छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 181–190

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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तृतीयोऽध्यायः २ ९ का कथन हुआ है । छः अक्षरों वाले चार पादों का आर्षी गायत्री छन्द हुआ करता है, इन चारों पादों की अक्षर संख्या को मिलाने पर आर्षी गायत्री में चौबीस अक्षर पर्यवसित होते हैं । शिवप्रसादिनी- - इसका उदाहरण वृत्तिग्रन्थ में दिया गया है जिसको देखने से इस छन्द का स्वरूप सुस्पष्ट हो जाता है ॥ ८ ॥

( कहीं गायत्री छन्द इक्कीस ( २१ ) अक्षरों वाला भी होता है, इसी को लक्ष्य करके सूत्र कहते हैं - )

क्वचित्रिपादृषिभिः । ३ ।९ ॥

मृतसञ्जीवनी - क्वचिद्वेदे सप्ताक्षरोपलक्षितैः पादैस्त्रिभिर्गायत्र्येव भवति । एवमेकविंशत्यक्षराणि जायन्ते । यथा— ' युवाकु हि शचीनां ( १ ) यु॒वा॑ सु॒मती॒नाम् ( २ ) । भू॒याम॑ वाज॒दाया॑म् ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० १ अ ० १ व ० ३२ मं ० ४ ) शिवप्रसादिनी — ऋग्वेदादिकों में कहीं पर सात - सात अक्षरों के तीन पादों को मिलाकर इक्कीस ( २१ ) अक्षरों में भी गायत्री छन्द सम्पन्न हुआ करता है । उदाहरण इस सूत्र के वृत्ति ग्रन्थ में अवलोकनीय है ॥ ९ ॥

( सात अक्षर वाले पाद से घटित गायत्री छन्द के सञ्ज्ञा विशेष को कहा जा रहा है— )

सा पादनिचृत् । ३ । १० ॥

मृतसञ्जीवनी – सैव गायत्री ' पदनिचृत् ' इति संज्ञां लभते । प्रयोक्तुरदृष्टाभ्युदय-सम्बन्धज्ञापनार्थमियं संज्ञा वेदस्यानादित्वान्महत्त्वेऽपि च न दुष्टेति शिवप्रसादिनी - सा = पूर्व सूत्र में कही गयी सात अक्षरों वाली गायत्री ही " पाद निचृत् ” सञ्ज्ञा वाली होती है । वह पुनः छन्दः प्रयोक्ता के धर्मविशेषाऽऽत्मक अदृष्ट के साथ अभिव्यक्त सम्बन्ध को प्रकाशित करने के लिए की जाने वाली यह सञ्ज्ञा, वेद के अनादि होने के कारण महिमाशाली होने पर भी दुष्ट नहीं हुआ करती । अर्थात् छन्दः प्रयोक्ता के शुभाऽदृष्ट को प्रकाशित करने के लिए ही यह सञ्ज्ञा कही गयी है ॥ १० ॥

( अब “ अतिपादनिचृद् " गायत्री का लक्षण करते हैं— ) षट्कसप्तकयोर्मध्येऽष्टावतिपादनिचृत् । ३ । ११ ॥ मृतसञ्जीवनी - प्रथमः षडक्षरः, द्वितीयोऽष्टाक्षरः, तृतीयः सप्ताक्षरः । एवं त्रिभिः छ ० शा०-१२ -0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 182

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३० छन्दः शास्त्रम् पादैर्या गायत्री सा ‘ अतिपादनिचृत् ' इति संज्ञां लभते । ' त्रिपात् ' इत्यनुवर्तनीयम् । यथा— ( ' प्रेष्ठ॑ वो॒ अति॑थिं ( १ ) स्तु॒षे मि॒त्रम॑व प्रि॒यम् ( २ ) । अग्निं रथं वेद्य॑म् ( ३ ) ॥ ' ( ऋवेदे - अ ० ६ अ ० ६ व ० ५ मं ० १ ) । शिवप्रसादिनी – यहाँ पर " त्रिपाद " ( ३।९ ) की अनुवृत्ति होती है । इस प्रकार सूत्रार्थ होगा - जिस गायत्री छन्द में प्रथम पाद छ: अक्षर वाला, द्वितीय पाद आठ अक्षर वाला तथा तृतीय पाद में लघु - गुरू सञ्ज्ञक सात अक्षर विद्यमान हो, उन तीनों पादों को एकत्र समाहार किये जाने की स्थिति में त्रिपादगायत्री छन्द “ अतिपादनिचृत् ” इसके नाम से कहा जाता है || उदाहरण के लिए प्रकृत सूत्र का वृत्तिग्रन्थ अवलोकनीय है ॥११ ॥

