बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 831–840
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
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ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ ९ प्रागेव प्रयात् अपानवृत्त्या चेन्न निगृह्य ेत । कस्मिन्न्वपानः प्रति ष्ठित इति १ व्यान इति – साप्य -! पानवृत्तिरध एव यायात् प्राण-वृत्तिश्च प्रागेव, मध्यस्थया चेद्व्यानवृत्त्या न निगृह्य ेत । कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इति १ उदान इति — सर्वास्तिस्रोऽपि वृत्तय उदाने कीलस्थानीये चेन्न निबद्धा, विष्वगेवेयुः । कस्मिन्नू-दानः प्रतिष्ठित इति १ समान इति - समानप्रतिष्ठा ह्य ेताः सर्वा वृत्तयः । एतदुक्तं भवति – शरीरहृदय-चायवोऽन्योन्यप्रतिष्ठाः, सङ्घा-तेन नियता वर्तन्ते विज्ञानमयार्थ- 6 प्रयुक्ता इति । सर्वमेतद् येन नियतं यस्मिन् प्रतिष्ठितमाका-शान्तमोतं च प्रोतं च तस्य निरुपाधिकस्य साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्मणो निर्देशः कर्तव्य इत्यय-मारम्भः । स एषः - स यो नेति नेतीति निर्दिष्टो मधुकाण्डे, एष सः । सोऽयमात्मागृह्यो न गृह्यः! । | अपानवृत्तिद्वारा रोकी न जाय तो | वह ऊपर - ही ऊपर बाहर निकल । जाय । ' ' अपान किसमें प्रतिष्ठित हे? ' ' व्यानमें, क्योंकि यदि मध्य-वर्तनी व्यानवृत्तिसे न रोकी जाय तो अपानवृत्ति नीचेको ही चली जाय और प्राणवृत्ति ऊपरको ही निकल जाय । ' ' व्यान किसमें प्रति-ष्ठित है? ' ' उदानमें, यदि ये तीनों वृत्तियाँ कीलस्थानीय उदान-वृत्तिमें बँधी न हों तो सब ओर ही चली जायँ । ' ' उदान किसमें प्रति-ष्ठित है? ' समानमें, – ये सब वृत्तियाँ समानमें ही प्रतिष्ठित हैं । ' यहां कहा यह गया है कि शरीर, हृदय और प्राण - ये परस्पर प्रतिष्ठित हैं और विज्ञानमयके लिये प्रयुक्त होकर सङ्घातरूपसे नियमपूर्वक प्रवृत्त होते हैं । यह सब जिसके द्वारा नियत है, जिसमें प्रतिष्ठित है और जिसमें यह आकाशपर्यन्त ओतप्रोत है, उस निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्मका निर्देश करना है, इसीसे यह आगे आरम्भ किया जाता है । स एषः - वह, जिसका कि मधु-काण्डमें ' नेति नेति ' इस प्रकार निर्देश किया गया है, यह है । वह् यह आत्मा अगृह्य है, ग्रहण करने
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८२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ कथम्? यस्मात् सर्वकार्यधर्मा- । तीतः, तस्मादगृह्यः । कुतः १ यस्मान्न हि गृह्यते । यद्धि करण-गोचरं व्याकृतं वस्तु, तद् ग्रहण-गोचरम्; इदं तु तद्विपरीतमात्म-तत्त्वम् । तथाशीर्यः यद्धि मृतं संहतं शरीरादि तच्छीर्यते; अयं तु तद्विपरीतोऽतो न हि शीर्यते । तथासङ्गो मूर्ती मूर्तान्तरेण सम्बध्यमानः सज्यतेऽयं च तद्वि-परीतोऽतो न हि सज्यते । तथा-सितोऽबद्धः, यद्धि मूर्त तद् बध्यते, अयं तु तद्विपरीतत्वादवद्धत्वान्न व्यथते, अतो न रिष्यति - ग्रह णविशरणसम्बन्धकार्यधर्मरहित-त्वान्न रिष्यति न हिंसामापद्यते न विनश्यतीत्यर्थः । योग्य नहीं है, किस प्रकार? क्योंकि यह समस्त कार्यधर्मोसे अतीत है, इसलिये अगृह्य है । क्यों अगृह्य है? क्योंकि यह ग्रहण नहीं किया जा सकता । जो व्याकृत वस्तु इन्द्रियका विषय होती है, वही ग्रहणका विषय होती है, किंतु यह आत्मतत्त्व तो उससे विपरीत है । इसी प्रकार यह अशीयं है; जो मूर्त और संहत शरीरादि हैं, वे ही शीर्णं होते हैं; यह उससे विप-रीत है, इसलिये यह शीर्णं ( नष्ट ) नहीं होता । तथा यह असङ्ग है । मूर्त पदार्थ हो किसी दूसरे मूर्तं पदार्थसे सम्बद्ध होनेपर उसमें संसक्त होता है, यह उससे विपरीत स्वभाव-वाला है, इसलिये कहीं संसक्त नहीं होता । तथा यह असित - अबद्ध है, क्योंकि जो पदार्थ मूर्त होता है, वही बँधता है; किंतु यह उससे विपरीत ( अमूर्त ) और अबद्ध होने के कारण व्यथित नहीं होता और इसीसे रेष ( हिंसा ) को नहीं प्राप्त होता है— ग्रहण, विशरण, सम्बन्ध आदि कार्यं धर्मोंसे रहित होने के कारण यह रेष अर्थात् हिंसा-को नहीं प्राप्त होता; भाव यह कि वह कभी नष्ट नहीं होता ।
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[ अध्याय ३ किस प्रकार? क्योंकि कार्यधर्मोसे अतीत है, है । क्यों अगृह्य है? ग्रहण नहीं किया जा व्याकृत वस्तु इन्द्रियका है, वही ग्रहणका विषय तु यह आत्मतत्त्वतो है । कार यह अशीयं है: संहत शरीरादि हैं, ते हैं; यह उससे विप-ये यह शीर्ण ( नष्ट ) तथा यह असङ्ग है । ही किसी दूसरे मूर्त द्ध होनेपर उसमें संसक्त उससे विपरीत स्वभाव-लिये कहीं संसक्त नहीं यह असित - अबद्ध है, पदार्थ मूर्त होता है, है; किंतु यह उससे अमूर्त ) और अबद्ध T व्यथित नहीं होता ष ( हिंसा ) को नहीं हे – ग्रहण, विशरण, दकार्यं धर्मोंसे रहित यह रेष अर्थात् हिंसा-होता; भाव यह कि नहीं होता । ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्य ८२१ क्रममतिक्रम्य औपनिषदस्य पुरुषस्य आख्यायिकातोऽपसृत्य । श्रुत्या स्वेन रूपेण त्वरया निर्देशः क्रुतः; ततः पुनराख्यायिकामेवा -श्रित्याह —- एतानि यान्युक्ता न्यष्टा वायतनानि ' पृथिव्येव यस्यायतनम् ' इत्येवमादीनि, अष्टौ लोका अग्निलोकादयः, अष्टौ देवाः अमृतमिति होवाच ' इत्येवमादयः; श्रष्टौ पुरुषाः शारीरः पुरुषः, इत्यादयः स यः कश्चित् तान् पुरुषाशारीरप्रभृतीन् । from निश्चयेनोद्य गमयित्वाष्ट-चतुष्कभेदेन लोकस्थितिमुप-पाद्य, पुनः प्राचीदिगादिद्वारेण प्रत्युद्य उपसंहृत्य स्वात्मनि । हृदयेऽत्यक्रामदतिक्रान्ता-नुपाधिधर्म हृदयाद्यात्मत्वम्; स्वेनैवात्मना व्यवस्थितो य औपनिषदः पुरुषोऽशनायादि वर्जितः उपनिषत्स्वेत्र विज्ञेयो नान्यप्रमाणगम्यः, तं त्वा त्वां विद्याभिमानिनं पुरुषं पृच्छामि । तं चेद् यदि यहाँ श्रुतिने उतावलीके कारण क्रमको छोड़कर आख्यायिकासे हट-कर औपनिषद पुरुषका स्वरूपतः निर्देश कर दिया है; इसलिये अब फिर आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है- ' ये जो ' पृथिव्येव यस्यायतनम् ' इत्यादि प्रकारसे वर्णित आठ आयतन, ' अग्निलोक ' आदि आठ लोक, ' अमृतमिति होवाच ' इत्यादि प्रकारसे कहे हुए आठ देव तथा ' शारीर पुरुष ' आदि आठ पुरुष बतलाये गये हैं; जो कोई इन शारीरप्रभृति आठ पुरुषों-को निरुह्य - निश्चयपूर्वक ऊहा करके अर्थात् इनका ज्ञान प्राप्त कराकर आयतन, लोक, देव और पुरुषरूप चार भेदोंके समुदायके क्रमसे आठ विभागोंद्वारा लोकस्थितिके अनुकूल विस्तारपूर्वक उपपादन कर फिर प्राची दिगादिके द्वारा उन्हें स्वात्मा-में - अपने हृदयमें प्रत्युह्य अर्थात् उपसंहृत कर उपाधिधर्मं हृदयादि-रूपताका अतिक्रमण किये हुए है तथा जो क्षुधादिधर्मं रहित औपनि-षद पुरुष अपने ही स्वरूपसे स्थित और उपनिषदोंमें ही विज्ञेय है, किसी अन्य प्रमाणसे नहीं जाना जा सकता, उस पुरुषके विषयमें मैं विद्याका अभिमान रखनेवाले तुमने प्रश्न करता हूँ, यदि तुम | मेरे प्रति उसका विवि-
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८२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ मेन विवक्ष्यसि विस्पष्टं न कथयिष्यसि, मूर्धा ते विपति-ष्यतीत्याह याज्ञवल्क्यः । तं स्वोपनिषदं पुरुषं शाकन्यो न मेने ह न विज्ञातवान् किल तस्य द्द मूर्धा विपपात विपतितः । समाप्ताख्यायिका । श्रुतेर्वचनं तं ह न मेन इत्यादि । किं चापि हास्य परमषिस्तस्करा अस्थीन्यपि संस्कारार्थं शिष्यै-नींयमानानि गृहान् प्रत्यपजहुः -अपहृतवन्तः किन्निमित्तम् १ अन्यद् धनं नीयमानं मन्य-मानाः । पूर्ववृत्ताह्या ख्यायिकेह सूचि-ता । अष्टाध्याय्यां किल शाकल्येन याज्ञवल्क्यस्य समा-नान्त एव किल संवादो निर्वृत्तः; तत्र याज्ञवल्क्येन शापो दत्तः -पुरेऽतिथ्ये मरिष्यसि न ते -ऽस्थीनि च न गृहान् प्राप्स्यन्ती-ति । स ह तथैव ममार । तस्य हाप्यन्यन्मन्यमानाः परिमो षिणोऽस्थीन्यपजहुः; तस्मान्नोप-| ख्यान - विशेष स्पष्टरूपसे रूप नहीं करोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा ' - ऐसा याज्ञल्क्यने कहा । उस औपनिषद पुरुषको शाकल्य नहीं जानता था उसे उसका स्पष्ट ज्ञान नहीं था; अतः उसका मस्तक विपपात अर्थात् गिर गया । बस, आख्यायिका समाप्त हो गयो । ' तं ह न मेने ' इत्यादि श्रुतिके वचन हैं । यही नहीं, उसके शिष्यगण जो उसकी अस्थियों को संस्कारके लिये घरकी ओर ले जा रहे थे, उन्हें परिमोषी - लुटेरों ने छीन लिया । क्यों? उन्हें ले जाये जाते हुए कोई अन्य धन समझकर । यह पहले घटी हुई आख्यायि-का ही यहाँ सूचित की गयी है । अष्टाध्यायीमें शाकल्य के साथ याज्ञ-वल्क्यका समानपर्यन्त ही संवाद हुआ है; फिर याज्ञवल्क्यने उसे शाप दिया है कि ' तू पुण्यक्षेत्राति-रिक्त देश और पुण्यतिथिशून्य कालमें मरेगा और तेरी हड्डियां भी घरतक नहीं पहुंचेंगी । ' वह इसी प्रकार मरा । यहाँतक कि अन्य वस्तु समझकर उसकी हड्डियोंको लुटेरे ले गये; इसलिये उपवादी ( तिरस्कार करनेवाला ) नहीं होना १. यह वृहदारण्यकसे पूर्ववर्ती कर्मविषयक ग्रन्थ है ।
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[ अध्याय ३ स्पष्टरूपनिरूपण तुम्हारा मस्तक गिर याज्ञल्क्यने कहा । षद पुरुषको शाकल्य बा - उसे उसका स्पष्ट अतः उसका मस्तक गिर गया । बस, समाप्त हो गयो । ' तं दिश्रुतिके वचन हैं । सके शिष्यगण जो को संस्कार के लिये ने जा रहे थे, उन्हें छीन लिया । जाये जाते हुए कोई ककर । वटी हुई आख्यायि चित की गयी है । कल्य के साथ याज्ञ-नपर्यन्त ही संवाद याज्ञवल्क्यने उसे कि ' तू पुण्यक्षेत्राति-और पुण्यतिथिशून्य नौर तेरी हड्डियां भी हुंचेंगी । ' वह इसी यहाँतक कि अन्य उसकी हड्डियोंको इसलिये उपवादी निवाला ) नहीं होना ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८२३ वादी स्यादुत वंचित् परो | चाहिए; क्योंकि ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ भवतीति । सैषा आख्यायिका होता है । यह आख्यायिका यहाँ आचारार्थं सूचिता विद्यास्तुतये आवारप्रदर्शन और विद्याको स्तुति-चेह ॥ २६ ॥ के लिये सूचित की गयी है ॥ २६ ॥
याज्ञवल्क्यका सभासदोंको प्रश्न करनेके लिये आमन्त्रण यस्य नेति नेतीत्यन्यप्रतिषेध-द्वारेण ब्रह्मणो निर्देशः कृतः, तस्य विधिमुखेन कथं निर्देशः कर्तव्यः, इति पुनराख्यायिका-मेक् आश्रित्याह मुलं च जगतो वक्तव्यमिति । आख्यायिका -सम्बन्धस्त्वब्रह्मविदो ब्राह्मणा-जित्वा गोधनं हर्तव्यमिति । न्यायं मत्वाह-अथ होवाच ब्राह्मणा स मा पृच्छतु सर्वे वा मा जिस ब्रह्मका ' नेति नेति ' इस प्रकार अन्य पदार्थों के प्रतिषेधद्वारा निर्देश किया गया है, उसका विधि-मुखसे किस प्रकार निर्देश करना चाहिये, अतः इस उद्देश्यसे कि जगत्का मूल बतलाना है, श्रुति पुनः आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है । आख्यायिकाका सम्बन्ध तो यही है कि अब्रह्मज्ञ ब्राह्मणोंको जीतकर गोधन ले जाना उचित है । अत: न्याय समझकर याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-भगवन्तो यो वः कामयते पृच्छत यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥ २७ ॥
फिर याज्ञवल्क्यने कहा, ' पूज्य ब्राह्मणगण! आपमें से जिसकी इच्छा हो वह मुझसे प्रश्न करे, अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें, इसी प्रकार आपमें से जिसकी इच्छा हो, उससे में प्रश्न करता हूँ या आप सभी से मैं प्रश्न करता हूँ । ' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥
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८२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय अथ होवाच । अथानन्तरं तूष्णीम्भूतेषु ब्राह्मणेषु होवाच हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्येवं सम्बोध्य - यो वो युष्माकं मध्ये कामयते इच्छति - याज्ञवल्क्यं पृच्छामीति स मा मामागत्य पृच्छतु; सर्वे वा मा पृच्छत-सर्वे वा यूयं मा मां पृच्छत । यो वः कामयते याज्ञवल्क्यो मां पृच्छत्विति, तं वः पृच्छामि सर्वान् वा वो युष्मानहं पृच्छामि । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः - ते ब्राह्मणा एवमुक्ता अपि न प्रगन्भाः संवृत्ताः किञ्चिदपि प्रत्युत्तरं वक्तुम् ॥ २७ ॥
३ ' अथ होवाच ' – अथ - इसके अनन्तर ब्राह्मणोंके मौन हो जाने-पर याज्ञवल्क्यने ' हे पूज्य ब्राह्मण-गण! ' इस प्रकार संम्बोधन करके कहा, ' आपमें जिसकी ऐसी कामना -इच्छा हो कि मैं याज्ञवल्क्यसे प्रश्न करूँ, वह मेरे सामने आकर पूछ सकता है । ' सर्वे वा मा पृच्छत'-अथवा आप सभी मुझसे पूछ सकते हैं । और आपमें से जिसकी ऐसी इच्छा हो कि याज्ञवल्क्य मुझसे प्रश्न करे, उससे मैं पूछता हूँ अथवा । आप सभीसे मैं पूछता हूँ । ' उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ - इस प्रकार कहे जानेपर भी वे ब्राह्मण किसी प्रकारका प्रत्युत्तर देनेकी प्रगल्भता ( धृष्टता ) न कर सके ॥ २७ ॥
