बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 931–940
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940
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[ अध्याय 8 मान है ' ऐसा करता है, खे हुएका स्मरण पदसे वर्तमान-है; यदि ' वेन ' हुएको स्मरण ' इदम् ' ऐसे T न क्षणकालतक की हानि होगी नहीसे स्मृतिज्ञान ' इदम् ' ऐसा निक ज्ञान क्षीण अवस्था में साह-भव नहीं है, समान है ' इस उस ] अनेक कोई एक णिकता मानने-भी सिद्धि नहीं क विज्ञान तो क्षीण हो जाता र सम्भव नहीं निवाला है, वह में नहीं रहता; है तो क्षणिक-न्ती है; यदि वह का है और कहो प्रत्यय होता है । वह जन्मान्धक ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ १७ स्तत्सादृश्यप्रत्ययश्चः सर्वमन्धपर । म्परेति प्रसज्येत सर्वज्ञशास्त्रप्रणय-नादि; न चैतदिष्यते; अकृता-म्यागमकृत विप्रणाशदोषौ तु प्रसि-द्वतरौ क्षणवादे । दृष्टव्यपदेशहेतुः पूर्वोत्तरसहित एक एव हि शृङ्खलावत् प्रत्ययो जायत इति चेत्, ' तेनेदं सदृशम् ' इति च न वर्तमानातीतयो -भिन्नकालत्वात् — तत्र वर्तमान-प्रत्यय एकः शृङ्खलावयवस्था -नीयः, अतीतश्चापरः, तौ प्रत्ययौ भिन्नकालौ तदुभयप्रत्ययविषय-स्पृक् चेच्छृङ्खलाप्रत्ययः, ततः क्षणद्वयव्यापित्वादेकस्य विज्ञा-नस्य पुनः क्षणवादहानिः; मम-तवतादिविशेषानुपपत्तेश्च सर्व-संव्यवहारलोपप्रसङ्गः । सर्वस्य च स्वसंवेद्य विज्ञानमा-त्रत्वे, विज्ञानस्य च स्वच्छावबो-रूप - विशेषकथन और उसीका सादृश्यज्ञान होगा; तब तो सर्वज्ञ बुद्धके शास्त्रप्रणयनादि सब - के - सब अन्धपरम्परा ही हैं - ऐसा कहनेका प्रसंग होगा और यह बात इष्ट नहीं है; इस क्षणिकवादमें बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश - ये दो दोष तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । पूर्वदृष्टके निर्देशका हेतु पूर्वोत्तर प्रत्ययसे युक्त शृङ्खलाके समान एक ही ज्ञान होता है तथा ' उसके समान यह है ' ऐसा भी प्रत्यय होता है - यदि यह कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि वर्तमान और भूत तो भिन्न काल हैं - उनमें श्वङ्ख-लाका अवयवरूप एक वर्तमान प्रत्यय है और दूसरा अतीत प्रत्यय है । वे दोनों प्रत्यय भिन्नकालिक हैं; यदि वह शृङ्खलाके समान प्रत्यय उन दोनों प्रत्ययोंके विषयों-को स्पर्श करनेवाला है तो एक ही विज्ञानके दो क्षणोंमें व्यापक होनेके कारण पुनः क्षणिकवादकी हानि होती है तथा मेरा - तेरा आदि भेद-की उपपत्ति न होनेके कारण सम्पूर्ण व्यवहारके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होता है । सब स्वसंवेद्य विज्ञानमात्र होनेपर | तथा विज्ञान को स्वच्छ ज्ञानप्रकाश-
