छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 131–140

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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भूमिका १२७ ६ + ६ = २४ ) चार पाद हों, उसे चतुष्पाद गायत्री कहा जाता है । यथा-इन्द्रः शचीपति - र्बलेन वीलितः । दुश्यवनो वृषा समत्सु सासहि । ( ऋ ० प्रा ० अ ०१६ सू ०१७ ) ( ११ ) नागी - जिस त्रिपदा गायत्री छन्द के आरम्भिक दो पादों में नौ - नौ अक्षर हों और तृतीयपाद में छः अक्षर आवे, वह गायत्री “ नागी गायत्री " कहलाती है । यथा-अग्ने॒ तम॒द्याश्वं॑ न स्तोमैः, क्रेतुं न भ॒द्रं ह॑दि॒ स्पृश॑म् ( २ ) । ऋ॒द्ध्यामा॑ त॒ ओर्हैः ( ३ ) । ( ऋ ० अ ०३ अ ०५ व ०१० मं ०१ ) इस छन्द का विधायक पिङ्गल सूत्र है- ' द्वौ नवकौषट्कश्च नागी ' ( पि ० छ ० ३।१२ ) | ( १२ ) वाराही - जिस गायत्री के प्रथमपाद में ( षड् ) = छ: अक्षर, तथा द्वितीय और तृतीयपादों में नौ - नौ अक्षर संख्या उपलब्ध हों, तो वह ( ६ + ९ + ९ = २४ ) चौबीस अक्षरों वाली त्रिपदा गायत्री वाराही कही जाती है । अर्थात् वराह = सूवर के आगे का मुख भाग जिस प्रकार से पतला एवं मध्य और पीछे का भाग जिस प्रकार मोटा होता है उसी प्रकार गायत्री के वाराही छन्द को जानना चाहिए । इसी प्रकार नागी नाम का भी अभिप्राय है । यहाँ पर भी नाग = सर्प का जिस प्रकार आगे के भाग मोटे होते हैं और पीछे का भाग पतला हुआ करता है उसी प्रकार प्रकृत में नागी छन्द के स्वरूप को भी आरम्भिक स्थल में दो पाद मोटा ( ९ + ९ ) और अन्तिम पतला ( + ६ ) होता है । द्र ० पि ० सू ० ' दौनवकौ षट्कश्च नागी ' ( ३।१२ ) ' विपरीता वाराही ' ( पि ० सू ० ३।१२ ) । वाराही का उदाहरण-वी॒ीत् स्तु॑के स्तुके ( १ ) यु॒वम॒स्मासु निय॑च्छतम् ( २ ) । प्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर ( ३ ) | ( तै ० आ ० प्रपा ० अ ०१ मं ०२० ) ( १३ ) यवमध्या - जिस छन्द के पादों में क्रमप्राप्त सात, दश, सात मिलकर चौबीस अक्षर ( ७ + १० + ७ = '२४ ) होते हैं, वह छन्द यवमध्या गायत्री के नाम से कही जाती है । इस नामनिर्देश का अभिप्राय यह है कि जौ के दाने जिस प्रकार से आदि और अन्त भाग में सूक्ष्म रहते हैं एवं मध्य में स्थूल हुआ करता है इसी प्रकार इस छन्द भी आदि एवम् अन्त का दो पाद तो न्यून संख्याक अक्षरों वाले होते हैं और मध्यपाद उन दोनों की अपेक्षा अधिक संख्या वाले अक्षरों का होता है । यथा ---स सु॑न्वे॒ यो वसू॑नां॒ ( १ ) यो रा॒या मा॑ने॒ता य इला॑नाम् ( २ ) । सोमो॒ यः सु॑क्षितीनाम् ( ३ ) ॥ ( ऋ ० ९ ।१०८।१३ ) CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 132

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१२८ छन्दः शास्त्रम् पिङ्गलछन्दः शास्त्र के अनुसार " यवमध्या " यह विशेषण उन सभी त्रिपाद छन्दों में प्रयुक्त होने योग्य है जिन छन्दों के आदि और अन्त के पादों की अक्षर संख्या न्यून हो और मध्यपाद की अक्षर संख्या अधिक हो । इसी अभिप्राय को प्रकाशित करने वाला पिङ्गलछन्द का सूत्र है— ' विपरीता यवमध्या ' ( पि ० सू ० ३।