बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 891–900
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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[ अध्याय ४ यते कर्म कुरुते तथा चन्द्रमाके अस्त ग्नि ही इसकी ज्योति र - उधर जाता, कर्म ऐसी ही है ' ॥४ ॥
अस्त होनेपर और न होनेपर अग्नि 118 11 न्द्रमस्यस्तमिते इतिवागे वास्य नेपल्ययते कर्म s पि यत्र स्वः चरत्युपैव तत्र द्रमा अस्त होनेपर ला होता है? ' ' वाक् ारा ही बैठता, इधर-सीसे हे सम्राट्! जहां णीका उच्चारण किया य! यह बात ऐसी शान्त होनेपर वाक् ‘ वाक् ’ इस शब्दसे या जाता है; शब्द-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ येण श्रोत्रमिन्द्रियं दीप्यते; श्रोत्रेन्द्रिये सम्प्रदीप्ते मनसि विवेक उपजायते; तेन मनसा बाह्यां चेष्टां प्रतिपद्यते - “ मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति " ( बृ ० उ ० १ । ५ । ३ ) इति ब्राह्मणम् । कथं पुनर्वाग्ज्योतिरिति वाचो , ज्योतिष्ट्रमप्रसिद्धमित्यत आह-तस्माद् वै सम्राड् यस्माद् वाचा ज्योतिषानुगृहीतोऽयं पुरुषो व्यवहरति, तस्मात् प्रसिद्ध-मेतद् वाचो ज्योतिष्ट्वम्; कथम्? अपि - यत्र यस्मिन् काले प्रावृषि प्रायेण मेघान्धकारे सर्वज्योतिः प्रत्यस्तमये स्वोऽपि पाणिर्हस्तो न विस्पष्टं निर्ज्ञायते - अथ तस्मिन् काले सर्वचेष्टानिरोधे । प्राप्ते बाह्यज्योतिषोऽभावाद् यत्र वागुच्चरति, श्वा वा भषति, गर्दभो वा रौति, उपैव तत्र न्येति - तेन शब्देन ज्योतिषा श्रोत्रमन सोनैरन्तर्यं भवति, तेन ज्योतिष्कार्यत्वं वाक् प्रतिपद्यते, तेन वाचा ज्योतिषोपन्येत्येव- -८७७ ! रूप विषयसे श्रोत्रेन्द्रिय दीप्त होती है; श्रोत्रेन्द्रियके सम्यक् प्रकारसे दीप्त होनेपर मनमें विवेक उत्पन्न होता है; उस मनसे बाह्य चेष्टाका अनुभव करता है; " मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है " ऐसा प्रथम अध्यायक पञ्चम ब्राह्मणका कथन है । किंतु वाक् किस प्रकार ज्योति है? वाक्का ज्योति होना तो प्रसिद्ध नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है; —इसीसे हे सम्राट्! चूंकि यह पुरुष वाणीरूप ज्योति से अनुगृहीत होकर व्यवहार करता है, इसलिये इस वाणीका ज्योति होना प्रसिद्ध है । किस प्रकार? [ सो बतलाते हैं - ] जव - जिस समय वर्षाकालमें मेघके अन्धकार में प्राय: समस्त ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर अपने हाथका भी स्पष्टतया भान नहीं होता, उस समय समस्त चेष्टाओंका निरोध प्राप्त होने पर बाह्यज्योतियोंका अभाव होनेसे जहाँ वाणीका उच्चारण होता है, कुत्ता भोंकता है अथवा गघा रेंकता है वहीं उसके समीप पुरुष चला जाता है; उस शब्दरूप ज्योति-से श्रोत्र ओर मनकी निरन्तरता हो जाती है, इससे वाक् ज्योतिकी
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८७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ उपगच्छत्येव तत्र संनिहितो । भवतीत्यर्थः तत्र च कर्म कुरुते, विपल्येति । तत्र वाग्ज्योतिषो ग्रहणं गन्धादीनामुपलक्षणार्थम् गन्धादिभिरपि हि घ्राणादिष्वनु-गृहीतेषु प्रवृत्तिनिवृत्त्यादयो भवन्तिः तेन तैरप्यनुग्रहो भवति कार्यकरणसंघातस्य; एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥
कार्यताको प्राप्त हो जाती है, तात्पर्य यह है कि उस वाणीरूप ज्योति पुरुष उपन्येति समीप जाता अर्थात निकटवर्ती हो जाता है और वह कर्म करता तथा पुनः लौट आता है । जहाँ वाक्रूप ज्योतिका ग्रहण गन्धादिके उपलक्षणके लिये है; गन्धादिके द्वारा भी प्राणादिके अनुगृहीत होनेपर प्रवृत्ति और निवृत्ति आदि होते हैं; अत: उनसे भी देहेन्द्रियसंघातका अनुग्रह होता है; [ जनक - ] ' हे याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है ' ॥ ५ ॥
५ - श्रात्मज्योति अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्त-मिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योति -5 वास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥
' हे याज्ञवल्क्य! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर, अग्निके शान्त होनेपर और वाक्के भी शान्त होनेपर यह पुरुष किस व ज्योतिवाला रहता है? ' ' आत्मा ही इसकी ज्योति होता है । यह आत्म-ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर - उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है ' ॥ ६ ॥ न
शान्तायां पुनर्वाचि, गन्धादि - वाणीके शान्त हो जानेपर तथा गन्धादि बाह्य अनुग्राहकोंके भी दव ष्वपि च शान्तेषु बाह्येष्वनुग्राह- निवृत्त हो जानेपर इस पुरुषको रि केषु, सर्वप्रवृत्तिनिरोधः प्राप्तोऽस्य सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंका निरोध प्राप्त होता
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[ अध्याय ४ न हो जाती है, तात्पर्य वाणीरूप ज्योतिसे समीप जाता अर्थात् जाता है और वह कर्म लौट आता है । रूप ज्योतिका ग्रहण पलक्षण के लिये है; रा भी प्राणादिके नेपर प्रवृत्ति और होते हैं; अत: उनसे घातका अनुग्रह होता ] ' हे याज्ञवल्क्य! यह है ' ॥ ५ ॥
चन्द्रमस्यस्त-कँ ज्योतिरेवायं मनैवायं ज्योति-न्ति ॥ ६ ॥
द्रमा अस्त होनेपर, होनेपर यह पुरुष किस होता है । यह आत्म-करता और फिर लौट शान्त हो जानेपर तथा. ह्य अनुग्राहकोंके भी जानेपर इस पुरुषकी योंका निरोध प्राप्त होता ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ ९ पुरुषस्य । एतदुक्तं भवति- है । यहाँ यह कहा गया है-जाग्रद्विषये बहिर्मुखानि करणानि जिस समय जाग्रत् अवस्थामें आदि-चक्षुरादीन्यादित्यादिज्योतिर्भिर- त्यादि ज्योतियोंसे अनुगृहीत होने-नुगृह्यमाणानि यदा तदा वाली चक्षु आदि इन्द्रियाँ बहिर्मुख स्फुट-तरः संव्यवहारोऽस्य होती हैं, उस समय इस पुरुषका पुरुषस्य भवतीति एवं तावज्जागरिते स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्य पुरुषस्य दृष्ट्वा तस्मात्ते वयं मन्या-महे— सर्व बाह्यज्योतिःप्रत्यस्तम -ये s पि स्वप्नसुषुप्तिकाले जागरिते च तादृगवस्थायां स्वावयवसंघात -व्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योति-कार्यसिद्धिरस्येति, दृश्यते.च स्वप्ने ज्योतिष्कार्यसिद्धिः -बन्धुसंगमन वियोगदर्शनं देशा-न्तरगमनादि च; सुषुप्ताच्चोत्था-नम् - सुखमहमस्वाप्तं न किञ्चि-दवेदिषमिति तस्मादस्ति व्यति-रिक्तं किमपि ज्योतिः । व्यवहार स्पष्टतर होता है; इस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें तो इस पुरुषके ज्योतिसम्बन्धी कार्योंकी सिद्धि अपने अवयवसंघात से व्यति-रिक्त ज्योतिके द्वारा ही देखी गयी है; अतः हम समझते हैं कि स्वप्न और सुषुप्तिकालमें सम्पूर्णं बाह्य. ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर तथा जाग्रत्कालमें भी ऐसी अवस्था आनेपर अपने अवयवसंघातसे व्यति-रिक्त ज्योतिके द्वारा ही इस पुरुष-के ज्योतिसम्बन्धी कार्यकी सिद्धि होती है; स्वप्न में बन्धुओंके संयोग-वियोग दिखायी देने और देशान्तर-में जाने आदि ज्योतिके कार्योंकी सिद्धि देखी ही जाती है; इसी प्रकार सुषुप्तिसे उठना और ' मैं सुखसे सोया उस समय कुछ भी भान नहीं रहा ' ऐसा अनुभव भी देखा ही जाता है । अत: व्यतिरिक्त ज्योति है ।
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८८० बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय किं पुनस्तच्छान्तायां वाचि ज्योतिर्भवति १ इत्युच्यते-आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीति । आत्मेति कार्यकरणस्त्रावयवसं घातव्यतिरिक्तं कार्यकरणावभा-सकम्, आदित्यादिबाह्यज्योति वंद स्वयमन्येनानवभास्यमान-मभिधीयते ज्योतिः; अन्तःस्थं च तत् पारिशेष्यात् — कार्यकर-णव्यतिरिक्तं तदिति तावत् सिद्धम्; यच्च कार्यकरणव्यति-रिक्तं कार्यकरणसंघातानुग्राहकं च ज्योतिस्तद् वाद्यैश्चक्षुरादिक रणैरुपलभ्यमानं दृष्टम्; न तु तथा तच्चक्षुरादिभिरुपलभ्यते, आदित्यादिज्योतिः षूपरतेषु कार्यं तु ज्योतिषो दृश्यते यस्मात्, तस्मादात्मनैत्रायं ज्यो-तिषा आस्ते पन्ययते कर्म कुरुते विपन्येतीति; तस्मान्नून-मन्तःस्थं ज्योतिरित्यवगम्यते । किं च आदित्यादिज्योतिर्वि-लक्षणं तदभौतिकं च स एव ४ किंतु उस वाणीके शान्त होने-पर कौन ज्योति होती है? सो बतलाया जाता है - उस समय आत्मा ही इस पुरुषकी ज्योति होता है । आत्मा - यह देहेन्द्रियरूप अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त, देह और इन्द्रियोंका अवभासक तथा आदित्यादि बाह्य ज्योतियोंके समान स्वयं किसी अन्यसे भासित न होने-वाली ज्योति कहा जाता है । तथा [ किन्हीं बाह्य ज्योतियोंमें न होने के कारण ] वह पारिशेष्य न्यायसे अन्तःस्थ है; वह देह और इन्द्रियोंसे भिन्न है — यह तो सिद्ध ही हो चुका है; और जो ज्योति देहेन्द्रियसे भिन्न तथा देहेन्द्रियसंघातकी उपकारक होती है, वह नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे उपलब्ध होती देखी जाती है; किंतु आदित्यादि ज्योतियोंके निवृत्त हो जानेपर यह आत्मा उनकी तरह चक्षु आदिसे उपलब्ध नहीं होता; किंतु तो भी चूँ कि ज्योतिका कार्य देखा ही जाता है, इसलिये यह पुरुष आत्मज्योतिसे हा इधर उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है; अतः यह ज्ञात होता है कि निश्चय अन्तःस्थ ज्योति है; यही नहीं, वह आदित्यादि ज्योतियोंसे विलक्षण और अभौतिक भी है; यही
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[ अध्याय४ उस वाणीके शान्त N होते. ज्योति होती है? सो जाता है - उस समय इस पुरुष की ज्योति होता —यह देहेन्द्रियरूप अपने T तसे व्यतिरिक्त, देह योंका अवभासक तथा बाह्य ज्योतियोंके समान अन्यसे भासित न होने-ति कहा जाता है । तथा ज्योतियोंमें न होने-] वह पारिशेष्य न्यायसे ; वह देह और इन्द्रियोंसे यह तो सिद्ध ही हो चुका ज्योति देहेन्द्रियसे भिन्न न्द्रियसंघातकी उपकारक नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे ती देखी जाती है; किंतु द ज्योतियों के निवृत्त हो व्ह आत्मा उनकी तरह से उपलब्ध नहीं होता; चूकि ज्योतिका कार्य जाता है, इसलिये यह त्मज्योतिसे ही बैठता, जाता, कर्म करता और आता है; अत: यह ज्ञात कि निश्चय ही आत्मा ज्योति है; यही नहीं, दित्यादि ज्योतियोंसे और अभौतिक भी है । यही ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ हेतुर्यञ्चचुराद्यग्राह्मस्वम्, आदि-त्यादिवत् । न, समानजातीयेनैवोपकार-आत्मज्योतिषो- दर्शनात्– यदादि-ऽन्यज्योतिर्वैलक्ष- त्यादिवित्तत्क्षणं ष्ये आक्षेपः ज्योतिरान्तरं सिद्ध-मिति, एतदसत् कस्मात् १ उपक्रियमाणसमानजातीयेनैव आदित्यादिज्योतिषा कार्यकरण-संघातस्य भौतिकस्य भौतिकेनै-वोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; यथादृष्टं चेदमनुमेयम्; यदि नाम कार्य करणादर्थान्तरं तदुप -कारकमादित्यादिवज्ज्योतिः, तथापि कार्यकरणसंघात समान-जातीयमेवानुमेयम्, कार्यकरण-संघातोपकारकत्वात्, आदित्या-दिज्योतिर्वत् । यत् पुनरन्तः-स्थत्वादप्रत्यक्षत्वाच्च वैलक्षण्य-मुच्यते, तच्चक्षुरादिज्योतिर्भिरनै-कान्तिकम्; यतोऽप्रत्यक्षाण्यन्तः स्थानि च चक्षुरादिज्योतींषि भौतिकान्येव । तस्मात्तव मनो-८८१ | कारण है कि वह आत्मज्योति आदित्यादिके समान चक्षु आदिसे ग्राह्य नहीं है । पूर्व ० - यह नहीं हो सकता, क्योंकि समान जातिवाले पदार्थसे ही उपकार होता देखा जाता है, | आदित्यादिसे भिन्न जो आन्तर ज्योति सिद्ध की गयी है, वह ठीक नहीं है; क्यों? क्योंकि जिनका उपकार किया जाता है, उन भौतिक देहेन्द्रियसंघातका अपने समान जातिवाले भौतिक आदि-त्यादि ज्योतिसे ही उपकार होता देखा जाता है; और जैसा देखा गया है, वैसा ही इसका अनुमान करना चाहिये । यदि देह और इन्द्रियोंकी उपकारक ज्योति आदि-त्यादिके समान उनसे कोई भिन्न पदार्थ है, तो भी उसे देहेन्द्रिय-संघातसे समान जातिवाली ही अनुमान करनी चाहिये; क्योंकि आदित्यादि ज्योतियोंके समान वह देहेन्द्रियसंघातका उपकार करने-वाली है । इसके सिवा अन्तःस्थ और अप्रत्यक्ष होनेके कारण जो उसकी विलक्षणता बतलायी जाती है, वह तो नेत्रादि ज्योतियोंके द्वारा व्यभिचरित है; क्योंकि अप्रत्यक्ष और अन्तःस्थ होनेपर भी नेत्रादि ज्योतियां भौतिक ही हैं । अत: ‘ आत्म-वृ ० उ ० ५६-
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८८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय रथमात्रम् - विलक्षणमात्मज्योतिः । सिद्धमिति । कार्यकरणसंघात भावभावित्वा-आत्मनः संघात- च्च संघातधर्मस्त्रम् साधम्यें युक्त्य- अनुमीयते ज्योतिषः न्तरम् सामान्यतो दृष्टस्य चानुमानस्य व्यभिचारित्वादप्रा-माण्यम्; सामान्यतो दृष्टबलेन । ४ ज्योति इनसे विलक्षण सिद्ध होता है ' ऐसा कहना है- यह तुम्हारी मनमानी कल्पनामात्र है । इसके सिवा देहेन्द्रियसंघात के रहने पर ही रहती है, इसलिये यह चैतन्यज्योति [ रूप आदिके समान ] संघातका ही धर्मं है, ऐसा भी बन-मान होता है । सामान्यतो दृष्ट अनु-मौन व्यभिचारी होता है, इसलिये उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती । आप सामान्यतो दृष्ट अनुमानके बलसे ही तो १. अनुमान वाक्य इस प्रकार है— चैतन्यं शरीरधर्मः, तद्भावभावित्वात्, रूपवत् । २. अनुमान साधारणतः तीन प्रकारका होता है-- १. पूर्ववत्, २. शेषवत् और ३. सामान्यतो दृष्ट । कारण देखकर जो कार्यका अनुमान किया जाता है, वह ' पूर्ववत् ' है, जैसे मेघको घिरी हुई घटा देखकर वृष्टिका अनुमान । कार्यं देखकर जो कारणका अनुमान होता है, वह ' शेषवत् ' कहलाता है; जैसे नदीमें बाढ़ आयी देखकर पर्वतपर वृष्टि होनेका अनुमान । तथा प्रत्यक्षमूलक साधारण नियम या व्याप्तिके अनुसार जो परोक्षवस्तुका अनुमान किया जाता है, वह सामान्यतो दृष्ट अनुमान है; जैसे प्रत्येक कार्यका एक कर्ता देखा जाता है, चूंकि यह जगत् भी एक कार्य है, अत: इसका भी एक कतां अवश्य होगा । जो इसका कर्ता है, वहीं ईश्वर है । यहाँ ' विमतं चैतन्यज्योतिः संघाताद् भिन्नम् तद्भासकत्वात् आदित्यादि-वत् ' ( विवादको विषयभूत चैतन्यज्योति संघातसे भिन्न है; क्योंकि यह संघातको प्रकाशित करनेवाली है, जैसे आदित्य ) – इस प्रकार ' प्रकाशक प्रकाश्यसे भिन्न होता है, इस व्याप्तिके अनुसार परोक्ष ' चैतन्यज्योति ' को संघातसे भिन्न सिद्ध किया जा रहा है; अतः यह सामान्यतो दृष्ट अनुमान है । ३. नेत्र देहका प्रकाशक होकर भी देहसे पृथक नहीं है; अतः संघातकी प्रकाशिका होनेके कारण जो चैतन्यज्योतिको संघातसे भिन्न सिद्ध करते हैं, उनका यह हेतु नेत्र प्रादिके विषय में अनैकान्तिक ( व्यभिचरित ) हो गया है - इसी युक्ति से पूर्वपक्षीने सामान्यतो दृष्ट अनुमानको व्यभिचारी कहा है ।
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[ अध्याय४ से विलक्षणहै — यह है ' ऐसा कहना तुम्हारी -ल्पनामात्र है । सिवा देहेन्द्रियसंघात के रहती है, इसलिये यह [ रूप आदिके समान ] धर्म है, ऐसा भी अनु-है । सामान्यतो दृष्ट अनु-चारी ' होता है, इसलिये णिकता स्वीकार नहीं ती । आप सामान्यतो नके बलसे हो तो धर्मः, तद्भावभावित्वात्, -- १. पूर्ववत्, २. शेषवत् अनुमान किया जाता है, अनुमान । कार्यं देखकर ; जैसे नदीमें बाढ़ आयी मुलक साधारण नियम या ता है, वह सामान्यतो दृष्ट चा है, चूँकि यह जगत् भी जो इसका कर्ता है, वही दभासकत्वात् आदित्यादि-है; क्योंकि यह संघातको प्रकाशक प्रकाश्यसे भिन्न को संघातसे भिन्न सिद्ध नहीं है; श्रतः संघातकी न्न सिद्ध करते हैं, उनका रत ) हो गया है - इसी कहा है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३ हि भवानादित्यादिवद् व्यति - | आदित्यादिके समान ज्योतिको देह रिक्तं ज्योतिः साधयति कार्य- और इन्द्रियोंसे भिन्न सिद्ध करते करणेभ्यः न च प्रत्यक्षमनुमानेन हैं; किंतु अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाधितुं शक्यते; अयमेव वाध नहीं हो सकता; यह देहेन्द्रिय-तु कार्य- संघात ही तो प्रत्यक्ष देखता, सुनता, करणसंघातः प्रत्यक्षं पश्यति शृणोति मनुते विजानाति च; यदि नाम ज्योतिरन्तरमस्योप-कारकं स्यादादित्यादिवत्, न तदात्मा स्यात्, ज्योतिरन्तरम्, आदित्यादिवदेवः य एव तु प्रत्यक्षं दर्शनादिक्रियां करोति स एवात्मा स्यात् कार्यकरण-संघातः, नान्यः, प्रत्यक्षविरोघे-ऽनुमानस्याप्रामाण्यात् । नन्वयमेव चेदर्शनादिक्रिया-यथोक्तयुक्तेरनै - कर्ता आत्मा संघातः कान्तिकत्वम् कथमविकलस्यैवास्य दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वं कदाचिद् भवति कदाचिन्नेति । नैष दोषः, दृष्टत्वात्; न हि तन्निरासपूर्वकं दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, स्वभावस्य निमित्तत्व- नि- न हि खद्योते प्रका-निरूपणम् शाप्रकाशकत्वेन मनन करता और विशेषरूपसे जानता है; यदि आदित्यादिके समान इसका उपकार करनेवाली कोई अन्य ज्योति हो तो वह आत्मा नहीं हो सकती, अपितु आदित्यादिके समान ही कोई अन्य ज्योति होगी } जो भी प्रत्यक्ष दर्शनादि कर्म करता है, वह देहेन्द्रियसंघात ही आत्मा होना चाहिये, कोई दूसरा नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं हो सकती । सिद्धान्ती - किंतु यदि यह संघात ही दर्शनादि क्रियाओंका करने-वाला आत्मा हो तो ऐसा क्यों होता है कि इसमें कोई विकार न आनेपर भी कभी तो इसमें दशैँ-नादि क्रियाओंका कर्तृत्व रहता है और कभी नहीं रहता है? पूर्व ० – यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा देखा गया है और देखी हुई बातमें अनुपपत्ति नहीं होती; खद्योतको प्रकाशक और.
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८८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय दृश्यमाने कारणान्तरमनुमेयम् । अनुमेयत्वे च केनचित् सामा-न्यात् सर्वं सर्वत्रानुमेयं स्यात् तच्चानिष्टम्; न च पदार्थ स्व-भावो नास्ति न ह्यग्नेरुष्णस्वा-भाव्यम् अन्यनिमित्तम्, उदकस्य वा शैत्यम् ॥ प्राणिधर्माधर्माद्य-पेक्षमिति चेत्; धर्माधर्मादेर्निमि-तान्तरापेक्षस्वभावप्रसङ्गः अस्त्विति चेत्, न; तदनवस्था-प्रसङ्गः स चानिष्टः । न, स्वप्नस्मृत्योर्दृष्टस्यैव दर्श-स्वभाववादि- नात् — यदुक्तं स्व-पक्षनिरसनम् भाववादिना देह-स्यैव दर्शनादिक्रिया न व्यति-रिकस्येति, तन्न यदि हि देहस्यैव दर्शनादिक्रिया स्वप्ने दृष्टस्यैव दर्शनं न स्यात्; अन्धः स्वप्नं पश्यन् दृष्टपूर्वमेव पश्यति ४ अप्रकाशकरूपसे देखने में किसी अन्य कारणका अनुमान नहीं करना चाहिये; यदि किसीसे समा-नता होनेके कारण उसके विषय में भी अनुमान किया जाय तब तो सब जगह सबके विषय में अनुमान ही करना होगा; और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि पदार्थका कोई स्वभाव ही न हो - ऐसी बात नहीं है; अग्निका उष्णस्वभाव होना अथवा जलका शीतल होना किसी अन्य कारणसे नहीं है । यदि कहो कि स्वभाव भी प्राणियोंके धर्माधर्मकी अपेक्षासे होता है, तो धर्माधर्मादिका भी किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा रखनेवाला स्वभाव माननेका प्रसङ्ग होगा । यदि कहो कि होने दो, तो यह ठोक नहीं; क्योंकि इससे अनवस्था-का प्रसङ्ग होगा और वह इष्ट नहीं है । सिद्धान्ती - तुम्हारा कथन ठीक नहीं है, क्योंकि स्वप्न और स्मृतिमें देखे हुएका ही दर्शन होता है - स्वभाववादीने जो कहा कि दर्शनादि क्रिया देह ही हैं, उससे भिन्नके नहीं हैं, सो ऐसी बात नहीं है; यदि दर्शनादि क्रिया देहकी ही होती तो स्वप्नमें देखे हुएको ही न देखा जाता । अन्धा पुरुष स्वप्न देखने के | समय पहले देखे हुए पदार्थों-
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[ श्रध्याय४ रूपसे देखने में किसी णका अनुमान नहीं हिये; यदि किसी से समा-कारण उसके विषयमें - किया जाय तब तो के विषय में अनुमान होगा; और यह इष्ट = योंकि पदार्थका कोई - न हो- ऐसी बात अग्निका उष्णस्वभाव T जलका शीतल होना कारणसे नहीं है । यदि भाव भी प्राणियों के अपेक्षासे होता है, तो का भी किसी अन्य अपेक्षा रखनेवाला नेका प्रसङ्ग होगा । कि होने दो, तो यह क्योंकि इससे अनवस्था-होगा और वह इष्ट ती - तुम्हारा कथन , क्योंकि स्वप्न और हुएका ही दर्शन स्वभाववादीने जो कहा दक्रिया देहके ही हैं, नके नहीं हैं, सो ऐसी है; यदि दर्शनादि ही होती तो स्वप्नमें ही न देखा जाता । ष स्वप्न देखनेके - देखे हुए पदार्थों-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८८५ न शाकद्वीपादिगतमदृष्टरूपम्; | को ही देखता है, जिन्हें पहले कभी ततश्चैतत् सिद्धं भवति - यः स्वप्ने नहीं देखा, उन शाकद्वीपादिके पश्यति दृष्टपूर्वं वस्तु, स एव पूर्वं विद्यमाने चक्षुष्यद्राक्षीत्, न देह इति, देहश्चेद् द्रष्टा, स येनाद्राक्षीत् तस्मिन्नुते चक्षुषि स्वप्ने तदेव दृष्टपूर्वं न पश्येत् अस्ति च लोके प्रसिद्धि: - पूर्वं दृष्टं मया हिमवतः शृङ्गमद्याहं स्वप्नेऽद्राक्षमित्युद्घृत चक्षुपाम-न्धानामपि; तस्मादनुद्धृतेऽपि चक्षुषि यः स्वप्नदृक् स एव द्रष्टा, न देह इत्यवगम्यते । तथा स्मृती - द्रष्टृस्मत्रों रेकत्वे घण्टु देहेन्द्रियादि- सति य एव द्रष्टा । व्यतिरिक्तत्वम् स एव स्मर्ता; यदा चैवं तदा निमीलिता-क्षोऽपि स्मरन् दृष्टपूर्व यद् रूपं तद् दृष्टवदेव पश्यतीति तस्माद् यन्निमीलितं तन्न । द्रष्टृ यन्निमीलिते चक्षुषि पदार्थों को नहीं देखता; इससे यह सिद्ध होता है कि स्वप्तमें जो पहले देखे हुए पदार्थोंको देखता है, उसीने पहले नेत्रोंके रहते हुए उन पदार्थोंको देखा था, देहने नहीं; यदि देह ही देखनेवाला होता तो जिनके द्वारा उसने पहले देखा था | उन नेत्रोंके निकाल लिये जानेपर उन पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें न देखता; किंतु जिनके नेत्र निकाल लिये गये हैं, उन अन्धोंके विषयमें भी लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है कि आज स्वप्न में मैंने पहले देखा हुआ हिमालयका शिखर देखा । इससे यह ज्ञात होता है कि जो स्वप्न देखनेवाला है, वही नेत्रों न निकालनेपर भी द्रष्टा है, देह द्रष्टा नहीं है | इसी प्रकार स्मरणमें समझना चाहिये - द्रष्टा और स्मरण करनेवाले-की एकता होनेपर जो द्रष्टा होता है, वही स्मरण करनेवाला होता है । जब कि ऐसी बात है तभी आँख मूंदकर स्मरण करनेवाला भी जो पहले देखा हुआ रूप है, उसे देखे हुएके समान ही देखता है; अतः जिन्हें मूद रखा है, वे नेत्र द्रष्टा नहीं
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८८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय स्मरद्रूपं पश्यति तदेवानि - । मीलितेऽपि चक्षुषि द्रष्टृ आसी-दित्यवगम्यते । मृते च देहेऽविकलस्यैव च रूपादिदर्शनाभावात् – देहस्यैव द्रष्टृत्वे मृतेऽपि दर्शनादिक्रिया स्यात् । तस्माद् यदपाये देहे दर्शनं न भवति, यद्भावे च भवति, तद् दर्शनादिक्रियाकर्तृ न देह इत्यवगम्यते । चक्षुरादीन्येव दर्शनादिक्रिया-कर्तृणीति चेन्न, यदहमद्राक्षं तत् स्पृशामीति भिन्नकर्तृकत्वे प्रतिसंधानानुपपत्तेः मनस्तद्दति चेन्न, मनसोऽपि विषयत्वाद् रूपादिवद् द्रष्टृत्वाद्यनुपपत्तिः । तस्मादन्तःस्थं व्यतिरिक्तमा-दित्यादिवदिति सिद्धम् । ४ हैं, जो नेत्रोंके मूदनेपर स्मरण किये जानेवाले रूपको ' देखता है, वही नेत्रोंके न मूंदनेपर भी द्रष्टा था - ऐसा जाना जाता है । इसके सिवा शरीरके मर जाने-पर उसमें कोई विकार न होनेपर भी वह रूपादिका दर्शन नहीं करता — यदि देह ही द्रष्टा होता तो उसके मरनेपर भी उसमें दर्शनादि क्रिया होती । अतः जिसके देहमें न रहनेपर दर्शन नहीं होता और रहनेपर होता है, वही दर्शनादि क्रियाका कर्ता है, देह नहीं - ऐसा ज्ञात होता है । यदि कहो कि नेत्रादि इन्द्रियाँ ही दर्शनादि क्रिया करनेवाली हैं, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ वैसी स्थिति में ] दर्शन और स्पर्श भिन्न कर्ताओंकी क्रिया होनेके कारण ' जिसे मैंने देखा था, उसका स्पर्शं करता हूँ ' ऐसा अनुभव नहीं हो सकता था; अच्छा तो, मन ही द्रष्टा है — ऐसा मानें तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि रूप आदिकी भांति विषय ( दृश्य ) होनेके कारण मनका भी द्रष्टा होना सम्भव नहीं है । अतः यह सिद्ध हुआ कि चैतन्य-| ज्योति अन्तःस्थ है और आदि-त्यादिके समान शरीरसे भिन्न है ।