बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 901–910

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

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[ अभ्याय8 के मूंदनेपरस्मरण ले रूपको देखता है, न मूंदनेपर भी द्रष्टा ना जाता है । वा शरीरके मर जाने-कोई विकार न होनेपर पादिका दर्शन नहीं देह ही द्रष्टा होता तो नर भी उसमें दर्शनादि । अतः जिसके देहमें न न नहीं होता और ता है, वही दर्शनादि न है, देह नहीं - ऐसा है । हो कि नेत्रादि इन्द्रियाँ क्रिया करनेवाली हैं, बात नहीं है, क्योंकि तिमें ] दर्शन और स्पर्श ओंकी क्रिया होनेके मैंने देखा था, उसका हूँ ' ऐसा अनुभव नहीं ना; अच्छा तो, मन ही मानें तो यह भी क्योंकि रूप आदिकी ( दृश्य ) होनेके कारण दष्टा होना सम्भव नहीं सिद्ध हुआ कि चैतन्य-तःस्थ है और आदि-न शरीरसे भिन्न है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८७ यदुक्तम् -- कार्य करणसंघात-समानजातीयमेव ज्योतिरन्तर मनुमेयम्, आदित्यादिभिः तत्समानजातीयैरेव उपक्रिय-माणत्वादिति - तदसत्, उप-कार्योपकारकभावस्यानियमदर्श-नात्; कथम्? पार्थिवैरिन्धनैः पार्थिवत्वसमानजातीयैस्तृणोल-पादिभिरग्नेः प्रज्वलनोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; न च तावता तत्समानजातीयैरेवाग्नेः प्रज्वलनोपकारः सर्वत्रानुमेयः स्यात्, येनोदकेनापि प्रज्वल -नोपकारो भिन्नजातीयेन वैद्यु-तस्याग्नेः जाठरस्य च क्रियमाणो दृश्यते; तस्माद् उपकार्योप-कारकभावे समानजातीयासमान-जातीय नियमो नास्ति; कदा- । चित् समानजातीया मनुष्या मनुष्यैरेवोपक्रियन्ते कदा-चित् स्थावरपश्वादिभिश्च मित्र- । ऐसा जो कहा कि देहेन्द्रिय-संघातके समान जातिवाली ही किसी अन्य ज्योतिका अनुमान करना चाहिये, क्योंकि आदित्यादि तथा उसके समानजातीय ज्योतियों-से ही संघातका उपकार होता है, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उप-कार्य - उपकारकभावका कोई नियम नहीं देखा जाता; किस प्रकार? [ सो बतलाते हैं - ] पार्थिव इन्धन-से एवं पार्थिवत्वमें समान जाति-वाले तृण और उलप ( घास ) आदिसे अग्निका प्रज्वलनरूप उप-कार होता देखा जाता है, किंतु इतनेहीसे सर्वत्र ऐसा अनुमान नहीं कर लेना चाहिये कि उनके समान-जातीय पदार्थोंसे ही अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होगा, क्योंकि उनसे भिन्न जातिवाले जलसे भी बिजलीरूप अग्निका तथा पेटके भीतरकी अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है; अत: उपकार्योपकारकभावमें समान-जातीय अथवा असमानजातीय होनेका नियम नहीं है; कभी तो समानजातीय मनुष्य मनुष्योंसे ही उपकृत होते हैं और कभी स्थावर एवं पशु आदि भिन्न जातिवालोंसे ही

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GGS वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय जातीयैः; तस्मादहेतुः कार्य-करणसंघात समानजातीयैरेव श्रादित्यादिज्योतिर्भिरुपक्रियमा णत्वादिति । यत् पुनरात्थ - चक्षुरादि-भिरादित्यादिज्योतिर्वद् अदृश्य -स्वादित्ययं हेतुर्ज्योतिरन्तर -स्यान्तःस्थत्वं वैलक्षण्यं च न साधयति, चक्षुरादिभिरनैकान्ति-कत्वादिति - — तदसत्, चक्षुरादि-करणेभ्योऽन्यत्वे सतीति हेतो-र्विशेषणत्वोपपत्तेः । ४ । उनका उपकार होता है; बतः कार्यकरणसंघातके समानजातीय आदित्यादि ज्योतियोंसे उपकृत होनेके कारण ही आत्मज्योति f संघातके समानजातीय ही होनी चाहिये – यह कोई हेतु नहीं है । स और तुमने जो ऐसा कहा कि आदित्यादिकी ज्योतिके समान चक्षु वि आदि इन्द्रियोंसे दिखायी देनेवाली ज न होनेके कारण [ आत्मज्योति अन्तःस्थ और भिन्न प्रकारकी है ] व - यह हेतु तो चक्षु आदिसे व्यभि-चरित होनेके कारण उस अन्य ज्योतिका अन्तःस्थ और विलक्षण त होना सिद्ध नहीं कर सकता, सो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि द ' चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भिन्न होते हुए ' [ उनसे न दिखायी देनेके कारण आत्मज्योति अन्तःस्थ एवं प्रा विलक्षण है ] इस प्रकार उपर्युक्त हेतुमें विशेषण लगा देनेसे उसकी उपपत्ति हो सकती है । ' १. तात्पर्य यह है कि पहले अनुमानका स्वरूप यों था ' आत्मज्योति: अन्त: - पा स्थम्, आदित्यादिवञ्चक्षुरादिभिरदृश्यत्वात् । ' अर्थात् आत्मज्योति अपने भीतर है, दि क्योंकि वह सूर्य आदिकी भाँति आँखोंसे नहीं दिखायी देती । यह हेतु नेत्रके विषयमें व्यभिचरित था; क्योंकि अपना नेत्र भी अपने ही नेत्रसे नहीं देखा जा स ता । न्य इस दोषको मिटानेके लिये सिद्धान्तीने हेतुमें ' चक्षुरादिकरणॆभ्योऽन्यत्वे सति ' यह विशेषण जोड़ दिया । अब अनुमानका स्वरूप इस प्रकार हो गया — ' आत्मज्योतिः मा अन्तःस्थम्, चक्षुरादिकरणेभ्योऽन्यत्वे सति चक्षुरादिभिरदृश्यत्वात् । ' अर्थात् आत्म-ज्योति अपने भीतर स्थित है; क्योंकि वह चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भिन्न होती हुई आत उन इन्द्रियोंसे देखी नहीं जाती -- ऐसा हेतु माननेपर कहीं भी दोष नहीं आता ।

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[ अध्याय४ कार होता है; अतः तके समानजातीय ज्योतियोंसे उपकृत ण ही आत्मज्योति नजातीय ही होनी कोई नहीं है । जो ऐसा कहा कि ज्योतिके समान चक्षु से दिखायी देनेवाली कारण [ आत्मज्योति भिन्न प्रकारकी है ] चक्षु आदिसे व्यभि 5 कारण उस अन्य न्तःस्थ और विलक्षण नहीं कर सकता, सो ठीक नहीं है, क्योंकि इन्द्रियोंसे भिन्न होते - न दिखायी देनेके ज्योति अन्तःस्थ एवं इस प्रकार उपर्युक्त T लगा देनेसे उसकी कती है । ' ना ' आत्मज्योति: अन्तः-ज्योति अपने भीतर है, । यह हेतु नेत्रके विषय में नहीं देखा जा सन्ता । रणेभ्योऽन्यत्वे सति ' यह हो गया --- ' आत्मज्योतिः यत्वात् । अर्थात् आत्म-न्द्रियोंसे भिन्न होती हुई भी दोष नहीं आता । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ कार्यकरणसंघातधर्मत्वं ज्यो-तिष इति यदुक्तम्, तन्न, अनु-मानविरोधात्; आदित्यादिज्यो-तिर्थत् कार्यकरणसंघातादर्थान्तरं ज्योतिरिति ह्यनुमानमुक्तम्; तेन विरुध्यते इयं प्रतिज्ञा —कार्य-करणसंघात धर्मत्वं ज्योतिष इति । तद्भावभावित्वं त्वसिद्धम्, मृते देहे ज्योतिषोऽदर्शनात् । सामान्यतो दृष्टस्यानुमानस्था-प्रामाण्ये सति पानभोजनादिसर्व-व्यवहारलोपप्रसङ्गः स चानिष्टः पानभोजनादिषु ही क्षुत्पिपासा -दिनिवृत्तिमुपलब्धवतः तत्सामा-न्यात् पानभोजनाद्युपादनं दृश्य-मानं लोके न प्राप्नोति दृश्यन्ते ८८ ९ तथा उस ज्योतिको जो देहे-न्द्रियसंघात के धर्मंवाली बतलाया, | सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अनुमान से विरोध आता है; आदित्यादि ज्योतिके समान यह ज्योति देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न पदार्थ है, ऐसा अनुमान कहा गया है; उस अनुमानसे इस प्रतिज्ञाका कि उस ज्योतिमें देहेन्द्रियसंघातका धर्मत्व है, विरोध आता है; देह तद्भावभावित है [ अर्थात् जबतक देह है, तबतक उसके धर्मरूपसे चैतन्यज्योति भी रहती है ] यह तुम्हारा हेतु तो असिद्ध है, क्योंकि मृत देहमें वह ज्योति नहीं देखी जाती । सामान्यतो दृष्ट अनुमानकी अप्रामाणिकता माननेपर तो भोजन और जलपानादि सभी व्यवहारोंके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; और वह इष्ट नहीं है; क्योंकि तब तो, जल-पान और भोजनादि करनेपर भूख और प्यासकी निवृत्ति देखनेवाले को उसीकी समानतासे लोकमें जलपान और भोजन ग्रहण करते दिखायी देना सिद्ध नहीं हो सकता [ क्योंकि सामान्यतो दृष्ट नियमको वह १ अतः इस हेतुके असिद्ध होनेसे तुम्हारा अनुमान अप्रामाणिक है, इससे आत्मज्योतिको देहेन्दियसंघातका धर्म नहीं सिद्ध किया जा सकता ।

पृष्ठ 904

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८ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ह्युपलब्धपानभोजनाः सामान्यतः । पुनः पानभोजनान्तरैः क्षुत्पि-पासादिनिवृत्तिमनुमिन्वन्तस्ता-दयॆन प्रवर्तमानाः । यदुक्तम् - अयमेव तु देहो दर्शनादिक्रियाकर्तेति, तत् प्रथम-मेव परिहृतं स्वप्नस्मृत्योर्देहा-दर्थान्तरभूतो द्रष्टेति ॥ अनेनैव ज्योतिरन्तरस्य अनात्मत्वमपि प्रत्युक्तम् । यत् पुनः खद्योतादेः कादाचित्कं प्रकाशाप्रकाशकत्वम्, तदसत्, पक्षाद्यवयवसंकोचवि-कामनिमित्तत्वात् प्रकाशाप्रकाश-कत्वस्य । यत् पुनरुक्तम्, धर्मा धर्मयोरवश्यं फलदातृत्वं स्व-भावोऽभ्युपगन्तव्य इति —तद-म्युपगमे भवतः सिद्धान्तद्दानात् । एतेनानवस्थादोषः प्रत्युक्तः । तस्मा अप्रामाणिक लेगा ] किंतु जिन्होंने जलपान और भोजन किया है, वे लोग फिर भी जलपान और भोजन करनेसे क्षुधा - पिपा-सादिकी निवृत्तिका अनुमान करके उसके लिये प्रवृत्त होते देखे ही जाते हैं । ऐसा जो कहा कि यही देह दर्शनादि क्रियाका कर्ता है; इसका तो ' स्वप्न और स्मृतियोंका देहसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा है ' ऐसा कहकर पहले ही परिहार कर गया है । तथा इसीसे [ अर्थात् संघातके द्रष्टृत्वका निराकरण वि करके ] उस अन्य ज्योतिके अना-त्मत्वका भी निषेध कर दिया है. तथा खद्योतका जो कभी प्रकाश- ध कत्व और कभी अप्रकाशकत्व बतलाया, वह भो ठीक नहीं है, क्योंकि वे प्रकाशकत्व और अप्र-काशकत्व तो पंख आदि अवयवों के भी सिकोड़ने और खोलनेके कारण हैं. वृि तथा यह जो कहा कि ' अवश्य वह फल देना ' - यह धर्म और अधर्मका अन स्वभाव ही स्वीकार कर लेना ( द चाहिये; सो ऐसा स्वीकार करने-पर तुम्हारे ही सिद्धान्तकी हानि रूप होगी । और इसीसे ( ( सिद्धान्तमें विरोध होनेके ही कारण ) तुम्हारे. प्रश् द्वारा आशङ्कित अनवस्था - दोषका बी भी निराकरण कर दिया गया । अतः

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[ श्रध्याय ४ 22 मान लेगा ] किंतु और भोजन ग फिर भी जलपान करनेसे क्षुधा पिपा-तका अनुमान करके प्रवृत्त होते देखे ही कहा कि यही देह काकर्ता है; इसका स्मृतियोंका देहसे अन्य द्रष्टा है ' ऐसा परिहार कर दिया. इसीसे [ अर्थात् त्वका निराकरण न्य ज्योतिके अना-निषेध कर दिया है । जो कभी प्रकाश-कभी अप्रकाशकत्व - भो ठीक नहीं है, काशकत्व और अप्र-पंख आदि अवयवोंके खोलने के कारण हैं. कहा कि ' अवश्य धर्म और अधर्मका स्वीकार कर लेना ऐसा स्वीकार करने-सिद्धान्तकी हानि इसीसे ( सिद्धान्तमें ही कारण ) तुम्हारे. ऋत अनवस्था- दोषका कर दिया गया । अतः ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८ ९ १ दस्ति व्यतिरिक्तं चान्तःस्थं | संघातसे पृथक् और अपने 2324 भीतर ज्योतिरात्मेति ही स्थित आत्मज्योति है -यह सिद्ध ॥ ६ ॥ हुआ ॥ ६ ॥

आत्माका स्वरूप यद्यपि व्यतिरिक्तत्वादि सिद्धम् | यद्यपि आत्माका देहादिसे भिन्न होना इत्यादि बातें सिद्ध हो गयीं तथापि समानजातीयानुग्राहकत्व - तो भी आदित्यादि समानजातीय दर्शननिमित्तभ्रान्त्या करणानामे-वान्यतमो व्यतिरिक्तो वा इत्य-विवेकतः पृच्छति -कतम आत्मेति योऽयं ज्योंतिः पुरुषः स समानः पदार्थोंका ही अनुग्राहकत्व देखने के कारण उत्पन्न हुई भ्रान्ति से ' आत्मा इन्द्रियोंमेंसे ही कोई एक है अथवा उनसे भिन्न है ' इसका विवेक न होनेसे जनक पूछता है— विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्त-सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति - ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमति-क्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥

' आत्मा कौन है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' यह जो प्राणों में बुद्धिवृत्तियों के भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योतिः स्वरूप पुरुष है, वह समान ( बुद्धि-वृत्तियों के सदृश ) हुआ इस लोक और परलोक दोनोंमें संचार करता है । वह [ बुद्धिवृत्तिके अनुसार ] मानो चिन्तन करता है और [ प्राणवृत्ति अनुरूप होकर ] मानो चेष्टा करता है । वही स्वप्न होकर इस लोक ( देहेन्द्रियसंघात ) का अतिक्रमण करता है और [ शरीर तथा इन्द्रिय-रूप ] मृत्युके रूपोंका भी अतिक्रमण करता है ॥ ७ ॥

कतम इति; न्यायसूक्ष्मताया ' कतम इति ' – सूक्ष्म युक्तियाँ प्रश्नस्यौचित्यं दुर्विज्ञेयत्वादुपपद्यते कठिनतासे समझमें आती हैं; इस-बीजं च भ्रान्तिः । अथवा | लिये भ्रान्ति होनी सम्भव ही है ।

पृष्ठ 906

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८ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ शरीरव्यतिरिक्त सिद्धेऽपि करणा- । नि सर्वाणि विज्ञानवन्तीव, विवे-कत श्रात्मनोऽनुपलब्धत्वात्; श्रतोऽहं पृच्छामि - कतम आत्मेति कतमोऽसौ देहेन्द्रिय-. प्रणमनःसु, यस्त्वयोक्त आत्मा, येन ज्योतिषास्त इत्युक्तम् । अथवा योऽयमात्मा त्वया-भिप्रेतो विज्ञानमयः, सर्व सर्व | आणा विज्ञानमया इव, एषु प्राणेषु कतमः १ यथा समुदितेषु ब्राह्मणेषु, सर्व इमे तेजस्विनः कतम एषु षडङ्गविदिति । पूर्वस्मिन् व्याख्याने कतम आत्मेत्येतावदेव प्रश्नवाक्यम्, योऽयं विज्ञानमय इति प्रति-चचनम्; द्वितीये तु व्याख्याने प्राणेष्वित्येवमन्तं प्रश्नवाक्यम् । अथवा सर्वमेव प्रश्नवाक्यम् -विज्ञानमयो हृद्यन्तर्ज्योति: पुरुषः कतम इत्येतदन्तम् । योऽयं विज्ञानमय इत्येतस्य शब्दस्य निर्धारितार्थविशेष-अथवा आत्मा शरीरसे व्यतिरिक्त सिद्ध होनेपर भी समस्त इन्द्रियाँ विज्ञानवती - सी जान पड़ती हैं, क्योंकि आत्मा उनसे पृथक्रूपसे उपलब्ध नहीं होता । इसलिये मैं पूछता हूँ कि आत्मा कौन - सा है? जिसका आपने उल्लेख किया है, वह आत्मा शरीर, इन्द्रिय, प्राण और मन – इनमें से कौन - सा है, जिस ज्योतिके द्वारा पुरुष बैठता है - ऐसा कहा गया है । अथवा जो यह आत्मा आपको विज्ञानमयरूपसे अभिप्रेत है, सो ये सभी प्राण विज्ञानमयके समान हैं, इन प्राणों में वह कौन - सा है? जिस प्रकार उपस्थित ब्राह्मणोंमें ये सभी तेजस्वी हैं, इनमें छहों वेदाङ्गका जाननेवाला कौन है? [ ऐसा प्रश्न किया जाय । ]. [ इन दोनों व्याख्याओंमेंसे ] पूर्वं व्याख्यामें ' कतम आत्मा ' ( कौन - सा आत्मा है ) इतना ही प्रश्नवाक्य है, और ' योऽयं विज्ञान-मयः ' इत्यादि उत्तर है; तथा दूसरी व्याख्यामें ' प्राणेषु ' यहाँ तक प्रश्न वाक्य है अथवा ' विज्ञानमयो हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः ' क़तमः यहाँ तक सारा ही प्रश्नवाक्य है । किंतु ' योऽयं विज्ञानमय: ' इस शब्दका निश्चित अर्थविशेषसे सम्बन्ध ब्राह्मण विषय शब्द र्थत्व रेण वाक्य सर्वम यते आत्म मयत्व हेतुः विवे बुद्धि दुप दिल्य करण स्थि मनस बुद्धि sa तमा

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अध्याय ४. व्यतिरिक्त स्त इन्द्रियाँ पड़ती हैं, पृथक्रूपसे इसलिये मैं कौन - सा है? किया है, न्द्रिय, प्राण कौन - सा है, पुरुष बैठता मा आपको है, सो ये समान हैं, ना है? जिस में ये सभी वेदाङ्गका ? [ ऐसा व्याओं में से ] न आत्मा ' इतना ही ऽयं विज्ञान-- है; तथा ' यहाँ तक ' विज्ञानमयो कृतमः यहाँ इस शब्दका सम्बन्ध ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३ विषयत्वम्, कतम आत्मेतीति- । शब्दस्य प्रश्नवाक्यपरिसमाप्त्य-र्थत्वम् — व्यवहितसम्बन्धमन्त-रेण युक्तमिति कृत्वा, कतम आत्मेतीत्येवमन्तमेव प्रश्न- । वाक्यम्, योऽयमित्यादि परं सर्वमेव प्रतिवचनमिति निश्ची यते । योऽयमित्यात्मनः प्रत्यक्षत्वा-आत्मनो विज्ञान- निर्देशः; विज्ञान-मयत्वविशेषणे मयो विज्ञानप्रायो हेतुः बुद्धिविज्ञानोपाधिसम्पर्का -विवेकाद् विज्ञानमय इत्युच्यते -बुद्धिविज्ञानसम्पृक्त एव हि यस्मा-दुपलभ्यते, राहुरिव चन्द्रा-दित्यसम्पृक्तः बुद्धिर्हि सर्वार्थ-करणम्, तमंसीव प्रदीपः पुरोऽव-स्थितः; ' मनसा ह्य ेव पश्यति मनसा शृणोति ' इति ह्यक्तम् । बुद्धिविज्ञानालोकविशिष्टमेव हि सर्व विषयजातमुपलभ्यते, पुरो-ऽवस्थित प्रदीपालोक विशिष्टमिव तमसि द्वारमात्राणि त्वन्यानि रखनेवाला होना तथा ‘ कतम आत्मेति ' इसमें इति शब्दका प्रश्न-वाक्यकी समाप्तिके लिये होना किसी व्यवहित सम्बन्ध के बिना ही उचित है - ऐसा समझकर ‘ कतम आत्मेति '. इसके इति शब्दपर्यन्त ही प्रश्नवाक्य है; ' योऽयम् ' इत्यादि आगेका सारा वाक्य उत्तर ही है-ऐसा निश्चय होता है । आत्मा प्रत्यक्ष है, इसलिये ' योऽयम् ' ( जो यह ) ऐसा निर्देश किया गया है; विज्ञानमय - विज्ञान-प्राय, बुद्धि - विज्ञानरूप उपाधिके सम्पर्कका विवेक न होनेके कारण यह विज्ञानमय कहा जाता है; क्योंकि जिस प्रकार राहु चन्द्रमा और सूर्यके सम्पर्कमें आकर ही उपलब्ध होता है, उसी प्रकार यह बुद्धिरूप विज्ञानसे सम्पर्क रखकर ही अनुभवमें आता है; अन्धकारमें सामने रखे हुए दीपकके समान बुद्धि ही सब प्रकारके व्यापारोंका साधन है; ' मनहीसे देखता है, मनहीसे सुनता है ' ऐसा कहा भी है । जिस प्रकार अन्धकारमें समस्त पदार्थं सम्मुखस्थ दीपकके प्रकाशसे युक्त होकर ही उपलब्ध होते हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ बुद्धिरूप विज्ञान के आलोकसे विशिष्ट होकर ही उपलब्ध होते हैं । अन्य इन्द्रियां

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ८ ९ ४ करणानि बुद्धेः; तस्मात्तेनैव । विशेष्यते - विज्ञानमय इति । येषां परमात्मविज्ञप्तिविकार - मटोविकारार्थ - इति व्याख्यानम्, त्वनिराकरणम् तेषां ‘ विज्ञानमयः ' ' मनोमयः ' इत्यादौ विज्ञानमय शब्दस्य अन्यार्थदर्शनादश्रौतार्थ -तावसीयते; संदिग्ध पदार्थों ऽन्यत्र निश्चितप्रयोगदर्शनान्नि-र्धारयितुं शक्यः वाक्यशेषात्, निश्चितन्यायबलाद् वाः सधी-रिति चोत्तरत्र पाठात्, ' हृद्यन्तः ' । इति वचनाद् युक्तं विज्ञानप्राय-त्वमेव । प्राणेष्विति व्यतिरेक प्रदर्श-' प्राणेषु ' ' हृदि ' नाथ सप्तमी - यथा इत्यादिप्रयोगाना -मभिप्रायः वृक्षेषु पाषाण इति तो बुद्धिकी द्वारमात्र हैं । इसलिये आत्माको उस ( बुद्धि ) के द्वारा ही विज्ञानमय इस प्रकार विशेषित किया जाता है । जिनके मत में ' विज्ञानमय ' शब्द-की व्याख्या ' परमात्माकी विज्ञप्ति -का विकार ' है, उनका यह अर्थं, ' विज्ञानमयः ' ' मनोमयः ' इत्य तैत्तिरीय श्रुतियों में विज्ञानमय शब्दका दूसरा अर्थ देखे जानेके कारण, श्रुतिविरुद्ध सिद्ध होता है । जहाँ किसी पदके अर्थ में संदेह हो वहीं अन्य स्थानमें निश्चित प्रयोग देखकर उसके अनुसार ही निश्चय किया जाता है; इसके सिवा वाक्यशेषसे अथवा निश्चित न्यायके बलसे भी उसका निश्चय हो सकता है । ' तथा आगे ' सधीः ' ( बुद्धिके सहित ) ऐसा पाठ है और ' हृद्यन्त ' ऐसा वचन भी है; इनसे भी उसका विज्ञानप्रायता - विज्ञानाधिक्य ही उचित है । ' प्राणेषु ' यह सप्तमी व्यति-रेक प्रदर्शित करनेके लिये है; जैसे ' वृक्षेषु पाषाणः ' यहाँ १. तात्पर्य यह है कि इन तैत्तिरीय श्रुतियोंमें मयट् प्रत्यय चातुर्य ( प्रायः अथवा आधिक्य ) अर्थमें ही हो सकता है, विकारार्थंक नहीं हो सकता; इसलिये यदि यहाँ इसका अर्थ विकार किया जायगा तो इसका उन श्रुतियोंसे विरोध होगा हो; इसलिये यहाँ भी इसे प्राचुर्यार्थिक ही समझना चाहिये । २. क्योंकि यदि आत्मा विज्ञानका विकार होगा तो उसे मोक्ष नहीं मिल सकता । ब्राह्मप सामी व्यति श्रात्म व्यति भवि त्येव-प्राण आह पुण्ड वात्स बुद्धौ रेक सात्म ह्यवभ यस चेतन पिण्ड शस्थ य तीरा आत

पृष्ठ 909

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अध्याय ४ । इसलिये के द्वारा ही विशेषित नमय ' शब्द-की विज्ञप्ति-यह अर्थ, ' इत्यादि विज्ञानमय देखे जानेके सिद्ध होता अर्थमें संदेह में निश्चित अनुसार ही इसके सिवा श्चित न्याय के हो सकता ' ( बुद्धिके और ' हृद्यन्तः ' भी उसका नाधिक्य ही तमी व्यति-के लिये चातुर्य ( प्रायः कता; इसलिये विरोध होगा; मोक्ष नहीं ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८ ९ ५ सामीप्यलक्षणा; प्राणेषु हि व्यतिरेकाव्यतिरेकता संदिात श्रात्मनः; प्राणेषु प्राणेभ्यो व्यतिरिक्त इत्यर्थः; यो हि येषु भवति, स तद्वयतिरिक्तो भव-त्येव - यथा पाषाणेषु वृतः । हृदि तत्रैतत् स्यात् प्राणेषु प्राणजातीयैव बुद्धिः स्यादित्यत आइ — हृद्यन्तरिति । हृच्छब्देन । पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डम्, वात्स्थ्याद् बुद्धिहृत्, तस्यां हृदि बुद्धौ; अन्तरिति बुद्धिवृत्तिव्यति रेक प्रदर्शनार्थम्, ज्योतिरवभा-सात्मकत्वादात्मोच्यते; तेन ह्यवभासकेन आत्मना ज्योतिषा श्रास्ते पल्ययते कर्म कुरुते, चेतनावानिव ह्ययं कार्यकरण-पिण्डः —यथा आदित्यप्रका -शस्थो घटः । यथा वा मरकतादिर्मणिः चीरादिद्रव्ये प्रक्षिप्तः परीक्षणाय, | सामीप्य अर्थको लक्षित कराने-वाली सप्तमी है ' प्राणोंमें ही आत्मा-की भिन्नता या अभिन्नताके विषय-में संदेह होता है; अतः ' प्राणेषु ' अर्थात् प्राणोंसे भिन्न है, क्योंकि जो जिनमें होता है, वह उनसे भिन्न होता ही है; जैसे पाषाणोंमें होनेवाला वृक्ष ं [ पाषाणोंसे भिन्न होता है ] | ' हृदि ' -- - हृदय में, वहां यह रहता है; प्राणोंमें प्राणजातिकी ही बुद्धि रहेगी, इसलिये श्रुति कहती है— ' हृद्यन्तः ' । यहां ' हृत् ' शब्दसे पुण्डरीकाकार मांसपिण्ड कहा गया है, उसमें रहनेके कारण बुद्धि हृत् है, उस हृत् में अर्थात् बुद्धिमें; ' अन्त: यह बुद्धिवृत्तिसे उसकी भिन्नता प्रदर्शित करनेके लिये है, | प्रकाशस्वरूप होनेके कारण आत्मा ' ज्योतिः ' कहा गया है; उस प्रकाशस्वरूप आत्मज्योतिसे चेत-नावान् - सा होकर ही यह देहेन्द्रिय-संघात सूर्यके प्रकाशमें स्थित घटके समान रहता, इधर उधर जाता और कर्म करता है । अथवा जिस प्रकार परीक्षा के लिये दुग्धादि द्रव्यमें डाली हुई मरकतादि आत्मच्छायमेव तत् क्षीरादिद्रव्यं मणि उस दुग्धादि द्रव्यको अपनी ही १ अतः ' वृक्षेषु पाषाण: ' का अर्थ होता है— वृक्षके निकट पत्थर है ।

पृष्ठ 910

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८ ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ करोति, ताडगेतदात्मज्योतिबु - । द्धेरपि हृदयात् सूक्ष्मत्वाद् हृद्यन्त: -स्थमपि हृदयादिकं कार्यकरण-संघातं चैकीकृत्य आत्मज्योति-श्छायं करोति, पारम्पर्येण सूक्ष्म-स्थूलतारतम्यात् सर्वान्तरतम-त्वात् । बुद्धिस्तावत् स्वच्छत्वादान-अनात्मन्यात्मचैत - न्तर्याच्चात्मचैतन्य न्याभाससंक्रान्तेःज्योतिः प्रतिच्छाया क्रमः भवति; तेन हि विवेकिनामपि तत्र आत्माभिमानबुद्धिः प्रथमा; ततोऽप्यानन्तर्यान्मनसि चैतन्या -वभासता, बुद्धिसम्पर्कात् तत इन्द्रियेषु, मनः संयोगात्; ततो-ऽनन्तरं शरीरे, इन्द्रियसम्प-र्कात् । एवं पारम्पर्येण कृत्स्नं कार्यकरणसंघातमात्मा चैतन्य-स्वरूपज्योतिषावभासयति । तेन हि सर्वस्य लोकस्य कार्यकरण-संघाते तद्वृत्तिषु चानियतात्मा-मिमान बुद्धिर्यथाविवेकं जायते । तथा च भगवतोक्तं गीतासु-कान्तिवाला कर देती है, प्रकार यह आत्मज्योति बुद्ध अर्थात् हृदयसे भी सूक्ष्म होनेके कारण हृत्पिण्डमें स्थित हृदयादिक और देहेन्द्रियसंघातको भी अपनेसे अभिन्न करके आत्मज्योतिकी कान्तिसे युक्त हो कर देती है. क्योंकि परम्परासे सूक्ष्म - स्थूल तारतम्यसे यह सबकी अपेक्षा अन्तरतम है । बुद्धि तो स्वच्छ है और आत्मा-की समीपवर्तिनी है, इसलिये वह आत्मचैतन्यकी प्रतिच्छायासे युक्त हो जाती है; इसीसे विवेकियोंको भी पहले उसी में श्रात्माभिमानबुद्धि होती है; उसका भी समीपवर्ती होनेसे बुद्धिके सम्पर्कसे मनमें चैतन्यावभासता आती है और मनका [ इन्द्रियोंसे ] सम्पर्क होनेके कारण मनसे इन्द्रियोंमें; फिर इन्द्रियोंका शरीरसे सम्पर्कं होनेके कारण उनसे शरीरमें चैतन्या-वभासता आ जाती है; इस प्रकार परम्परासे आत्मा सम्पूर्ण देहेन्द्रिय-संघातको चैतन्यस्वरूप प्रकाशसे प्रकाशित कर देता है, इसीसे सब लोगोंकी देहेन्द्रियसंघात और उसकी वृत्तियों में अपने - अपनेविवेक-के अनुसार अनियत आत्मा भिमान-बुद्धि उत्पन्न हो जाती है । ऐसा ही भगवान्ने भी गीतामें ब्राह्म " यथ लोक तथा ( १६ तेजः न्च । श्वेत इति मनुभ मिदं २ । सूर्य मन्त्र प त्वात विश सर्वा नवर स्वय त्वं आत्म वहा रेण तुग्र