याज्ञवल्क्यके प्रश्न
तान् हैते: श्लोकैः पप्रच्छ-यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥१ ॥
याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया - वनस्पति ( विशा-लता आदि गुणोंसे युक्त ) वृक्ष जैसा ( ( जिस धर्मोंसे युक्त ) होता है, पुरुष ( जीवका शरीर ) भी वैसा हो ( उन्हीं धर्मोसे सम्पन्न ) होता है - यह बिल्कुल सत्य है । वृक्षके पत्ते होते हैं और उस पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोएँ होते हैं; उसके शरीरमें जो त्वचा ( चाम ) है, उसकी समतामें इस वृक्षके बाहरी भागमें छाल होती है ॥ १ ॥
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[ अध्याय ३ 22 वाच ' - अथ - इसके णोंके मौन हो जाते. ने ' हे पूज्य ब्राह्मण-कार संम्बोधन करके जिसकी ऐसी कामना - मैं याज्ञवल्क्यसे प्रश्न सामने आकर पूछ सर्वे वा मा पृच्छत'--भी मुझसे पूछ सकते पसे जिसकी ऐसी याज्ञवल्क्य मुझसे से में पूछता हूँ अथवा पूछता हूँ । ' उन साहस न हुआ - इस नेपर भी वे ब्राह्मण का प्रत्युत्तर देनेकी धृष्टता ) न कर ब्राह्मण ९ | शाङ्करभाष्यार्थ ८२१ तेषु श्रप्रगल्भभूतेषु ब्राह्मणेषु तान् हैतैर्वक्ष्यमाणैः श्लोकैः पप्रच्छ पृष्टवान् । यथा लोके वृक्षो वन-स्पतिः, वृक्षस्य विशेषणं वनस्प-तिरिति ", तथैव पुरुषोऽमृषा -अमृषा सत्यमेतत् - तस्य लोमानि; तस्य पुरुषस्य लोमानीतरस्य वन-स्पतेः पर्णानि; त्वगस्योत्पाटिका बहि: - त्वगस्य पुरुषस्य इतरस्यो-स्पाटिका वनस्पतेः ॥ १ ॥
जब वे ब्राह्मण कुछ बोलनेका साहस न कर सके तो याज्ञवल्क्यने उनसे इन आगे कहे जानेवाले
श्लोकोंद्वारा पूछा । जिस प्रकार
लोकमें वनस्पति अर्थात् विशालता आदि गुणोंसे युक्त वृक्ष है- वनस्पति यह वृक्षका विशेषण है – उसी प्रकार यानी उस वृक्षके समान धर्मोसे सम्पन्न पुरुष भी है — यह बिल्कुल सत्य बात है । उसके लोम-उस पुरुष के लोम हैं और उन्हींके समान इतर यानी इस वनस्पतिके पत्ते होते हैं तथा ' त्वगस्योत्पाटिका बहि: ' इस पुरुषके शरीरमें जो त्वचा है, उसकी समानता रखनेवाली इतर यानी इस वनस्पति वृक्षके बाहरी भागमें छाल है ॥ १ ॥
षोऽमृषा ।
का बहिः ॥ १ ॥
वनस्पति ( विशा-उक्त ) होता है, पुरुष न ) होता है - यह के शरीरमें पत्तोंकी ) है, उसको समतामें
त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः ।
तस्मात्तदातृण्णात् प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥२ ॥
इस पुरुषकी त्वचासे ही रक्त चूता है और वृक्षको भी त्वचा ( छाल ) से ही गोंद निकलता है । वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षसे रस निकलता है, उसी प्रकार चोट खाये हुए पुरुष - शरीरसे रक्त प्रवाहित होता है ॥ २ ॥
त्वच एव सकाशादस्य पुरुष- इस पुरुषकी त्वचा के ही पाससे स्य रुधिरं प्रस्यन्दि, वनस्पतेस्त्रच रक्त चूकर गिरता है और वनस्पतिकी