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९ १८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ धावभासमात्रस्वाभाव्याभ्युपगमा - ॥ त्, तद्दशिन चान्यस्याभावे, अनि त्यदुःखशून्यानात्मत्वाद्यने कंक-ल्पनानुपपत्तिः । न च दाडिमा-देवि विरुद्धानेकांशवत्वं विज्ञान-स्य,, स्वच्छावभासस्वाभाव्यादू ज्ञानस्य । अनित्य दुःखादीनां विज्ञानांशत्वे च सति -- अनुभूय-मानत्वाद् व्यतिरिक्तविषयत्व-प्रसङ्गः । अथ अनित्यदुःखाद्यात्मैकत्व-मेव विज्ञानस्य, तदा तद्वियोगाद् विशुद्धि कल्पनानुपपत्तिः; संयो-गिमलवियोगाद्धि विशुद्धिर्भवति, यथा आदर्शप्रभृतीनाम् न तु स्वाभाविकेन धर्मेण कस्यचिद् वियोगो दृष्टः, न ह्यग्नेः स्वाभावि-केन प्रकाशेन औष्ण्येन वा वियोगो स्वरूप माननेपर यदि उसके साक्षी किसी अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं मानी जायगी तो उसमें अनित्यत्व , दुःखत्व, शून्यत्व और अनात्मव आदि अनेकों कल्पनाओंकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी । अनार आदिके समान विज्ञान बहुत - से विरुद्ध अंशों से युक्त हो- ऐसी बात भी है नहीं, क्योंकि विज्ञान तो स्वच्छ प्रकाशस्वरूप है । यदि अनित्य दुःखादिको विज्ञानका अंश माना जाय तो अनुभूत होनेवाले होनेके कारण उन्हें किसी दूसरेका विषय माननेका प्रसङ्ग होगा । " और यदि विज्ञानको अनित्य दुःखादिरूप ही माना जाय तो उनकी निवृत्तिद्वारा उसकी विशुद्धि-की कल्पना करनी सम्भव नहीं है, क्योंकि विशुद्धि तो लगे हुए मलको दूर करनेसे ही होती है, जैसे कि दर्पणादिकी; किंतु अपने स्वाभाविक धर्मंसे किसीका भी वियोग होता नहीं देखा जाता; अग्निका अपने स्वाभा-विक प्रकाश अथवा उष्णतासे वियोग १. क्योंकि विज्ञान ही अनुभव करनेवाला और अनित्यत्वादि विज्ञानके अंश ही उसके अनुभवके विषय हों — यह सम्भव नहीं है । कारण प्रमेय और प्रमाणका अंशांथिभाव अथवा धर्म - धर्मिभाव किसी भी प्रकार नहीं हो सकता, वे अवश्य पृक् - पृथक् ही होने चाहिये । ब्राह दृष्ट त्वा जनं मनु फल नात कल्प वि परिव प्यन स्यात धर्मो न्न ग्नेरो दनि नहीं, सर्वथ
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[ अध्याय ४ दि उसके साक्षी की सत्ता नहीं समें अनित्यत्व, और अनात्मत्व ओंकी उपपत्ति अनार आदिके बहुत - से विरुद्ध इसी बात भी है न तो स्वच्छ यदि अनित्य का अंश माना नेवाले होनेके दूसरेका विषय I I नको अनित्य ना जाय तो उसकी विशुद्धि-सम्भव नहीं है, नगे हुए मलको है, जैसे कि स्वाभाविक योग होता नहीं अपने स्वाभा ष्णता से वियोग विज्ञानके अंश - और प्रमाणका कता, वे अवश्य ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ १ ९ दृष्टः यदपि पुष्पगुणानां रक्त-त्वादीनां द्रव्यान्तरयोगेन वियो-जनं दृश्यते, तत्रापि संयोगपूर्वत्व मनुमीयते -- बीजभावनया पुष्प-फलादीनां गुणान्तरोत्पत्तिदर्श-नाद; अतो विज्ञानस्य विशुद्धि-कल्पनानुपपत्तिः । विषय विषय्याभासत्वं च यन्मलं परिकल्प्यते विज्ञानस्य, तद-प्यन्यसंसर्गाभावादनुपपन्नम् न ह्यविद्यमानेन विद्यमानस्य संसर्गः स्यात् असति चान्यसंसर्गे यो धर्मो यस्य दृष्टः, स तत्स्वभावत्वा-न्न तेन वियोगमर्हति -यथा-ग्नेरौष्ण्यम्, सवितुर्वा प्रभा; तस्मा -दनित्यसंसर्गेण मलिनत्वं तद्विशु-१. विज्ञानवादीके मतमें विज्ञानसे | होता कभी नहीं देखा गया; पुष्प-के गुण लालिमादिका जो अन्य द्रव्योंके योगसे वियोग होता देखा जाता है, वहां भी उनकी संयोग-| पूर्वताका अनुमान किया जाता है, क्योंकि बीजकी भावनासे ( संस्कार से ) पुष्प एवं फलादिमें अन्य गुणों-की उत्पत्ति होती देखी जाती है; अत: [ अनित्य दुःख आदिको विज्ञानका स्वरूप माननेपर ] विज्ञान के विशुद्ध ( दुःखादिरहित ) होनेकी कल्पना असम्भव होगी । विज्ञान के विषय और विषयी-रूपसे प्रकाशित होनारूप जिस मलकी कल्पना की जाती है, वह भी दूसरेका संसर्गं न होनेपर सम्भव नहीं है; और जो पदार्थ है ही नहीं, उससे किसी विद्यमान वस्तुका संसर्ग हो नहीं सकता; ' इस प्रकार यदि किसी दूसरेका संसगं नहीं है तो जो जिसका धर्मं देखा गया है, वह उसका स्वभाव होनेके कारण उससे वियुक्त नहीं हो सकता; जैसे अग्निको उष्णता और सूर्यकी प्रभा; अतः अनित्य वस्तुओंके संसर्गसे विज्ञानकी भिन्न किसी अन्य वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, इसलिये विद्यमान वस्तु विज्ञानका किसी भी अविद्यमान पदार्थ से संसर्ग होना सर्वथा असम्भव है ।
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९ २० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ द्विश्व विज्ञानस्येतीयं कल्पना । अन्धपरम्परेव प्रमाणशून्येत्यव -गम्यते । यदपि तस्य विज्ञानस्य निर्वाणं पुरुषार्थ कम्पयन्ति, तत्रापि फलाश्रयानुपपत्तिः; कण्ट-कविद्धस्य हि कण्टकवेधजनित दुःखनिवृत्तिः फलम्; न तु कण्टक-विद्धमरणे तद्दुःखनिवृत्तिफल-स्याश्रय उपपद्यते तद्वत् सर्वनि-र्वाणे, असति च फलाश्रये, पुरुषा-थकल्पना व्यर्थैव; यस्य हि पुरुष-शब्दवाच्यस्य सवस्य श्रात्मनो विज्ञानस्य चार्थः परिकल्प्यते, तस्य पुनः पुरुषस्य निर्वाणे; कस्यार्थः पुरुषार्थ इति स्यात् । यस्य पुनरस्त्यनेकार्थदर्शी विज्ञानव्यतिरिक्त आत्मा, तस्य इष्टस्मरणदुःखसंयोगवियोगादि ब्राह मलिनता और [ उनके वियोगसे ] विशुद्धि होती है - यह कल्पना अन्घ- सर्व परम्परा ही है तथा इसका कोई नि प्रमाण भी नहीं है - ऐसा ज्ञात नि होता है । शून इसके सिवा उस विज्ञानका वि निर्वाण ही पुरुषार्थ है - ऐसी जो वे ना कल्पना करते हैं, उसमें भी कोई उस फलका आश्रय होना सम्भव नहीं है; जो काँटेसे बिंधा हुआ है, उसीको कण्टकवेधजनित दुःखकी निवृत्तिरूप फल मिल सकता है | भूत यदि कण्टकविद्ध मर जाय तो वह णा उस दुःखनिवृत्तिरूप फलका आश्रय ज्य नहीं हो सकता; इसी प्रकार सबकी निवृत्ति हो जानेपर कोई फलका म आश्रय न रहनेके कारण पुरुषार्थकी कल्पना करना व्यर्थ ही है; क्योंकि जिस ' पुरुष ' शब्दवाच्य जीव, आत्मा अथवा विज्ञानका अर्थ कल्पना स किया जाता है, उस पुरुषका ही निर्वाण हो जानेपर किसके अर्थको म ' पुरुषार्थं ' ऐसा कहा जायगा । घ हां, जिसके मतमें अनेकों अर्थों-ह का साक्षी विज्ञानसे व्यतिरिक्त कोई म आत्मा है, उसके सिद्धान्तानुसार व देखे हुएका स्मरण, दुःखके संयोग-
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[ श्रध्याय ४ नके वियोगसे ] कल्पना अन्ध-इसका कोई है - ऐसा ज्ञात इस विज्ञानका है - ऐसी जो वे उसमें भी कोई होना सम्भव बंधा हुआ है, ननित दुःखकी ल सकता है; जाय तो वह फलका आश्रय प्रकार सबकी - कोई फलका रण पुरुषार्थकी ही है; क्योंकि जीव, आत्मा इस पुरुषका ही किसके अर्थको जायगा । में अनेकों अर्थों-व्यतिरिक्त कोई सिद्धान्तानुसार • दुःखके संयोग-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ २१ सर्वमेवोपपन्नम्, अन्यसंयोग- | वियोगादि, दूसरेके संयोगके कारण निमित्तं कालुष्यम्, तद्वियोग- होनेवाली मलिनता और उसके निमित्ता च विशुद्धिरिति । वियोगसे होनेवाली शुद्धि - ये सभी सर्वप्रमाण- हो सकते हैं । किंतु शूम्यवादीका शून्यवादिपक्षस्तु पक्ष तो सभी प्रमाणोंसे विरुद्ध है, विप्रतिषिद्ध इति तन्निराकरणाय | अतः उसके निराकरणके लिये और नादरः क्रियते ॥ ७ ॥ प्रयत्न नहीं किया जाता ॥ ७ ॥
आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है यस्मिन् देहे स्वप्नो जिस प्रकार यहाँ एक देहमें कार्यकर- स्वप्न होकर आत्मा मृत्युके रूप भूत्वा मृत्यो रूपाणि देह और इन्द्रियोंका अतिक्रमण कर णान्यतिक्रम्य स्वप्ने स्व आत्म- स्वप्न में अपने आत्मज्योतिःस्त्ररूप-ज्योतिष्यास्ते, एवम् - में ही स्थित रहता है, उसी प्रकार-सवा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्य-मानः पाप्मभिः स ँसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥
वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्मभावसे प्राप्त होता हुआ पापोंसे ( देह और इन्द्रियोंसे ) संश्लिष्ट हो जाता है तथा मरते समय - उत्क्रमण करते समय पापोंको त्याग देता है ॥ ८ ॥
सवै प्रकृतः पुरुषोऽयं जाय-मानः - कथं जायमानः १ इत्युच्यते-शरीरं देहेन्द्रियसंघातमभिसम्प-द्यमानः, शरीरे आत्मभावमापद्य-मान इत्यर्थः, पाप्मभिः पाप्मसम-वह यह प्रकृत पुरुष जन्म लेते समय; किस प्रकार जन्म लेते समय? सो बतलाया जाता है— शरीर यानी देहेन्द्रियसंघातको प्राप्त होता हुआ अर्थात् शरीरमें आत्मभाव करता हुआ, पापोंसे अर्थात् पापके समवायी कारण वायिभिर्धर्माधर्माश्रयैः कार्यकरणै- धर्म और अधर्मके आश्रयभूत देह
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९ २२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ रित्यर्थः 9 संसृज्यते संयुज्यते, स एवोरका मञ्छरीरान्तरमृध्य क्रामन् गच्छन् म्रियमाण इत्ये-तस्य व्याख्यानमुत्क्रामन्निति । तानेव संश्लिष्टान् पाप्मरूपान् कार्यकरणलक्षणान्, विजहाति तैर्वियुज्यते, तान् परित्यजति । यथायं स्वप्नजाग्रद्वयोर्वर्त-माने एवैकस्मिन् देहे पाप्मरूप कार्यकरणोपादान परित्यागाम्या-मनवरतं संचरति धिया समानः लन्, तथा सोऽयं पुरुषः 6. उभा-विहलोकपरलोकौ जन्ममरणा-भ्यां कार्यकरणोपादानपरित्यागौ अनवरतं प्रतिपद्यमानः, श्रा संसारमोक्षात् संचरति । तस्मात् सिद्धमस्य आत्मज्योतिषोऽन्यत्वं कार्यकरणरूपेभ्यः पाप्मभ्यः, संयोगवियोगाभ्याम्, न हि तद्धर्मत्वे सेति, तैरेव संयोगो वियोगो वा युक्तः ॥ ८ ॥
| और इन्द्रियोंसे संसृष्ट — संयुक्त हो जाता है । तथा वही उत्क्रमण करते समय — शरीरान्तरप्राप्तिके लिये ऊपरकी ओर जाते समय, श्रुतिमें ' म्रियमाण: ' ( मरते समय ) इस पदकी ही व्याख्या ' उत्क्रामन् ' इस पदसे की गयी है, उन संश्लिष्ट | देहेन्द्रियरूप पापरूपोंको त्याग देता हे उनसे वियुक्त हो जाता है अर्थात्. उन्हें छोड़ देता है । जिस प्रकार यह जीव, इस एक वर्तमान शरीरमें ही बुद्धिकी समानताको प्राप्त होकर स्वप्न और जाग्रत् दोनों वृत्तियों में पाप-रूप देह तथा इन्द्रियोंका ग्रहण और त्याग करता हुआ निरन्तर संचार करता रहता है, उसी प्रकार यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा देहेन्द्रियका निरन्तर ग्रहण और त्याग करता हुआ इहलोक और परलोक दोनोंमें तबतक संचार करता रहता है, जबतक इस संसार - बन्धनसे मुक्त नहीं हो जाता । अतः इन संयोग और वियोगके कारण इस आत्मज्योतिका देहे-न्द्रियरूप पापोंसे अन्यत्व सिद्ध होता है; उन्हींका धर्म होनेपर तो इसका उन्हींसे संयोग या वियोग होना बन ही नहीं सकता ॥ ८ ॥
बा यौ संच स्त्र केन एक पर इ ता भ प म स्थ यह यह का
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[ अध्याय ४ ष्ट - संयुक्त हो वही उत्क्रमण रान्तरप्राप्तिके जाते समय, मरते समय ) ा ' उत्क्रामन् ’ उन संश्लिष्ट को त्याग देता ता है अर्थात् - जीव, इस ही बुद्धि Fa तयों में पाप-योंका ग्रहण मा निरन्तर उसी प्रकार रणके द्वारा ग्रहण और हलोक और तक संचार जबतक इस हो जाता । वियोगके तिका देहे-सिद्ध होता र तो इसका योग होना ॥ ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ २३ आत्मा के दो स्थानोंका वर्णन ननु न स्वोऽस्योभौ लोकौ यौ जन्ममरणाभ्यामनुक्रमेण संचरति स्वप्नजागरिते इव, स्वप्न जागरिते तु प्रत्यक्षमवग-येते, न त्विहलोक परलोकौ केनचित् प्रमाणेन तस्मादेते एव स्वप्नजागरिते इहलोक -परलोकौं ॥ इत्युच्यते-। किंतु स्वप्न और जाग्रत्के समान यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा . क्रमशः जिनमें संचार करता है, इसके वे दोनों लोक तो हैं नहीं; स्वप्न और जाग्रत् तो प्रत्यक्ष जाने | जाते हैं, किंतु इहलोक और पर-लोकका तो किसी भी प्रमाणसे ज्ञान नहीं होता, अतः ये स्वप्न और जागरित ही इहलोक और परलोक हैं । इसपर कहा जाता है— तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्व े एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च: संध्यं तृतीय 7 स्वप्नस्थानं तस्मिन् संध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीद च परलोकस्थानं च । अथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दाँश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रा-मपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योति-र्भवति ॥ ६ ॥
उस इस पुरुषके दो ही स्थान हैं - यह लोक और परलोकसम्बन्धी स्थान; तीसरा स्वप्नस्थान संध्यस्थान है । उस संध्यस्थानमें स्थित रहकर यह इस लोकरूप स्थान और परलोकस्थान- इन दोनोंको देखता है । यह पुरुष परलोकस्थानके लिये जैसे साधनसे सम्पन्न होता है, उस साधन-का आश्रय लेकर यह पाप ( पापका फलरूप दु: ख ) और आनन्द दोनों-
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९ २४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ हीको देखता है । जिस समय यह सोता है, उस समय इस सर्वावान् लोककी मात्रा ( एकदेश ) को लेकर, स्वयं ही इस स्थूलशरीरको अचेत करके तथा स्वयं अपने वासनामय देहको रचकर, अपने प्रकाशसे अर्थात् अपने ज्योतिःस्वरूपसे शयन करता ज्योतिःस्वरूप होता है ॥ ६ ॥
तस्यैतस्य पुरुषस्य वै द्वे एव स्थाने भवतः, न तृतीयं चतुर्थ वा, के ते १ इदं च यत् प्रतिपन्नं वर्तमानं जन्म शरीरेन्द्रियविषय-वेदनाविशिष्टं स्थानं प्रत्यक्षतो-ऽनुभूयमानम्, परलोक एव स्थानं परलोकस्थानम् - तच्च शरी-रादिवियोगोत्तर कालानुभाव्यम् ॥ ननु स्वप्नोऽपि परलोकः, तथा च सति द्वे एवेत्यवधारण-मयुक्तम् । न, कथं तर्हि? संध्यं तत् — इहलोकपरलोकयोर्यः संधिस्त स्मिन् भवं संध्यं यत् तृतीयं तत् स्वप्नस्थानम्, तेन स्थान-द्वित्वावधारणम्, न हि ग्रामयोः संधिस्तावेव ग्रामावपेक्ष्य तृतीय-त्वपरिगणनमईति । है; इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयं उस इस पुरुषके निश्चय दो ही स्थान होते हैं; न तो तीसरा होता है और न चौथा ही । वे कौन - से हैं? यह जो प्राप्त वर्तमान जन्म है, अर्थात् जो शरीर, इन्द्रिय, विषय और वेदनायुक्त प्रत्यक्षतया अनुभव होनेवाला स्थान है तथा परलोक-स्थान - जिसमें परलोक ही स्थान है; वह शरीरादिके वियोगके पश्चात् अनुभव होनेवाला है । शङ्का - किंतु स्वप्न भी तो पर-लोक है और यदि ऐसी बात है तो दो ही इस प्रकार I निश्चय उचित नहीं है । समाधान- - ऐसी बात नहीं है, तो फिर कैसी बात है? वह संध्य है - इहलोक और परलोककी जो संधि है, उसमें रहनेवाला जो तीसरा संध्यस्थान है, वह स्वप्न-स्थान है । इसीसे स्थानोंके दो होनेका निश्चय किया गया है; क्योंकि दो ग्रामोंकी संधि उन ग्रामोंक़ी अपेक्षा तृतीयरूपसे गिनने योग्य नहीं मानी जाती । 2 स स वि र स स्व भ 5 र E f
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अध्याय ४ इस सर्वावान् को अ काशसे अर्थात् पुरुष स्वयं निश्चय दो ही तीसरा होता । वे कौन - से मन जन्म है, न्द्रय विषय तया अनुभव था परलोक-क ही स्थान योगके पश्चात् भी तो पर बात है तो नश्चय नहीं है, ? वह संध्य परलोककी हनेवाला जो वह स्वप्न-स्थानोंके दो गया है; संधि उन रूपसे गिनने " ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ २५ कथं पुनस्तस्य परलोकस्थान-स्यास्तित्वमवगम्यते १ यदपेक्ष्य स्वप्नस्थानं संध्यं भवेत् -यत-स्तस्मिन् संध्ये स्वप्नस्थाने तिष्ठन् भवन् वर्तमानः एते उमे । स्थाने पश्यति के ते उभे १ इदं च परलोकस्थानं च । तस्मात् स्वः स्वप्नजागरितव्यति-रेकेणोभौ लोकौ, यौ धिया समानः सन्ननुसंचरति जन्म-मरणसंतानप्रबन्धेन । कथं पुनः स्वप्ने स्थितः सन्नु-स्वप्नस्थपुरुषस्यो - भौ लोकौ पश्यति । भयस्थानावलोकन- किमाश्श्रयः, केन प्रकार: विधिना १ इत्युच्यते-अथ कथं पश्यति? इति शृणु -यथाक्रम आक्रामत्यनेनेत्याक्रमः --श्राश्रयोऽवष्टम्भ इत्यर्थः ॥ यादृश श्राक्रमोऽस्य, सोऽयं यथाक्रमः । अयं पुरुषः परलोकस्थाने प्रतिप-त्तव्ये निमित्ते, यथाक्रमो भवति यादृशेन परलोकप्रतिपत्तिसाधनेन विद्याकर्म पूर्वप्रज्ञालक्षणेन युक्तो किंतु उस परलोकस्थानके अस्तित्वका ज्ञान कैसे होता है? जिसकी अपेक्षासे स्वप्नस्थान संव्य-स्थान होता है? [ इसका उत्तर देते हैं ] क्योंकि उस संध्य स्वप्न-स्थान में स्थित अर्थात् वर्तमान रह-कर पुरुष इन दोनों स्थानोंको देखता है; वे दोनों स्थान कौन - से हैं? - यह लोकरूप स्थान और परलोकस्थान । अतः स्वप्न और जागरितसे भिन्न दोनों लोक हैं ही, जिनमें कि अपनी बुद्धिकी समान-ताको प्राप्त होकर पुरुष जन्म - मरण-परम्परा के क्रमसे निरन्तर संचार करता रहता है । किंतु पुरुष स्वप्न में स्थित रह-कर किस प्रकार, किस आश्रयमें रहकर और किस विधिसे दोनों लोकोंको देखता है? सो बतलाया जाता है— अब वह किस प्रकार देखता है? सो सुनो – ' यथाक्रम, ' जिससे जीव आक्रमण करता है, उसे आक्रम - आश्रय अर्थात् अव-टम्भ ( आधार ) कहते हैं । इस जीवका जैसा आक्रम हो, उसके अनुसार यह ' यथाक्रम ' कहलाता है; यह पुरुष अपने प्राप्त करने योग्य परलोकस्थानरूप निमित्तमें जैसे आक्रमवाला होता है अर्थात् विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञारूप जिस प्रकारके परलोकप्राप्तिके साघनसे
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ २६ भवतीत्यर्थः; तमाक्रमं परलोक - । स्थानायोन्मुखीभूतं प्राप्ताङ्कुरी-भावमिव बीजं तमाक्रममाक्रम्या-चष्टम्याश्रित्योभयान् पश्यति — -बहुवचनं धर्माधर्मफलानेकत्वात् - | उभयानुभयप्रकारानित्यर्थः । कांस्तान् १ पाप्मनः पाप-फलानि - न तु पुनः साक्षादेव । पाप्मनां दर्शनं सम्भवति, तस्मात् पापफलानि दुःखानीत्यर्थः -- श्रानन्दां धर्मफलानि सुखानी । त्येतत्, तानुभयान् पाप्मन श्रा-नन्दांश्च पश्यति जन्मान्तरदृष्टवा-सनामयान्; यानि च प्रतिपत्त-व्यजन्मविषयाणि क्षुद्रधर्माधर्म-फलानि, धर्माधर्मप्रयुक्तो देवता -जुग्रहाद् वा पश्यति । तत् कथमवगम्यते परलोकस्था-युक्त होता है, उस आक्रमको—— अङ्कुरभावको प्राप्त हुए बीजके समान परलोकस्थानके प्रति उन्मुख हुए उस आक्रमको आक्रान्त कर, उसका अवष्टम्भ अर्थात् आश्रय लेकर दोनों लोकोंको देखता है । ' उभयान् ' इस पदमें बहुवचन धर्मा-धर्मके फलोंकी अनेकता के कारण है । ' उभयान् अर्थात् उभय प्रकारके 1 उनको किनको? पापोंको अर्थात् पापके फलोंको । साक्षात् पापों का ही दर्शन होना तो सम्भव है नहीं, इसलिये पापोंके फल अर्थात् दुःखों-को और आनन्दोंको अर्थात् धर्मके फलरूप सुखोंको - इन जन्मान्तरदृष्ट वासनाओंके कार्यं पाप ( दुःख ) और आनन्द दोनोंहीको देखता है । इनके सिवा, जो प्राप्त होनेवाले जन्मोंसे सम्बद्ध धर्म और अधर्मोके क्षुद्र फल हैं, उन्हें भी धर्माधर्मसे प्रेरित होकर अथवा देवताके अनुग्रहसे देखता है । किंतु यह कैसे जाना जाता है ब्राह पूर्व तेन भाव येन विष नाि षाम स्वय दैवा एवो S सन वेन रूपेण भूत कि स्वप्नमें परलोकस्थान में होनेवाले यथो नभावित पाप्मानन्ददर्शनं स्वप्ने १ सुखदुःखोंका दर्शन होता है; सो इत्युच्यते - यस्मादिह जन्म- बतलाया जाता है- क्योंकि जिनका माह इस जन्ममें अनुभव नहीं हो सकता, न्यननुभाव्यमपि पश्यति बहु ऐसी भी बहुत - सी बातें देखता यसि स्वप्नो नामापूर्वं दर्शनम् है हो; -- ऐसी और बात स्वप्न हे अपूर्वदर्शन नहीं, स्वाप १. क्योंकि वे दोनों लोक हैं तो धर्माधर्मके परिणाम ही ।