बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 911–920

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920

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[ श्रध्याय ४ देती है, उसी ज्योति बुद्धि सूक्ष्म होनेके नत हृदयादिक भी अपने से आत्मज्योतिकी कर देती है, सूक्ष्म - स्थूल नबकी अपेक्षा - और आत्मा-- इसलिये वह च्छायासे युक्त विवेकियोंको माभिमानबुद्धि मी समीपवर्ती पर्कसे मनमें नाती है और सम्पर्क होने के न्द्रयोंमें; फिर सम्पर्कं होनेके रमें चैतन्या-है; इस प्रकार म्पूर्ण देहेन्द्रिय-रूप प्रकाशसे है, इसीसे सब संघात और - अपने विवेक-आत्माभिमान-ती है । ने भी गोतामें ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८ ९ ७ " यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं । लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ " ( १३ | ३३ ) " यदादित्यगतं तेजः " ( १५ । १२ ) इत्यादि च । “ नित्योऽनित्यानां चेतन-श्चेतनानाम् " ( २ । २ । १४ ) इति च काठके । " तमेव भान्त-मनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्व मिदं विभाति " ( क ० उ ० २ । २ । १६ ) इति च । " येन सूर्यस्तपति तेजसैद्धः " इति च मन्त्रवर्णः । तेनायं हृद्यन्तज्र्ज्योतिः । पुरुषः- आकाशवत् सर्वगत-त्वात् पूर्ण इति पुरुषः; निर-तिशयं चास्य स्वयंज्योतिष्ट्म्, सर्वावभासकत्वात् स्वयमन्या-नवभास्यत्वाच्च । स एष पुरुषः स्वयमेव ज्योतिःस्वभावः, यं त्वं पृच्छसि — कतम आत्मेति । बाह्यानां ज्योतिषां सर्वकरणा-आत्मन: सर्वव्य- नुग्राहकाणां प्रत्य-वहारहेतुत्वम् स्तमयेऽन्तःकरणद्वा-रेण हृद्यन्तज्र्ज्योतिः पुरुष आत्मा-नुग्राहकः करणानामित्युक्तम् | बृ ० उ ० ५७-कहा है-- " हे भारत! जिस प्रकार एक सूर्य इस सम्पूर्ण लोकको प्रका-शित करता है, उसी प्रकार क्षेत्री [ आत्मा ] सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है " " जो आदित्यगत तेज है [ वह मेरा ही जानो ] " इत्यादि । " जो अनित्योंमें नित्य और चेतनों-में चेतन है " ऐसा कठोपनिषद् भी कहा है और ऐसा भी कहा है कि " सब उसीके प्रकाशित होनेसे प्रकाशित होता है तथा यह सब उसीके तेजसे प्रकाशित है । ” इनके सिवा " जिसके तेजसे तेजोमय होकर सूर्य तपता है " ऐसा मन्त्र-वर्णं भी है । अतः यह आत्मा हृदयान्तर्गत ज्योति है । ' पुरुष: ' आकाशके समान सर्वं-गत होने के कारण पूर्ण है, इसलिये पुरुष है; सबका प्रकाशक और स्वयं दूसरोंसे अप्रकाश्य होनेके कारण इसकी स्वयंप्रकाशता सबसे बढ़कर है । वह यह पुरुष, जिसके विषयमें तुम पूछते हो कि आत्मा कौन - सा हे? ' स्वयं ही ज्योतिःस्वभाव है । समस्त इन्द्रियों की उपकारक बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर हृदयके भीतर अन्तर्ज्योतिःस्वरूप पुरुष - पूर्ण आत्मा अन्तःकरणके द्वारा इन्द्रियोंका उपकारक है-ऐसा पहले कहा गया

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८ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ यदापि बाह्यकरणानुग्राहकाणा । मादित्यादिज्योतिषां भावः, तदा -प्यादित्यादिज्योतिषां परार्थत्वात् कार्यकरणसङ्घातस्याचैतन्ये स्वा-र्थानुपपत्तेः स्वार्थज्योतिष । श्रात्मनोऽनुग्रहाभावेऽयं कार्य-करणसङ्घातो न व्यवहाराय कल्पते; श्रात्मज्योतिरनुग्रहेणैव हि सर्वदा सर्वः संव्यवहारः, “ यदेतद् हृदयं मनश्चैतत् संज्ञा-नम् ” ( ऐ ० उ ० ३ । २ ) इत्यादि श्रुत्यन्तरात्ः साभिमानो हि सर्वप्राणिसंव्यवहारः; अभिमान हेतुं च मरकतमणिदृष्टान्ते-नावोचाम । यद्यप्येवमेतत्, तथापि जाग्र-द्विषये सर्व करणागोचरत्वादात्म-ज्योतिषो बुद्धयादिवाह्याभ्यन्तर-कार्यकरणव्यवहारसन्निपातव्या-कुलत्वान्न शक्यते तज्ज्योतिरा-त्माख्यं मुञ्जेषीकावन्निष्कृष्य दर्शयितुमित्थतः स्वप्ने दिदर्शयिषुः ब्राह्म है । जिस समय बाह्य इन्द्रियों उपकारक आदित्यादि ज्योतियोंकी प्रक्रम भी सत्ता रहती है, उस समय भी आदित्यादि ज्योतियाँ परार्थं होनेके स कारण और कार्यकरणसङ्घात सञ्च अचेतन है, इसलिये उसमें स्वार्थका भाव सम्भव न होनेसे स्वार्थज्योतिः ज्यो ( जिसका प्रकाश अपने ही लिये है सन्-उस ) आत्माके अनुग्रहके बिना यह देहेन्द्रियसङ्घात व्यवहारमें हित समर्थ नहीं हो सकता; सारा व्यव- चह हार सर्वदा आत्मज्योतिके अनुग्ग्रहसे सन्ध ही होता है, " जो यह हृदय है, वही मन है और वही संज्ञान है " ऐसी साम एक अन्य श्रुतिसे भी यही सिद्ध वि होता है । प्राणियों का सारा व्यव-हार अभिमानपूर्वक ही होता है । महि और अभिमानका हेतु हमने मर-कतमणिके दृष्टान्तसे बतला दिया है । अव यद्यपि यह बात ऐसी ही है, तदा तथापि जाग्रत् - कालमें आत्मज्योति सारी ही इन्द्रियोंकी अविषय तथा अव बुद्धि आदि बाह्य और आभ्यन्तर ऽनुप देह एवं इन्द्रिय आदिके व्यवहार- त्वा समूहसे चञ्चल रहती है, इसलिये भव उस आत्मसंज्ञक ज्योतिको मूँ जमेंसे रक्त सींक समान निकालकर यथ पृथकुरूपसे नहीं दिखाया जा सकता, अतः उसे स्वप्न में च.

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[ अध्याय ४ इन्द्रियोंकी ज्योतियोंकी उस समय भी - परार्थ होनेके करणसङ्घात इसमें स्वार्थका स्वार्थज्योतिः हीलिये है ग्रह बना - व्यवहारमें सारा व्यव अनुग्रह हृदय है, वही न है " ऐसी बीयही सिद्ध सारा व्यव-ही होता है - हमने मर-चला दिया है । ऐसी ही है, आत्मज्योति व्यविषय तथा र आभ्यन्तर के व्यवहार-है, इसलिये तको म जसे निकालकर दिखाया जा से स्वप्न में ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८ ९९ प्रक्रमते — स समानः सन्नुभौ लोकावनु-सञ्चरति । यः पुरुषः स्वयमेव ज्योतिरात्मा स समानः सदृश: सन्— केन? प्रकृतत्वात् सन्नि-हितत्वाच्च हृदयेन; ' हृदि ' इति च हृच्छब्दवाच्या बुद्धिः प्रकृता सन्निहिता च तस्मात्तयैव सामान्यम् । किं पुनः सामान्यम्? अश्व-महिषवद् विवेकतोऽनुपलब्धिः; अवभास्या बुद्धिः, अवभासकं तदात्मज्योतिः, आलोकवत्; अवभास्यावभासकयोर्विवेकतो-ऽनुपलब्धिः प्रसिद्धाः विशुद्ध त्वाद्धथालोकोऽवभास्येन सदृशो भवति यथा रक्तमवभासयन् मं रक्तसदृशो रक्ताकारो भवति, यथा हरितं नीलं लोहितं अवभासयन्नालोकः BAJAS दिखाने की इच्छा से श्रुति आरम्भ करती है । वह पुरुष समान रहकर इस लोक और परलोक - दोनोंमें सचार करता है । जो पुरुष स्वयंज्योतिः-स्वरूप आत्मा ही है, वह समान-एक जैसा रहकर; किसके समान रहकर? प्रकरण - प्राप्त और समीप-वर्ती होनेके करण हृदयके; ‘ हृदि ’ इससे ' हृत् ' शब्दवाच्य बुद्धि ही प्रकरणप्राप्त है और वही समीप-वर्तनी भी है; अतः उसीसे आत्मा-की समानता रहती है । वह समानता किस प्रकारकी है? घोड़े और भैंसे के समान उनका अलग - अलग उपलब्ध न होना; बुद्धि प्रकाश्य है और प्रकाशके समान आत्मज्योति प्रकाशक है; प्रकाश्य और प्रकाशकका अलग-अलग उपलब्ध न होना प्रसिद्ध ही है; क्योंकि प्रकाश शुद्ध होनेके कारण प्रकाश्यक प्रकाश्यके समान समान है हो । जाता है, जिस प्रकार लाल रंगको वस्तु-को प्रकाशित करते समय वह लालके समान - लाल आकारवाला हो जाता है । एवं हरे, नीले और | लोहित पदार्थोंको प्रकाशित करते

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९ ०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तत्समानो भवति, तथा बुद्धि । मवभासयन् बुद्धिद्वारेण कृत्स्नं क्षेत्रमवभासयति — इत्युक्तं पर-कतमणिनिदर्शनेन । तेन सर्वेण समानो बुद्धिसामान्यद्वारेण । ' सर्वमयः ' इति चात एव वक्ष्यति तेनासौ कुतश्चित् प्रविभज्य मुञ्जेषोकावत् स्वेन ज्योतीरूपेण दर्शयितुं न शक्यत इति, सर्वव्यापारं तत्राध्यारोप्य । नामरूपगतम्, ज्योतिधर्मं च नामरूपयोः, नामरूपे चात्म-ज्योतिषि, सर्वो लोको मो-मुह्यते - अयमात्मा नायमात्मा, एवं धर्मा नैवंधर्मा, कर्ताकर्ता, शुद्धोऽशुद्धो बद्धो मुक्तः, स्थितो गत श्रागतः, अस्ति नास्तीत्या -दिविकल्पैः । अतः समानः सन्नुभौ लोकौ प्रतिपद्मप्रतिपत्तव्यौ इहलोकपर-लोकावुपाचदेहेन्द्रियादिसङ्घात-त्यागान्योपादान सन्तानप्रबन्ध शतसन्निपातैरनुक्रमेण सञ्चरति । ब्राह्मण समय वह तद्रूप हो जाता है । प्रकार बुद्धिको प्रकाशित करते धीसा समय वह बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्र-को प्रकाशित करने लगता है; यह तुर्न बात मरकतमणिके दृष्टान्त से बतला दी गयी है । इसीसे बुद्धिकी तत्र समानताके द्वारा वह सबके समान भ्रान्ति हो जाता है । संसर इसीसे श्रुति उसे ' सर्वमयः ' ऐसा कहेगी । अतः यह जसे सोंकके इत्येत समान किसीसे भी अलग करके सन्तु अपने ज्योतिःस्वरूपसे नहीं दिखाया तदेत जा सकता । उसमें नाम - रूपके सारे यतो व्यापारोंका, नाम- रूपमें ज्योतिके करोती धर्मका तथा आत्मज्योतिमें नाम-रूपका आरोप करके सम्पूर्णं लोक व्याप ' यह आत्मा है, यह आत्मा नहीं रस्वभा है, आत्मा ऐसे धर्मोवाला है, ऐसे त्सदृश धर्मोवाला नहीं है, कर्ता है, अकर्ता है, शुद्ध है, अशुद्ध है, बद्ध है, मुक्त आल है, स्थित है, गत है, आगत है, चिन्त सद्रूप है, असद्रूप है ' इत्यादि विक-ल्पोंसे अत्यन्त मोहित हो रहा है । तु पर तथ अतः यह समान रहकर प्राप्त इहलोक और प्राप्त करने योग्य पर- तीच, लोक- इन दोनोंमें प्राप्त देहेन्द्रिय- वायुष सङ्घातके त्याग और अप्राप्त देहे-न्द्रिय सङ्घातके ग्रहणकी परम्परासे त्वात निरन्तर सैकड़ों सम्बन्धोंके क्रमसे यतीव सञ्चार करता रहता है । तात्पर्य यह है कि उसके तदात

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[ अध्याय ४ नाता है । इसी काशित करते सम्पूर्ण क्षेत्र-लगता है; यह दृष्टान्त से बतला सीसे बुद्धिकी सबके समान ' सर्वमयः ' ऐसा जसे सींक के अलग करके नहीं दिखाया म - रूपके सारे रूपमें ज्योतिके ज्योतिमें नाम-= सम्पूर्ण लोक इ आत्मा नहीं वाला है, ऐसे कर्ता है, अकर्ता बद्ध है, मुक्त है, आगत है, इत्यादि विक-न हो रहा है । रहकर प्राप्त करने योग्य पर-आप्त देहेन्द्रिय-अप्राप्त. देहे-की परम्परासे -बन्धोंके क्रमसे रहता है । कि उसके ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ०१ धीसादृश्यमेवोभयलोकसञ्चरणहे- । स्वतइति । तत्र नामरूपोपाधिसादृश्यं भ्रान्तिरेवात्मनः भ्रान्तिनिमित्तं य-संसरणहेतुः तदेव हेतुर्न स्वतः, इत्येतदुच्यते-- यस्मात् स समानः सन्नुभौ लोकावनुक्रमेण सञ्चरति -तदेतत् प्रत्यक्षमित्येतद्दर्शयति-यतो ध्यायतीव ध्यानव्यापारं करोतीच, चिन्तयतीव, ध्यान-व्यापारवतीं बुद्धिं स तत्स्थेन चि -स्वभावज्योतीरूपेणावभासयन् त -त्सदृशस्तत्समानः सन् ध्यायतीव " आलोकवदेव - – अतो भवति चिन्तयतीति भ्रान्तिर्लोकस्य; न तु परमार्थतो ध्यायति । तथा लेलायतीव अत्यर्थं चल-तीव, तेष्वेव करणेषु बुद्ध्यादिषु वायुषु च चलत्सु तदवभासक-त्वात् तत्सदृशं तदिति - लेला-यतीव, न तु परमार्थतश्चलनधर्मकं तदात्मज्योतिः । दोनों लोकों में सचारका कारण बुद्धिकी सदृशता ही है, वह स्वयं सञ्चार नहीं करता । इस सञ्चारमें जो भ्रान्तिजनित नामरूपोपाधिकी सदृशता है, वही हेतु है, वह स्वतः सञ्चार नहीं करता - यही बात अब बतलायी जाती है; क्योंकि वह समान रह-कर क्रमशः दोनों लोकोंमें सञ्चार करता है - यह बात प्रत्यक्ष ही है, सो श्रुति दिखलाती है- क्योंकि वह मानो ध्यान करता है - ध्यानव्या-पार - सा करता है, चिन्तन - सा करता है । तात्पर्य यह है कि वह प्रकाशके समान ही अपने चित्स्व-भाव ज्योतिःस्वरूपसे ध्यानव्यापार-वती बुद्धिको तटस्थरूपसे प्रकाशित करता हुआ उसीके समान होकर मानो ध्यान करता है । इसीसे लोकको ऐसी भ्रान्ति होती है कि वह चिन्तन करता है; किंतु वह वस्तुतः ध्यान नहीं करता । इसी प्रकार ' लेलायतीव'- मानो अधिक चलता है । उन इन्द्रियोंके अर्थात् बुद्धि आदि वायुओंके चलने-पर उनका अवभासक होनेके कारण वह उनके समान जान पड़ता है; इसीसे मानो अधिक चलता है । वास्तवमें तो वह आत्मज्योति चलनधर्मवाली नहीं है ।

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९ ०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ कथं पुनरेतदवगम्यते, तत्स-मानत्वभ्रान्तिरेवोभय लोकसञ्चर -णादिहेतुर्न स्वतः -- इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनाय हेतुरुपदिश्यते — स श्रात्मा हि यस्मात् स्वप्नो भूत्वा, स यया घिया समानः, सा धीर्यद् यद् भवति तत्तदसावपि भवतीव; तस्माद् यदासौ स्वप्नो भवति स्वाप -वृत्तिं प्रतिपद्यते धीः, तदा सोऽपि स्वप्नवृत्तिं प्रतिपद्यते यदा घी-जिंजागरिषति, तदा असावपि । श्रत आह - स्वप्नो भूत्वा स्वप्नवृत्तिमवभासयन् धियः स्वापवृत्त्याकारो भूत्वेमं लोकं जागरित व्यवहारलचणं कार्यकर-णसङ्घातात्मकं लौकिकशास्त्रीय-व्यवहारास्पदम्, अतिक्रामत्य-तीत्य क्रामति, विविक्तेन स्वेन श्रात्मज्योतिषा स्वप्ना-त्मिकां धीवृत्तिमवभासयन्न-किंतु यह कैसे जाना जाता है कि उन बुद्धि आदिकी समानताकी भ्रान्ति ही आत्माके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि करनेका हेतु है, वह स्वतः सञ्चारादि नहीं करता - इसी अर्थको प्रदर्शित करनेके लिये हेतु बतलाया जाता है- ' क्योंकि वह आत्मा ही स्वप्न हो [ लोकका अतिक्रमण करता है ] । वह जिस बुद्धिके समान होता है, वह बुद्धि जो - जो होती है, वही वही मानो यह भी हो जाता है; इस-लिये जिस समय वह स्वप्न होती हे अर्थात् जिस समय बुद्धि स्वप्न-वृत्तिको प्राप्त होती है, उस समय यह आत्मा भी स्वप्नवृत्तिको प्राप्त हो जाता है; और जिस समय बुद्धि जागने की इच्छा करती है उस समय यह भी जागना चाहता है । इसलिये श्रुति कहती है- स्वप्न होकर - बुद्धिकी स्वप्नवृत्तिको प्रका-शित करता हुआ अर्थात् स्वप्न-वृत्त्याकार होकर लौकिक एवं शास्त्रीय व्यवहारके योग्य इस देहे-न्द्रियसंघातमय जागरित व्यवहार-रूप लोकका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इसको पार करके चला जाता है, उस समय चूँकि यह अपने विशुद्ध आत्मतेजसे बुद्धिकी स्वप्ना-त्मिका वृत्तिको प्रकाशित करता हुआ ब्राह्म ति स्वयं विश शून्य तु उ भ्र म विद्य कार्य श्रत मति व्यति सत्ताय धी माने न्या यव विवे घटा नश संकि न च

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[ अध्याय ४ नाना जाता है समानताकी दोनों लोकों में हेतु है, वह हीं करता - इसी नेके लिये हेतु ' क्योंकि वह होकर [ इस करता है ] । ' मान होता है, है, वही वही नाता है; इस-स्वप्न होती बुद्धि स्वप्न-है, उस समय नवृत्तिको प्राप्त स समय बुद्धि ती है उस समय ता है । हती है- स्वप्न वृत्तिको प्रका-अर्थात् स्वप्न-लौकिक एवं योग्य इस देहे-रित व्यवहार-मण कर जाता र करके चला चूकि यह अपने बुद्धिकी स्वप्ना-शत करता हुआ ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ०३ वतिष्ठते यस्मात् — तस्मात् स्वयंज्योतिःस्वभाव एवासौ; विशुद्धः स कर्तृक्रियाकारक फल-शून्यः परमार्थतः, धीसादृश्यमेव तु उभयलोक सञ्चारादिसंव्यवहार-भ्रान्तिहेतुः । मृत्यो रूपाणि 7, मृत्युः कर्मा-विद्यादिः, न तस्यान्यद् रूपं स्वतः, कार्यकरणान्येवास्य रूपाणि; श्रतस्तानि मृत्यो रूपाण्यतिक्रा-मति क्रियाफलाश्रयाणि । ननु नास्त्येव धिया समान-व्यतिरिक्तात्म- मन्यद् धियोऽवभा-सत्तायामाक्षेपः सकमात्मज्योतिः, धीव्यतिरेकेण प्रत्यक्षेण वा अनु-मानेन वानुपलम्भात् - यथा -न्या यत्काल एव द्वितीया धीः । यस्त्रवमास्यावभासकयोरन्यत्वेऽपि स्थित रहता है, इसलिये यह स्वयं-ज्योतिःस्वरूप ही है; वह वस्तुतः कर्ता, क्रिया, कारक एवं फलसे रहित शुद्धस्वरूप है, उसके दोनों लोकोंमें सवारादि व्यवहाररूप भ्रान्तिकी हेतु बुद्धिके समान होना है । मृत्युके रूपोंको — कर्म एवं अविद्यादि ही मृत्यु हैं, इनके सिवा उसका स्वतः कोई रूप नहीं है; देह और इन्द्रियाँ ही उसके रूप हैं; अत: कर्म और फलके आश्रयभूत उन मृत्युके रूपोंको वह पार कर 1 पूर्व ० – किंतु बुद्धिके समान बुद्धिको प्रकाशित करनेवाली कोई अन्य आत्मज्योति तो है नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे भी बुद्धिसे व्यतिरिक्त उसकी उपलब्धि नहीं होती जिस प्रकार कि उसी कालमें [ अर्थात् एक बुद्धिकी उपलब्धिके समय ] दूसरी बुद्धिकी उपलब्धि नहीं होती । और ऐसा जो कहा कि विवेकानुपलम्भात् सादृश्यमिति । अवभास्य घट आदि और अवभासक घटाद्यालोकयोः - तत्र भवत्वन्यत्वे आलोकका भेद होनेपर भी विवेक न हो सकनेके कारण साहश्य है, सो न लोकस्योपलम्भाद् घटादेः, वहाँ आलोककी भिन्नरूपसे उपलब्धि संश्लिष्टयोः सादृश्यं भिन्नयोरेव होने के कारण उन दोनोंके भिन्न होनेपर भी घटादिके साथ मिलने पर न च तथेह घटादेखि धियोऽव- सदृशता हो सकती है, किंतु यहाँ

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वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ ०४ भासकं ज्योतिरन्तरं प्रत्यक्षेण । वानुमानेन वोपलभामहे; धीरेव हि चित्स्वरूपावभासकत्वेन स्वा-कारा विषयाकारा च; तस्मान्ना-नुमानतो नापि प्रत्यक्षतो थियो-ऽवभासकं ज्योतिः शक्यते प्रति पादयितुं व्यतिरिक्तम् । यदपि दृष्टान्तरूपमभिहितम्, अवभास्यावभासकयोर्भिन्नयोरेव घटाद्यालोकयोः संयुक्तयोः साह-श्यमिति तत्राभ्युपगममात्र मस्मा -भिरुक्तम्; न तत्र घटाद्यवभास्याव-भासकौ भिन्नौ; परमार्थतस्तु घटादिरेवावभासात्मकः सालोकः; अन्योऽन्यो हि घटादिरुत्पद्यते; विज्ञानमात्रमेव सालोकघटादिवि-षयाकारमवभासते यदैवम्, तदा न बाह्य दृष्टान्तोऽस्ति, विज्ञान-लक्षणमात्रत्वात् सर्वस्य I तो घटादिके समान प्रक्ष अनुमान प्रमाणसे भी बुद्धिकी प्रकाशक कोई अन्य ज्योति हमें उपलब्ध नहीं होती; अपि तु चित्स्व-रूपसे प्रकाशक होनेके कारण बुद्धि ही बुद्ध्याकार और विषयाकार हो जाती है । अतः बुद्धिकी अव-भासक उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति न तो अनुमानसे और न प्रत्यक्ष से ही बतलायी जा सकती है । इसके सिवा [ स्वरूपतः ] भिन्न किंतु परस्पर मिले हुए अवभास्य घटादि और अवभासक आलोकका जो दृष्टान्तरूपसे सादृश्य बतलाया गया है, उसे भो हमने एक प्रकार-की मान्यतामात्र कहा है; किंतु वहाँ घटादि अवभास्य और उनका अव-भासक भिन्न नहीं हैं; वास्तवंमें तो आलोकके सहित घटादि ही अव-भासस्वरूप हैं । अन्य अन्य घटादि उत्पन्न होते रहते हैं, केवल विज्ञान हो आलोकसहित घटादिरूप विषयके आकारमें भासित होता रहता है । जब कि ऐसी बात है, तो वस्तुतः कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि सब कुछ विज्ञानस्वरूपमात्र ही है । ' १. यहाँतक विज्ञानवादी बौद्धोंका मत कहा गया, इससे आगे इस मतका अनुवाद करते हुए शून्यवादी बौद्धों का मत बतलाते हैं । ब्रा पुन ग्राह स्व इति क सं शूद पर वा भ 59 घ स्त व गे घ

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अध्याय ४ प्रत्यक्ष या भी बुद्धिकी - ज्योति हमें अपितु चित्स्व-कारण बुद्धि - विषयाकार बुद्धिकी अव-कोई अन्य नसे और न जा सकती है । रूपतः ] भिन्न हुए अवभास्य आलोकका दृश्य बतलाया एक प्रकार-है; किंतु वहाँ र उनका अव-वास्तवमें तो ही अव -- अन्य घटादि केवल विज्ञान दिरूप विषयके चा रहता है । है, तो वस्तुतः हीं है, क्योंकि पमात्र ही है । ' नागे इस मतका ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९ ०५ एवं तस्यैव विज्ञानस्य ग्राहच-शून्यवादिमता- ग्राहकाकारतामलं नुवादः परिकल्प्य, तस्यैव पुनर्विशुद्धिं परिकल्पयन्ति तद् ग्राह्यग्राहकविनिर्मुक्तं विज्ञानं स्वच्छीभूतं क्षणिकं व्यवतिष्ठत इति केचित् । तस्यापि शान्ति केचिदिच्छन्ति तदपि विज्ञानं संवृतं ग्राह्यग्राहकांश विनिर्मुक्तं शून्यमेव घटादिवाह्मवस्तुवदित्य- । परे माध्यमिका श्राचक्षते । सर्वा एताः कल्पना बुद्धि-तन्निरासः विज्ञानावभासकस्य व्यतिरिक्तस्यात्मज्योतिषोऽपह-वादस्य श्रेयोमार्गस्य प्रतिपक्ष - । भूतावैदिकस्य । तत्र येषां बाह्यो-ऽर्थोऽस्ति, तान् प्रत्युच्यते— न तावत् स्वात्मावभास कत्वं घटादेः, तमस्यवस्थितो घटादि-स्वावन्न कदाचिदपि स्वात्मना -वमास्यते; प्रदीपाद्या लोकसंयो-गेन तु नियमेनैवावभास्यमानो दृष्टः सालोको घट इति; संश्लि-योरपि घटालोकयोरन्य-सिद्धान्ती - इस प्रकार उस विज्ञानकी ही ग्राह्यग्राहकाकारता-की पूर्णतया कल्पना कर फिर उसीकी अत्यन्त शुद्धिकी कल्पना करते हैं; वह ग्राह्य - ग्राहकभावसे रहित विज्ञान स्वच्छ और क्षणिक-रूपसे स्थित है - ऐसा किन्हों - किन्हीं-का मत है । कोई तो उस क्षणिक विज्ञानकी भी शान्ति करना चाहते हैं; अविद्यासे आच्छादित वह विज्ञान भी घटादि बाह्य वस्तुओंके समान ग्राह्य - ग्राहकांशसे रहित शून्यमात्र ही है - ऐसा दूसरे माध्य-मिक बौद्ध कहते हैं । ये सारी कल्पनाएँ बुद्धिरूप विज्ञानके अवभासक एवं उससे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका त्याग करनेवाली होनेसे इस वैदिक कल्याणमार्गकी विघ्नरूपा हैं । अब जिनके मतमें घटादि बाह्य पदार्थ-की सत्ता है, उनसे कहा जाता है-घटादि स्वयं ही अपने प्रकाशक हों -ऐसी बात तो है नहीं; अंधेरेमें रखे हुए घटादि तो कभी अपने-आप प्रकाशित होते ही नहीं; हां, दीपकादिके प्रकाशसे संयोग होने-पर तो ' यह घट प्रकाशयुक्त है ' इस प्रकार उसका नियमसे प्रकाशित होना देखा जाता है; मिले हुए | घट और प्रकाश भी एक - दूसरे-

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९ ०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ त्वमेव पुनः पुनः संश्लेषे । विश्लेषे च विशेषदर्शनाद् रज्जु-घटयोरिव । अन्यत्वे च व्यति-रिक्तावभासकत्वम्; न स्वात्मनैव स्वमात्मानमवभासयति । ननु प्रदीपः स्वात्मानमेवाव-विज्ञानस्य स्वयंप्रका - भासयन् दृष्ट इति व्यत्वे प्रदीपदृष्टान्तो - न हि घटादिवत् । पन्यासः प्रदीपदर्शनाय । प्रकाशान्तरमुपाददते लौकिकाः; तस्मात् प्रदीपः स्वात्मानं प्रका-शयति । न, अवभास्यत्वाविशेषात्; - निरसनम् यद्यपि प्रदीपोऽन्य-स्यावभासकः स्वयमवभासात्मक-त्वात्, तथापि व्यतिरिक्त चैतन्या-वभास्यत्वं न व्यभिचरति, घटा-दिवदेव यदा चैवम्, तदा व्यतिरिक्तावभास्यत्वं तावद-वश्यम्भावि । ननु यथा घटश्चैतन्यावभा -स्यत्वेऽपि व्यतिरिक्तमालोकान्त-से हैं भिन्न ही; क्योंकि रस्सी और घटके समान उनका पुनः पुनः संयोग और वियोग होनेपर उनमें विशेषता दिखायी देती है । प्रकार यदि उनका भेद है तो प्रकाश्य पदार्थों का कोई अन्य प्रका-शक है - यह भी सिद्ध हो जाता है; वे स्वयं ही अपनेको प्रकाशित नहीं करते । पूर्व ० - किंतु दीपक तो स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता देखा जाता है; क्योंकि लौकिक पुरुष घटादिके समान दीपकको देखनेके लिये कोई अन्य प्रकाश ग्रहण नहीं करते; इसलिये दीपक स्वयं हो अपनेको प्रकाशित करता है । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्रकाश्यत्वमें दीपककी घटा-दिसे समानता है, यद्यपि स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेके कारण दीपक दूसरोंका प्रकाशक है, तथापि घटादिके समान ही वह अपने से भिन्न चैतन्यद्वारा प्रकाशित होने की योग्यताका त्याग नहीं करता; जब कि ऐसी बात है, तो अपने से भिन्न-से प्रकाशित होना तो अनिवार्य ही है । पूर्व ० - किंतु जिस प्रकार चैतन्यसे अवभासित होने योग्य होनेपर भी घटको अपनेसे भिन्न दसरे आलोककी बा रम लो ST भ घ न्य घ क भ न प ल य वि क