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८२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ उत्पटः – - त्वच एवोत्स्फुटति । यस्मात्; एवं सर्वं समानमेव वन-स्पतेः पुरुषस्य च; तस्माद् श्रातृ-ण्णात् हिंसितात् प्रति तद् रुधिरं निर्गच्छति वृक्षादिव भारताच्छि-नाद् रसः ॥ २ ॥
भी त्वचा ( छाल ) से ही पट अर्थात् गोंद निकलता है; क्योंकि वह ( गोंद ) वृक्षकी छालसे हो फूट-कर बहता है । इस प्रकार वनस्पति और पुरुषकी सभी बातें एक - ही-जैसी हैं । इसीलिये महत अर्थात् कटे हुए वृक्षसे निकले हुए रसकी भांति चोट खाये हुए पुरुष- शरीरसे भी वह रुधिर निकलता है ॥ २ ॥
मांसान्यस्य शकराणि किनाट ँ
स्नाव तत् स्थिरम् ।
अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥३ ॥
पुरुषके शरीरमें मांस होते हैं और वनस्पतिके शकर ( छालका भीतरी अंश ), पुरुषके स्नायु - जाल होते हैं और वृक्षमें किनाट ( शकर-के भी भीतरका अंशा - विशेष ) । वह किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है । पुरुषके स्नायु - जालके भीतर जैसे हड्डियां होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर काष्ठ हैं तथा मज्जा की गयी है ॥ ३ ॥
एवं मांसान्यस्य पुरुषस्य, वनस्पतेस्तानि शकराणि शक-लानीत्यर्थः । किनाटं वृक्षस्य, किनाटं नाम शकलेभ्योऽस्य-न्तरं वल्कलरूपं काष्ठसंलग्नम्, तत् स्नाव पुरुषस्य; तत् स्थिरम् तच्च किनाटं स्नाववद् तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित इसी प्रकार इस पुरुषके मांस हैं और वनस्पतिके मांसस्थानीय शकर — शकल ( छालके भीतरका अंश ) हैं । वृक्षके किनाट होता है, किनाट उसे कहते हैं जो शकलों-से भीतर काठसे लगी हुई छाल होती है, वह [ अर्थात् उसके सदृश ] पुरुषकी शिराएँ हैं । वह स्थिर है अर्थात् वह किनाट शिराओंके f | समान पुरुषकी
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[ अध्याय ३ बाल ) से ही उत्पट नकलता है; क्योंकि नकी छालसे हो फूट-इस प्रकार वनस्पति सभी बातें एक - ही-लये आहत अर्थात् निकले हुए रसकी ये हुए पुरुष- शरीरसे निकलता है ॥ २ ॥
[ स्थिरम् ।
ना कृता ॥३ ॥
शकर ( छालका नमें किनाट ( शकर-की ही भाँति स्थिर ती हैं, वैसे ही वृक्षमें के हो समान निश्चित इस पुरुषके मांस तिके मांसस्थानीय ( छालके भीतरका के किनार होता है, कहते हैं जो शकलों-लगी हुई छाल अर्थात् उसके सदृश ] ऍ हैं । वह स्थिर किनाट किनाट शिराओंके है । पुरुषकी ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८२७ दृढं हि तत्; अस्थीनि पुरुषस्य, | शिराओंके भीतर अस्थियाँ होती हैं; स्नान्नो ऽन्तरतोऽस्थीनि भवन्ति; इसी प्रकार किनाटके भीतर काष्ठ तथा किनाटस्याभ्यन्तरतो दारूणि काष्ठानि मञ्जा, मञ्जव वनस्पतेः पुरुषस्य च मज्जोपमा कृता, मज्जाया उपमा मज्जोपमा, नान्यो विशेषोऽस्तीत्यर्थः; यथा वनस्पतेर्मज्जा तथा पुरुषस्य, यथा पुरुषस्य तथा वनस्पतेः । । ३ ॥ यद् वृक्षो वृक्णो रोहति होता है; मज्जा - वनस्पति तथा पुरुषकी मज्जा हो मज्जाको उपमा नियत की गयी है, मज्जाकी उपमा हो मज्जोपमा है, अर्थात् उनमें कोई अन्य भेद नहीं है; जिस प्रकार वनस्पतिकी मज्जा होती है, वैसे ही पुरुषको होती है और जैसे पुरुषकी होती है वैसे ही वनस्पतिको होती है || ३ ||
मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥४ ॥
किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो अपने मूलसे पुन: और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो जाता है; इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह किस मूलसे उत्पन्न होगा? ॥ ४ ॥
यद् यदि वृत्तो वृक्णश्छि-भो रोहति पुनः पुनः प्ररोहति प्रादुर्भवति मूलात् पुनर्नवतरः पूर्वस्मादभिनवतरः; यदेतस्माद् विशेषणात् प्राग् वनस्पतेः पुरुषस्य च, सर्वं सामान्यमव-गतम्; अयं तु वनस्पतौ विशेषो दृश्यते यच्छिन्नस्य प्ररोह- । यदि वृक्षको काट दिया जाय तो वह पुन: - पुनः अपनी जड़से अतिशय नवीन - पहलेको अपेक्षा नवीनतर होकर अङ्कुरित - प्रादु-भूत हो जाता है । इस विशेषणसे पूर्वं वनस्पति और पुरुषकी सब प्रकार समानता जानी गयो है; किंतु कट जानेपर पुनः अङ्कुरित हो जाना यह वनस्पतिमें विशेषता देखी जाती है; परंतु
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८२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ __णम्; न तु पुरुष मृत्युना वृकणे । पुनः प्ररोहणं दृश्यते; भवितव्यं च कुतश्चित्प्ररोहणेन; तस्माद् वः पृच्छामि – मर्त्यो मनुष्यः स्वि - । न्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ९ मृतस्य पुरुषस्प कुतः प्ररोहणमित्यर्थः ॥ ४ ॥
मृत्युद्वारा छेदन किये जानेपर पुरुष-को पुनः अङ्कुरित होते नहीं देखा जाता; किंतु वह किसीसे अङ्कुरित अवश्य होना चाहिये; इसीसे में आपलोगोंसे पूछता हूँ कि यदि मृत्युद्वारा मनुष्यका छेदन कर दिया जाय त वह किस मूलसे अङ्कुरित होता है? अर्थात् मरे हुए पुरुषकी उत्पत्ति कहाँसे होती है? ॥ ४ ॥
रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत् प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥५ ॥
वह वीर्यसे उत्पन्न होता है - ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्यं तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [ मृत पुरुषसे नहीं ] । वृक्ष भी [ केवल तसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] वीजसे भी उत्पन्न होता है, किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुनः अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है ॥ ५ ॥
यदि चेदेवं वदथ - रेतसः प्ररो-हतीति, मा वोचत मैवं वक्तु-मर्हथ कस्मात् १ यस्माज्जीवतः पुरुषात्तद् रेतः प्रजायते, न मृतात् । अपि च धानारुहः, धाना बीजम्, वीजरुहोऽपि वृतो भवति, न केवलं काण्ड-रुह एव; इवशब्दोऽनर्थ क यदि तुम ऐसा कहो कि वह वीर्यसे उत्पन्न होता है, तो मत कहो - ऐसा कहना उचित नहीं है; क्यों नहीं है? क्योंकि वीर्यं जीवित | पुरुषसे ही उत्पन्न होता है, मरे हुएसे नहीं होता । वृक्ष धा भी है, धाना बीजको कहते हैं, उस बीजसे उत्पन्न होनेवाला भी वृक्ष होता है; वह केवल तनेसे ही उत्पन्न नहीं होता; ' इव ' शब्द.