बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 881–890

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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[ अध्याय४ पश्चिम दिशा पश्चिम दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊर्ध्व प्राण हैं; नीचे की प्राण हैं और सम्पूर्ण प्राण हैं । विद्वान् क्रमशः सर्वा-आत्मभावसे प्राप्त हो उस सर्वात्माका प्रत्य-संहार कर द्रष्टा द्रष्टृ-- ' नेति नेति ' इस प्रकार गये तुरीय आत्माको ता है । इस क्रमसे यह प्राप्त होता है, वह यह इस प्रकार निर्देश किया ' है । ' नेति नेति आत्मा ' ' नरिष्यति ' यहाँतक पहले की जा चुकी है । क! तू अभयको अर्थात् दिशून्य ब्रह्मको प्राप्त हो निश्चय ही याज्ञवल्क्य-इस प्रकार यह कहा तुझे यह बतलाता हूँ जायगा । देह जनकने कहा- हे याज्ञवल्क्य! जो आप का ज्ञान करा रहे हैं, धिकृत अज्ञानरूप पदे-ब्रह्मकी प्राप्ति करा रहे को भी अभय ही प्राप्त ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६७ किमन्यदहं विद्यानिष्क्रयार्थ प्रय- । हो । साक्षात् आत्माका ही दान च्छामि, साक्षादात्मानमेव दत्त-वते; अतो नमस्तेऽस्तु इमे विदेहास्तव यथेष्टं भुज्यन्ताम्; अयं चाहमस्मि दासभावे स्थितः; यथेष्टं मां राज्यं च प्रतिपद्यस्वे-त्यर्थः ॥। ४ ॥ करनेवाले आपको में इस विद्याके बदलेमें और क्या हूँ? इसलिये आपको नमस्कार है; यह विदेह-राज्य आपका ही है, आप इसका यथेच्छ भोग करें और यह में भी आपके दासभावमें स्थित हूँ; तात्पर्य यह है कि मुझे और इस राज्यको आप इच्छानुसार प्राप्त करें ॥ ४ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये द्वितीयं कुचंब्राह्मणम् ॥ २ ॥

तृतीय जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो उपक्रम ) जगामेत्यस्याभि-सम्बन्धः । विज्ञानमय आत्मा साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तरः पर एव - ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्य-दतोऽस्ति द्रष्टृ ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । स एष इह प्रविष्टो वदनादिलिङ्गः, अस्ति व्यतिरिक्त इति मधुकाण्डे -ऽजातशत्रुसंवादे प्राणादिकर्तृत्व- । ब्राह्मण ' जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम ' इत्यादि रूपसे आरम्भ होनेवाले ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है— विज्ञानमय आत्मा साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर परब्रह्म ही है; जैसा कि ' इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई द्रष्ट नहीं है ' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इस देहमें प्रविष्ट वह भाषणादि लिङ्गवाला विज्ञानात्मा शरीरसे भिन्न है - ऐसा मघुकाण्डमें अजातशत्रुके संवादमें [ गार्ग्य और काश्यके प्रश्नमें ] प्राणादिके कर्तृत्व-

पृष्ठ 882

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८६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय भोक्तृत्व प्रत्याख्यानेनाधिगतो- । ऽपि सन् पुनः प्राणनादिलिङ्गमु-पन्यस्य औषस्तप्रश्ने प्राणनादि -लिङ्गो यः सामान्येनाधिगतः ' प्राणेन प्राणिति ' इत्यादिना, ' दृष्टेर्द्रष्टा ' इत्यादिना श्रलुप्त-शक्तिस्वभावोऽधिगतः । तस्य च परोपाधिनिमित्तः संसारः - यथा रज्जूषरशुक्तिकाग-गनादिषु सर्पोदकरजतमलिन-त्वादि पराध्यारोपणनिमित्तमेव, न स्वतः, तथा । निरुपाधिको निरुपाख्यो नेति नेतीति व्यपदेश्यः सोक्षा-दपरोक्षात् सर्वान्तर आत्मा ब्रह्मा-क्षरमन्तर्यामी प्रशास्ता औपनिषदः पुरुषो विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यधि-गतम् । तदेव पुनरिन्धसंज्ञः प्रविविक्ताहारः, ततोऽन्तर्हृदये लिङ्गात्मा प्रविविक्ताहारतरः; ततः ४ भोक्तृत्व के निराकरणद्वारा होनेपर भी फिर औषस्त ( उषस्त ज्ञात चाक्रायण ) के प्रश्नमें जो ' प्राणसे प्राणन करता है ' इत्यादि वाक्य-द्वारा प्राणनादि लिङ्गका उपन्यास कर सामान्यरूपसे प्राणनादि लिङ्ग-वाला जाना गया है, वही ' दृष्टिका द्रष्टा है ' इत्यादि वाक्यसे अलुप्त-शक्तिस्वभाव ज्ञात हुआ है । उसे [ अज्ञान और उसके कार्य अन्तःकरणादि इस ] अन्य उपाधिके कारण संसारकी प्राप्ति हुई है, जिस प्रकार कि रज्जु, ऊसर, शुक्ति और आकाशादिमें सर्प, जल, रजत और मलिनता आदिकी प्रतीति दूसरोंके आरोप करनेके कारण ही है, स्वतः इ नहीं, उसी प्रकार [ यहाँ समझना म चाहिये ] । S इस प्रकार निरुपाधिक, निरु-पाख्य ( मन और वाणीका अविषय ), ' नेति नेति ' इस वाक्यसे निर्देश्य, प साक्षात् अपरोक्ष, सर्वान्तर आत्मा, वि ब्रह्म, अक्षर, अन्तर्यामी, प्रशास्ता, म पनिषद पुरुष विज्ञान - आनन्दरूप न ब्रह्म है- यह ज्ञात हुआ । वही फिर न्त सूक्ष्माहार करनेवाला इन्धसंज्ञक ' वैश्वानर, फिर उससे भी सूक्ष्मतर आहार करनेवाला हृदयान्तर्वर्ती धि लिङ्गात्मा और फिर उससे भी वि

पृष्ठ 883

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[ श्रध्याय ४ निराकरणद्वारा कर औषस्त ज्ञात ( उषस्त के प्रश्नमें जो ' प्राणसे T है ' इत्यादि वाक्य--दि लिङ्गका उपन्यास रूपसे प्राणनादि लिङ्ग-गया है, वही ' दृष्ट यादि वाक्य से अलुप्त-ज्ञात हुआ है ज्ञान और उसके कार्य इस ] अन्य उपाधिके की प्राप्ति हुई है, जिस ज्जु, ऊसर, शुक्ति और सर्प, जल, रजत और दिकी प्रतीति दूसरोंके के कारण ही है, स्वतः कार [ यहाँ समझना र निरुपाधिक, निरु र वाणीका अविषय ), इस वाक्यसे निर्देश्य, रोक्ष, सर्वान्तर आत्मा, अन्तर्यामी, प्रशास्ता, रुष विज्ञान - आनन्दरूप ज्ञात हुआ । वही फिर करनेवाला इन्धसंज्ञक कर उससे भी सूक्ष्मतर नेवाला हृदयान्तर्वर्ती और फिर उससे भी ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ परेण जगदात्मा प्राणोपाधिः ततो s पि प्रविलाप्य जगदात्मान-मुपाधिभूतं रज्ज्वादाविव सर्पा -दिकं विद्यया, ' स एष नेति नेति ' इति साक्षात् सर्वान्तरं ब्रह्माधिगतम् । एवमभयं परि-प्रापितो जनको याज्ञवल्क्येनाग-मतः संक्षेपतः । अत्र च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ततु-रयाण्युपन्यस्तान्यन्यप्रसङ्गेन- = इन्धः, प्रविविकाहारवरः, सर्वे " प्राणाः, स एष नेति नेतीति । इदानीं जाग्रत्स्वप्नादिद्वारेणैव महता तर्केण विस्तरतो -ऽधिगमःकर्तव्यः; अभयं प्रापयि -तव्यम्; सद्भावश्वात्मनो विप्रति-' पत्याशङ्का निराकरणद्वारेण - व्य-तिरिक्तत्वं शुद्धत्वं स्वयंज्योतिष्ट्व-मलुप्तशक्तिस्वरूपत्वं निरतिशया नन्दस्वाभाव्यम् अद्वैतत्वं चाधिग-न्तव्यम् - इतीदमारभ्यते । श्रख्या यिका तु विद्यासम्प्रदानग्रहणवि धिप्रकाशनार्थी, विद्यास्तुतये च विशेषतः, वरदाना दिसूचनात् ॥ ८६ ९ । सूक्ष्म प्राणोपाधिक जगदात्मा जाना गया । फिर रज्जु आदिमें सर्पादिके समान उपाधिभूत जग़-दात्माका भी ज्ञानद्वारा लय करके ' स एष नेति नेति ' इस वाक्यद्वारा साक्षात् सर्वान्तर ब्रह्म जाना गया है । इस प्रकार संक्षेपतः शास्त्रद्वारा याज्ञवल्क्यसे जनक अभयको प्राप्त कराया गया है । यहाँ ( द्वितीय ब्राह्मणमें ) [ उपा-सककी क्रममुक्तिरूप ] अन्य प्रसङ्गसे " इन्धः " प्रविविक्ताहारतरः'सर्वेप्राणाः ’ ' स एष नेति नेति ' इत्यादि रूपसे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयका उल्लेख किया गया है । अव जाग्रत्, स्वप्नादिके द्वारा ही महान् तर्कसे उसका विस्तारपूर्वक बोघ और अभय प्राप्त कराना है तथा विपरीत ज्ञानकी आशङ्काके निराकरणद्वारा आत्मा के अस्तित्व, देहादिसे भिन्नत्व, शुद्धत्व, स्वयंप्रकाशत्व, अलुप्तशक्ति-स्वरूपत्व, निरतिशयानन्दस्वभावत्व और अद्वेतत्वका भी बोध कराना है; इसीसे [ आगेका ग्रन्थ ] आरम्भ किया जाता है । आख्यायिका तो विद्याके दान और ग्रहणकी विधि प्रदर्शित करनेके लिये तथा विशेषतः विद्याकी स्तुतिके लिये है, वरदा-नादिकी सूचना से यही बात ज्ञात होती है ।

पृष्ठ 884

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८७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ जनकके पास याज्ञवल्क्यका प्राना और राजाका पहले प्राप्त क हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना " जनक ँह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चा-ग्निहोत्रे समुदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वत्रे त ँ हास्मै ददौ तह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥

विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये । उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा । किंतु, पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्य-अग्निहोत्र विषयमें परस्पर संवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही मांगा था । यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था; अत: उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया ॥ १ ॥

जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम । स च गच्छन्नेवं मेने चिन्तितवान् - न वदिष्ये किञ्चिद-पि राज्ञे; गमनप्रयोजनं तु योग-क्षेमार्थम् । न वदिष्य इत्येवंसंक-न्पोऽपि याज्ञवल्क्यो यद् यज-नकः पृष्टवांस्तत्तत् प्रतिपेदे; तत्र को हेतुः संकल्पितस्यान्यथाक-रणे - इत्यत्राख्यायिकामाचष्टे । पूर्वत्र किल जनकयाज्ञवल्क्ययोः संवाद आसीदग्निहोत्रे निमित्ते । तत्र जनकस्याग्निहोत्रविषयं विज्ञा-विदेहराज जनकके पास याज्ञ-वल्क्य गये । उन्होंने जाते हुए ऐसा व विचार किया - यह सोचा कि मैं प राजाके प्रति कुछ उपदेश नहीं करूँगा; जानेका प्रयोजन तो योग-क्षेमके लिये था । ' कुछ उपदेश नहीं करूंगा ' इस प्रकार संकल्पवाले होनेपर भी याज्ञवल्क्यने जो - जो भी जनकने पूछा वह सभी बतलाया; इस प्रकार संकल्पित विचारके विरुद्ध करनेमें क्या हेतु था, इस विषय में श्रुति आख्यायिका बतलाती है । इससे पहले याज्ञवल्क्य और जनक- अ का अग्निहोत्रके निमित्तसे संवाद ज्य हुआ था । उसमें जनकके अग्निहोत्र- या

पृष्ठ 885

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[ श्रध्याय४ का पहले प्राप्त किये नसे प्रश्न करना नगाम स मेने न याज्ञवल्क्यश्चा-यो वरं ददौ स तह सम्राडेव का विचार था में कुछ जनक और याज्ञवल्क्य-उस समय याज्ञवल्क्यने करना ही मांगा था । से पहले राजाने ही ज जनकके पास याज्ञ-उन्होंने जाते हुए ऐसा यह सोचा कि मैं कुछ उपदेश नहीं का प्रयोजन तो योग-या । ' कुछ उपदेश नहीं प्रकार संकल्पवाले याज्ञवल्क्यने जो जो - भी वह सभी बतलाया; संकल्पित विचारके में क्या हेतु था, इस श्रुति आख्यायिका याज्ञवल्क्य और जनक-के निमित्तसे संवाद समें जनकके अग्निहोत्र-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ नमुपलभ्य परितुष्टो याज्ञवल्क्य -एतस्मै जनकाय ह किल वरं ददौ स च जनको ह कामप्रश्न-मेच वरं वत्रे वृतवान्; तं च वरं हास्मै ददौ याज्ञवल्क्यः; तेन वरप्रदानसामर्थ्येन अव्याचि-ख्यासुमपि याज्ञवल्क्यं तूष्णीं स्थितमपि सम्राडेव जनकः पूर्व पप्रच्छ । तत्रैवानुक्तिर्ब्रह्मविद्यायाः कर्मणा विरुद्धत्वात् विद्यायाश्च ।

स्वातन्त्र्यात् – स्वतन्त्रा हि ब्रह्म- ।

विद्या सहकारिसाधनान्तर निर-पेक्षा पुरुषार्थसाधनेति च ॥१ ॥

८७१ विषयक ज्ञानको देखकर उससे संतुष्ट हो याज्ञवल्क्यने जनकको वर दिया था, उस जनकने उस समय इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर ही मांगा था और याज्ञवल्क्य ने उसे यह वर दे दिया था; उस वरप्रदान-के सामर्थ्य से कुछ कहने की इच्छा-वाले न होने और चुप बैठे रहनेपर भी पहले राजा जनकने ही याज्ञवल्क्यसे पूछा । कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उस कर्मकाण्डके प्रसङ्गमें ही ब्रह्म-विद्याका वर्णन नहीं किया गया, क्योंकि विद्या तो स्वतन्त्र है — ब्रह्म-विद्या स्वतन्त्र है, अन्य सहकारी साधनकी अपेक्षासे रहित है और पुरुषार्थकी साधनभूत है ॥ १ ॥

पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ १ - आदित्यज्योति याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इति । आदित्य-ज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्य-यते कर्म कुरुते त्रिपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥२ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! यह पुरुष किस ज्योतिवाला हे? ' ' हे सम्राट्! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है ' - ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' यह आदित्यरूप

ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लोट जाता है ।

याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ २ ॥

पृष्ठ 886

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८७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ हे याज्ञवल्क्येत्येवं सम्बोध्या-भिमुखीकरणाय, किं ज्योतिरयं पुरुष इति - किमस्य पुरुषस्य ज्योतिर्येन ज्योतिषा व्यवहरति, सोऽयं कि ज्योतिः १ अयं प्राकृतः कार्यकरणसंघातरूपः शिरःपाण्यादिमान् पुरुषः पृच्छ - । यते । किमयं स्वावयवसंघात -बाह्येन ज्योतिरन्तरेण व्यवहरति, श्रहो स्वित् स्वावयवसंघातम-ध्यपातिना ज्योतिषा ज्योति-ष्कार्यमयं पुरुषो निर्वर्तयति, इत्येतदभिप्रेत्य पृच्छति । किं चातः, यदि व्यतिरिक्तेन यदि वाव्यतिरिक्तेन ज्योतिषा ज्योतिष्कार्य निर्वर्तयति । शृणु वत्र कारणम् – यदि व्यतिरिक्त-नैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यनिर्वर्त -कत्वम् अस्य स्वभावो निर्धारितो भवति, ततोऽदृष्टज्योतिष्कार्य-विषयेऽप्यनुमास्यामहे व्यतिरिक्त-ज्योतिर्निमित्तमेवेदं कार्यमिति; ' हे याज्ञवल्क्य ' इस प्रकार अपने अभिमुख करनेके लिये सम्बोधन करके जनक पूछता है— यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? अर्थात् इस पुरुषको ज्योति क्या है, जिस ज्योतिसे कि यह व्यवहार करता है? ( इसी अभिप्रायसे पूछता है - ) सो यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? यहां इस प्राकृत देहेन्द्रियसंघातरूप शिर और हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषके विषय में प्रश्न किया जाता है । क्या यह अपने अवयवोंसे बाहर रहनेवाली किसी अन्य ज्योतिसे व्यवहार करता है, अथवा अपने अवयवोंके संघातमें रहनेवाली ज्योतिसे यह पुरुष ज्योतिका कार्य पूरा करता है - इस अभिप्राय से ही जनक पूछता है । किंतु देहादि संघातसे व्यति-रिक्त अथवा अव्यतिरिक्त किसी भी प्रकारकी ज्योतिसे यह ज्योतिका कार्यं पूर्णं करता हो - इससे क्या हुआ? इसमें जो कारण है, सो सुनो - यदि इसका स्वभाव किसी व्यतिरिक्त ज्योतिसे ही ज्योतिका कार्य पूरा करनेका निश्चय किया जाय तो जहाँ ज्योति नहीं देखी गयी है, उस कार्यके विषयमें भी हम ऐसा अनुमान करेंगे कि यह कार्यं किसी व्यतिरिक्त ज्योतिके | कारण ही हुआ है; और यदि

पृष्ठ 887

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[ अध्याय४ वल्क्य ' इस प्रकार मुख करने के लिये के जनक पूछता है-स ज्योतिवाला है? रुषकी ज्योति क्या है, से कि यह व्यवहार ( इसी अभिप्रायसे सो यह पुरुष किस है? यहाँ इस प्राकृत नरूप शिर और हाथ वाले पुरुषके विषयमें जाता है । क्या यह से बाहर रहनेवाली ज्योतिसे व्यवहार यवा अपने अवयवोंके नेवाली ज्योतिसे यह का कार्य पूरा करता भिप्रायसे ही जनक हादि संघातसे व्यति-अव्यतिरिक्त किसी भी नोतिसे यह ज्योतिका रता हो - इससे क्या में जो कारण है, सो इसका स्वभाव किसी ज्योतिसे ही ज्योतिका करनेका निश्चय किया हाँ ज्योति नहीं देखी कार्यके विषयमें भी नुमान करेंगे कि यह व्यतिरिक्त ज्योतिके हुआ है; और यदि ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ अथाव्यतिरिक्तेनैव स्वात्मना ज्योतिषा व्यवहरति, ततो-ऽप्रत्यक्षेऽपि ज्योतिषि ज्योतिष्का -र्यदर्शनेऽव्यतिरिक्तमेव ज्योति-रनुमेयम्; अथानियम एव— व्यतिरिक्तमव्यतिरिक्तं वा ज्योतिः पुरुषस्य व्यवहारहेतु:, ततोऽनध्यवसाय एव ज्योति-र्विषये — इत्येवं मन्वानः पृच्छति जनको याज्ञवल्क्यम् — किं ज्योतिरयं पुरुष इति । नन्वेवमनुमानकौशले जनक-स्य किं प्रश्नेन, स्वयमेव कस्मान्न प्रतिपद्यत इति? सत्यमेतत्; तथापि लिङ्ग-लिङ्गिसम्बन्धविशेषाणामत्यन्त-सौक्ष्म्याद् दुरवबोध्यतां मन्यते बहूनामपि पण्डितानाम्, किमु-तैकस्य; अत एव हि धर्मसूक्ष्म- । निर्णये परिषद्वयापार इष्यते, पुरुषविशेषश्चापेक्ष्यते - दशावरा । ८७३ | यह अपनेसे अभिन्न ज्योतिद्वारा ही व्यवहार करता है तो ज्योतिका प्रत्यक्ष न होनेपर भी ज्योतिका कार्य देखने पर अभिन्न ज्योतिका ही अनुमान करना होगा; यदि ऐसा मानें कि पुरुषके व्यवहारको हेतु व्यतिरिक्त या अव्यतिरिक्त ज्योति है - इसका नियम है ही नहीं, तब तो ज्योतिके विषय में मनिश्चय ही रहेगा — ऐसा मानकर ही जनक याज्ञवल्क्यसे पूछता है कि यह पुरुष किस ज्योतिबाला है? शङ्का- - किंतु यदि जनकमें ऐसा अनुमान कौशल है तो उसे प्रश्न करनेकी क्या आवश्यकता थी, उसने स्वयं ही [ अनुमान करके ] क्यों नहीं जान लिया? समाधान- यह ठीक है; तथापि लिङ्ग ओोर लिङ्गी [ अर्थात् व्यापक गौर व्याप्य ] के सम्बन्धविशेषों को अत्यन्त सूक्ष्मताके कारण वह उन्हें अनेकों विद्वानोंके लिये भी दुर्बोध समझता है, एककी तो बात ही क्या है; इसीसे धर्म- जैसे सूक्ष्म विषयका निर्णय करनेके लिये परिषद्व्यापार ( अनेकोंकी गोष्ठी ) की अपेक्षा होती है तथा विशिष्ट पुरुषकी भी अपेक्षा होती है । कम - से - कम दश पुरुषोंको

पृष्ठ 888

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८७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ परिषद्, त्रयो वैको वेति; तस्माद् । यद्यप्यनुमान कौशलं राज्ञः, तथा पि तु युक्तो याज्ञवल्क्यः प्रष्टुम्, विज्ञान कौशलतारतम्योपपत्तेः पुरुषाणाम् । अथवा श्रुतिः स्वयमेव आख्यायिकाव्याजेन अनुमान-मार्गमुपन्यस्य अस्मान् बोधयति पुरुषमतिमनुसरन्ती । याज्ञवल्क्योऽपि जनकाभि-प्रायाभिज्ञतया व्यतिरिक्तमात्म-ज्योतिर्बोधयिष्यन् जनकं व्यति-रिक्तप्रतिपादकमेव लिङ्गं प्रति -पेदे, यथा- प्रसिद्धमादित्यज्यो-तिः सम्राडिति होवाच । कथम्? श्रादित्येनैव स्वावयव-संघातव्यतिरिक्तेन चक्षुषोऽनु-ग्राहकेण ज्योतिषायं प्राकृतः पुरुष आस्ते उपविशति, पन्ययते पर्येति क्षेत्रमरण्यं वा तत्र गत्वा कर्म कुरुते, विपल्येति विपर्येति च यथागतम् अत्यन्तव्यतिरिक्तज्यो-परिषद् होती है, तथा । सदाचार- " सम्पन्न ] तीन पुरुषोंकी और [ अध्यात्मनिष्ठ ] एक पुरुषकी भी परिषद् हो सकती है । इ यद्यपि राजामें अनुमान करने कुशलता है, तो भी याज्ञवल्क्यसे पूछना ' उचित ही है; क्योंकि पुरुषों-के विज्ञान और कौशलका तो तारतम्य होना सम्भव है । अथवा पुरुषकी बुद्धिका अनु-सरण करनेवाली श्रुति आख्या-काके मिषसे अनुमान के मार्गका उल्लेख करके हमें स्वयं ही बोघ करा रही है । [ इसमें राजा अथवा मुनि किसीकी भी बुद्धिकी कुशलता अभिप्रेत नहीं है ] | जनकके अभिप्रायको जानने-वाले होनेसे याज्ञवल्क्यजीने भी देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका बोध करानेके लिये जनकको व्यति-रिक्त ज्योतिका प्रतिपादक लिङ्ग ही बतलाया; यथा - हे सम्राट्! वह प्रसिद्ध आदित्य ज्योतिवाला है, ऐसा उन्होंने कहा । किस प्रकार आदित्य ज्योतिवाला है? [ सो बतलाते हैं- ] यह प्राकृत पुरुष अपने अवयवसंघातसे व्यति-रिक्त नेत्रेन्द्रियके अनुग्राहक आदित्य-के द्वारा ही बैठता, इधर - उधर क्षेत्र या जंगलमें जाता, वहाँ जाकर कर्म - करता और जैसे गया था, वैसे आता है । पुरुषके अत्यन्त व्यतिरिक्त ज्योतिष्ट्र की

पृष्ठ 889

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[ अध्याय ४ -, तथा [ सदाचार-न पुरुषोंकी ओर ] एक पुरुषकी भी कती है । इसलिये अनुमान करनेकी भी याज्ञवल्क्यसे ही है; क्योंकि पुरुषों-र कौशलका तो सम्भव है | की बुद्धिका अनु-ली श्रुति आख्या-अनुमान के मार्गका हमें स्वयं ही बोघ [ इसमें राजा अथवा श्री बुद्धिकी कुशलता है ] । अभिप्रायको जानने-याज्ञवल्क्यजीने भी रिक्त आत्मज्योतिका लिये जनकको व्यति-प्रतिपादक लिङ्ग यथा - हे सम्राट्! दित्य ज्योतिवाला I कहा । आदित्य ज्योतिवाला नाते हैं- ] यह प्राकृत वयवसंघातसे व्यति-[ 5 ] अनुग्राहक आदित्य-बेठता, इधर - उधर में जाता, वहाँ जाकर र जैसे गया था, आता है । पुरुषके तिरिक्त ज्योतिष्ट्रकी ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ तिष्ट्वप्रसिद्धताप्रदर्शनार्थम् अनेक

विशेषणम्; बाह्यानेकज्योति: -प्रदर्शनं च लिङ्गस्याव्यभिचारि-त्वप्रदर्शनार्थम् ।

एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥

८७ NNNA | प्रसिद्धता प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ अनेक विशेषण दिये गये हैं 1 । और बाह्य अनेक ज्योतियोंका प्रदर्शन लिङ्गका अव्यभिचारित्व प्रदर्शित करने के लिये है । [ जनक - ] ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ २ ॥

२ - चन्द्रज्योति अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसै-वायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येव-मेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ [ जनक - ] ' हे याज्ञवल्क्य! किस ज्योतिवाला होता है? ' [ उसकी ज्योति होता है, चन्द्रमारूप उधर जाता, कर्म करता और लौट यह बात ऐसी ही है ' ॥ ३ ॥

तथास्तमिते श्रादित्ये याज्ञ-वल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य ज्योतिः ॥ ३ ॥

॥ आदित्यके अस्त हो जानेपर यह पुरुष याज्ञवल्क्य - ] ' उस समय चन्द्रमा ही ज्योतिके द्वारा ही यह बैठता, इधर-आता है । ' [ जनक - ] ' हे याज्ञवल्क्य! ' तथा आदित्य के अस्त होनेपर हे याज्ञवल्क्य! यह पुरुष किस | ज्योतिवाला होता हे? ' ' चन्द्रमा ही इसकी ज्योति होता है ' ॥ ३ ॥

३- अग्निज्योति अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तं-मिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योति-

पृष्ठ 890

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८७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ र्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! आदित्य के अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है? ' ' अग्नि ही इसकी ज्योति होता है । यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर - उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है । ' ' हे याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ ४ ॥

अस्तमिते श्रादित्ये चन्द्रमस्य- आदित्य अस्त होनेपर और चन्द्रमाके अस्त होनेपर अग्नि स्तंमितेऽग्निर्ज्योतिः ॥ ४ ॥ ज्योति होता है ॥ ४ ॥।

४ - वाग्ज्योति अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इतिवागे वास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद् वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर और अग्निके शान्त होनेपर ही इसकी ज्योति होती है । उघर जाता, कर्म करता अपना हाथ भी नहीं जाना ही है ' ॥ ५ ॥

शान्तेऽग्नौ वाग्ज्योतिः; यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है? ' ' वाकू यह वाक्रूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-और लौट आता है । इसीसे हे सम्राट्! जहाँ जाता, वहां ज्यों ही वाणीका उच्चारण किया ता है । ' ' हे याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी वागिति | अग्निके शान्त होनेपर वाक् ज्योति है । ' वाकू ' इस शब्द शब्दः परिगृह्यते; शब्देन विष- शब्द ग्रहण किया जाता है; शब्द-