बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 871–880

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880

पृष्ठ 871

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[ अध्याय ४ देवानप्येति लहस्रं ददामीति ज्ञवल्क्यः पिता G ॥ कहा है वह हम सुनें । ' हृदय ही ब्रह्म है । ' चार्यवान् पुरुष उपदेश ऐसा कहा है, क्योंकि तुम्हें उसके आयतन हीं बतलाये । ' [ याज्ञ-है । ' [ जनक - ] ' याज्ञ-' हृदय ही आयतन है, नसे उपासना करे । ' ट्! हृदय ही स्थितता = भूतोंका आयतन समस्त भूत प्रतिष्ठित विद्वान् इसकी इस करता, सब भूत उसको - प्राप्त होता है । ' वैदेह ल उत्पन्न करनेवाली मेरे पिताका विचार उसका धन नहीं ले कल्यने ' हृदय ही ब्रह्म है । हे सम्राट्! हृदय चोंका आयतन है । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्याथ रूपकर्मात्मकानि हि भूतानि हृदयाश्रयाणीत्यवोचाम शाक-यत्राह्मणे हृदयप्रतिष्ठानि चेति । तस्माद् हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति ।

तस्माद् हृदयं स्थितिरित्यु-पासीत । हृदये च प्रजापतिः ।

देवता ॥ ७ ॥

८५७ | नाम, रूप और कर्मात्मक भूत हृदयके ही आश्रित हैं और हृदयमें ही प्रतिष्ठित हैं - ऐसा हम शाकल्य-ब्राह्मणमें कह चुके हैं । अत: हे सम्राट्! समस्त भूत हृदयमें ही प्रतिष्ठित हैं । ग्रतः हृदयकी ‘ ' स्थिति ’ इस रूपसे उपासना करे । हृदयमें प्रजापति देवता है ॥ ७ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये प्रथमं षडाचार्यंब्राह्मणम् ॥ १ ॥

द्वितीय ब्राह्मण जनक उपसत्ति जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्ते-ऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाद-दीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्मास्येवं वृन्दारक. आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क गमिष्यसीति नाहं तद् भगवन् वेद यत्र गमिष्यामी-त्यथ वै तेऽहं तद् वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥

विदेहराज जनकने कूर्च [ नामक एक विशेष प्रकारके आसन ] से उठ-कर [ याज्ञवल्क्यके ] समीप जाकर कहा, ' याज्ञवल्क्य! आपको नमस्कार है, मुझे उपदेश कीजिये । ' उस ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा, ' राजन्! जिस प्रकार लंबे

पृष्ठ 872

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८५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ 222 NEED मार्गको जानेवाला पुरुष सम्यक् प्रकारसे रथ या नौकाका श्राश्रय ले, उसी प्रकार तू इन उपनिषदों ( उपासनाओं ) से युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी उपासना कर समाहितचित्त हो गया है । इस प्रकार तू पूज्य, श्रीमान्, अधीतवेद और उक्तोपनिषत्क ( जिसे प्राचार्यने उपनिषद्का उपदेश कर दिया है - ऐसा ) हो गया है । इतना होनेपर भी तू इस शरीरसे छूटकर कहाँ जायगा? ’ [ जनक– ] ‘ भगवन्! मैं कहाँ जाऊँगा, सो मुझे मालूम नहीं है । ' [ याज्ञवल्क्य– ] ' अब मैं तुझे यही बतलाऊँगा – जहाँ तू जायगा । ' [ जनक— ] ‘ भगवान् मुझे बतलावें ' ॥ १ ॥

जनको ह वैदेहः । यस्मात् सविशेषणानि सर्वाणि ब्रह्माणि । जानाति याज्ञवल्क्यः, तस्मादा-चार्यकत्वं हित्वा जनकः कूर्चा-दासन विशेषादुत्थाय उप समीप-मवसर्पन् पादयोर्निपतन्नित्यर्थः, उवाचोक्तवान् - नमस्ते तुभ्य-मस्तु हे याज्ञवल्क्य; अनु मा शाभ्यनुशाधि मामित्यर्थः इति - शब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः । स होवाच याज्ञवल्क्यः-यथा वै लौके हे सम्राट् महान्तं दीर्घमध्वानमेष्यन् गमिष्यन्, - रथं वा स्थलेन गमिष्यन्, नावं वा जस्तेन गमिष्यन् समाददीत - एवमेवैतानि ब्रह्मा-ण्येताभिरुपनिषद्भिर्युक्तानि उपासीनः समाहितात्मा-' जनको ह वैदेहः ' । चूँकि याज्ञवल्क्य विशेषणों के सहित सम्पूर्ण ब्रह्मोंको जानता है, इस-लिये जनक आचार्यकत्व ( ज्ञानि-स्वाभिमान ) को छोड़कर कूर्च- स आसन विशेष से उठकर उसके समीप जा अर्थात् चरणों में गिरकर बोला, ' हे याज्ञवल्क्य! तुम्हें नमस्कार है; ' अनु मा शाघि ' अर्थात् मेरा अनु-शासन करो । [ शाधीति इसमें ] ' इति ' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित स करनेके लिये है । वि उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे समाट्! लोकमें जिस प्रकार महान् प यानी लंबे मार्गंको जानेवाला पुरुष स्थलसे जानेपर रथ और जलसे जानेपर नौकाका आश्रय ले, ग उसी प्रकार तू इन उपनिषदों— तु उपासनाओंसे युक्त इन ब्रह्मोंकी य उपासना करके समाहितचित्त हो

पृष्ठ 873

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[ श्रध्याय४ नौकाका प्राश्रयले, युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी र तू पूज्य, श्रीमान्, निषद्का उपदेश कर इस शरीरसे छूटकर गा, सो मुझे मालूम तलाऊँगा – जहाँ तू वैदेहः । चूँकि विशेषणोंके सहित जानता है, इस-चार्यकत्व ( ज्ञानि -को छोड़कर कूर्च -उठकर उसके समीप में गिरकर बोला, तुम्हें नमस्कार है; - ' अर्थात् मेरा अनु-[ शाधीति इसमें ] क्यकी समाप्ति सूचित है । वल्क्यने कहा, ' हे जिस प्रकार महान् को जानेवाला पुरुष र रथ और जलसे का आश्रय ले, इन उपनिषदों-युक्त इन ब्रह्मोंकी के समाहितचित्त हो ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ सि, अत्यन्तमेताभिरुपनिषद्भिः संयुक्तात्मासि; न केवलम्नुपनि -पत्समाहितः, एवं वृन्दारकः पूज्यश्वादयश्वेश्वरो न दरिद्र इत्यर्थः; अधीतवेदोऽधीतो वेदो येन स त्वमधीतवेदः, उक्ताश्चोप-निषद आचार्यैस्तुभ्यं स त्व-मुक्तोपनिषत्कः । एवं सर्वविभूतिसम्पन्नोऽपि सन् भयमध्यस्थ एव परमात्म-ज्ञानेन विनाकृतार्थ एव तावदि-त्यर्थः, यावत् परं ब्रह्म न वेत्सि । इतोऽस्माद्देहाद् विमुच्य मान एवामिनौरथ स्थानीयाभिः समाहितः क्व कस्मिन् गमिष्यसि, किं वस्तु प्राप्स्यसीति? नाहं तद् वस्तु भगवन् पूजावन् वेद जाने यत्र गमि-व्यामीति । अथ यद्येवं न जानीषे यत्र गतः कृतार्थः स्याः, अहं वै ते तुभ्यं तद् वक्ष्यामि यत्र गमि -ष्यसीति । ८१ ९ | गया है, अर्थात् इन उपासनाओंसे | अत्यन्त केवल संयुक्तचित्त हो गया है; उपनिषदों ( उपासनाओं ) से | समाहित ( संयुक्त ) ही नहीं है, इसी प्रकार वृन्दारक — पूज्य और आढ्य अर्थात् श्रीमान् भी है, भाव यह कि दरिद्र नहीं है; तथा तू अवोतवेद— जिसने वेदाध्ययन कर लिया है, ऐसा अधीतवेद है और उक्तोपनि-षत्क – जिसे आचार्योंने उपनिषदों-का उपदेश कर दिया है, ऐसा तू. उक्तोपनिषत्क है । ' इस प्रकार सम्पूर्ण विभूतियों-से सम्पन्न होनेपर भी परमात्माका बोध हुए विना तु भय मध्यमें ही स्थित है अर्थात् तबतक तो तू अकृतार्थ ही है, जबतक कि पर-ब्रह्मको नहीं जानता । तू यहाँसे-इस देहसे छूटकर इन नौका और रथस्थानीय उपासनाओंसे समा-हित होकर कहाँ जायगा? वस्तुको प्राप्त करेगा? ” [ जनक - ] ' हे भगवन्! हे पूज्य! में उस वस्तुको नहीं जानता, जहाँ कि मैं [ देह छोड़नेपर ] जाऊँगा । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' अच्छा, यदि तू यह नहीं जानता कि कहाँ जानेपर तू कृतार्थं होगा तो मैं तुझे वह स्थान बतलाऊँगा जहाँ तू जायगा । '

पृष्ठ 874

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८६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रवीतु भगवानिति, यदि [ जनक - ] ' यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो भगवान् मुझे उसका प्रसन्नो मां प्रति । उपदेश करें । ' शृणु—– ॥ १ ॥ [ याज्ञवस्थ्य– ] ‘ सुन ’ – ॥ १ ॥

दक्षिणनेत्रस्थ इन्द्रसंज्ञक पुरुषका परिचय इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्ध सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥

यह जो दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, इन्ध नामवाला है, उसी इस पुरुषको इन्ध होते हुए भी परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण मानो परोक्ष-प्रिय हैं, प्रत्यक्षसे द्वेष करनेवाले हैं ॥ २ ॥

इन्धो ह वै नाम - इन्ध इत्ये- ' इन्धो ह वै नाम'- ' इन्ध ' ऐसे बन्नामा, · यश्चक्षुर्वै ब्रह्मेति पुरोक्त नामवाला है, ' चक्षु ही ब्रह्म है ' आदित्यान्तर्गतः पुरुषः स एषः, इस प्रकार जिस आदित्यान्तर्गत दक्षिणेऽक्षन् अक्षणि पुरुषका पहले वर्णन किया गया है, योऽयं वह यह है जो कि विशेषरूपसे विशेषेण व्यवस्थितः -- स च दक्षिण नेत्रमें स्थित है; वह सत्य सत्यनामा; तं वै एतं पुरुषं नामवाला है; दीप्ति गुणवाला होने-दीप्तिगुणत्वात् प्रत्यक्षं नाम से इसका ' इन्ध ' यह प्रत्यक्ष नाम अस्येन्ध इति, तमिन्धं सन्त- है, उस इस पुरुषको, इन्ध होते मिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण; हुए भी, परोक्षरूपसे ‘ इन्द्र ' ऐसा यस्मात् परोक्षप्रिया इव हि देवा: कहते हैं; क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षद्वेषी हैं-प्रत्यक्ष द्विषः प्रत्यक्षनामग्रहणं नामग्रहणसे ं द्वेष करते हैं । द्विषन्ति । एष त्वं वैश्वानर- यह प्रत्यक्ष तू वैश्वानर आत्माको प्राप्त हो

मात्मानं सम्पन्नोऽसि ॥। २ ॥ गया है ॥ २ ॥

पृष्ठ 875

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[ श्रध्याय४ - ] ' यदि मुझपर भगवान् मुझे उसका ' त्रय- ] ' सुन ' – ॥ १ ॥

परिचय णेऽक्षन् पुरुषस्तं क्षते परोक्षेणैव १ ॥ २ ॥

है, उसी इस पुरुषको - देवगण मानो परोक्ष-- वै नाम ' - ' इन्ध ' ऐसे , ' चक्षु ही ब्रह्म है ' जिस आदित्यान्तर्गत ले वर्णन किया गया है, जो कि विशेषरूपसे में स्थित है; वह सत्य है; दीप्ति गुणवाला होने-इन्ध ' यह प्रत्यक्ष नाम पुरुषको इन्ध होते रोक्षरूप से ' इन्द्र ' ऐसा क्योंकि देवगण मानो हैं, प्रत्यक्षद्वेषी हैं-ग्रहणसे द्वेष करते हैं । नर आत्माको प्राप्त हो ॥ ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६१ वामनेत्रस्थ इन्द्रपत्नी तथा विराट्का परिचय और उन दोनों के संस्ताव, अन्न, प्रावरण एवं मार्गादिका वर्णन अथैतत् वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष स ँस्तावो य एषोऽन्तहृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तहृदये लोहित-पिण्डोऽथैतयो रेतत् प्रावरणं यदेतदन्तहृदये जालक-मिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्य च्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्यो ऽन्त दये प्रतिष्ठिता भवन्त्येता-भिर्वा एतदाखवदास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥

और यह जो बायें नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इस ( इन्द्र ) की पत्नी विराट् ( अन्न ) है; उन दोनोंका यह संस्ताव ( मिलनका स्थान ) है जो कि यह हृदयान्तर्गंत आकाश है । उन दोनोंका यह अन्न है जो कि यह हृदयान्त-र्गत लाल पिण्ड है । उन दोनोंका यह प्रावरण है जो कि यह हृदयान्त-र्गत जाल - सा है । उन दोनोंका यह मार्ग - संचार करनेका द्वार है जो कि यह हृदयसे ऊपरकी ओर नाडी जाती है । जिस प्रकार सहस्र भागों में विभक्त हुआ केश होता है, वैसी ही ये हिता नामकी नाडियां हृदय के भीतर स्थित हैं । इन्हींके द्वारा जाता हुआ यह अन्न [ शरीरमें ] जाता है; इसीसे इस ( स्थूल शरीराभिमानी वैश्वानर ) से यह ( सूक्ष्मदेहाभिमानी तैजस ) सूक्ष्मतर आहार ग्रहण करनेवाला ही होता है ॥ ३ ॥

अथैतद् वामेऽक्षणि पुरुषरूपम्, और यह जो वाम नेत्रमें पुरुष-एषास्य पत्नी - यं त्वं वैश्वानरमा- रूप है, वह इसकी पत्नी है - तुम जिस वैश्वानर आत्माको सम्पन्न त्मानं सम्पन्नोऽसि तस्यास्येन्द्रस्य हुए हो, उस इस भोक्ता इन्द्रकी यह भोक्तर्भाग्यैषा पत्नी विराडन्नं । भोग्यरूपा पत्नी है, भोग्य होने के

पृष्ठ 876

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८६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ भोग्यत्वादेव । तदेतदन्नं चात्ता । चैकं मिथुनं स्वप्ने । कथम् १ । तयोरेष इन्द्राण्या इन्द्रस्य चैष संस्ताव:, सम्भूय यत्र संस्तवं कुर्वा श्रन्योन्यं स एष संस्तावः । कोऽसौ १ य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः, अन्तर्हृदये हृदयस्य मांसपिण्डस्य मध्ये । अथैनयोरेतद् वक्ष्यमाणमन्नं भोज्यं स्थितिहेतुः किं तत् १ य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डो लोहित एव पिण्डाकारापन्नो लोहितपिण्डः । श्रन्नं जग्धं द्वेवा परिणमते; यत् स्थूलं तदधो गच्छति यदन्यत्तत् पुनरग्निना पच्यमानं द्वेधा परिणमते - यो मध्यमो रसः स लोहितादिक्रमेण पाञ्चभौतिकं पिण्डं शरीरमुपचि-नोति, योऽणिष्ठो रसः स लोहि-तपिण्ड इन्द्रस्य लिङ्गात्मनो हृदये मिथुनीभूतस्य, यं तैजसमाच-कारण विराट्र अन्त है । वह यह अन्न और अत्ता स्वप्न में एक मिथुन होते हैं । किस प्रकार? उन इन्द्राणी और इन्द्रका यह संस्ताव है; जहाँ दोनों मिलकर एक - दूसरे-का संस्तव ( प्रशंसा ) करते हैं, वह संस्ताव कहलाता है । संस्ताव क्या है? जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है । अन्त-हृदयमें अर्थात् मांसपिण्डरूप हृदयके भीतर । और इन दोनोंका यह आगे कहा जानेवाला अन्न- भोज्य यानी स्थितिका हेतु है, वह क्या है? जो कि यह हृदयके भीतर लोहितपिण्ड है— पिण्डाकारको प्राप्त हुआ लोहित ही लोहितपिण्ड है । खाया हुआ अन्न दो प्रकारसे परिणत होता है; जो स्थूल होता है, वह नीचे चला जाता है और जो दूसरे प्रकारका होता है, वह पुनः अग्नि- द से पचाया जाकर दो प्रकारसे परिणत हो जाता है— जो मध्यम म स रस होता है, वह लोहितादि क्रमसे पाञ्चभौतिक पिण्डरूप शरीरको पुष्ट बनाता है और जो सूक्ष्मतम रस दे हि होता है, वह हृदय में मिथुनभावको प्राप्त हुए लिङ्गात्मा इन्द्रका यह ता । लोहितपिण्ड है, जिसे तेजस कहते

पृष्ठ 877

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[ अध्याय ४ अन्न है । वह यह त्ता स्वप्नमें एक मिथुन किस प्रकार? उन इन्द्रका यह संस्ताव मिलकर एक - दूसरे-( प्रशंसा करते हैं, कहलाता है । वह है? जो कि यह आकाश है । अन्त-अर्थात् मांसपिण्डरूप र । न दोनोंका यह आगे बला अन्न - भोज्य यानी तु है, वह क्या है? जो के भीतर लोहितपिण्ड कारको प्राप्त हुआ नोहितपिण्ड है । खाया दो प्रकारसे परिणत स्थूल होता है, वह जाता है और जो दूसरे ता है, वह पुनः अग्नि-जाकर दो प्रकारसे जाता है - जो मध्यम , वह लोहितादि क्रमसे - पिण्डरूप शरीरको पुष्ट और जो सूक्ष्मतम रस इ हृदयमें मिथुनभावको लिङ्गात्मा इन्द्रका यह - है, जिसे तैजस कहते ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ क्षते । स तयोरिन्द्रेन्द्राण्योर्हृदये मिथुनीभूतयो: सूक्ष्मासु नाडीष्व -नुप्रविष्टः स्थितिहेतुर्भवति तदे-तदुच्यते — श्रथैनयोरेतदन्नमि-त्यादि । किञ्चान्यत्, अथैनयोरेवत प्राचरणम्; भुक्तवतोः स्व-पतोश्च प्रावरणं भवति लोके, तत्सामान्यं हि कल्पयति श्रुतिः; किं तदिह प्रावरणम् १ यदेतदन्त-हृदये जालकमिव -- अनेकनाडी-छिद्रबहुलत्वाज्जालकमिव । अथैनयोरेषा सृतिर्मार्गः, सञ्च रतोऽनयेति सञ्चरणी, स्वप्ना -जागरितदेशागमनमार्गका सा सुतिः १ यैषा हृदयाद् हृदयदेशा-दूर्वाभिमुखी सती उच्चरति नाडी, तस्याः परिमाणमिद-मुच्यते - यथा लोके केशः । सहस्रधा भिन्नोऽत्यन्तसूक्ष्मो भवति, एवं सूक्ष्मा अस्य देहस्य सम्बन्धिन्या हिता नाम हिता इत्येवं वं ख्याता नाड्यः ताश्चान्तर्हृदये मांसपिण्डे । ८६३ हैं । वह सूक्ष्म नाडियोंमें अनु-प्रविष्ट होकर हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए उन इन्द्र और इन्द्राणीकी स्थितिका कारण होता है; यही वात ' अथेनयोरेतदन्नम् ' इत्यादि वाक्यसे कही जाती है । इसके सिवा दूसरी बात यह है - यही इन दोनोंका प्रावरण है । लोकमें भोजन करनेवालों और सोनेवालोंका प्रावरण ( आच्छादन ) होता है, श्रुति उसीकी समानताकी कल्पना करती है । यहाँ वह प्राव-रण क्या है? यह जो हृदयके भीतर जाल - सा है— अनेक नाडीछिद्रोंकी बहुलता होनेके कारण जालके समान है । और यह इनकी सृति यानी मार्ग है; इससे संचार करते हैं, इसलिये यह सञ्चरणी अर्थात् स्वप्न-से जागरित देशमें आनेका मार्ग है | वह मार्ग क्या है? जो कि यह हृदयसे—– हृदयदेशसे ऊपरकी ओर नाडी जाती है; यह उसका परि-माण बतलाया जाता है— लोकमें जिस प्रकार सहस्रों भागोंमें बाँटा हुआ केश अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, इसी प्रकार इस देह से सम्बन्ध रखनेवाली ये हिता - हिता नामसे विख्यात नाडियाँ सूक्ष्म होती हैं, तथा ये हृदयके भीतर मांस - पिण्डमें

पृष्ठ 878

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८६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ प्रतिष्ठिता भवन्ति हृदयाद् । विप्ररूढास्ताः सर्वत्र कदम्ब केसर वत्; एताभिर्नाडी भिरत्यन्त-सूक्ष्माभिरेतदन्नमास्रवद् गच्छ-दास्रवति गच्छति । तदेतद् देवता शरीरमनेनानेन दामभूतेनोपचीयमानं तिष्ठति तस्माद् यस्मात् स्थूलेनान्नेनोप-चितः पिण्डः, इदं तु देवता-शरीरं लिङ्गं सूक्ष्मेणान्नेनोपचितं तिष्ठति । पिण्डोपचयकरमध्यन्नं प्रविविक्तमेव मूत्रपुरीषादिस्थूल-मपेक्ष्य लिङ्गस्थितिकर स्वन्नं ततोऽपि सूक्ष्मतरम्; अतः प्रविविक्ताहारः पिण्डः; तस्मात् प्रविविक्ताहारादपि प्रविविक्ता हारतर एष लिङ्गात्मा इवैव भवति । अस्माच्छरीराच्छरीर-मेव शारीरं तस्माच्छारीरा-दात्मनो वैश्वानराचैजसः सूक्ष्मा-न्नोपचितो भवति ॥ ३ ॥

प्रतिष्ठित हैं; कदम्ब - पुष्पकी केसर-के समान ये हृदयसे सब ओर फैली हुई हैं; इन अत्यन्त सूक्ष्म नाडियोंसे जाता हुआ यह अन्न [ शरीरमें सर्वत्र ] जाता है | वह यह देवताशरीर इस रज्जु-भूत अन्नसे बढ़ता ( पुष्टि पाता ) रहता है; अतः चूँकि पिण्डस्थूल अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता है, यह देवताशरीररूप लिङ्गदेह सूक्ष्म अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता हुआ स्थित रहता है । मलमूत्रादि स्थूल भागकी अपेक्षा तो पिण्डकी वृद्धि करनेवाला अन्न भी सूक्ष्म ही है; उससे भी लिङ्गदेहकी स्थिति करने -वाला अन्न तो अत्यन्त सूक्ष्मतर है । अतः पिण्ड सूक्ष्माहारी है, उस सूक्ष्माहारीसे भी यह लिङ्गात्मा सूक्ष्मतर आहार करनेवाला ही है । इस शरीरसे - शरीर ही शारीर है, उस शारीर आत्मा वैश्वानरसे तेजस अधिक सूक्ष्म अन्नद्वारा उप चित होता है ॥ ३ ॥

प्रारणात्मभूत विद्वान्की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण स एष हृदयभूतस्तैजसः वह यह हृदयभूत तेजस सूक्ष्म-सूक्ष्मभूतेन प्राणेन विधियमाणः भूत प्राणसे धारण किया जाकर प्राण एव भवति । प्राण ही हो जाता है ।

पृष्ठ 879

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[ अध्याय४ कदम्ब - पुष्पकी केसर-हृदयसे सब ओर फैली अत्यन्त सूक्ष्म नाडियोंसे यह अन्न [ शरीरमें ता है । - देवताशरीर इस रज्जु-बढ़ता ( पुष्टि पाता ) अतः चूँकि पिण्ड स्थूल को प्राप्त होता है, यह दरूप लिङ्गदेह सूक्ष्म को प्राप्त होता हुआ है । मलमूत्रादि स्थूल - पेक्षा तो पिण्डकी वृद्धि अन्न भी सूक्ष्म ही है; लिङ्गदेहकी स्थिति करने-न तो अत्यन्त सूक्ष्मतर पिण्ड सूक्ष्माहारी है, हारीसे भी यह लिङ्गात्मा हार करनेवाला ही है । से — शरीर ही शारीर रीर आत्मा वैश्वानरसे क सूक्ष्म अन्नद्वारा उप - है ॥ ३ ॥

वर्णन, जनककी आत्मसमर्पण ह हृदयभूत तेजस सूक्ष्म-धारण किया जाकर जाता है । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६५ तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणा दक्षिणादिग् दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणाउदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाचीदिग-वाञ्चः प्राणाः सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीयों न हि शीर्यते ऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । स होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद् याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमह-मस्मि ॥ ४ ॥

उस विद्वान् के पूर्व दिशा पूर्व प्राण हैं, दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण हैं, पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण हैं, नीचेकी दिशा नीचे प्राण हैं और सम्पूर्णं दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं । वह यह ' नेति नेति ' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, शीर्ण ( नष्ट ) नहीं होता, असङ्ग है, उसका सङ्ग नहीं होता; वह अबद्ध है, व्यथित नहीं होता और क्षण नहीं होता । हे जनक! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है - ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । उस विदेहराज जनकने कहा, ' हे भगवन् याज्ञवल्क्य! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार हो, ये विदेह तस्यास्य विदुषः क्रमेण वैश्वा-नरात्तैजसं प्राप्तस्य हृदयात्मानमा-मनस्य हृदयात्मनश्च प्राणात्मान-मापन्नस्य प्राची दिक प्राञ्चः प्रा-ग्गताः प्राणाः, तथेो दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः, तथा प्रतीची बृ ० उ ० ५५-देश और यह मैं आपके अधीन हैं ॥४ ॥

क्रमशः वैश्वानरसे तैजसको, उससे हृदयात्माको और हृदयात्मासे प्राणात्मभावको प्राप्त हुए उस इस विद्वान्के प्राची दिशा पूर्वगत प्राण हैं तथा दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण

पृष्ठ 880

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८६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय दिक् प्रत्यश्चः प्राणाः, उदीची । दिगुदश्चः प्राणाः, ऊर्ध्वा दिगू-धर्वाः प्राणाः, अवाची दिगवाञ्चः प्राणाः, सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः । एवं विद्वान् क्रमेण सर्वात्मकं प्राणमात्मत्वेनोपगतो भवति । तं सर्वात्मानं प्रत्यगात्मन्युपसं-हृत्य द्रष्टुर्हि द्रष्टृभावं नेति नेत्यात्मानं तुरीयं प्रतिपद्यते । यमेष विज्ञाननेन क्रमेण प्रति-पद्यते, स एष नेति नेत्यात्मे-त्यादि न रिष्यतीत्यन्तं व्याख्या-तमेतत् । अभयं वै जन्ममरणादिनिमि-तभयशून्यं हे जनक प्राप्तोऽसि, इति दैवं किलोवाचोक्तवान् याज्ञवल्क्यः । तदेतदुक्तम् । अथ वै तेऽहं तद् वक्ष्यामि यत्र गमि-ष्यसीति । स होवाच जनको वैदेहोऽभ-यमेव त्वा त्वामपि गच्छताद् गच्छ-तु यस्त्वं नोऽस्मान् हे याज्ञवल्क्य भगवन् पूजावन् अभयं ब्रह्म वेदयसे ज्ञापयसि प्रापितवानुपाधिकृता-ज्ञानव्यवधानापनयनेन इत्यर्थः ॥ ४ हैं; इसी प्रकार पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊर्ध्व दिशा ऊर्ध्व प्राण हैं; नीचे की दिशा नीचे के प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं । इस प्रकार विद्वान् क्रमशः सर्वा-त्मक प्राणको आत्मभावसे प्राप्त हो जाता है । उस सर्वात्माका प्रत्य-गात्मामें उपसंहार कर द्रष्टाके द्रष्टृ-भाव अर्थात् ' नेति नेति ' इस प्रकार निर्देश किये गये तुरीय आत्माको प्राप्त हो जाता है । इस क्रमसे यह विद्वान् जिसे प्राप्त होता है, वह यह ' नेति नेति ' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा है 1 । ' नेति नेति आत्मा ' इससे लेकर ' न रिष्यति ' यहाँतक -की व्याख्या पहले की जा चुकी है । हे जनक! तू अभयको अर्थात् जन्म - मरणादिशून्य ब्रह्मको प्राप्त हो गया है - ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्य- स ने कहा । इस प्रकार यह कहा 4 गया । अब तुझे यह बतलाता हूँ जहाँ कि तू जायगा । द उस वैदेह जनकने कहा- - हे स भगवन् - पूज्य याज्ञवल्क्य! जो आप हमें अभय ब्रह्मका ज्ञान करा रहे हैं. अ अर्थात् उपाधिकृत अज्ञानरूप पदं-को हटाकर ब्रह्मकी प्राप्ति करा रहे S हैं, उन आपको भी अभय ही प्राप्त