बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 941–950
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950
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- अध्याय ४ आक्रमको --हुए बीजके के प्रति उन्मुख आक्रान्त कर, र्थात् आश्रय देखता है । बहुवचन धर्मा-कारण अर्थात् उभय नापोंको अर्थात् क्षात् पापों का म्भव है नहीं, अर्थात् दुःखों-अर्थात् धर्मंके जन्मान्तरदृष्ट प ( दुःख ) और वता है । इनके नेवाले जन्मोंसे क्षुद्रफल प्रेरित होकर हसे देखता है । जाना जाता है । यान में होनेवाले होता है; सो क्योंकि जिनका हीं हो सकता, बातें देखता अपूर्वं दर्शन नहीं, ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ पूर्वदृष्टस्मृतिर्हि स्वप्नः प्रायेण; तेन स्वप्नजागरितस्थानव्यतिरे-रेण हत उभो लोकौ । यदादित्यादिवाह्मज्योतिषाम-भावेऽयं कार्यकरणसंघातः पुरुषः येन व्यतिरिक्तेन श्रात्मना ज्यो-तिषा व्यवहरतीत्युक्तम् —तदेव नास्ति, यद् आदित्यादिज्योति -षामभावगमनस्, यत्रेदं विविक्तं स्वयंज्योतिरुपलभ्येत; येन सर्व-दैवायं कार्यकरणसंघातः संसृष्ट एवोपलभ्यते तस्मादसत्समो-ऽसन्नेव वा स्वेन विविक्तस्वभा-वेन ज्योतीरूपेणात्मेति । अथ ' क्वचिद् विविक्तः स्वेन ज्योती-रूपेणोपलभ्येत बाह्याध्यात्मिक-भूतभौतिकसंसर्गशून्यः, ततो यथोक्तं सर्वं भविष्यतीत्येतदर्थ-माह-स यः प्रकृत आत्मा यत्र यस्मिन् काले प्रस्वपिति प्रकर्षेण स्वापमनुभवति तदा किमुपादानः । ९ २७ | अधिकतर तो पहले देखे हुएको स्मृतिका नाम ही स्वप्न है । अतः दोनों लोक स्वप्न और जागरित-स्थानोंसे भिन्न हैं । जिन आदित्यादि बाह्यज्योति-योंके अभाव में यह देहेन्द्रियसंघात-रूप पुरुष जिस अपनेसे भिन्न आत्मज्योतिके द्वारा व्यवहार करता है - ऐसा कहा गया है, सो उन | आदित्यादि ज्योतियोंका जो अभाव होना है, जहाँ कि इस विशुद्ध स्वयंज्योति आत्माकी उपलब्धि होती है, वह स्थान ही नहीं है; क्योंकि यह देहेन्द्रियसंघात सर्वंदा वाह्यज्योतियोंसे संश्लिष्ट ही देखा जाता है; अत: अपने विविक्तस्वभाव ज्योतीरूपसे यह आत्मा असत् समान अर्थात् असत् ही है । यदि यह कभी बाह्य, आध्यात्मिक तथा भूत और भौतिक पदार्थोंके संसर्गसे शून्य अपने विशुद्ध ज्योतिःस्वरूपसे उपलब्ध होता तो ऊपर कहा हुआ सब कुछ सो सकता था- इसलिये श्रुति कहती है-जो प्रकृत आत्मा है, वह जिस समय ' प्रस्वपिति ' -- प्रकर्षतया स्वाप ( निद्रा ) का अनुभव करता है, उस समय वह किस उपादानवाला होकर
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ २८ केन विधिना स्वपिति संध्यं । स्थानं प्रतिपद्यते १ इत्युच्यते— श्रस्य दृष्टस्य लोकस्य जागरि-तलक्षणस्य, सर्वावतः सर्वमव-तीति सर्वावानयं लोकः कार्य- | करणसंघातो विषयवेदनासंयुक्तः सर्वावत्त्वमस्य व्याख्यातमन्न-जयप्रकरणे “ अथो अयं वा आत्मा " इत्यादिना । सर्वा वा भूतभौतिकमात्रा अस्य संसर्ग -कारणभूता विद्यन्त इति सर्व-बान्, सर्ववानेव सर्वावान्, तस्य सर्वावतो मात्रामेकदेशमवयवम्, पादायापच्छिद्य आदाय गृहीत्वा - दृष्टजन्मवासनावासितः सन्नित्यर्थः स्वयमात्मनैव