छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 141–150

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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भूमिका १३७ के नाम से कहा जाता है । अतः उनके मत में " चतन्तम् " के आगे खरी पायी को दिया जाना अनुपयुक्त होगा । विराट् पङ्गि ( पाद -४ प्रतिपाद में अक्षर संख्या - १० + १० + १० + १० = ४० ) - जिस पनि छन्द में दश ( १० ) अक्षर संख्याओं में प्रत्येक पादों की उपलब्धि होती हो वह छन्द विशेष अक्षर पङ्गि कहा जाता है । यथा-मन्ये॑ त्वा य॒ज्ञिय॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मन्ये॑ त्वा॒ च्य॑वन॒मच्यु॑तानाम । मन्ये॑ त्वा॒ सत्व॑नामिन्द्र के॒तुं मन्ये॑ त्वा वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम् ॥ ( ऋ०८।९ ६।४ ) त्रिष्टुप् छन्द ( पाद -४ अक्षरसंख्या- ११ + ११ + ११ + ११ = ४४ ) – त्रिष्टुप् छन्द में पङ्किकी अपेक्षा प्रत्येकपाद में एक - एक अक्षरसंख्या की अधिकता रहती है, जिसके कारण चालिस ( ४० ) अक्षर से बढ़कर चौवालिस की संख्या में यहाँ अक्षर होते हैं । सामान्य रूप से यद्यपि इस छन्द के चार पाद एवं प्रत्येक पादगत ग्यारह ग्यारह अक्षर हुआ करते हैं । किन्तु पाद और अक्षर संख्या की न्यूनाधिक भाव में प्रकृत छन्द के अनेक भेद भी सिद्ध होते हैं । त्रिष्टुप् सामान्य का उदाहरण—

पिबा॒ सोम॑म॒भि यमु॑ग्र॒ तद॑ ऊ॒र्वं गव्यं॒ महि॑ गृणा॒न इन्द्र ।

वि यो धृष्णो॒ वर्ध॑षो वज्रहस्त, विश्वा॑ वृ॒त्रम॑मित्रियां शर्वोभिः ॥

( ऋ ० ६ । १७।१ ) टिप्पणी — त्रिष्टुप् सामान्य होने पर भी विशेष कोटी में ही इसका पर्यवसान हुआ करता है । तदनुसार यह छन्द " चतुष्पदात्रिष्टुप् ” में ही विश्राम करता है । अभिसारिणी त्रिष्टुप् ( पाद - ४ - प्रतिपाद अक्षर संख्या- १० + १० + १२ + १२ = ४४। ) – जिस त्रिष्टुप् छन्द में चार पाद और प्रति पाद में क्रमिक रूप से दश-दश तथा बारह - बारह की संख्या में अक्षर वर्त्तमान हो, वह " अभिसारिणी त्रिष्टुप् ” कहा जाता है । यह बात ऋक्प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वाऽनुक्रमणिका आदि ग्रन्थों में बतलायी गयी

है । यथा-यो वाचा विवाचो मृध्रवाचः, पुरूसहस्त्राशिवा जघान ।

तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसि, पितेव यस्तविषीं वावृधे शवः ॥

( ऋ ० १०।२३।५ ) टिप्पणी- इस उदाहृतमन्त्र के तृतीय पाद में नियमाऽनुसार बारह अक्षर न होकर केवल ग्यारह ( ११ ) अक्षर ही है । अतः यहाँ पर व्यूहभाव के सहारे बारह अक्षरों की CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 142

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१३८ छन्दः शास्त्रम् पूर्ति हुआ करती है । विराट्स्थाना त्रिष्टुप् ( पाद - चार प्रतिपाद अक्षरसंख्या - १+ ९ + १० + ११ = ३ ९ ) – . जिस छन्द के प्रत्येक पादों में क्रमिकरूप से नौ - नौ - दश एवं ग्यारह संख्या के अक्षरों की उपस्थिति होती हो, वह विराट्स्थानात्रिष्टुप् कहलाती है । यथा-स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृद्धभ॑वाः, स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः । स्व॒स्ति नस्तार्क्ष्यो अरि॑ष्टनेमिः, स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑ दधातु ॥ ( ऋ ० १।८ ९ ।६ ) विराट्स्थाना त्रिष्टुप् वेङ्कटमाधव द्वारा स्वविरचित छन्दः शास्त्र में दर्शाया गया है । इस उदाहरण के चतुर्थपाद में ग्यारह अक्षरों के स्थान में दश ही उपलब्ध होते हैं । अतः व्यूहभाव के द्वारा अक्षर पूर्ति होगी । महाबृहती पञ्चपदा ( पाद - पाँच, प्रतिपाद अक्षर सङ्ख्या - १२ + ८ + ८ + ८ + ८ = ४४ ) — जिस त्रिष्टुप् छन्द में पाँच पाद और आरम्भिक पाद में बारह तथा शेष चार पादों में आठ - आठ की सङ्ख्या में अक्षर विराजमान हो, तो वह महाबृहती त्रिष्टुप् के नाम से कहलाती है । यथा—

न॒मा॒ वा॒के प्रस्थि॑ते॒ अ॒ध्व॒रे न॑रा, विवक्षि॑णस्य प्रा॒तये ।

आया॑तमश्विनाग॑तम् अव॒स्युव॑म॒हं हु॑वे, धत्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे ॥

( ऋ ० ८।३५।२३ ) मध्ये ज्योतिः ( पाद - पाँच - प्रतिपाद क्रमशः अक्षर संख्या ८ + ८ + ११ + ८ + ८ = ४३ ) —जिस त्रिष्टुप् के पाँच पाद और प्रतिपाद में क्रमशः आठ - आठ - ग्यारह, पुनः आठ - आठ की संख्या में अक्षर उपलब्ध हो, वह छन्द मध्येज्योतिः त्रिष्टुप् कहलाता है । यथा-बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभिः॑ शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑ । भ॒रद्वाजै समिधा॒नो य॑विष्ठ्य, रे॒वन्न॑ शुक्र दीदिहि, द्यु॒मत् पावक दीदिहि ॥ ( ऋ ० ६।४८।७ ) विशेष- महर्षि शौनक इस छन्द को " यवमध्या " के नाम से अभिधान करते हैं । उपरिष्टाज्ज्योति त्रिष्टुप् ( पाद - पाँच प्रतिपाद सं ० क्रमशः ८ + ८ + ८ + ८ + ११ = ४३ ) - जिस त्रिष्टुप् छन्द के पाँच एवं पाँचों पादों में क्रमशः आठ - आठ - आठ-आठ एवं ग्यारह की संख्या में अक्षर विद्यमान हो तो, वह “ उपरिष्टाज्योतिः त्रिष्टुप् ” कहलाता है । यथा-CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammimu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 143

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भूमिका १३ ९ संवेशनी सं यामिनीं, ग्रहनक्षत्रमालिनीम् ।

प्रपन्नोऽहं शिवां रात्री, भद्रे पारमशीमहि ।

भद्रे पारमशीमह्यों नमः ॥

( ऋ ० १०।१२७ के अनन्तर खिलपाठ रात्रि सू ० ११ ) विराट् पूर्वा त्रिष्टुप् पञ्चपदा ( १० + १० + ८ + ८ + ८ = ४४ ) – जिस छन्द में चौवालिस अक्षरों वाला पाँच पाद हों, वह विराट् पूर्वा त्रिष्टुप् के नाम से कहा जाता

है । यथा-एवेन्द्राऽग्निभ्यामहा विहव्यं शूष्यं धृतं न पूतमद्रिभिः ।

ता सूरिषु श्रवो बृहद्, रयिं गृणत्सु दिधृतम्, इषं गृणत्सुं दिधृतम् ॥

( ऋ ० ५।८६।६ ) जगती छन्द ( पाद- ४ अ ० सं०-१२ + १२ + १२ + १२ ) - जगती छन्द में चार पाद और चौवालिस ( ४४ ) अक्षर वाले त्रिष्टुप् छन्द से चार अक्षर अधिक जुड़कर अड़तालिस अक्षर होते हैं । तदनुसार प्रकृत छन्द में प्राय: बारह - बारह अक्षरों वाले पाद होते हैं और पादों की संख्या भी लगभग चार ही होते हैं । किन्तु पाद और अक्षरों के न्यूनाऽधिक भाव की स्थिति में इस छन्द के विविध भेद होते हैं । प्रकृत छन्द का उदाहरण यथा—

जन॑स्य गो॒पा अ॑जनिष्ट॒ जागृ॑विर् अ॒ग्निः सु॒दक्षि॑ः सु॒विताय॒ नव्य॑से ।

धृतप्र॑तीको बृह॒ता दि॑वि॒स्पृशो॑ द्यु॒मत् विभा॑ति भ॒रतेभ्य॒ः शुचि॑ः ॥

( ऋ ० ५।११।१ ) जगती छन्द के भेदों के अन्तर्गत होने वालों का प्रदर्शन उपजगती - जिस जगती छन्द में आरम्भ के दो पाद बारह - बारह अक्षरों वाले हों, तथा उत्तरार्द्ध के दो पाद ग्यारह ग्यारह अक्षरों के हों ( १२ + १२ + ११ + ११ = ४६ ), तो उस छन्द को उपजगती के नाम से कहा जाता है । यथा—

यस्मै॑ त्वमा॒यज॑से॒ स सा॑धत्य, न॒र्वा क्षैति दध॑ते सु॒वीर्य॑म् ।

स तू॒ताव॒ नैन॑म॒श्नोत्यं हूतिर् अग्ने सख्ये मा रि॑िषामा वयं॒ तव॑ ॥

( ऋ ० १।९ ४।२ ) टिप्पणी-- प्रकृत उदाहरण गत प्रथम पाद में जहाँ ग्यारह अक्षर होने चाहिए थे वहाँ पर दश अक्षर हैं, अतः यहाँ व्यूहभाव ( = सन्धि विच्छेद ) से क्षति पूर्ति की जानी चाहिए । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 144

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१४० छन्दः शास्त्रम् मध्ये ज्योतिः जगती ( पादसंख्या -५, अ ० सं०-८ + ८ + १२ + ८ + ८ = ४४ ) – जिस जगती में पादों की स्थिति क्रमशः आठ - आठ बाहर - आठ एवम् आठ की अक्षरों में वर्त्तमान हो, वह छन्द मध्ये ज्योति जगती कहलाती है । यथा-यन्ते॒ नोक्तं॒ तद् र॑मतां शकैयं॒ यद॑नु॒ वै । निशा॑तं॒ नि शा॑महे॒ महि॑ व्र॒तं स॒ह व्र॒तेषु॑ भूयास॒म् ॥ ब्रह्म॑णा॒ सं गमेमहि ॥ ( ऋ ० १०।१५१ परिशिष्ट- ४ ) , टिप्पणी- उपर्युक्त मन्त्र और मन्त्रगत पाद- विभाग की व्यवस्था पिङ्गलसूत्र के व्याख्याता वेणीराम गौण द्वारा निर्दिष्ट है । महा पति जगती ( पाद प्रतिपाद अक्षर सं०-८ + ८ + ७ + ६ + १० + ९ = ४८ ) जिस जगती छन्द के प्रतिपाद में क्रमश: - आठ - आठ - सात - छः- दश एवं नौ अक्षर वर्तमान हों, वह " महापङ्कि जगती " कहलाती है । यथा-सूर्यो॑ वि॒षमा सृ॑जामि॒ दृति॑ सु॒रा॑वतो गृ॒हे । सो चि॒न्नु न मरा॑ति नो व॒यं मरा॒मा॑ रे अ॑स्य॒ योजन हरि॒ष्ठा मधु॑त्वा बधुला च॑कारः ॥ ( ऋ ० १ ९ १ । १० ) उपरिष्टाज्ज्योतिः जगती ( पाद -५ प्रतिपाद अक्षर संख्या- ८ + ८ + ८ + ८ + १२ = ४४ ) —जिस जगती छन्द के प्रत्येक पादों में क्रमशः आठ - आठ - आठ - आठ तथा बारह अक्षरों की संख्या हो, वह उपरिष्टाज्ज्योति जगती के नाम से कही जाती है । यथा— लो॒कं पृ॑ण छिद्रं पृ॒ण, अथो॑ सीद शि॒वा त्वम् । इ॒न्द्रा॒ऽग्नी त्वा॒ बृह॒स्पति॑, अ॒स्मिन् योना॑वसीषदत्, तया देवत॑याऽङ्गिर॒स्वद् ध्रुवा सीद ॥ ( तै ० ब्रा ० ३।११।६।३ ) टिप्पणी- इस उदाहरण को पण्डित वेणी राम गौण द्वारा प्रस्तुत किया गया है । इस मन्त्र के द्वितीय चरण में अक्षरों की संख्या सात है, तथा पाँचवें पाद में अक्षर संख्या तेरह हैं । कुल मिलाकर चौवालिस ( ४४ ) अक्षर हैं । इस प्रकार छन्दों और उन छन्दों के भेदों का अतिसंक्षिप्त रूप में स्वरूप एवं लक्षण प्रस्तुत किया गया ताकि वैदिक तथा लौकिक छन्दों का निभ्रान्तज्ञान हो सके । प्रकृत ग्रन्थ छन्दों के विषय को ही नाना प्रकार से बतलाने के लिए अवतरित हुआ है । जिस प्रकार जलों के आधारभूत विविध जलाशय होते हैं और विविध जलाशयों की अपनी - अपनी विशेषतायें होती हैं, जिन के कारण उन सभी प्रकार के जलों की परस्पर में एक का दूसरे जल से निरर्थकता कथमपि सिद्ध नहीं हो पाती है । उसी प्रकार सभी CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 145

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भूमिका १४१ छन्द अपने - अपने स्वरूप में विभिन्न प्रकार के प्रयोजन साधक किसी न किसी प्रकार की विशेषता को लेकर स्थित होने के कारण छन्दों के भेदोपभेदों की, तथा उन भेदों - उपभेदों के साथ साथ मुख्य छन्दों की भी अपने - अपने विलक्षण विलक्षण प्रयोजनों की सिद्धियों के साधक रूप से उन सभी की सार्थकता सिद्ध होती है । अत एव यह नही कहा जा सकता है कि छन्दस्त्वेन छन्दः सामान्य से, अर्थात् सर्वव्यापक रूप से एक ही छन्द को स्वीकार करने पर भी छन्द के आश्रयीभूत लौकिक - वैदिक समस्त गद्याऽऽत्मकपद्यात्मक शब्दों के प्रयोजनीय प्रयोग की सिद्धि हो सकती है, तो पुनः उसी छन्दः प्रयुक्त लौकिक-वैदिक वाक्यों के प्रयोजन साधक सद्व्यवहार की सिद्धि के लिए भेदों एवं प्रभेदों से युक्त विभिन्न प्रकार के छन्दों को मानना उचित नहीं है, क्योंकि इस ग्रन्थ में छन्दों की, छन्दों मुख्य भेदों एवं उपभेदों की महती आवश्यकता मूलग्रन्थों में प्रतिपादित की गयी है । इसी विषय से सम्बद्ध ग्रन्थ के आमुख में स्पष्टीकरणाऽर्थ कुछ विचारों को प्रस्तुत किये गये है । ग्रन्थ में मुख्य रूप से छन्दों के स्वरूप उसके प्रयोजन और तत्तच्छन्दों के इतर व्यावृत्तस्वरूप के परिज्ञान के लिए उनके लक्षणों पर विविध दृष्टि से विचार प्रस्तुत किये गये हैं । उदाहरणों को वृत्ति ग्रन्थ में इस प्रकार प्रदर्शित किया गया है कि जिसके आधार पर हम सरलता के साथ छन्दों के लक्षणों को और लक्षणों से लक्षित भेदोपभेदसहित छन्दों के स्वरूपों को जान सकते हैं । इस विषय में वृत्ति ग्रन्थ की सहायता के लिए “ धूपकर " इस उपनाम से विभूषित विद्यालङ्कार अनन्त भट्ट यज्ञेश्वर शर्मा जी की आनुसान्धानिक टिप्पणी ग्रन्थ भी प्रस्तुत हुआ है, यह ग्रन्थ उदाहरण के कलेवर को खोलने के लिए पर्याप्त समर्थ है । धूपकर जी की इस ग्रन्थ पर संस्कृत में लिखी गयी भूमिका छन्दः शास्त्र को दार्शनिक धरातल प्रदान कराने का एक असाधारण प्रयास है । इस में छन्द विषय से सम्बन्धित जितने विचारों के तलस्पर्शी व्यूहन हुए हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं । यहाँ पर छन्द के समग्र अंशों पर उनकी सार्थकता से सम्बद्ध विचारों का ऐसा प्रवाह प्रस्फुटित हुआ कि जिसके आगे छन्द से सम्बन्धित अज्ञान, विपरीत ज्ञान, संशय आदि प्रवृत्तिप्रतिबन्धों की ग्रन्थि शिथिल होती हुयी विशीर्ण हो जाती है । इस ग्रन्थ में विस्तृत संस्कृत भूमिका होने पर भी उस भूमिका से साधारण छन्द जिज्ञासुओं को लाभ नहीं हो पाता इसको ध्यान में रखकर मैं हिन्दी में ग्रन्थोपयोगिनी भूमिका को बहुत ऊहापोह के द्वारा प्रदर्शित करने का प्रयास किया है । यह ग्रन्थ लौकिक एवं वैदिक छन्दों का प्रतिपादन करने वाला एक व्यापक और प्रामाणिक प्राचीन आर्षग्रन्थ है । इस बात को ध्यान में रखकर ही यह हिन्दी भूमिका लिखी गयी है जिसमें आरम्भिक विचार: सामान्य रूप से किये गये हैं, किन्तु प्रकृतग्रन्थ मुख्य रूप से वैदिक छन्दों के विश्लेषणार्थ ही प्रवृत्त हुआ है इसको ध्यान में रखकर वैदिक छन्दों पर विशेषरूप से CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 146

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१४२ छन्दः शास्त्रम् विशद प्रकाश डाला गया है । मूल ग्रन्थ आठ अध्यायों में विस्तृत है जिस पर हलायुध भट्ट की “ मृतसञ्जीवनी ” नाम की वृत्ति है, जो प्रकृत ग्रन्थ के रहस्य को उद्घाटित करने में सिद्धहस्त है । सटीक ग्रन्थ के संस्कृत में उपलब्ध होने से उसका तत्त्व साधारणजन को शीघ्र अधिगत नहीं हो पाता है । एवं सभी अंशों का अविकल रूप ज्ञान हो पाना सब के वश की बात नहीं है । इस बात को संस्कृतशास्त्र के मनीषियों ने अनुभव किया; इसी का परिणाम हुआ कि उन लोगों ने हिन्दी में संस्कृतग्रन्थों के कलेवरों को खोलना शुरू किया । प्रकृत ग्रन्थ में इससे पूर्व पण्डित प्रवर वेणीराम गौड जी के द्वारा आरम्भ के चार अध्यायों पर हिन्दी व्याख्या लिखि जा चुकी है, सुनते हैं कि कपिलदेव द्विवेदी जी के द्वारा भी इस सम्पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या हुई है, किन्तु मुझे उस व्याख्याग्रन्थ के अवलोकन का अवसर प्राप्त नहीं हो सका है । अस्तु मेरे द्वारा हलायुधभट्ट के वृत्तिग्रन्थ के सहारे, एवं अपनी विचारणाशक्ति, तथा कुछ अन्य ग्रन्थों की सहायता से समग्र आठों अध्यायों की हिन्दी बनायी गयी है । इस ग्रन्थ की हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत करने में मैं कितना सफल हो पाया हूँ इस बात को तो अध्येता ही बता पाएगें, किन्तु इस विषय में इतना विश्वास हमें अवश्य है कि जो भी लेख प्रस्तुत किये गये हैं उन सबको प्रामाणिकता के निकष ( कसौटी ) पर आरूढ़ करके, एवं यथोचित रीति से है, यहाँ सन्देह का अवसर नहीं है । अति आनन्द का विषय है कि जो वेद हमारी संस्कृति की वह भूति है जिसका सञ्चय भारत-वर्ष के दिव्य मणीषियों ने अपनी दिव्य अलौकिक इन्द्रियों के द्वारा साक्षात्कारपूर्वक किया था । उसी वेद भूमि पर क्रान्तद्रष्टा मनु आदि प्रजापतियों ने मन्वादि स्मृतियों का प्रासाद निर्मित किया, जिन प्रासादों की सुरक्षा के लिए पुराणोपपुराण इतिहास आदि प्रकारों के अतिन्द्रिय वस्तुद्रष्टा व्यासाऽऽदि द्वारा निर्माण किये गये प्राकारों ( दिवालों ) से सुरक्षित वेददुर्ग = इस किले को विपक्षियों के आक्रमण से बचाने के लिए किले के चारो ओर खात ( खायी ) के निर्माण किये गये हैं जहाँ पर शत्रु सेना को डुबोकर शस्त्र प्रहारणाऽऽदि द्वारा समाप्त करने के उद्देश्य से चार्वाकदर्शन से लेकर न्याय - वैशेषिक-दर्शन, साङ्ख्य - योगदर्शन - पूर्वमीमांसा एवम् उत्तरमीमांसादर्शन आदि अनेक शास्त्र पुनः अनेक शास्त्रप्रमाणों एवं युक्तियों की अमोघ मारक क्षमता वाले अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित होकर इस वेदभूमि की एवं वेदभूमि पर विस्तृत धर्माऽर्थकाममोक्षाऽऽत्मक फल को आश्रयीभूत स्मृतिस्वरूप जो प्रासाद, उस प्रासाद के चारों ओर सुरक्षा घेरारूपी दिवार की रक्षा में संलग्न हैं । सनातन संस्कृति के आधारभूत वेद रूपी वृक्ष के तीन मुख्य स्कन्ध हैं — संहिता, ब्राह्मण और ग्राह्मणान्तर्गत आरणयक तथा उपनिषद् । इन स्कन्धों का पोषण जिस प्रकार

पृष्ठ 147

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भूमिका १४३ व्याकरणाऽऽदि षड् अङ्गों के द्वारा होता है, उसी प्रकार साङ्गछन्दों के द्वारा भी इस वेदवृक्ष का पोषण हुआ करता है । विकासकारक साधन जितना विशुद्ध रहता है साध्य उतना ही विकसित हुआ करता है । इसीलिए छन्दः शास्त्र को पाणिनि - शिक्षा में वेदविज्ञानाऽऽत्म शरीर का पाद ( शरीराऽऽधार पैर ) कहा गया है । तथाहि-छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते । ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥

शिक्षाप्राणन्तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।

तस्मात् साङ्गधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥

( पा ० शि ० श्लो०-४१-४२ ) इसी उद्देश्य से छन्द: शास्त्र की व्याख्यानाऽऽत्मिका सेवा की गयी है कि यह सेवा वेद भगवान् में अर्पित होकर लोककल्याणकारिणी हो सके । इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 148

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आभार प्रदर्शन अन्त में मैं उन मनीषियों का चिर ऋणी हूँ जिसने मुझ जैसे अन्धकाराऽऽच्छन्न गह्वर को अपनी शास्त्रमयी मणिप्रभा से आलोकित कर कृतार्थ कर दिया । मैं मन ही मन उनकी अहेतुकी कृपा को भगवान् आशुतोष की कृपा, एवं मानवाऽऽकार के रूप में उपस्थित हुए सद्गुरु भगवान् को, भगवान् शिव के स्वरूप में ही अनुभव करने का प्रयास किया हूँ । इसके उपरान्त भी मुझमें स्थित दोष का प्रतिबिम्ब इस व्याख्याग्रन्थ में न पड़ा हो, ऐसा हो पाना तो कथमपि सम्भव नहीं है । अत: मानवसुलभ दोष समझ कर अध्येतागण मुझ पर कुपित न होकर, दोष परिमार्जन पुरस्सर इसको अध्ययन का विषय बनाएगें ऐसा मुझे विश्वास है । प्रकृत ग्रन्थ का संशोधनाऽऽदि कार्य हमारी उपस्थिति में हमारी कनिष्ठपुत्री सन्ध्या पाठक ने उसी तत्परता के साथ की है जिस प्रकार हमारे पिछले अन्य ग्रन्थों में करती आयी है । भगवान् आशुतोष उसकी ज्ञानसम्पत्ति को समुन्नत करें तथा सत्कर्म सम्पादनाऽर्थ इसी प्रकार का निरामय चिरजीवन प्रदान कर अनुगृहीत करे । अति हर्ष का विषय है कि प्रकृत ग्रन्थ का प्रकाशन चौखम्बा विद्याभवन से होने जा रहा है, जो संस्था भारतीय संस्कृति के सम्वर्द्धन में चिरकाल से लगी हुयी है । यह वही प्रसिद्ध संस्था है जो समस्त विश्व में फैले हुए भारतीय समाज में भारतीय विचारधारा को अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित रखने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ है । अत: मैं इन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूँ । भावदीय चित्तनारायणपाठक प्राचार्य, श्री निर्मल संस्कृत विद्यालय, वाराणसी । सचलध्वनि - 9452160711 CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 149

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छन्दः शास्त्रस्य विषयानुक्रमणी विषयाः पृष्ठम् ( संस्कृतभूमिकास्थ विषयसूची ) छन्दः स्वरूपजिज्ञासा १ तल्लक्षणपरीक्षाऽऽदिविचारः २ अथ छन्दोवादः ४५ अथ छन्दोविभक्तिवादः ४७ अथ वैदिकाऽन्यत्वावादः ५३ छन्दोलक्षणवादः ५४ समासवादः ५७ छन्दापदवादः ५ ९ छन्दःपदसंहितावादः ६३ । यतिदोषवादः ६५ पञ्चाऽङ्गतावादः ६६ छन्दोविज्ञानसार्थकतावादः ६७ ( प्रस्तावना ) छन्दः तत्त्वाऽऽवेदनम् ८१ । लौकिकछन्दसामुत्पत्तिः २२ छन्दःशास्त्रस्य वेदाङ्गता आदि ८२ पिङ्गलप्रभृति छन्दोग्रन्थकाराः ८३ छन्दःशास्त्रेवृत्तसञ्ज्ञा ८६ हिन्दी भूमिकास्थ विषयसूची पिङ्गलछन्दः शास्त्र के प्रतिपाद्य ९ २ विषय पर सामान्य.. विषयाः छन्दः पदार्थ से सम्बन्धित विचार प्रकृतोपयोगी छन्दः शब्दाऽर्थ का विवेचन पिङ्गलाऽऽचार्य की दृष्टि से वैदिक छन्दों पर.. छन्दगत गणों के स्वरूप पर शास्त्रीय विचार छन्द के विषय में ज्ञातव्य कुछ विशेष नियम वैदिक छन्दों के प्रमुख भेदों का वर्णन सभी छन्दों की मूल गायत्री अक्षरों के न्यूनाऽधिक भाव आदि का वर्णन मन्त्रों में व्यूह का स्वरूप एवम् ‘ इय् - उव् ' आदि आ. पादों से सम्बन्धित सूत्राऽऽ-श्रित विचार छन्दः तालिका सहित छन्द: -स्वरूप विचार छन्दोभेदः आभार प्रदर्शन 13480 भू ० छ ० शा०-१० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 150

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विषयानुक्रमणी विषयाः ( प्रथमोऽध्यायः ) वृत्तिकृतो मङ्गलम् गणादिपरिभाषा शास्त्रोपक्रमणिका गणसंज्ञा: गणदेवताः गणफलानि गणेषु शत्रु मित्रादि गणप्रयोगे फलम् दुष्टगणादिदोषापवादः लगसंज्ञा. लगसङ्केतरेखालक्षणम् गुरुत्वापवादः क्वचित्पादान्तस्य लघुत्वम् तद्विषये मतान्तरम् श्वेताम्बरमतखण्डनम् पाणिनिविरोधसमाधानम् संयोगपरकह्रस्वस्य गुरुत्वम् द्विमात्रस्य गुरुत्वम् सङ्ख्योपलक्षकसंज्ञाः धीश्रीरित्यादिपदानामर्थः ( द्वितीयोऽध्यायः ) गायत्रीभेदाः तत्प्रदर्शनोपायः लक्षणव्यभिचारे विचारः गायत्र्या अष्टत्रिंशद्भेदाः ( तृतीयोऽध्यायः ) पादपूरणप्रकारः गायत्र्यादिपादाक्षरसङ्ख्या छान्दसंमेकादिपादत्वम् पञ्चादिपादानि छन्दांसि CC - 0. JK Sanskrit Academy, पृष्ठम् विषयाः चतुष्पादादिगायत्रीलक्षणम् १ गायत्रीपदनिर्वचनम् १ उष्णिगधिकारः २ उष्णिक्पदनिर्वचनम् २ अनुष्टुवधिकारः २ | अनुष्टुप्पदनिरुक्तिः २ | बृहत्यधिकारः २ | प I यधिकारः ३ | त्रिष्टुब्जगत्यधिकारः ३ त्रिष्टुप्पदनिर्वचनम् ७ बहूनाक्षराया अपि त्रिष्टुप्त्वम् 67 जगतीपदनिर्वचनम् ७ शङ्कुमत्यादिच्छन्दोविशेषाः ८ छन्दःसन्देहे निर्णयप्रकारः ८ छन्दसां देवताः ८ छन्दसां स्वराः ८ छन्दसां वर्णाः ९ छन्दसां गोत्राणि ९ छन्दसां धातवः १० देवतादिविषये विचार: ११ मतान्तरविरोधपरिहारः ( चतुर्थोऽध्यायः ) १४ अतिच्छन्दांसि १५ xx अतिच्छन्दसां पादाक्षराणि १६ लौकिकच्छन्दोऽधिकारः २२ um पादलक्षणम् २५ मात्रागणलक्षणम् आर्याधिकारः २६ 2828 आर्याया अशीतिभेदाः २७ ३० वैतालीयाधिकारः Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA