बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 951–960

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960

पृष्ठ 951

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[ अध्याय ४ आध्यात्मिक अपने स्वरूप से सोये रहते हैं, तात्पर्य यह अलुप्त आत्म-अवभासित ज्योतिष्मान् ग्रहणकर वह रित स्थान में हिरण्मय-चैतन्यज्योतिः-है; अकेला ही लिये एक हंस जाग्रत, स्वप्न कादिमें जाता ॥ ११ ॥

दमृतश्च-मयः पुरुष तधर्मा शरीर-अमृत पुरुष पानादि पाँच रक्षण - परि-नहीं तो जाती, अतः अनेकों अप-संघात होनेके भकुला ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ नीडं शरीरम्, स्वयं तु बहिस्त-स्मात् कुलायात्, चरित्वा- -यद्यपि शरीरस्थ एव स्वप्नं पश्यति तथापि तत्सम्बन्धा -भावात् तत्स्थ इव आकाशो बहिश्वरित्वेत्युच्यते, अमृतः । स्वयममरणधर्मा, ईयते गच्छति, 2 यत्र कामम् — यत्र यत्र कामो विषयेषु उद्भूतवृत्तिर्भवति तं तं कामं वासनारूपेणोद्भूतं गच्छति ॥ १२ ॥

९ ३७ | - घोंसले अर्थात् शरीरकी रक्षा करता हुआ, किंतु स्वयं उस कुलाय-से बाहर विचरकर; यद्यपि वह शरीरमें रहकर ही स्वप्न देखता है, तथापि उसके सम्बन्धसे रहित होने के कारण तदन्तर्वर्ती आकाशके समान मानो बाहर विचरकर-ऐसा कहा जाता है, स्वयं अमृत– अमरणधर्मा रहकर ईयते - जाता है, जहाँ कामना होती है अर्थात् जहाँ - जहाँ विषयोंमें कामना उद्-भूतवृत्ति रहती है, वासनारूपसे उद्भुत उस - उस काम ( कामना के विषय ) के प्रति जाता है ॥ १२ ॥

स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥

वह देव स्वप्नावस्था में ऊँच - नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ बहुत - से रूप बना लेता है । इसी प्रकार वह [ मित्रोंके साथ ] हँसता हुआ तथा रहता है ॥ १३ ॥

किञ्च स्वप्नान्ते स्वप्नस्थाने, उच्चावचम् - उच्चं देवादिभावम् अवचं तिर्यगादिभावं निकृष्टं तदुच्चावचम्, ईयमानो गम्यमानः प्राप्नुवन्, रूपाणि, देवो द्योतना-वान् कुरुते निर्वर्तयति वासना-रूपाणि बहून्यसंख्येयानि । उतापि स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, [ व्याघ्रादि ] भय देखता हुआ - सा इसके सिवा स्वप्नान्तमें— स्वप्न - स्थान में ऊँच - नीच — ऊँच देवादिभाव और नीच तिर्यंगादि निकृष्टभाव – ऐसे ऊँच - नीच भावों-को प्राप्त होता हुआ वह देव-द्योतनावान् पुरुष ' बहूनि ' —असंख्य वासनामय रूप बना लेता है ।

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ ९ ३८ ब्राह स्त्रीभिः सह मोंदमान इव, जक्ष - | वह स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता 15 वयस्यैः, उतेवापि हुआ, मित्रोंके साथ हँसता हुआ मिंत दिव हसन्निव और भय - जिनसे वह डर जाता प भयानि - बिमेत्येभ्य इति भयानि है, ऐसे सिंहव्याघ्रादि भयको कष्ट सिंहव्याघ्रादीनि पश्यन्निव ॥ १३ ॥ देखता हुआ - सा रहता है ॥ १३ ॥

गो स्वप्नस्थानके विषयमें मतभेद और उसके स्वयंज्योतिष्ट्वका निश्चय डीन आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति मध्य कश्चनेति । तं नायतं बोधयेदित्याहुः । दुर्भिषज्य‍ नो हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यते । अथो खल्वा हुर्जा- श्र गरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत् पश्यति तानि रात्म सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्र ं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४ ॥ प्रस

सब लोग उसके आराम ( क्रीडाकी सामग्री ) को ही देखते हैं, उसे श्रात कोई नहीं देखता । उस सोये हुए आत्माको सहसा न जगावे - ऐसा कास [ वैद्यलोग ] कहते हैं । जिस इन्द्रियप्रदेशमें यह सोया हुआ होता है, सहर उसमें प्राप्त न होनेसे इसका शरीर दुश्चिकित्स्य हो जाता है । हुरे अवश्य ही कोई - कोई ऐसा कहते हैं कि यह ( स्वप्नस्थान ) इसका जाग-जना रितदेश ही है; क्योंकि जिन पदार्थोंको यह जागनेपर देखता है, उन्हींको सोया हुआ भी देखता है [ किंतु यह ठीक नहीं है ]; क्योंकि इस अवस्थामें जाग्र यह पुरुष स्वयंज्योति होता है । [ जनक - ] वह में जनक श्रीमान्को केव सहस्र मुद्रा देता हूँ, अब आगे मुझे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये ॥ १४ ॥ आह

आराममारमणमाक्रीडामनेन | सब लोग इस आत्माके आराम-निर्मितां वासनारूपाम् अस्यात्मनः आरमण अर्थात् आक्रीडाको यानी ह्यसौ , इसकी रची हुई वासनारूप क्रीडा-पश्यन्ति सर्वे जनाः- ग्रामं नगरं | को देखते हैं । वे ग्राम, नगर, स्त्री सहस स्त्रियम् अन्नाद्यमित्यादिवासनानि - और भक्ष्य अन्तरूप वासनानिर्मित

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[ श्रध्याय ४ R. - आनन्द मानता हँसता हुआ वह डर जाता याघ्रादि भयोंको हता है ॥ १३ ॥

तिष्ट्वका निश्चय तं पश्यति दुर्भिषज्य खल्वा हुर्जा-पश्यति तानि ऽहं भगवते ते ॥ १४ ॥

ही देखते हैं, उसे न जगावे -- ऐसा हुआ होता है, जाता है । इस न ) इसका जाग-देखता है, उन्हीं को इस अवस्था में जनक श्रीमान्को कीजिये ॥ १४ ॥

आत्माके आराम-आक्रीडाको यानी वासनारूप क्रीडा-ग्राम, नगर, स्त्री रूप वासना निर्मित ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्याथ ९ ३ ९ मितम् आक्रीडनरूपम्; न तं पश्यति तं न पश्यति कश्चन । कष्टं भो वर्ततेऽत्यन्तविविक्तं दृष्टि-गोचरापन्नमपि - अहो भाग्य हीनता लोकस्य यच्छक्यदर्शन -मप्यात्मानं न पश्यति — इति लोकं प्रत्यनुक्रोशं दर्शयति श्रुतिः । अत्यन्त विविक्तः स्वयंज्योति-रात्मा स्वप्ने भवतीत्यभिप्रायः । तं नातं बोधयेदित्याहु: -प्रसिद्धिरपि लोके विद्यते, स्वप्न आत्मज्योतिषो व्यतिरिक्तत्वे; कासौ? तमात्मानं सुप्तम्, च्यायतं सहसा भृशम्, न बोधयेत् - इत्या-हुरेवं कथयन्ति चिकित्सकादयो जना लोके; नूनं ते पश्यन्ति -जाग्रद्देहादिन्द्रियद्वारतोऽपसृत्य केवलो बहिर्वर्तत इति, यत आहुः - तं नायतं बोधयेदिति । तत्र च दोषं पश्यन्ति – भृशं ह्यसौ बोध्यमानस्तानीन्द्रियद्वाराणि सहसा प्रतिबोध्यमानो न प्रतिप । | आक्रीडनके रूपको देखते हैं; उसे नहीं देखते - उस आत्माको कोई नहीं देखता । अहो! बड़ा कष्ट है; जो अत्यन्त भिन्न और दृष्टिकी विषयता को प्राप्त है, जिसका दर्शन भी किया जा सकता है, उस आत्माको कोई नहीं देखता । अहो! जीवोंका कैसा दुर्भाग्य है? इस प्रकार जीवोंके प्रति श्रुति करुणा प्रदर्शित करती है । तात्पर्य यह है कि स्वप्नावस्था-में यह स्वयंज्योति आत्मा अत्यन्त संसर्गशून्य हो जाता है । ' तं नायतं बोधयेदित्याहु: ' -स्वप्न में आत्मज्योतिकी व्यतिरिक्त-ताके विषयमें लोकमें प्रसिद्धि भी है; वह प्रसिद्धि क्या है - उस सोये हुए आत्माको आयतम् — सहसा -एकाएकी न जगावे ऐसा चिकित्स-कादि लोग लोकमें कहते हैं । निश्चय ही वे देखते हैं कि आत्मा जाग्रद्देहसे उसके इन्द्रियरूप द्वारसे निकलकर विशुद्धरूपसे बाहर विद्य मान है; इसीसे ' उसे सहसा न जगावे ' ऐसा कहते हैं । उसमें वे यह दोष भी देखते हैं- सहसा जगाये जानेपर वह एकाएकी जगाया हुआ उन इन्द्रियद्वारोंको प्राप्त

पृष्ठ 954

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्राह ९ ४० द्यत इति तदेतदाह - दुर्भिषज्यं । हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यते; यमिन्द्रियद्वारदेशम् - यस्माद्देशा छुक्रमादायापसृतस्तमिन्द्रियदे - । शम् - एष आत्मा पुनर्न प्रतिपद्यते, कदाचिद् व्यत्यासेनेन्द्रियमात्राः प्रवेशयति, तत आन्ध्यबाधि-र्यादिदोषप्राप्तौ दुर्भिषज्यं दुःख भिषकर्मता हास्मै देहाय भवति, दुःखेन चिकित्सनीयोऽसौ देहो भवतीत्यर्थः । तस्मात् प्रसि-थापि स्वप्ने स्वयंज्योतिष्ट्र-मस्य गम्यते । स्वप्नो भूत्वातिक्रान्तो मृत्यो रूपाणीति तस्मात् स्वप्ने स्वयं-ज्योतिरात्मा । अथो अपि खल्वन्य प्राहु: - जागरितदेश एवास्यैष यः स्वप्नः - न संध्यं स्थानान्तरमिहलोक परलोकाभ्यां व्यतिरिक्तम्, किं तर्हि? इह लोक एव जागरितदेशः । नहीं हो सकता । जिस इन्द्रियद्वार. य देशको - जिस देशसे कि वह शुक्र यद् ( इन्द्रियमात्रा ) को लेकर हट गया एवा था, उस इन्द्रियदेशको यह बात्मा कर फिर प्राप्त नहीं होता । इसीसे श्रुति कहती है, ' दुभिषज्यं हास्मै भवति ' भूत जिसे कि यह प्राप्त नहीं होता ॥ रात्म जिस इन्द्रियद्वारदेशको - जिस देश - बाध से कि यह शुक्र ( इन्द्रियमात्रा ) देश लेकर हट गया है, उस इन्द्रियदेश- हेतुम को यह आत्मा फिर प्राप्त नहीं यांनि होता । यदि कभी विपरीतरूपसे इन्द्रियमात्राओंको प्रविष्ट कर देता पदाध है तो अन्धत्व - बधिरत्व आदि दोष- देशे, की प्राप्ति होनेपर इस देहके लिये सुप्तो दुर्भिषज्य - कष्टकर वैद्यक्रिया हो त जाती है, अर्थात् तब यह देह कठि-नतासे चिकित्साके योग्य हो जाता रतेषु है । अतः प्रसिद्धिसे भी स्वप्नमें इसकी स्वयंप्रकाशता ज्ञात होती है । तस्मा यह स्वप्न होकर [ शरीरादि ] सम्भ मृत्युके रूपोंसे पार हो जाता है, इसलिये स्वप्न में आत्मा स्वयंज्योति रथा है । इसीसे अवश्य ही कोई - कोई तस्मा लोग कहते हैं कि यह जो स्वप्न है, भवत्य इस आत्माका जागरितदेश ही है । इहलोक और परलोकसे भिन्न कोई स्वर संध्यस्थान नहीं है; तो फिर क्या स्वप्ना है? इहलोक अर्थात् जागरितदेश ही है |

पृष्ठ 955

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[ अध्याय ४ जिस इन्द्रियद्वार-से कि वह शुक्र - लेकर हट गया को यह आत्मा ता । इसीसे श्रुति = यं हास्मै भवति ' प्त नहीं होता । शको - जिस देश-( इन्द्रियमात्रा ) उस इन्द्रियदेश-फिर प्राप्त नहीं नी विपरीतरूपसे प्रविष्ट कर देता रत्व आदि दोष-इस देहके लिये - वैद्यक्रिया हो तब यह देह कठि-योग्य हो जाता से भी स्वप्न में ताज्ञात होती है । कर [ शरीरादि ] हो जाता है, आत्मा स्वयं ज्योति यही कोई - कोई यह जो स्वप्न है, गरितदेश ही है । लोकसे भिन्न कोई है; तो फिर क्या यत् जागरितदेश ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ यद्येवम्, किश्चातः १ शृण्वतो यद् भवति - यदा जागरितदेश एवायं स्वप्नः, तदायमात्मा कार्य करणेभ्यो न व्यावृत्तस्तैर्मिश्री-भूतः, अतो न स्वयंज्योति -रात्मा - इत्यतः स्वयंज्योतिष्ट्र-बाधनाय अन्ये श्राहुः- जागरित-देश एवास्यैष इति । तत्र च हेतुमाचक्षते - जागरित देश त्वे यानि हि यस्माद् हस्त्यादीनि पदार्थजातानि, जाग्रञ्जागरित-देशे, पश्यति लौकिकः, तान्येव सुप्तोऽपि पश्यतीति । तदसत्, इन्द्रियोपरमात्, उप-रतेषु हीन्द्रियेषु स्वप्नान् पश्यति; तस्मान्नान्यस्य ज्योतिषस्तत्र सम्भवोऽस्ति; तदुक्तम् - ‘ न तत्र रथा न रथयोगाः ' इत्यादि तस्मादत्रायं पुरुषः स्वयंज्योति-र्भवत्येव । स्वयंज्योतिरात्मा अस्तीति स्वप्ननिदर्शनेन प्रदर्शितम्, अति- । ९ ४१ यदि ऐसी बात है, तो इससे क्या हुआ? इससे जो होता है, सो | सुनो - यदि यह स्वप्न जागरित देश ही है तो उस समय यह आत्मा देह और इन्द्रियोंसे पृथक् नहीं होता, उनसे मिला ही रहता है, मतः आत्मा स्वयंज्योति नहीं है, इसलिये उसके स्वयंज्योतिष्ट्रको बाधित करनेके लिये कोई लोग कहते हैं कि यह इसका जागरित-देश ही है । उसकी जागरितदेशता-वे यह हेतु बतलाते हैं; क्योंकि लौकिक पुरुष जागरितदेशमें जिन हाथी आदि पदार्थोंको देखता है, उन्हीं को वह स्वप्न में भी देखता है । यह ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय इन्द्रियाँ उपरत हो जाती हैं । इन्द्रियोंके उपरत होनेपर ही पुरुष स्वप्न देखता है; इसलिये उस अवस्थामें किसी अन्य ज्योतिका होना तो सम्भव नहीं है, इसीसे कहा है- ' वहां न रथ हैं, न रथ-योग हैं ' इत्यादि इसलिये इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता ही है । स्वयंज्योति आत्मा है — यह बात स्वप्नके दृष्टान्तसे दिखा दी गयी और

पृष्ठ 956

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बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय ४ ९ ४२ क्रामति मृत्यो रूपाणीति च; । क्रमेण संचरन्निहलोक परलोकादी-निहलोक परलोकादिव्यतिरिक्तः, तथा जाग्रत्स्वप्नकुलायाभ्यां व्य- । तिरिक्तः, तत्र च क्रमसंचारान्नि -त्यश्च - इत्येतत् प्रतिपादितं या-ज्ञवल्क्येन । अतो विद्यानिष्क्रयार्थ सहस्रं ददामीत्याह जनकः; सोऽ-हमेवं बोधितस्त्वया भगवते तुभ्यं सहस्रं ददामि विमोक्षय काम-प्रश्नो मयाभिप्रेतः, तदुपयोग्यं तादर्थ्यात्तदेकदेश एव; अतस्त्वां नियोक्ष्यामि समस्त कामप्रश्न-निर्णयश्रवणेन - विमोक्षायात ब्राह यह भी दिखा दिया गया कि वह मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है । तप वह क्रमशः इहलोक और पर-दान लोकादिमें संचार करता हुआ भी इहलोक और परलोकादिसे व्यति- य रिक्त है तथा जाग्रत् और स्वप्न के श्रात्म शरीरोंसे पृथक है और उनमें क्रमशः संचार करनेके कारण नित्य भी क्रान्त है - ऐसा याज्ञवल्क्यने प्रतिपादन प्रति किया; अतः विद्यादानसे उऋण स्वयं होनेके लिये जनकने ' मैं आपको यत्तर सहस्र मुद्रा देता हूँ ' ऐसा कहा । मति आपके द्वारा इस प्रकार उपदेश तत किये जानेपर मैं आपको सहस्र मुद्रा देता हूँ । अब मुझे अपने चाति मनोवाञ्छित प्रश्न मोक्षके विषयमें ह्येतत् सुनना अभीष्ट है; यह आत्मप्रत्यय- प का उपदेश मोक्ष या सम्यग्बोधमें उपयोगी है, अतः उसका साधन न्नूनं होनेके कारण यह उस यथार्थं बोध- कम का एकदेश ( अङ्ग ) ही है, इसलिये त्रासा समस्त इच्छित प्रश्नोंका निर्णय सुननेके द्वारा मैं आपसे प्रार्थना ना बा ऊर्ध्वं ब्रूहीति, येन संसाराद् करता हूँ; अब आगे मोक्षके लिये विमोच उपदेश कीजिये, जिससे कि आप- १ विप्रमुच्येयं स्वरप्रसादात् । विमो- । की कृपासे में संसारसे विमुक्त हो

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| अध्याय ४ गया कि वह कर जाता है । क और पर-करता हुआ भी लोकादिसे व्यक्ति-तु और स्वप्न के नौर उनमें क्रमशः कारण नित्य भी क्यने प्रतिपादन व्यादानसे उऋण कने ' मैं आपको हूँ ' ऐसा कहा । प्रकार उपदेश आपको सहस्र अब मुझे अपने न मोक्षके विषय में यह आत्मप्रत्यय-या सम्यग्बोधमें उसका साधन उस यथार्थ बोध-ब ) ही है, इसलिये प्रश्नोंका निर्णय मैं आपसे प्रार्थना आगे मोक्षके लिये - जिससे कि आप-सारसे विमुक्त हो ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ क्षपदार्थैकदेश निर्णयहेतोः सहस्र दानम् ॥१४ ॥

यत् प्रस्तुतम् - — ' श्रात्मनैवायं आत्मनो मृत्योरवि- ज्योतिषास्ते ' इति, क्रान्तिराथङ्कयते तत् प्रत्यक्षतः प्रतिपादितम् — अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति, इति स्वप्ने । यत्तक्तम्- ' स्वप्नो भूत्वेमं लोक-मतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ' इति तत्रैतदाशङ्क्यते — मृत्यो रूपाण्ये-चातिक्रामति, न मृत्युम्; प्रत्यक्षं ह्येतत् स्वप्ने कार्यकरणव्यावृत्तस्या -पि मोदत्रासादिदर्शनम् तस्मा -न्नूनं नैवायं मृत्युमतिक्रामति । कर्मणो हि मृत्योः कार्यं मोद-त्रासादि दृश्यते; यदि च मृत्यु-ना बद्ध एवायं स्वभावतः, ततो विमोक्षो नोपपद्यते; न हि स्वभा-९ ४३ - जाऊँ, यह सहस्रदान तो जो विमोक्षपदार्थंके एकदेशका निर्णय किया गया है, उसके लिये है ॥ १४ ॥

' आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते ' इस प्रकार जिसका प्रस्ताव किया था, उसका स्वप्न में ' यहाँ यह पुरुष स्वयंज्योति होता है ' इस प्रकार प्रत्यक्षतः प्रतिपादन कर दिया । | किंतु ऐसा जो कहा कि ' यह स्वप्न होकर इस लोकको अतिक्रमण कर जाता है - मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है ' उसमें यह आशङ्का रहती है कि वह मृत्युके रूपोंको ही पार करता है, मृत्युको पार नहीं करता; स्वप्न में देह और इन्द्रियोंसे व्यावृत्त हुए पुरुषको भी आनन्द और भय आदिका दर्शन होता है; यह बात प्रत्यक्ष भी है; अतः निश्चय ही यह मृत्युका अति-क्रमण नहीं करता । आनन्द और भय आदि कर्म-रूप मृत्यु के ही कार्य देखे जाते हैं; यदि यह जीव स्वभावतः मृत्युसे ही बंधा हुआ है तो इसका मोक्ष होना सम्भव नहीं है, क्योंकि स्वभावसे १. यह पुरुष अपने स्वरूपभूत ज्योतिसे ही प्रकाशित होता है ।

पृष्ठ 958

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ ४४ वात् कचिद् विमुच्यते; अथ । स्वभावो न भवति मृत्युः, तत-स्तस्मान्मोक्ष उपपत्स्यते 1 । यथासौ मृत्युरात्मीयो धर्मो न भवति, तथा प्रदर्शनाय श्रत ऊर्ध्वं विमो-चाय ब्रूहीत्येवं जनकेन पर्यनु-युक्तो याज्ञवन्क्यस्तद्दिदर्शयिषया प्रववृते-ब्रा भी मुक्ति नहीं हो सकत मृत्यु स्वभाव न हो तभी उससे मोक्ष द होना सम्भव होगा । जिस प्रकार रि यह मृत्यु आत्माका धर्मं नहीं है, पा वह दिखाने के लिये ' अब आगे वि मोक्षके लिये उपदेश कीजिये ' इस इ प्रकार जनकद्वारा प्रश्न किये जाने-पर याज्ञवल्क्यजी उसे दिखानेकी इच्छा से प्रवृत्त हुए । 5-सुषुप्तिके भोगसे आत्माकी असङ्गता स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा ( दृष्ठैव पुण्यं च पापं च । पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या-द्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागत-स्व स्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ऐस एक ब्रूहीति ॥ १५ ॥ ब

वह यह आत्मा इस सुषुप्ति में रमण और विहार कर पुण्य और पापको प्र केवल देखकर, जैसे आया था और जहाँसे आया था, पुनः स्वप्नस्थानको स सा ही लौट आता है । वहाँ वह जो कुछ देखता है, उससे असम्बद्ध रहता है; कि क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है । [ जनक- ] ' याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी स ही है, में श्रीमान्को सहस्र मुद्रा देता हूँ, इससे आगे भी मोक्षके लिये ही अ उपदेश कीजिये ' ॥ १५ ॥ भू

स वै प्रकृतः स्वयंज्योतिः वह यह प्रकृत स्वयंज्योति होउ पुरुषः, एष यः स्वप्ने प्रदर्शितः, पुरुष, जिसे कि स्वप्ना- अ एतस्मिन् सम्प्रसादे - सम्यक् प्रसी - इस सम्प्रसादमें - इसमें पुरुष

पृष्ठ 959

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[ अध्याय ४ सकती, यदि तभी उससे मोक्ष जिस प्रकार धर्म नहीं है, नये ' अब आगे कीजिये इस प्रश्न किये जाने-उसे दिखाने की स्वा चरित्वा प्रतियोन्या-त्यनन्वागत-• याज्ञवल्क्य विमोक्षायैव पुण्य और पापको स्वप्नस्थानको सम्बद्ध रहता है; 1 यह बात ऐसी मोक्षके लिये ही कृत स्वयंज्योति कि स्वप्ना किया है, - इसमें - पुरुष ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ४५ 22 दत्यस्मिन्निति सम्प्रसादः; जाग- | सम्यक् प्रकारसे प्रसादयुक्त ( प्रसन्न ) होता है, इसलिये सुषुप्तिको सम्प्र-रिते देहेन्द्रियव्यापारशतसन्नि-साद कहते हैं; जागरित - अवस्था में पातजं हित्वा कालुष्यं तेभ्यो । जो देह और इन्द्रियोंके सैकड़ों विप्रमुक्त ईषत् प्रसीदति स्वप्ने, इह तु सुषुप्ते सम्यक् प्रसीदति — इत्यतः सुषुप्तं सम्प्रसाद उच्यते; " तीर्णो हि सदा सर्वा ञ्शोकान् ” ( ४ । ३ । २२ ) इति " सलिल एको द्रष्टा " ( ४ । ३ । ३२ ) इति हि वक्ष्यति सुषुप्तस्थमात्मानम् ॥ . व्यापारोंके सम्बन्धसे हुआ क्लेश था, उसे छोड़कर उन देह और इन्द्रियों से मुक्त हो जाने के कारण स्वप्नमें वह थोड़ा प्रसन्न होता है, किंतु इस सुषुप्तावस्था में वह सम्यक्तया प्रसन्न हो जाता है; इसलिए सुषुप्तिको सम्प्रसाद कहते हैं; सुषुप्त-स्थ आत्मा के विषय में श्रुति " उस अवस्थामें वह सम्पूर्णं शोकोंसे पार हो जाता है " " जलमें प्रतिबिम्बके समान एक ही द्रष्टा है " ऐसा कहेगी भी । * शाङ्करभाष्यमें प्रायः अनेकों जगह सुषुप्तिके दृष्टान्तसे मुक्त आत्माके स्वरूपका कुछ आभास दिया गया है; इससे कुछ लोग इस भ्रममें पड़ जाते हैं कि सुप्तावस्था में स्थित और मुक्त पुरुषकी प्राय: एक ही स्थिति होती है; किन्तु ऐसा समझना भारी भूल है; मुक्त पुरुषका सभी अवस्थाओं और स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरसे भी सदाके लिये सम्बन्ध छूट जाता है, उसके सभी मायिक वन्धनोंका अत्यन्त अभाव हो जाता है; लोकदृष्टिमें उसके शारीरिक व्यवहारोंकी प्रतीति होती रहनेपर भी मुक्त पुरुषका उनसे कुछ भी सम्पर्क नहीं रहता । परंतु सुपुति एक अवस्था है, जो स्वयं बन्धन है, अतः सुषुप्त जीवकी मुक्त आत्मा के साथ कोई वास्तविक समानता नहीं है । इसका दृष्टान्त इसलिये दिया जाता है । कि जिस प्रकार मुक्त आत्मा सभी प्रकारके हर्ष - शोक आदि विकारोंसे सदाके लिये सम्बन्धरहित हो जाता है, उसी प्रकार सुषुप्त जीव भी कुछ क्षण के लिये हर्ष - शोक आदिकी अनुभूति से रहित होता है; क्योंकि उस समय वह अव्याकृत मायाके अंश-भूत कारण शरीरके सहित ही ब्रह्ममें स्थित होता है, इसलिये उसे कुछ भान नहीं होता । यदि वास्तवमें मुक्तकी - सी हो उसकी स्थिति होती तो पुनः संसारमें उसका प्रत्यागमन नहीं होता, अतः सुषुप्तिके सुखको मोक्ष - सुख मानकर उसके अनुभव के लिये रात - दिन सोये पड़े रहनेकी भूल कभी नहीं करनी चाहिये । वृ ० उ ० ६०-

पृष्ठ 960

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९ ४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे क्रमेण सम्प्रसन्नः सन् सुषुप्ते स्थित्वा; कथं सम्प्रसन्नः १ स्वप्नात् सुषुप्तं प्रविविक्षुः स्वप्ना -वस्थ एव रत्वा रतिमनुभूय मित्रबन्धुजनदर्शनादिना, चरिखा विहृत्यानेकधा चरणफलं । श्रममुपलभ्येत्यर्थः, दृष्ट्प्रैव न कृत्वेत्यर्थः, पुण्यं च पुण्यफलम्, पापं च पापफलम्; न तु पुण्य-पापयोः साक्षादर्शनमस्तीत्यवो-चाम; तस्मान्न पुण्यपापास्याम-नुबद्धः; यो हि करोति पुण्यपापे, स ताभ्यामनुबध्यते न हि दर्शन-मात्रेण तदनुबद्धः स्यात् । तस्मात् स्वप्नो भूत्वा मृत्युमति-क्रामत्येव, न मृत्युरूपाण्येव केष-लम् । अतो न मृत्योरात्मस्वभाव-स्वाशङ्का; मृत्युश्चेत् स्वभावोऽस्य, स्वप्नेऽपि कुर्यात् न तु करोति । वह यह आत्मा इस सम्प्रसाद-में - क्रमशः सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न होता हुआ इस सुषुप्तावस्था में स्थित रहकर किस प्रकार सम्यक् प्रसन्न होता हुआ? स्वप्न से सुषुप्तावस्था-में प्रवेश करनेकी इच्छावाला आत्मा स्वप्नावस्था में रहनेपर हो मित्र और बन्धुजनोंके दर्शनादिसे रतिका अनुभव कर तथा अनेक प्रकारसे विहार कर अर्थात् उस विहारके फलस्वरूप श्रमकी उप-लब्धिकर; तात्पर्य यह है कि केवल देखकर, करके नहीं [ किसे-? ] पुण्य - पुण्यफलको ओर पाप— पापफलको; यह हम कह चुके हैं । कि पुण्य और पापका साक्षात् दर्शन नहीं होता; इसलिये वह पुण्य - पापसे अनुबद्ध नहीं होता; जो . पुरुष पुण्य पाप करता है, वही उससे अनुबद्ध होता है; केवल दर्शनमात्र-से उसका अनुबन्धन नहीं होता । अत: स्वप्न होकर वह मृत्युको ही पार कर जाता है, केवल मृत्युके रूपोंको ही नहीं; अतः मृत्यु आत्मा-का स्वभाव है - ऐसी आशङ्का नहीं हो सकती; यदि मृत्यु इसका स्वभाव होता तो यह स्वप्न में भी [ पुण्य - पापरूप कर्म ] करता; किंतु 6 S 2 द र