५८ ) । ( १४ ) पिपीलिका मध्या - जिस छन्द के पादाक्षरों की संख्या ( ८ + ३ + ८ = १ ९ ) हों, वह पिपीलिका मध्या गायत्री कहलाती है । पिपीलिका मध्या से अभिप्राय है कि जिस प्रकार पिपीलिका = चींटी के अग्रिम भाग एवम् अधः भाग तो मोटा = स्थूल होता है तथा मध्य भाग पतला होता है, इसी प्रकार जिस त्रिपदा गायत्री छन्द के आदि और अन्त पाद तो आठ - आठ अक्षरों वाले होते हैं, किन्तु मध्य पाद तीन अक्षरों का होता है । यथा— नृभि॑र्य॒मा॒नो ह॑र्य॒तो ( १ ) वि॑चक्ष॒णो ( २ ) । राजा॑ दे॒वः स॑मु॒द्रय॑ः ॥ ( ऋ ० अ ०७ अ ०५ व ०१५ मं ०१ ) विशेष – पिङ्गलछन्दः शास्त्राऽनुसार “ पिपीलिका मध्या " यह विशेषण उन सभी त्रिपाद छन्दों में प्रयुक्त हो सकता है जिन छन्दों के आदि और अन्त पादों में मध्य पाद की अपेक्षा अधिक अक्षर हों और मध्य पाद में अल्प अक्षर हो । इसका स्पष्टीकरण ' त्रिपादणिष्ठमध्या पिपीलिकामध्या ' ( पि ० छ ० सू ० ३।५७ | | ) इस सूत्राऽर्थ पर विचार किये जाने से सिद्ध होगा । ( १५ ) उष्णिग्गर्भा — जिस छन्द के तीनों पादों में क्रमश: ६ + ७ + ११ = २४ अक्षर उपलब्ध हों, उसे उष्णिग्गर्भा गायत्री कहते हैं । तामे अया॑नां॒ ( १ ) हरी॑णां नि॒तोश॑ना ( २ ) । उतो नु॒ कृ॒त्व्या॑नां नृ॒वाह॑सा ( ३ ) । ( ऋ ० सं ० ६।२।२५।३ ) ज्ञातव्य विचार — यह उदाहरण ऋक् प्रातिशाख्य के अनुसार प्रदर्शित किया गया है । इसके प्रथम पाद में ६ ( षड् ) अक्षर न होकर पाँच ही हैं । तथा तृतीय चरण में पुनः ग्यारह ( ११ ) अक्षर न होकर दश ( १० ) ही हैं । अतः यहाँ पर अक्षर संख्या की पूर्ति के लिए प्रथम पाद घटक “ श्या " के स्थान में सन्धिविच्छेदात्मकव्यूह की कल्पना करेंगें, तदनुसार “ श्वि + आ ' ' इस प्रकार से एकाऽक्षर अधिक का लाभ होकर छः संख्या की पूर्ति होगी । इसी प्रकार तृतीय पादस्थ “ कृत्व्या " में व्यूहभाव की कल्पना द्वारा “ कृत्वि आ ” की स्थिति में एकादश अक्षर संख्या की पूर्ति होगी । ( १६ ) भूरिग् गायत्री - जिस गायत्री छन्द में पादगत अक्षरों की संख्या क्रमशः आठ - दश एवं सात ( ८ + १० + ७ = ) के क्रम को प्राप्त करके ( = २५ ) की CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 133

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भूमिका १२ ९ संख्या में उपस्थित हों, वह गायत्री भूरिग्गायत्री कही जाती है । यथा— वि॒द्वांसा॒विदुर॑ः पृच्छेदा॒ ( १ ) अवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचेताः ( २ ) । नू चिन्नु मर्ते अर्को ( ३ ) । ( ऋ ० १।१२०।२ ) ज्ञातव्य तथ्य — ऋक्सर्वाऽनुक्रमणी में इस मन्त्र का छन्द " ककुबुष्णिक् " उपलब्ध होता है । सर्वाऽनुक्रमणी के व्याख्याकार षड्गुरुशिष्य ने लिखा है कि ब्राह्मण ग्रन्थ में इस ऋचा के भुरिग्गायत्री एवं ककुबुष्णिक् ये दोनों छन्द देखे जाते हैं । पिङ्गलछन्दः शास्त्राऽनुसार “ भुरिग् ” यह विशेषण केवल गायत्री में ही नहीं, अपितु उन सभी छन्दों में लग सकता है जिन छन्दों में पूर्णाऽक्षर से एक अक्षर की मात्रा अधिक उपलब्ध होगा । अतः “ भुरिग्गायत्री ” को एक स्वतन्त्र छन्द नहीं कहा जा सकता है । ( १७ ) पदपङ्क्ति - जिस छन्द के पाँच पाद हों और पाँचों पादों में पाँच - पाँच अक्षर हों, अर्थात् ( ५ + ५ + ५ + ५ + ५ = २५ ) पच्चीस अक्षर विद्यमान हों, वह छन्द पदपङ्कि गायत्री कहलाता है । घृ॒तं न पू॒तं त॒नुर॑रे॒पाः शुचि॒ हिर॑ण्यम् । तत्तै रुक्मो न रोचत स्वधावः ॥ ( ऋ ० ४।१०।६ ) पदपङ्क्ति का यह उदाहरण ऋक्प्रातिशाख्य अ ० १६ सू ०१ ९ में महर्षि शौनक के द्वारा प्रस्तुत किया गया है । किन्तु पिङ्गल छन्दः शास्त्र में पदपङ्क्ति को पङ्क्ति छन्द के अन्तर्गत माना गया है । एक दूसरा भी पदपङ्कि छन्द उपलब्ध होता है जिनके पाँच पादों में से तीन में पाँच-पाँच संख्या के अक्षर होते हैं, एवं शेष बचे एक में चार और अन्तिम पाद में छः अक्षर होते हैं । विशेष — इस द्वितीय पदपङ्गि की विशेषता यह है कि चार अक्षर वाला पाद अन्त पाद के समीप में ही रहे ऐसा कोई नियम नहीं है । अर्थात् चार अक्षर वाला पाद छन्द के आरम्भ में हो, द्वितीय पाद के स्थान में हो, तृतीय या चतुर्थ में से कहीं पर भी हो इसमें कोई नियम नहीं है, किन्तु छः अक्षरों वाला पाद प्राय: अन्त ( पञ्चमपाद स्थन ) में ही देखा जाता है । यथा-अधा॒ ह्य॑ग्ने॒ क्रतो॑र्भद्रस्य॒ दक्ष॑स्य सा॒धोः । र॒थी ऋतस्य॑ बृह॒तो ब॒भूथ ॥ ( ऋ ० ४।१०।२ ) एभिर्नो अ॒र्कैर् भवा॑ अर्वाङ् स्वर्ण ज्योति॑ः । भू ० छशी KSanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 134

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१३० छन्दः शास्त्रम् अग्ने॒ विश्वे॑भिः सु॒मना॒ अनी॑कैः ॥ ( ऋ ० ४।१०।३ ) उपर्युक्त उदाहरणों में से प्रथम मन्त्र के प्रथम चरण में, तथा द्वितीय मन्त्र के तृतीय पाद में चार - चार अक्षर हैं । ( १८ ) द्विपदा गायत्री - जिस छन्द में बारह - बारह ( १२ + १२ = २४ ) अक्षरों के दो पाद मिलते हों, वह छन्द द्विपदा गायत्री कहलाती है । इसका निर्देश ऋक्प्रातिशाख्य में मिलता है । तदनुसार उदाहरण है— सनो॒ वाजे॑ष्ववि॒ता पु॑रू॒वसु॑ः पुरस्था॒ता म॒घवा॑ वृत्र॒हा भु॑वत् । ( ऋ ० ८।४६ । १३ ) विशेष — यहाँ पर ऋक्प्रातिशाख्य के अनुसार पूर्वपाद “ पुरुवसुः ” तक समझना चाहिए । पूर्व पाद में बारह अक्षरों की पूर्ति " वाजेष्वविता " घटक ष्व में सन्ध्यभावाऽऽत्मक व्यूहभाव की कल्पना करके वाजेषु + अविता के रूप में जानना चाहिए । ( २० ) द्विपाद् विराट् — जिस छन्द में क्रमश: १२ + ८ = २० अक्षरों वाले दो पाद रहते हों, वह छन्द द्विपाद् विराट् गायत्री के नाम से कही जाती है । यथा— नृभि॑र्य॒मा॒नो ह॑र्य॒तो विचक्षणो ( १ ) । राजा देवः समुद्रियः ( २ ) । ( ऋ ० ९ ।१०७।१६ ) इस छन्द पर पिङ्गलछन्दः शास्त्र में प्रकाश डाला गया है । अतः जिज्ञासुओं को वहाँ का ग्रन्थ देखना चाहिए । ( २१ ) एकपदा - जिसमें आठ अक्षरों वाला एक ही पाद उपलब्ध हो, वह एकपदा गायत्री के नाम से जानी जाती है । यथा— भ॒द्रं॑ नो॒ अपि॑ वातय । ( ऋ ० १०।२०।१ ) इसी प्रकार द्विपदा गायत्री, जम्बूका द्विपदा गायत्री आदि भी उपलब्ध होते हैं, जिसके अनुसार वैदिक छन्दों के ग्रन्थों में गायत्री छन्द के लगभग ( २६ ) छब्बीस भेद उपलब्ध होते हैं । ( 2 ) उष्णिक् छन्द के भेदों का संक्षेप में सोदाहरण प्रदर्शन उष्णिक् छन्द में सामान्य रूप से तीन पाद और अठाईस ( २८ ) अक्षर हुआ र हैं । गायत्री के समान तीन पाद वाला होने के उपरान्त भी यहाँ पर गायत्री छन्द की अपेक्षा चार अक्षर अधिक पाए जाते हैं । इस छन्द का “ उष्णिक् ” यह नाम औपमिक ( = उपमा के आधार पर सिद्ध होता ) है । उष्णिक् शिरोवेष्टन = पगड़ी को कहा जाता है जो से ही आते हुए मनुष्यों के ऊपर सबसे पहिले दिखायी देता है । अतः जिस प्रकार आने वाले CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 135

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भूमिका १३१ मनुष्यों के शिरो भाग में सबसे पूर्व में उष्णिक् = पगड़ी दिखायी देता है, उसी प्रकार गायत्री से चार अक्षर बढे हुए होने से गायत्री की अपेक्षा उच्च स्वरूप में यह छन्द दृष्टि वा श्रुतिगोचर हुआ करता है । गायत्री से बढे हुए चार अक्षर प्रायः अन्त पाद में होते हैं । इसी लिए पिङ्गलछन्दः शास्त्र में इसे " परोष्णिक् " नाम से ही पुकारा गया है । कहीं - कहीं आदि और मध्य के पादों में अक्षर संख्या की वृद्धि देखने को मिलती है । ये बढे हुए चार अक्षर जिस पाद में उपलब्ध होते हैं वह पाद अन्य पादों की अपेक्षा बड़ा होने के कारण स्पष्ट रीति से इतर विलक्षण रूप से ज्ञात हुआ करता है । इस प्रकार गायत्री छन्द की अपेक्षा चार अक्षरों की संख्या जिस पाद में हुआ करते हैं उसी पाद के भेद प्रयुक्त भेदप्रधानरूप छन्द पर प्रभावित होता है । यथा - अठाईस अक्षर संख्या वाला ककुप् उष्णिक् । जिसका लक्षण इस प्रकार है- ( ककुप्उष्णिक ) - जिस छन्द के मध्य में बारह ( १२ ) अक्षरों वाला पाद हों तथा आदि एवम् अन्त के पादों में आठ - आठ अक्षर विद्यमान हो अर्थात् ( ८ + १२ + ८ = २८ ) वह छन्द विद्यमान ककुबुष्णिग् नाम वाला होता है । उदाहण— युष्माकं स्मा रथ अनुं मुदे द॑धे मरुतो जीरदानवः । वृ॒ष्टी द्यावो॑ य॒तीरि॑वा ॥ ( ऋ ० ५।५३।५ ) ( २ ) पुर उष्णिक् — जिस छन्द में क्रमशः ७ + ५ + ८ + ८ = २८ पदाक्षर हों, वह छन्द पुर उष्णिक् कहलाता है । यथा— तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं शुक्रमुच्च॑रत् । पश्ये॑म श॒रद॑ः श॒तं जीवे॑म श॒रद॑ः श॒तम् ॥ ( ऋ ० ६६।१६ ) ( ३ ) परोष्णिक् — जिस छन्द में पादाऽक्षरों की संख्या क्रमशः ( ८ + ८ + १२ = २८ ) आठ - आठ एवं बारह हो, वह परोष्णिक् के नाम से कहा जाता है । यथा— अग्ने॒ वाज॑स्य॒ गोम॑त॒, ईशा॑नः सहसो यहो । अ॒स्मै॑ धे॑हि जातवेदो महिश्रर्वः ॥ ( ऋ ० १।७ ९ ।४ ) ( ६ ) चतुष्पाद अनुष्टुप् - पाद- ४-८ + ८ + ८ + ८ अक्षर- ३२ ) जिस अनुष्टुप् में चार पाद हों और प्रत्येक पाद में आठ - आठ अक्षरों की संख्या हों वह छन्द चतुष्पाद् अनुष्टुप् के नाम से कहा जाता है । यथा— ततो विराडजायत, विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत, पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ ( शु ० य ० अ ०३१ मं ०५ ) ( ७ ) मध्ये ज्योतिः ( पिपीलिका मध्या ) त्रिपाद - १२ + ८ + १२ = १२॥ जिस CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 136

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१३२ छन्दः शास्त्रम् त्रिपाद् छन्द के प्रत्येक पाद में क्रमश: बारह, आठ एवं पुनः बारह संख्या वाले अक्षर हों तो वह त्रिपाद् छन्द मध्ये ज्योति: अनुष्टुप् कहा जाता है । इस छन्द को ऋक्प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वाऽनुक्रमणी एवं वेङ्कट कृत छन्दोऽनुक्रमणिका नामक ग्रन्थ में “ पिपीलिकामध्या अनुष्टुप् के नाम से कहा गया हैं किन्तु पतञ्जलिकृत निदान सूत्र में भी इस को पिपीलिकामध्या अनुष्टुप् के नाम से संकेतित करके वहृचों के मत में " मध्येज्योतिः ” नाम दर्शाया गया है । किन्तु पिङ्गलछन्द में तो यह त्रिपाद नाम से निर्दिष्ट हुआ है । इसका उदाहरण है— पर्युषु प्रध॑न्व॒ वाज॑सातये॒ परिवृ॒त्राणि॑ स॒क्षणि॑ः । द्वि॒षस्त॒रध्या ऋण॒या ने ईयसे ॥ ( ऋ ० ९ ।११०।१ ) उपरिष्टाज्ज्योतिः ( कृतिः ) पाद- ३, अ ० सं०- १२ + १२ + ८ = ३२ – जिस छन्द के तीनों पादों में क्रमश: बारह, बारह और आठ संख्याओं के अक्षर हों, वह उपरिष्टात् ज्योति नामक अनुष्टुप् छन्द कहलाता है । यह बात पतञ्जलिकृत निदानसूत्र एवम् उपनिदान के मताऽनुसार व्यक्त की गयी है । ऋक्प्रातिशाख्य, एवम् ऋक्सर्वाऽनुक्रमणिका आदि ग्रन्थों में इस छन्द को " कृतिअनुष्टुप् ” के नाम से कहा गया है । और इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं-मा कस्मै॑ धात॒मभ्य॑मत्रिणे॑ नो॒ मा कुत्रा॑ नो गृहेभ्यो॑ धे॒नवो गुः । स्त॒ना॒ भुजो॒ अश॑श्वी ॥ ( ऋ ० १।१२०।८ ) यद्यपि इस उदाहरण के तीनों ही पादों में एक - एक मात्रा की कमी है, तथाऽपि उनकी पूर्ति व्यूह द्वारा करने योग्य है । तीनों पादों में मात्रा की क्षतिपूर्ति क्रमश: इस प्रकार की जाती है । प्रथम पाद के मभ्य के स्थान में " मभिय " के रूप में दूसरा " धेनवो ” के स्थान में “ प्रधेववो ” प्र उपसर्ग की वृद्धि करके, तथा अन्तिम पाद " अशिश्वी ” " के स्थान में " अशिशुवी: " का व्यूहन करके । ( ९ ) विराट् अनुष्टुप् — जिस छन्द के प्रत्येक पादों में दश - दश अक्षरों की संख्या हो, ( १० + १० + १० = ३० ) वह " विराट् अनुष्टुप् " कहा जाता है । यह बात ऋक्प्राति-शाख्य, ऋग्वेदाऽनुक्रमणिका आदि ग्रन्थों में वर्णित है । इसका उदारण देखिए-श्रुधी हवं॑ विपिपा॒न स्याद्रेर् बोधा विप्र॒स्यार्चतो मनी॒षाम् । कृ॒ष्वा दु॒वा॑स्यन्त॑मा॒ सचे॒मा ॥ ( ऋ ० ७१।२२।४ ) ( १० ) महापदपङ्क्ति अनुष्टुप् ( षट्पदा - अक्षरसंख्या- ३१ ) - जिस छन्द में छः पाद हों, एवम् आरम्भ के पाँच पादों में पाँच - पाँच अक्षरों की संख्या हों, तथा अन्तिम पाद में छ: अक्षर उपलब्ध हों, तो वह छन्द महापदपति के नाम से कहा जाता है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation US /

पृष्ठ 137

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भूमिका १३३ यथा-तव॒ स्वादि॒ष्ठाऽग्ने॒ संदृष्टि - रि॒दा चि॒दह॑ इ॒दा चि॑द॒क्तोः । श्रिये रुक्मो न रोचत उपाके ॥ ( ऋ ० ४।१०।१५ ) विशेष - द्वितीय पाद में यहाँ पर चार अक्षर ही ज्ञात होते हैं अतः व्यूह भाव का आश्रयण करके " ऽग्नेसंदृष्टि " के घटक ऽग्ने के सन्धिविच्छेदाऽऽत्महव्यूह के आश्रयण से " अग्ने " ऐसा एकमात्रिक अधिक अक्षर को लाकर पञ्चाऽक्षर की पूर्ति की जानी चाहिए । ( ४ ) बृहती छन्द - बृहती छन्द में बत्तीस अक्षर ( ३२ ) वाले अनुष्टुप् छन्द से अक्षरों की चार संख्या अधिक हुआ करती है । तदनुसार बृहती छन्द छत्तीस अक्षर संख्या वाले ( १२ + ८ + ८ + ८ = ३६ ) प्रायः चारपाद होते हैं । इस विषय में पिङ्गल ऋक्प्रातिशाख्य निदानसूत्र आदि सभी एकमत हैं । पाद संख्या एवं पादगत अक्षर संख्या के न्यूनाऽधिक अक्षर भावप्रयुक्त विविध प्रकार के अवान्तर भेद भी होते हैं । इस विषय में भी किसी छन्दः शास्त्रप्रर्वत्तक आचार्यो में मतभेद नही हैं । प्रकृतछन्द का उदाहरण-यत्स्वा सुशिप्र हरिवस्तदीमहे त्वे आभूषन्ति वेधसः । तव श्रवापपमान्युक्थ्या सुतेष्विन्द्र गिर्वणः ॥ ( ऋ ० ६।७ व ०३ मं ०२ ) विशेष - प्रकृतछन्द के पादों में अक्षरों की न्यूनाधिक भाव उपस्थित होने की स्थिति में जो अवाऽन्तर भेद होते हैं, उन भेदों का अति संक्षेप में दिग् दर्शन कराया जाता है । पथ्या बृहती ( चारपाद, अक्षरसंख्या ८ + ८ + १२ + ८ = ३६ ) - जिस छन्द के चारों पादों में आठ - आठ, बारह एवं आठ अक्षर संख्या के क्रम में कुल छत्तीस अक्षर हों, वह छन्द पथ्याबृहती कही जाती है । यह सिद्धान्त पिङ्गलसूत्र, निदानसूत्र, उपनिदानसूत्र, जयदेव छन्द आदि छन्दः शास्त्र निर्माताओं को मान्य है । यथा-कदाचन स्तरीसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे । उपा॑पेन्नु म॑घव॒न् भूय॒ इन्नु ते॒ दाने॑ दे॒वस्य॑ पृच्यते ॥ ( यजुर्वे ० ३।३४ ) उपनिदान सूत्र में इसका “ सिद्धा " ऐसा नामाऽन्तर भी उपलब्ध होता है । पुनः निदान सूत्रकार इस छन्द को " स्कन्धोग्रीवी " नाम से निर्देश किया है । ऋक्सर्वाऽ-नुक्रमणीकार उपर्युक्त नाम से भिन्न इसे " बृहती ” नाम से स्मरण किया है । इत्यादि अन्य बातें अन्याऽन्य ग्रन्थों से अध्ययन द्वारा जानी जा सकती हैं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 138

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१३४ छन्दः शास्त्रम् न्यसारिणी ( पादचार अक्षर संख्या ८ + १२ + ८ + ८ = ३६ ) – - जिस छन्द के चारों पादों में क्रमशः आठ, बारह, आठ, आठ संख्या में पादाक्षर उपलब्ध हो, वह ‘ “ उरोबृहती ” ‘ “ स्कन्धोग्रीवीबृहती ” " न्यङ्कुसारिणी बृहती " इन तीन प्रकार के नामों से शास्त्रकारों द्वारा स्मरण किया जाता है । यथा-मत्यपा॑यि ते॒ मह॒ पात्रेस्थेव हरिवो मत्स॒रो मद॑ः । वृषा॑ ते॒ वृष्ण॒ इन्द्र॑र वा॒जी सहस्त्रसात॑मः ॥ ( ऋ ० १ । १७५ ।१ ) ऋग्वेदप्रातिशाख्य में शौनक द्वारा निर्दिष्ट इस उदाहरण के प्रथम और तृतीय पाद में दो - दो अक्षर न्यून हैं । पिङ्गलछन्द अ ०३ सू ०२ ९ -३० से यह विदित होता है कि-‘ “ स्कन्धोग्रीवी ” यह क्रौष्टुकि आचार्य के मत में है । तथा " उरोबृहती ” यह नाम निरुक्तकार यास्क के अनुसार निर्दिष्ट हुआ है । किन्तु उक्त दोनों आचार्यों ने यह बात अपने जिस छन्द: शास्त्र में प्रकट किये थे, वे छन्दग्रन्थ इदानीम् अनुपलब्ध हैं । ' महाबृहती ( पाद -३ अक्षर संख्या १२ + १२ + १२ = ३६ ) - जिस छन्द में बारह - बारह - बारह अक्षर के तीन पाद हों, वह छन्द महाबृहती कहलाता है । महर्षि पिङ्गल और गार्ग्य तो इसे सतोबृहती या महाबृहती कहते हैं, किन्तु ऋक्सर्वाऽनुक्रमणी ग्रन्थ में इसे “ ऊर्ध्व बृहती ” यह नाम दिया गया है । ऋक्प्रातिशाख्य और वेङ्कट की छन्दोऽनुक्रमणिका ग्रन्थ में " विराड् ऊर्ध्वबृहती ” नाम दिया गया है । और पतञ्जलिकृत निदानसूत्र में यह छन्द " त्रिपदाबृहती ” के नाम से निर्दिष्ट हुआ है । प्रकृत छन्द का उदाहरण-अध॒ अदि॒मे॑ पवमान॒ रोद॑सी, इ॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒भं म॒ज्मना॑ । यूथे न नि॒ष्ठ वृ॑ष॒भो वि तिष्ठसे ॥ ( ऋ ० ९।११०।९ ) इसके अतिरिक्त बृहती छन्द के और भी भूरिग् बृहती, पुरस्ताद् बृहती, उरोबृहती, उपरिष्टाद्बृहती, विष्टार बृहती, विषमपदा बृहती, आदि अनेक भेद छन्दः शास्त्रों में उपलब्ध होते हैं । पंक्तिछन्द और उसके भेद का वर्णन तदन्तर्गत प्रकृत छन्द के स्वरूप का निर्धारण - बृहती छन्द में सामान्य रूप से छत्तीस ( ३६ ) अक्षरों का होना छन्द शास्त्र के उपदेश द्वारा स्वीकार किया गया है । इस छन्दाऽक्षरों में चार अक्षरों की वृद्धि होने पर अर्थात् चालीस ( ४० ) की अक्षर संख्या होने की स्थिति में पङ्क्ति छन्द हो जाता है । इस छन्द की पाद संख्या सामान्य रूप से चार संख्या में होती है । यदा - कदा यहाँ न्यूनाऽधिकपाद भी उपलब्ध होता है । पति शब्द की व्युत्पति से पाँच पादों के समाहार का नाम पङ्क्ति नाम से अभिहित होता है । अत: CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 139

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भूमिका १३५ जिस छन्द में पाँच पाद उपलब्ध हों, वही छन्द पङ्क्ति कहलाने योग्य हुआ करता है । परन्तु वेद में पञ्चपदा पङ्क्ति छन्द की बहुत कम उपलब्धि होती है । पति छन्दः का उदाहरण -- ( चार पाद, अक्षरसंख्या ४० अ॒ग्निना॑ तु॒र्वशं यदुं परा॒वत॑ उ॒ग्रादे॑वं हवामहे । अ॒ग्निर्नयन्नव॑वास्त्वं बृ॒हद्रथं तुर्वीति॒ दस्य॑वे॒ सह॑ः ॥ ( ऋ ० १।३६।१८ ) यहाँ पर चार पाद हैं और प्रत्येक पाद में अक्षरों की संख्या क्रमशः इस प्रकार है-बारह - आठ पुनः बारह - आठ ( = १२ + ८ + १२ + ८ = ४० ) । " नहि निर्विशेषं सामान्यं भवति " तथा " अवश्यमेव सामान्यं विशेषं प्रतिगच्छति " इन दोनों प्रकार के लौकिक न्याय के अनुसार प्रकृत छन्द की विशेषता की जिज्ञासा में इस उदाहरण का सतः पङ्कि में विश्राम होता है; क्योंकि सतः पङ्गि छन्द के चारों पादों की अक्षर संख्या क्रमशः - बारह - आठ - बारह - आठ ( = १२ + ८ + १२ + ८ = ४० ) मिलकर चालिस ही हुआ करती है । पङ्कि भेद का विवरण - पति छन्द का भेद छन्दः शास्त्राऽनुसार इस प्रकार है-सतः पङ्क्ति, सतो बृहती, सिद्धा, विष्टार, सिद्धा विष्टार, इत्यादि । जिसमें से सामान्य रूप से प्रदर्शित पङ्कि छन्द का उदाहरण विशेषाऽऽकाङ्क्षा में सतः पति या सतोबृहती के रूप में पर्यवसित हुआ, अब शेष बचे पति विशेष में से कुछ परिगणितों के स्वरूप एवं लक्षणों का दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है— सतः पङ्कि विपरीता, सिद्धा, या विष्टार - जिस छन्द में क्रमशः ८ + १२ + ८ + १२ = ४० मिलकर चालिस की अक्षर संख्या हो, वह संतः पङ्गि विपरीता पङ्कि कहलाता है । यह बात ऋक्प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वाऽनुक्रमणिका, निदानसूत्र, आदि छन्दः शास्त्रों में कही गयी है । किन्तु पिङ्गलसूत्र, जयदेवकृत छन्दः शास्त्र आदि में इस विपरीता पङ्क्ति को भी सतः पङ्क्ति ही कहा गया है । उपनिदान में इसे सिद्धा पति एवं विष्टारपङ्कि का नाम दिया गया है । उदाहरण-य ऋप्वः श्रावयत् सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः । तं विश्वे मानुषा युगेन्द्रं हवन्ते तविषं यजस्स्रुचः ॥ ( ऋ ० ८।४६।१२ ) उपनिदानसूत्र में तण्डी के मतानुसार प्रस्तुत उदाहरण और इसके पूर्व में प्रदर्शित मन्त्र विष्टारपङ्कि के नाम से कहा गया है । अस्तार पङ्गि - जिस पङ्क्ति छन्द के चारों पादों में पादाऽक्षरों की संख्या क्रमश: -८ + ८ + १२ + १२ = ४० हो, वह पङ्कि छन्द विशेष " आस्तार पङ्गि ” " के नाम से कहा जाता है । यह बात पिङ्गल सूत्र, ऋक्प्रातिशाख्य ऋक्सर्वाऽनुक्रमणिका, उपनिदानसूत्र, CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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१३६ छन्दः शास्त्रम् जयदेवकृत छन्दः शास्त्र आदि में कही गयी है । प्रकृत छन्दका उदाहरण यथा— भ॒द्रं॑ नो॒ अपि॑ वातय॒ " मनो॒दक्ष॑मु॒त क्रतु॑म् । अधा॑त स॒ख्ये अन्ध॑सो वि वो॒ मदे॒ रण॒न् गावो॒ न यव॑से॒ विव॑क्षसे ॥ ( ऋ ० १०।२५।१ ) प्रस्तारपङ्कि – जिस पङ्गि छन्द में क्रमशः - ( १२ + १२ + ८ + ८ = ४० ) अक्षरसंख्या वाले चारपाद विद्यमान हों, वह प्रस्तार पङ्कि छन्द कहलाता है । इस विषय का प्रतिपादन पिङ्गलसूत्र, ऋक्प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वाऽनुक्रमणी, निदानसूत्र, उपनिदानसूत्र आदि ग्रन्थों में किया गया है । प्रकृत छन्द का उदाहरण है, यथा— भ॒द्रमिद् भ॒द्रा कृ॒णव॒त् सर॑स्व॒ त्यक॑वारी चेतति वा॒जिनीव॑ती । गृ॒णा॒ना ज॑मदग्न॒िवत् स्तु॑वा॒ना च॑ वशिष्ठ॒वत् ॥ ( ऋ ० ७।९ ६।३ ) टिप्पणी- यहाँ पर द्वितीय पाद में श्रूयमाण अक्षरों की संख्या बारह न होकर ग्यारह है । अतः सन्धिविच्छेदाऽऽत्मक व्यूहभाव की कल्पना द्वारा अर्थात् सरस्वती + अकवारी " इस प्रकार से यण् सन्धि के अभाव द्वारा अक्षरों की पूर्ति समझनी चाहिए । विष्टारपङ्कि — जिस पङ्कि छन्द के चारों पादों में क्रमशः -८ + १२ + १२ + ८ = ४० अक्षरों हो, वह विष्टारपङ्कि छन्द कहलाता है । इसका विवेचन ऋक्प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वाऽनुक्रमणिका, निदानसूत्र, उपनिदानसूत्र, जयदेवकृत छन्दः सूत्र आदि ग्रन्थों में उपलब्ध होता है । इसका उदाहरण-अग्ने॒ तव॒नवो॒ वयो॒ महि॑भ्राजन्ते अ॒र्चयो॑ विभावसो । बृहद्भानो॒ शव॑सा॒ वाज॑मुक्थ्यं? दधा॑सि दा॒शुषे॑ कवे ॥ ( ऋ ० १०।१४०।१ ) ध्यातव्य - इस मन्त्र के तृतीय पाद में " उक्थ्यं " यहाँ पर सन्ध्यभावाऽऽत्मक व्यूह द्वारा ग्यारह अक्षर से बढकर बारह अक्षर का सम्पादन होता है । अक्षरपति – ( पाद -४, अक्षर संख्या- ५ + ५ + ५ + ५ = २० ) – जिस पङ्कि छन्द में चारपाद और प्रत्येक पाद में पाँच - पाँच की संख्या में अक्षर विराजमान हो, वह पङ्गि छन्द विशेष पिङ्गल एवम् उपनिदानसूत्र, ये दोनों अक्षर पङ्गि कहलाते हैं, तथा निदानसून में उसे “ चतुष्पदा अक्षरा पङ्घि " के नाम से कहा गया है । यथा— प॒श्वा न ता॒युं गुहा॒ चर्तन्तम् । नमो॒ युजा॒नं नमो॒ वह॑न्तम् ॥ ( ऋ ० १।६५ । १ ) विशेष वक्तव्य - महर्षि कात्यायन के अनुसार यह छन्द “ द्विपदा विराट् पङ्कि ” CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA