बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 841–850

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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[ अध्याय ३ - किये जानेपर पुरुष-रित होते नहीं देखा ह किसीसे अङ्कुरित चाहिये; इसीसे में हूँ कि यदि न्यका छेदन कर दिया किस मूलसे अङ्कुरित त् मरे हुए पुरुषकी होती है? ॥ ४ ॥

प्रजायते । सम्भवः || ५ || कहो, क्योंकि वीर्यं तो [ हों ] । वृक्ष भी [ केवल होता है, किंतु बीजसे नः अङ्कुरित होकर ऐसा कहो कि वह होता है, तो मत -हना उचित नहीं है; - क्योंकि वीर्य जीवित उत्पन्न होता है, मरे होता । वृक्ष धानारह - बीजको कहते हैं, उस न होनेवाला भी वृक्ष वह केवल तनेसे ही होता; ' इव ' शब्द-ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ वै वृक्षोऽञ्जसा साक्षात् प्रेत्य । मृत्वा सम्भवो धानातोऽपि प्रेत्य सम्भवो भवेदखसा पुनर्वन-स्पतेः ॥ ५ ॥

८२ ९ 22 का कोई अर्थ नहीं है; यह प्रसिद्ध है कि वृक्ष मरकर भी पुन: साक्षात् उत्पन्न हो जाता है; घाना अर्थात् बीजसे उत्पन्न हुए वनस्पतिका भी कटने के बाद पुनः प्रादुर्भाव हो जाता है [ किंतु- जीवके शरीरका इस प्रकार आविर्भाव नहीं देखा जाता ] ॥ ५ ॥

SECR

यत् समूलमावृहेयुवृक्षं न पुनराभवेत् ।

मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति॥६ ॥

यदि वृक्षको मूलसहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा; इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है? ॥ ६ ॥

यद् यदि सह मूलेन धानया वा श्रीवृहेयुरुद्यच्छेयुरुत्पाटयेयु- । वृक्षम्, न पुनराभवेत् पुनरागत्य न भवेत् । तस्माद् वः पृच्छामि सर्वस्यैव जगतो मूलम् - - म मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मू-लात् प्ररोहति ॥ ६ ॥

यदि वृक्षको मूल अथवा बीजके सहित ' आवृहेयुः ' — आकर्षित कर लें- उखाड़ लें तो फिर वह वृक्ष कहींसे आकर उत्पन्न नहीं होगा । इसलिये में तुमलोगोंसे सम्पूर्ण जगत् के मूलके सम्बन्धमें प्रश्न कर रहा हूँ- यदि मृत्यु मनुष्यका छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है? ॥ ६ ॥

जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः । विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य तद्विद इति ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥

पृष्ठ 842

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८३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३. [ यदि ऐसा मानो कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वह मरकर पुन: उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा? [ यह प्रश्न है; ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वयं ही उसका निर्देश करती है - ] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता ( कर्म करनेवाले यजमान ) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥

जात एवेति मन्यध्वं यदि किमत्र प्रष्टव्यमिति - अनिष्यमा -णस्य हि सम्भवः प्रष्टव्यः, न जातस्य, अयं तु जात एवातो-ऽस्मिन् विषये प्रश्न एव नोप--पद्यत इति चेत् - न, किं तर्हि? मृतः पुनरपि जायत एवान्यथा-कृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात्; अतो वः पृच्छामि को न्वेनं मृतं पुनर्जनयेत्? तन्न विजज्ञर्ब्राह्मणाः - यतो , मृतः पुनः प्ररोहति जगतो मूलं न विज्ञातं ब्राह्मणैः; अतो ब्रह्मिष्ठ-त्वाद् हृता गावः; याज्ञवल्क्येन यदि तुम ऐसा मानते हो कि पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, उसके विषय में क्या पूछना – क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला होता है, उसीकी उत्पत्तिके विषय में पूछा जाता है, जो उत्पन्न हो चुका है, उसके विषय में नहीं पूछा जाता; वह पुरुष तो उत्पन्न हो चुका है, इसलिये इसके विषय में प्रश्न करना f उचित नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; तो क्या बात है? मरने-पर भी तो यह पुनः उत्पन्न होता इ ही है, नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति क और किये हुएके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा; इसीसे में तुमलोगों से प पूछता हूँ कि मरनेपर इसे पुनः कौन वि उत्पन्न करेगा? ब्राह्मणोंको इसका विशेष ज्ञान व नहीं था, जहाँसे मरनेपर पुरुष वे पुनः जन्म लेता है; उस जगत्के मा मूलका ब्राह्मणोंको पता नहीं था । इत्य अत: ब्रह्मिष्ठ होनेके कारण याज्ञवल्क्य-ने गायोंको हरण कर लिया और वे

पृष्ठ 843

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[ अध्याय ३ गया है, अतः फिर मरकर पुन: उत्पन्न न उत्पन्न करेगा? दिया, इसलिये श्रुति ब्रह्म है, वह धनदाता ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मानते हो कि न हो ही गया है, क्या पूछना - क्योंकि नेवाला होता है, त्तिके विषयमें पूछा उत्पन्न हो चुका है, नहीं पूछा जाता; उत्पन्न हो चुका है, विषय में प्रश्न करना है, तो ऐसा कहना क्या बात है? मरने-पुन: उत्पन्न होता बिना कियेकी प्राप्ति कनाशका प्रसङ्ग आ से मैं तुमलोगों रने पर इसे पुनः कौन ? - इसका विशेष ज्ञान-सिमरनेपर पुरुष है; उस जगत् को पता नहीं था । के कारण याज्ञवल्क्य-कर लिया और वे . ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३१ जिता ब्राह्मणाः । समाप्ता श्राख्या- ब्राह्मण जीत लिये YAVAL गये । आख्यायिका V यिका । समाप्त हुई । जगतो मूलम्, येन च जो जगत्का मूल है, जिस शब्देन साक्षाद् व्यपदिश्यते ब्रह्म, यद् याज्ञवल्क्यो ब्राह्मणान् पृष्टवांस्तत् स्वेन रूपेण श्रुति-रस्मभ्यमाह — विज्ञानं विज्ञप्ति-विज्ञानम्, तच्च आनन्दम्, न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम्, किं तर्हि ९ प्रसन्नं शिवमतुलम --नायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थः, किं तद् ब्रह्म उभयविशेषणवद् -रातिः - रातेः षष्ठयर्थे प्रथमा, ' धनस्येत्यर्थः, धनस्य दातुः -कर्मकृतो यजमानस्य परायणं ' परा गतिः कर्मफलस्य प्रदातु । किश्च व्युत्थायैषणाभ्यस्तस्मिन्नेव ब्रह्मणि तिष्ठत्यकर्मकृत्, तद् ब्रह्म वेतीति तद्वचः तस्य - तिष्ठ--मानस्य च तद्विदः; ब्रह्मविद इत्यर्थः, परायणमिति । शब्दसे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश किया जाता है और जिसके विषयमें याज्ञवल्क्यने ब्राह्मणोंसे पूछा था, उसे श्रुति हमारे लिये स्वयं ही बतलाती है - विज्ञान - विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, वही आनन्द भी है, विषय विज्ञानके समान वह दुःख-से अनुविद्ध नहीं है, तो फिर कैसा है? प्रसन्न, शिव, अतुल, अनायास नित्यतृप्त और एकरस है — ऐसा इसका तात्पर्य है । जो [ विज्ञान और आनन्द इन ] दोनों विशेषणों-से युक्त है वह ब्रह्म क्या है? रातिः-रातेः ( रातिका ) अर्थात् धनका इस प्रकार ' रातिः ' शब्दमें षष्ठीके अर्थं-में प्रथमा विभक्ति है, तात्पर्य यह क़ि धन देनेवाले अर्थात् कर्म करने-वाले यजमानका परायण - परा गति अर्थात् कर्मफल प्रदान करने-वाला है । इसी प्रकार जो एषणाओंसे अलग होकर उस ब्रह्म-में ही परिनिष्ठित है, कर्मकर्ता नहीं है, और उस ब्रह्मको जानता है, इसलिये तद्वित् ( ब्रह्मविद् ) है, उस ब्रह्मनिष्ठ और तद्विद्यानी ब्रह्म-देत्ताका भी परायण है ।

पृष्ठ 844

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८३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ अत्रेदं विचार्यते -आनन्द-ब्रह्मानन्दस्य वेद्य- शब्दो लोके सुख- / त्वाबेद्यत्वं मी - चाची प्रसिद्धः; अत्र मांस्यते च ब्रह्मणो विशेषण-त्वेन श्रानन्दशब्दः श्रूयते - । श्रानन्दं ब्रह्मेति । श्रुत्यन्तरे च " श्रानन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् " ( तै ० उ ०३ । ६ । १ ) “ आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् " ( तै ० उ ०२४ । १ ) " यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् " ( तै ० उ ० रा ८ | १ | ) “ यो वै भूमा तत् सुखम् " ( छा ० उ ० ७ | २३ | १ ) इति च; " एष परम आनन्द: " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ३३ ) इत्येवमाद्याः । संवेद्ये च सुखे आनन्दशब्दः प्रसिद्धः; ब्रह्मानन्दश्च यदि संवेद्य: स्याद् युक्ता एते ब्रह्मण्या-नन्दशब्दाः । ननु च श्रुतिप्रामाण्यात् संवेद्यानन्दस्वरूपमेव ब्रह्म, किं तत्र विचार्यम्? इति न, विरुद्धश्रुतिवाक्य-दर्शनात् — सत्यम्, आनन्द-शब्दो ब्रह्मणि श्रूयते; यहाँ यह विचार किया जाता है— लोक में ' आनन्द ' शब्द सुख-वाची प्रसिद्ध है; और यहाँ ' आनन्दं ब्रह्म ' इस प्रकार ' आनन्द ' शब्द ब्रह्मके विशेषणरूपमें है श्रुतियोंमें भी यह ब्रह्मके विशेषण-रूपसे श्रुत हुआ है; जैसे- " आनन्दो ब्रह्म ेति व्यजानात् " " आनन्द ' ब्रह्मणो विद्वान् " " यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ” “ यो ' वे भूमा तत् सुखम् " इत्यादि तथा ऐसी ही " एष " परम आनन्दः " इत्यादि श्रुतियाँ हैं । किंतु ' आनन्द ' शब्द संवेद्य ( ज्ञेय ) सुखके अर्थमें ही प्रसिद्ध है; अतः यदि ब्रह्मानन्द भी संवेद्य ( ज्ञेय ) हो तभी ब्रह्ममें ये ' आनन्द ' शब्द सार्थक हो सकते हैं । पूर्व ० - किंतु श्रुतिके प्रमाणसे ब्रह्म संवेद्य आनन्दस्वरूप तो है ही, फिर इसमें विचार क्या करना है? सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं- यह तो ठीक है कि | ब्रह्ममें ' आनन्द ' शब्द श्रुत होता है; १. आनन्द ब्रह्म है - ऐसा ' जाना । २. ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला । ३. यदि यह आकाश मानन्द न होता । ४. जो भी भूमा है, वही सुख है । ५. यह परम आनन्द है ।

पृष्ठ 845

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[ श्रध्याय ३ विचार किया जाता ' आनन्द ' शब्द सुख-है; और यहाँ ' आनन्दं कार ' आनन्द ' शब्द णरूपमें श्रुत है; अन्य यह ब्रह्मके विशेषण-आ है; जैसे- " आनन्दो नजानात् " " आनन्द ' न् ” “ यदेष आकाश स्यात् ” “ यो वै भूमा इत्यादि तथा ऐसी ही आनन्दः " इत्यादि किंतु ' आनन्द ' शब्द 1 ) सुखके अर्थमें ही यदि ब्रह्मानन्द भी ) हो तभी ब्रह्ममें ये शब्द सार्थक हो किंतु श्रुतिके प्रमाणसे आनन्दस्वरूप तो है ही, विचार क्या करना है? सी - ऐसी बात नहीं है, विषयमें विरुद्ध श्रुतिवाक्य हैं - यह तो ठीक है कि नन्द ' शब्द श्रुत होता है; आनन्दको जाननेवाला । भूमा है, वही सुख है । ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३ विज्ञानप्रतिषेधश्चैकत्वे— " यत्र । त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं विजानीयात् " ( बृ ० उ ० ४।५ । १५ ) " यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा ' ( छा ० उ ० ७ । २४ । १ ) " प्राज्ञे -नात्मना सम्परिष्वक्ता न बाह्यं किश्चन वेद " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । २१ ) इत्यादिः विरुद्ध-श्रुतिवाक्यदर्शनात् तेन कर्तव्यो विचारः; तस्माद् युक्तं वेदवा -क्यार्थनिर्णयाय विचारयितुम् । मोक्षवादिविप्रतिपत्ते – सां-ख्या वैशेषिकाच मोक्षवादिनो नास्ति मोक्षे सुखं संवेद्यमित्येवं विप्रतिपन्नाः अन्ये निरतिशयं सुखं स्वसंवेद्यमिति किं तावद् युक्तम्? 2 किंतु साथ ही एक होनेके कारण उसके विज्ञानका प्रतिषेव भी श्रुत होता है । जैसे- " जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, उस अवस्था में किसके द्वारा किसको देखे और किसके द्वारा किसको जाने? " " जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता और अन्य कुछ नहीं जाता ह है " " प्रज्ञानात्मासे आलिङ्गित ( अभिन्न ) होकर यह बाह्य कुछ भी नहीं जानता " इत्यादि । इस प्रकार उससे विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं, इसलिये विचार करना आवश्यक है; अतः वेदके वचनोंका तात्पर्य निर्णय करनेके लिये विचार करना उचित ही है । इसके सिवा मोक्षवादियों में मतभेद होने के कारण भी विचार करना आवश्यक है - सांख्य और वैशेषिक मोक्षवादियोंका ऐसा विप-रीत विचार है कि मोक्षमें संवेद्य सुख है ही नहीं, किंतु दूसरे मोक्ष-| वादियोंका मत है कि मोक्षमें निर-तिशय स्वसंवेद्य सुख है; सो इनमें कौन - सी बात ठीक है? आनन्दादिश्रवणात् " जचत् पूर्व ० - आनन्दादिका श्रवण होने-क्रीडन् रममाणः ” ( छा ० उ ०८ । से तथा " भक्षण करता हुआ, क्रीडा १२ । ३ ) “ स यदि पितृलोककामो करता हुआ, रमण करता हुआ ” भवति " ( छा ० उ ० ८ । २ । १ ) " वह यदि पितृलोककी इच्छावाला ० उ ० ५३–

पृष्ठ 846

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८३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय३ " यः सर्वज्ञः सर्वचित् ” ( मुण्डक ० | होता है " " जो सवंश और सर्ववेत्ता १ । १ । ६ ) " सर्वान् कामान् है " " समस्त कामोंको प्राप्त करता समश्नुते " ( तै ० उ ० २ । ५ । १ ) इत्यादिश्रुतिभ्यो मोक्षे सुखं संवेद्यमिति । नन्वेकत्वे कारकविभागाभा-वाद् विज्ञानानुपपत्तिः, क्रियाया-श्वाने ककारकसाध्यत्वाद् विज्ञान स्य च क्रियात्वात् । नैष दोषः; शब्दप्रामाण्याद् भवेद् विज्ञानमानन्दविषये; " बिज्ञानमानन्दम् " इत्यादीनि आनन्दस्वरूपस्यासंवेद्यत्वेऽनुप-पन्नानि वचनानीत्यवोचाम । ननु वचनेनाप्यग्नेः शैत्यमुद-कस्य चौष्ण्यं न क्रियते एव, ज्ञापकत्वाद् वचनानाम् । न च देशान्तरेऽग्निः शीत इति शक्य-ते ज्ञापयितुम्; अगम्ये वा देशा-न्तरे उष्णमुदकमिति । न, प्रत्यगात्मन्यानन्दविज्ञान-दर्शनात्; न ‘ विज्ञानमानन्दम् ' इत्येवमादीनां वचनानां शीतो- । है " इत्यादि श्रुतियोंसे तो मोक्षमें संवेद्य सुख जान पड़ता है । सिद्धान्ती -- किंतु उस समय एकत्व होनेके कारण कारकविभाग-का अभाव होनेसे विज्ञान होना | सम्भव नहीं है, क्योंकि क्रिया अनेक कारकद्वारा साध्य होती है और विज्ञान भी एक क्रिया ही है । पूर्वं ० - यह दोष नहीं हो सकता; शब्दप्रामाण्य होनेके कारण उस समय आनन्दविषयक विज्ञान रहना ही चाहिये; यदि आनन्द-स्वरूप असंवेद्य होगा तो " विज्ञान-मानन्दं ब्रह्म " इत्यादि वाक्य अनुप-पन्न हो जायँगे - ऐसा हम पहले कह चुके हैं । सिद्धा सिद्धान्ती - किंतु वचनके द्वारा भी अग्निकी शीतलता और जलकी उष्णता नहीं की जा सकती, क्योंकि वचन तो ज्ञापक ही हैं और यह बात बतलायी नहीं जा सकती कि किसी देशान्तरमें अग्नि शोतल है और किसी अगम्य गम्य देशान्तरमें जल उष्ण है । पूर्व०- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मामें तो आनन्दका विज्ञान देखा जाता है । ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्य ' अग्नि शीत है’-

पृष्ठ 847

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[ श्रध्याय३ नो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता कामोंको प्राप्त करता श्रुतियोंसे तो मोक्षमें पड़ता है । — किंतु उस समय कारण कारकविभाग-होनेसे विज्ञान होना , क्योंकि क्रिया अनेक साध्य होती है और क क्रिया ही है । दोष नहीं हो सकता; होनेके कारण उस दविषयक विज्ञान हिये; यदि आनन्द-होगा तो " विज्ञान-इत्यादि वाक्य अनुप-- ऐसा हम पहले कह किंतु वचनके द्वारा तलता और जलकी की जा सकती, ज्ञापक ही हैं और यी नहीं जा सकती न्तरमें अग्नि शोतल अगम्य देशान्तरमें त नहीं है, क्योंकि आनन्दका विज्ञान । ' विज्ञानमानन्दं क्य ' अग्नि शीत है ' -ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३५ ऽग्निरित्यादिवाक्यवत् प्रत्य- । चादिविरुद्धार्थ प्रतिपादकत्वम् । अनुभूयते स्व विरुद्धार्थता; सुख्य-हमिति सुखात्मकमात्मानं स्वय-मेव वेदयते; तस्मात् सुतरां प्रत्य-क्षाविरुद्धार्थता; तस्मादानन्दं ब्रह्म विज्ञानात्मकं सत् स्वयमेव वेद-यते । तथा आनन्दप्रतिपादिकाः श्रुतयः समञ्जसाः स्युः ' जक्षत् क्रीडन् रममाणः ' इत्येवमाद्याः पूर्वोक्ताः । न कार्यकरणाभावेऽनुपपते-विज्ञानस्य – शरीरवियोगो हि मोक्ष प्रात्यन्तिकः; शरीराभावे च करणानुपपत्तिः, आश्रयामा चात्; ततश्च विज्ञानानुपपत्तिः, अकार्यकरणत्वात्; देहाद्यभावे च विज्ञानोत्पत्तौ सर्वेषां कार्यकर-गोपादानानर्थक्यप्रसङ्गः । इत्यादि वाक्योंके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं । इनकी अविरु-द्धार्थताका तो अनुभव होता है । ' मैं सुखी हूँ ' इस प्रकार सुखस्व-रूप आत्माको पुरुष स्वयं ही जानता है, इसलिये इनको अविरुद्धता तो अत्यन्त प्रत्यक्ष ही है । अत: आनन्द ब्रह्म विज्ञानात्मक होते हुए स्वयं ही जानता है । इसी प्रकार पहले कही हुई ' जक्षत् क्रीडन् रममाणः ' इत्यादि आनन्दका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियां सुसंगत हो सकती हैं । सिद्धान्ती — नहीं, क्योंकि देह और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर विज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती-शरीरका वियोग हो जाना ही आत्यन्तिक मोक्ष है और शरीर न रहनेपर आश्रयका अभाव हो जाने-के कारण इन्द्रियोंका रहना भी असम्भव है; अत: देह और इन्द्रियों-का अभाव हो जानेसे उस समय विज्ञान नहीं हो सकता; यदि देहादिके अभाव में भी विज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय तो समस्त जीवोंके देह और इन्द्रियोंको ग्रहण करनेकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा ।

पृष्ठ 848

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८३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय एकत्वविरोधाच्चपरं चेद् ब्रह्म आनन्दात्मकमात्मानं नित्य विज्ञानत्वान्नित्यमेव विजानीयात्, तन्न, संसार्यपि संसारविनिर्मुक्तः स्वाभाव्यं प्रति-पद्येत; जलाशय इवोदकाञ्जलिः क्षिप्तो न पृथक्त्वेन व्यवतिष्ठते श्रानन्दात्मकब्रह्म विज्ञानाय, तदा मुक्त आनन्दात्मकमात्मानं वेद-यते इत्येतदनर्थकं वाक्यम् । अथ ब्रह्मानन्दमन्यःसन् मुक्तो वेदयते, प्रत्यगात्मानं च, अहम-स्म्यानन्दस्वरूप इति, तदैकत्व-विरोधः, तथा च सति सर्वश्रुति-विरोधः, तृतीया च कल्पना नोपपद्यते । किश्वान्यत्, ब्रह्मणश्च निरन्त रात्मानन्दविज्ञाने विज्ञानाविज्ञान -१. मुक्त पुरुषको ब्रह्मसे अभिन्न या ३ इसके सिवा एकत्वसे विरोध होनेके कारण भी विज्ञान होना अनुपपन्न है - यदि ऐसा मानो कि नित्यविज्ञानानन्दस्वरूप होने के कारण परब्रह्म अपने आनन्दमय स्वरूपको नित्य ही जानता रहता है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि संसारी जीव भी संसारसे मुक्त होनेपर ब्रह्मस्वरूपता-को प्राप्त हो जाता है, जलाशय में डाली हुई जलको अञ्जलिके समान वह भी आनन्दस्वरूप ब्रह्मके विज्ञानके लिये पृथक् होकर स्थित नहीं हो सकता; ऐसी स्थिति में यह कहना कि मुक्त पुरुष आनन्दस्वरूप आत्माको जानता है, निरर्थक है । और यदि ऐसा कहो कि मुक्त पुरुष ब्रह्मसे अलग रहकर ब्रह्मा-नन्दको और ' मैं आनन्दस्वरूप हूँ ' इस प्रकार प्रत्यगात्माको जानता है तो ऐसी स्थिति में एकत्वसे विरोध आता है; और ऐसा होनेपर सभी श्रुतियोंसे विरोध होता है । इन दो पक्षोंके सिवा कोई तीसरी कल्पना होनी सम्भव नहीं है । एक बात और भी है, ब्रह्मको आत्मानन्दका निरन्तर विज्ञान मानने-पर उसके विज्ञान और अविज्ञान की भिन्न माननेके सिवा ।

पृष्ठ 849

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[ अध्याय३ सिवा एकत्वसे विरोध रण भी विज्ञान होना -यदि ऐसा मानो कि नन्दस्वरूप होने के कारण आनन्दमय स्वरूपको नता रहता है, तो यह क्योंकि संसारी जीव भी होनेपर ब्रह्मस्वरूपता-जाता है, जलाशय में लकी अञ्जलिके समान -आनन्दस्वरूप ब्रह्मके पृथक् होकर स्थित ता; ऐसी स्थिति में यह क्त पुरुष आनन्दस्वरूप जानता है, निरर्थक द ऐसा कहो कि मुक्त अलग रहकर ब्रह्मा-' मैं आनन्दस्वरूप हूँ ' त्यगात्माको जानता व्यतिमें एकत्वसे विरोध ऐसा होनेपर सभी रोध होता है । इन दो कोई तीसरी कल्पना नहीं है । - और भी है, ब्रह्मको निरन्तर विज्ञान मानने-ज्ञान और अविज्ञानकी नवा । ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८३७ कल्पनानर्थक्यम्; निरन्तरं चेदा-त्मानन्दविषयं ब्रह्मणो विज्ञा-नम्, तदेव तस्य स्वभाव इत्या- | त्मानन्दं विजानातीति कल्पना-नुपपन्नाः तद्विज्ञानप्रसङ्गे हि कल्पनाया अर्थवश्वम्, यथा श्रात्मानं परं च वेत्तीति, न हृष्वाद्यासक्तमनसो नैरन्तर्येणेषु-ज्ञानाज्ञान कल्पनाया अर्थ-चत्रम् । अथ विच्छिन्नमात्मानन्दं वि-जानाति - विज्ञानस्य आत्मविज्ञा-नच्छिद्रे अन्यविषयत्वप्रसङ्गः आत्मनश्च विक्रियावत्वं ततश्चा -नित्यत्वप्रसङ्गः; तस्माद् विज्ञान-मानन्दमिति स्वरूपान्चाख्यान -परैव श्रुतिः, नात्मानन्दसंवेद्य-स्वार्था । ' जक्षत् क्रीडन् ' इत्यादिश्रुति-| कल्पना भी व्यर्थं हो जाती है; यदि ब्रह्मको आत्मानन्दविषयक विज्ञान निरन्तर रहता है, तो वही उसका स्वभाव समझना चाहिये; अत: वह आत्मानन्दको जानता है — यह कल्पना नहीं बन सकती । इस । कल्पनाकी सार्थकता तो उसका विज्ञान न होनेका प्रसङ्ग होनेपर ही हो सकती है; जैसे - वह अपने-को और दूसरेको जानता है; जिसका चित्त निरन्तर बाणमें लगा हुआ है, उसके विषय में बाणके ज्ञान और अज्ञानकी कल्पना सार्थक नहीं हो सकती । और यदि वह विच्छिन्न रूपसे ही आत्मानन्दको जानता है तो आत्मविज्ञानके छिद्रमें अर्थात् जिस समय आत्मानन्दका ज्ञान नहीं रहता, उस क्षण में किसी अन्य विषयके विज्ञानके रहनेका प्रसङ्ग होगा; इससे आत्मा विकारी सिद्ध होगा और ऐसा होनेसे उसके अनित्य होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; अतः ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' यह श्रुति ब्रह्मके स्वरूपका निर्देश करनेवाली ही है, आत्मानन्दका संवेद्यत्व बत-लानेवाली नहीं है । पूर्व ० - किंतु आत्मानन्दका

पृष्ठ 850

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८३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय विरोधोऽसंवेद्यत्व इति चेत! न; यथाप्राप्तानु-वादित्वात् - मुक्तस्य सर्वात्म-भावे सति यत्र क्वचिद् योगिषु देवेषु वा जक्षणादि प्राप्तम्, तद् यथाप्राप्तमेवानुद्यते - तत्तस्यैव सर्वात्मभावादिति सर्वात्मभाव-मोक्षस्तुतये । यथाप्राप्तानुवादित्वे दुःखित्व-मपीति चेत् — योग्यादिषु यथा-प्राप्तजक्षणादिवत् स्थावरादिषु यथाप्राप्तदुःखित्वमपीति चेत्! न नामरूपकृत कार्यकरणोपा-धिसम्पर्कजनित भ्रान्त्यध्यारोपित-त्वात् सुखित्वदुःखित्वादिविशेष-३ असंवेद्यत्व माननेपर ‘ जक्षत् क्रीडन् ' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा । सिद्धान्ती – नहीं; क्योंकि यह सर्वात्मैकत्वको अनुभूति होनेपर यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली है । मुक्त पुरुषको सर्वा त्मैकत्वकी प्राप्ति हो जानेपर जहाँ-कहीं योगियों अथवा देवताओं में भक्षणादिकी प्राप्ति होती है, उस यथाप्राप्त भक्षणादिका ही इसके द्वारा अनुवाद किया गया है । अर्थात् सर्वात्मभाव होनेके कारण वह भक्षणादि उस मुक्त पुरुषका ही है - इस प्रकार यह कथन मोक्षकी स्तुति के लिये है । पूर्व ० - यदि यह श्रुति यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली है तब तो उसका दुःखी होना भी प्राप्त होगा - योगी आदिकों में यथाप्राप्त भक्षणादिकी प्राप्तिके समान उसे स्थावरादिमें यथाप्राप्त दुःखित्वकी भी प्राप्ति होगी- ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुखित्व और दुःखित्व आदि विशेष धर्मं नाम - रूपजनित देह और इन्द्रियरूप उपाधिके सम्पर्कसे होने-वाली भ्रान्तिसे आरोपित हैं- इस प्रकार इन सब शङ्काओंका पहले ही