बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 821–830
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830
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[ अध्याय ३ ऽथ दक्षिणां इति कस्मिन्नु दयेन हि श्रद्धां भवतीत्येव -' [ याज्ञवल्क्य - ] समें प्रतिष्ठित है? " कसमें प्रतिष्ठित है? ' किसमें प्रतिष्ठित है? " ता है, तभी दक्षिणा शाकल्प - ] ' श्रद्धा ' कि हृदयसे ही पुरुष [ ' [ शाकल्य - ] स्यां दक्षिणायां दिशि क्यका अर्थ पूर्ववत् ये । अर्थात् दक्षिण कौन देवता है? ला हूँ अर्थात् दक्षिण थत हुए मेरा यम वह यम किसमें प्रति-नमें ' अर्थात् दिशाके कारणभूत यज्ञमें किंतु यम यज्ञका कार्य - बतलाया जाता है-द्वारा निष्पन्न किया उनसे दक्षिणाद्वारा यज्ञको खरीदकर क द्वारा - यमके ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्याथ ८११ यज्ञेन दक्षिणां दिशं सह यमे -नाभिजयति 1 । तेन यज्ञे यमः कार्यत्वात् प्रतिष्ठितः सह दक्षिणया दिशा । कस्मिन्न यज्ञः प्रतिष्ठित इति? दक्षिणायामिति - दक्षिणया स निष्क्रीयते, तेन दक्षिणाकार्यं यज्ञः । कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठि-तेति १ श्रद्धायामिति - श्रद्धा नाम दिसुत्वम् आस्तिक्यबुद्धि-भक्तिसहिता । कथं तस्यां प्रति-ष्ठिता दक्षिणा! यस्माद् यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति, नाश्रद्दधद् दक्षिणां ददाति तस्माच्छ्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति । कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति? हृदय इति होवाच - हृदयस्य हि । वृत्तिः श्रद्धा यस्मात्, हृदयेन हि श्रद्धां जानाति, वृत्तिश्च वृत्ति-मति प्रतिष्ठिता भवति । तस्माद् हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीति । एवमेवैतद् याज्ञ-वल्क्य ॥ २१ ॥
| सहित दक्षिण दिशाको जीत लेता है । अतः [ यज्ञका ] कार्य होनेके | कारण दक्षिण दिशा के सहित यम यज्ञमें प्रतिष्ठित है । ' यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? " | इसके उत्तरमें कहा — ' दक्षिणामें; क्योंकि वह दक्षिणासे खरीद लिया जाता है, इसलिये यज्ञ दक्षिणाका कार्य है । ' दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' श्रद्धा ' – श्रद्धा से अभिप्राय हे देने की इच्छा अर्थात् भक्तिसहित आस्तिक्यबुद्धि । उसमें दक्षिणा किस प्रकार प्रतिष्ठित है? क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है; श्रद्धा किये बिना दक्षिणा नहीं देता । इसलिये श्रद्धा-में ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है । ' श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है? " " याज्ञवल्क्यने कहा, ' हृदयमें ' -क्योंकि श्रद्धा हृदयकी हो. वृत्ति है. हृदयसे ही पुरुष श्रद्धाको जानता. है और वृत्ति वृत्तिमानमें प्रतिष्ठित रहा करती है । इसलिये हृदयमें हो श्रद्धा प्रतिष्ठित है । [ शाकल्य - ] ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी हो हे ' ॥ २१ ॥
देवता और प्रतिष्ठाके सहित पश्चिमदिशाका वर्णन किन्देवतो ऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्यप्स्विति कस्मिन्न्वापः प्रति-
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८१२ बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय ३ ष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥
‘ इस पश्चिम दिशामें तुम कौन - से देवतावाले हो? ' [ याज्ञवल्क्य- ] ‘ वरुणदेवतावाला हूँ । ' [ शाकल्य - ] ' वह वरुण किसमें प्रतिष्ठित है? ' [ याज्ञवल्क्य— ] ‘ जलमें । ' [ शाकल्य - ] ' जल किसमें प्रतिष्ठित है? ” [ याज्ञवल्क्य – ] ' वीर्यमें । ' [ शाकल्य - ] ' वीर्यं किसमें प्रतिष्ठित है? ” [ याज्ञवल्क्य— ] ' हृदयमें, इसीसे पिता के अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रको लोग - कहते हैं कि यह मानो पिताके हृदयसे ही निकला है, मानो पिताके हृदय-से ही बना है, क्योंकि हृदयमें ही वीर्य स्थित रहता है । ' [ शाकल्य – ] ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ किन्देवतोऽस्यां प्रतीच्यां ' दिश्यसीति १ तस्यां वरुणोऽधि-` देवता मम । स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति १ अप्स्विति – अप हि वरुणः कार्यम्, " श्रद्धा वा " आप " " श्रद्धातो वरुणम-सृजत " इति श्रुतेः । कस्मि-न्वापः प्रतिष्ठिता इति? रेतसीति — " रेतसो ह्याप: सृष्टाः " इति श्रुतेः । कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति १ हृदय इति -- यस्माद् हृदयस्य कार्य रेतः । कामो हृदयस्य वृत्तिः, २२ ॥ ' इस पश्चिम दिशामें तुम किस देवतावाले हो? ' ‘ उस दिशामें मेरा अधिष्ठातृदेव वरुण है । ' ‘ वह वरुण किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' जलमें ' – क्योंकि वरुण जलका ही कार्य है, जैसा कि " श्रद्धा ही जल है,, " " " श्रद्धासे वरुणको रचा " इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । ' ' जल किसमें प्रतिष्ठित है? " ' वीर्यमें'– यह बात " वीर्यंसे जलकी रचना हुई " इस श्रुति M गयी है । ' वीर्य ' किसमें प्रतिष्ठित है? " ' हृदयमें, क्योंकि वीर्य हृदयका ही कार्य है । काम हृदयकी वृत्ति है,
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| अध्याय ३ ष्ठितमितिहृदय दयादिव सृप्तो रेतः प्रतिष्ठितं 11 ? ' [ याज्ञवल्क्य – ] किसमें प्रतिष्ठित है? " किसमें प्रतिष्ठित है? " किसमें प्रतिष्ठित है? " = पन्न हुए पुत्रको लोग मानो पिताके हृदय-- है । ' [ शाकल्य - ] दिशामें तुम हो? ' ' उस दिशा में तृदेव वरुण है । ' ' वह में प्रतिष्ठित है? " कि वरुण जलका ही कि " श्रद्धा ही जल से वरुणको रचा " तसे सिद्ध होता है । ' में प्रतिष्ठित है? " ह बात " वीर्यसे जलकी इस श्रुति ह किसमें प्रतिष्ठित है? " क्योंकि वीर्यं हृदयका ही काम हृदयकी वृत्ति है, ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ कामिनो हि हृदयाद्रेतोऽधि-स्कन्दति । तस्मादपि प्रतिरूप-मनुरूपं पुत्रं जातमाहुलौकिकाः— अस्य पितुर्हृदयादिवायं पुत्रः सृप्तो विनिःसृतः, हृदयादिव । निर्मितो यथा सुवर्णेन निर्मितः कुण्डलः । तस्मात् हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीति । एवमेवैतत् याज्ञवल्क्य ॥ २२ १ ॥ ८१३ क्योंकि कामीके हृदयसे ही बीर्यं स्खलित होता है । इसीसे पिताके प्रतिरूप - अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रके विषयमें लौकिक पुरुष ऐसा कहते हूँ कि यह पुत्र मानो अपने पिताके हृदयसे हो सृप्त - विशेषरूपसे निःसृत हुआ है, स्वर्णसे वने हुए कुण्डलके समान मानो यह उसके हृदयसे ही बना है, अतः हृदयमें ही वीर्यं प्रतिष्ठित है । ' ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ २२ ॥
देवता और प्रतिष्ठाके सहित उत्तर दिशाका वर्णन किन्देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रति-ष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥
' इस उत्तर दिशामें तुम किस देवतावाले हो? ' [ याज्ञवल्क्य— ] सोमदेवतावाला हूँ । ' [ शाकल्य - ] ' वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' दीक्षामें । ' [ शाकल्य - ] ' दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है? " [ याज्ञवल्क्य - ] ' सत्यमें, इसीसे दीक्षित पुरुषसे सत्य बोलो, क्योंकि सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है । ' [ शाकल्य— ' सत्य किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' हृदय में । ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही सत्यको जानता है, अतः हृदयमें ही सत्य प्रतिष्ठित है । [ शाकल्य - ] ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ २३ ॥
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८१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ किन्देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्य । सीति १ सोमदेवत इति - सोम इति तां सोमं देवतां चैकी-कृत्य निर्देशः । स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति १ दीक्षाया-मिति - दीक्षितो हि यजमानः -सोमं क्रीणाति, क्रीतेन सोमेनेष्ट्वा ज्ञानवानुत्तरां दिशं प्रतिपद्यते - सोमदेवताधिष्ठितां सौम्याम् । कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति! -सत्य इति कथम् म् १ यस्मात् · सत्ये दीक्षा प्रतिष्ठिता, तस्मादपि दीक्षितमाहुः – सत्यं वदेति कारण श्रेषे कार्यश्रेषो मा भूदिति; सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति । कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति १ हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति तस्माद् हृदये ह्य व सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीति ॥ । एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥
इस उत्तर दिशामें तुम कौन देवतावाले हो? ' ‘ सोमदेवतावाला हूँ ’ —– ' सोम ' इस शब्दसे सोमलता और सोमदेवताको एक मानकर निर्देश किया गया है । ' वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' दीक्षा में'-क्योंकि दीक्षित यजमान ही सोमको खरीदता है और खरीदे हुए सोमसे यजन करके वह ज्ञानवान् सोम-देवतासे अधिष्ठित सोमसम्बन्धिनी उत्तर दिशाको प्राप्त होता है । ' दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है? " ' सत्यमें,; किस प्रकार? क्योंकि दीक्षा सत्यमें प्रतिष्ठित है, इसीसे दीक्षित पुरुषसे कहते हैं कि ' सत्य बोलो ' जिससे कि [ सत्यरूप ] कारणका नाश होनेसे [ दीक्षारूप ] कार्यका नाश न हो; अतः सत्य में ही दीक्षा प्रतिष्ठित है । ' सत्य किसमें प्रतिष्ठित है? ' इससर याज्ञवल्क्यने कहा, ' हृदयमें क्योंकि हृदयसे ही सत्यको जानता है; इसलिये सत्य हृदयमें ही प्रतिष्ठित है । ' [ शाकल्य ] ‘ याज्ञवल्क्य | यह बात ऐसी ही है ' ॥ २३ ॥ ना
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[ अध्याय ३ र दिशामें तुम कौन -? ' ' सोमदेवतावाला इस शब्दसे सोमलता ताको एक मानकर गया है । ' वह सोम उत हे? ' ' दीक्षा'-यजमान ही सोमको नौर खरीदे हुए सोमसे वह ज्ञानवान् सोम-ष्ठित सोमसम्बन्धिनी प्राप्त होता है । किसमें प्रतिष्ठित है? ' स प्रकार? क्योंकि प्रतिष्ठित है, इसीसे कहते हैं कि ' सत्य न कि [ सत्यरूप ] श होनेसे [ दीक्षारूप ] न हो; अतः सत्यमें बष्ठित है । ' सत्य किसमें इससर याज्ञवल्क्यने , क्योंकि हृदयसे हो ता है; इसलिये सत्य तिष्ठित है । ' [ शाकल्प- ] यह बात ऐसी ही STE ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१५ देवता और प्रतिष्ठाके सहित ध्रुवा दिशाका वर्णन किन्देवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक् प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥
' इस ध्रु वा दिशामें तुम कौन देवतावाले हो? ' [ याज्ञवल्क्य— ' ] “ अग्निदेवतावाला हूँ, ' [ शाकल्य - ] ' वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है? " [ याज्ञवल्क्य— ] ' वाक् । ' [ शाकल्य - ] ' वाक् किसमें प्रतिष्ठित है? ' याज्ञवल्क्य — ] ' हृदयमें । ' [ शाकल्य - ] ' हृदय किसमें प्रतिष्ठित ? ' ॥ २४ ॥
किन्देवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्य सीति । मेरोः समन्ततो वसतामव्यभिचारादूर्ध्वा दिग् ध्रुवेत्युच्यते । अग्निदेवत इति - । ऊर्ध्वायां हि प्रकाशभूयस्त्वम्, प्रकाशश्चाग्निः । सोऽग्निः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति १ वाचीति । कस्मिन्तु वाक् प्रतिष्ठितेति १ हृदय इति । तत्र याज्ञवल्क्यः सर्वासु दिक्षु विप्रसृतेन हृदयेन सर्वा दिश आत्मत्वेनामिसम्पन्नः; सदेवाः प्रतिष्ठा दिश आत्मभूतास्तस्य नामरूपकर्मात्मभूतस्य याज्ञवल्क्य -| ' इस ध्रुवा दिशामें तुम कौन देवतावाले हो? ' मेरुके चारों ओर निवास करनेवाले लोगोंकी दृष्टिसे ऊर्ध्वं दिशाका कभी व्यभिचार नहीं होता, इसलिये वह ध्रुवा कही जाती है । [ याज्ञवल्क्य - ] ‘ मैं अग्नि देवतावाला हूँ । ' क्योंकि ऊर्ध्व-दिशामें प्रकाशकी बहुलता है और प्रकाश ही अग्नि है । ' वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' वाक्में । ' ‘ और वाक् किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' हृदयमें । ' उस समय समस्त दिशाओं में फैले हुए हृदयके द्वारा याज्ञवल्क्य सम्पूर्णं दिशाओंको आत्मभावसे प्राप्त था; अर्थात् नामरूप और कर्मके स्वरूप-भूत उस याज्ञवल्क्यकी देवता और प्रतिष्ठाके सहित सम्पूर्णं दिशाएँ
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८१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ स्य । यद् रूपं तत् प्राच्या दिशा सह हृदयभूतं याज्ञवल्क्य-स्य । यत् केवलं कर्म पुत्रो-त्पादनलक्षणं च ज्ञानसहितं च सहफलेनाधिष्ठात्रीभिश्च देवता-भिर्दक्षिणाप्रतीच्युदीच्यः कर्मफ-लात्मिका हृदयमेव आपन्नास्तस्य, ध्रुवया दिशा सह नाम सर्वं वाग्द्वारेण हृदयमेव आपन्नम् । एतावद्धीदं सर्वम्, यदुत रूपं कर्म वा नाम वेति तत् सर्वं हृदयमेव, तत् सर्वात्मकं हृदयं पृच्छयते - कस्मिन्नु हृदयं प्रति-ष्ठितमिति ॥ २४ ॥
आत्मभत थीं । जो रूप था, वह पूर्व-दिशाके सहित याज्ञवल्क्यका हृदय-स्वरूप हो गया था । तथा जो केवल कर्म, पुत्रोत्पादनरूप कर्म और ज्ञानसहित कर्म थे वे अपने फल और अधिष्ठातृदेवोंके सहित कर्मफलरूप दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओंके साथ उसका हृदय ही हो गये थे । तथा ध्रु वा दिशा के सहित सम्पूर्ण नाम भी वाक्के द्वारा उसके हृदयको ही प्राप्त गये थे । जो कुछ रूप, कर्म अथवा नाम है, वह सब इतना ही है और वह सब हृदय ही है; उस सर्वात्मक हृदयके विषय में प्रश्न किया जाता है - ' हृदय किसमें प्रतिष्ठित | है? ' ॥ २४ ॥
हृदय और शरीरका अन्योन्याश्रयत्व अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्य-त्रास्मन्मन्यास यद्ध तदन्यत्रास्मत्स्याच्छ्वानो वैन-दद्युर्वया सि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥
याज्ञवल्क्यने ' अहल्लिक! ( प्रेत! ) ' ऐसा सम्बोधन करके कहा - ' जिस समय तुम इसे अलग मानते हो, उस समय यदि यह हमसे अलग हो जाय तो इसे कुत्ते खा जायँ, अथवा इसे पक्षी चोंच मारकर मथ डालें ॥ २५ ॥
अहल्लिकेति होवाच याज्ञ- याज्ञवल्क्यने ‘ अर्हल्लिक ' ऐसा कहा । १. ' अहनि लीयते इति अहल्लिकः ' जो दिनमें लोन हो जाता है वह अहल्लिक अर्थात् प्रेत है ।
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[ अध्याय ३ नीं । जो रूप था, वह पूर्व-व्हत याज्ञवल्क्यका हृदय-गया था । तथा जो पुत्रोत्पादनरूप कर्म सहित कर्म थे वे अपने अधिष्ठातृदेवोंके सहित दक्षिण, पश्चिम और ओंके साथ उसका हृदय थे । तथा ध्रु वा दिशाके म्पूर्ण नाम भी वाक्के के हृदयको ही प्राप्त हो छ रूप, कर्म अथवा नाम इतना ही है और वह ही है; उस सर्वात्मक षयमें प्रश्न किया जाता किसमें प्रतिष्ठित २४ ॥ -याश्रयत्व वल्क्यो यत्रैतदन्य-त्याच्छ्वानो वैन-॥ २५ ॥
बोधन करके कहा - ' जिस यह हमसे अलग हो जाय मारकर मथ डालें ॥ २५ ॥
ज्ञवल्क्यने ' अर्हल्लिक ' ऐसा कीन हो जाता है वह अहल्लिक ब्राह्मण ९ ] शङ्कर वल्क्यः, नामान्तरेण सम्बोधनं । कृतवान् । यत्र यस्मिन्काले, एतद् हृदयमात्मास्य शरीर-स्यान्यत्र क्वचिद्देशान्तरे, अस्मद-स्मत्तो वर्तत इति मन्यासै मन्यसे — यद्धि यदि ह्य ेतद् हृदयमन्यत्रास्मत् स्याद् भवेत्, श्वानो वैनच्छरीरं तदा अद्युः, वयांसि वा पक्षिणो वैनद् विमथ्नीरन् विलोडयेयुः विकर्षे रन्निति । तस्मान्मयि शरीरे हृदयं प्रतिष्ठितमित्यर्थः । शरीर-स्यापि नामरूपकर्मात्मकत्वात् हृदये प्रतिष्ठितत्वम् ॥ २५ ॥
८१७ अर्थात् [ प्रेतवाची ] अन्य नामसे सम्बोधन किया । जिस समय यह | हृदय - इस शरीरका आत्मा हमसे अन्यत्र किसी देशान्तरमें रहता है-ऐसा मानते हो; उस समय यदि इस शरीर से यह हृदय - आत्मा अन्यत्र हो जाय, तो इस शरीरको या तो कुत्ते खा जायँ या पक्षी इसे विमथित - विलोडित कर दें यानी चोंच मार - मारकर नोच डालें । अतः तात्पर्य यह है कि हृदय सुझ शरीरमें प्रतिष्ठित है । शरीर भी नाम, रूप एवं कर्ममय होनेके कारण हृदयमें ही प्रतिष्ठित है ॥ २५ ॥
समानपर्यंन्त शरीरादिकी प्रतिष्ठा तथा आत्मस्वरूपका वर्णन और शाकल्यका शिरःपतन हृदयशरीरयोरेवमन्योन्यप्रति- [ शाकल्य - ] इस प्रकार तुमने कार्य और करणरूप शरीर एवं ष्ठोक्ता कार्यकरणयोः; अतस्त्वां हृदयकी परस्पर प्रतिष्ठा बतलायी; पृच्छामि - इसलिये मैं तुमसे पूछता हूँ-कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इत्यपान इति कस्मिन्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्मा-गृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यते ऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति । बृ ० उ ० ५२-
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६.८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ एतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौपुरुषाः स यस्तान् पुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वोपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति । त ँह न मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हांस्य परिमोषिणोऽस्थीन्यप जहुरन्य-न्मन्यमानाः ॥ २६ ॥
' तुम ( शरीर ) और आत्मा ( हृदय ) किसमें प्रतिष्ठित हो । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' प्राणमें । ' [ शाकल्य - ] ' प्राण किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' अपान में । ' ' अपान किसमें प्रतिष्ठित है? " ' व्यान में । ' ' व्यान किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' उदान में । ' ' उदान किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' समान में । ' जिसका [ मधुकाण्ड में ] ' नेति नेति ' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है, वह आत्मा अगृह्य है - वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्यं है— वह शीर्ण ( नष्ट ) नहीं होता, असङ्ग है - वह संसक्त नहीं होता, असित है - वह व्यथित और हिंसित नहीं होता । ये आठ आयतन हैं, आठ लोक हैं, आठ देव हैं और आठ पुरुष हैं । वह जो उन पुरुषोंको निश्चय-पूर्वक जानकर उनका अपने हृदय में उपसंहार करके औपाधिक धर्मोका अतिक्रमण किये हुए है, उस औपनिषद पुरुषको मैं पूछता हूँ; यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया न बतला सकोगे किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, यही नहीं, अपितु चोरलोग उसकी ले गये ॥ २६ ॥
कस्मिन्नु त्वं च शरीरमात्मा । च तत्र हृदयं प्रतिष्ठितौ स्थ इति १ प्राण इति; देहात्मानौ प्राणे प्रतिष्ठितौ स्यातां प्राणवृतौ । कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति - सापि प्राणवृत्तिः! तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा । इसलिये उसका मस्तक गिर गया । हड्डियोंको कुछ और समझकर चुरा ' तुम शरीर और तुम्हारा आत्मा-हृदय किसमें प्रतिष्ठित हो? ' ' प्राणमें; देह और आत्मा - ये दोनों प्राणमें— प्राणवृत्ति में प्रतिष्ठित हैं । ' ' प्राण किसमें प्रतिष्ठित है? ' ' अपानमें, – क्योंकि वह प्राणवृत्ति भी यदि
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[ अध्याय३ 2 देवा अष्टौपुरुषाः कामत्तं त्वौपनिषदं चक्ष्यसि मूर्धा ते -यस्तस्य ह मूर्धा श्रीन्यपजह्नुरन्य-किसमें प्रतिष्ठित हो । ' किसमें प्रतिष्ठित है? ' ध्यान में । ' ' व्यान किसमें ष्ठित है? ' ' समान में । ' निरूपण किया गया है, सकता, अशीर्यं है— त नहीं होता, असित गिरना आठ आयतन हैं, आठ शिर उन पुरुषोंको निश्चय-रके औपाधिक धर्मोका शाकल्यका मैं पूछता हूँ; यदि तुम मस्तक गिर जायगा । का मस्तक गिर गया । छ और समझकर चुरा र और तुम्हारा आत्मा-प्रतिष्ठित हो? ' ' प्राण में; त्मा- ये दोनों प्राणमें-प्रतिष्ठित हैं । ' ' प्राण ष्ठित है? ' ' अपान में, वह प्राणवृत्ति भी यदि
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