अध्याय ३ भयग्रस्त होने के गारे निकालने का ए हैं ' सो क्या तुम कारण इस प्रकार स्कार करते हो? ' I, ' मेरा ब्रह्मज्ञान ? कि मैं दिशाओं-मुझे दिशासम्बन्धी है । वह भी केवल नहीं, सदेवा तथा ओंका ज्ञान है के अधिष्ठाता देव -और दिशाओंके उन दिशाओंका इसपर शाकल्यने देव और प्रतिष्ठा को जानते हो -लसहित विज्ञानकी तो ॥ १६ ॥

वर्णन नीत्यादित्यदेवत इति चक्षुषीति तिचक्षुषा हि प्रतिष्ठितानीति जानाति हृदये वन्तीत्येवमेवैतद् ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८०७ ' इस पूर्वदिशा में तुम किस देवतासे युक्त हो? ' [ याज्ञवल्क्य— मैं आदित्य ( सूर्यं ) देवतावाला हूँ । ' [ शाकल्य - ] ' वह आदित्य ' वहाँ प्रतिष्ठित है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' नेत्रमें । ' [ शाकल्य - ] ' नेत्र किसमें प्रतिष्ठित किसमें है? [ याज्ञवल्क्य- J ‘ रूपोंमें, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है । ' [ शाकल्य - ] ' रूप किसमें प्रतिष्ठित है? ' याज्ञवल्क्यने कहा, ' हृदयमें, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोंको जानता है, अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं । ' [ शाकल्य - ] ' हे याज्ञवल्क्य । किन्देवतः का देवतास्य तब दिग्भूतस्य । असौ हि याज्ञव-ल्क्यो हृदयमात्मानं दिक्षु पञ्चधा विभक्तं दिगात्मभूतम्, तद्द्वा-रेण सर्व जगदात्मत्वेनोपगम्य, श्रहमस्मि दिगात्मेति व्यव -स्थितः, पूर्वाभिमुखः- स प्रतिष्ठा वचनाद्,, यथा याज्ञवल्क्यस्य प्रतिज्ञा तथैव पृच्छति — किन्दे -वतस्त्वमस्यां दिश्यसीति । सर्वत्र हि वेदे यां यां देवता-मुपास्ते, इहैव तद्भूतस्तां तां प्रति-यह बात ऐसी ही है ' ॥ २० ॥

तुम किस देवतावाले हो? अर्थात् दिशास्वरूपमें स्थित हुए तुम्हारा कौन देवता है? यहाँ इस प्रकार प्रश्न करनेका कारण यह है कि वे याज्ञवल्क्य दिशाओंमें पांच प्रकारसे विभक्त अपने हृदयोपाधिक आत्माको ' दिगात्म ' स्वरूप समझ-कर और उसके द्वारा सम्पूर्णं जगत्-को आत्मभावसे जानकर ‘ मैं दिक्स्वरूप हूँ ' इस प्रकार स्थित हैं; वह पूर्वाभिमुख है [ इसलिये पहले पर्वदिशाके विषय में ही पूछा जाता है ] तथा उसका कथन है कि प्रतिष्ठासहित दिशाओंको जानता हूँ, [ इससे यह जान पड़ता है कि वह समस्त जगत्को आत्मरूप जान-कर स्थित है । ] इसलिये जैसी याज्ञवल्क्यकी प्रतिज्ञा है, वैसे ही शाकल्य पूछता है – ' तुम इस पूर्व -दिशामें कौन - से देवतावाले हो? " वेदमें सभी जगह पुरुष जिस-जिस देवताकी उपासना करता है, इस लोकमें तद्रूप हुआ हो वह

पृष्ठ 818

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८०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ पद्यत इति; तथा च वक्ष्यति— " देवो भूत्वा देवानप्येति ” ( बृ ० उ ० ४ । १ । २ ) इति ॥ अस्यां प्राच्यां का देवता दिगात्मनस्तवा -धिष्ठात्री, कया देवतया त्वं प्राची दिग्रूपेण सम्पन्न इत्यर्थः । इतर आह— आदित्यदेवत इति । प्राच्यां दिशि मम आदि-त्यो देवता, सोऽहमादित्यदे-वतः । सदेवा इत्येतदुक्तम्, सप्र-तिष्ठा इति तु वक्तव्यमित्याह — स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति १ चक्षुषीति । अध्यात्मत -अक्षुष आदित्यो निष्पन्न इति हि मन्त्रब्राह्मणवादाः– “ चक्षोः सूर्यो अजायत " ( यजु ० ३१ । ... १२ ) " चक्षुष आदित्यः " ( ऐ ० उ ० १ । ४ ) इत्यादयः । कार्य हि कारणे प्रतिष्ठितं भवति । कस्मिन्न चक्षुः प्रतिष्ठितमिति उस - उस देवताको प्राप्त होता है । ऐसा ही " देव होकर देवोंमें लोन होता है " यह श्रुति कहेगी । [ अत: प्रश्न यह है कि ] दिशारूपमें स्थित हुए तुम्हारा इस पूर्व दिशामें कौन अधिष्ठाता देवता है? अर्था देवताके द्वारा तुम प्राची दिशा के रूपमें सम्पन्न हुए हो? इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा, ' [ प्राची दिशामें ] मैं आदित्यदेवता-वाला हूँ । अर्थात् पूर्वंदिशामें आदित्य मेरा देवता है, इसलिये में आदित्यदेवतावाला हूँ । ' इस प्रकार देवतासहित प्राची दिशा तो कह दी, अब प्रतिष्ठासहित कहनी है, इसलिये शाकल्य कहता है- ' वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' चक्षुमें ' । अध्यात्म चक्षुसे आदित्य निष्पन्न हुआ है-ऐसा " चक्षुसे सूर्य उत्पन्न हुआ " " चक्षुसे आदित्य ” इत्यादि मन्त्र और ब्राह्मण कहते हैं । और कार्य कारणमें ही प्रतिष्ठित होता है; [ अतः आदित्य चक्षु प्रतिष्ठित है ] । ' चक्षु किसमें प्रतिष्ठित है? ' रूपेष्विति; रूपग्रहणाय हि रूपा- ' रूपोंमें '; क्योंकि रूपात्मक चक्षु रूप-को ग्रहण करनेके लिये ही रूपसे त्मकं चत्तू रूपेण प्रयुक्तम्; यैर्हि | प्रेरित होता है; और जिन रूपों-

पृष्ठ 819

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[ अध्याय ३ को प्राप्त होता है । होकर देवोंमें लीन त्रुति कहेगी । [ अतः ] दिशा रूपमें स्थित पूर्व दिशा में कौन है? अर्थात किस तुम प्राची दिशा के हो? ज्ञवल्क्य ) ने कहा, मैं ] मैं आदित्य देवता-अर्थात् पूर्वदिशामें देवता है, इसलिये मैं वाला हूँ । ' इस प्रकार ची दिशा तो कह ष्ठासहित कहनी है, कहता है- ' वह में प्रतिष्ठित है? ' ' चक्षुमें ' । अध्यात्म निष्पन्न हुआ है-- सूर्य उत्पन्न हुआ " दित्य " इत्यादि मन्त्र कहते हैं । और कार्य तिष्ठित होता है; [ अतः में प्रतिष्ठित है ] । किसमें प्रतिष्ठित है? " कि रूपात्मक चक्षु रूप-रनेके लिये ही रूपसे है; और जिन रूपों-ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८० ९ रूपैः प्रयुक्तं तैरात्मग्रहणायारन्धं | द्वारा वह प्रयुक्त होता है, उन्होंने अपनेको ग्रहण करनेके लिये ही चक्षुः । तस्मात् सादित्यं चक्षुः । चक्षुको उत्पन्न किया है । अतः सह प्राच्या दिशा सह तत्स्थैः सर्वे रूपेषु प्रतिष्ठितम् । चक्षुषा सह प्राची दिक् सर्वा रूपभूता, तानि च कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति १ हृदय इति होवाच । हृदयारब्धानि रूपाणि । रूपाकारेण हि हृदयं परिणतम् । यस्माद् हृदयेन हि रूपाणि सर्वो लोको जानाति । हृदयमिति बुद्धिमनसो एकीकृत्य निर्देशः; तस्माद् हृदये ह्येत्र रूपाणि प्रतिष्ठितानि । हृदयेन हि स्मरणं भवति रूपाणां वासना-त्मनाम्; तस्माद् हृदये रूपाणि

प्रतिष्ठितानि इत्यर्थः । एवमेवै-- ।

तद् याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥

आदित्य के सहित चक्षु प्राची दिशा और उस दिशा में स्थित समस्त पदार्थों के सहित रूपों में प्रतिष्ठित है । [ शाकल्य - ] चक्षुके सहित सम्पूर्ण प्राची दिशा रूपमात्र हैं, किंतु वे रूप किसमें प्रतिष्ठित हैं? ' याज्ञवल्क्यने ' हृदयमें ' ऐसा कहा । रूप हृदयसे आरम्भ ( उत्पन्न ) होने-वाले हैं; हृदय ही रूपाकारसे परि-णत होता है, क्योंकि सब लोग हृदयसे ही रूपको जानते हैं । ' हृदयम् ' इस प्रकार मन और बुद्धि-को एक करके कहा गया है; अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं । वासनारूप रूपोंका हृदयसे हो स्मरण होता है; अत: तात्पर्यं यह हे कि हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं । [ शाकल्य - ] ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ ॥ देवता और प्रतिष्ठाके सहित दक्षिण दिशाका वर्णन किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठि-

पृष्ठ 820

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वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ८१० तेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धतेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धाया ँह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येव -मेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥

' इस दक्षिण दिशामें तुम कौन से देवतावाले हो? ' [ याज्ञवल्क्य – ] ‘ यमदेवतावाला हूँ ' [ शाकल्य - ] ' वह यमदेवता - किसमें प्रतिष्ठित है? ” [ याज्ञवल्क्य - ] ' यज्ञमें । ' [ शाकल्य - ] ' यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' दक्षिणामें । ' [ शाकल्य - ] ' दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' श्रद्धामें, क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामें ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है । ' [ शाकल्य - ] ' श्रद्धा ' किसमें प्रतिष्ठित है? ' याज्ञवल्क्यने कहा, हृदयमें, क्योंकि हृदयसे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, अत: हृदयमें ही ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति पूर्ववत् । दक्षिणायां दिशि का देवता तत्र १ यमदेवत इति, यमो देवता मम दक्षिणा-दिग्भूतस्य । स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति १ यज्ञ इति — यज्ञे कारणे प्रतिष्ठितो यमः सह दिशा । कथं पुनर्यज्ञस्य कार्य यमः १ इत्युच्यते - ऋत्विग्भि-निष्पादितो यज्ञो दक्षिणया यज-मानस्तेभ्यो यज्ञं निष्क्रीय तेन श्रद्धा प्रतिष्ठित है । ' [ शाकल्य – ] २१ ॥ ' किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिशि असि ' इस वाक्यका अर्थं पूर्ववत् समझना चाहिये । अर्थात् दक्षिण दिशामें तुम्हारा कौन देवता है? ' मैं यम देवतावाला हूँ अर्थात् दक्षिण दिशारूपसे स्थित हुए मेरा यम देवता है । " " वह यम किसमें प्रति-ष्ठित है? ' ' यज्ञमें ' अर्थात् दिशाके सहित यम अपने कारणभूत यज्ञमें प्रतिष्ठित है । किंतु यम यज्ञका कार्य क्यों है? सो बतलाया जाता है-यज्ञ ऋत्विजोंद्वारा निष्पन्न किया जाता है, उनसे • दक्षिणाद्वारा द यजमान यज्ञको खरीदकर उस यज्ञके द्वारा म