छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 101–110
छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 101–110
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भूमिका ९ ७ वेद का अध्ययन करता है ” इसि श्रोत्रिय शब्द का निपातन हुआ करता है । मनुस्मृति में भी - ' युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान् ॥ ' ' आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव । ' काव्य ग्रन्थ में भी वेदपर्याय के रूप में छन्दः पदप्रयुक्त हुआ है । छन्दः पद पुनः इच्छार्थक भी है इसीलिए वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ में कहा गया है । कि “ मयोच्यमानं यदि ते श्रोतुं छन्दो विलासिनि! इसी प्रकार काव्य ग्रन्थ में भी इच्छापर्याय के रूप में छन्द शब्द का प्रयोग उपलब्ध होता है । यथा- ' छन्दाऽनुवृत्तिदुः-साध्या सुहृदो विमनीकृताः ' इत्यादि । छन्द शब्द आच्छादनाऽर्थक भी देखा गया है । ' छन्दांसि आच्छादनात् ' ( अर्थात् आच्छादन = आवरणा क्रिया करने के कारण आवरण क्रिया के आश्रय को छन्द कहा जाता है । ) वर्षा एवं गर्मी से अपने शरीर की रक्षा के लिए छाता आदि के द्वारा जो ढका जाता है, उसे आवरण कहा जाता है । शीत ( ठण्डी ) से बचने के लिए वस्त्र से भी शरीर का आवरण = आच्छादन किया जाता है । इसी प्रकार घर के छत्ती ( छप्पर ) के द्वारा भी शीत, आतप एवं वर्षा से मनुष्य अपने शरीर रक्षणार्थ अपवरण किया करते हैं । इसी प्रकार अन्य - अन्य अर्थों में भी छन्दः शब्द का प्रयोग होते देखा जाता है । प्रकृतोपयोगी छन्दः शब्दाऽर्थ का विवेचन “ दो पादों में अथवा चारपादों में वर्णकृत पौर्वापर्यनियम के माध्यम से गुरु-लघुवर्णघटित पाँच गणों ( 55१, २, ३, ४, ५ ) के तथा मात्रा रूप से अवस्थित हुए उसी प्रकार के ही मगण आदि ( SS ऽ म ॥। न. 5 ॥ भ. ।ऽऽ य.।ऽ । ज. ऽ।ऽ र.॥ ऽ स. ऽऽ । त. ) आठ प्रकार के गणों के वर्णन रूप से विन्यास छन्द नाम से कहा जाता है । ” उपर्युक्त प्रकार से छन्दः शरीर में दो पादों का जो उपादान किया जाता है, वह आर्या आदि छन्दों के अभिप्राय से कहा गया है; क्योंकि पिङ्गलाऽऽचार्य आदि महर्षियों तथा केदार भट्ट आदि प्राचीन आलङ्कारिकों के द्वारा, अपने - अपने ग्रन्थों में उसी प्रकार व्यवहार किया गया है । प्राचीन आलङ्कारिकों में केवल कालिदास ही इस प्रकार के विद्वान् हैं जो श्रुतबोधनामक ग्रन्थ में इस प्रकार कहते हैं — जिस आर्या आदि छन्दों के प्रथमपाद, द्वितीयपाद, तृतीयपाद, एवं चतुर्थपाद कहते हैं । अतः चारपादों में उन छन्दों का विन्यास ( उल्लेख ) चाहते हैं । इस प्रकार के सुसंयत शृङ्खलाबद्ध गणों से घटित होने के कारण आह्लादार्थक छन्द निष्पन्न हुआ करता है । आह्लादाऽऽत्मकपरमाऽऽनन्द का कारणीभूत छन्द संगीत ध्वनि के समान श्रोताओं के हृदय में आनन्द रस को प्रवाहित किया करता है । संगीत में जिस प्रकार ताल, लय एवं विराम की अवस्था हुआ करती है, उसी प्रकार छन्दस्थल में भी यति - विच्छेद तथा विराम होते हैं । ' रसैरुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ' भू ० छ ० - NG Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ८ छन्दः शास्त्रम् इत्यादि प्रक्रिया के द्वारा छन्दगत यति आदि की अभिव्यक्ति हुआ करती है । नियतमात्रावर्ण आदि से सुसज्जित छन्दबद्ध पद्यों को बार - बार पढते रहने वाले पुरुष का अपने उद्देश्य में, लक्ष्य में एवं सेव्य विषय में तल्लीनता सिद्ध होती है, जिसका परिणाम यह होता है कि उद्देश्य अथवा सेव्य देवादि भी उस तल्लीन पुरुष के ऊपर प्रसन्न होकर उसकी इच्छा की पूर्ति किया करते हैं । यदि सेव्य में निष्काम प्रीति का सञ्चार पद्यों के माध्यम से कदाचित् हृदय में आविर्भूत हुआ तो परमेश्वर भी उस निष्काम स्नेही जीवों के लिए अपने पवित्र ज्ञान से सम्पन्न गायत्री आदि छन्दों से समन्वित वेदों को स्नेहयुक्त उसी हृदय पटल में उपदेश के माध्यम से उपस्थित करा देते हैं । जब इस प्रकार के स्नेहसम्पन्न मनुष्य इस भूमण्डल पर ऋषि - मुनियों, पवित्र ब्राह्मणों के रूप में अवतरित होते हैं, तभी इस लोक में भी ईश्वरीयज्ञान के श्रोतस्वरूप छन्दों ( वेदों ) के प्रचार - प्रसार हुआ करते है । इतना ही नहीं इस प्रकार के निष्काम भागवत पुरुष के कारण ही वैदिक छन्दों धाराओं के साथ ही साथ लौकिक - वाणियों में भी छन्दों का सुललित रीति से लोक वाणी में भी अवतरण हुआ करता है । वाणी लौकिक - वैदिक भेद से दो प्रकार की हुआ करती है, जिनमें लोक व्यवहार सिद्ध्यर्थ मानवों में लोक वाणी का प्रचार हुआ करता है, तथा देववाणी स्वरूप वैदिक वाणी से आध्यात्मिक जगत् से सम्बन्धित मोक्ष - स्वर्ग आदि परमपुरुषाऽर्थों की सिद्धि हुआ करती है । लौकिक भाषा एवं देव ( वैदिक ) भाषा दोनों ही अलग - अलग हैं इसीलिए तो रामायण के सुन्दर काण्ड में हनुमान् जी सोचते हैं कि “ यदि मैं ब्राह्मणों के समान देव वाणी का प्रयोग सीता जी के सम्मुख उपस्थित होकर करता हूँ तो मुझे वह भ्रम से रावण समझ कर भयाक्रान्त हो सकती है । अतः मनुष्यों में बोली जाने वाली संस्कृत वाणी को ही उनके आगे बोलू तो उचित होगा " । इसी आशय से “ वाल्मीकि रामायण " का श्लोक प्रकट हुआ है-यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् । रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ॥ अतो वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् ॥ इति । संस्कृत के दो प्रकार की भाषाओं का उल्लेख निरुक्तकार भी करते हैं—
द्विविधां वाचं ब्राह्मणा वदन्ति ।
या च देवानां या च मनुष्याणाम् ॥
वाणी में संस्कृत शब्द का प्रयोग हमें वाल्मीकि रामायण काल से ही उपलब्ध होता है, उससे पूर्व नहीं । अतः सिद्ध होता है कि वाल्मीकि रामायण काल के पूर्वकालिक वाणी केवल एक ही रही होगी और वह वैदिक भाषा के रूप में ही प्रसिद्ध होगी । पुराण काल में भी शूद्र के लिए कहा गया है कि ' शूद्रः संस्कृतां नोच्चरेद्गिरम् । ' इस प्रकार गिर् ( वाणी C ) - 0 में . JK " Sanskrit संस्कृत Academy " यह विशेषण , Jammmu हम . Digitized पुराण by काल Foundation में भी पाते हैं ।
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भूमिका ९९ जहाँ तक पिङ्गल छन्दः शास्त्र का वर्ण्य विषय है वहाँ पर भी लौकिक एवं वैदिक वाणी का पार्थक्यज्ञान हमें उसके अध्ययन से उपलब्ध होता है । वहाँ पर ' अथ लौकिकम् ' ( ४।८ ) इस सूत्र का उल्लेख हुआ है । इससे पूर्व के सूत्रों में वैदिक छन्द का होना सिद्ध होता है । अत एव इस सूत्र की वृत्ति में वृत्तिकार " हलायुध " कहते हैं कि- ' अधिकारोऽयमाशास्त्रपरिसमाप्तेः । ( इतः ) पूर्वेषां छन्दसां वैदिकत्वमेव । इतः प्रभृति आर्यादीनां चूलिकापर्यन्तानां छन्दसां लौकिकत्वमेव । सामान्या-दीनामुत्कृतिपर्यन्तानां वैदिकत्वं लौकिकत्वञ्च । स्मृतिपुराणेतिहासेषु दृश्यमा-नानामार्यादिदण्डकपर्यन्तं लौकिकछन्दोजातमधिक्रियते । तन्मूलत्वाच्छन्दोमूलत्वात् पद्यकाव्यस्य । पद्यकाव्यञ्च आनन्दहेतुः । यदि आह्लादे धातोर्निष्पन्नत्वेन आह्लादकाऽर्थेन छन्दसा निबद्धत्वात्तस्येति ' । लौकिक एवं वैदिक वाणी में भेद की सिद्धि व्याकरण शास्त्र से भी प्रमाणित होती है । यथा - ' सर्वत्रविभाषा गो: ' इस सूत्र में स्थित सर्वत्र शब्द से ' लोके वेदे च ' इस प्रकार के अर्थ का लाभ होना, तथा ' छन्दसि बहुलम्, छन्दस्युभयथा ' इत्यादि सूत्रों के प्रयोग से अनेक सूत्रों एवं वार्तिक ग्रन्थों में ' भाषायाम् ' इस शब्द का प्रयोग होने से देववाणी एवं लोकवाणी स्वरूपा संस्कृत में भिन्नता की सिद्धि होती है । देववाणी वैदिक संस्कृत में ही प्रयुक्त हो सकती है, किन्तु भ्रम से कुछ लोग लौकिकवाणी को देववाणी कहा करते हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है । छन्दोबद्धरचना से लाभ छन्दोबद्धपद्य रचना से पाँच प्रकार के लाभ अधिगत होते हैं- ( १ ) सर्वप्रथम छन्दोबद्ध श्लोकोंके पठन - पाठन से आनन्द की प्राप्ति होती है । ( २ ) द्वितीय लाभ कण्ठस्थीकरण में सुगमता का होना । जिस प्रकार छन्दोबद्ध - श्लोकाऽऽदिकों के कण्ठस्थीकरण में सुगमता होती है, उस प्रकार गद्यपाठ का कण्ठस्थीकरण हो पाना सम्भव नहीं, दूसरी बात यह भी है कि कण्ठस्थ किये गये पद्यों के स्मरण सुख से, अर्थात् सुगमता के साथ हो जाते हैं, यह बात सभी के अनुभव से प्रमाणित है । ( ३ ) तृतीय लाभ यह कि - पद्यमय ग्रन्थ से सम्बन्धित पद्यों की गणना होती है जिसके परिणामस्वरूप ग्रन्थाऽऽरम्भ में, अथवा ग्रन्थाऽऽदि में इतने संख्या परिमाण वाला यह ग्रन्थ है, यह लिखा जा सकता है । ( ४ ) चतुर्थ लाभ होगा कि- छन्दों को जानकर अध्ययन में छन्दगत दोषों का निवारण किया जा सकता है, तथा पढ़ने से शुभ की अभिवृद्धि होती है । किन्तु छन्दों को बिना जाने यदि कोई व्यक्ति काव्यपाठ करता है, तो अज्ञानवश दोष का मार्जन न कर पाने की स्थिति में पाठक दोष का भागी बन जाता है । दूसरी बात यह भी है कि-दोषयुक्त छन्द के द्वारा रचा गया जो पद्य, वह अर्थों के प्रकाशन में सर्वथा उसी प्रकार CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०० छन्दः शास्त्रम् असमर्थ हुआ करता है, जिस प्रकार उदात्ताऽऽदि स्वर, वर्ण आदि से हीन असावधानता के कारण अनभिप्रेत अर्थ में प्रयुक्त हुआ मन्त्राऽऽत्मक शब्द अभीष्ट अर्थ को कह पाने में सर्वथा असमर्थ हुआ करता है । अर्थात् उदात्त अनुदात्त स्वरित - आदि स्वरों से हीन वैदिक मन्त्र, उच्चारणस्वरूप स्वर से भ्रष्ट हुआ लौकिकपद्य अर्थप्रकाशनोपयोगी वर्णों और मात्राओं से हीन वैदिक मन्त्र तथा लौकिक पद्य ये दोनों दोष युक्त होने के कारण मिथ्या माना जाता है और मिथ्याभूत लौकिक और वैदिक शब्दों का प्रयोग अभीष्ट अर्थ के प्रकाशन में समर्थ सिद्ध नहीं होता है । अतः यथाऽर्थ स्वर - मात्रा - वर्ण आदि से युक्त लौकिक पद्य, अथवा वैदिक मन्त्रों का ज्ञान करके पुनः दोष वर्जन पुरस्सर ही उन दोनों का पाठ होना चाहिए । लौकिकसंस्कृतभाषीय छन्द आदि का प्रचुर विनियोग पुराणों, इतिहासों, प्राचीन काव्य ग्रन्थों में जहाँ उपलब्ध होता है, वहीं वैदिक भाषा से सम्बन्धित ब्राह्मण, उपनिषद् एवम् आरण्यक आदि ग्रन्थों में छन्द, मात्रा, आदि का प्रयोग विद्वानों की दृष्टि के विषय ब हु हैं । [ अध्ययनोपयोगी ग्रन्थ प्रतिपाद्यविषयों को सार रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे ग्रन्थाऽर्थ को समझनों मे सुलभता का लाभ प्राप्त हो सके – ] छन्द छन्द दो प्रकार के होते हैं- ( १ ) लौकिक और ( २ ) वैदिक । इन दोनों में लौकिक प्रयोजनसाधक के साथ ही साथ जो वैदिकप्रयोजन का भी हेतु हो, उसे लौकिक छन्द कहा जाता है । वैदिक छन्द पुनः वेदाऽर्थज्ञानमात्र में उपयोगी होता हुआ वेदाऽर्थज्ञान के माध्यम से वेद का जो जीवन मुक्ति एवं परममुक्तिभूत फल है उस फल के प्रति ही केवल उसकी प्रयोजकता है । वर्ण भेद विचार वर्ण के सामान्य रूप से दो भेद होते हैं - ( १ ) गुरु और द्वितीय ( २ ) लघु । गुरु और लघु सञ्ज्ञा में विभक्त हुआ द्विविध प्रकार ये वर्ण ही छन्दः शास्त्र के केन्द्र भूत माने जाते हैं । पिङ्गलाऽऽचार्य कृत प्रकृत शास्त्र में तो इन्हीं गुरु और लघु के आधार पर निखिल कार्यों का निर्वाह हुआ करता है । इन्हीं लघु - गुरु के संयोग के परिणामस्वरूप अष्टगण के रूप में गणों की सृष्टि हुआ करती है । पिङ्गलाचार्य की दृष्टि से वैदिक छन्दों से सम्बद्ध विशद् विचार शब्द और अर्थ के रूप में अभिव्यक्त सम्पूर्ण जगत् किसी न किसी धर्म या अन्य वस्तुओं से • आच्छादित Sanskrit Academy है । आच्छादक , Jammmu. तत्त्व Digitized से रहितु by S3 Foundation केवल निर्गुण USA ब्रह्म, अथवा
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भूमिका १०१ मुक्तात्मा ही हो सकता है । वे ही आच्छादक तत्त्व जब आच्छादित हुये वस्तु के अनुकूल होकर उनके प्रयोजनों में हितकारी सिद्ध होने लगते हैं, तब उन्हें सद्गुण, सद्धर्म, संरक्षक, अथवा सहायक, वा सेवक आदि के नाम से कहा जाता है । इसके विपरीत यदि कोई धर्म, अथवा वस्तु आच्छन्न हुये वस्तु को अपने स्वभाव और इच्छा के अनुसार सञ्चालित करते हुये पराधीन कर देता है, तब वह आच्छादक तत्व आच्छन्न वस्तु के अहितकारी होने से शत्रु कोटी में समाविष्ट होता है । तथा जिस प्रकार अर्थ जगत् तत्तद् रूप में शुभ आच्छादकों से आच्छन्न हुआ, तथा कल्याण मार्ग में प्रवाहयुक्त नदी की तरह लोकोपकार में प्रवृत्त होकर अन्त में वह भी अपने कल्याण में स्वयमेव प्रविष्ट हो जाता है । उसी तरह शब्द जगत् में भी परम् आप्त एवं आप्त जनों के द्वारा अभिव्यक्त होने वाले शब्द जगत् प्रयोक्ता के स्वाभिलषित अर्थ को सिद्ध करता हुआ, श्रवण, मनन, एवं निदिध्यासन परायण जिज्ञासु जनों के कल्याण के भी सहज रूप से साधक होते हैं । ये शब्द प्राय: करके जब काव्य के रूप में अथवा श्लोक के रूप में अपने मधुमय स्वरूप में, तथा वैदिक मन्त्रों के रूप में अभिव्यक्त होते हैं, तब लोकहिताऽऽवह छन्दों को धारण किये हुये रहते हैं, छन्दों से आच्छन्न हुये लौकिक लकड़ी जब नाँव के रूप को धारण कर नदी में अवतरित होती है, तब उसकी लोकोपकार परायणता सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त होते है । सार रूप में यहाँ यह कहा जा सकता है कि छन्दों से आबद्ध हुआ ही श्लोकात्मक लैकिक शब्द, एवं मन्त्रात्मक वैदिक शब्द श्रोताओं के इष्टसाधक हुआ करते हैं, शब्दों से होने वाली इष्ट सिद्धि में शब्दनिष्ठ छन्दों की उपादानता व्यक्त होती है, अत: छन्द परिज्ञानार्थ इसका विचार किया जा रहा है । तात्त्विक रहस्य तो यहाँ यही ज्ञात होता है कि प्रत्यक्ष अनुमान उपमान - अर्थाऽऽपत्ति एवम् अनुपलब्धि स्वरूप पञ्चविध प्रमाण मुख्य रूप से लौकिक इष्टसाधता का ही प्रकाश किया करता है, जबकि शब्द प्रमाण लौकिक सुखसाधनता को तो निरपेक्षरूप से कहता ही है स्वर्ग - मोक्षाऽऽदि स्वरूप जो अलौकिक सुखाऽऽदि, उन सुखाऽऽदिस्वरूप परमपुरुषाऽर्थ के जो अलौकिक-साधन उन साधनों का प्रकाशन एवं प्रादुर्भाव के परिपाटियों का विस्तृत विवेचन जिस रूप में वेदाऽऽदि शब्दप्रमाण कर पाने में सक्षम हुआ करता है उस प्रकार से सक्षमता के उपलब्धि की सम्भावना प्रत्यक्षाऽऽदिभूत अन्य प्रमाणों में नहीं के बराबर है । क्योंकि जहाँ अन्य प्रमाणों के प्रकाशन व्यापार का सामर्थ्य अस्त होने लगता है वहीं से वेदाऽऽदि शब्दप्रमाण का अलौकिक साधन प्रकाशनाऽऽत्मकव्यापार आरम्भ होता है । यथा स्थल-पूण्यजन्य स्थूलपदार्थ के भोग से सम्बन्धित जाग्रद् अवस्था का जहाँ अन्त होता है, वहीं सूक्ष्मपुण्य से अन्य सूक्ष्म भोग से सम्बन्ध रखने वाला स्वप्नाऽवस्था का आरम्भ हुआ करता है । एवं जहाँ से स्वप्निक भोग के साधनीभूत सूक्ष्मपुण्याऽऽदिकों के फलजनन CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०२ छन्दः शास्त्रम् सामर्थ्य का समापन आरम्भ होता है वहीं से निर्लिप्त आत्मस्वरूप के सुखमय स्वाऽनुभव का आरम्भ होता है जिस अवस्था विशेष को सुषुप्ति के नाम से कहा जाता है । कुछ इसी प्रकार के अलौकिक अभिप्राय का आवेदक ' या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जागर्ति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ २ । ६ ९ ॥ इसी प्रकार ' ऋतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् । ' इत्यादि कहा गया है । प्रकृत में सर्व प्रमाणों के प्रकाशनसामर्थ्य का जहाँ तक सञ्चार हुआ करता है प्रत्यक्षाऽऽदिप्रमाणाऽऽवेदित साध्य - साधनाऽऽत्मक वह सकल वस्तु लौकिक कोटी में समाविष्ट होता है, किन्तु जो इन प्रमाणों के व्यापार का गोचर होने के योग्य नहीं है, वही अलौकिक साध्य - साधन कहा जाने वाला वस्तु केवल वेदाऽऽदि शब्दप्रमाण का विषय होता है । उन शब्दों में जो अलौकिक साधनभूतपदार्थनिष्ठश्रेयः साधनताप्रका-शकत्वाऽऽदिस्वरूप प्रमाणाऽन्तराऽवेद्यसामर्थ्य है । वेदाऽऽदिवाक्यनिष्ठ वह सामर्थ्य पुनः गायत्त्री आदि विलक्ष - विलक्षण छन्दों से समन्वित होने के कारण ही व्यक्त हुआ करता है । अत एव छन्दः सूत्र प्रणेता महर्षि पिङ्गलाऽऽचार्य के अनुसार वैदिक छन्द पर एक व्यापक विचार ( प्रमाण गर्भित रूप में ) प्रस्तुत किया जा रहा है— वैदिक छन्द पर दृष्टिपात करते ही यह तथ्य सम्मुख आता है कि - चारों वेदों ब्राह्मग्रन्थों एवं श्रौत सूत्रों पर छन्दों का साम्राज्य छाया हुआ है । जिस प्रकार जल में रस, अग्नि में उष्णता एवम् आकाश में शून्यता की व्याप्ति है, उसी प्रकार वैदिक मन्त्राऽऽदिकों में छन्द की व्याप्ति देखी जाती है । एकाक्षर से लेकर शताऽक्षरों एवम् उन से भी अधिक अक्षरों वाले छन्द वैदिक वाङ्मय में उपलब्ध होते हैं । छन्दव्याप्त होने के कारण ही वेदों का छन्दनाम से भी व्यवहार हुआ है । यही कारण है कि पुरुषसूक्त में छन्दनाम से ही वेदों की उत्पत्ति भगवान् नारायण से बतलायी गयी है— ' छन्दांसि जज्ञिरे ' इत्यादि । छन्दशब्द पर जब हम विचार करते हैं तो पाते हैं कि ' छदि छादने ' धातु से अपादान् अर्थ में “ असुन् ' ( अस् ) प्रत्यय होने पर छादनाद = स्वाऽऽश्रयस्य आवरणात् छन्दः । अर्थात् जो अपने आश्रयीभूत वेद मन्त्राऽऽदि के स्वरूपों को आवृत्त करे, उसे छन्द कहा जाता है । वेदों में विभिन्न प्रकार के छन्दों की उपलब्धि होती है । वर्णों के न्यूनाऽधिक भाव में तो एक ही छन्द के मुख्य स्वरूप में कितने उपभेद हो जाते हैं । जिसका विस्तृत ज्ञान तो पिङ्गलाऽऽदि छन्दःशास्त्र के गहन अध्ययन से प्रकट होता है, जिसका पूरा स्वरूप तो शास्त्राऽध्ययन से ही प्रकट हो सकता है, किन्तु हम “ स्थाली पुलाक न्याय ” से उनके मुख्य अंशों पर ही विचार करने जा रहे हैं, क्योंकि हमारा यह प्रयास छन्दोविद्या के जिज्ञासुओं का उत्साह बढाने के उद्देश्य से दिग्दर्शन मात्र है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भूमिका १०३ छन्दों के भेद ऊपर के आरम्भिक विचार में यह बात आयी है कि शब्द जगत के छन्द लौकिक
श्लोक आदि में तथा वैदिक मन्त्रों में व्याप्त होकर रहता है । अत एव लोक में प्रयुक्त
होने वाले के लौकिक छन्द एवं वेद मात्र में उपस्थित हुए छन्द को वैदिक छन्द के नाम से कहा जाता है । वैदिक छन्दों का प्रयोग व्यावहारिक भाषा स्थल में न होकर, केवल वेद मन्त्र में जो कि ऋचा आदि के नामों से भी कहा जाता है, वहीं पर हुआ करता है । इस प्रकार छन्दों का ( १ ) लौकिक छन्द एवं ( २ ) वैदिक छन्द के भेद से भिन्न द्विधाविभाग होता है । यद्यपि श्लोक शब्द से वैदिक मन्त्रों का ग्रहण नहीं हुआ करता है, किन्तु मन्त्र शब्द से वैदिक मन्त्र से लेकर लोक प्रसिद्ध श्लोक का भी ग्रहण होता है । इस प्रकार हम पाते हैं कि मन्त्रों से केवल वैदिक मन्त्र तक ही सम्भव नहीं है, अत एव वहाँ वैदिक शब्द का विशषेण प्रस्तुत करना अनिवार्य है अर्थात् " वैदिकमन्त्र " इतना कहने पर ही वैदिक छन्दोमय शब्दों का ग्रहण होगा, एवं लौकिक श्लोकों का उससे भेद सिद्ध होगा । इसी प्रकार वैदिक मन्त्र के भीतर भी उनके भेद - प्रभेद पाये जाते हैं । अत एव ऋग्वेदीय मन्त्रों में ऋचा शब्द का व्यवहार होते देखा जाता है । छन्दों के प्रकाराऽन्तर से द्विविध भेद छन्दों के स्वरूप की अभिव्यक्ति में स्वर एवं व्यञ्जन वर्ण तो स्वनिष्ठसंस्था द्वारा कारण होते ही हैं, इसके साथ ही साथ स्वर - वर्णगत मात्रायें भी कारण कोटी में समाविष्ट होते हैं । वर्ण के आधार पर जिन छन्दों के स्वरूप लाभ होते हैं उन्हें ( १ ) वार्णिक छन्द कहते हैं, एवम् ( २ ) स्वरवृत्ति मात्राओं को निमित्त मानकर जिन छन्दों की अभिव्यक्ति होती है, वे पुनः मात्रिक छन्द के नाम से कहे जाते हैं-( १ ) वार्णिक छन्द - जिसमें वर्णगत परिणामाऽऽत्मिका जो मात्रा है उस मात्रा को निमित्त न मानकर जब छन्द का स्वरूप प्रकट होता है, तब वह छन्द वार्णिक छन्द के नाम पुकारा जाता है, जिसे अक्षर छन्द भी कहा जाता है । इस छन्द में ह्रस्व - दीर्घ, लघु - गुरु विषयक विचार प्रवृत्त नहीं हुआ करता है । यहाँ पर वर्णगत मात्रा की निमित्तरूप से अवहेलना करके केवल पूर्ण स्वर अथवा स्वर सम्बलित व्यञ्जन को ही निमित्त के रूप में ग्रहण किया जाता है । जिससे स्वर वर्ण के ह्रस्व - दीर्घ अथवा प्लुत के रूप में उपस्थित होने पर भी वहाँ का स्वरवर्ण, या स्वरवर्णयुक्त व्यञ्जन एक ही अक्षर के रूप में जानने के योग्य होगा । ( २ ) मात्रिक छन्द - जिस छन्द में अक्षरों का निमित्त रूप से ग्रहण न होकर स्वरवर्णगत ह्रस्वत्व - दीर्घत्व एवं प्लुतत्व धर्म को लेकर छन्दों का व्यवहार होता हो, तदनुसार ह्रस्व की एकमात्रा के रूप में, द्विमात्रिकरूप से दीर्घ को, तथा प्लुत का त्रैमात्रिक रूप से व्यवहार होकर वर्ण के एक होने पर भी वर्णगत संख्या को छोड़कर CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०४ छन्दः शास्त्रम् एवं स्वरवर्ण से सम्बद्ध मात्रा की संख्या को आधार मान कर छन्द का स्वरूप निर्धारित होता हो, तो वैसा छन्द " मात्रिक छन्द " के नाम से कहा जाता है । उपर्युक्त दोनों प्रकार के छन्द लौकिक भाषा के हिन्दी आदि काव्यों से लेकर संस्कृत के श्लोकाऽऽदिकों में भी उपलब्ध होते हैं । वैदिक मन्त्राऽऽदिकों में तो दोनों प्रकार के छन्दों को प्रयोग होते नहीं देखा जाता, किन्तु वार्णिकछन्दों का ही प्रयोग उपलब्ध होता है । यतः वैदिक मन्त्रों में केवल स्वरवर्ण, या पुनः स्वरवर्णयुक्त व्यञ्जन के आधार पर ही गणना होती है, स्वरवर्णशून्य केवल व्यञ्जन वर्ण की गणना वैदिक साहित्य में छन्द का निमित्त नहीं होती । इस प्रकार वर्ण गणना के आधार पर सिद्ध होने वाले छन्द “ वार्णिक छन्द या अक्षर छन्द " कहलाते हैं । वार्णिक छन्दों के स्वरूप उनके उदाहरणों में स्पष्ट रूप से जाने जा सकते हैं । यथा-अ॒ग्निमी॑ले पु॒रोहि॑तम्, य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म् । होता॑रं रत्न॒धात॑मम् ॥ ( ऋग्वेदसं ० १।१।१ । ) इस मन्त्र की अभिव्यक्ति गायत्री नामक वार्णिक ( अक्षर ) छन्द के रूप में हुयी है । क्योंकि यहाँ पर आठ - आठ सङ्ख्या की मात्रा में तीन पाद हैं और चतुर्विंशति ( चौवीस ) अक्षरों की सङ्ख्या विद्यमान है जो कि गायत्री छन्द का लक्षण है । अतः गायत्री छन्द वाला मन्त्र पर्यवसित होता है । इसमें अक्षरों के परिगणन की तालिका का आकार इस रूप में समझना चाहिए— १ + १- १ + १ + १ + १ + १ + १ = ( १ × ८ = ८ प्रथमपाद ) ( १ ) अ - ग्नि- मी - ले - पु - रो - हि - तम् । १ + १ + १ + १ + १ + १ + १ + १ = ( १ × ८ = ८ द्वितीयपाद ) ( २ ) य -ज्ञ - स्य- दे - व - मृ - त्वि - जम् । १ + १ + १ + १ + १ + १ + १ + १ = ( १ × ८ = ८ तृतीयपाद ) ( ३ ) हो - ता - रं रत्न - धा त तम् । यहाँ गायत्री छन्द है, तीन पाद एवं प्रतिपाद आठ - आठ अक्षर हैं । ८ ८ ८ = २४ अक्षर । छन्दगत गणों के स्वरूप पर शास्त्रीय विचार छन्दों में गणों का मुख्य स्थान माना जाता है, क्योंकि इसी के आधार पर छन्दों के स्वरूप, अपनी अपनी विशेषता को लेकर अभिव्यक्त होते हैं । गण की उपस्थिति लौकिक एवं वैदिक छन्दों में समान रूप से रहती है । इतना ही नहीं मात्रिक एवम् अक्षर छन्द नाम से प्रसिद्ध छन्द के उपभेद स्थल में भी गणों की व्याप्ति समान रूप से रहती है । गण में जहाँ मात्राओं पर ध्यान रखा जाता है वहीं पर प्रत्येक गण में मात्रा सम्बलित CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भूमिका १०५ स्वर अथवा स्वरवर्ण युक्त व्यञ्जन का होना अनिवार्य माना गया है । इस प्रकार के तीन स्वर घटित अक्षर, एवं स्वतन्त्र स्वर और स्वरयुक्त व्यञ्जन के रूप में तीन - तीन अक्षरों का गण माना जाता है । तीन अक्षर वाले गणों के कुल आठ भेद होते हैं, जिनके पृथक्-पृथक् रूप में आठ देवता एवं आठ प्रकार के फलाऽऽत्मक परिणाम स्वीकार किये जाते हैं । इन अक्षरत्रय से निर्मित गणों के आठ भेदों के सहित लघु - गुरु के ज्ञान के लिए पिङ्गलाऽऽचार्य जी अपने पिङ्गल छन्दशास्त्र में चतुर्दश ( १४ ) सूत्रों की रचना किये हैं । इन सूत्रों में गण की स्वरूप सिद्धि के लिए सूत्रों के आरम्भ में तीन अक्षरों को प्रस्तुत करके, सूत्रों के उत्तराऽर्ध भाग से गणों की सञ्ज्ञा का प्रदर्शन किया गया है । सूत्रों के स्वरूप ये हैं-( १ ) धी श्री - स्त्रीम् ।१।१ । ( २ ) वश सा य् । १।२ । ( ३ ) का गुहार् ।१।३ । ( ४ ) व सुधा स् । १।४ । ( ५ ) सा ते क्व त् । १।५ । ( ६ ) कदास ज् । १ । ६ । ( ७ ) किंवद भ् । १।७ । ( ८ ) न हस न् । १।८ । ( ९ ) गृ ल् । १।९। ( १० ) गन्ते । १ । १० । ( ११ ) घ्रादिपरः । १ । ११ ॥ ( १२ ) हे । १ । १२ । ( १३ ) लौ सः । १ । १३। ( १४ ) ग्लौ । १ । १४ । इन सूत्रों का भाव यह है कि- तीन गुरु अक्षरों की मगण, आदि लघु मध्य एवम् अन्त गुरुवर्ण वाले गण की यगण, मध्य लघु, एवम् आदि अन्त गुरु वर्ण वाले की रगण सञ्ज्ञा, अन्त गुरु तथा आदिमध्य लघु अक्षर वाले गण की सगण सञ्ज्ञा, अन्त लघु और आदि मध्य गुरु अक्षरों वाले गण की तगण सञ्ज्ञा, मध्य गुरु और आदि अन्त लघु वर्ण वाले की आदि गुरु एवं मध्य अन्त में लघु वर्ण वाले गण की भगण सञ्ज्ञा तथा जिसमें तीनों अक्षर लघु हो उसकी नगण सञ्ज्ञा होती है । छन्द के विषय में ज्ञातव्य कुछ विशेष नियम ( १ ) एकमात्रिक ह्रस्व अक्षर की ' हर्स्ट लघु ' इस पाणिनि सूत्र से लघु सञ्ज्ञा होती है । ( २ ) पाद के अन्त में हस्व अक्षर लघुसञ्ज्ञक होता हुआ भी वैदिक शिक्षा एवं प्रातिशाख्याऽऽदिकों के प्रमाण से गुरुसञ्ज्ञक माना जाता है । ( ३ ) संयुक्ताऽक्षर ( स्वर रहित हल् वर्ण ), अनुस्वार, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय, अनु-नासिक आदि वर्ण यदि हस्वाक्षर से पर में हो, तो उस ह्रस्वाऽक्षर की गुरु सञ्ज्ञा मानी गयी है । ( ४ ) स्वाभाविकरूप से जो द्विमात्रिक हैं, तथा जो त्रिमात्रिक वा चतुर्मात्रिक स्वर वर्ण हैं, वे गुरु सञ्ज्ञक ही हुआ करते हैं । ( ५ ) दीर्घ सञ्ज्ञक साहजिक रूप से “ ई - ऊ " इत्यादि स्वर वर्ण की त्रि- चतुर्मात्रिक प्लुत CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०६ सञ्ज्ञक वर्ण की, तथा की दो - दो मात्राएँ होती दो लघु अक्षर के रूप ( ६ ) इस प्रकार के लघु गुरु आवश्यक है ।. यहाँ पर लघु के लिए शास्त्रांऽभिमत है । गण चक्र प्रदर्शित किया जा रहा है-संख्या गणनाम ( १ ) मगण: | ( २ ) यगणः | ( ३ ) रगणः ( ४ ) सगणः ( ५ ) तगणः ( ६ ) जगणः ( ७ ) भगण: ( ८ ) नगणः छन्दः शास्त्रम् संयोग सञ्ज्ञक संयुक्त व्यञ्जन वर्ण परे रहते ह्रस्व अच् हैं अर्थात् इसका दो लघ्व अक्षर के बराबर उच्चारण, और में परिगणन हुआ करता है । सञ्ज्ञक वर्ण से सम्बन्धित विचार मात्रिक छन्द स्थल में ( 1 ) यह चिह्न, तथा गुरु के लिए ( S ) इस प्रकार चिह्न के माध्यम से गण, देवता, एवं फल का स्पष्ट निर्देश गणस्वरूप गणदेवता गणफलम् SSS भूमि: लक्ष्मीः । ISS जलम् वृद्धिः । 515 अग्निः दाहः । 115 वायुः दूरगमनम् । 551 व्योम शून्यम् । 151 सूर्य रोमः । 511 चन्द्रः यशः । ||| स्वर्गः सुखम् । वैदिक छन्दों के प्रमुख भेदों का वर्णन पिङ्गलछन्दश्शास्त्राऽनुसार वैदिक छन्दों के मुख्य सप्त ( सात ) भेद ज्ञात होते हैं । जिनका वर्णन प्रमाण प्रदर्शन के साथ नीचे किया जा रहा है— ( १ ) गायत्री, ( २ ) उष्णिक्, ( ३ ) अनुष्टुप्, ( ४ ) बृहती, ( ५ ) पङ्क्ति, ( ६ ) त्रिष्टुप्, ( ७ ) जगती भेद से भिन्न सात प्रकार के छन्द ही मुख्य रूप से वैदिक साहित्य में उपलब्ध हुआ करते हैं । इन सात प्रकार के छन्दों में प्रत्येक छन्दों के पुनः ( १ ) आर्षी, ( २ ) दैवी, ( ३ ) आसुरी, ( ४ ) प्राजापत्य, ( ५ ) याजुषी, ( ६ ) साम्नी, ( ७ ) आर्ची, तथा ( ८ ) ब्राह्मी, ये आठ प्रकार के भेद पिङ्गलछन्दश्शास्त्र के अनुसार ही ज्ञात होते हैं । जिसमें गायत्त्री छन्द के अष्टविध भेदों का वर्णन पि ० सू ० अध्याय- २ के सू ० सं ० १ से लेकर सू ० सं ० १३ तक वर्णन किया गया है । इसी प्रकार उष्णिक् आदि छन्दों के भी आर्षी, दैवी आदि अष्टविध भेदों को इस छन्दः शास्त्र में अव्याकुलरीति से विवेचन किया गया है । ७ × ८ = ५६ भेद को धारण करने वाले गायत्त्री, उष्णिग्, अनुष्टुप्, वृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप्, जगती, के भेद से भिन्न हुए सात प्रकार के छन्दों से पृथक् भी CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA