बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 971–980
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980
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[ अध्याय ४ विस्तारसे प्रति-वो केवल दृष्टान्त-है, उसका वर्णन यसे श्रुति आरम्भ दृष्टान्त संचरति पूर्व तावनुसंचरति और अपर दोनों स्वप्नस्थान और -रता है ॥ १८ ॥
है; तत्र ( वहाँ ) दिखाये हुए विषय-बताया जाता है-में महामत्स्य - जो मत्स्य हो अर्थात् अक्षुण्ण रहने-स्रोतको भी रोक छन्द विचरनेवाला नदी के पूर्व और पर क्रमश: संचार चार करता हुआ रों के बीच में रहने-के वेगसे विवश इसी प्रकार यह स्थानों में क्रमशः ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ वुभौ अन्तौ अनुसंचरति; कौ तौ १ स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च दृष्टान्तप्रदर्शन फलं तु— मृत्युरूपः कार्यकरणसंघातः सहतत्प्रयोजकाभ्यां कामकर्म भ्याम् अनात्मधर्मः, अयं चात्मा एतस्माद् विलक्षणः - इति विस्तरतो व्याख्यातम् ॥ १८ ॥
९ ५७ । संचार करता है; वे दोनों स्थान कौन से हैं? स्वप्नस्थान और जागरित स्थान | दृष्टान्त- प्रदर्शन करनेका फल तो यह है कि अपने प्रयोजक काम और कर्मोंके सहित मृत्युरूप देहे-न्द्रियसंघात अनात्मधर्म है और यह आत्मा इससे विलक्षण है -- इस प्रकार इसकी विस्तारसे व्याख्या | कर दी गयी ॥ १८ ॥
अत्र च स्थानत्रयानुसंचारेण स्वयंज्योतिष आत्मनः कार्य-करणसंघातव्यतिरिक्तस्य काम-कर्मभ्यां विविक्ततोक्ता; स्वतो नायं संसारधर्मवान् उपाधि -निमित्तमेव त्वस्य संसारित्वम् अविद्याध्यारोपितम् - इत्येष समुदायार्थ उक्तः । तत्र च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तस्थाना-नां त्रयाणां विप्रकीर्णरूप उक्तः, न पुञ्जीकृत्यैकत्र दर्शितः - यस्मा ज्जागरिते ससङ्गः समृत्युः स-कार्यकरणसंघात उपलक्ष्यतेऽवि-द्यया; स्वप्ने तु कामसंयुक्तो यहाँ स्थानत्रयके क्रमिक संचार-के द्वारा देहेन्द्रियसंघातसे व्यतिरिक्त स्वयंप्रकाश आत्माकी काम और कर्मोंसे भिन्नता बतलायी गयी है; यह स्वयं संसारधर्मवान् नहीं है, इसका संसारित्व अविद्यासे आरो-पित उपाधिके कारण ही है - इस प्रकार यह समुदायका सारांश बतलाया गया । परंतु यहाँ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त ' तीनों स्थानोंका पृथक् - पृथक् रूप कहा गया है, सबको मिलाकर एक स्थानमें नहीं दिखाया गया; क्योंकि जागरित - अवस्था में वह अविद्यावश, ससङ्ग ( आसक्तियुक्त ), मृत्युयुक्त और कार्यंकरणसंघात सहित देखा जाता है, किंतु स्वप्नमें
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९ ५८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ मृत्युरूपविनिर्मुक्त उपस्यतेः । सुषुप्ते पुनः सम्प्रसन्नोऽसङ्गो भवतीत्य सङ्गतापि दृश्यते; एक -वाक्यतया तूपसंहियमाणं फलं नित्यमुक्त बुद्धशुद्धस्वभावतास्थ नैकत्र पुञ्जीकृत्य प्रदर्शिता, इति तत्प्रदर्शनाय कण्डिका श्रारभ्यते । सुषुप्ते ह्येवंरूपतास्य वक्ष्य--माणा ' तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयं रूपम् ' इति यस्मादेवंरूपं विलक्षणं सुषुप्तं प्रविविक्षति; तत् कथम्? इत्याह दृष्टान्तेनास्यार्थस्य प्रकटीभावो भवतीति तत्र दृष्टान्त उपा-दीयते-१. यह सम्प्रसाद भी क्षणिक ही है; चिन्ताओं और क्लेशोंका बोध न होनेके मानसिक विकारोंका सम्पर्क न रहनेसे कामयुक्त तथा मृत्युके रूपोंसे विनिर्मुक्त दिखायी देता है और फिर सुषुप्ति में सम्प्रसादको प्राप्त होकर असङ्ग हो जाता है -- इस रि प्रकार उसकी असङ्गता भी देखो मेव जाती है । अत: एकवाक्यतारूपसे का जो उपसंहार किया जानेवाला फल है, वह इसकी नित्य शुद्ध-उड़न बुद्धमुक्तस्वभावता एक स्थानपर -संगृहीत करके नहीं दिखायी गयी; की अतः अब उसे दिखाने के लिये यह है, कण्डिका आरम्भ की जाती है । स्वप्न इसका ऐसा रूप ' तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयं भौति रूपम् ' इस वाक्यद्वारा सुषुप्तिमें ही बतलाया जानेवाला है; क्योंकि ऐसे सुप विलक्षणरूपवाले सुषुप्तस्थान में यथा आत्मा प्रवेश करना चाहता है; विप वह किस प्रकार, सो श्रुति बतलाती पतन है - दृष्टान्त से इस अर्थको स्पष्टता संहत्य होती है, इसलिये इस विषय में पक्षौ; दृष्टान्त दिया जाता है-संलय चित्तका लय होनेसे सब प्रकारको धियत कारण प्रसन्नता रहती है; उस समय मेवः वह असङ्ग होता है; इसी असङ्गताको -बतानेके लिये यह दृष्टान्तमात्र है, वास्तविक असङ्गता तो तत्व बोधसे ही होती पुरुषः है; और उसकी पूर्णतया समानता कहीं नहीं है । धावति २. जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंकी अपेक्षा सुषुप्तिमें विलक्षणता अवश्य है; विशेष क्योंकि उसमें वह कामना, पाप और भय आदिसे रहित होता है; किंतु इसकी यह अकामता आदि क्षणिक ही है । वस्तुतः अकाम, निष्पाप एवं निर्भय तो मुक्त सुप्तः, -आत्मा ही है, जो सब अवस्थाओंसे परेकी स्थिति है ।
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[ अध्याय ४ मृत्युके रूपोंसे देता है और मप्रसादको प्राप्त जाता है-- इस सङ्गता भी देखी एकवाक्यतारूप से किया जानेवाला की नित्य शुद्ध-एक स्थान पर --दिखायी गयी; वानेके लिये यह की जाती है । रूप ‘ तद् वा अपहतपाप्माभयं T रा सुषुप्ति में ही क्यों सुषुप्तस्थानमें ना चाहता है; श्रुति बतलाती अर्थी स्पष्टता इस विषय में है— न सब प्रकारकी ती है; उस समय इस अङ्ग -बोधसे ही होती वणता अवश्य है; है; किंतु इसकी निर्भय तो मुक्त ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ५ ९ सुषुप्ति आत्माका विश्रान्तिस्थान हैं, इसमें श्येनका दृष्टान्त तद् यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विप-रिपत्य श्रान्तः स ँहत्य पक्षौ संलयायैव प्रियतएव-मेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ॥ १६॥
जिस प्रकार इस आकाशमें श्येन ( बाज ) अथवा सुपर्ण ( तेज उड़नेवाला बाज ) सब ओर उड़कर थक जानेपर पंखोंको फैलाकर घोंसले -की ओर ही उड़ता है, इसी प्रकार यह पुरुष इस स्थानकी ओर दौड़ता है, जहाँ सोनेपर यह किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है ॥ १६ ॥
तद् यथा - अस्मिन्नाकाशे भौतिके श्येनो वा सुपर्णो वा, सुपर्णशब्देन चित्रः श्येन उच्यतेः यथा आकाशेऽस्मिन् विहृत्य विपरिपत्य श्रान्तो नानापरि-पतनलक्षणेन कर्मणा परिखिन्नः; संहत्य पक्षौ सङ्गमय्य सम्प्रसार्य पक्षौ; सम्यग्लीयते श्रस्मिन्निति संलयो नीड; नायैव धियते स्वात्मनैव धार्यते स्वय-मेव; यथायं दृष्टान्तः, एवमेवायं पुरुषः, एतस्मा एतस्मै अन्ताय धावति । अन्तशब्दवाच्यस्यं विशेषणम् - यत्र यस्मिन्नन्ते सुप्तः, न कञ्चन न कश्चिदपि । जिस प्रकार इस भौतिक | आकाशमें श्येन अथवा सुपर्ण-सुपर्णं शब्दसे वेगवान् श्येन कहा गया है, जिस प्रकार इस आकाश-में विहार कर - सब ओर उड़कर थक जानेपर कई बार उड़ान भर-नारूप कर्मसे खिन्न होकर पंखोंके संहत - सङ्गत अर्थात् फैलाकर संलय-जिसमें सम्यक् प्रकारसे लीन होता है, उस घोंसलेका नाम संलय है, उस घोंसले के प्रति स्वयं ही अपनेको धारण करता है; जैसा यह दृष्टान्त है, इसी प्रकार यह पुरुष एतस्मै-इस स्थान के प्रति दौड़ता है । अन्त-शब्दवाच्य स्थानका विशेषण - जिस स्थानमें शयन करनेपर यह किसी
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ९ ६० कामं कामयते; तथा न कञ्चन । स्वप्नं पश्यति । ' न कञ्चन कामम् ' इति स्वप्न बुद्धान्तयोरविशेषेण सर्वः कामः प्रतिषिध्यते, ' कञ्चन ' इत्य-विशेषिताभिधानात् तथा ' न कञ्चन स्वप्नम्, इति- जागरिते-ऽपि यद् दर्शनम्, तदपि स्वप्नं मन्यते श्रुतिः, अत आह — न कञ्चन स्वप्नं पश्यतीति; तथा च श्रुत्यन्तरम् - " तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः ” ( ऐ ० उ ० १ । ३ । १२ ) इति । यथा दृष्टान्ते पक्षिणः परिप-तनजश्रमापनुत्तये स्वनीडोपसर्प-णम्, एवं जाग्रत्स्वप्नयोः कार्य भोगकी इच्छा नहीं करता और इसी प्रकार न किसी स्वप्नको ही देखता है । ३ ' न कञ्चन कामम् ' इससे स्वप्न और जागरितके सभी भोगोंका समानरूपसे प्रतिषेध किया जाता है, क्योंकि ' कञ्चन ' ( किसी भी ) इस पदके द्वारा किसी भोगविशेष-का नाम न लेकर समानरूपसे ही कहा गया है । इसी प्रकार ' न श कञ्चन स्वप्नम् ' इस वाक्यसे भी समझना चाहिये; जागरितमें भी जो कुछ देखा जाता है, उसे भी श्रुति स्वप्न ही मानती है, इसीसे ६ कहती है कि कोई स्वप्न नहीं देखता; ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है - " उसके तीन आवसथ ( स्थान ) हैं और तीन स्वप्न हैं " E इत्यादि । जिस प्रकार दृष्टान्तमें उड़ानसे उत्पन्न हुए श्रमकी निवृत्तिके लिये पक्षीका अपने घोंसले में जाना दिखाया है, इसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें देहेन्द्रियके करणसंयोगजक्रियाफलैः संयुज्य- संयोगसे होनेवाले क्रियाफलोंसे मानस्य, पक्षिणः परिपतनज इव, संयुक्त हुए जोवको, पक्षीके उड़ने-से होनेवाले श्रमके समान ही, श्रमो भवति, तच्छ्रमापनुत्तये श्रम होता है; उस श्रमकी निवृत्ति-स्वात्मनो नीडमायतनं सर्वसंसार के लिये वह अपने घोंसले-निवासस्थान अर्थात् सम्पूर्ण संसार-धर्मविलक्षणं सर्वक्रियाकारक- धर्मोसे विलक्षण तथा सब प्रकार-
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63 [ अध्याय ४ - करता और स्वप्नको ही मु ' इससे स्वप्न सभी भोगोंका किया जाता ( किसी भी ) सी भोगविशेष-समानरूपसे हो सी प्रकार ' न वाक्य से भी जागरितमें भी है, उसे भी नती है, इसीसे स्वप्न नहीं अन्य तीन आवसथ तीन स्वप्न हैं " ष्टान्तमें उड़ान से - निवृत्तिके लिये घोंसले में जाना - प्रकार जाग्रत् देहेन्द्रिय ल क्रियाफलोंसे , पक्षी के उड़ने-मके समान ही, श्रमकी निवृत्ति-अपने घोंसले-त् सम्पूर्ण संसार-तथा सब प्रकार-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ६१ फलायासशून्यं स्वमात्मानं प्रवि- | के क्रिया, कारक और फलके श्रमसे रहित अपने ' आत्मामें प्रवेश करता शति ॥ १ ९ ॥ हे ॥ १६ ॥
स्वप्नदर्शनकी स्थानभूता हिता नाम्नी नाडियों का वर्णन यद्यस्यायं स्वभावः —–— सर्व-संसारधर्मशून्यता, परोपाधि-निमित्तं चास्य संसारधर्मित्वम्; यन्निमित्तं चास्य परोपाधिकृतं । संसारधर्मित्वम्, सा चाविद्या-तस्या श्रविद्यायाः किं स्वा-भाविकत्वम् १ आहोस्वित् काम कर्मादिवदागन्तुकत्वम् १ यदि चागन्तुकत्वम्, ततो विमोक्ष उपपद्यते; तस्याश्चागन्तुकत्वे कोपपत्तिः १ कथं वा नात्म-धर्मोऽविद्या १ इति सर्वानर्थबीज-भूताया अविद्यायाः सतश्वाव-धारणार्थ परा कण्डिका | आरभ्यते-ता वा अस्यैता हिता यदि यह सर्वसंसारघर्मशून्यता, इस आत्माका स्वभाव है तो इसका सांसारिक धर्मोसे युक्त होना अन्य उपाधिके कारण है; और जिस हेतु-से इसका परोपाधिकृत संसारधर्मित्व है, वह अविद्या है । अब प्रश्न होता है - वह अविद्या स्वाभाविक है अथवा काम एवं कर्मादिके समा-न आगन्तुक है? यदि आगन्तुक है, तब तो उससे मोक्ष होना सम्भव है । किंतु उसके आगन्तुक होने में युक्ति क्या है? अविद्या आत्माका ही धर्म क्यों नहीं है? अतः सम्पूर्णं अनर्थोंकी बीजभूता अविद्याका स्वरूप निर्णय करनेके लिये आगेकी कण्डिका आरम्भ की जाती है-नाम नाड्यो यथा केशः १. सुषुप्ति में जो जीवका आत्मामें प्रवेश करना कहा है, इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वह मुक्त आत्माकी भाँति स्वरूपमें स्थित हो जाता है, यह स्थिति तो पूर्ण बोध होनेपर ही हो सकती है । सुषुप्त जीवका अव्याकृत मायाके अंशभूत कारण - शरीरसे सम्बन्ध बना रहता है; अतः उक्त कथनका तात्पर्य ब्रह्म में कारण- शरीरके सहित प्रवेश करना है - ऐसा समझना चाहिये । बृ ० उ ० ६१–
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९ ६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ AL सहस्रधा भिन्नस्तावताणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यन्नैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव. हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्द्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेद सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥
उसकी वे ये हिता नामकी नाडियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागों में विभक्त केश होता है वैसी ही सूक्ष्मता से रहती हैं । वे शुक्ल, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रससे पूर्ण हैं । सो जहाँ इस पुरुषको मानो मारते, मानो अपने वशमें करते हैं और जहाँ मानो इसे हाथी खदेड़ता है अथवा जहां यह मानो गड़हेमें गिरता है; इस प्रकार जो कुछ भी जाग्रदवस्थाके भय देखता है, उन्हें इस स्वप्नावस्थामें अविद्यासे मानता है और जहाँ यह देवताके समान, राजाके समान अथवा मैं ही यह सब हूँ - ऐसा मानता है, वह इसका परमधाम है ॥ तावै, अस्य शिरः पाण्यादि-लक्षणस्य पुरुषस्य, एता हिता नाम नाड्यः, यथा केशः सहस्रधा भिन्नः, तावता तावत्परिमाणे-नाणिम्ना अणुत्वेन तिष्ठन्ति ताथ शुक्लस्य रसस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णाः, एतैः शुक्लत्वादिभी रसविशेषैः पूर्णा इत्यर्थः एते च रसानां वर्ण-विशेषा वातपित्तश्लेष्मणाम्इत--रेतरसंयोगवैषम्य विशेषाद्
विचित्रा बहवश्च भवन्ति ।
२० ॥
इस शिर एवं हाथ आदि अव-यवोंवाले पुरुषकी ये हिता नामकी नाडियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागों-में विभक्त हुआ केश रहता है, उत-ने ही परिमाण यानी सूक्ष्मतासे रहती हैं; और वे शुक्ल, नील, पीत, । हरित एवं लोहित रसकी भरी हुई हैं अर्थात् इन शुक्लत्वादिविशिष्ट रसोंसे पूर्ण हैं; ये रसोंके वर्णविशेष वात, पित्त और कफोंके पारस्परिक संयोगको विशेष विषमताके कारण विभिन्न और बहुत प्रकारके होते हैं । सु श व्य तद चर वा पा दू द्या व अ म वा चा प क त
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[ श्रध्याय ४ स्य नीलस्य नथ यत्रनं गर्तम मन्यतेऽथ ति मन्यते सहस्र भागों में नील, पीत, मानो मारते, ड़ता है अथवा जाग्रदवस्था के है और जहाँ सब हूँ - ऐसा आदि अव-हिता नामकी सहस्र भागों-हता है, उत सूक्ष्मता , नील, पीत, की भरी हुई स्वादिविशिष्ट के वर्णविशेष पारस्परिक के कारण प्रकार ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९ ६३ तास्वेवंविधासु नाडीषु सूक्ष्मा । सु वालाग्र सहस्रमेदपरिमाणासु शुक्लादिरसपूर्णासु सकलदेह व्यापिनीषु सप्तदशकं लिङ्गं वर्तते । तदाश्रिताः सर्वा वासना उच्चाव-चसंसारधर्मानुभवजनिताः; तल्लिङ्गं वासनाश्रयं सूक्ष्मत्वात् स्वच्छं स्फटिकमणिकल्पं नाडीगतरसो-पाधिसंसर्गवशाद् धर्माधर्मप्रेरितो-द्भूतवृत्तिविशेषं स्त्रीरथहस्त्या-द्याकारविशेषैर्वासनाभिः प्रत्य-वभासते । अथैवं सति 9 यत्र यस्मिन् अविद्याप्रत्ययो - काले केचन शत्र -भूतदुःखानुभव- वोऽन्ये वा तस्करा प्रदर्शनम मामागत्य घ्नन्ति - इति मृषैव वासनानिमित्तः प्रत्ययोऽवि -द्याख्यो जायते, तदेतदुच्यते -एनं स्वप्नदृशं घ्नन्तीवेति; तथा जिनन्तीव वशीकुर्वन्तीव; न केचन घ्नन्ति, नापि वशी-कुर्वन्ति, केवलं त्वविद्यावास-नोद्भवनिमित्तं भ्रान्तिमात्रम्; तथा हस्तीवनं विच्छाययति वि-इन इस प्रकारकी शुक्लादि रसों-से पूर्ण सम्पूर्ण शरीरमें फैली हुई और वालाग्रके सहस्रांश परिमाण-वाली सूक्ष्म नाडियों में वह सतरह तत्त्वोंका लिङ्गशरीर रहता है । उसीके अधीन संसारके ऊँच - नीच धर्मोके अनुभवसे उत्पन्न हुई सारी वासनाएँ हैं । वासनाओंका आश्र यभूत वह लिङ्गशरीर सूक्ष्म होनेके कारण स्वच्छ और स्फटिकमणिके समान है, वह नाडीग्रत रसरूप उपाधिके संसर्गसे धर्माधर्मप्रेरित उद्भुतवृत्तिविशेषवाला तथा स्त्री, रथ, हाथी आदि आकारवाली विशेष वासनाओंसे युक्त भासित होता है । ऐसी स्थितिमें, जिस समय वासनाओंके कारण शत्रु अथवा अन्य चोर आदि आकर मुझे मारते हैं ' ऐसा अविद्यासंज्ञक वृथा ही प्रत्यय हो जाता है, उसके विषय में यह कहा जाता है — इस स्वप्नद्रष्टाको मानो मारते हैं, तथा ' जिनन्तीव ' – मानो वशमें करते हैं । [ वास्तवमें ] उस समय न कोई मारते हैं और न वशमें ही करते हैं, यह तो केवल अविद्या-जनित वासना के उद्भवके कारण भ्रान्तिमात्र हो जाती है; इसी प्रकार हाथी के समान कोई इसे विच्छायित-
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९ ६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 च्छादयति विद्रावयति धावयती- । वेत्यर्थः; गर्तमिव पतति — गर्त जीर्णकूपादिकमिव पतन्त-मात्मानमुपलक्षयति तादृशी ह्यस्य मृषा वासनोद्भवत्यत्यन्त-निकृष्टाधर्मोद्भासितान्तःकरण-वृत्त्याश्रया, दुःखरूपत्वात् । किंबहुना, यदेव जाग्रद्भयं पश्यति हस्त्यादिलक्षणम्, तदेव भयरूपम् अत्रास्मिन् स्वप्ने विनैव हस्त्यादिरूपं भयमविद्या-वासनया मृषैवोद्भूतया मन्यते । अथ पुनर्यत्राविद्यपकृष्यमा-विद्याप्रत्ययोद्भूत- णा विद्या चोत्कृ-देवात्मत्वप्रदर्शनम् ष्यमाणा - किं-विषया किंलक्षणा च? इत्युच्यते - अथ पुनर्यत्र यस्मिन् काले, देव इव स्वयं भवति, देवता-विषया विद्या यदोद्भूता जाग-रितकाले, तदोद्भूतया वासनया देवमिवात्मानं मन्यते; स्वप्ने-ऽपि तदुच्यते - देव इव, राजेव । विद्रावित करता अर्थात् दौड़ाता ब्रा ( पीछा करता ) है तथा यह माना गर्त में गिरता है अर्थात् अपनेको श गर्त - पुराने कृपादिमें गिरता - सा श देखता है; इसे इस प्रकार की मिथ्या वासना पैदा हो जाती है, जो दु: ख- चा रूपा होनेके कारण अत्यन्त निकृष्ट और अन्तःकरणकी अधर्मोद्भा- उ सिता वृत्तिके आश्रित रहती है । य अधिक क्या, जागरित अवस्था-भा में जो कुछ यह हाथी आदिरूप भय म देखता है, इस स्वप्नावस्था में भी सो हस्त्यादिरूप भयके बिना ही जाग्रत् अ हुई अविद्यावासनासे उस भयरूप-को, जो मिथ्या ही है, सच मानने लगता है । वि और फिर जब अविद्याका अपकर्ष और विद्याका उत्कर्षं होने. वि लगता है, तो उसका क्या विषय और क्या लक्षण होता है? सो ते बतलाया जाता है - फिर जब - जिस स समय वह स्वयं देवताके समान स हो जाता है; अर्थात् जब जागरित-. कालमें देवताविषयिणी विद्याका उद्भव होता है, तब उस उद्भुत त हुई वासनासे वह अपनेको देवताके व समान मानता है, स्वप्न में भी ऐसा ही कहा जाता है कि वह देवताके समान तथा राजाके समान होता है; f
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[ अध्याय ४ अर्थात् दौड़ाता तथा यह मानो अर्थात् अपनेको में गिरता - सा कारकी मिथ्या ती है, जो दुःख-अत्यन्त निकृष्ट अधर्मोद्भा रहती है । गरित अवस्था-आदिरूप भय प्नावस्था में भी बिना ही जाग्रत् उस भयरूप-है, सच मानने ब अविद्याका का उत्कर्ष होने का क्या विषय होता है? सो फिर जब - जिस 1 वता के समान जब जागरित-यिणी विद्याका - उस उद्भुत पनेको देवताके नमें भी ऐसा ही देवताके समान मान होता है; ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ६५ राज्यस्थोऽभिषिक्तः स्वप्नेऽपि । राजाहमिति मन्यते राजवासना-वासितः । एवमत्यन्त प्रतीयमाणा विद्या उद्भूता च विद्या सर्वात्मविषया यदा, तदा स्वप्नेऽपि तद्भाव भावित: - अहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते; स यः सर्वात्मभावः, " सोऽस्यात्मनः परमो लोकः परम आत्मभावः स्वाभाविकः । • यत्तु सर्वात्मभावादर्वाग् वाला -विद्याविद्ययोर्भेदः ग्रमात्रमप्यन्यत्वेन . दृश्यते - नाहमस्मीति, तदवस्था -विद्या; तया श्रविद्यया ये प्रत्युप-स्थापिता अनात्मभावा लोकाः, तेऽपरमाः स्थावरान्ता; तान् संव्यवहार विषयाँल्लो कानपेक्ष्यायं सर्वात्मभावः समस्तोऽनन्तरोऽबा -ह्यः, सोऽस्य परमो लोकः ॥ तस्मादपकृष्यमाणायामविद्यायां विद्यायां च काष्ठां गतायां सर्वा -त्मभावो मोक्षः, यथा स्वयंज्योतिष्टुं स्वप्ने प्रत्यक्षत उपलभ्यते तद्वद् विद्याफलमुपलभ्यत इत्यर्थः । [ तात्पर्य यह है कि ] जागरित-अवस्थामें अभिषेकपूर्वक राज्यपर स्थित हुआ पुरुष उस राजवासना-से युक्त होनेके कारण स्वप्न में भी. ' मैं राजा हूँ ' ऐसा मानता है । इसी प्रकार जब अविद्या अत्यन्त क्षीण हो जाती है और सर्वात्म-विषयिणी विद्याका उद्भव हो जाता है, उस समय उस भावसे भावित रहनेके कारण वह स्वप्नमें भी ' मैं ही यह सर्वरूप हूँ ' ऐसा मानता है; यह जो सर्वात्मभाव है, वह इस आत्माका परम लोक - स्वाभाविक परम आत्मभाव है । और जो सर्वात्मभावसे उतर-कर अपनेको वालाग्रमात्र भी ' मैं यह नहीं हूँ ' इस प्रकार अन्यरूपसे | देखता है, वह अवस्था अविद्या है, उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये गये जो अनात्मभाव हैं, वे स्थावरपर्यन्त लोक अपरम हैं; उन व्यवहारविष-यक लोकोंकी अपेक्षा यह सर्वात्म-भाव पूर्णं तथा अन्तर - बाह्यशून्य है, वह इसका परम लोक है; अत: अविद्याका अपकर्ष और विद्याकी पराकाष्ठा होनेपर सर्वात्मभावकी प्राप्ति ही मोक्ष है, तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वप्न में आत्माका स्वयं-प्रकाशत्व प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, उसी प्रकार विद्याके फल मोक्षकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है ।
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९ ६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तथाविद्यायामप्युत्कृष्यमा-णायाम्, तिरोधीयमानायां च विद्यायाम्, अविद्यायाः फलं प्रत्यक्षत एवोपलभ्यते - ' प्रथ यत्रेनं घ्नन्तीव जिनन्तीव ' इति । ते एते विद्याविद्याकार्ये सर्वात्म-भावः परिच्छिन्नात्मभावश्च; विद्यया शुद्धया सर्वात्मा भवति अविद्यया चासर्वो भवति अन्यतः कुतश्चित् प्रविभक्तो भवति यतः प्रविभक्तो भवति, तेन विरुध्यते; विरुद्धत्वाद् हन्यते । जीयते विच्छाद्यते च । असर्व विषयत्वे च भिन्नत्वादेतद् भवतिः समस्तस्तु सन् कुतो भिद्यते येन विरुध्येत विरोधा-भावे केन हन्यते जीयते विच्छा-द्यते च १ अत इदमविद्यायाः सतत्त्व-मुक्तं भवति - सर्वात्मानं सन्तम सर्वात्मत्वेन ग्राहयति, आत्मनोऽन्यद् वस्त्वन्तर-विद्यमानं प्रत्युपस्थापयति आत्मानम सर्वमापादयति; इसी प्रकार अविद्याका उत्कर्ष और विद्याका तिरोभाव होनेपर द भी ' जिस समय मानो इसे कोई i मारते हैं अथवा वशमें करते हैं ' इत्यादि रूपसे अविद्याका फल प्रत्यक्ष ही उपलब्ध होता है । वे ये सर्वात्मभाव और परिच्छिन्नात्म-भाव क्रमश: विद्या और अविद्याके कार्य हैं; शुद्ध विद्यासे पुरुष सर्वात्मा घ हो जाता है और अविद्यासे असर्वं घ होता है; वह किसी अन्यसे विभक्त हो जाता है और जिससे विभक्त होता है, उससे विरुद्ध रहता है तथा विरुद्ध रहनेके कारण मारा जाता है, जीता जाता है तथा खदेड़ा जाता है । असर्वका विषय रहनेपर ही भिन्न होनेके कारण यह सब होता है; यदि सर्वरूप रहता तो किससे भिन्न होता, जिससे कि उसका विरोध हो सकता और विरोध न होनेपर वह किसके द्वारा मारा जाता, अथवा खदेड़ा जाता? अत: यह अविद्याका स्वभाव बतलाया जाता है कि पुरुष सर्वात्मा होते हुए अपनेको असर्वात्मरूपसे ग्रहण कराता है, आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु न होनेपर भी उसे उपस्थित करता है तथा आत्माको असर्वरूप बना देता है; फिर