बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 851–860

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 851 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ श्रध्याय३ माननेपर ' जक्षत् क्रीडन् ' तिसे विरोध होगा । ती - नहीं; क्योंकि यह की अनुभूति होनेपर भक्षणादिका अनुवाद है । मुक्त पुरुषको सर्वा-प्राप्ति हो जानेपर जहाँ-यों अथवा देवताओं में प्राप्ति होती है, उस भक्षणादिका ही इसके किया गया है । अर्थात् च होनेके कारण वह उस मुक्त पुरुषका ही कार यह कथन मोक्षकी है । यदि यह श्रुति यथाप्राप्त अनुवाद करनेवाली है का दुःखी होना भी प्राप्त गी आदिकों में यथाप्राप्त प्राप्तिके समान उसे में यथाप्राप्त दुःखित्वकी होगी- ऐसा कहें तो? ती - ऐसी बात नहीं है, स्वत्व और दु: खित्व आदि नाम - रूपजनित देह और उपाधिके सम्पर्कसे होने-न्तिसे आरोपित हैं- इस सब शङ्काओंका पहले ही ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३ ९ - स्येति परिहृतमेतत् सर्वम् ॥ विरुद्धश्रुतीनां च विषयमत्रो - । चामं । तस्मात् " एषोऽस्य परम आनन्दः ” ( बृ ० उ ० ४ | ३ | ३२ ) इतिवत् सर्वाण्यानन्दवा-क्यानि द्रष्टव्यानि ॥ ७ ॥

॥ २८ ॥

परिहार किया जा चुका है । विरुद्ध-श्रुतियोंका विषय भी हम पहले क्रह चुके हैं । ' अतः आनन्दप्रतिपादक समस्त वाक्योंकों " एषोऽस्य परम आनन्दः " इस वाक्यके समान ही समझना चाहिये ॥ ७ ॥। २८ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये नवमं शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ६ ॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंस परिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

१. मधुकाण्डमें जो ब्रह्मका वेद्यत्व है, वह सोपाविक होने के कारण है । निरुपाधिक ब्रह्म तो अवेद्य हो है ।

पृष्ठ 852

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 852 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थ अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनक याज्ञवल्क्य - - संवाद जनको ह वैदेह श्रासाञ्चक्रे । अस्य सम्बन्धः- -उपोद्घातः शारीराद्यानष्टौ पुरु-पान्निरुह्य, प्रत्युद्य पुनर्हृदये, दिग्मेदेन च पुनः पञ्चधा व्यूझ, हृदये प्रत्यु, हृदयं शरीरं च पुनरन्योन्यप्रतिष्ठं प्राणादिपञ्च-वृत्त्यात्मके समानाख्ये जग -दात्मनि सूत्र उपसंहृत्य, जग-दात्मानं शरीर हृदय सूत्रावस्थमति-क्रान्तवान् य औपनिषदः पुरुषो नेति नेतीति व्यपदिष्टः, स साक्षाञ्चोपादानकारणस्वरूपेण च निर्दिष्टः ' विज्ञानमानन्दम् ' इति । तस्यैव वागादिदेवताद्वा-रेण पुनरधिगमः कर्तव्य इत्यधि-' जनको ह वैदेह आसाञ्चके ' इसका पहले अध्यायसे इस प्रकार सम्बन्ध है - शारीरादि आठ पुरुषों-का निरूपण करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा फिर दिशाओंके भेदसे उन्हें पाँच भार्गोर्षि विभक्त करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा एक दूसरे में प्रतिष्ठित हृदय और शरीरका प्राणादि पाँच वृत्तियोंवाले समान-संज्ञक जगदात्मा सूत्रमें उपसंहार कर जो ' मेति नेति ' इस प्रकार बत-लाया हुआ औपनिषद पुरुष शरीर, हृदय और सत्र में स्थित जगदात्माको अतिक्रमण किये हुए है, उसीका ' ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है ' इस प्रकार साक्षात् और उपादान कारणरूपसे निर्देश किया गया है । उसीका वागादि देवतारूप द्वार | पुनः बोध कराना है, इसीलिये इन

पृष्ठ 853

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 853 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

य द को ह वैदेह आसाञ्चक ' इले अध्यायसे इस प्रकार - शारीरादि आठ पुरुषों-पण करके पुनः उनका उपसंहार कर तथा फिर के भेदसे उन्हें पाँच भागों में करके पुनः उनका हृदयमें - कर तथा एक दूसरेमें हृदय और शरीरका पाँच वृत्तियोंवाले समान-गदात्मा सूत्रमें उपसंहार नेति नेति ' इस प्रकार बत-आ औपनिषद पुरुष शरीर, र सत्र में स्थित जगदात्माको किये हुए है, उसीका ज्ञान और आनन्दरूप है ' र साक्षात् और उपादान नसे निर्देश किया गया है । वागादि देवतारूप द्वारसे चकराना है, इसीलिये इन

पृष्ठ 854

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 854 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 855

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 855 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वाह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१ गमनोपायान्तरार्थोऽयमारम्भो दो ब्राह्मणोंका आरम्भ किया गया ब्राह्मणद्वयस्य । आख्यायिका है । [ यहाँ ] आख्यायिका तो स्वाचारप्रदर्शनार्था — आचार प्रदर्शित करने के लिये है । जनककी सभामें याज्ञवल्क्यका आगमन, जनकका प्रश्न ॐ जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रेऽथ ह याज्ञ-चल्क्य आवव्राज । त ँ होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थम-चारी: पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उभयमेव सम्राडिति होवाच ॥ १ ॥

विदेह जनक आसनपर स्थित था । तभी [ उसके पास ] याज्ञवल्क्यजी आये । उनसे [ जनकने ] कहा, ' याज्ञवल्क्यजी! कैसे आये? पशुओंकी इच्छासे, अथवा सूक्ष्मान्त [ प्रश्न श्रवण करने ] के लिये? ' ' राजन्! मैं दोनोंके लिये आया हूँ ' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] कहा ॥ १ ॥

जनको ह वैदेह श्रासाञ्चक्रे आसनं कृतवानास्थायिकां दत्तवानित्यर्थः, दर्शनकामेभ्यो राज्ञः । अथ ह तस्मिन्नवसरे याज्ञवल्क्यः भावव्राज -आगतवानात्मनो योगक्षेमार्थम्, राज्ञो वा विविदिषां दृष्ट्ानुग्रहा र्थम् । तमागतं याज्ञवल्क्यं यथावत् पूजां कृत्वोवाच होक्त-वाञ्जनक: - हे याज्ञवल्क्य कि-मर्थम् अचारी: – श्रागतोऽसि? किं पशू निच्छन् पुनरपि, आहो-स्विदण्वन्तान् सूक्ष्मान्तान् सूक्ष्म-वस्तुनिर्णयान्तान् प्रश्नान् मतः श्रोतुमिच्छन्निति ॥ विदेह देशका राजा जनक आसनपर स्थित था - आसन लगाये हुए था अर्थात् उसने राजाका दर्शन करनेकी इच्छावालोंके लिये अवसर दे रखा था । तब उस समय अपने-। योगक्षेमके अथवा राजाकी जिज्ञासा | देखकर उसपर कृपा करनेके लिये वहाँ याज्ञवल्क्यजी आये । उन | याज्ञवल्क्यजीको आये देख उनकी यथावत् पूजा कर राजा जनकने कहा, ' हे याज्ञवल्क्य! आप किस-लिये आये हैं? क्या पुन: पशुओंकी इच्छासे ही आये हैं, अथवा मुझसे सूक्ष्मान्त - सूक्ष्म वस्तुके निर्णयमें समाप्त होनेवाले प्रश्न सुननेकी इच्छासे? '

पृष्ठ 856

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 856 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय उभयमेत्र पशून् प्रश्नांश्च हे सम्राट् – सम्राडिति वाजपेय-याजिनो लिङ्गम्; यश्च श्राज्ञया राज्यं प्रशास्ति, स सम्राट् तस्या मन्त्रणं हे सम्राडिति; समस्तस्य चा भारतस्य वर्षस्य राजा ॥१ ॥

४ ' हे सम्राट्! पशु और प्रश्न. दोनोंहोके लिये [ आया हूँ ] । ' ' सम्राट् ' यह पद वाजपेय यज्ञ करनेवालेका सूचक है; जो भी अपनी आज्ञासे राज्यपर शासन करता है, वह सम्राट् ' होता है; ' हे सम्राट् ' यह उसीका सम्बोधन है; अथवा समस्त भारतवर्षका राजा । [ सम्राट् कहा गया है ] ॥ १ ॥

शैलिनिके बतलाये हुए वाक्- ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे जित्वा शैलिनिर्वाग् वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमाना-चार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्रवीद् वाग् वै ब्रह्मेत्य-वदतो हि कि स्वादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञे-त्येनदुपासीत । का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य । वागेव सम्राडिति होवाच । वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायते ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्या-नानि व्याख्यानानीष्ट ँ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञा-यन्ते वाग् वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग् जहाति सर्वा-ण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं

पृष्ठ 857

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 857 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय४ =! पशु और प्रश्न [ आया हूँ ] । ' पद वाजपेय यज्ञ सूचक है; जो भो राज्यपर शासन सम्राट् ' होता है; ' हे सीका सम्बोधन है; भारतवर्षका राजा गया है ] ॥ १ ॥

- फलसहित वर्णन वीन्मे जित्वा न् पितृमाना-वै ब्रह्मेत्य-वायतनं प्रतिष्ठां डिति स वै नो : प्रतिष्ठा प्रज्ञे-क्य । वागेव बन्धुः प्रज्ञायते ल इतिहासः यनुव्याख्या-तमयं च लोकः सम्राट् प्रज्ञा-जहाति सर्वा नप्येति य एवं ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४३ विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २ ॥

[ याज्ञवल्क्य - ] ' तुझसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें । ' [ जनक - ] ' मुझसे शिलिन के पुत्र जित्वाने कहा है कि वाक् हो ब्रह्म है । " [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने ' वाक् ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है? किंतु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं? ' [ जनक- ] ' मुझे नहीं बतलाये । ' [ याज्ञ-वल्क्य - ] ' राजन्! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है । ' [ जनक - ] ' याज्ञ-वल्क्य! वह हमें आप बतलाइये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसको ' प्रज्ञा ' इस प्रकार उपासना करे । ' [ जनक - ] ' याज्ञवल्क्यजी! प्रज्ञता क्या हे? ' राजन्! वाक् ही प्रज्ञता है ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे सम्राट्! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता हे और राजन्! ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्वाङ्गिरसवेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित ( भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म ), पायित ( प्यासे को पानी पिलाने से होनेवाले धर्मं ), यह लोक,, परलोक और समस्त भूत वाक्से ही जाने जाते हैं 1 । हे सम्राट्! वाक् ही परब्रह्म है । इस प्रकार उपासना करने-वालेको वाक् नहीं त्यागता, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं । जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है । ' विदेहराज जनकने कहा, ' मैं आपको - जिनसे हाथी के समान बैल उत्पन्न हों ऐसी - सहस्र गौएँ देता हूँ । ' उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये ' ॥ २ ॥

किंतु यत्ते तुभ्यं कश्चिदत्रवी- किंतु तुमसे जो कुछ किसी आचार्यंने कहा है, वह हम सुनें, दाचार्य:, अनेकाचार्यसेवी हि क्योंकि तुम बहुत - से आचार्योंकी सेवा

पृष्ठ 858

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 858 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय भवान्; तच्छृणवामेति । इतर श्रह - श्रब्रवीदुक्तवान् मे ममा-चार्य:, जित्वा नामतः, शिलिन-स्थापत्य शैलिनिः- वाग्वै ब्रह्मेति वाग्देवता ब्रह्मेति । आहेतरः- यथा मातृमान् माता यस्य विद्यते पुत्रस्य सम्यगनु-शास्त्री अनुशासनकर्त्रीस मातृमान्; श्रत ऊर्ध्वं पिता यस्यानुशास्ता स पितृमान् उपनयनादूर्ध्वमा समावर्तनादाचार्यो यस्यानु-शास्ता स आचार्यवान्; एवं शुद्धित्रय हेतु संयुक्तः स साक्षादा-चार्यः स्वयं न कदाचिदपि प्रामाण्याद् व्यभिचरति स यथा ब्रूयाच्छिष्याय तथासौ जित्वा शैलि निरुक्तवान् बाग वै ब्रह्मेति; अवदतो हि किं स्यादिति - न हि कस्येहार्थममुत्रार्थं वा किश्चन स्यात् । किंतु, अत्रवीदुक्त-चांस्ते तुभ्यं तस्य ब्रह्मण आयतनं प्रतिष्ठां च - आयतनं ४ करनेवाले हो; इतर ( जनक ) ने | कहा, मुझसे जित्वा | शिलिनके पुत्र शैलिनिने क कहा था कि ' वाक् ही ब्रह्म है ' अर्थात् ' वाग्देवता ब्रह्म है । ' इतर ( याज्ञवल्क्य जी ) बोले, ' जिस प्रकार मातृमान् - जिस पुत्र-का सम्यक् प्रकारसे अनुशासन करनेवाली माता विद्यमान है, वह मातृमान्, इसके पश्चात् जिसका अनुशासन करनेवाला पिता है, वह पितृमान् तथा उपनयनके पश्चात् समावर्तन संस्कारतक आचार्य जिसका अनुशासन करनेवाला है, S वह आचार्यवान् है; इस प्रकार जो तीन प्रकारकी शुद्धिके हेतुओंसे संयुक्त है, वह साक्षात् आचार्य कभी भी प्रमाणसे व्यभिचरित नहीं हो सकता, वह जिस प्रकार अपने प शिष्यको उपदेश करे, उसी प्रकार इस शिलिनके पुत्र जित्वाने तुम्हें S यह उपदेश किया है कि वाक् ही f ब्रह्म है; क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है? मूकको तो लौकिक या पारलौकिक कोई भी लाभ नहीं हो सकता; किंतु त्र क्या उसने तुम्हें उस ब्रह्मके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये

पृष्ठ 859

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 859 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय४ इतर ( जनक ) ने जित्वा नामवाले शैलिनिने कहा था ब्रह्म है ' अर्थात् झ है । ' नाज्ञवल्क्य जी ) बोले, मातृमान्- जिस पुत्र-प्रकारसे अनुशासन विद्यमान है, वह के पश्चात् जिसका नेवाला पिता है, वह उपनयनके पश्चात् स्कार तक आचार्य सन करनेवाला है, न है; इस प्रकार जो शुद्धिके हेतुओंसे ह साक्षात् आचार्य से व्यभिचरित नहीं - जिस प्रकार अपने करे, उसी प्रकार पुत्र जिवाने तुम्हें = या है कि वाक् ही न बोलनेवालेको सकता है? मूकको T पारलौकिक कोई हो सकता; किंतु तुम्हें उस ब्रह्म प्रतिष्ठा भी बतलाये ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ नाम शरीरम्; प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेषु य श्राश्रयः । आहेतरः न मेऽब्रवीदिति । इतर आह— - यद्येवमेकपाद् वै एतत् एकः पादो यस्य ब्रह्मणस्तदिदं एकपाद् ब्रह्म त्रिभिः पादैः शून्यमुपास्यमान-मपि न फलाय भवतीत्यर्थः । यद्येवम्, स त्वं विद्वान् सनो-ऽस्मभ्यं ब्रूहि हे याज्ञवल्क्येति । स चाह - वागेवायतनम्, वाग्देवस्य ब्रह्मणो वागेव कर-णमायतनं शरीरम्, आकाशो- । ऽव्याकृताख्यः प्रतिष्ठोत्पत्तिस्थि तिलयकालेषु । प्रज्ञेत्येनदुपा-सीत - प्रज्ञेतीयमुपनिषद् ब्रह्मण - । चतुर्थः पादः - प्रज्ञेति कृत्वैनद् ब्रह्मोपासीत । का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य १ किं ८४५ थे? आयतन शरीरको कहते हैं और जो तीनों कालोंमें आश्रय हो वह प्रतिष्ठा कहलाता है । दूसरे ( जनक ) ने कहा, ' मुझे. नहीं बतलाये । ' अन्य ( याज्ञवल्क्य ) बोला, ' यदि ऐसी बात है तो वह एकपाद ब्रह्म है, जिस ब्रह्मका एक पाद हो वह एकपाद ब्रह्म है, तात्पर्य यह है वह तीन पादोंसे शून्य ब्रह्म उपा-सना किये जानेपर भी फलप्रद नहीं होता । ' ( जनक - ) ' यदि ऐसी बात है तो हे याज्ञवल्क्यजी! आप उसके ज्ञाता हैं, इसलिये हमारे उसका वर्णन कीजिये । ' याज्ञवल्क्यने कहा — ' वाक् हो आयतन है - उस वाग्देवरूप ब्रह्मका वाक् ही करण - आयतन अर्थात् शरीर है तथा उसकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय अव्याकृत-संज्ञक आकाश उसकी प्रतिष्ठा है । उसकी ' प्रज्ञा ' इस रूपसे उपासना करे । ' प्रज्ञा ' यह उपनिषद् उस ब्रह्मका चतुर्थ पाद है । ' प्रज्ञा ' ऐसा मानकर उस ब्रह्मकी उपासना करे । ' [ जनक - ] ' याज्ञवल्क्यजी! प्रज्ञता

पृष्ठ 860

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 860 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ स्वयमेव प्रज्ञा, उत प्रज्ञानि । मित्ता — यथा आयतनप्रतिष्ठे । ब्रह्मणो व्यतिरिक्त, तद्वत् किम्? । न; कथं तर्हि? वागेव सम्राडिति होवाच; वागेव प्रज्ञेति होवाचोक्तवान्, न व्यतिरिक्ता प्रज्ञेति । कथं पुनर्वागेव प्रज्ञा १ इत्युच्यते-चाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायते - अस्माकं बन्धुरित्युक्ते प्रज्ञा-यते बन्धुः; तथर्वेदादि, इष्टं यागनिमित्तं धर्मजातम्, हुतं-होमनिमित्तं च, आशितमन्न दाननिमित्तम्, पायितं पान-दाननिमित्तम्, अयं च लोकः, इदं च जन्म, परश्व लोकः, प्रतिपत्तव्यं च जन्म, सर्वाणि च भूतानि - वाचैव सम्राट प्रज्ञायन्ते क्या है? क्या स्वयं प्रज्ञा ज्ञ है अथवा जिसका प्रज्ञा निमित्त है, [ वह बाक् ] प्रज्ञता है? जिस प्रकार आयतन और प्रतिष्ठा [ वाक्रूप ] ब्रह्मसे भिन्न हैं, उसी ए प्रकार प्रज्ञता भी है क्या? नहीं, तो फिर किस प्रकार है? ' हे सम्राट्! वह वाक् ही है ' ह ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] उत्तर दिया, म ' वाक् ही प्रज्ञा है, प्रज्ञा उससे भिन्न नहीं है - इस प्रकार याज्ञवल्क्यने कहा । ' किंतु वाक् हो प्रज्ञा किस न प्रकार है? सो बतलाया जाता है, ' है सम्राट्! वाक्से ही बन्धुका पि ज्ञान होता है । ' यह हमारा बन्धु चा ' है ' ऐसा कहने पर ही बन्धुका ज्ञान होता है ॥ इसी प्रकार ऋग्वेदादि, इष्ट-- यागसे होनेवाले धर्म, हुत-होमसे होनेवाले धर्म ', I आशित-अन्नदानजनित धर्मं, पायित - जल- उ दानजनित धर्म, यह लोक, यह पि जन्म, परलोक, आगे प्राप्त होने- प्रा वाला जन्म और सम्पूर्णं भूत - हे ते सम्राट्! इन सबका वाक्से ही । अतो वाग् वै सम्राट ५ ज्ञान होता है, अतः हे सम्राट्! एत परमं ब्रह्म । नैनं यथोक्त- वाक् ही परम ब्रह्म है । इस उपर्युक्त प्रा ब्रह्मविदं वागू जहाति | ब्रह्मको जाननेवालेका वाक् त्याग सी सर्वाण्येनं भूतान्यभिचरन्ति नहीं करती । समस्त भूत उपहारादि- होव बलिदानादिभिः इह देवो के द्वारा इसका उपकार करते हैं ।