छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 161–170
छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 161–170
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प्रथमोऽध्यायः ९ ३।३।१०३ ) इत्यकारप्रत्ययो यथा स्यात् — कुण्डा, हुण्डा; ( इत्यादीनाम् । तथा- ) ईहा-ञ्चक्रे, ऊहाञ्चक्रे, इत्येवमादीनाम् ' इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः ' ( पा ० सू ० ३/१/३६ ) इत्याम्प्रत्ययश्च । पदान्ते वर्तमानस्य लघोर्गुरुत्वातिदेशे पाणिनेः प्रयोजनमेव नास्ति । किंचानुस्वारादिपूर्वस्य वर्णस्य ' बलं ' ' संपदि ' त्यादौ स्थितस्य गुरुसंज्ञा पाणिनिना न कृता, किमेतावतान्यैरपि न कर्तव्या? । तस्मात्सूक्तमिदम् ' गन्ते ' इति । गप्रदेशाः ‘ गावन्त आपीड ' ( पि ० सू ० ५/२२ ) इत्येवमादयः ॥ शिवप्रसादिनी - इस सूत्र में ऊपर से " गृ " ग्रहण की अनुवृत्ति आती है । गृ वर्ण. से उपलक्षित ( = बोधित ), अन्ते = पाद के अन्त में होने वाले ह्रस्व अक्षर की ग् = गुरु सञ्ज्ञा की जाती है । सूत्र में प्रतीक रूप से प्रथम अक्षर के रूप में गृहीत " ग् ” अक्षर से ग् घटित गुरुशब्द का ग्रहण होता है, इसी विचार को लेकर सूत्राऽर्थ का स्वरूप निर्दिष्ट हुआ है ॥ १० ॥
ध्राऽऽदिपरः । १ । ११ ॥
मृतसञ्जीवनी —ध्र इति व्यञ्जनसंयोगस्योपलक्षणार्थमेतत् । ध्र आदिर्येषां ते ध्रादयः । आदिशब्देन विसर्जनीयानुस्वारजिह्वामूलीयोपध्मानीयानां ग्रहणम् । ध्रादयः परे यस्मात्स ध्रादिपरः । ततश्चायं सूत्रार्थ: - व्यञ्जनसंयोगात्पूर्वस्य ह्रस्वस्यानुस्वारविसर्जनीयजिह्वा-मूलीयोपध्मानीयेभ्यश्च पूर्वस्य गुरुसंज्ञातिदिश्यते ॥ शिवप्रसादिनी - " ध्र " यह व्यञ्जन संयोग का बोधक है । “ ध्र " है आदि में जिनके, वे ध्रादि कहलाते हैं । सूत्र में संयोगाऽर्थक “ ध्र " घटक आदि शब्द से पुनः विसर्ग, अनुस्वार, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय, वर्णों का ग्रहण होता है । “ ध्र ” ( व्यञ्जन संयोग ) आदिवर्ण परे हैं जिससे वह " ध्रादि परः " इस शब्द से कहा जाता है । इस उपर्युक्त विचार से पर्यवसित सूत्राऽर्थ का स्वरूप है — ) व्यञ्जन संयोग से पूर्व में तथा अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, एवम्, उपध्मानीय सञ्ज्ञक वर्णों से पूर्व में विद्यमान ह्रस्व सञ्ज्ञक स्वर वर्ण की गुरुसञ्ज्ञा होती है ॥११ ॥
रहे । १।१२ ॥
मृतसञ्जीवनी —ग इत्यनुवर्तते । हे इति द्विमात्रोपलक्षणार्थम् । ततश्चायं सूत्रार्थः— द्विमात्रिकस्य दीर्घस्य ' ग ' इति संज्ञा क्रियते ॥ शिवप्रसादिनी — यहाँ पर “ गन्ते " सूत्र से “ ग् " की अनुवृत्ति होती है । “ हे ” यह शब्द द्विमात्रिक दीर्घ वर्ण के उपलक्षणाऽर्थ ( बोधनाऽर्थ ) प्रयुक्त हुआ है । तदनुसार सूत्राऽर्थ ( १ ) ध्रग्रहणं गुरुप्रयत्नोच्चार्योपलक्षणार्थम् । ( २ ) ' ए ओ क्वचित्प्राकृतके लघूस्त ' ( १।६ ) इति वाणीभूषणे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१० छन्दः शास्त्रम् का स्वरूप होगा — द्विमात्रिक दीर्घ स्वर वर्ण की ग् = गुरु सञ्ज्ञा होती है ॥ १ । १२ ॥
लौ सः । १ । १३ ॥
मृतसञ्जीवनी - स इति गकारस्य परामर्शः । स गकारो द्विमात्रा: - गणनायां द्वौ लकारौ कृत्वा गणयितव्यः ॥ शिवप्रसादिनी – यहाँ पर " स: " इस पद से गुरुवर्ण के बोधक " ग् ” का परामर्श होता है । इस प्रकार सूत्रार्थ होगा - वह द्विमात्रिक एक गकार मात्रा की गणना में लौ = लघुसञ्ज्ञक ( एकमात्रिक ) दो लकार के तुल्य गिनती करने के योग्य हैं । अर्थात् द्विमात्रिक गुरु सञ्ज्ञक वर्ण को दो लघुमात्रिक वर्ण के समान गिनती की जानी चाहिए ॥ १३ ॥
ग्लौ । १ । १४ ॥
मृतसञ्जीवनी– अधिकारोऽयमाशास्त्रपरिसमाप्तेः । यत्र विशेषान्तरं न श्रूयते तत्र ‘ ग्लौ ’ इत्युपतिष्ठते, ‘ गायत्र्या वसवः ' ( पि ० सू ० ३।३ ) इत्येवमादिवत् । प्लुतेनेह व्यवहारो नास्ति ॥ शिवप्रसादिनी - ग् च ल् च = ग्लौ, अर्थात् गुरु और लघु स्वर वर्ण । यहाँ से लेकर इस शास्त्र के अन्त तक जहाँ - जहाँ पर इस शास्त्र का विशेष विधि नहीं है, वहाँ-वहाँ सर्वत्र “ ग्लौ ” = गुरु - लघु सञ्ज्ञक का अधिकार जाएगा, ऐसा समझना चाहिए । अर्थात् यहाँ से लेकर इस छन्दः शास्त्र की समाप्ति पर्यन्त " ग्लौ " इस सूत्र का विशेषविधि के अभाव में अधिकार ( = सब सूत्रों में अनुवृत्ति ) समझना चाहिए । जिस प्रकार “ गायत्र्या वसवः ” ( पि ० सू ० ) = जहाँ पर गायत्री पाद कहा जाता है वहाँ पर पाद में आठ अक्षर की मात्रा जाननी चाहिए; क्योंकि गायत्री का पाद आठ अक्षर वाले ही होते हैं, तथा त्रिपदा गायत्री के होने से गायत्री छन्द में कुल अष्टादश ( अठारह ) मात्रा ही ग्रहण करने योग्य निर्धारित होता है । इस बात की जानकारी देने के लिए सर्वत्र सूत्रों में इस परिभाषिक सूत्र का अधिकार के समान अनुवृत्ति होती है, उसी प्रकार " इस शास्त्र में जहाँ विशेषविधि नहीं है वहाँ गुरु - लघु वर्णों के सामान्य व्यवहार सिद्धि के लिए " ग्लौ ” इसका व्यवहार जानना चाहिए । जैसे " आसुरी पञ्चदश " ( पि ० सू ० २।४ ) इस सूत्र में वृत्तिकार लिखते हैं कि — तानि च अक्षराणि “ ग्लौ ” इत्यधिकारवशाद् गुरुणि लघूनि वा यथा सम्भवं द्रष्टव्यानि ” अर्थात् आसुरी गायत्री छन्द पञ्चदश ( पन्द्रह ) मात्राओं का होता है वे पञ्चदश मात्राएँ पुन: " ग्लौ ” के अधिकारवश यथासम्भव गुरु सञ्ज्ञक एवं लघु सञ्ज्ञक अक्षरों को लेकर समझना चाहिए ॥ १ । १४ ॥
अष्टौ वसव इति । १।१५ ॥
मृतसञ्जीवनी – अत्र शास्त्रे वसव इत्युच्यमानेऽष्टसंख्योपलक्षिता गुरुलघुस्वरूपा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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प्रथमोऽध्यायः ११ वर्णा गृह्यन्ते । लौकिकप्रसिद्ध्युपलक्षणार्थमिदं सूत्रम् । ते चतुर्णां समुद्राः, पञ्चानामिन्द्रि-याणि, इत्येवमादयः संज्ञाविशेषा लौकिकेभ्यः प्रत्येतव्याः । इतिकारोऽध्यायसमाप्ति-सूचकः ॥ इह ध्यादीनामुपादानप्रयोजनं वर्ण्यते - अध्ययनाद्धीर्भवति । यस्य धीस्तस्य श्रीः, बुद्धिपूर्वकत्वाद्विभूतेः । यस्य श्रीस्तस्य स्त्री, अर्थमूलकत्वाद्गार्हस्थ्यस्य । ' वरा सा ' इत्यनेन सर्वेषां स्त्रीसाधनोपायानां बुद्धेरुपायस्य माहात्म्यं दर्शयति । तथा चोक्तम्-‘ अर्धाङ्गुलपरीणाहजिह्वाग्रायासभीरवः । सर्वाङ्गीणपरिक्लेशमबुधाः कर्म कुर्वते || ' तत्राह शिष्य: - ' का गुहा '? गुहाशब्दः स्थानवाचकः । का गुहा यत्रासौ तिष्ठति? । उपाध्यायो ब्रूते - ' वसुधा ' । पृथिव्यां लभ्यते धीर्नात्र विषादः कर्तव्यः । पुनरप्याह शिष्यः - ' सा ते क्व? सा धीस्त्वयोपदिष्टा पृथिव्यां क्वाश्रयस्थितेन लभ्यते? । तत्र पुनराचार्य आह-' गृहे ' । पुनरप्याह शिष्यः - ' कदा सः ' स गृहस्थः पुरुषः कदा कस्मिन्काले तां धियं प्राप्नोति? । ततोऽनन्तरं गुरुराह - ' श्रादिपरः ' धारणार्थावबोधपरोऽसौ यदा स्यात्तदा धियं लभते । भूयोऽपि शिष्यः पृच्छति - ' किं वद ' किं कुर्वन्नसौ तां धियं लभते? तद्वद । तत्राह गुरुः – ‘ न हसन् ' हासादिचापल्यमकुर्वाणस्तां धियं लभत इति ॥ ॥ इति भट्टहलायुधकृतायां छन्दोवृत्तौ प्रथमोऽध्यायः ॥ शिवप्रसादिनी – इस छन्दः शास्त्र में “ वसु ” शब्द से गुरु लघु सञ्ज्ञक के रूप में स्थित आठ वर्णों को समझना चाहिए । शास्त्र व्यवहार से भिन्न लोक प्रसिद्ध शब्दों के ग्रहण करने में यह सूत्र उपलक्षण स्वरूप सिद्ध होता है । भाव यह है कि वसु शब्द से लोक प्रसिद्धि वश आठ संख्या वाले अक्षरों का, समुद्र शब्द से चार ( ४ ), तथा इन्द्रिय से ( ५ ) पाँच अक्षरों का प्रकृत छन्दः शास्त्र में ग्रहण किया जाना चाहिए । इस प्रकार जो - जो वस्तुएँ जितनी संख्या के रूप में लोक प्रसिद्ध हैं उतनी संख्या वाले अक्षरों का, प्रकृत शास्त्र में उन्हीं नियत सञ्ज्ञा वालों के माध्यम से ग्रहण किया गया है । “ इति ” शब्द का उच्चारण अध्याय समाप्ति के सूचनार्थ दिया गया है । ( १ ) सङ्ख्येयपरैः पदैर्लोकव्यवहारात्सङ्ख्या लक्ष्यते । ' वसवोऽष्टौ च चत्वारो वेदा इत्यादि लोकत: । ' ( ३२८।३ ) इत्यग्निपुराणे । तथा च- ' समुद्र ' ( ६।१ ९ इत्यादौ ) पदेन ' वेद ' ( ८।१० ) पदेन चात्र चतुः सङ्ख्योपलक्ष्यते एवं ' इन्द्रियाणि ' ( ६।४१ इ ० ) ' भूतानि ' ( ७।३० इ ० ) ' कामशरा: ' ( ६।४२ ) इत्येतैः पञ्च । ' ऋतवः ' ( ३।८।३० ) ' रसा: ' ( ६।३३ ) इति षट् । ' ऋषयः ' ( ३।९ इ ० ) ' स्वरा: ' ( ७/६ इ ० ) इति सप्त । ‘ वसवः ’ ( ३।३ इ ० ) इत्यष्टौ । ' दिश: ' ( ३।५ इ ० ) इति दश । ' रुद्रा: ' ( ३।६ इ ० ) इत्येकादश । ' आदित्या: ' ( ३।४ इ ० ) ' मासा ' ( ७।२ ९ ) इति द्वादशेति ज्ञेयम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१२ छन्दः शास्त्रम् विशेष- - इस प्रथमाऽध्याय में " धी " आदि शब्द के उच्चारण का प्रयोजन वृत्तिकार के विचार से कहा जा रहा है, -अध्ययन से धी = बुद्धि की प्राप्ति होती है । एवं जिसके पास धी होती है उसी को श्री की प्राप्ति होती है; क्योंकि बुद्धि द्वारा ही धनाऽऽदि ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । इसी प्रकार जिसको धन की प्राप्ति हुआ करती है उसके साथ ही सज्जन लोग अपनी पुत्री का विवाह करना चाहते हैं । यतः विवाह स्वरूप स्त्री की उपलब्धि धनाऽऽगममूलक होता है । इसीलिए " वरा सा " ( पि ० सू ० १।२ ) इस सूत्र से स्त्री धन को प्राप्त कराने वाले समस्त साधनों में बुद्धिस्वरूप साधन की श्रेष्ठता कही गयी है । अत एव “ वरा सा " इस सूत्र में " सा " पद वाच्य “ बुद्धि " में श्रेष्ठाऽर्थक " वरा " यह विशेषण दिया गया । बुद्धिहीनों की निन्दा के बहाने बुद्धि की सर्वोत्तम साधनता का वर्णन किसी प्रामाणिक ग्रन्थ में इस प्रकार से किया गया है— अर्द्धअङ्गुलि के परिमाण में बंधा हुआ जिह्वा के ग्रास की प्राप्ति के लिए सशंकित हुए, अर्थात् ये - ये काम यदि नहीं करेंगे, तो उसके द्वारा प्राप्त धन नहीं मिल पाएगा, और धन को न पाने की स्थिति में धन द्वारा प्राप्त होने वाला भोज्य पदार्थ नहीं मिल पाएगा । अतः भोज्य पदार्थ की उपलब्धि के उद्देश्य से ही अज्ञानी जन समस्त जगत् को क्लेश पहुँचाने वाला कर्म किया करते हैं । " इससे यही सिद्ध होता है कि अज्ञानी जन शरीरेन्द्रियों के संघात में ही आत्मबुद्धि करता हुआ अत एव उसके पात के भय से भयभीत इस सेन्द्रिय शरीर सञ्चालनार्थ ही भयवश सर्वजीव क्लेश कारक कर्म किया करते हैं, किन्तु बुद्धिमान् जन शरीरेन्द्रियाऽऽदिकों से भिन्न रूप में अपने स्वरूप का अनुभव करने वाले होने से, उनका पुनः उसी प्रकार कर्म होने पर भी, अज्ञान प्रयोजित भय मूलक न होने से, किन्तु तत्त्वज्ञानमूलक होने के कारण सर्वजीव हितावह होता है । इत्यादि । इस प्रकार से तत्त्वज्ञानाऽऽत्मक बुद्धि की सर्वश्रेष्ठता का अनुभव कर शिष्य गुरु जी से प्रश्न करता है कि गुरुदेव! का गुहा? ( पि ० सू ० १ ३ ) यहाँ पर “ गुहा " शब्द आधार अर्थ का बोधक है, अर्थात् वह कौन - सा स्थान है जहाँ पर बुद्धि रहती है? इसके उत्तर में गुरु जी कहते हैं- वसुधा ( पि ० सू ० ११४ ) इसका अभिप्राय यह है कि हे शिष्य! बुद्धि इस पृथिवी पर ही उपलब्ध होती है, अतः इसकी प्राप्ति के विषय में चिन्ताऽऽतुर होने की आवश्यकता नहीं है । उपर्युक्त बात को सुनकर शिष्य पुनः प्रश्न करता है कि आपके द्वारा उपदिष्ट वह धी ( बुद्धि ) इस भूमण्ड के किस भाग में, तथा उन भागों में भी किस स्थल विशेष में विराजती है? यतः प्राप्त करने के लिए वस्तु के आधार देश में जाना अनिवार्य हुआ करता है । इस जिज्ञासा के समाधानार्थ आचार्य पुनः समाधान प्रस्तुत करता है कि गृ - हे ( पि ० सू ० १।९ -१२ ) अर्थात् उसका स्थान तुम्हारा घर ही है । शिष्य पूछता है घर में कब, अर्थात् किस काल में उसकी उपलब्धि होगी? ( कदा सः । १।६ ॥ सः = वह गृह में रहने वाला मनुष्य, कदा = किस समय CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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प्रथमोऽध्यायः १३ में उस बुद्धि को प्राप्त करेगा? या कर सकता है? ) इसके उत्तर में गुरुजी कहते हैं-धादिपरः ( पि ० सू ० १ | ११ ) = यहाँ पर श्रादिपद धारणा - ध्यान - समाधि का बोधक है, अर्थात् जो पुरुष शास्त्राऽऽध्ययन के माध्यम से शास्त्रबोधित कल्याणकारक अर्थ विषयक धारणा - ध्यान - समाधि से जब युक्त होगा, उस समय वह पुरुष सर्वश्रेष्ठकल्याण साधनीभूत धी ( = बुद्धि ) को प्राप्त करेगा । पुनः शिष्य प्रश्न करता है - " किं वद " ( पि ० सू ० १।६ । ), अर्थात् क्या करने पर = किस उपाय के माध्यम से पुरुष बुद्धि प्राप्त कर सकता है? इस तत्त्व को आप हमें बतावें । इस पर गुरुजी समाधान करते हुए कहते हैं— “ न हसन् ” ( पि ० सू०-१।८ ) अर्थात् उस सर्वकल्याणकारक धीस्वरूपा बुद्धि को प्राप्त करने के लिए अध्ययन में रत उद्यमी पुरुष में हासाऽऽदिस्वरूप चपलता का सर्वथा अभाव
होना चाहिए । इत्यादि ॥१५ ॥
॥ इति साङ्ख्य - योग- ग - न्याय - वैशेषिकपदवाक्यपारावारीणेन मैथिलपण्डित-चित्तनारायणपाठकाऽऽह्वयेन कृतायां पिङ्गलछन्द: शास्त्रीय-शिवप्रसादिनीव्याख्यायां प्रथमोऽध्यायः ॥ 6 छ ० शा ० ८ Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वितीयोऽध्यायः
छन्दः । २।१ ॥
मृतसञ्जीवनी - अधिकारोऽयमाशास्त्रपरिसमाप्तेः । इत ऊर्ध्वं यद्वक्ष्यामश्छन्द-स्तत्रोपतिष्ठते । छन्द: शब्देनाक्षरसंख्यावच्छेदोऽत्राभिधीयते ॥ शिवप्रसादिनी – यहाँ से आरम्भ करके प्रकृत छन्द: शास्त्र की समाप्ति पर्यन्त “ छन्दः ” का अधिकार चलेगा, अर्थात् यहाँ से लेकर आगे के सूत्रों से जो भी कहा जाएगा वहाँ पर सर्वत्र छन्द की उपस्थिति होगी । छन्दशब्द से पुनः अक्षरों की संख्या से विशिष्टछन्द इस छन्दः शास्त्र में कहा जाता है ॥१ ॥
( अथ गायत्र्यधिकारः - )
गायत्री । २।२ ॥
मृतसञ्जीवनी– अधिकारोऽयमाद्वादशसूत्रपरिसमाप्तेः । ‘ तान्युष्णिग्- ' ( पि ० सू ० २।१४ ) इत्यादिसूत्रात्प्राग्यदुच्यते छन्दः, तद्गायत्रीसंज्ञं वेदितव्यम् ॥ शिवप्रसादिनी— ‘ “ गायत्री " का अधिकार यहाँ से लेकर बारहवें सूत्र की समाप्ति पर्यन्त चलेगा । अर्थात् “ तान्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपङ्क्तित्रिष्टुब्जगत्यः " ( पि ० सू ० २।१४ ) इस सूत्र से पूर्व तक के सूत्र द्वारा जो भी छन्द कहा जाएगा, उसे गायत्री सञ्ज्ञक छन्द जानना चाहिए । अथवा “ गायत्री ” इस सूत्र का “ देव्येकम् " ( २।३ ) इस सूत्र से लेकर “ जह्यादासुरी ” ( २।१३ ) पर्यन्त ( गायत्रीछन्द के नाम का ) अधिकार जाएगा ॥ २ ॥
( १ - दैवी गायत्रीलक्षणमाह— )
दैव्येकम् । २ । ३ ॥
मृतसञ्जीवनी – एकाक्षरं छन्दो दैवी गायत्रीति संज्ञायते । तत्रायं प्रदर्शनोपायः ' -चतुरङ्गक्रीडायामिव चतुःषष्टिकोष्ठान् लिखित्वा तत्र प्रथमपङ्क्तौ आर्षीनाम लिखित्वा द्वितीयादिकोष्ठेष्वङ्कानामुपरि गायत्र्यादिसप्तच्छन्दसां नामानि विन्यसेत् । ततो द्वितीयायां पङ्क्तौ प्रथमकोष्ठे दैवीशब्दं विन्यसेत्, संज्ञाज्ञापनार्थम् । द्वितीये एक ( १ ) संख्याङ्कं विन्यसेत् ॥ शिवप्रसादिनी - एक अक्षर वाला छन्द “ दैवी गायत्री ” नाम व्यवहृत होता है । यथा-- - ' " ओम् " यह एक अक्षर होने से “ दैवी गायत्री ” छन्द है । यहाँ पर दैवी गायत्री ( १ ) ' चतुः षष्टिपदे लिखेत, ( अ. D & 814 ) s3 Foundation USA
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द्वितीयोऽध्यायः १५ आदि छन्दों के प्रदर्शन की परिपाटी इस प्रकार समझना चाहिए-चतुरङ्ग ( शतरञ्ज ) के नाम से लोक प्रसिद्ध खेल में जिस प्रकार चौसठ कोणों का निर्माण करके उसके आधार पर खेल खेला जाता है, उसी प्रकार आठ - आठ की आठ पंक्ति में चौसठ ( II ) कोष्ठकों का निर्माण करके वहाँ पर प्रथम पंक्ति में “ आर्षी ” नाम लिख कर द्वितीय आदि कोष्ठकों अङ्कों के ऊपर संज्ञा बोधनाऽर्थ " गायत्री ” आदि सात छन्दों का नाम दिया जाना चाहिए । द्वितीया पंक्ति में ( देवी के आगे ) संख्या का उल्लेख किया जाना चाहिए || इस चौसठ कोणों वाले कोष्ठक का समग्रता के साथ लेखन तो स्वयं वृत्तिकार हलायुध के द्वारा द्वितीयाऽऽध्याय के अन्त में प्रदर्शित किया जाएगा, किन्तु यहाँ पर तो एक - एक के लक्षणाऽनुसार क्रमशः ही प्रदर्शित किया जा रहा है || ३ || ( २ - आसुरीगायत्रीलक्षणमाह— )
आसुरी पञ्चदश । २।४ ॥
मृतसञ्जीवनी – आसुरी गायत्री पञ्चदशाक्षरा । तानि चाक्षराणि ' ग्लौ ' ( पि ० सू ० १।१४ ) इत्यधिकाराद्गुरूणि लघूनि वा यथासंभवं द्रष्टव्यानि । अत्र तृतीयायां पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे आसुरीशब्दं लिखित्वा द्वितीये कोष्ठे पञ्चदश ( १५ ) संख्याङ्कं लिखेत् ॥ शिवप्रसादिनी - पन्द्रह अक्षर वाले गायत्री छन्द को आसुरी ( गायत्री ) छन्द कहा जाता है । उदाहरण – ‘ “ आपोज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ” ( तै ० आ ०१०।२७ ) इति । प्रकृति में इस सूत्र का तात्पर्य यह है कि इस छन्द में पञ्चदश ( १५ ) अक्षर का विधान किया गया है वे पन्द्रह अक्षर पुनः यथा सम्भव “ ग्लौ ” ( पि ० सू ० १ | १४ ) सूत्र के अधिकाराऽनुसार गुरुसंञ्ज्ञक ( S ) एवं लघुसञ्ज्ञक दोनों ग्रहण करने योग्य हैं । इस सूत्र से सम्बन्धित तृतीय पंक्ति के प्रथम कोष्ठ में आसुरी शब्द को लिखकर द्वितीय कोष्ठ में ( १५ ) यह संख्या लिखनी चाहिए ॥४ ॥
( ३- प्राजापत्यगायत्री लक्षणमुच्यते— )
प्राजापत्याष्टौ । २।५ ॥
मृतसञ्जीवनी - प्राजापत्या गायत्र्यष्टाक्षरा भवति । यत्र क्वचिद्वेदे ऽष्टाक्षरं छन्दस्तत्प्राजापत्या गायत्रीति ज्ञेयम् । चतुर्थ्यामत्र पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे प्राजापत्याशब्दं लिखित्वा द्वितीयेऽष्ट ( ८ ) संख्याङ्कं लिखेत् ॥ शिवप्रसादिनी - वेद में प्राजापत्यगायत्री छन्द के आठ गुरु - लघुसञ्ज्ञक अक्षर होते हैं । यथा - ऋत √ सत्यमृत ं सत्यम् ( शु ० य ० वेद अ ० १ मं ० ४७ ) यथा वा = “ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः " ( शु ० य ० ३।९। ) इस प्रकार वेद में जहाँ - कहीं भी अष्टअक्षर वाले छन्द हैं, वे प्राजापत्य गायत्री के CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१६ छन्दः शास्त्रम् नाम से जाने जाते हैं | आठपंक्ति में विभक्त चौसठ कोष्ठक वाले चक्र चतुर्थ पंक्ति के अष्ट कोष्ठकाऽन्तर्गत प्रथम कोष्ठक में प्राजापत्यशब्द का उल्लेख करके, तदनन्तर द्वितीय कोष्ठक में ( ८ ) आठ संख्या का अङ्क लिखना चाहिए ॥ ५ ॥
( ४- याजुषी गायत्री का लक्षण कहते हैं - )
यजुषां षट् । २।६ ॥
मृतसञ्जीवनी – यजुषां गायत्री षडक्षरा भवति । यत्र क्वचिद्वेदे षडक्षरं छन्दस्तद्याजुषी गायत्रीति संज्ञायते । अत्र पञ्चम्यां पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे याजुषीशब्दं ( ६ ) संख्याङ्कं लिखेत् ॥ शिवप्रसादिनी - याजुषी गायत्री षड् ( छः ) अक्षर वाली भी वेद में छः अक्षर वाला छन्द दृष्टिगोचर हो, वह " याजुषी जानी जाती है । अत: कोष्ठक चक्र के अन्तर्गत पञ्चम पंक्ति “ याजुषी ” शब्द को लिखकर उस पंक्ति के द्वितीय कोष्ठक में ( ६ ) करना चाहिए । उदाहरण– ( १ ) अश्विभ्यांपच्यस्व, ( शु ० य ० १ ९ ।१ ) ( २ ) य ० १।१६ ) यहाँ प्रत्येक में छ: अक्षर हैं ॥ ६ ॥
( ५- साम्नी गायत्री का लक्षण कहते हैं— )
साम्नां द्विः । २।७ ॥
व्यवस्थाप्य द्वितीये षट् होती है । जहाँ कहीं गायत्री " के नाम से के प्रथम कोष्ठक में इस अङ्क का उल्लेख “ वर्षवृद्धमसि ” ( शु ० मृतसञ्जीवनी – षडित्यनुवर्तते । द्विरिति क्रियाभ्यावृत्तिदर्शनात्करोतिरध्याह्रियते; द्वादशाक्षरेत्यन्यावृत्त्या क्रियते । तेन द्विः कृता द्विगुणिता षट्संख्या साम्नां गायत्री भवति । यत्र क्वचिद्वेदे द्वादशाक्षरं छन्दः तत्साम्नां गायत्रीति संज्ञायते । अत्र षष्ठ्यां पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे सामशब्दं लिखित्वा द्वितीये द्वादश ( १२ ) संख्याङ्कं लिखेत् ॥ शिवप्रसादिनी- - इस सूत्र में पूर्वसूत्र से “ षट् " इस पद की अनुवृत्ति आती है । “ द्विः ” यहाँ पर क्रिया की अभ्यावृत्ति अर्थ में ( पुनः पुनः आवृत्ति अर्थ में ) द्वि प्रातिपदिक सुच् ( स् ) प्रत्यय हुआ है । द्विशब्द से क्रियाऽभ्यावृत्तिस्वरूप अर्थ के प्रकाशक सुच् ( स:) प्रत्यय देखे जाने से उसके अर्थ की संगति के लिए यहाँ पर " करोति ” इस पद का अध्याहार कर लेना चाहिए । षट् पद की दो आवृत्ति की जानी चाहिए । तदनुसार सूत्राऽर्थ का सङ्कलित स्वरूप होगा - द्विगुणित षट्संख्या अर्थात् बारह अक्षर वाला छन्द साम्नी गायत्री कही जाती है । जिस किसी भी वेद में बारह अक्षर वाला छन्द देखें, वहाँ ( १ ) ' साम्नां स्याद्द्वादशाक्षरा । ' ( अ ० पु ० ३१ ९ ।२ ) CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वितीयोऽध्यायः १७ साम्नी गायत्री के नाम से व्यवहार हुआ करता है । अष्ट पंक्ति की श्रेणि में स्थित चौंसठ संख्या वाले कोष्टक के अन्तर्गत छठी पंक्ति के प्रथम कोष्ठक में ' साम्नी ' शब्द का उल्लेख करके, पुन: उसी पंक्ति के द्वितीय कोष्ठक में ( १२ ) इस संख्या को लिखा जाना चाहिए । साम्नां द्वादश ( ऋक् प्रा ० १६।१२ ) इस ऋग्वेदीय प्रातिशाख्य सूत्र तथा साम्नां स्याद् द्वादशाऽक्षरा ( २।२ । ) इस " आग्नेयच्छन्दः सार " में उल्लिखितवाक्य से भी “ सामगायत्री ” छन्द में द्वादशाऽक्षरत्व प्रमाणित होता है । उदाहरण - " अग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वद् भराम: । " ( शु ० य ० ११।४७ ) इत्यादि || ७ || ( ६- आर्ची गायत्री का लक्षण कहते हैं - )
ऋचां त्रिः । २।८ ॥
मृतसञ्जीवनी - षडित्यनुवर्तते । अत्रापि पूर्ववत् क्रियाभिव्यावृत्तिः, तेन त्रिगुणा षट्संख्या ऋचां गायत्री भवति । यत्र क्वचिद्वेदेऽष्टादशाक्षरं छन्दः सा ऋचां गायत्री ज्ञेया । अत्र सप्तमपङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे ऋक्शब्दं व्यवस्थाप्य द्वितीयेऽष्टादश ( १८ ) संख्याङ्कं लिखेत् ॥१ शिवप्रसादिनी - पूर्व सूत्र से " षट् " इसकी अनुवृत्ति होती है । यहाँ पर भी पूर्व सूत्र के समान ‘ “ त्रि ” प्रातिपदिक से क्रिया की अभ्यावृत्ति ( = आवृत्ति ) अर्थ में सुच् ( स् =ः ) प्रत्यय हुआ जानना चाहिए तदनुसार त्रिगुणित छ: सख्या वाले ( १८ ) गुरुलघु सञ्ज्ञक अक्षरों वाले छन्द की आर्ची गायत्री सञ्ज्ञा समझनी चाहिए । कोष्ठक चक्र के अन्तर्गत सप्तम पंक्ति के प्रथम कोष्ठक में " आर्ची ' शब्द का उल्लेख करके पुनः द्वितीय कोष्ठक में ( १८ ) संख्या को लिखना चाहिए । उदाहरण - " वसवस्त्वा धूपयन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वत् ” ( शु ० य ० ११।६० ) ॥८ ॥
( ७- साम उष्णिक् आदि छन्दों के स्वरूप निश्चय के लिए अग्रिम सूत्र को कहते हैं— ) द्वौ साम्नां वर्धेत । २।९ ॥ मृतसञ्जीवनी – गायत्रीत्यनुवर्तते । साम्नां पङ्क्तौ गायत्री द्वौ द्वौ संख्याङ्कौ गृहीत्वा वर्धिता पूर्वात् पूर्वाद्धर्धेत यावदष्टमं कोष्ठं प्राप्नोति । तत्र साम्रां पङ्क्तौ तृतीयादिषु कोष्ठेषु क्रमेण वर्धितान्यक्षराण्यङ्केन विन्यसेत् ॥ शिवप्रसादिनी - यहाँ पर " गायत्री " ( पि ० सू ० २।२ ) की अनुवृत्ति आती है । साम्नी गायत्री को षष्ठी पंक्ति के तृतीय कोष्ठक से आरम्भ करके अष्टम कोष्ठक तक क्रमशः दो - दो संख्या की वृद्धि से बढ़ाता हुआ अंक को लिखना चाहिए । अर्थात् षष्ठ ( १ ) ‘ ऋचामष्टादशार्णा स्यात्- ( अ ० पु ० ३१ ९ ।२ ) CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१८ छन्दः शास्त्रम् पंक्ति के द्वितीय कोष्ठक में जहाँ साम्नी गायत्री की ( १२ ) संख्या लिखी होती है, वहाँ से दो संख्या की वृद्धि करके तृतीय कोष्ठक में ( १४ ) अङ्क को लिखना चाहिए तदनन्तर चतुर्थ कोष्ठक में दो की वृद्धि करके ( १६ ) अंक लिखे, पुन: उसी प्रकार पञ्चम में ( १८ ) षष्ठ कोष्ठक में ( २० ) सप्तम में ( २२ ) एवं अन्तिम अष्टम में ( २४ ) संख्या होगी उदाहरण - इमं वृषणं कृणुतैक मिन्माम् " ( सा ० सं ० पू ० ६ | ३ | १० | ४ ) यद्यपि यहाँ पर स्वाभाविक रूप से बारह मात्रा की पूर्ति नहीं हो रही, तथाऽपि " कृतैम् " शब्द का = “ कृत + एकम् ” इस प्रकार से व्यूहा ( विग्रहाऽ ) वस्था में सुकरता के साथ उसकी पूर्ति हो जाती है ॥९ ॥
त्रींस्त्रीनृचाम् । २।१० ॥
मृतसञ्जीवनी – गायत्रीत्यनुवर्तते । ऋचां गायत्री त्रींस्त्रीस्त्रिसंख्याङ्कान् गृहीत्वा पूर्व-वद्वर्धेत् । अत्राप्यृचां पङ्क्तौ तृतीयादिषु कोष्ठेषु त्रि ( ३ ) संख्याङ्कक्रमेण वृद्धमङ्कं स्थापयेत् ॥ शिवप्रसादिनी — यहाँ पर भी " गायत्री " सूत्र की अनुवृत्ति आती है । सप्तम पङ्क्ति के तृतीया घर से तीन - तीन अङ्क की वृद्धि होती हुई अष्टम कोष्ठक ( घर ) तक क्रम से उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त हुई सङ्ख्या बैठेगी । अर्थात् सप्तमपंक्ति के द्वितीय घर में जो आर्ची गायत्री की अष्टादश ( १८ ) संख्या बैठती है, वह संख्या तीन - तीन के क्रम से बढ़ती हुई तृतीय घर में ( २१ ), चतुर्थघर में ( २४ ), पञ्चम में ( २७ ), षष्ठ में ( ३० ),
सप्तम में ( ३३ ), अष्टम में जाकर ( ३६ ) के क्रम से बैठती है ।
चतुरश्चतुरः प्राजापत्यायाः । २।११ ॥
मृतसञ्जीवनी — प्राजापत्यापङ्क्तौ गायत्री चतुरश्चतुरः संख्याङ्कान् गृहीत्वा वर्धेत | अत्रापि तृतीयादिषु कोष्ठेषु विन्यासः पूर्ववदेव ॥ चतुर्थ पंक्ति के तृतीय घर से प्राजापत्य गायत्री की चार - चार के क्रम से वृद्धि होती हुई अष्टम कोष्ठक में प्राजापत्यगायत्री होती है । वहाँ से में ( २० ), षष्ठ में ( देवी आदि, है— ) पर्यन्त यथा क्रम से बैठेगी । अर्थात् — चतुर्थ पंक्ति के द्वितीय कोष्ठक की ( ८ ) संख्या बैठती है, अर्थात् आठ अक्षर की प्राजापत्यगायत्री चार की वृद्धि करके तृतीय घर में ( १२ ), चतुर्थ में ( १६ ), पञ्चम ( २४ ), सप्तम में ( २८ ) एवम् अष्टम में ( ३२ ) संख्या बैठेगी ॥११ ॥
याजुषी आदि छन्दों के " उष्णिग् " आदि प्रभेदों को कहा जा रहा
एकैकं शेषे । २।१२ ॥
मृतसञ्जीवनी — अनुक्तः शेषः । यत्र गायत्र्यां संख्यावृद्धिर्नोक्ता सैकैकं संख्याङ्कं गृहीत्वा वर्धेत । देवी याजुषी च शेषशब्देनोच्यते । आसुर्यां विशेषाभिधानात् । तेन दैवी CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA