बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 981–990
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990
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[ अध्याय ४ V विद्याका उत्कर्ष भाव होनेपर नो इसे कोई शमें करते हैं ' विद्याका फल होता है । वे ये नरिच्छिन्नात्म-और अविद्या पुरुष सर्वात्मा अविद्यासे अस अन्यसे विभक्त जिससे विभक्त रुद्ध रहता है कारण मारा जाता है तथा सर्वका विषय होनेके कारण यदि सर्वरूप भिन्न होता, रोध हो सकता पर वह किसके जीता जाता ? बाका स्वभाव I पुरुष सर्वात्मा असर्वात्मरूपसे आत्मासे भिन्न होनेपर भी उसे तथा आत्माको ता है; फिर ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ६७ वतस्तद्विषयः कामो भवति यतो । भिद्यते, कामतः क्रियामुपादत्ते ततः फलम् - तदेतदुक्तं वक्ष्य-माणं च – ' यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति ' इत्यादि । इदमविद्यायाः सतश्वं सह कार्येण प्रदर्शितम्; विद्यायाश्च कार्य सर्वात्मभावः प्रदर्शितो -ऽविद्याया विपर्ययेण । सा चाविद्या नात्मनः स्वाभाविको धर्मः- यस्माद् विद्यायामुत्कृष्य-माणायां स्वयमपचीयमाना सती काष्ठां गतायां विद्यायां परिनि-ष्ठिते सर्वात्मभावे सर्वात्मना निवर्तते, रज्ज्वामिव सर्पज्ञानं रज्जानश्चये । तच्चोक्तम्– “ यत्र स्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् केन कं पश्येत् ” ( वृ ० उ ० ४ । ५ । १५ ) इत्यादि; तस्मान्नात्म-धर्मोऽविद्या; न हि स्वाभावि -कस्योच्छित्तिः कदाचिदप्युपप-द्यते, सवितुरिवौष्ण्यप्रका-शयोः । तस्मात् तस्या मोक्ष उपपद्यते || २० || जिससे भेद मानता है, उसके विष-यमें कामना होती है, कामनासे क्रिया स्वीकार करता है और उससे फल होता है, इसीसे यह कहा है । और आगे कहा भी जायगा कि ' जहां द्वैत - सा होता है, वहीं अन्य अन्य को देखता है ' इत्यादि । यह अविद्याका स्वरूप उसके कार्यके सहित दिखाया गया तथा अविद्या के विपरीतरूपसे विद्याका कार्य सर्वात्मभाव दिखाया गया । वह अविद्या आत्माका स्वाभाविक धर्म नहीं है, क्योंकि विद्याका उत्कर्षं होनेपर वह स्वयं क्षीण होने लगती हे और जिस समय विद्याकी परा-त्मभावकी पूर्णं प्रतिष्ठा हो जाती है, उस समय रज्जुका निश्चय होने-पर रज्जुमें सर्पज्ञान के समान उसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है- " जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा क्या देखे? " इत्यादि; इसलिये अविद्या आत्माका धर्म नहीं है, क्योंकि सूर्यके उष्णता और । प्रकाशके समान स्वाभाविक धर्मो-का कभी उच्छेद नहीं हो सकता । अत: उससे मोक्ष होना सम्भव है ॥ २० ॥
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९ ६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त इदानीं योऽसौ सर्वात्म-भावो मोक्षो विद्याफलं क्रिया-कारक फलशून्यम्, स प्रत्यक्षतो निर्दिश्यते, यत्राविद्याकामक-र्माणि न सन्ति । तदेतत् प्रस्तु-तम् — ' यत्र सुप्तो न कश्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ' इति -अब, यह जो विद्याका फल क्रियाकारक एवं फलसे रहित सर्वा-त्मभावरूप मोक्ष है, जिसमें कि अविद्या, काम और कर्मका अभाव है, उसका प्रत्यक्षतया निर्देश किया जाता है । ' जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भोगको इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न देखता है ' इस प्रकार जिसका प्रक-रण चला था -तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभय ँ रूपम् । तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेना-त्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरं तद् वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामरूप शोका-न्तरम् ॥ २१ ॥
वह इसका कामरहित, पापरहित और अभयरूप है । व्यवहारमें जिस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको आलिङ्गन करनेवाले पुरुषको न कुछ बाहरका ज्ञान रहता है और न भीतरका, इसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञा-त्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ भीतरका; यह इसका आप्तकाम, . रूप है ॥ २१ ॥.
तदेतद् वा अस्य रूपम्— यः सर्वात्मभावः ' सोऽस्य परमो लोकः ' इत्युक्तः -वदतिच्छन्दा अतिच्छन्द-बाहरका विषय जानता है और न आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य इसका यह रूप, जो कि सर्वात्म-भाव एवं ' यह इसका परम लोक है ' इस प्रकार कहा गया है, वह | अतिच्छन्दा अर्थात् अतिच्छन्द - रूप ब्राह मित मः सौ छन अ द्रष्ट वच चह श्र ने त्य ध स ३ प
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[ अध्याय ४ का दृष्टान्त विद्याका फल रहित सर्वा-, जिसमें कि कर्मका अभाव निर्देश किया वस्था में सोया नोगकी इच्छा कोई स्वप्न जिसका प्रक-प्माभय रिष्वक्तो न प्राज्ञेना-न्तरं तद् यशोका-। व्यवहारमें रुषको न कुछ इ पुरुष प्राज्ञा-ता है और न र शोकशन्य कि सर्वात्म-का परम लोक गया है, वह अतिच्छन्द - रूप ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ६ ९ मित्यर्थः; रूपपरत्वात्; छन्दः का-मः, अतिगतश्छन्दो यस्माद्-रूपात् तदतिच्छन्दं रूपम् [;; अन्योऽ सौ सान्तश्छन्दः शब्दो गायत्र्यादि-छन्दोवाची; श्रयं तु कामवचनः, अतः स्वरान्त एव; तथाप्यति-च्छन्दा इति पाठः स्वाध्यायधर्मो द्रष्टव्यः । अस्ति च लोके काम-वचनप्रयुक्तच्छन्दशब्दः ' स्व-च्छन्दः ' ' परच्छन्दः ' इत्यादौ अतः ' अतिच्छन्दम् ' इत्येवमुप-नेयम्, कामवर्जितमेतद् रूपमि -यस्मिन्नर्थे । तथापहतपाप्म - पाप्मशब्देन धर्माधर्मावुच्येते, " पाप्मभिः संसृज्यते " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ८ ) " पाप्मनो विजहाति " ( ४ । ३ । ८ ) इत्युक्तत्वात्; छापहृत-पाप्म धर्माधर्मवर्जितमित्येतत् । किश्व, अभयम् - मयं हि नामाविद्याकार्यम्, ' अविद्यया है; क्योंकि अतिच्छन्द शब्द रूपका विशेषण है । छन्द कामको कहते हैं, अत: जिस रूपसे छन्द ( काम ) की निवृत्ति हो गयी है, वह अति-च्छन्दरूप कहलाता है; जो सान्त छन्दस् शब्द है, वह इससे भिन्न है, जो गायत्री आदि छन्दोंका वाचक है; यह छन्द शब्द तो कामवाची है, इसलिये स्वरान्त ही है । फिर भी ' अतिच्छन्दा ' ऐसा दीर्घान्त पाठ तो स्वाध्यायधर्मं ही समझना चाहिये । लोकमें ' स्व-च्छन्द ' ' परच्छन्द ' इत्यादि शब्दोंमें छन्द शब्दका काम अर्थ में प्रयोग प्रसिद्ध है; अतः कामवर्जित इस अर्थमें इस रूपका ‘ अतिच्छन्दम् ’ इस प्रकार परिवर्तन कर लेना चाहिये । इसी प्रकार वह अपहतपाप्म. हे —यहां पाप्म शब्द में धर्म - अधर्म दोनों ही कहे गये हैं जैसा कि “ पाप्मभिः संसृज्यते ” ” “ पाप्मनो विजहाति " I इन वाक्योंमें कहा गया है; अत: ' अपहतपाप्म ' अर्थात् धर्माधर्मंसे रहित । तथा अभय है- भय तो अविद्या- ' का ही कार्य है, ‘ अविद्यासे १. इसलिये इसका ' अतिच्छन्दम् ' ऐसा नपुंसकलिङ्ग प्रयोग होना चाहिये । २. " धर्माधर्मके आश्रयभूत देह और इन्द्रियोंसे संयुक्त हो जाता है । " : ३. “ घर्माधर्मके आश्रयभूत देह - इन्द्रियोंको त्याग देता है । "
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९ ७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 भयं मन्यते ' इति ह्युक्तम् । त-त्कार्यद्वारेण कारणप्रतिषेधोऽयम्; अभयं रूपमित्यविद्यावर्जितमित्ये-तत् । यदेतद् विद्याफलं सर्वात्म-भावः, तदेतदतिच्छन्दापहत-पाप्माभयं रूपम् - सर्वसंसारधर्म-वर्जितम्, अतोऽभयं रूपमेतत् । इदं च पूर्वमेवोपन्यस्तमतीता-नन्तर ब्राह्मणसमाप्तौ " अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि " ( ४ । २ । ४ ) इत्यागमतः । इह तु तर्कतः प्रपश्चितं दर्शितागमार्थप्रत्यय-दाय । अयमात्मा स्वयं चैतन्यज्योतिः-स्वभावः सर्वं स्वेन चैतन्यज्योति -षावभासयति -- स यत्तत्र किञ्चित् पश्यति, रमते, चरति, जानाति चेत्युक्तम्; स्थितं चैतन्न्यायतो - नित्यं स्वरूपं चैतन्यज्योतिष्ट-मात्मनः । स यद्यात्मा अत्रात्रिनष्टः स्वेनैव रूपेण वर्तते, कस्मादयम् - अहम -ब्रा । भय मानता है ' ऐसा पहले कहा चुका है । यह उस ( अविद्या ) के कार्यके द्वारा कारणका प्रतिषेध. भ किया गया है; अभयरूप अर्थात् जो ज अविद्यासे रहित है । [ इस प्रकार ] यह जो विद्याका फल सर्वात्मभाव ज्ञ है, वह कामरहित, पुण्यपापरहित ह एवं अभयरूप है, यह सम्पूर्णं संसार- ह धर्मोसे रहित है, इसलिये अभयरूप चि है । इसका इससे पूर्ववर्ती ब्राह्मण--की समाप्तिमें " हे जनक! तू अभय-को प्राप्त हो गया है " इस वाक्य- दि द्वारा पहले ही वर्णन कर दिया गया प है । यहां तो पूर्वंप्रदर्शित वेदार्थमें स प्रत्यय ( विश्वास ) की दृढताके लिये ही उसका युक्तिपूर्वक विस्तार किया व गया है! ! ६ यह स्वयं चेतन्यज्योतिःस्वरूप आत्मा सबको अपने चैतन्य प्रकाश- ६ से प्रकाशित करता है - ' वह जो कुछ उस अवस्था में देखता, रमण करता, विहार करता एवं जानता है [ उस सबसे असङ्ग रहता है ] ' ऐसा पहले कहा जा चुका है; यह चैतन्यज्योतिष्ट् आत्माका नित्यस्व-रूप है - ऐसा युक्तिसे भी निश्चय होता है । इस सुषुप्तावस्था में यदि वह आत्मा नष्ट न होकर अपने स्वरूपसे ही विद्य-
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[ अध्याय ४ पहले कहा जा ( अविद्या ) के रणका प्रतिषेध. न्यरूप अर्थात् जो । [ इस प्रकार ] ल सर्वात्मभाव - पुण्यपापरहित इ सम्पूर्ण संसार-सलिये अभयरूप वर्ती ब्राह्मण-नक! तू अभय-है " इस वाक्य-- कर दिया गया दर्शित वेदार्थ में दृढता के लिये विस्तार किया = यज्योतिःस्वरूप चैतन्य प्रकाश-है - ' वह जो देखता, रमण एवं जानता [ ङ्ग रहता है ] ' चुका है, यह नाका नित्यस्व-से भी निश्चय स्थामें यदि न होकर ही विद्य ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ७१ स्मित्यात्मानं वा, बहिर्वा - इमानि भूतानीति ' जाग्रत्स्वप्नयोरिव न जानाति १ इत्यत्रोच्यतेः शृण्वत्रा-ज्ञानहेतुम् — एकत्वमेवाज्ञान-हेतु:; तत् कथम् १ इत्युच्यते 1 । दृष्टान्तेन हि प्रत्यक्षी भवति विवक्षितोऽर्थ इत्याह-तत्तत्र यथा लोके प्रिययेष्टया स्त्रिया सम्परिष्वक्तः सम्यक् परिष्वक्तः कामयन्त्या कामुकः सन् न बाह्यमात्मनः किञ्चन किञ्चिदपि वेद – मत्तोऽन्यद् वस्त्विति, न चान्तरम् — श्रयमहमस्मि सुखी दुःखी वेति अपरिष्वक्तस्तु तया प्रविभक्तो जानाति सर्वमेव ब्राह्यम् श्राम्य-न्तरं च; परिष्वङ्गोचरकालं त्वेकत्वापत्तेर्न जानाति - एवमेव, | मान रहता है तो जाग्रत् और स्वप्न के समान ' मैं यह हूँ ' इस प्रकार अपनेको और अपनेसे बाहर इन भूतोंको क्यों नहीं जानता? — इसपर यहाँ कहा जाता है - इस अवस्था में उसके न जाननेका जो हेतु है, सो सुनो- उसके न जाननेका कारण ऐकत्व ही है; सो किस प्रकार? यह बतलाया जाता है । विवक्षित अर्थ दृष्टान्तसे स्पष्ट हो जाता है, इसलिये श्रुति कहती है-इस विषय में ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लोकमें अपनी कामना करनेवाली प्रिया-इष्ट स्त्रीसे स्वयं भी कामुक होकर सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित हुआ पुरुष अपनेसे बाहर ' मुझसे भ कोई भी वस्तु है ' ऐसा नहीं जानता और न भीतर ही ' यह मैं सुखी अथवा दुःखी हूँ ' ऐसा ही जानता है; उससे आलिङ्गित न होनेपर तो उससे अलग रहकर बाहरी और भीतरी सब बातोंको जानता है; आलिङ्गन के बाद तो एकाकारता हो जानेसे वह कुछ नहीं जानता – इसी यथा दृष्टान्तोऽयं पुरुषः क्षेत्रज्ञो | प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, १. यहाँ एकत्वका अर्थ आत्माका अद्वैत बोध नहीं समझना चाहिये; क्योंकि सुषुप्तिमें यह बोध नहीं होता, बोध होनेपर तो किसी अवस्थाविशेषसे, जिसका शब्दद्वारा निर्देश किया जा सके, संम्बन्ध रहता ही नहीं । सुषुप्ति में चित्तका लय होनेसे कुछ क्षणके लिये नानात्वका भान नहीं होता; इसी आशयसे एकत्वको कारण बताया है ।
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९ ७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ त्रा भूतमात्रासंसर्गतः सैन्धवखिल्य- | क्षेत्रज्ञ पुरुष भूतमात्राके संसर्गसे बत् प्रविभक्तः, जल्लादौ चन्द्रादि- लवणखण्डके समान विभक्त होकर, प्रतिविम्बवत् कार्यकरण प्रविष्टः, सोऽयं पुरुषः, प्राज्ञेन परमार्थेन स्वाभाविकेन स्वेना-स्मना परेण ज्योतिषा, सम्परि-वक्तः सम्यक् परिष्वक्त एकी-भूतो निरन्तरः सर्वात्मा, न बाह्यं किञ्चन वस्त्वन्तरम्, नाप्यान्तरमात्मनि - - श्रयमहमस्मि सुख दुःखी वेति वेद । तत्र चैतन्यज्योतिःस्वभावस्ये कस्मादिह न. जानातीति यद-प्राक्षीः, तत्रायं हेतुर्मयोक्त एकत्वम्, यथा स्त्रीपुंसयोः सम्परिष्वक्तयोः । १. इस प्रसङ्गसे कोई यह न समझ एकं अद्वितीय एवं सर्वात्मा हो जाता है । जलादिमें चन्द्रमादिके प्रतिबिम्बके समान इस देहेन्द्रिय में प्रविष्ट हो रहा है, वह यह पुरुष अपने स्वाभाविक परमार्थस्वरूप परज्योति प्राज्ञसे सम्यक् प्रकारसे परिष्वक्त अर्थात् एकीभूत होकर निरन्तर और सर्वात्मा होनेके कारण न तो किसी बाह्य वस्त्वन्तरको जानता है और न आन्तर अर्थात् आत्मामें ही ' यह सुखी अथवा दुःखी मैं हूँ ' ऐसा सम-ता है । इस प्रकार तुमने जो पूछा था कि चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप होनेपर भी वह इस अवस्थामें क्यों नहीं जानता, सो उसमें मैंने एकत्व यह हेतु बतलाया, जिस प्रकार कि परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषका ले कि सुषुप्तिमें जोव वस्तुतः आत्मनिष्ठ यह तो बोधवान्का स्वरूप है । जो किसी अवस्थाविशेषसे परिच्छिन्न होगा, वह सर्वात्मा कैसे हो सकता है? इस प्रकरणका तात्पर्य, जैसा कि पहले टिप्पणीमें बताया गया है, इतना ही है कि उस समय कुछ भी भान नहीं रहता; सुषुप्ति से जागनेपर मनुष्य यही अनुभव सुनाता ' मैं सुखसे सोया, कुछ नहीं जाना ' इत्यादि । उसको सर्वात्मभावका है कि क्योंकि आवरण दूर हुए बिना यह बोध प्रकाशित नहीं होता बोध नहीं रहता; आवरण रहता नहीं; सुषुप्तिसे जीव पुनः जाग्रत् और बोध हो जानेपर स्वरूपस्थिति नहीं मानी - अवस्था में आता है; इससे इसकी जा सकती; स्त्री - पुरुषके मिलनका दृष्टान्त अथवा सुषुप्ति-का दृष्टान्त वस्तुको समझानेके लिये सब एकदेशी दृष्टान्तमात्र किसी दूसरेसे वास्तविक तुलना हो ही नहीं है; मुक्त पुरुषकी सकती । तत्र रि क I चा त S
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[ अध्याय ४ के संसर्ग विभक्त होकर, के प्रतिबिम्बके प्रविष्ट हो रहा ने स्वाभाविक ज्योति प्राज्ञसे रष्वक्त अर्थात् निरन्तर और ग न तो किसी में ही यह हूँ ' ऐसा सम-जो पूछा था स्वरूप होनेपर क्यों नहीं एकत्व यह प्रकार किं - और पुरुषका तुतः आत्मनिष्ठ है । जो किसी इस प्रकरणका कि उस समय सुनाता है कि ध नहीं रहता; ध हो जाने पर - इससे इसकी अथवा सुषुप्ति-; मुक्त पुरुषकी ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ७३ तत्रार्थान्नानात्वं विशेषविज्ञान हेतु -रित्युक्तं भवति नानात्वे च कारणम् – आत्मनो वस्त्वन्तरस्य । - प्रत्युपस्थापिकाविद्येत्युक्तम् । तत्र चाविद्याया यदा प्रविविक्तो भवति तदा सर्वेणैकत्वमेवास्य भवति ततश्च ज्ञानज्ञेयादिकारकविभागे । ऽसति कुतो विशेषविज्ञानप्रादु-भवः कामो वा सम्भवति स्वाभाविके स्वरूपस्थ आत्म-ज्योतिषि? यस्मादेवं सर्वैकत्वमेवास्य रूपम् अतस्तद् वा अस्यात्मनः स्वयंज्योतिःस्वभावस्यैतद् रूप-माप्तकामम् । यस्मात् समस्त मे -तत्, तस्मादाप्ताः कामा अस्मिन् | रूपे तदिदमाप्तकामम; यस्य ह्यन्यत्वेन प्रविभक्तः कामः, तद-नाप्तकामं भवति, यथा जागरिता-वस्थाया देवदत्तादिरूपम्; न विद तथा कुतश्चित् प्रविभज्यते; अत-स्वदाप्तकामं भवति । एकत्व होता है । इससे स्वत: ही यह बात बतला दी गयी कि नानात्व विशेष विज्ञानका हेतु हे और नानात्वका कारण आत्मासे भिन्न वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली अविद्या है - यह बतलाया जा चुका है । सो जिस समय यह अविद्यासे अलग हो जाता है, उस समय इसकी सबके साथ एकता ही हो जाती है; तब आत्मज्योतिके अपने स्वाभाविक स्वरूप में स्थित हो जानेपर ज्ञान- ज्ञेयादि कारकविभाग-के न रहनेपर विशेष विज्ञानका प्रादुर्भाव तथा कामना कैसे हो सकते हैं? क्योंकि इस प्रकार सबके साथ एकता ही इसका रूप है, इसलिये इस स्वयंज्योतिःस्वरूप आत्माका यह रूप आप्तकाम है | चूँकि यह इसका समस्त रूप है, इसलिये इस रूपमें समस्त काम प्राप्त रहते हैं, अतः यह आप्तकाम है; जिसकी इच्छा उससे अन्य रूपसे विभक्त रहती है, वह अनाप्तकाम होता है, जिस प्रकार जागरित - अवस्था में देव-दत्तादिरूप; किंतु यह आत्मतत्त्व उनकी तरह किसीसे विभक्त नहीं है; इसलिये यह आप्तकाम है ।
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९ ७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ किमन्यस्माद् वस्त्वन्तरान्न प्रविभज्यते? आहोस्विदात्मैव तद् वस्त्वन्तरम्? अत आह-नान्यदस्त्यात्मनः, कथम् १ यत आत्मकामम् — आत्मैव कामा यस्मिन् रूपे, अन्यत्र प्रविभक्ता इवान्यत्वेन काम्यमाना यथा जाग्रत्स्वप्नयोः, तस्यात्मैव क्या यह ( आत्माका ज्योतिर्मय रूप ) किसी अन्य वस्तुसे विभिन्न । नहीं है? अथवा आत्मा ही वह वस्त्वन्तर है? इसपर श्रुति कहती है - आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु ही नहीं है — कैसे नहीं है? क्योंकि वह रूप आत्मकाम है; जिस प्रकार स्वप्न और जागरित-अवस्थाओंमें आत्मासे. अन्यत्र विभक्त के समान तथा अन्य रूप से कामना किये जानेवाले काम होने ब्राह क्त न्त जा प्ये यो तत्र कर अन्यत्वप्रत्युपस्थापक हेतोरविद्याया हैं, उस प्रकार सुषुप्तिमें अन्यत्वको -अभावात् — आत्मकामम्; अत एवाकाममेतद्रूपं काम्यविषया-भावात्; शोकान्तरं शोकच्छिद्रं शोकशून्यमित्येतत् शोकमध्य-मिति वा, सर्वथाप्यशोकमेतद 9 रूपं शोकवर्जितमित्यर्थः ॥ २१ ॥
सुषुप्तिस्य श्रात्माकी निःसङ्ग प्रकृतः स्वयं ज्योतिरात्मा-विद्याकामकर्मविनिर्मुक्त इत्यु-प्रस्तुत करनेवाले अविर्द्यारूप हेतुका अभाव होनेके कारण आत्मा ही उसके काम हैं, इसलिये वह रूप आत्मकाम है । इसीसे काम्य विषयों-का अभाव होनेके कारण यह रूप अकाम है; तथा शोकान्तर — शोक-च्छिद्र अर्थात् शोकशून्य है अथवा यह शोकमध्य है; तात्पर्य यह कि यह रूप सर्वथा ही अशोक अर्थात् | शोकरहित है ॥ २१ ॥
और निःशोक स्थितिका वर्णन जिसका प्रकरण चल रहा है, वह स्वयं ज्योति आत्मा अविद्या, काम | और कर्मसे रहित है - ऐसा कहा जा सग या पुंस मा स का अ च वि १. यहाँ अविद्याका तात्पर्य सांसारिक राग - द्वेष, सुख - दुःख आदिसे है, उसका स अभाव हो जानेका अर्थ है, उसका भान न होना । सुषुप्ति में जैसा कि पहले बता आये हैं, अव्याकृत मायासे सम्पर्क तो बना ही रहता है । भान तो. जा इसलिये नहीं होता है कि चित्त लीन रहता है; अन्यथा अविद्याका अत्यन्ताभाव मान लेनेपर तो मुक्त और सुषुप्तमें अन्तर ही नहीं रह जायगा ।
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[ अध्याय ४ नाका ज्योतिर्मय वस्तुसे विभिन्न आत्मा ही वह इसपर श्रुति भिन्न कोई i - कैसे नहीं आत्मकाम है; और जागरित-= मासे अन्यत्र था अन्य रूपसे बाले काम होने सप्तमें अन्यत्वको विद्यरूप हेतुका रण आत्मा ही चलिये वह रूप काम्य विषयों-कारण यह रूप कान्तर - शोक-शून्य है अथवा तात्पर्य यह कि अशोक अर्थात् ॥ तिका वर्णन चल रहा है, ना अविद्या, काम - ऐसा कहा जा आदिसे है, उसका में जैसा कि पहले है । भान तो. का अत्यन्ताभाव ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ७१ क्तम्, असङ्गत्वादात्मनः, आग- । न्तुकत्वाच्च तेषाम् । तत्रैवमाशङ्का जायते; चैतन्यस्वभावत्वे सत्य -प्येकीभावान्न जानाति स्त्रीपुंस - । योरिव सम्परिष्वक्तयोरित्युक्तम्, तत्र प्रासङ्गिकमेतदुक्तम् — काम -कर्मादिवत् स्वयंज्योतिष्वमप्य-स्वात्मनो न स्वभावः यस्मात् सम्प्रसादे नोपलभ्यते - -इत्याशङ्का ध यां प्राप्तायां तन्निराकरणाय स्त्री-पुंसयोः दृष्टान्तोपादानेन विद्य-मानस्यैव स्वयंज्योतिष्ट्रस्य सुषु-सेऽग्रहणमे की भावाद्धेतोः, न तु कामकर्मादिवदागन्तुकम् । इत्येतत् प्रासङ्गिकमभिधाय यत् प्रकृतं तदेवानुप्रवर्तयति । अत्र चैतत् प्रकृतम् - श्रविद्याकामकर्म-विनिर्मुक्तमेव तद् रूपम्, यत् सुषुप्त आत्मनो गृह्यते प्रत्यक्षत । चुका है, क्योंकि आत्मा असङ्ग हे और वे ( अविद्यादि ) आगन्तुक हैं । इससे यह आशङ्का होती है-ऊपर यह कहा गया है कि चैतन्य-स्वभाव होनेपर भी परस्पर आलि-ङ्गित स्त्री और पुरुषोंके समान एकी-भाव होनेके कारण आत्मा नहीं-जानता; वहीं प्रसङ्गानुसार यह-कहा गया था कि काम और-कर्मादिके समान स्वयं ज्योतिष्व भी इस आत्माका स्वभाव नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति में इसकी उपलब्धि नहीं होती, इस आशङ्काके प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करनेके लिये ' स्त्री पुरुष ' का दृष्टान्त देकर [ यह बतलाया गया था कि ] -ऐकी भावरूप हेतुके कारण सुषुप्ति में विद्यमान स्वयंज्योतिष्ट्ट्रका ही ग्रहण ग्रहण नहीं होता, वह काम काम - कर्मा कर्मा दिके समान आगन्तुक नहीं है । इस प्रकार इस प्रासङ्गिक स्वयं ज्योतिष्ट्रका निरूपण कर जो प्रकृत है, उसका ही श्रुति उल्लेख करती है । यहाँ प्रकरण यह है कि सुषुप्तिमें आत्माके जिस रूपका प्रत्यक्षतया ग्रहण किया जाता है, वह अविद्या, काम और कर्मसे रहित ही है । १. इस एकीभाव या एकत्वका तात्पर्य पहले टिप्पणी ( पृष्ठ पृष्ठ १७१ ) में बताया जा चुका है । २. इस प्रसङ्गको समझनेके लिये पृष्ट ६४५ और ६७२ की टिप्पणी देखिये ।
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९ ७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ इति । तदेतद् यथाभूतमेवा- । अतः यह बात ठीक ही कही गयी भिहितम् - — सर्वसम्बन्धातीत मे- है कि यह रूप सब प्रकारके -सम्बन्धोंसे परे है; चूँकि यहाँ इस तद् रूपमिति; यस्मादत्रैतस्मिन् सुषुप्त - स्थानमें यह रूप कामरहित, सुषुप्तस्थाने अतिच्छन्दापहत- धर्माधर्मं रहित और अभय होता त पाप्माभयमेतद् रूपम्, तस्मात् - है, इसलिये - प अत्र पितापिता भवति मातामाता लोका अलो- ह्य का देवा अदेवा वेदा अवेदाः । अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्र भ्रूणहा हाम्रणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्क- क सो s पौल्कसः श्रमणोऽभ्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वा-गतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छो-कान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥ स
त इस सुषुप्तावस्था में पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती मि है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव हो जाते हैं और वेद अवेद हो जाते हैं । यहाँ चोर अचोर हो जाता है, भ्रूणहत्या करनेवाला अभ्रूणहा हो ध जाता है, तथा चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस अपौल्कस, श्रमण अश्रमण अ और तापस प्रतापस हो जाते हैं । उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पापसे भो असम्बद्ध होता है और हृदयके सम्पूर्णं शोकोंको पार कर स लेता है ॥ २२ ॥
छात्र पिता जनकः -- तस्य च जनयितृत्वाद् यत् पितृत्वं पुत्रं प्रति, तत् कर्मनिमित्तम्, तेन च कर्मणायमसम्बद्धोऽस्मिन् काले । तस्मात् पितापुत्र-सम्बन्धनिमित्चात् कर्माणो विनि-मुक्तत्वात् पिताप्यपिता भवतिः तथा पुत्रोऽपि पितुर्षुत्रो क्र यहाँ पिता अर्थात् जनक — जन्म वेव देनेके कारण जो उसका पुत्रके प्रति पिताका भाव होता है, वह ' कर्म ' रूप निमित्त से है, उस कर्मसे इस ती कालमें ( सुषुप्तिमें ) यह असम्बद्ध रहता है । अतः पिता - पुत्र - सम्बन्धके न्त हेतुभूत कर्मसे रहित होने के कारण इस अवस्थामें पिता भी अर्पिता हो चत जाता है; इसी प्रकार पुत्र भी | पिताका अपुत्र हो जाता है - ऐसा