विहत्य देहं पातयित्वा निःसम्बोधमा-पाद्य - जागरिते ह्यादित्यादीनां चक्षुरादिष्वनुग्रहो देहव्यवहा-रार्थः, देहव्यवहारचात्मनो धर्मा-धर्मफलोपभोगप्रयुक्तः, तद्धर्मा-ब्रा किस विधिसे सोता यानी संध्य-प्राप्त होता है । सो वि स्थानको बतलाया जाता है-- इस जागरितरूप नि दृष्ट लोककी सर्वावान् -- जो सबका द अवन ( पालन ) करता है, वह यह त्क लोक अर्थात् विषय एवं सुखदुःखादि वेदनायुक्त देहेन्द्रियसंघात, इसके सर्वावत्त्वकी व्याख्या " अथो अयं वा द आत्मा " इत्यादि वाक्यद्वारा अन्न- शे त्रयके प्रकरण में कर दी गयी है । क अथवा सम्पूर्ण भूत भौतिक मात्रा [ अध्यात्मादि भागोंके साथ ] इसके त संसगँकी कारणभूता है, इसलिये प्र यह सर्ववान् है और सर्व॑वान् हो ' ' सर्वावान् ' कहा गया है, उस भ सर्वावान्की मात्रा —— एकदेश अर्थात् यि अवयवका अपादान - अपच्छेदन -आदान अर्थात् ग्रहण कर यानी भ दृष्ट जन्मकी वासनाओंसे सम्पन्न वि हो, स्वयं अर्थात् आप ही देहको व विहत — चेतनाशून्य कर- जागरित अवस्था में ही देहके व्यवहारके लिये क चक्षु आदि इन्द्रियों में आदित्यादिका उपकार होता है और देहका ति व्यवहार आत्माके धर्मा - धर्मके ति फलोपभोगके कारण होता है, तथा धर्मफलोपभोगोपरमणमस्मिन् देहे इस देहमें वह धर्माधर्मके फलोप-भोगकी उपरति आत्माके कर्मकी ब श्रात्मकर्मोपरमकृतमित्यात्मास्य उपरतिके कारण है, इसलिये आत्मा
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[ अध्याय ४ ना यानी संध्य-है! सो - इस जागरितरूप बानू -- जो सबका ता है, वह यह एवं सुखदुःखादि यसंघात, इसके ना " अथो अयं वा वाक्यद्वारा अन्न-कर दी गयी है । भौतिक मात्रा के साथ ] इसके ता है, इसलिये और सर्ववान् ही गया है, उस - एकदेश अर्थात् नादान - अपच्छेदन ग्रहण कर यानी नाओंसे सम्पन्न आप ही हो न्य कर - जागरित के व्यवहारके लिये में आदित्यादिका है और देहका नाके धर्मा - धर्म के रण होता है, तथा धर्माधर्मके फलोप-आत्माके कर्मकी है, इसलिये आत्मा ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ २ ९ विहन्तेत्युच्यते - स्वयं निर्माय । निर्माणं कृत्वा वासनामयं स्वप्न-देहं मायामयमिव, निर्माणमपि त स्कर्मापेक्षत्वात् स्वयं कर्तृकमुच्यते । स्वेन आत्मीयेन, भासा मात्रोपा-दानलक्षणेन भासा दीप्त्या प्रका-शेन, सर्ववासनात्मकेन अन्त: -करणवृत्तिप्रकाशेनेत्यर्थः - सा हि तत्र विषयभूता सर्ववासनामयी प्रकाशते, सा तत्र स्वयं भा उच्यते — तेन स्वेन भासा विषय भूतेन, स्वेन च ज्योतिषा तद्विष-यिणा विविक्तरूपेण अलुप्तदृक्स्व-भावन तद् भारूपं वासनात्मकं विषयीकुर्वन् प्रस्वपिति 1 । यदेवं वर्तनम् म् तत् प्रस्वपितीत्युच्यते । अत्रेतस्यामवस्थायाम् एतस्मिन् काले, अयं पुरुष आत्मा, स्वयमेव विविक्तज्योतिर्भवति - बाह्याध्या त्मिकभूत भौतिक संसर्गरहितं ज्यो तिर्भवति । इसका हनन करनेवाला कहा जाता है - तथा स्वयंनिर्माण कर - माया-मयके समान वासनामय स्वप्नदेह रचकर [ शयन करता है । ] देहका निर्माण भी आत्माके कर्मोकी अपे-क्षासे है, इसलिये वह आत्मकर्तृ क कहा गया है । स्वकीय यानी अपने भाससे -— मात्रोपादानरूपभास - दीप्ति अर्थात् प्रकाशसे यानी सर्व-वासनात्मक अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रकाशसे, क्योंकि वह सर्वंवासना-मयी वृत्ति ही वहां विषयभूता होकर प्रकाशित होती है, उस अव-स्थामें वह स्वयं भा ( प्रकाश ) कहीं जाती है । उस अपनी विषयभूता भासे तथा उसको विषय करनेवाली विशुद्धरूपा ' अलुप्तकस्वभावा मात्मज्योतिसे उस अपने वासनात्मक प्रकाशस्वरूपको विषय करता हुआ प्रस्वाप ( शयन ) करता है । इस प्रकार जो रहना है, वही ' प्रस्व-पिति ' ऐसा कहा जाता है । यहां इस अवस्थामें - इस काल-में यह पुरुष अर्थात् आत्मा स्वयं ही विशुद्धज्योतिःस्वरूप होता है अर्थात् बाह्य आध्यात्मिक भूत एवं भौतिक संसगंसे रहित ज्योति होता है । १. जिसके बोधस्वरूप या साक्षीस्वभावका साक्षास्वभावका कभी कभी लोप लोप नहीं नहीं हुआ है है ॥ बृ ० उ ० ५६-
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ ९ ३० नन्वस्य लोकस्य मात्रोपादानं कृतम्, कथं तस्मिन् सत्यनायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवतीत्युच्यते १ नैष दोषः विषयभूतमेव हि तत्, तेनैव चात्रायं पुरुषः स्वयं-ज्योतिर्दर्शयितुं शक्यः न त्वन्य-थासति विषये कस्मिंश्चित् सुषुप्त काल इव; यदा पुनः सा भा वासनात्मिका विषयभूता उपल- । भ्यमाना भवति, तदा असिः कोशादिव निष्कृष्टः सर्वसंसर्ग-रहितं चक्षुरादिकार्यकरणव्यावृत्त-स्वरूपम लुप्तद्दगात्मज्योतिः स्वेन रूपेणावभासयद् गृह्यते । तेनात्रा-यं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीति सिद्धम् ॥९ ॥
शङ्का - किंतु इसने तो इस लोक-की [ विषय- वेदनासंयुक्त ] मात्राको ग्रहण किया है; फिर उसके रहते हुए यह पुरुष स्वयंज्योति होता है— ऐसा कैसे कहा जाता है? समाधान -- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वह मात्रा तो विषयभूता ही होती है । इसीलिये यहाँ यह पुरुष [ आत्मा ] ' स्वयंज्योतिः ' स्वरूप-से दिखाया जा सकता है, नहीं तो सुषुप्तावस्था के समान, जब कि कोई भी विषय नहीं रहता, इस स्वयंज्योतिका दर्शन नहीं कराया जा सकता । और जिस समय कि वह वासनात्मिका ज्योति विषय-भूता होकर उपलब्ध होती है, उस समय म्यानसे निकाली हुई तल-बारके समान सर्वसंसर्गशून्य, चक्षु आदि कार्य - करणसे व्यावृत्तस्वरूप तथा जिसके बोध - स्वभावका कभी लोप नहीं होता, वह आत्मज्योति अपने स्वरूपसे प्रकाश करती हुई स्वयं गृहीत होती है । अतः यह सिद्ध हुआ कि इस अवस्था में यह पुरुष स्वयंज्योति होता है ॥ ६ ॥
स्वप्नावस्थामें रथादिका अभाव है, इसलिये उस समय आत्मा स्वयंज्योति है नन्वत्र कथं पुरुषः स्वयंज्यो- | शङ्का - किंतु इस अवस्थामें पुरुष तिर्येन जागरित स्वयंज्योति कैसे हो सकता है? इव ग्राह्यग्राहका- क्योंकि जागरितके समान इस समय ब्रा दि च . रि क्रि ति नर मन स्म या लो भ न्त त पर
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अध्याय ४ तो इस लोक-क ] मात्राको उसके रहते ति होता है-है? ई दोष नहीं. तो विषयभूता यहाँ यह पुरुष तिः ' स्वरूप-ता है, नहीं नान, जब कि रहता, इस नहीं कराया जस समय कि योति विषय-होती है, उस ली हुई तल-गंशून्य, चक्षु व्यावृत्तस्वरूप भावका कभी आत्मज्योति करती हुई । अतः यह अवस्था में यह है ॥ ६ ॥
- समय वस्था में पुरुष सकता है? नान इस समय ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ दिलक्षणः सर्वो व्यवहारो दृश्यते । चक्षुराद्यनुग्राहकाच श्रादित्याद्या लोकास्तथैव दृश्यन्ते यथा जाग-रिते - तत्र कथं विशेषावधारणं क्रियते — अत्रायं पुरुषः स्वयंज्यो-तिर्भवतीति १ उच्यते - वैलक्षण्यात् स्वप्नदर्श-नस्य; जागरिते हि इन्द्रियबुद्धि-मनश्चालोकादिव्यापारसंकीर्णमा -त्मज्योति '; इह तु स्वप्ने इन्द्रि याभावात् तदनुग्राहकादित्याद्या-लोकाभावाच्च विविक्तं केवलं भवति तस्माद् विलक्षणम् । ननु तथैव विषया उपलभ्य-न्ते स्वप्नेऽपि, यथा जागरिते; तंत्र कथमिन्द्रियाभावाद् वैलक्ष ण्यमुच्यत इति? शृणु – किर ९ ३१ भी ग्राह्य - ग्राहकादिरूप सारा व्यव-हार देखा जाता है तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके उपकारक आदित्यादि लोक भी उसी प्रकार देखे जाते हैं, जैसे कि जागरित- अवस्था में देखे जाते थे, फिर ' इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता है ' इस प्रकार विशेषरूपसे निश्चय क्यों किया जाता है? समाधान- बतलाते हैं— क्योंकि स्वप्नदर्शनकी जागरितसे विलक्ष-णता है, जागरित- अवस्थामें आत्म-ज्योति इन्द्रिय, बुद्धि, मन और आलोकादि व्यापारसे व्याप्त रहती. है किंतु यहाँ स्वप्नमें तो इन्द्रियोंके अभाव तथा उनके उपकारक आदि-त्यादिके प्रकाशके अभावके कारण वह विशुद्ध अर्थात् केवल रहती है, इसलिये यह विलक्षण है । शङ्का - किंतु जिस प्रकार जाग-रितमें दिखायी देते हैं उसी प्रकार स्वप्न में भी विषयोंकी उपलब्धि होती ही है, फिर इन्द्रियोंके अभाव-के कारण ही उसकी विलक्षणता क्यों बतायी जाती है? समाधान- सुनो-
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ ३२ न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान्मुदः प्रमुदः सृजते । न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्त्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥
उस अवस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले [ अश्वादि ] हैं और न मार्ग ही हैं । परंतु वह रथ, रथमें जोते जानेवाले [ अश्वादि ] और रथके मार्गीकी रचना कर लेता है । उस अवस्थामें आनन्द, मोद और प्रमोद भी नहीं हैं, किंतु वह आनन्द, मोद और प्रमोदकी रचना कर लेता है । वहां छोटे - छोटे कुण्ड, सरोवर और नदियाँ नहीं हैं; वह कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है -न तत्र विषयाः स्वप्ने स्थादि । लक्षणाः; तथा न रथयोगाः, रथेषु युज्यन्ते इति रथयोगा -श्वादयः, तत्र न विद्यन्ते; न च पन्थानो रथमार्गा भवन्ति । अथ रथान् रथयोगान् पथश्च सृजते स्वयम् । कथं पुनः सृजते रथादि-साधनानां वृक्षादीनामभावे? उच्यते – ननूक्तम् ' अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामा-दाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय ' इति अन्तःकरण-वृत्तिरस्य लोकस्य वासना-वही उनका कर्ता है ॥ १० ॥
वहाँ उस स्वप्नावस्था में रथादि-रूप विषय नहीं हैं और न रथयोग हैं, जो रथमें जोते जाते हैं, वे रथ-योग अर्थात् अश्वादि वहाँ मौजूद नहीं हैं; और न पथ - रथके मार्ग ही हैं । किंतु यह रथ रथयोग और मार्गों की स्वयं रचना कर लेता है । शङ्का - किंतु रथादिके साधन वृक्षादिका .. अभाव होनेपर भी यह उनकी रचना कैसे कर लेता है? समाधान- बतलाते हैं, ऐसा कहा है न न कि ' इस सर्वावान् लोककी मात्राको लेकर अपनेको चेतनाशून्य कर तथा दूसरा शरीर रचकर ' इत्यादि सो अन्तःकरणकी वृत्ति ही इस ब्र म f र ग्र 44 तु ) P ह वि नि पेठ त पुष्क
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[ अध्याय ४ भवन्त्यथ न्दा मुदः न तत्र वेशान्तान् १० ॥ वादि ] हैं और [ द ] और रथके. द और प्रमोद कर लेता है । कुण्ड, सरोवर १० ॥ स्था में रथादि-और न रथयोग T ते हैं, वे रथ-वहाँ मौजूद - रथके मार्ग ही रथयोग और कर लेता है । दिके साधन नेपर भी यह र लेता है? ते हैं, ऐसा स सर्वावान् कर अपनेको तथा दूसरा इत्यादि सो ही इस ब्राह्मण ३ ] मात्रा तामपादाय रथादिवासना -रूपान्तःकरणवृत्तिस्तदुपलब्धि-निमित्तेन कर्मणा चोद्यमाना दृश्यत्वेन व्यवतिष्ठते; तदुच्यते -स्वयं निर्मायेति; तदेवाह— रथादीन् सृजत इति । न तु तत्र, करणं वा करणानु-ग्राहकाणि वा आदित्यादिज्यो-तींषि, तदवभास्या वा रथादयो विषया विद्यन्ते तद्वासनामात्रं तु केवलं तदुपलब्धिकर्मनिमित्त-चोदितोद्भूतान्तःकरणवृत्त्याश्रयं दृश्यते । तद् यस्य ज्योतिषो दृश्यते ऽलुसदृशः, तदात्म-ज्योतिरत्र केवलमसिरिव कोशाद् विविक्तम् । तथा न तत्रानन्दाः सुखवि-शेषाः, मुदो हर्षाः पुत्रादिलाभ -निमित्ताः, प्रमुदस्त एव प्रकर्षो-पेताः अथ चानन्दादीन् सृजते । तथा न तत्र वेशान्ताः पल्वलाः, पुष्करिण्यस्तडागाः, स्रवन्त्यो नद्यो ९ ३३ VAIN लोककी वासनाकी मात्रा है, उसे लेकर रथादिकी वासनारूपा जो अन्तःकरणकी वृत्ति है, वह उसकी उपलब्धिके निमित्तभूत कर्मसे प्रेरित होकर दृश्यरूपसे स्थित होती है । उसीको ' स्वयं निर्माय ' इस प्रकार कहा है और उसीको ' रथादीन् सृजते ' इन शब्दोंसे कहा है । उस अवस्थामें इन्द्रिय, इन्द्रियों-के अनुग्राहक आदित्यादि प्रकाश अथवा उनसे प्रकाश्य रथादि विषय भी नहीं हैं, उनकी उपलब्धिके हेतु-भूत जो कर्म हैं, उन कर्मरूप निमित्तसे प्रेरित जो अन्तःकरणकी उद्भूत वृत्ति है, उसके आश्रित रहनेवाली केवल उनकी वासना-मात्र तो देखी जाती है । वह जिस नित्यज्ञानस्वरूप ज्योतिको दिखायी देती है, वह आत्मज्योति इस अवस्थामें म्यानसे निकाली हुई तलवारके समान शुद्ध होती है । इसी प्रकार उस समय आनन्द-सुखविशेष, मुद - पुत्रादिकी प्राप्तिसे होनेवाले हर्षं और प्रमुद् - प्रकर्षको प्राप्त हुए वे हर्ष भी नहीं हैं; किंतु यह आनन्दादिको रच लेता है । तथा उस अवस्थामें न वेशान्त-पल्वल ( छोटी तलेया ), न पुष्करिणी तडाग और न स्रवन्ती - नदियाँ ही
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९ ३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ भवन्ति; अथ वेशान्तादीन् सृजते वासनामात्ररूपान्, यस्मात् स हि कर्ता; तद्वासनाश्रयचित्तवृत्त्युद्ध बनिमित्त कर्महेतुत्वेनेत्यवोचाम तस्यं कर्तृत्वम्; न तु साक्षादेव तत्र क्रिया सम्भवति, साधना-भावात् । न हि कारकमन्तरेण क्रिया सम्भवति; न च तत्र हस्तपादा-दीनि क्रियाकारकाणि सम्भवन्ति यत्र तु तानि विद्यन्ते जागरिते, तत्र आत्मज्योतिरवभासितैः का-करण रथादिवासनाश्रयान्तः-करणवृत्त्युद्भवनिमित्तं कर्म निर्व-र्त्यते; तेनोच्यते — स हि कर्तेति; तदुक्तम् -- ' आत्मनैवायं ज्यो-तिषास्ते पन्ययते कर्म कुरुते ' इति तत्रापिन परमार्थतः स्वतः कर्तृत्वं चैतन्यज्योतिषोऽवभासकत्वव्य-तिरेकेण - यच्चैतन्यात्मज्योतिषा-है; किंतु यह उन वासनामात्ररूपी पल्वलादिकी रचना कर लेता है क्योंकि वही कर्ता है; उन विषयों-व की वासनाको आश्रयभूता जो चित्तवृत्ति है उसके परिणामके C कारण होनेवाले जो कर्म हैं, उनके कारण ही उसका कर्तृत्व बतलाया 2 गया है, साक्षादरूपसे ही उसमें क्रियाका होना सम्भव नहीं है; २ क्योंकि उसके पास क्रियाके साधनों-का अभाव है । कारकके बिना क्रियाका होना सम्भव नहीं है और वहीं क्रियाके कारक हाथ - पैर आदि हैं नहीं; जहाँ जागरित - अवस्था में वें रहते हैं वहीं आत्मज्योतिसे प्रकाशित देह और इन्द्रियोंके द्वारा रथादिकी वासनाओंकी आश्रयभूता अन्तः-करणकी वृत्तिके उत्थानसे होनेवाला कर्म निष्पन्न हो सकता है, इसीसे ऐसा कहा जाता है कि वही कर्ता है | और इसीसे ' वह आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर - उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है ' ऐसा कहा है; वहाँ भी अवभासक होने के सिवा इस चैतन्यज्योर्ति- ह का वास्तव में स्वतः कोई कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि आत्मा अन्त: -करणके द्वारा चैतन्यात्म-
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[ अध्याय ४ सनामात्ररूपी करता है उन विषयों-श्रयभूता जो के परिणामके कर्म हैं, उनके तृत्व बतलाया नसे ही उसमें -भव नहीं है; क्रिया के साधनों-क्रियाका होना वहीं क्रिया के नादि हैं नहीं; यामें वे रहते हैं प्रकाशित देह T रा रथादिकी यभूता अन्तः-बानसे होनेवाला कता है, इससे है कि वही आत्मज्योतिसे घर जाता, कर्म लौट आता है ' भी अवभासक चैतन्यज्योति-कोई कर्तृत्व आत्मा अन्त: -चैतन्यात्म-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ३५ न्तःकरणद्वारेणावभासयति कार्य -करणानि, तदवभासितानि कर्मसु व्याप्रियन्ते कार्य करणानि, तत्र कर्तृत्वमुपचर्यत आत्मनः । यदुक्तम् — ' ध्यायतीव लेलाय-तीव ' इति, तदेवानूद्यते – ' स हि कर्ता ' इतीह हेत्वर्थम् ॥१० ॥ ।
ज्योतिसे देह और इन्द्रियोंको प्रका-शित करता है और उससे प्रका-शित हुई देह और इन्द्रियाँ कर्ममें प्रवृत्त होती हैं, इसीसे उनमें आत्माके कर्तृविका उपचार किया जाता है । ऊपर जो ' मानो ध्यान करता है, मानो अत्यन्त चञ्चल होता ' है ' ऐसा कहा है, उसीका कर्तृत्वमें हेतु दिखानेके लिये यहाँ ' वही कर्ता है ' इस प्रकार अनुवाद किया गया है ॥ १० ॥
स्वप्नसृष्टिके विषय में प्रमाणभूत मन्त्र तदेते श्लोका भवन्ति । स्वप्नेन शारीरमभित्र-हत्या सुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाय पुनरैति स्थान ँ हिरण्मयः पुरुष एकह ँसः ॥ ११ ॥
इस विषयमें ये श्लोक हैं— आत्मा स्वप्न के द्वारा शरीरको निश्चेष्ट . कर स्वयं न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है । वह शुद्ध - इन्द्रियमात्रारूपको लेकर पुन: जागरित स्थान में आता है । हिरण्मय ( ज्योतिःस्वरूप ) पुरुष अकेला ही [ दोनों स्थानोंमें ] जाने-वाला है ॥ ११ ॥
तदेते — -- एतस्मिन्नुतेऽर्थ एते
श्लोका मन्त्रा भवन्ति —
स्वप्नेन स्वप्नभावेन, शारीरं शरीरम्, अभिहत्य निश्चेष्टमापा-द्यासुतः स्वयम लुप्तदृगादिशक्तिस्वा-भाव्यात्, सुप्तान् वासनाकारोद्भू-तानन्तःकरणवृत्त्याश्रयान् वा इस उक्त अर्थमें ये श्लोक-मन्त्र हैं— स्वप्नसे- स्वप्नभावसे शारीर - शरीरको अभिप्रहत्य - निश्चेष्ट कर स्वयं अलुप्तज्ञानादिशक्ति-स्वरूप होनेके कारण प्रसुप्त रहकर सुप्त अर्थात् वासनारूप-से उद्भू अन्तःकरणवृत्ति-
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९ ३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ह्याध्यात्मिकान् सर्वानेव भावान् स्वेन रूपेण प्रत्यस्तमितान् सुप्तान्; अभिचाकशीति, अलुप्तया आत्मदृष्ट्या पश्यत्यवभासय-तीत्यर्थः । शुक्रं शुद्धं ज्योतिष्मदिन्द्रिय-मात्रारूपम्, आदाय गृहीत्वा, पुनः कर्मणे जागरितस्थान मैत्या-गच्छति, हिरण्मयो हिरण्मय इव चैतन्यज्योतिः स्वभावः, पुरुषः, एक हंसः - एक एव हन्तीत्येक-हंस: - एको जाग्रत्स्वप्नेहलोक-परलोकादीन् गच्छतीत्येक-हंसः ॥ ११ ॥
के आश्रित बाह्य और आध्यात्मिक सभी भावोंको, जो अपने स्वरूपसे प्रत्यस्तमित अर्थात् सोये रहते हैं, प्रकाशित करता है । तात्पर्य ह है कि उन्हें अपनी अलुप्त आत्म-दृष्टिसे देखता अर्थात् अवभासित करता है । तथा शुक्र - शुद्ध ज्योतिष्मान् इन्द्रियमात्रारूपको ग्रहणकर वह पुनः कर्म अर्थात् जागरित स्थानमें आ जाता है । वह हिरण्मय-हिरण्मयके समान चैतन्यज्योतिः -स्वरूप पुरुष एकहंस है; अकेला ही हन्ति - चलता है, इसलिये एक हंस है । वह अकेला ही जाग्रत, स्वप्न तथा इहलोक - परलोकादिमें जाता है, इसलिये एकहंस है ॥ ११ ॥
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादस्मृतश्च-रित्वा । स ईयतेऽमृतो यत्र काम हिरण्मयः पुरुष एकह ँ सः ॥ १२ ॥
इस निकृष्ट शरीरकी प्राणसे रक्षा करता हुआ वह अमृतधर्मा शरीर-से बाहर विचरता है । वह अकेला विचरनेवाला हिरण्मय अमृत पुरुष जहाँ वासना होती है, वहाँ चला जाता है ॥ १२ ॥
तथा प्राणेन पश्चवृत्तिना रक्षन् इसी प्रकार प्राणापानादि पाँच वृत्तियोंवाले प्राणसे रक्षण - परि-परिपालयन् - अन्यथा मृतभ्रान्तिः पालन करता हुआ, नहीं तो मरनेकी भ्रान्ति हो जाती, अतः स्यात्, अवरं निकृष्टमनेकाशुचि - इस अवर - निकुष्ट - अनेकों अप-संघातत्वादत्यन्तबीभत्सम् ` वित्र वस्तुओंका संघात होनेके , कुलायम् कारण अत्यन्त बीभत्स कुलाय ब्राह नी स्म यह पर भा स्व यन्त्र विष काम गच्छ बह भय रूप [ मि रहत वि उच्चा अव तदुच्च प्राप्त वान् रूपा