बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 921–930

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930

पृष्ठ 921

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अध्याय ४ - रस्सी और पुनः - पुनः नेपर उनमें इ भेद है तो अन्य प्रका-हो जाता प्रकाशित तो स्वयं ही करता देखा किक पुरुष को देखने ग्रहण नहीं स्वयं ही है । त नहीं है; ककी घटा-द्यपि स्वयं T रण दीपक तथापि वह अपने से शत होने की करता; जब से भिन्न-- अनिवार्य होनेपर भी - आलोकक ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ०७ रमपेक्षते, न त्वेवं प्रदीपोऽन्यमा- । लोकान्तरमपेचते; तस्मात् प्रदीपो S न्यावभास्योऽपि सन्नात्मानं घटं चावभासयति । न, स्वतः परतो वा विशेषा-भावात् — यथा चैतन्यावभास्यत्वं घटस्य, तथा प्रदीपस्यापि चैत-न्यावभास्यत्वम विशिष्टम् । यत्तूच्यते, प्रदीप आत्मानं घटं चावभासयतीति, तदसत्; कस्मात् १ यदा श्रात्मानं नाव-भासयति, तदा कीदृशः स्यात् १ । न हि तदा प्रदीपस्य स्वतो वा परतो वा विशेषः कश्चिदुप-लभ्यते स ह्यवभास्यो भवति, यस्यावभासकसन्निधावसन्निधौ च विशेष उपलभ्यते; न हि प्रदीपस्य स्वात्मसन्निधिरसन्निधिर्वा शक्यः कल्पयितुम्; असति च कादा- । अपेक्षा होती है, उस प्रकार दीपक-को तो किसी अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं होती; अतः अन्यसे अवभासित होनेवाला होनेपर भी दीपक अपनेको ओर घटको प्रका-शित करता है । सिद्धान्ती - नहीं, उसमें स्वतः अथवा परतः कोई भी विशेषता नहीं है; जिस प्रकार घट चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है, उसी प्रकार उसके समान ही दोपक भी चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है । तथा ऐसा जो कहा जाता है कि दीपक अपनेको और घटको भी प्रकाशित करता है; सो यह भी ठीक नहीं है; क्यों नहीं है? सो बतलाते हैं - जिस समय दीपक अपनेको प्रकाशित नहीं करता, उस समय वह कैसा रहता है? उस अवस्था में तो दोपकका अपनेसे अथवा अन्यसे कोई भी अन्तर नहीं देखा जाता; अवभास्य तो वही होता है, जिसमें अवभासककी सन्निधि अथवा असन्निधि होने पर कोई अन्तर देखा जाय । किंतु दीपककी अपने से ही सन्निधि अथवा असन्निधि होनेकी कल्पना नहीं की जा सकती; अतः इस प्रकार कभी - कभी [ सन्निधि अथवा अस-निधिके कारण ] होनेवाले अन्तर-

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९ ०८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ चित्के विशेषे, आत्मानं प्रदीपः । प्रकाशयतीति मृषैवोच्यते । चैतन्यग्राह्यत्वं तु घटादिभि-रविशिष्टं प्रदीपस्य; तस्माद् विज्ञा-नस्यात्मग्राह्यग्राहकत्वे न प्रदीपो दृष्टान्तः । चैतन्यग्राह्यत्वं च विज्ञानस्य बाह्यविषयैर विशिष्टम् । चैतन्यग्राह्यत्वे च विज्ञानस्य, कि ग्राह्मविज्ञानग्राह्यतैव, किं वा ग्राहक विज्ञानग्राह्यतेति तत्र । सन्दिह्यमाने वस्तुनि, योऽन्यत्र । दृष्टों न्यायः स कल्पयितु ं युक्तो | न तु दृष्टविपरीतः तथा च सति यथा व्यतिरिक्तेनैव ग्राहकेण बाह्यानां प्रदीपानां ग्राह्यत्वं दृष्टम् तथा विज्ञानस्यापि चैतन्यग्राह्यत्वात् प्रकाशकत्वे सत्यपि प्रदीपवद् व्यतिरिक्तचैतन्यग्राह्यत्वं युक्तं कल्पयितुम्, न त्वनन्यग्राह्यत्वम्; यश्चान्यो विज्ञानस्य ग्रहीता, स के न होनेपर ' दीपक अपनेको प्रकाशित करता है ' ऐसा मिथ्या हो कहा जाता है । दीपकका चैतन्यग्ग्राह्य होना तो घटादिके समान ही है; अतः विज्ञानके अपने ही ग्राह्य और ग्राहक होने में दीपक दृष्टान्त नहीं हो सकता । हां, विज्ञानका चैतन्य ग्राह्य होना तो बाह्य विषयोंके समान ही है । विज्ञानकी चैतन्यग्राह्यता सिद्ध होनेपर भी क्या ग्राह्य ( विषय-विषयक ) विज्ञान की ग्राह्यता है अथवा ग्राहक ( विषयिविषयक ) विज्ञान-की? इस प्रकार वस्तुके विषय में संदेह होनेपर जो न्याय अन्य पदार्थोके विषयमें देखा गया है, उसीकी यहाँ भी कल्पना करनी चाहिये, दृष्टन्यायसे विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है; ऐसी स्थिति में, जिस प्रकार अपनेसे व्यति-रिक्त ग्राहकके द्वारा बाह्य प्रदीपों-की ग्राह्यता देखी गयी है, उसी प्रकार विज्ञानकी भो चैतन्यग्राह्यता होनेके कारण, प्रकाशक होनेपर भी दीपक के समान अपनेसे भिन्न चैतन्य-द्वारा ही ग्राह्यता कल्पना करनी चाहिये, उसकी अनन्यग्राह्यता ( विज्ञान ग्राह्यता ) माननी उचित नहीं है, इस प्रकार जो विज्ञानका ग्रहीता अ म न्त स प्रस कर न्न वर तत्र ण यन क दि क

पृष्ठ 923

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अध्याय ४ AAN क अपनेको ह्य होना तो है; अतः और टान्त नहीं नका चैतन्य - विषयोंके ह्यता सिद्ध ( विषय-है अथवा ) विज्ञान-के विषय में न्याय अन्य गया है, ना करनी विपरीत हीं है; ऐसी नसे व्यति-ह्य प्रदीपों-है, उसी न्यग्राह्यता होनेपर भी वन चेतन्य-ना करनी न्यग्राह्यता उचित नहीं का ग्रहीता ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं आत्मा ज्योतिरन्तरं विज्ञानात् ॥ तदानवस्थेति चेन्न, ग्राह्यत्व-मात्रं हि तद्ग्राहकस्य वस्त्वन्तर-त्वे लिङ्गमुक्तं न्यायतः; न त्वेकान्ततो ग्राहकत्वे तद्ग्राहका-न्तरास्तित्वे वा कदाचिदपि लिङ्ग सम्भवति; तस्मान्न तदनवस्था-प्रसङ्गः । विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राह्यत्वे करणान्तरापेक्षायामनवस्थेति चे-न्न, नियमाभावात् न हि सर्व-त्रायं नियमो भवति; यत्र वस्त्वन्तरेण गृह्यते वस्त्वन्तरम्, तत्र ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं कर णान्तरं स्यादिति नैकान्तेन नि-यन्तुं शक्यते, वैचित्र्यदर्शनाद कथम् १ घटस्तावत् स्वात्मव्यतिरि क्तेनात्मना गृह्यते; तत्र प्रदीपा-दिरालोको ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणम्, न हि प्रदीपाद्यालोको ९ ० ९ है, वह आत्मा विज्ञानसे भिन्न ज्योति है । यदि कहो कि तब तो अनवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है । किसी वस्तुका ग्राह्य होना ही उसके ग्राहकके अन्य पदार्थ होनेमें न्यायतः लिङ्ग कहा गया है; किंतु उस आत्माके अव्यभिचारी ग्राहकत्व और उसके किसी अन्यग्राहकके अस्तित्वमें कभी कोई लिङ्ग होना सम्भव नहीं है, इसलिये उस अन-वस्थाका प्रसङ्ग नहीं हो सकता । यदि कहो कि विज्ञानको किसी अन्यसे ग्राह्य माननेपर इन्द्रियान्तर-की अपेक्षा होनेके कारण अनवस्था होगी तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि ऐसा नियम नहीं है - सर्वत्र यही नियम नहीं होता, जहाँ किसी अन्य वस्तुसे कोई अन्य वस्तु ग्रहण की जाती है, वहीं ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न कोई अन्य इन्द्रिय भी होनी चाहिये- ऐसा कोई अनि-वार्य नियम नहीं किया जा सकता; क्योंकि इसमें विचित्रता देखी जाती है; किस प्रकार? [ सो बतलाते हैं- ] घट अपनेसे भिन्न आत्माके द्वारा गृहीत होता ही है, वहाँ ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न प्रदीपादि प्रकाश उसका करण है; क्योंकि प्रदीपादिका

पृष्ठ 924

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ १० घटांशचक्षुरंशो वा घटवच्चक्षु | आलोक न घटका अंश है और न ग्रह्यत्वेऽपि प्रदीपस्य, चक्षुः-प्रदीपव्यतिरेकेण न बाह्यमालो -कस्थानीयं किञ्चित् करणान्तरम-पेक्षते । तस्मान्नैव नियन्तुं शक्यते— यत्र यत्र व्यतिरिक्त ग्राह्यत्वं तत्र तत्र करणान्तरं स्यादेवेति । तस्माद् विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राहकग्राह्मत्वे न करण-द्वारानवस्था, नापि ग्राहकत्व-द्वारा कदाचिदप्युपपादयितुं शक्य-ते; तस्मात् सिद्धं विज्ञानव्यति-रिक्तमात्मज्योतिरन्तरमिति । ननु नास्त्येव बाह्योऽर्थो । विज्ञानातिरिक्त- घटादिः प्रदीपो वा ग्राह्यग्राहकस्यासत्वो- विज्ञानव्यतिरि -पपादनं तन्निरासश्च क्तः, यद्धि यद्व्य-तिरेकेण नोपलभ्यते, तत्तावन्मात्रं वस्तु दृष्टम् — यथा स्वप्नविज्ञान -ग्राह्यं घटपटादिवस्तु स्वप्नवि-ज्ञानव्यतिरेकेणानुपलम्भात् स्वप्न-घटप्रदीपादेः स्वप्नविज्ञानमात्र-तावगम्यते, तथा जागरितेऽपि घटप्रदीपादेर्जाग्रद्विज्ञान व्यतिरेके णानुपलम्भान्जाग्रद्विज्ञानमात्रतैव नेत्रका ही; किंतु दीपक घटके समान नेत्रसे ग्राह्य होनेपर भी नेत्र और दीपकसे व्यतिरिक्त बाह्य प्रकाशस्थानीय किसी अन्य करण-की अपेक्षा नहीं करता । इसलिये ऐसा नियम नहीं किया जा सकता कि जहाँ - जहाँ अपने से भिन्न वस्तु-द्वारा ग्राह्यता होती है, वहाँ - वहाँ कोई अन्य करण होना ही चाहिये । अतः विज्ञानकी व्यतिरिक्तग्राहक-ग्राह्यता होनेपर भी न तो करणके कारण और न ग्राहकत्वके द्वारा ही कभी अनवस्था सिद्ध की जा सकती है, अतः विज्ञानसे पृथक् आत्मज्योति दूसरी ही है – यह सिद्ध हुआ । " विज्ञानवादी - किंतु घटादि अथवा दीपक आदि कोई बाह्य पदार्थ विज्ञानसे व्यतिरिक्त तो है ही नहीं, वस्तु जिसके बिना उपलब्ध नहीं होती, वह तत्स्वरूप ही देखी गयी है - जिस प्रकार स्वप्न विज्ञान-से गृहीत होनेवाली घट - पटादि वस्तु स्वप्नविज्ञान से अलग उपलब्ध न होनेके कारण स्वप्नदृष्ट --पादिकी स्वप्न विज्ञानमात्रता ज्ञात होती है; इसी प्रकार जागरित-अवस्थामें भी घट एवं प्रदीपादिकी जाग्रद्विज्ञानके सिवा उपलब्धि न होनेके कारण जाग्रद्विज्ञान-ब्रा बाह नम कर वभ मरि तनि दृष्ट न त नैव शब्द बाह्य व्यम चेदर पट र्थत्व

पृष्ठ 925

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अध्याय ४ और न पक घटके नेपर भी नेत्र रिक्त बाह्य अन्य करण-। इसलिये जा सकता भिन्न वस्तु-है, वहां - वहां ही चाहिये । रिक्त ग्राहक-- तो करणके व के द्वारा ही की जा सकती आत्मज्योति द्व हुआ । घटादि अथवा बाह्य पदार्थ है ही नहीं, ना उपलब्ध वरूप ही देखी स्वप्न विज्ञान-टपटादि वस्तु उपलब्ध न घट - प्रदी-मात्रता ज्ञात जागरित-प्रदीपादिकी उपलब्धि जाग्न द्विज्ञान-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ११ युक्ता भवितुम् । तस्मान्नास्ति बाह्योऽर्थो घटप्रदीपादिः, विज्ञा-नमात्रमेव तु सर्वम्, तत्र यदु-क्तम् — विज्ञानस्य व्यतिरिक्ता-वभास्यत्वाद् विज्ञानव्यतिरिक्त-मस्ति ज्योतिरन्तरं घटादेरिवेति, तन्मिथ्या, सर्वस्य विज्ञानमात्रत्वे दृष्टान्ताभावात् । न, यावत्तावदस्युपगमात् — न तु बाह्योऽर्थो भवता एकान्ते -नैव नाभ्युपगम्यते; ननु मया नाभ्युपगम्यत एव । न, विज्ञानं घटः प्रदीप इति च शब्दार्थ पृथक्त्वाद् यावत्, तावदपि बाह्यमर्थान्तरमवश्यमभ्युपगन्त-व्यम् । विज्ञानादर्थान्तरं वस्तु न वेदभ्युपगम्यते, विज्ञानं घटः पट इत्येवमादीनां शब्दानामेका-र्थत्वे पर्यायशब्दत्वं प्राप्नोति । | मात्रता ही होनी उचित है अत: घट एवं प्रदीपादि बाह्य पदार्थ | हूँ ही नहीं, सब कुछ विज्ञानमात्र ही है; ऐसी स्थितिमें जो यह कहा गया कि घटादिके समान विज्ञान भी अपने से भिन्न साक्षीद्वारा भाष्य है, इसलिये उससे व्यतिरिक्त कोई अन्य ज्योति है, सो यह ठीक नहीं. क्योंकि जब सभी विज्ञानमात्र है, तो [ उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति है; इसमें ] कोई दृष्टान्त नहीं हो सकता । सिद्धान्ती - ऐसी बात मत कहो, जहाँ तक तुम बाह्यार्थकी सत्ता स्वी-कार करते हो वहाँतक तो है ही । तुम सर्वथा ही बाह्यार्थं न मानते हो - ऐसी बात तो है नहीं । विज्ञान ० - हां, मैं तो नहीं ही मानता । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ' विज्ञान, घट, प्रदीप ' इत्यादि शब्द और इनके अर्थ पृथक् हैं, जबतक ऐसा है, तबतक भी तुम्हें बाह्य अर्थान्तर अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि विज्ञानसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नहीं माना जायगा तो विज्ञान, घट, पट इत्यादि शब्दों का एक ( विज्ञान-मात्र ) ही अर्थ माननेपर इनका पर्याय शब्द होना सिद्ध होगा ।

पृष्ठ 926

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९ १२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तथा साधनानां फलस्य चैकत्वे, । साध्यसाधनमेदोपदेशशास्त्रानर्थ-क्यप्रसङ्गः; तत्कर्तुरज्ञानप्रसङ्गो वा । किञ्चान्यत् - — विज्ञानव्यति-रेकेण वादिप्रतिवादिवाददोषा-भ्युपगमात्; न ह्यात्मविज्ञानमा-त्रमेव चादिप्रतिवादिवादस्तदोषो वाभ्युपगम्यते, निराकर्तव्यत्वात् प्रतिवाद्यादीनाम्; न ह्यात्मीयं विज्ञानं निराकर्तव्यमम्युपगम्यते, स्वयं वा आत्मा कस्यचित्; तथा च सति सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः । न च प्रतिवाद्यादयः स्वात्मनैव गृह्यन्त इत्यभ्युपगमः व्यति-रिक्तग्राह्या हि तेऽभ्युपगम्यन्ते । तस्मात् तद्वत् सर्वमेव व्यतिरिक्त-प्रायं वस्तु जाग्रद्विषयत्वात्, इस प्रकार साधन और फलको भी एकता होनेपर तो साध्य - साधनरूप भेदका उपदेश करनेवाले शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, तथा उनके रचयिताओंके भी अज्ञानका प्रसङ्ग होगा! इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वादी प्रतिवादीके वाद और दोष ये विज्ञान से व्यतिरिक्त ही स्वीकार किये जाते हैं; वादी और प्रतिवादीके वाद अथवा दोष-आत्मविज्ञानमात्र ही नहीं स्वीकार किये जाते; क्योंकि प्रतिवादी आदि-के लिये इनका निराकरण करना आवश्यक होता है; किंतु किसीके भी लिये अपना विज्ञान अथवा स्वयं आत्मा ही निराकरणके योग्य नहीं होता, यदि ऐसा हो तब तो सब प्रकारके सम्यक् व्यवहारके लोपका ही प्रसङ्ग ' उपस्थित हो जाय । प्रतिवादी आदि विज्ञानरूप आत्मासे ही ग्रहण किये जाते हैं-ऐसा विज्ञानवादीको स्वीकार भी नहीं है; वे अपनेसे भिन्न वादी आदिके द्वारा ही ग्रहण किये जाते हैं- ऐसी मान्यता है । अत: उन्हीं-के समान सब वस्तुएँ अपने से भिन्न ग्राहकद्वारा ही ग्राह्य हैं, क्योंकि वे जाग्रत्के विषय है, ब्राह जा सुत विज्ञ वि वि रन यु भा भ वि त द्या ज्ञ

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[ अध्याय ४ VINY रफलको भी ध्य - साधनरूप वाले शाखाकी उपस्थित होगा, भी T! बात यह है के वाद और व्यतिरिक्त ही हैं; वादी और थवा दोष-नहीं स्वीकार तिवादी आदि-राकरण करना किंतु किसीके वज्ञान अथवा करणके योग्य हो तब तो क् व्यवहारके " उपस्थित हो दविज्ञानरूप किये जाते हैं-स्वीकार भी भिन्न वादी हण किये जाते । अतः उन्हीं-वस्तुएँ अपने से ही ग्राह्य हैं, के विषय हैं, ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९ १३ जाग्रद्वस्तु प्रतिवाद्यादिवदिति । | सुलभो दृष्टान्तः; सन्तत्यन्तरवद् विज्ञानान्तरवच्चेति । तस्माद् विज्ञानवादिनापि न शक्यं विज्ञानव्यतिरिक्तं ज्योति-रन्तरं निराकर्तुम् । स्वप्ने विज्ञानव्यतिरेकाभावाद-युक्तमिति चेन्न अभावादपि भावस्य वस्त्वन्तरत्वोपपत्तेः भवतैव तावत् स्वप्ने घटादि-विज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतम्; तदम्युपगम्य तद्वचतिरेकेण घटा-द्यभाव उच्यते, स विज्ञानविषयो घटादिर्यद्यभावो यदि वा भावः स्यात्, उभयथापि घटादिविज्ञा-नस्य भावभूतत्वमभ्युपगतमेवः न तु तन्निवर्तयितं शक्यते, तन्निवर्तकन्यायाभावात् । १. जिस प्रकार व्यवहारमें रामकी जाग्रत्- कालकी वस्तु प्रतिवादी आदिके समान, इस प्रकार यह [ प्रतिज्ञा और हेतुसहित ] दृष्टान्त सुलभ है; इसके सिवा दूसरी संतान तथा दूसरे विज्ञानके समान भी वे वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ग्रहण करने योग्य हैं । ' अतः विज्ञानवादी भी विज्ञानसे पृथक् अन्य ज्योतिका निराकरण करने में समर्थ नहीं है । यदि कहो कि स्वप्नमें तो विज्ञान-के सिवा दूसरी वस्तुका अभाव है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अभावसे भी भावका भिन्न वस्तु होना तो सिद्ध होता ही है - स्वप्नमें घटादि विज्ञान की भावस्वरूपता तो आप भी स्वीकार करते ही हैं, वैसा मानकर ही उससे भिन्न घटादिका अभाव बतलाया जाता है, उस विज्ञानका विषय घटादि अभाव हो | अथवा भाव, दोनों ही प्रकार घटादि विज्ञान की भावरूपता तो मान ही ली गयी, उसका तो निराकरण किया नहीं जा सकता; क्योंकि | उसकी निवृत्ति करनेवाली संतानसे श्यामकी संतानका तथा असर्व-ज्ञोंके ज्ञानसे सर्वज्ञके ज्ञानका अनुमान होता है, उसी प्रकार नीलादि पदार्थ और उनके विज्ञानके भेदसे विज्ञान और उनके प्रकाशक आत्मज्योतिके भेदका भी अनुमान किया जा सकता है; अतः विज्ञानवादियोंका मत ठीक नहीं है । बृ ० उ ० ५८-

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९ १४ वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ एतेन सर्वस्य शून्यता प्रत्युक्ता । / प्रत्यगात्मग्राह्यता चात्मनोऽह -मिति मीमांसकपक्षः प्रत्युक्तः यत्तूक्तम्, सालोकोऽन्यश्चान्यश्च । घटो जायत इति, तदसत्, क्षणान्तरेऽपि स एवायं घट इति प्रत्यभिज्ञानात्; सादृश्यात् प्रत्य-भिज्ञानं कृत्तोत्थित केशनखादि-विवेति चेन्न, तत्रापि क्षणिकत्व-स्यासिद्धत्वात्, जास्येकत्वाच्च । कृत्तेषु पुनरुत्थितेषु च केशनखादिषु केशनखत्वजाते-रेकत्वात् केशनखत्वप्रत्ययस्त-निमित्तोऽभ्रान्त एव । न हि दृश्यमानलूनोत्थितकेश-नखादिषु व्यक्तिनिमित्तः स कोई युक्ति नहीं है । इससे सबकी शून्यताका निराकरण हो गया । तथा आत्मा ' अहम् ' इस प्रकार प्रत्यगात्माद्वारा ग्राह्य है - ऐसा मीमां सकों के पक्षका भी खण्डन हो गया । ' ऐसा जो कहा कि प्रकाशसहित दूसरा - दूसरा घट उत्पन्न होता रहता है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे क्षणमें भी ‘ यह वही घट है ' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है; यदि कहो कि काट देनेपर पुनः बढ़े हुए केश और नखादिके समान उन घटोंमें समानता होनेके कारण ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि वहाँ भी उनकी क्षणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती; इसके सिवा उन केश और नखादिकी एक ही जाति होनेके कारण भी ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है ॥ काटे हुए और पुन: बढ़े हुए केश और नखादिकी केशत्व और नखत्व-रूपसे एक ही जाति होनेके कारण उससे होनेवाली केशत्व और नखत्व-की प्रतीति अभ्रान्त ही है । साक्षात् काटे और बढ़े हुए केश एवं नखादि-में ' यह वही है ' ऐसी प्रतीति व्यक्ति-ब्राह एवे दीघ परि प्रत्य घटा प्रत्य प्रा वस्त नुमा लिए प्रत्या कत्व वस्त स्या वस्त तिष्ठ १. क्योंकि एक ही आत्माका ग्राह्म और ग्राहक उभयरूप होना सम्भव नहीं है । सकृ न

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[ अध्याय ४ इससे सबकी हो गया । ' इस प्रकार है - ऐसा मीमां डन हो गया । ' क प्रकाशसहित उत्पन्न होता ठीक नहीं है ' यह वही घट होती है; यदि पुन: बढ़े हु समान उन कारण ऐसी नो ऐसी बात हाँ भी उनकी की जा उन केश और जाति होनेके ज्ञा होती है । बढ़े हुए केश और नखत्व-होनेके कारण और नखत्व-है । साक्षात् एवं नखादि-तीति व्यक्ति--भव नहीं है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ १५ एवेति प्रत्ययो भवति कस्यचिद् । दीर्घकालव्यवहितदृष्टेषु च तुल्य -परिमाणेषु, तत्कालीनवालादि-तुन्या इमे केशनखाद्या इति -प्रत्ययो भवति, न तु त एवेति घटादिषु पुनर्भवति स एवेति प्रत्ययः; तस्मान्न समो दृष्टान्तः । प्रत्यक्षेण हि प्रत्यभिज्ञायमाने वस्तुनि तदेवेति न चान्यत्वम-नुमातुं युक्तम्, प्रत्यक्ष विरोधे लिङ्गस्याभासत्वोपपत्तेः; सादृश्य-प्रत्ययानुपपत्तेश्च, ज्ञानस्य क्षणि-कत्वात्; एकस्य हि वस्तुदर्शिनो वस्त्वन्तरदर्शने सादृश्यप्रत्ययः स्यात् न तु वस्तुदर्शी एको वस्त्वन्तरदर्शनाय क्षणान्तरमव-तिष्ठते; विज्ञानस्य क्षणिकत्वाद सकृद्वस्तुदर्शनेनैव क्षयोपपत्तेः ॥ के लिये ( एक - एक नख या केशके लिये ) नहीं होती । किसी - किसीको दीर्घकालके पश्चात् देखे हुए समान परिमाणवाले केश - नखादिमें तो ये केश और नखादि उस समयके केश-नखादिके समान हैं — ऐसा प्रत्यय होता है, परंतु ' ये वही हैं ' ऐसा नहीं होता; किंतु घटादिमें तो ' यह वही है ' ऐसा प्रत्यय होता है; इस-लिये यह ( कटकर बढ़े हुए केश आदिका ) दृष्टान्त ठीक नहीं है । यदि किसी वस्तुके विषय में प्रत्यक्षतया ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । कि यह वही है तो उसके अन्य होने-का अनुमान करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर लिङ्गका आभासत्व सिद्ध होगा; तथा ज्ञान क्षणिक है, इसलिये सदृशताका भान होना भी सम्भव नहीं है । एक ही वस्तुदर्शीको किसी दूसरी वस्तुके देखनेपर सादृश्य-प्रत्यय हो सकता है; और [ तुम्हारे सिद्धान्तानुसार ] एक वस्तुदर्शी दूसरी वस्तुको देखनेके लिये दूसरे क्षणमें रहता नहीं है; क्योंकि विज्ञान क्षणिक होनेके कारण उसका एक बार वस्तु देखनेसे ही क्षय होना सिद्ध हो जाता

पृष्ठ 930

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. ९ १६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 तेनेदं सदृशमिति हि सादृश्यप्र- । त्ययो भवति; तेनेति दृष्टस्मरणम् इदमिति वर्तमानप्रत्ययः; तेनेति दृष्टं स्मृत्वा, यावदिदमिति वर्त- ते- । मानक्षणकालमवतिष्ठेत, ततः क्षणिकवादहानिः अथ तेनेत्ये-वोपक्षीणः स्मार्तः प्रत्ययः, इद-मिति चान्य एव वार्तमानिकः प्रत्ययः क्षीयते, ततः सादृश्यप्र-त्ययानुपपत्तिस्तेनेदं सदृशमिति अनेकदर्शिन एकस्याभावात् व्यपदेशानुपपत्तिश्च - द्रष्टव्य-दर्शनेनैवोपचयाद् विज्ञानस्येदं । पश्याम्यदोऽद्राक्ष मिति व्यपदे-शानुपपत्तिः, दृष्टवतो व्यप देशक्षणानवस्थानात् अथा-वतिष्ठेत, क्षणिकवादहानिः; अथादृष्टवत व्यपदेशः सादृश्यप्रत्ययश्च, तदानीं । - जात्यन्धस्येव रूपविशेषव्यपदेश-ब्राह्म है, यह उसके समान है ' ऐसा सादृश्यप्रत्यय हुआ करता है, ' उसके ' यह पहले देखे हुएका स्मरण म्परे है और ' यह ' इस पदसे वर्तमान-की प्रतीति होती है; यदि ' वेन ' नादि इस प्रकार पहले देखे हुएको स्मरण रखकर देखनेवाला ‘ इदम् ' ऐसे भ्या अनुभवपर्यन्त वर्तमान क्षणकालतक रहेगा तो क्षणिकवादको हानि होगी? द्धत और यदि ' तेन ' इतनेहीसे स्मृतिज्ञान क्षीण हो गया और ' इदम् ' ऐसा एक दूसरा ही वार्तमानिक ज्ञान क्षीण होता है तो ऐसी अवस्थामें सादृ- जाय श्यज्ञान होना सम्भव नहीं है, इति ' क्योंकि यह उसके समान है ' इस प्रकार [ इस और उस ] अनेक भिन्न वस्तुओं को देखनेवाला कोई एक नहीं है । प्रत्य [ विज्ञानकी क्षणिकता मानने- नीय पर ] व्यवहारकी भी सिद्धि नहीं मिन हो सकती, क्योंकि विज्ञान तो द्रष्टव्यको देखकर ही क्षीण हो जाता स्पृक है ॥ ' मैं यह देखता हूँ ' ' मैंने इसे चण देखा ' ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं नस्य है, क्योंकि जो देखनेवाला है, वह ऐसा कहने के क्षणमें नहीं रहता; तवत यदि मानें कि रहता है तो क्षणिक- संव्य वादकी हानि होती है; यदि वह कथन न देखनेवालेका है और कहो स कि उसीको सादृश्यप्रत्यय होता है । त्रत्वे तो उस अवस्थामें वह जन्मान्धक