बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 961–970

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970

पृष्ठ 961

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अध्याय ४ स सम्प्रसाद-रसे प्रसन्न वस्था में स्थित म्यक् प्रसन्न सुषुप्तावस्था-इच्छावाला रहने पर ही - दर्शना दिसे तथा अनेक अर्थात् उस श्रमकी उप-है कि केवल [ किसे-? ] पाप-कह चुके हैं का साक्षात् इसलिये वह होता; जो 5, वही उससे दर्शनमात्र-हीं होता । वह मृत्युको केवल मृत्यु मृत्यु आत्मा-शङ्का नहीं त्यु इसका स्वप्न में भी करता; किंतु ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ स्वभावश्चेत् क्रिया स्यात् निर्मोक्षतैव स्यात् न तु स्वभावः, स्वप्नेऽभावात्; अतो विमोक्षोऽस्योपपद्यते मृत्योः पुण्यपापाभ्याम् । मनु जागरितेऽस्य स्वभाव एव । न बुद्धधाद्युपाधिकृतं हि तत्; तच्च प्रतिपादितं सादृश्यात् । ' ध्यायतीव लेलायतीव ' इति । तस्मादेकान्तेनैव स्वप्ने मृत्यु-रूपातिक्रमणान्न स्वाभाविकत्वा-शङ्का निर्मोक्षता वा । तत्र ' चरित्वा ' इति - चरणफलं श्रममुपलभ्येत्यर्थः, ततः सम्प्रसा-दानुभवोत्तरकालं पुनः प्रतिन्यायं यथान्यायं यथागतम् - — निश्चित आयो न्यायः, अयनमायो ९ ४७ | यह करता नहीं है; यदि स्वभाव होता तो क्रिया भी होती और फिर इसका छुटकारा हो ही नहीं सकता था; किंतु स्वप्न में क्रियाका अभाव होनेके कारण वह इसका स्वभाव | नहीं है; इसलिये इसका पाप - पुण्य-रूप मृत्युसे मोक्ष होना सम्भव ही है । शङ्का - किंतु जागरितमें तो यह इसका स्वभाव है ही । समाधान- - नहीं यह तो बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है । यह बात ' ध्यान - सा करता है, अत्यन्त चञ्चल - सा होता है ' इस वाक्य में सादृश्यद्वारा प्रतिपादित कर दी गयी है । अतः स्वप्नावस्थामें मृत्युके रूपों का नियमतः अतिक्रमण करने-के कारण उसके स्वाभाविकत्वकी आशङ्का अथवा आत्मा के अनिर्मोक्ष-की आशङ्का नहीं हो सकती । वहाँ ( स्वप्नावस्था में ) विहार करके अर्थात् विहारके फल श्रमको उपलब्ध करके फिर सम्प्रसादके अनुभव के पश्चात् पुनः प्रतिन्याय— यथान्याय - जिस प्रकार कि आया था निश्चित आयको न्याय कहते हैं तथा अयन- -निर्गमनका नाम आय है,

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ ४८ निर्गमनम्, पुनः पूर्वगमनवैप - | पुनः पहले जानेके विपरोत - क्रमसे रीत्येन यदागमनं स प्रति-न्यायः - यथागतं पुनरागच्छती -स्पर्थः । प्रतियोनि यथास्थानम्; स्वप्नस्थानाद्धि सुषुप्तं प्रतिपन्नः । सन् यथास्थानमेव पुनरा-गच्छति — प्रतियोनि द्रवति, स्वयैव स्वप्नस्थानायैव । ननु स्वप्ने न करोति पुण्यपापे तयोः फलमेव पश्यतीति कथम-वगम्यते १ यथा जागरिते तथा करोत्येव स्वप्नेऽपि, तुल्यत्वाद् दर्शनस्य- इत्यत आह - स आत्मा," यत् किश्चित् तत्र स्वप्ने पश्यति पुण्यपापफलम्, अनन्त्रागतोऽन-नुबद्धस्तेन दृष्टेन भवति, नैवा- । नुबद्धो भवति । यदि हि स्वप्ने कृतमेव तेन स्यात्, तेनानुबध्येत; स्वप्नादुत्थितो-ऽपि समन्वागतः स्यात् न च तल्लोके - स्वप्नकृतकर्मणा अन्वागत अर्थात् जाकर जो फिर उलटे लोट आना है, उसे प्रतिन्याय कहते हैं । अर्थात् जिस प्रकार गया था, उसी प्रकार उलटे वापस आ जाता है । प्रतियोनि - यथास्थान | स्वप्नस्थान-से ही सुषुप्तिको प्राप्त होकर वह यथास्थान फिर आ जाता है, अर्थात् वह प्रतियोनि ( यथास्थान ) स्वप्न यानी स्वप्नस्थानके लिये ही लोट आता है । किंतु यह कैसे जाना गया कि वह स्वप्न में पाप - पुण्य करता नहीं, केवल उनके फलको ही देखता है? जिस प्रकार जागरितमें वैसे ही स्वप्न में भी वह कर्म करता ही है, क्योंकि इन दोनों अवस्थाओं का दर्शन समान रूपसे ही होता है; ऐसी शङ्का होनेपर श्रुति कहती है-वह आत्मा स्वप्न में जो कुछ पुण्य-पापका फल देखता है, उस देखे हुए - से वह अनन्वागत - बिना बंधा हुआ ही रहता है अर्थात् वह उससे बँधता नहीं है । यदि उसने स्वप्न में वैसा किया ही होता तो वह उससे बँध जाता और स्वप्न से उठनेपर भी उससे संश्लिष्ट रहता; किंतु लोकमें स्वप्न में किये हुए - कर्मसे संश्लेष होने की प्रसिद्धि

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ध्याय ४ रोत - क्रमसे उलटे लौट कहते हैं । था, उसी जाता है । वप्नस्थान-होकर वह जाता है, थास्थान ) के लिये ही गया कि करता नहीं, देखता है? वैसे ही दता ही है, वस्थाओं का होता है; - कहती है-कुछ पुण्य-उस देखे - बिना बंधा वह उससे वैसा किया उससे बँध उठने पर भी ता; किंतु किये हुए की प्रसिद्धि ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं त्वप्रसिद्धिः; न हि स्वप्नकृतेना- । गसा श्रागस्कारिणमात्मानं मन्यते कश्चित्; न च स्वप्नदृश आगः श्रुत्वा लोकस्तं गर्हति परिहरति वा; अतोऽनन्वागत एव तेन भवति । तस्मात् स्वप्ने कुर्वन्निवोपल-भ्यते, न तु क्रियास्ति परमा-र्थतः; ‘ उतेव स्त्रीभिः सह मोद-मानः ' इति श्लोक उक्तः; आख्यातारथ स्वप्नस्य सह इव-शब्देनाचक्षते — हस्तिनोऽद्य घटीकृता धावन्तीव मया दृष्टा । इति; अतो न तस्य कर्तृत्वमिति । कथं पुनरस्याकर्तृत्वमिति-कार्यकरणैर्भूतैः संश्लेषो मूर्तस्य, स तु क्रियाहेतुर्दृष्टः, न ह्यमूर्तः कश्चित् क्रियावान् दृश्यते; अमूर्त-श्रात्मा, अतोऽसङ्गः यस्माच्चासड़ो ऽयं पुरुषः, तस्मादनन्वागतस्तेन स्वप्नदृष्टेन अत एव न क्रिया- । ९ ४ ९ नहीं है; स्वप्न में किये हुए अपराध-से कोई भी पुरुष अपनेको अपराधी नहीं मानता और लोक भी स्वप्न देखने वालेके अपराधको सुनकर उसका तिरस्कार या त्याग नहीं करता; अतः वह उससे असंश्लिष्ट ही रहता है । अतः स्वप्नमें पुरुष केवल करता हुआ - सा दिखायी देता है, वस्तुतः उस समय कोई क्रिया नहीं होती । इसीसे ' मानो वह स्त्रियोंके साथ आनन्दानुभव करता रहता हे ' ऐसा मन्त्रमें कहा है । स्वप्नका वर्णन करनेवाले भी उसका ' इव ' शब्दके साथ ही वर्णन करते हैं— ' आज मैंने हाथियोंको एकत्रित होकर दौड़ते हुए - से देखा '; इसलिये स्वप्नद्रष्टा में कर्तृत्व नहीं है । अच्छा तो इसका अकर्तृत्व किस प्रकार है? मूर्त पदार्थका जो मूर्तं देह और इन्द्रिय आदिसे संश्लेष है, वही क्रियाका कारण देखा गया है; कोई भी अमूर्तं पदार्थं क्रियावान् नहीं देखा जाता; और आत्मा अमूर्त है, इसलिये वह असङ्ग है; चूकि यह पुरुष असङ्ग है, इसलिये उस स्वप्नदृष्ट पुण्य - पापसे असंश्लिष्ट है; इसीसे

पृष्ठ 964

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ ५० कर्तृत्वमस्य कथञ्चिदुपपद्यते कार्यकरण संश्लेषेण हि कर्तृत्वं स्यात्ः स च संश्लेषः सङ्गोऽस्य नास्ति, यतोऽसङ्गो ह्ययं पुरुषः; तस्मादमृतः । एवमेवैतद् याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददामि; मत उध्वं विमोक्षायैव ब्रूहि; मोक्षपदार्थैक-देशस्य कर्मप्रविवेकस्य सम्यग्द-शिवस्वात्; अत ऊर्ध्वं विमोक्षा-यैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥

| किसी भी प्रकार इसे क्रियाका कर्तृत्व सम्भव नहीं है; देह और इन्द्रियोंके संश्लेषसे ही कर्तृत्व होता है और इस पुरुषको वह संश्लेष है नहीं, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग हे; अत: यह अमृत है । [ जनक - ] याज्ञवल्क्य! यह | बात ऐसी ही है; में श्रीमान्को सहस्र मुद्रा देता हूँ; अब आगे मोक्षके लिये ही वर्णन कीजिये; क्योंकि ऊपर मोक्षपदार्थंके एकदेश कर्मविवेकका अच्छी तरह दिग्दर्शन करा दिया गया है, इसलिये अब आगे मोक्षके लिये ही वर्णन कीजिये ॥ १५ ॥

स्वप्नावस्थाके भोगोंसे श्रात्माकी असङ्गता तत्र ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' इत्य सङ्गताकर्तृत्वे हेतुरुक्तः; उक्तं च पूर्वम् - कर्मवशात् स ईयते यत्र काममिति; कामश्च सङ्गः, अतोऽसिद्धो हेतुरुक्त: -' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' इति । न त्वेतदस्तिः कथं तर्हि १ असङ्ग एवेत्येतदुच्यते-शङ्का - वहाँ ( पूर्व मन्त्रमें ) ' असङ्गो ह्ययं पुरुष: ' इस वाक्यद्वारा असङ्गता ही अकर्तृत्व हेतु बत-लायी गयी है और पहले यह भी | कहा है कि यह कर्मवश जहाँ · इसकी इच्छा होती वहीं चला जाता है, तथा इच्छा ही सङ्ग है, इसलिये ' क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है ' यह तो असिद्ध हेतु ही कहा गया है । समाधान- ऐसी बात नहीं है; तो फिर यह असङ्ग ही किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है-त्र प S ब ओ उस उस 5 या Pric ढे हूँ; स प्रत यथ पा न्ता तस स्व तत प्रत्य

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अध्याय ४ - क्रियाका देह और होता संश्लेष है असङ्ग है; क्य! यह श्रीमान्को अब आगे - कीजिये; के एकदेश हदिग्दर्शन सलिये अब ही वर्णन मन्त्रमें ) वाक्यद्वारा हेतु बत-यह भी श जहाँ वहीं चला सङ्ग है, [ रुष असङ्ग नहीं है; किस प्रकार है-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ५१ स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा गृष्ठैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सो-S हं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥

वह यह आत्मा इस स्वप्नावस्था में रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर ही फिर जिस प्रकार आया था और जहाँसे आया था उस जागरित स्थानको ही लौट जाता है; वह वहाँ जो कुछ देखता है, उससे असंश्लिष्ट रहता है; क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है । ( जनक - ) याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है । मैं श्रीमान्‌को सहस्र मुद्रा भेंट करता हूँ; इससे आगे आप मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये ॥ १६ ॥

स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने ' स वा एष: ' - वह यह पुरुष इस स वा एष पुरुषः सम्प्रसादात् स्वप्नावस्था में सुषुप्तिसे लौटकर. प्रत्यागतः स्वप्ने रत्वा चरित्वा यथाकामम्, दृष्द्वैव पुण्यं च पापं च - इति सर्वं पूर्ववत्; बुद्धा-न्तायैव जागरितस्थानाय । तस्मादसङ्ग एवायं पुरुषः; यदि स्वप्ने सङ्गवान् स्यात् कामी, ततस्तत्सङ्गजैर्दो षर्बुद्धान्ताय प्रत्यागतो लिप्येत ॥ १६ ॥

स्वप्न में रमण और विहार कर इच्छानुसार पुण्य और पापको देखकर हो इत्यादि सब अर्थं पूर्व-वत् समझना चाहिये बुद्धान्तायैव-जागरितस्थानके लिये हो [ लौट आता है ] | अतः यह पुरुष असङ्ग ही है । यदि यह इच्छावान् होनेके कारण स्वप्नमें सङ्गवान् होता तो जागरित - अवस्था में लौटनेपर यह उन सङ्गजनित दोषोंसे लिप्त हो जाता ॥ १६ ॥

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वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ ९ ५२ जागरित अवस्थाके भोगोंसे श्रात्मा की प्रसङ्गता यथासौ स्वप्नेऽसङ्गत्वात् स्व-प्नसङ्गजैर्दोषै र्जागरिते प्रत्यागतो न लिप्यते, एवं जागरितसङ्ग-जैरपि दोषैर्न लिप्यत एव बुद्धा-न्तेः तदेतदुच्यते-जिस प्रकार यह स्वप्नावस्था में असङ्ग होनेके कारण जागरित-स्थान में लौटनेपर उन स्वप्नसङ्घ-जनित दोषोंसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जागरितअवस्था में भी यह जागरितसङ्गजनित दोषोंसे लिप्त नहीं हो सकता — यही बात अब कही जाती है— स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्चैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्र-वति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥

वह यह पुरुष इस जागरित अवस्था में रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर फिर जिस स्थान स्वप्नस्थानको ही लौट जाता स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते । जागरिते रत्वा चरित्वेत्यादि पूर्ववत् । स यत्तत्र बुद्धान्ते कि-श्चित् पश्यत्यनन्वागस्तेन भवति — असङ्गो ह्ययं पुरुष इति । ननु दृष्ट्वैवेति कथमवधार्यते? प्रकार आया था उसी मार्ग से यथा-है ॥ १७ ॥

वह यह पुरुष इस बुद्धान्त-जागरित - स्थान में रमण और विहार कर - इत्यादि अर्थं पूर्ववत् समझना चाहिये । वह उस जागरित-अवस्थामें जो कुछ देखता है, उससे असंश्लिष्ट रहता है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग हे । शङ्का - किंतु यह कैसे निश्चय किया जाता है कि वह उन्हें देख-करोति च तत्र पुण्यपापे; तत्फलं कर ही [ लौट आता है ]? वहाँ तो वह पुण्य - पापोंको करता भी हैं च पश्यति । और उनका फल भी देखता है । न, कारकावभासकत्वेन कर्तृ- समाधान- - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसका कर्तृत्व कर्ता - कर्मादि कारकोंके अवभासकरूपसे ही है । त्वोपपत्तेः; ‘ आत्मनैवायं ज्योतिषा! ' यह पुरुष आत्मज्योतिके द्वारा हो a च f f व f ( f

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[ श्रध्याय ४ ङ्गता स्वप्नावस्था में रण जागरित-उन स्वप्न सङ्ग-नहीं होता, -अवस्था में भी -नित दोषोंसे ता - यही बात स्वा चरित्वा तियोन्याद्र-बहार कर तथा ती मार्ग से यथा-इस बुद्धान्त-मण और विहार पूर्ववत् समझना उस जागरित-देखता है, उससे है, क्योंकि यह ह कैसे निश्चय वह उन्हें देख-ता है ]? वहाँ को करता भी है भी देखता है । बात नहीं है, त्वकर्ता - कर्मादि सकरूपसे ही है । ति द्वारा ही ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ५३ श्रास्ते ' इत्यादिना श्रात्मज्योति -पावभासितः कार्यकरणसंघातो व्यवहरति । तेनास्य कर्तृत्वमुप- । ' चर्यते, न स्वतः कर्तृश्वम् तथा चोक्तम् ' ध्यायतीव लेलायतीव ' इति बुद्धाद्युपाधिकृतमेव न स्वतः; इह तु परमार्थापेक्षयोपा-धिनिरपेक्ष उच्यते - दृष्ट्दैव पुण्यं । च पापं च न कृत्वेति; तेन न पूर्वापरव्याघाताशङ्का; यस्मा -न्निरुपाधिकः परमार्थतो न करोति, न लिप्यते क्रियाफलेन तथा च भगवतोक्तम् – “ अना-दित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माय -मव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ " ( गीता १३ | ३१ ) इति । तथा सहस्रदानं तु कामप्र-विवेकस्य दर्शितत्वात् । तथा ' स । 64 ! रहता है ' इत्यादि उक्तिके, अनुसार आत्मज्योतिसे अवभासित देहेन्द्रिय-. संघात व्यवहार करता है । उसके कारण उसके कर्तृत्वका आरोप किया जाता है, इसमें स्वत: कर्तृत्व नहीं है; ऐसा ही कहा भी है-' ध्यान करता हुआ - सा, अत्यन्तं चञ्चल होता हुआ - सा ' इत्यादि इसका कर्तृत्व बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है, स्वतः नहीं है । यहाँ तो उपाधिकी अपेक्षा न रखकर परमार्थकी अपेक्षा से ही ऐसा कहा जाता है कि वह पुण्य - पापको देख-कर ही लौट आता है, करके नहीं; इसलिये यहाँ पूर्वापरके व्याघातकी आशङ्का नहीं है, क्योंकि निरुपाधिक होनेके कारण वह परमार्थतः नहीं करता और न क्रियाफलसे लिप्त ही होता है; ऐसा ही श्रीभगवान्ने भी कहा है- " हे कुन्तीनन्दन! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और निर्गुण होनेके कारण शरीरमें रहते हुए भी न करता है और न लिप्त होता है " इत्यादि । तथा सहस्र मुद्राका दान तो कामविवेक प्रदर्शित किये जानेके कारण है । इस प्रकार ' वह

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९ ५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ वा एष एतस्मिन् स्वप्ने ' ' स वा । एष एतस्मिन् बुद्धान्ते ' इत्येताभ्यां कण्डिकाभ्यामसङ्गतैव प्रतिपादि -ता; यस्माद् बुद्धान्ते कृतेन स्वप्नान्तं गतः सम्प्रसन्नोऽ-सम्बद्धो भवति स्तैन्यादिकार्या-दर्शनात्, तस्मात् त्रिष्वपि स्थानेषु स्वतोऽसङ्ग एवायम् श्रतोऽमृतः स्थानत्रयधर्म- । विलक्षणः । प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नान्ता-यैव, सम्प्रसादायेत्यर्थः - - दर्शन-वृत्तेः स्वप्नस्य स्वप्नशब्देना-भिघानदर्शनात्, अन्तशब्देन च विशेषणोपपत्तेः; ' एतस्मा अन्ताय धावति ' इति च सुषुप्तं दर्शयिष्यति । यदि पुनरेवमुच्यते - ' स्वप्ना-न्ते रत्वा चरित्वा ' ' एतावुभाव-न्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ' इति दर्शनात्, ' स्वप्ना -न्तायैव ' इत्यत्रापि दर्शनवृत्तिरेव यह पुरुष इस स्वप्नावस्था में ' ' वह यह पुरुष इस जागरित - अवस्था में इत्यादि इन दोनों कण्डिकाओंद्वारा आत्माको असङ्गताका ही प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि स्वप्नावस्था-में जाकर सम्यक् प्रकारसे प्रसादको प्राप्त हुआ यह पुरुष जागरितस्थान-में किये हुए कर्मसे सम्बद्ध नहीं होता, कारण, उस समय इसके चोरी आदि कार्य नहीं देखे जाते; अतः तीनों स्थानोंमें यह स्वयं असङ्ग ही है; इसलिये यह अमृत और तीनों स्थानोंके धर्मोसे विलक्षण है । यह ' प्रतियोनि ' - - यथास्थान स्वप्नान्त यानी सम्प्रसादके प्रति ही लौट आता है, दर्शनवृत्ति स्वप्नका ' स्वप्न ' शब्दसे उल्लेख देखा गया है, अतः ' अन्त ' शब्दसे उसके विशेषणकी उपत्ति होती है; ' एतस्मा अन्ताय धावति ' इस वाक्यसे ( वाक्यके ‘ अन्ताय ' पदसे ) श्रुति सुषुप्तको प्रदर्शित करेगी । और यदि ऐसा कहा जाय कि ' स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा ' और ' एता-वुभावन्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ' ऐसा देखे जानेके कारण ' स्वप्नान्तायैव ' इस प्रयोगमें भी दर्शन-ब्राह्मण स्वप्न किञ्च सिषा यस्मा पापं च न्तमा नुगतो एव ज्योत त्प्रयोज लक्षण असङ्ग एष ए द्याभि प्रतिपा नः; क स्वप्नम सम्प्रसा क्रमेण न्ताच्च मनुक्रम व्यतिरे न्यस्तो लोकम

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[ श्रध्याय ४ वस्था में ' ' वह -रित अवस्था में ण्डिकाओं द्वारा ही प्रतिपादन स्वप्नावस्था-कारसे प्रसादको नागरितस्थान-सम्बद्ध नहीं समय इसके ह्रीं देखे जाते; में यह स्वयं ये यह अमृत के धर्मोसे - यथास्थान सदके प्रति ही वृत्ति स्वप्ना व देखा गया दसे उसके न होती है; धावति ' इस न्ताय ' पदसे ) करेगी । कहा जाय कि चा ' और ' एता-स्वप्नान्तं च जानेके कारण गमें भी दर्शन-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ५५ स्वप्न उच्यत इति — तथापि न किञ्चिद् दुष्यति असङ्गता हि सिषाधयिषिता सिध्यत्येव; यस्माजागरितेष्व पुण्यं च पापं च रत्वा चरित्वा च स्वप्ना-न्तमागतः, न जागरितदोषेणा-नुगतो भवति ॥ १७ ॥

एवमयं पुरुष आत्मा स्वयं-ज्योतिः कार्यकरणविलक्षणस्त-स्प्रयोजकाभ्यां कामकर्मभ्यां वि-लक्षण: - यस्मादसङ्गो ह्ययं पुरुषः असङ्गत्वात् - इत्ययमर्थः ' स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे ' इत्या- । द्याभिस्तिसृभिः कण्डिकाभिः प्रतिपादितः; तत्रासङ्गतैव आत्म-नः; कुतः १ यस्माज्जागरितात् स्वप्नम्, स्वप्नाच्च सम्प्रसादम्, सम्प्रसादाच्च पुन: स्वप्नम्, क्रमेण बुद्धान्तं जागरितम्, बुद्धा-न्वाच्च पुनः स्वप्नान्तम् इत्येव मनुक्रमसंचारेण स्थानत्रयस्य व्यतिरेकः साधितः । पूर्वमप्युप-न्यस्तोऽयमर्थः ' स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ' | वृत्तिको ही स्वप्न कहा गया है तो भी कुछ दोष नहीं आता; क्योंकि असङ्गताकी सिद्धि अभीष्ट है और वह सिद्ध हो ही जाती है; कारण यह कि जागरितअवस्थामें पुण्य और पापको देखकर ही तथा रमण और विहार कर यह स्वप्नान्तमें आता है, किंतु उस समय जागरित-के दोष से लिप्त नहीं होता ॥ १७ ॥

इस प्रकार यह पुरुष आत्मा स्वयंज्योति, देह और इन्द्रियोंसे विलक्षण और उनके प्रयोजक काम एवं कर्मसे भी विलक्षण है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग ही है, असङ्ग होने के कारण ही ' ल वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे ' इत्यादि तीन मन्त्रोंद्वारा इस अर्थका प्रतिपादन किया गया है; इससे आत्माकी असङ्गता ही सिद्ध होती है; क्यों? क्योंकि वह जागरितसे स्वप्न को, स्वप्न से सुषुप्ति को और सुषुप्तिसे पुन: स्वप्नको तथा क्रमशः बुद्धान्त यानी जाग-रितको और जागरितसे पुन: स्वप्न-को इस प्रकार क्रमिक संचारके द्वारा उससे तीनों स्थानोंका व्यति-रेक सिद्ध किया गया है । पहले भी ' स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ' इस वाक्यद्वारा इस अर्थका उल्लेख किया

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९ ५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्राह्मण इति — तं विस्तरेण प्रतिपाद्य, | गया है । उसका विस्तारसे प्रति-पादन कर अब जो केवल दृष्टान्त- वुभौ केवलं दृष्टान्तमात्रमवशिष्टम्, मात्र रह गया है, उ करूंगी- इस उद्द ेश्यसे श्रुति आरम्भ तौ? तद् वक्ष्यामीत्यारभ्यते— करती है- दृष्ट पुरुषके अवस्थान्तर - संचारमें महामत्स्यका दृष्टान्त मृत्युर सहत तद् यथा महामत्स्य उभेकूले अनुसंचरति पूर्व भ्याम चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसंचरति एतस्म स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥ विस्तर

जिस प्रकार कोई बड़ा भारी मत्स्य नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमश: संचार करता है, उसी प्रकार यह पुरुष स्वप्नस्थान और अत्र जागरितस्थान इन दोनों ही स्थानों में क्रमशः संचार करता है ॥ १८ ॥ स्वयंज

तत्रैतस्मिन् यथा प्रदर्शितेऽर्थे । दृष्टान्तोऽयमुपादीयते - यथा लोके महामत्स्यः, महांश्चासौ मत्स्यश्च, नादेयेन स्रोतसाहार्य इत्यर्थः, स्रोतश्च विष्टम्भयति, स्वच्छन्दचारी, उभे कूले नद्याः पूर्वं चापरश्चानुक्रमेण संचरति; संचरन्नपि कूलद्वयं तन्मध्यवर्तिना उदकस्रोतोवेगेन न परवशी-क्रियते — एवमेवायं पुरुष एता- । तत्का अर्थ है; तत्र ( वहाँ ) करण अर्थात् इस ऊपर दिखाये हुए विषय कर्मभ्य में यह दृष्टान्त बताया जाता है-नायं जिस प्रकार लोकमें महामत्स्य - जो निमि महान् हो और मत्स्य हो अर्थात् जो नदीके स्रोतसे अक्षुण्ण रहने- विद्य वाला हो तथा स्रोतको भी रोक समुदा देता हो, वह स्वच्छन्द विचरनेवाला तत्र महामत्स्य जैसे नदीके पूर्व और नां त्रय अपर दोनों तीरोंपर क्रमश: संचार करता है और संचार करता हुआ नपु भी उन दोनों तीरोंके बीचमें रहने- ज्जाग वाले जलप्रवाहके वेगसे विवश कार्यक नहीं होता, इसी प्रकार यह पुरुष इन दोनों स्थानोंमें क्रमशः द्यया;