छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 111–120
छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 111–120
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भूमिका १०७ ( १ ) अतिजगती, ( २ ) शक्वरी, ( ३ ) अतिशक्वरी, ( ४ ) अष्टि, ( ५ ) अत्यष्टि, ( ६ ) धृति, ( ७ ) अतिधृति ये सात प्रकार के छन्द वेदों में उपलब्ध होते हैं । दग्वेद में ये ही चौदह छन्द कात्यायन, शौनक आदि आचार्यों द्वारा स्वीकृत हैं । अत एव ऋग्वेद भाष्यकार ' वेङ्कट माधव ' जी लिखते हैं-चतुर्दशेत्यं कविभिः पुराणैश्छन्दांसि दृष्टानि समीरितानि । इयन्ति दृष्टानि तु संहितायामन्यानि वेदेष्वपरेषु सन्ति ॥ ( इस प्रकार शौनकाऽऽदि प्राचीन विद्वानों के द्वारा चतुर्दश ( १४ ) छन्दों के अनुसन्धान किये गये हैं । इतने ही छन्द ऋग्वेदसंहिता में उपलब्ध होते हैं । शेष छन्द अन्य वेदों में देखे जाते हैं । ) यहाँ इतना ध्यातव्य है कि गायत्री आदि सात छन्दों के उत्तरवर्ती रूप से " अति जगती " आदि सात छन्द स्वीकार किये गये हैं । उपर्युक्त चौदह छन्दों के अतिरिक्त ( १ ) मा, ( २ ) प्रमा, ( ३ ) प्रतिमा, ( ४ ) उपमा और ( ५ ) समा नाम से और भी छन्द वेदों में स्वीकार किये गये हैं । ये पाँचों छन्द गायत्री के पूर्ववर्ती कहे जाते हैं । इन छन्दों में क्रमशः चार, आठ, बारह, सोलह और बीस अक्षर होते हैं । इस प्रकार वेदों में मुख्य छन्दों की संख्या कुल मिलाकर छब्बीस ( २६ ) सिद्ध होते है । किन्तु पिङ्गलाऽऽचार्य ने गायत्री छन्द के प्राग्वर्ती मा - प्रमा आदि पाँच छन्दों का वैदिक छन्द विचार में उल्लेख नहीं करते हैं । छन्दों के ५२ भेद का निर्देश पूर्वोक्त छब्बीस प्रकार के सभी छन्दों में जब दो - दो अक्षरों को एक बार न्यून किया जाता है तब वहाँ न्यूनता वाले तत्तत् उन सभी छन्दों मे विराट् विशेष लगकर विशेषण विशिष्ट छब्बीस, एवं विशेषण विनिर्मुक्त भी छब्बीस की संख्या का एकत्र योग होने पर बावन ( ५२ ) संख्या के छन्द सिद्ध होते हैं । ये सब महर्षि शौनक एवं पिङ्गल के मतानुसार कहे गये हैं । छन्दों के १०४ भेद का निर्देश उपर्युक्त छब्बीस ( २६ ) प्रकार के छन्द ही कृत, त्रेता द्वापर एवं कलि भेद से भिन्न होते हुए २६ × ४ = १०४ छन्दों वाले सिद्ध होते हैं । अर्थात् कृत आदि चार नामों से विभक्त होते हुए छब्बीस संख्या के ये छन्द चार गुणा बढ़कर एक सौ चार स्वरूप में स्थापित होते हैं । पूर्व में इस पर संक्षिप्त विचार प्रकट किया जा चुका है कि ( १ ) गायत्त्री ( २ ) उष्णिग् ( ३ ) अनुष्टुप् ( ४ ) वृहती ( ५ ) पति ( ६ ) त्रिष्टुप् एवं ( ७ ) जगती भेद से भिन्न सात प्रकार के गायत्त्री आदि छन्द के स्वरूप होते हैं । पुनः गायत्री आदि सातों छन्दों CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०८ छन्दः शास्त्रम् में से प्रत्येक छन्द के ( १ ) आर्षी, ( २ ) दैवी, ( ३ ) आसुरी, ( ४ ) प्राजापत्या, ( ५ ) याजुषी, ( ६ ) साम्नी, ( ७ ) आर्ची, ( ८ ) ब्राह्मी - ये आठ - आठ भेद हुआ करते हैं । तदनुसार इन छन्दों के चौसंठ भेद पर्यवसित हुए । श्री हलायुधभट्ट के अनुसार चतुषष्ठी ( ६४ ) कोणाऽऽत्मक मण्डल का स्वरूप दिया जा रहा है तदनुसार गायत्री आदि सातों छन्दों के आठ - आठ भेद क्रम से ६४ भेदों का स्पष्टीकरण सुगमता के साथ सिद्ध होता है । चतुःषष्ठी कोणाऽऽत्मक मण्डलतालिका क्र. छन्दः गायत्री उष्णिम् अनुष्टुप् वृहती पंक्ति त्रिष्टुप् जगती अङ्कों की वृद्धि सं. १. आर्षी २४ २. दैवी | ३. आसुरी १५ ४. प्राजापत्या ०८ ५. याजुष ०६ ६. साम्नी १२ ७. आर्ची १८ ८. ब्राह्मी ३६ २८ ३२ ०२ ०३ १४ १३ १२ १६ ०७ ०८ १४ १६ २१ २४ ४२ ४८ एवं क्षय का क्रम । ३६ ४० ४४ ४८ उत्तरोतर ४-४ सं. की वृद्धि ०४ ०५ ०६ ०७ क्रमश: एक ( १ ) की वृद्धि | १२ | ११ | १०० ९ क्रमिक रूप से १ का ह्रास २० २४ २८ | ३२ क्रमशः ४ सं. की वृद्धि | ० ९ १० ११ १२ क्रमशः १ सं. की वृद्धि १८ | २० | २२ २४ क्रमशः २ सं. की वृद्धि २७ ३० ३३ ३६ क्रमशः ३ सं. की वृद्धि ५४ ६० ६६ | ७२ ६ की क्रमशः वृद्धि टि ० - ऊपर में जो संख्या दिखलाई गयी है वह छन्दों की अक्षर संख्या है । सभी छन्दों का उद्भवस्था गायत्रीछन्द ही है छन्दश्शास्त्र पर आनुसान्धानिक दृष्टि से विचार किये जाने पर यह तथ्य प्रकट होता है कि समस्त छन्दों का मूल श्रोत गायत्री छन्द ही है । अष्टाऽक्षर से आरम्भ करके चतुर्विंशति ( २४ ) अक्षर तक के समस्त छन्द एवं गायत्री छन्द के पूर्ववर्त्ती मा, प्रमा, प्रतिमा, उपमा, और समा ये सभी छन्द गायत्री छन्द विशेष ही कहे जा सकते हैं । इनसे भिन्न और जितने भी छन्द हैं, वे सभी छन्द गायत्री छन्द के अक्षरों में ही वृद्धि या न्यूनभाव करने से बनते हैं । गायत्री आदि छन्दों की पूर्ण संख्या को लेकर ही आर्षी छन्द का स्वरूप निर्धारित होने से उस छन्द को लेकर छन्दोभेद की कल्पना नहीं की जा सकती है । अर्थात् २४ अक्षरों वाली गायत्री, २८ अक्षरों की उष्णिक्, ३२ अक्षरों का अनुष्टुप्, ३६ अक्षरों की वृहती, ४० अक्षरों की पङ्क्ति, ४४ अक्षरों का त्रिष्टुप् तथा ४८ अक्षरों वाली जगती इन सभी छन्दों की इसी पूर्ण संख्या को आर्षी छन्द का नाम दिया गया समझना चाहिए । २४ अक्षर संख्या वाली गायत्री छन्द में ही क्रमिक रूप से चार - चार अक्षरों की संख्या को उत्तरोत्तर बढाये जाने की स्थिति में क्रमशः उष्णिक्, अनुष्टुप्, वृहती, पङ्क्ति, CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भूमिका १० ९ त्रिष्टुप् और जगती छन्दों के स्वरूप लाभ होते हैं । अतः निष्कर्षरूप से यही कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण छन्दों का मूल श्रोत गायत्री छन्द ही है । अक्षरों के न्यूनाऽधिभाव हेतुक छन्दविषयक विचार मूल छन्द की संख्या में यदि न्यूनाऽक्षर अथवा अधिकाऽक्षर की स्थिति उत्पन्न होती है, तथापि न्यूनाधिक अक्षर संख्या वाले उन उन छन्दों के स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ करता है, अर्थात् अक्षरों के न्यूनाधिक भाव होने पर छन्दों के स्वरूप अन्य छन्दों के रूप में परिवर्तित नहीं हुआ करते हैं । इस विषय में पिङ्गल सूत्र इस रूप में उपलब्ध होता है— ' ऊनाऽधिके नैकेन निचृद्भूरिजौ ' ( पि ० छ ० अ ० सू ० ५ ९ ) तथा ' द्वाभ्यां विराट् स्वरा जौ ' ( पि ० छ ० अ ० ३। सू ० ६ ) इन दोनों सूत्रों में प्रथम सूत्र का अर्थ है— चौबीस अक्षरों वाली गायत्री छन्द जब एक अक्षर संख्या से ही हो जाती है, तो वैसी स्थिति में वह छन्द “ निचृद्गायत्री " के नाम से कही जाती है । यथा-अग्निमिन्धानो मनसा ( १ ) धियं सचेत मर्त्यः ( २ ) । अग्निमीधे विवस्वभिः ॥ ( ऋग्वेदे अ ० ६ अ ० ७ व ० १२ ० ७1 ) तीन पाद वाले इस मन्त्र के द्वितीय पाद में सात अक्षर हैं और इसके कारण तीनों पादों की अक्षर संख्या चौबीस से न्यून तेईस अक्षर हैं, जिसके कारण यह गायत्री छन्द निचृद गायत्री के नाम से कहा जाता है । इसी प्रकार उष्णिक् आदि अन्य छन्द स्थलों में भी इसी क्रम से निचृद् उष्णिक्, निचृद्अनुष्टुप् निचृगृहती आदि को भी समझना चाहिए । भूरिक् गायत्री आदि छन्दों के स्वरूप का निर्धारण यदि छन्द में निर्धारित संख्यक अक्षरों से एक अक्षर अधिक पाया जाय तो इस प्रकार का गायत्री आदि छन्द क्रमशः भुरिक् गायत्री, भुरिक् उष्णिक्, भुरिक् अनुष्टुप्, भुरिक्वृहती, भुरिक् पङ्क्ति, भरिक् त्रिष्टुप् एवं भूरिक् जगती के नाम से कहा जाता है । इसके उदाहरण के क्रम में भुरिक् गायत्री का उदाहण यह है— ( १ ) परि॑द्युक्षः स॒नप्र॑यि ( २ ) भि॑र॒द्वाज॑ नो॒ अन्ध॑सा । ( ३ ) सुवा॒नो अ॑र्ष प॒वित्र आ । ( ऋ ० ७।१।९ ।१ ) इस गायत्री छन्द के तृतीय पाद में नौ ( ९ ) अक्षर हैं । कुल मिलाकर २५ अक्षर होने से यह गायत्री भूरिक्गायत्री के अन्तर्गत आती है । इसी प्रकार भुरिक् उष्णिग् आदि छन्दों का भी एक अक्षर की अधिकता से निर्णय किया गया है, जो इसी ग्रन्थ में इस विषय से सम्बद्ध सूत्र की मूल पर लिखी गयी टिप्पणी से जानने का प्रयत्न करने पर अधिगत होने के योग्य हैं । विशेष - निचृद् गायत्री छन्द में जहाँ एक अक्षराऽऽत्मिका मात्रा की कमी पायी जाती है, वहाँ पर उच्चारणाऽऽत्मिका कटुता के परिहाराऽर्थ आचार्य पिङ्गल का सूत्र इस CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११० छन्दः शास्त्रम् रूप में उपलब्ध होता है- ' इयादि पूरणः ॥ ' ( पि ० छ ० ३ सू ० २ ) सूत्र में आदि पद के उल्लेख से “ उव् ” आदि का ग्रहण समझना चाहिए । इस प्रकार सूत्र का स्पष्ट अर्थ होगा - जहाँ पर गायत्री आदि छन्दों में पाद के लिए निर्धारित की गयी अक्षर संख्या मन्त्र में पूरी होती हुयी न दिख पड़े, उन न्यून संख्याक अक्षर वाले पाद की पूर्ति “ इय्, उव् ” आदि एक संख्या वाले पदों को जोड़कर अविकलरूप से पाद का उच्चारण किया जाना चाहिए । यथा— ' तत्सवितर्वरेण्यम् ' ( ऋ ० सं०-३।४।१०।५ ) तथा ' दिवं गच्छ स्वः पत । ' ( यजु ० वे ० १२।४ ) इन दोनों पादों में आठ अक्षर संख्या के स्थान पर सात - सात अक्षरों का ही उच्चारण वेद में किया गया उपलब्ध होता है । अब यहाँ पर प्रकृत उच्चारण की न्यूनता को दूर करने लिए शास्त्रकार के द्वारा अष्टाऽक्षर उच्चारण करने के लिए एक सामान्य विधि ( नियम ) को प्रदर्शित किया गया है । तदनुसार " न्यूनमात्रा वाले छन्दः पाद में “ य, व " अक्षर का संयोग उपस्थित होने पर संयुक्त य से पूर्व में इ ( य् ) का आगम करके " वरेण्यम् ” आदि के स्थान में " वरेणियम् ” आदि का उच्चारण किया जाना चाहिए ( एवं संयुक्ताऽक्षर " व " के उत्तर उव् को जोड़ कर उपर्युक्त मन्त्र घटक “ स्वः ” आदि के स्थान में " सुवः ” आदि का उच्चारण किया जाना चाहिए " । किन्तु यहाँ केवल उच्चारण मात्र में ही “ इय् एवं उव् ” आदि का सन्निवेश होगा, मन्त्र में उसका लेखन भी नहीं । क्योंकि यह इय् आदि आगमों का विधान कटु उच्चारण से बचने के लिए शास्त्रकार द्वारा किये गये प्रयास के परिणामस्वरूप उच्चारणाऽवस्था में ही अक्षर संख्या की पूर्ति के निमित्त हुआ जानना चाहिए । यदि शास्त्रकार का यह प्रयास नहीं होता, तो पुनः “ वरेण्यम् ” आदि के स्थान में “ वरेणियम् ” आदि इय् आगम घटित उच्चारण नहीं हो सकता था और न ही “ स्वः ” आदि के स्थान में “ सुवः ” आदि “ उव् ” आदि आगम घटित उच्चारण का होना ही सम्भव था । क्योंकि वेद मन्त्र में न तो “ वरेणियम् ” का और न ही “ सुवः ” का उच्चारण उपलब्ध होता है । अत: लेख से विलक्षण उच्चारण ऐसे न्यूनता गर्भितस्थलों मे हो, इसके लिए उच्चारण का यह नियम बनाया गया है । विराट् एवं स्वराट् छन्द की अवतरणिका जिस प्रकार गायत्री आदि छन्दों में निर्धारित अक्षरों की पूर्ण संख्या से एक अक्षर की न्यूनता में निचृद् गायत्री आदि छन्द, तथा निर्धारित पूर्ण संख्या से एक संख्याक अधिक गायत्री आदि छन्द की भुरिक् गायत्री आदि छन्द होते हैं, उसी प्रकार नियत संख्याक गायत्री आदि छन्दों में जब दो अक्षरों की न्यूनता दीखती हो या होती हो तथा पूर्ण संख्या वाले छन्दों में नियत संख्या से दो संख्या अधिक की अधिगति हो रही हो तो वहाँ पर गायत्री Sanskrit आदि Academy छन्दों को, Jammmu किस रूप . Digitized में निश्चय by किया जाना चाहिए? इस विषय
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भूमिका १११ पर प्रकाश करते हुए पिङ्गलाऽऽचार्य जी कहते हैं-" द्वाभ्यां विराट्स्वराजौ " ( पि ० छ ० अ ० ३। सू ० ६० || ) अर्थात् गायत्री आदि छन्दों में निर्धारित पूर्ण संख्याक अक्षरों से दो अक्षर संख्या न्यून हो, तो वे गायत्री, उष्णिग् आदि छन्द क्रमशः विराड् गायत्री, विराड् उष्णिक् आदि नामों से कहे जाते है और यदि उन्हीं गायत्री आदि छन्दों में पूर्ण संख्याक अक्षर से दो संख्याक अधिक अक्षर विद्यमान हों, तो वे गायत्री आदि छन्द स्वराट् गायत्री, स्वराड् उष्णिक् आदि नामों से कहने योग्य होते हैं । विराड् गायत्री आदि का उदारहण द्वारा स्पष्टीकरण यथा — राजन्तमध्वराणां ( १ ) गोपाऽमृतस्य दीदिविम् ( ३ ) । वर्द्धमानं स्वे दमे ( ३ ) ॥ ( ऋग्वेदे- अ ०१ अ ०१ १०२ मं ०३ । ) इस मन्त्र के प्रथम पाद एवं तृतीयपाद में क्रमशः एक - एक संख्याक अक्षरों को मिला कर चौबीस संख्याक अक्षर वाले इस गायत्री छन्द में दो संख्या वाले दो अक्षरों की न्यूनता के कारण यह छन्द विराट् गायत्री कहलाती है । इसी प्रकार विराड्उष्णिक् विराड्अनुष्टुप्, विराड्बृहती, विराट् पङ्कि, विराट्त्रिष्टुप् विराड्जगती के स्वरूप को जानना चाहिए । तृतीयाऽध्याय में प्रकृत सूत्र के सं ० टिप्पणी में इन सभी छन्दों के सोदाहरण प्रदर्शन किये गये हैं । अतः वहीं देखना होगा । स्वराट् गायत्री आदि छन्दों के उदाहरणों का दिग् दर्शन किसी मन्त्र में निर्धारित पूर्ण संख्या से हटकर जब दो संख्या के दो अक्षर अधिक वाला छन्द हो, तो उसे स्वराट् गायत्री आदि के नाम से कहा जाता है, इस बात का स्पष्टीकरण अभी - अभी किया जा चुका है । इसका उदाहरण है-जोषा॑ सवित॒र्यस्य॑ ते॒ ( १ ) हरेः श॒तं स॒वाँ अर्हति ( २ ) । पा॒हि नो॑ दि॒द्युतः॒ पत॑न्त्या ( ३ ) । ( ऋ ० ८।८।१६।२ ) इस गायत्री मन्त्र के द्वितीय एवं तृतीय पाद में क्रमशः एक - एक अक्षर अधिक होने से दो अक्षर अधिक वाला अर्थात् २६ अक्षर वाला होने से यह छन्द “ स्वराड् गायत्त्री ” नाम से कहा जाता है । इसी प्रकार दो - दो अक्षर मात्रा की वृद्धि से क्रमश: स्वराड् उष्णिक्, स्वराडनुष्टुप्, स्वराड् वृहती आदि नाम से स्वरूप लाभ करते रहेंगे । आवश्यक बातें - ऊपरितन विचार के विषय बने हुए ( १ ) निचृत् ( २ ) भूरिक् ( ३ ) विराट् एवं ( ४ ) स्वराट् नाम से ख्यात चार भेदों में विभक्ति होने के कारण पुनः इन छन्दों के अक्षरों की न्यूनता एवम् अधिकता ही हुआ करती है । अतः सामान्य रूप से यहाँ पर निष्कर्ष रूप में यह बात कही जा सकती है कि- छन्द के स्वरूप स्थापक पूर्णाऽक्षरों में से एक ( १ ) अक्षर कम जिन छन्दों में पाये जाएगें वे छन्द “ निचृद् गायत्री ” CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११२ छन्दः शास्त्रम् आदि होगें, तथा पूर्णाऽक्षर से एक अक्षर अधिक होने पर, एकाऽक्षर अधिक वाले गायत्री आदि छन्द “ भुरिक् गायत्री ” आदि के नामों से कहे जाएगें । इसी प्रकार छन्द स्वरूपाऽ-भिव्यञ्जक पूर्णाऽक्षरों में से दो अक्षर न्यून मात्रा वाले छन्द विराट् गायत्री आदि के रूप में जाने जाते हैं, तथा उचित मात्रा से दो अक्षर मात्रा की अधिकता वाले छन्द स्वराट् गायत्री आदि के नाम से पुकारे जाते हैं । उपर्युक्त क्रम से जिस किसी भी मन्त्र में विद्यमान छन्दों में अक्षरों की न्यूनता अथवा अधिकता का अनुभव हो तो वहाँ पर अक्षरों के जोड़-घटाव के अनुसार मूल छन्द को उन चारों में से एक - एक को लगाकर उनसे घटित मूल छन्द का प्रयोग हुआ जानना चाहिए । निचृत् आदि चतुर्विध विशेषण विशिष्ट गायत्री आदि छन्दों के अभिधान में ऐसा कोई विशेष प्रकार का नियम नहीं है कि अमुक मन्त्र अथवा छन्द में ही इन विशेषणों से विशिष्ट गायत्री आदि का व्यवहार हो, या पुनः अमुक पाद में ही इन विशिष्ट छन्दों का अवतरण हो, किन्तु इसके विपरीत सामान्य रूप से उन सप्तविधमौलिक छन्दों में से किसी भी छन्द में, तथा किसी भी पाद में इनकी उपस्थिति हो सकती है । सातों छन्दों के हर विशेष अवस्था में इन्हीं चारों विशेषणों से विशिष्ट का व्यवहार हुआ करता है । मुख्य रूप से वैदिक छन्दों को चार भागों में विभक्त किये जा सकते हैं-( १ ) प्राग् गायत्री छन्द - ( क ) मा ( ख ) प्रमा ( ग ) प्रतिमा ( घ ) उपमा ( ङ ) समा । ( २ ) प्रथम सप्तक— ( क ) गायत्त्री ( ख ) उष्णिक् ( ग ) अनुष्टुप् ( घ ) वृहती ( ङ ) पङ्क्ति ( च ) त्रिष्टुप् ( छ ) जगती । ( ३ ) द्वितीय सप्तक — ( क ) अतिजगती ( ख ) शक्वरी ( ग ) अतिशक्वरी ( घ ) अष्टि ( ङ ) अत्यष्टि ( च ) धृति ( छ ) अतिधृति । ( ४ ) तृतीयसप्तक— ( क ) कृति ( ख ) प्रकृति ( ग ) आकृति ( घ ) विकृति ( ङ ) अभिकृति ( च ) उत्कृति एवं ( छ ) संकृति ॥ छन्दों के प्रकारान्तर से कृत छन्द, त्रेताछन्द, द्वापर छन्द तथा कलि छन्द के नाम से होने वाले भेदों का प्रदर्शन क्र. कृत छन्द अक्षर अक्षर त्रेता छन्द सं. नाम | संख्या संख्या नाम | ( १ ) प्राग् गायत्री पञ्चक १. मा ( कृति ) ४ ३ हर्षीका २. प्रमा ( प्रकृति ) ८ ७ शर्षीका ३. प्रतिमा ( सं ० ) १२ ११ सर्षीका १४. उप ० ( अ ० ) १६ १५ सर्वमात्रा द्वापर अक्षर अक्षर कलि छन्द संख्या संख्या छन्द २ १ ( सर्षीका ) ६ ५ ( मर्षीका ) १० ९ १४ १३ ५. सम ( उ ० ) २० १ ९ वि ० कामा १८ १७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भूमिका ११३ क्र. कृत छन्द अक्षर अक्षर त्रेता छन्द सं. नाम संख्या संख्या ( २ ) प्रथम सप्तक - मुख्य छन्द का ६. गायत्री २४ २३ ७. उष्णिक् २८ २७ 2 ८. अनुष्टुप् ३२ ३१ ९. बृह ३६ ३५ १०. पंक्ति ४० ३ ९ ११, त्रिष्टुप् ४४ ४३ १२ जगती ४८ ४७ ( ३ ) द्वितीय सप्तक -१३. विधृति ५२ ५१ ( अतिज ० ) १४, शक्री ५६ ५५ १५, अष्टि ६० ५ ९ ( अतिज ० ) १६, अत्यष्टि ( अष्टि ) ६४ ६३ १७, अंहः ( अत्यष्टि ) | ६८ ६७ १८. सरित ( धृति ) ७२ ७१ १ ९, सम्पा ७६ ७५ ( अतिधृति ) नाम विभाग राट् सम्राट् विराट् स्वराट् स्वव ० परमेष्ठा अन्तस्था प्रयत्न अमृत वृषा जीव तृप्त रस शुक्र ( ४ ) तृतीय सप्तक- अति छन्द का विभाग २०, सिन्धु ( कृति ) ८० ७ ९ | २१, सलिल ( प्रकृति ) ८४ ८३ २२, अम्भ: ( आकृति ) | ८८ ८७ २३. गगन ( विकृति ) ९ २ ९ १ २४. अर्णव ( संकृति ) ९ ६ ९ ५ | २५, अप: ( अभिकृति ) १०० ९९ २६, समुद्र ( उत्कृति ) १०४ १०३ अर्णः अंश: अम्भः अम्बु वारि आपः उदक द्वापर अक्षर अक्षर कलि छन्द संख्या संख्या छन्द ( ताराट ) २२ २१ x ( विराट ) २६ २५ I ( स्वराट् ) ३० २ x ९ ( सम्राट ) ३४ ३३ m ३८ ३७ 2 ( परमेष्ठी ) ४२ ४१ x ( प्रतिष्ठा ) ४६ ४५ 5 | ५० ४ ९ ५४ ५३ ५८ ५७ ( शुक्र ) ६२ ६१ ( जीव ) ६६ ६५ ( पयः ) ७० ६ ९ ( तृप्त ) ७४ ७३ कथन ७८ ७७ 6 & ८२ ८१ 0८६ ८५ ९ 3 ० F ८ ९ 0 D ९ ४ ९ ३ 2 û ९ ८ ९ ७ 1 & १०२ १०१ O भू ० छ था. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११४ छन्दः शास्त्रम् ऊपरितन तालिका से सम्बद्ध कुछ आवश्यक विचार ( १ ) प्रथम सप्तक में विद्यमान सभी छन्द स्तोत्र विषयक माने गये हैं । इस कारण से उन छन्दों को दिव्य छन्द के नाम से लोक और शास्त्रों में व्यवहार किया जाता है । ( २ ) द्वितीय सप्तक के अन्तर्गत आने वाले सभी छन्द मानव छन्द कहे जाते हैं; क्योंकि इन छन्दों में दिव्यता का अभाव हुआ करता है । ( ३ ) तृतीय सप्तक में आने वाले छन्द दिव्य एवम् अदिव्य दोनों के धर्मों से युक्त होते हैं । इसी कारण तृतीय सप्तक में समाविष्ट छन्दों में देव - मानव, अथवा दिव्याऽदिव्य के नाम के व्यवहार होते हैं । ( ४ ) चतुर्थ श्रेणि में समाविष्ट मा ( = कृति ) प्रमा ( = प्रकृति ) आदि पाँचों छन्दों के साथ - साथ प्रथम - द्वितीय एवं तृतीय सप्तक में आये हुए सम्पूर्ण मिलकर कुल छब्बीस ( २६ ) प्रकार के छन्द वैदिक छन्द होते हैं । किन्तु पिङ्गलछन्दः सूत्र के व्याख्याता हलायुध उन छन्दों में प्रविष्ट गायत्री से लेकर त्रिष्टुप् पर्यन्त षड्विध छन्दों का वेद के साथ - साथ लौकिक काव्याऽऽदिकों में भी व्यवहार होना मान्य है । मन्त्रों में व्यूह का स्वरूप एवम् " इय् उव् ” आदि आगमों के निमित्त का प्रदर्शन व उदाहरण ( १ ) व्यूह के स्वरूप का निर्धारण - जब किसी मन्त्र में दो वर्णों के निमित्त से उत्पन्न होने वाले दीर्घ - गुण - वृद्धि - पूर्वरूप- पररूपाऽऽदि आदेश रूप सन्धियों को अलग - अलग रूप में सन्धियों के अभाव को प्रस्तुत किया जाता है, अर्थात् जहाँ पर सन्ध्यक्षरों की स्वतन्त्र रूप में स्थिति कायम होती हो = सन्धि के अभाव दो वर्णों के मध्य स्थित होता हो, तो वही व्यूहभाव के रूप में व्यवहृत हुआ करता है । यथा – “ दर्शते मे " = दर्शत - इमे, सूनवेऽग्ने = सूनवे अग्ने, त्र्यम्बकं यजामहे = त्रि - अम्बकं यजामहे । इत्यादि । ( २ ) इय् - उव् आदि आगमों के निमित्त, तथा उदाहणों का दिग्दर्शन-न्यून संख्या वाले पादाक्षरों की अक्षर संख्या को पूर्ण करके छन्दों का अविकल प्रकट करने के लिए पदों में इय् -उव् आदि आगमों की कल्पना शास्त्र निर्देशाऽनुसार करनी पड़ती है, उसे ही इत्यादि आगमाऽऽदेश भाव के नाम से कहा जाता है । वह आगम भी सामान्य रूप से न होने लगे उसके लिए शास्त्रकारों के द्वारा इस विषय में विलक्षण प्रयास किये गये हैं । तदनुसार जहाँ मन्त्र घटक जिस पद में संयुक्त वर्णों का अवयव " य " वर्ण बनता हो उस पद में " य " अक्षर के पूर्व " इय् ” का आगम होता है जिसमें " इ " शेष रहता हुआ वह आगम न्यूनसंख्या का निवर्त्तन करता है । यथा - गायत्री मन्त्र घटक “ वरेण्यम् ” इस पद में " इय् = इ " का " य " के पूर्व एवं " ण् ” के उत्तर में हो जाने पर वरेण् + इ + यम् = वरेणियम् शब्द सिद्ध होता है । इसी प्रकार जब न्यून अक्षरों से घटित पद में ‘ “ व ” संयुक्ताऽक्षर का मिलता हो, तो वकार के पीछे “ उव् = उ ” का CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भूमिका ११५ आगम होता है । यथा - तन्वम् = तन् + उ + वम् । यथा वा स्वः = स् + उव् + अस् ( = अ:) = सुवस् = सुवः । इत्यादि । [ नोट - इय् उव् आदि आगमों के अन्तिम वर्णों के रूप में क्रमिक रूप से य् और व् इनके लोप हो जाते हैं । ] विशेष - उपर्युक्त विषय में ध्यान देने योग्य यह तथ्य है कि सन्ध्यभाव स्वरूप व्यूह अथवा इय् - उव् आदि आगम न्यून अक्षरों को पूर्णता प्रदान करके, पूर्णाक्षर घटित पद युक्त पादों की उच्चारण बेला में छन्द दोष परिहाराऽर्थ मात्र प्रयुक्त होता है । जिससे कि स्तोत्र - पाठाऽऽदि कार्यों में छन्द से सम्बद्ध छान्दसिक नियमों का स्तोत्राऽऽदि में उल्लङ्घन प्रयुक्त प्रतिबन्ध उपस्थित न होने पावे । इसके विपरीत मन्त्राऽऽदि में न्यूनता दोष परिहाराऽर्थ उच्चारणपूर्वक व्यूहभाव एवम् इयादि आगम भाव का लेख के माध्यम से मन्त्राऽऽदि में सन्निवेश किया जाना कथमपि न्यायोचित नहीं हैं; क्योंकि ऐसा होने पर मन्त्रों का अनादि स्वरूप नष्ट होने लगेगा । पादों से सम्बन्धित पिङ्गलसूत्राऽऽश्रित विचार सामान्य रूप से छन्दों में कितने पाद होने चाहिये तथा पादों के अन्तर्गत होने वाले पदों में कितनी अक्षर संख्या होनी चाहिये, इन विषयों को छन्दः शास्त्र में, तथा वृत्ति ग्रन्थ में विस्तार भाव के साथ स्पष्ट किया गया है । पादों एवं पादाक्षरों के विषय में क्रमबद्ध रीति से नियमों को सामान्य नियमानुसार उद्घाटित किये जाने पर भी अक्षर संख्या एवं पाद संख्या के परस्पर अवाऽन्तरीय भेद विषय को लेकर भी उतना ही अधिक विचार किया गया है । इसी का परिणाम हुआ कि छन्द सामान्य, छन्द विशेष एवं उसके अवाऽन्तरीय भेदों का भी विपुल वैलक्षण्य जागृत हुआ और उनके विद्वान् उन विषयों का चयन करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की । इसी अभिप्राय से नियत मात्रा संख्या एवं नियत पाद संख्या से सम्बद्ध वाक्याद्यात्मकशब्द विशेष में छन्द का निवास प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि “ एक द्वि - त्रि चतुष्पादुक्त पादम् " ( पि ० छ ० अ ० ३ सू ०६ । ) इत्यादि । जिसका अभिप्राय यह है कि- पूर्वोक्त - गायत्री, जगती, त्रिष्टुप् आदि पादाऽनुयायी छन्दों में कहीं एक पाद, कहीं दो पाद, किसी छन्द में तीन पाद तथा किसी छन्द में चारपाद होते हैं । अर्थात् पादों और अक्षर संख्या के विद्यमान रहने पर छन्द होने पर भी उन छन्दों की विभिन्नता को प्रकट करने के लिए उन छन्दों के पादों में तथा अक्षर संख्या में पारस्परिक न्यूनाऽधिकभाव का स्वरूप निर्धारण करके गायत्री आदि के रूप में छन्दों का विभाग शास्त्र में दर्शाया गया, पुनः गायत्री आदि प्रत्येक विभक्तों का “ निचृद्गायत्री ” आदि रूप से अष्टविध भेद होते हैं । आगे इस पर विचार जारी रखते हुए सूत्रकार कहते हैं कि— “ गायत्र्याः वसवः ” ( ३।३ ); " गगत्या आदित्याः " ( ३।४ ); विराजो दिशः ( ३।५ ) इत्यादि । जिन सूत्रों के क्रमिक अर्थ हैं— CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११६ छन्दः शास्त्रम् आठ अक्षरों वाला एक गायत्री छन्द में होता है । बारह अक्षरों वाला पाद जगती छन्द में हुआ करता है । विराट् छन्द में दश अक्षरों का एक पाद होता है । एवं ( ग्यारह ) अक्षरों वाला पाद त्रिष्टुप् छन्द में होता है । इस प्रकार नियमित अक्षर संख्या से युक्त हुआ कोई छन्द एक ही पाद का होता है, कोई दो पादों वाला पुन: कोई - कोई छन्द तीन पाद और चार पाद वाले भी होते है । इतना ही नहीं कहीं - कहीं छन्दों में पञ्चपाद - षट्पाद आदि भी पाये जाते है । मुख्य छन्दों के अवान्तर भेद अधिकांश छन्दों में उपलब्ध होता है । छन्दों के अवान्तर भेद का कारण पादों एवं पादगत अक्षर संख्याओं में भेद ही हो सकते हैं अन्य नहीं और इन अवाऽन्तर भेदों के कारण छन्दों में भ्रम न उत्पन्न हो, इसके लिए मुख्य छन्दों के अन्तर्गत विभाग होते समय उन सभी मुख्य छन्दों के अवाऽन्तर विभाग में अवान्तर विभक्त नामों के साथ ही साथ मुख्य छन्दों के नाम भी विशेष्य रूप में उपस्थापित किये गये हैं । इसका निरूपण पूर्व ग्रन्थ में किये जा चुके है । अतः पिष्टपेषण के भय से वहाँ से निवृत्त होकर प्रकाराऽन्तर से होने वाले मुख्य छन्दों के भेद का निर्देश किया जा रहा है— ( १ ) गायत्री - अष्टाऽक्षरों का एक पाद एवं तीन पादों से युक्त गायत्री छन्द हुआ करता है । अत एव कहा गया है कि ' गायत्री च त्रिपदैव ' = गायत्री तीन पादों से युक्त हुआ करती है । यद्यपि ' चतुर्भिरष्टाऽक्षरैरनुष्टुभमेव स्यात् ' अर्थात् आठ अक्षरों के चार पादों से युक्त छन्द अनुष्टुप् कहलाता है ( पि ० छ ० अ ०३ । सू ० २३ ) ऐसा पिङ्गलाऽऽचार्य का सामान्य नियम भी उपलब्ध होता है, तथाऽपि इसे भी गायत्री के अवाऽन्तर भेदों में ही अन्तर्भाव समझना चाहिए । ( २ ) उष्णिग् — उष्णिग् की विशेषता को व्यक्त करते हुए सूत्रकार इस प्रकार कहते हैं- ' गायत्त्रौ जागतश्च ' ( पि ० छ ० अ ० ३।सू ० १८ ) = आठ अक्षर वाले गायत्री के दो पाद और १२ अक्षर वाले जगती छन्द के एक पाद मिलकर उष्णिक् छन्द होता है । ( ३ ) अनुष्टुप् –अष्टाऽक्षर वाले गायत्री छन्द के चारपादो के संयोग से अनुष्टुप् छन्द व्यक्त होता है । इस विषय में सूत्र है - ' अनुष्टुव् गायत्रैः ' ( पि ० छ ० अ ०३ । सू ० २३ ) इति । ( ४ ) बृहती- -बारह अक्षरों वाले जगती छन्द का एक पाद और आठ अक्षरों वाले गायत्री छन्द के तीन पाद के मिलने पर ३६ अक्षरों वाले चार पाद सम्बन्धी छन्द बृहती के नाम से कही जाती हैं । इससे सम्बद्ध द्रष्टव्यपिङ्गलसूत्र है— ' बृहती जागतस्त्रयश्च गायत्राः । ' ( पि ० छ ० ३।२६ । ) अर्थात् जिस छन्द का एक पाद द्वादशाऽक्षर एवं तीन पाद अष्टाऽक्षर के रूप में उपलब्ध हो, वह बृहती नामक छन्द होता है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA