बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 861–870
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870
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[ अध्याय ४ स्वयं प्रज्ञा ही प्रज्ञता का प्रज्ञा निमित्त है, प्रज्ञता है? जिस न और प्रतिष्ठा ब्रह्मसे भिन्न हैं, उसी भी है क्या? नहीं, प्रकार है? ! वह वाक ही है ' [ क्यने ] उत्तर दिया, है, प्रज्ञा उससे भिन्न प्रकार याज्ञवल्क्यने वाक् ही प्रज्ञा किस बतलाया जाता है, वाकुसे ही बन्धुका । ' यह हमारा बन्धु पर ही बन्धुका ज्ञान नी प्रकार ऋग्वेदादि, होनेवाले धर्म, हुत-धर्म, आशित- 1 त धर्म, पायित - जल-धर्म, यह लोक, यह क, आगे प्राप्त होने-और सम्पूर्णं भूत - हे न सबका वाक्से ही है, अतः हे सम्राट्! ब्रह्म है । इस उपर्युक्त ननेवालेका वाक् त्याग समस्त भूत उपहारादि-का उपकार करते हैं । त्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ भूत्वा पुनः शरीरपातोत्तलतका देवानप्येति — अपि गच्छति, य एवं विद्वानेतदुपासते । विद्यानिष्क्रयार्थं हस्तितुल्य ऋषभो हस्त्यृषभो यस्मिन् गोस-हस्रे तद् हस्त्यूषमं सहस्रं ददा-मीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः - अन-नुशिष्य शिष्यं कृतार्थमकृत्वा शिष्याद् धनं न हरेतेति मे मम पिता - श्रमन्यत । ममाप्ययमे - । चाभिप्रायः || २ || ८४७ | जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें देव होकर फिर शरीरपातके अन-तर देवोंको प्राप्त होता है । ' तब वैदेह जनकने कहा, ' इस विद्या के बदले में में आपको जिन सहस्र गौओंसे हाथी के समान बैल होते हैं, ऐसे सहस्र हस्त्यूषभ देता हूँ । उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरे पिताका ऐसा विचार था कि शिष्यका अनुशासन किये बिना-उसे कृतार्थ किये बिना शिष्यके यहाँसे धन नहीं ले जाना चाहिये । और मेरा भी ऐसा ही अभिप्राय है ' ॥ २ ॥
उदङ्कोक्त प्राण - ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्म उदङ्कः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रयात्तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत् प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि कि स्यादित्यबूत्रीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽबूवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो बहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदुपा-सीत का प्रियता याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं याजयत्य-
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ प्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशङ्कं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट् कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभि क्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदु-पास्ते । हस्त्यृषभ ँ सहस्त्र ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नान-नुशिष्य हरेतेति ॥ ३ ॥
[ याज्ञवल्क्य- ] ' तुमसे किसी [ आचार्य ] ने जो भी कहा है, वह हम सुनें । ' [ जनक - ] ' मुझसे शुल्बके पुत्र उदङ्कने ' प्राण ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यंवान् कहे, उसी प्रकार उस शुल्बके पुत्रने ' प्राण ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है, क्योंकि प्राणक्रिया न करनेवालेको क्या लाभ हो सकता है? किंतु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं? ' [ जनक - ] ' मुझे नहीं बतलाये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' राजन्! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म हे । ' [ जनक- ] ' याज्ञवल्क्यजी! वह हमें आप बतलाइये । ' [ याज्ञवल्क्य- ] ६ ' प्राण ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, उसकी ' प्रिय ' इस रूपसे उपा-सना करे । ' [ जनक - ] ' याज्ञवल्क्य! प्रियता क्या है? " ' हे सम्राट्! प्राण ही प्रियता है ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' राजन्! प्राणके लिये ही ६ अयाज्यसे यजन कराते हैं, प्रतिग्रह न लेनेयोग्यसे प्रतिग्रह लेते हैं तथा जिस दिशा में जाते हैं, उसमें ही वधकी आशंका करते हैं । हे सम्राट्! यह सब प्राणके ही लिये होता है । हे राजन्? प्राण हो परम ब्रह्म है । जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे प्राण नहीं त्यागता, उसको सब भूत उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता हे । ' ' मैं आपको हाथीके समान हृष्ट - पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएं देता हूँ ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यते ।
कहा, ' मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थं किये ।
बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये ' ॥ ३ ॥
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[ अध्याय ४ शङ्कं भवति यां प्राणो वै सम्राट् येनं भूतान्यभि-एवं विद्वानेतदु-होवाच जनको मेऽमन्यत नान-जो भी कहा है, वह हम ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा पितृमान्, आचार्यवान् है ' ऐसा कहा है, क्योंकि ना है? किंतु क्या उसने [ जनक - ] ' मुझे नहीं एक ही पादवाला ब्रह्म तलाइये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' प्रिय ' इस रूपसे उपा-क्या है? ” “ हे सम्राट्! राजन्! प्राणके लिये ही से प्रतिग्रह लेते हैं तथा - करते हैं । हे सम्राट्! प्राण हो परम ब्रह्म है । , उसे प्राण नहीं त्यागता, कर देवोंको प्राप्त होता उत्पन्न करनेवाली एक कहा । उस याज्ञवल्क्यते पदेशके कृतार्थ किये । " द्वारा ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थं यदेव ते कश्चिदत्रवीत्, उदङ्को नामतः शुन्यस्यापत्यं शौन्वायनोऽब्रवीत्; प्राणो वै ब्रह्मेति, प्राणो वायुर्देवता - पूर्व वत् । प्राण एव श्रायतनमाकाशः प्रतिष्ठा; उपनिषत् — प्रिय-मित्येन दुपासीत । कथं पुनः प्रियत्वम्? प्राणस्य वै हे सम्राट् कामाय प्राणस्यार्था यायाज्यं जयति पतितादिक-मपि; प्रतिगृह्यस्याप्युग्रादेः प्रतिगृह्णात्यपि तत्र तस्यां दिशि । वधनिमित्तमाशङ्कम् - बधाशङ्के-त्यर्थः, यां दिशमेति तस्कराद्या-कीर्णां च तस्यां दिशि वधाशङ्का; तच्चतत् सर्व प्राणस्य प्रियत्वं भवति, प्राणस्यैव सम्राट् कामाय । तस्मात् प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म । नैनं प्राणो जहाति समानमन्यत् ॥ ३ ॥
८४ ९ ' यदेव ते कश्चिदब्रवीत् ' इत्यादि मुझसे उदङ्क नामवाले शौल्बायन– शुल्बके पुत्रने कहा है कि प्राण ही ब्रह्म है । पूर्वबत् ' प्राण ' वायुदेवता है । प्राण ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है । इसकी ' प्रिय ' इस रूपसे उपासना करे – यह उपनिषद् है । ' किंतु इसकी प्रियता किस प्रकार है? ' ' हे सम्राट् । प्राणकी ही कामनासे - प्राणके ही लिये अयाज्यले पतितादिकमे भी यजन कराते हैं और प्रतिग्रहके अयोग्य उग्र ( उद्दण्ड ) आदिसे भी प्रतिग्रह लेते हैं तथा चोर और लुटेरों आदि-से आक्रान्त जिस दिशामें जाते हैं, उस दिशा में वधके कारण होनेवाली आशङ्का रखते हैं; उस दिशा में वघ-की आशङ्का रहती है; यह सब प्राणकी प्रियता होनेपर ही होता है; हे सम्राट्! प्राणके हो लिये यह सव होता है । अतः हे राजन्! प्राण ही परम ब्रह्म है । [ जो ऐसी उपासना करता है ] उसे प्राण नहीं छोड़ता । ' शेष पूर्ववत् है ॥ ३ ॥
बर्कुके बताये हुए चक्षुब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बकुर्वाण-चक्षुवै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा वृ ० उ ० ५४-
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८५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तद् वाष्र्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि कि I स्या-दित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येक-पाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्रा-क्षमिति तत् सत्यं भवति चक्षुर्वे सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चतुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति । ४ । [ याज्ञवल्क्य - ] ' तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें । ' [ जनक- ] ' मुझसे वृष्णके पुत्र बकुंने कहा है कि चक्षु ही ब्रह्म है । ' [ याज्ञवल्क्य- ] ' जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान् आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वाने ष्ण ' चक्षु ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है; क्योंकि न देखनेवाले-को क्या लाभ हो सकता है? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं । ' [ जनक - ] ' मुझे नहीं बतलाये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे सम्राट्! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है । ' [ जनक- ] ' याज्ञवल्क्य-जी! वह हमें आप बतलाइये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी ' सत्य ' इस रूपसे उपासना करे । ' [ जनक- - ] हे ' याज्ञवल्क्य! सत्यता क्या है? ' ' हे राजन्! चक्षु ही सत्यता है ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे सम्राट्! चक्षुसे देखने-वालेसे ही ' क्या तूने देखा ' ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि ' मैंने देखा ' तो वह सत्य होता है । राजन्! चक्षु ही परम ब्रह्म है । जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और
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[ अध्याय४ हि कि स्या-मेऽब्रवीदित्येक-ब्रूहि याज्ञवल्क्य मित्येनदुपासीत बाडिति होवाच ति स आहाद्वा-बाट् परमं ब्रह्म अक्षरन्ति देवो हस्त्यृषभ हः स होवाच जय हरेतेति | ४ | 7 कहा है, वह हम क चक्षु ही ब्रह्म है । ' चार्थवान् कहे, उसी क्योंकि न देखनेवाले -उसके आयतन और ये । ' [ याज्ञवल्क्य ] जनक - ] ' याज्ञवल्क्य-] ' चक्षु ही आयतन से उपासना करे । ' ' हे राजन्! चक्षु ट्! चक्षुसे देखने-नाता है और वह है । राजन्! चक्षु उपासना करता है, पहार देते हैं और ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१ वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है । ' ' मैं आपको हाथी के समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका घन नहीं ले जाना चाहिये ' ॥ ४ ॥
यदेव ते कश्चिद् बर्कुरिति ना मतो वृष्णस्यापत्यं वार्ष्णः चक्षुर्वै ब्रह्मेति; आदित्यो देवता चक्षु-षि । उपनिषत् — सत्यम्; यस्मा-च्छ्रोत्रेण श्रुतमनृतमपि स्थात्, न तु चक्षुषा दृष्टम्; तस्माद् वै सम्राट् पश्यन्तमाहु: -- अद्राक्षी-स्त्वं हस्तिनमिति, स चेदद्राक्ष -मित्याह, तत् सत्यमेव भवति | यस्त्वन्यो ब्रूयात् — श्रहमश्रौष-मिति; तद् व्यभिचरति; यत्तु चक्षुषा दृष्टं तद्व्यभिचारित्वात् सत्यमेव भवति ॥ ४ ॥
! ' यदेव ते कश्चित् ' - वकु इस नामवाले बा - वृष्णके पुत्रने ' चक्षु ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है; चक्षुमें आदित्य देवता है । उसकी ' सत्य ' यह उपनिषद् है, क्योंकि कानसे सुना हुआ तो मिथ्या भी | हो सकता है, किंतु नेत्रसे देखा हुआ नहीं हो सकता; हे सम्राट्! इसीसे देखनेवालेसे कहते हैं ' तुमने हाथी देखा? " इसपर यदि वह कहे कि देखा है तो वह सत्य ही होता है । यदि कोई अन्य कहे कि मैंने सुना है तो उसमें तो अन्तर आ सकता है । किंतु जो नेत्रसे देखा हुआ होता है, उसमें अन्तर न आनेके कारण वह सत्य ही होता है ॥ ४ ॥
गर्दभीविपीतके कहे हुए श्रोत्रब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभी-विपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृ-मानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद् भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां
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८५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय 8 न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति सवै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा-नन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपियां कांच दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्र श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यूषभः सहस्र ं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥
[ याज्ञवल्क्य - ] ' तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें । ' [ जनक - ] ' मुझसे भारद्वाजगोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीत ने कहा है कि श्रोत्र ही ब्रह्म है । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने ' श्रोत्र ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है; क्योंकि न सुननेवालेको क्या लाभ हो सकता है? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं? ' [ जनक ] ' मुझे नहीं बतलाये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे सम्राट्! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है । ' [ जनक - ] ' हे याज्ञवल्क्य! वह हमें आप बताइये । ' [ याज्ञवल्क्य - ) ' श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी ' अनन्त ' इस रूपसे उपासना करे । ' [ जनक - | ' हे याज्ञवल्क्य! अन-न्तता क्या है? ' ' हे सम्राट् । दिशाएँ ही अनन्तता है ' ऐसा याज्ञवल्क्य कहा, ' इसीसे हे सम्राट्! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त है ' और हे सम्राट् । दिशाएँ ही श्रोत्र हैं 1 । श्रोत्र ही परम ब्रह्म है । जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है । ' ' मैं आपको
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[ श्रध्याय ४ ब्राडिति स वै काशः प्रतिष्ठा-दिश एव पियां कांच नन्ता हि दिशो म्राट् परमं ब्रह्म भिक्षरन्ति देवो ते । हस्त्यृषभँ इः । स होवाच व्य हरेतेति ॥५ ॥
नी कहा है, वह हम विपीतने कहा है कि मातृमान्, पितृमान्, ही ब्रह्म है ' ऐसा सकता है? किंतु क्या लाये हैं? " [ जनक ] ! यह तो एक ही हमें आप बताइये । ' तिष्ठा है तथा इसकी ' हे याज्ञवल्क्य! अन-हैं ' ऐसा याज्ञवल्क्यने दशाको जाता है, वह है ' और हे सम्राट्! द्वान् इसकी इस प्रकार ता, सब भूत उसको ता है । ' ' मैं आपको ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३ हाथी के समान हृष्ट - पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थं किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये ' ॥ ५ ॥
' येदेव ते ' गर्दभीविपीत इति नामतः, भारद्वाजो गोत्रतः; श्रोत्रं चै ब्रह्मेति - श्रोत्रे दिग् देवता, अनन्त इत्येनदुपासीत; कानन्तता श्रोत्रस्प? दिश एव श्रोत्रस्या-नन्त्यं यस्मात्, तस्माद् वै सम्राट् प्राचीमुदीचीं वायां काञ्चिदपि दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छति कश्चिदपि श्रतोऽनन्ता हि दिशः; दिशो वै सम्राट् श्रोत्रम्; तस्माद्दिगानन्त्यमेव श्रोत्रस्यानन्त्यम् ॥ ५ ॥
' यदेव ते ' – गर्दभीविपीत ऐसे नामवाले गोत्रतः भारद्वाजने ‘ श्रोत्र । ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है । श्रोत्रमें दिग् देवता है, उसकी ‘ अनन्त ’ इस रूपसे उपासना करनी चाहिये । श्रोत्रकी अनन्तता क्या है? हे सम्राट्! चूँकि दिशाएँ ही श्रोत्रकी अनन्तता हैं, इसलिये पूर्व या उत्तर जिस किसी भी दिशाको जाय, कोई उसका अन्त नहीं पाता; इस-लिये दिशाएँ अनन्त हैं । हे सम्राट्! दिशाएँ ही श्रोत्र है; अत: दिशाओं-की अनन्तता ही श्रोत्रकी अनन्तता है ॥ ५ ॥
जाबालोक्त मनोब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे-सत्यकाम जाबालो मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्य वान् ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्या-यतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवा-यतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्द इत्येनदुपासीत कानन्दता
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८५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपासते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति । ६ । [ याज्ञवल्क्य - – ] ' तुमसे किसी आचार्यंने जो भी कहा है, वह हम सुनें । ' [ जनक— - ] ' मुझसे जबाला के पुत्र सत्यकामने कहा है कि मन हो ब्रह्म है । ' [ याज्ञवल्क्य - – ] ' जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालाके पुत्रने ' मन ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है; क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आय-तन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं? ' [ जनक - ] ' मुझे नहीं बतलाये । ' [ याज्ञं-वल्क्य - ] ' हे सम्राट्! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है । ' [ जनक - ] ' हे याज्ञवल्क्य! वह हमें आप बतलाइये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' मन ही आय- f तन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी ' आनन्द इस रूपसे उपासना करे । ' [ जनक- ] ' याज्ञवल्क्य! आनन्दता क्या है? ' ' हे सम्राट्! मन ही आनन्दता है ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे राजन्! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है, उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है! हे सम्राट्! मन ही परम ब्रह्म है । जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव f होकर देवोंको प्राप्त होता है । ' ' मैं आपको हाथी के समान हृष्ट - पुष्ट बेल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरे पिताका विचार था कि शिष्य को उपदेशके द्वारा कृतार्थं किये बिना उसका धन नहीं ले जाना स चाहिये ' ॥ ६ ॥
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[ श्रध्याय४ वाच मनसा वै ः पुत्रो जायते ब्रह्म नैनं मनो देवो भूत्वा । हस्त्यृषभ ँ हः स होवाच ष्य हरेतेति | ६ | कहा है, वह हम कहा है कि मन हो आचार्यवान् कहे. ऐसा कहा है; क्योंकि तुम्हें उसके आय-बतलाये । ' [ याज्ञं-हा है । ' [ जनक - ] - ] ' मन ही आय-नसे उपासना करे । ' सम्राट्! मन ही से ही स्त्रीकी इच्छा न्द है! हे सम्राट्! उपासना करता है, ते हैं तथा वह देव नमान हृष्ट - पुष्ट बैल विदेहराज जनकने र था कि शिष्य को ब नहीं ले जाना ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५५ सत्यकाम इति नामतो जवा-लाया अपत्यं जाबालः । चन्द्रमा मनसि देवता । आनन्द । इत्युपनिषत् | यस्मान्मन एवा-नन्दः, तस्मान्मनसा वै सम्राट स्त्रियमभिकामयमानोऽभिहार्यते प्रार्थयत इत्यर्थः । तस्माद् यां नियमभिकामयमानोऽभिहार्यते, तस्यां प्रतिरूपोऽनुरूपः पुत्रो जायते; स आनन्दहेतुः पुत्रः; स येन मनसा निर्वर्त्यते तन्मन श्रानन्दः ॥ ६ ॥
सत्यकाम ऐसे नामवाले । जावाल - जबालाके पुत्रने । मनमें चन्द्रमा देवता है । ' आनन्द ' यह उपनिषद् है । क्योंकि मन ही आनन्द है, इसलिये हे सम्राट्! मन-से स्त्रीकी इच्छा करते हुए उसका अभिहरण अर्थात् प्रार्थना करता है | अतः जिस स्त्रीकी कामना करते हुए प्रार्थना करता है, उसमें प्रति-रूप - अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह पुत्र आनन्दका हेतु है । जिस मनके द्वारा वह निष्पन्न होता है, वह मन आनन्द है ॥ ६ ॥
शाकल्योक्त हृदयब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणत्रामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छाकल्योऽब्रवीद्धृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवा-यतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतन हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनँ हृदयं जहाति
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८५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभ ँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ७ ॥
[ याज्ञवल्क्य- ] ' तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें । ' [ जनक- ] ' मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि हृदय ही ब्रह्म है । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने ' हृदय ही ब्रह्म है ' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं? ' [ जनक- ] ' मुझे नहीं बतलाये । ' [ याज्ञ-वल्क्य - । ' हे सम्राट्! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है । ' [ जनक - ] ' याज्ञ-वल्क्य! वह हमें आप बतलाइये । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी ' स्थिति ' इस रूपसे उपासना करे । ' [ जनक- ] ' याज्ञवल्क्य! स्थितता क्या है? ' ' हे सम्राट्! हृदय हो स्थितता है ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' राजन्! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदय में ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं । हे सम्राट्! हृदय ही परम ब्रह्म है । जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है । ' वैदेह जनक कहा, ' मैं आपको हाथीके समान हृष्ट - पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ । उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना धन नहीं ले जाना चाहिये ' ॥ ७ ॥
विदग्धः शाकन्यो हृदयं वै । विदग्ध शाकल्यने ' हृदय ही ब्रह्म ब्रह्मेति । हृदयं वै ' सम्राट् सर्वेषां है ' ऐसा कहा है । हे सम्राट्! हृदय भूतानाम् आयतनम् । नाम- । ही समस्त भतोंका आयतन है ।