( अग्रिम सूत्र से नागी गायत्री के लक्षण को कहा द्वौ नवकौ षट्कश्च नागी । ३ मृतसञ्जीवनी – द्वौ नवाक्षरौ पादौ, षडक्षरस्तृतीयः गायत्री भवति । यथा--( ' अग्ने॒ तमद्याश्वं न स्तोमै: ( १ ) ऋतुं न भ॒द्रं ऋ॒ध्यामा॑ त॒ ओहै: ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० जा रहा है— ) । १२ ॥ । एवं त्रिभिः पादैः ' नागी ' नाम ह॑दि॒स्पृश॑म् ( २ ) । ३ अ ० ५ व ० १० मं ० १ ) । शिवप्रसादिनी - जिस तीन पाद वाली गायत्री छन्द के प्रथम दो पादों में नौ - नौ संख्या वाले अक्षर हों, तथा तृतीय पाद में छः संख्या वाले अक्षर विराजमान हों, उस त्रिपाद गायत्री को " नागी " गायत्री कहते हैं । उदाहरण का स्वरूप वृत्ति में स्पष्ट है ॥१२ ॥

( वाराही गायत्री का लक्षण कहा जा रहा है— )

विपरीता वाराही । ३।१३ ॥

मृतसञ्जीवनी — इयमेव नागी गायत्री विपरीता यदा भवति तदा ‘ वाराही ’ नाम भवति । प्रथमः षडक्षरः पादो, द्वितीयतृतीयौ नवाक्षरौ । यथा-( ' वी॒त ं स्तु॑के स्तुके ( १ ) यु॒वम॒स्मासु निय॑च्छतम् ( २ ) । ( १ ) शौनककात्यायनमते त्वियं पदपङ्क्तिः । पादाश्च पञ्च, आदितस्त्रयः पञ्चाक्षराः, चतुर्थश्चतुरक्षरः, अन्त्यः षडक्षर इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 183

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तृतीयोऽध्यायः ३१ प्र प्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर ( ३ ) ॥ ' ( तै ० आ ० प्रपा ० ३ अ ० ११ मं ० २० ) शिवप्रसादिनी - पूर्व सूत्रोक्त लक्षण के विपरीत जिस गायत्री के प्रथमपाद में छः अक्षर हों, एवं द्वितीय तथा तृतीय पाद में नौ - नौ अक्षर हों वह वाली होती है । उदाहरण वृत्ति में देखें ॥ १३ ॥

( वर्द्धमाना, गायत्री के लक्षण को कहते हैं— ) ' षट्कसप्तकाष्टकैर्वर्धमाना । ३।१४ मृतसञ्जीवनी – षडक्षरः प्रथमः पादः, द्वितीयः सप्ताक्षर:, त्रिभिः पादैः ‘ वर्धमाना ' गायत्री भवति । यथा -' त्वम॑ग्ने॒ य॒ज्ञानां॒ ( १ ) होता॒ विश्वे॑षां ह॒ितः ( दे॒वेभि॒र्मानु॑षे॒ जने॑ ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे अ ० ४ अ ० गायत्री " वाराही ” नाम ॥ तृतीयोऽष्टाक्षरः । एवं २ ) । ५ व ० २१ मं ० १ ) शिवप्रसादिनी - जिस गायत्री के प्रथम पाद में छः अक्षर, द्वितीयपाद में सप्त अक्षर एवं तृतीयपाद में अष्ट अक्षर विद्यमान हों, उस गायत्री छन्द को वर्धमाना गायत्री कहते हैं । वृत्ति ग्रन्थ में उदाहरण देखें ॥ १४ ॥

( प्रतिष्ठागायत्री का लक्षण कहा जा रहा है— )

विपरीता प्रतिष्ठा । ३ । १५ ॥

मृतसञ्जीवनी — सैव वर्धमाना गायत्री विपरीता यदा भवति तदा ' प्रतिष्ठा ' नाम गायत्री भवति । अष्टाक्षरः प्रथमः पादः, द्वितीयः सप्ताक्षरः, षडक्षरस्तृतीयः । यथा-' आप॑ पृणी॒त भे॑ष॒जं ( १ ) वरू॑थं त॒न्वे॒ मम॑ ( २ ) । ज्योक्च॒ सूर्यं दृशे ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० १ अ ० २ व ० १२ मं ० १ ) ( १ ) ' पर ' इति व्यूहान्त्रवाक्षरत्वम् । उदाहरणान्तरं मृग्यम् । ( २ ) प्रातिशाख्ये वर्धमानाया भेदान्तरमपि दृश्यते— ' अष्टकौ मध्यमः षट्क एकेषा-मुपदिश्यते । ' ( १६।२२ ) इति । उदाहरणं तु— ‘ निष॑साद घृ॒तव॑तो॒ ( १ ) वरु॑णः प॒स्त्या॑३ स्वा ( २ ) । साम्राज्याय सुक्रर्तुः ( २ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० अ ० १ अ ० २ व ० १७ मं ० ५ ) तृतीयो व्यूहेनाष्टाक्षरः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 184

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३२ छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - वही वर्धमाना गायत्री जब विपरीत हो जाती है तब " प्रतिष्ठा ” कहलाती है । तदनुसार आठ अक्षर वाला प्रथम पाद, सात अक्षरवाला द्वितीय पाद, एवं छः अक्षरों से युक्त तृतीय पाद इस छन्द में होता है । उदाहरण का प्रदर्शन वृत्ति ग्रन्थ में है ॥१५ ॥

( विराट् गायत्री छन्द का लक्षण कहते हैं - ) तृतीयं द्विपाञ्जागतगायत्राभ्याम् ' । ३।१६ ॥ मृतसञ्जीवनी – तृतीयशब्देनैतदध्यायस्थसूत्रपाठक्रमापेक्षया विराजमाह । तथा चोक्तम्— ‘ विराजो दिश: ' ( पि ० सू ० ३।५ ) इति । यदा द्वादशाक्षरोऽष्टाक्षरश्च पादः स्यात्, ततस्ताभ्यां ' द्विपाद् विराड् ' नाम गायत्री भवति । यथा— ' नृभि॑ये॑मा॒नो ह॑र्य॒तो वि॑चक्ष॒णो ( १ ) राजा॑ दे॒वः स॑मु॒द्रय॑ः ( २ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० ७ अ ० ५ व ० १५ मं ० १ ) शिवप्रसादिनी – यहाँ पर " तृतीय " पद से इस अध्याय में स्थित सूत्र पाठकृत क्रम की अपेक्षा से विराट् नामक गायत्री छन्द विवक्षित है । अर्थात् " गायत्र्या वसवः " ' } ( ३।३ ) जगत्या आदित्या: ( ३।४ ) - इन दोनों सूत्र की अपेक्षा जो तृतीय सूत्र “ विराजो दिश: ” ( ३।५ ) प्रकृत में तृतीय पद से इसी " विराट् ” छन्द का ग्रहण अभीष्ट है । जब बारह अक्षर वाला जगती छन्द का एक पाद एवम् अष्ट अक्षर वाला गायत्री छन्द का दूसरा पाद एक स्थान में उपस्थित होता है, अर्थात् उपर्युक्त दो पाद एकत्रित होता है तब वह ‘ “ द्विपाद विराट् ” नामक गायत्री छन्द कहलाता है । उदाहरण के लिए वृत्ति ग्रन्थ दे रखना चाहिए ॥१६ ॥

( एकादश अक्षरों वाले त्रिपादात्मिका विराट्गायत्री का लक्षणसूत्रकार कहते हैं— )

त्रिपात्रैष्टुभैः । ३।१७ ॥

मृतसञ्जीवनी– ' तृतीयम् ' इत्यनुवर्तते । एकादशाक्षरैः पादैः ' त्रिपाद् विराड् ' नाम ( १ ) अत्र क्रमोऽविवक्षितः । जागतग्रहणं च त्रैष्टुभस्याप्युपलक्षकम् । तेन— ' वसु॑र॒ग्निर्वसु॑नवा॒ ( १ ) अच्छनक्षि द्यु॒मत्त॑मं र॒यिंदा॑ः ( २ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० अ ० ४ अ ० १ व ० १६ मं ० २ ) इत्यादीनामपि सङ्ग्रहः । यद्यपि भूम्ना विराडाख्यं स्वतन्त्रमेव छन्दः श्रूयते, तथापि लाघवार्थमस्य भेदानां तत्र तत्रान्तर्भावः सप्तच्छन्दोवादावष्टम्भेन विहित इति बोध्यम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 185

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तृतीयोऽध्यायः ३३ गायत्री ' भवति । यथा-' दु॒ही॒यन्मि॒त्रधि॑तये॒ युवा॑ ( १ ) रा॒ये च॑ नो मिमी॒तं वाज॑व॒त्यै ( २ ) । इषे च॑ नो मिमीतं धेनुमत्यै ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० १ अ ० ८ व ० २३ मं ० ४ ) इति गायत्र्यधिकारः । ( १ ) शौनककात्यायनाभ्यां त्विदमनुष्टुब्भेदेषु परिगणितम् । ( २ ) गायतां त्राणात् गायत्री । ' गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मणः । त्रिगमना वा विपरीता गायतो मुखादुदपतदिति च ब्राह्मणम् । ' ( नि.अ. ७ खं. १२ ) इति यास्कः । भगवता कात्यायनेन तु गायत्र्या नव भेदाः प्रदर्शिताः - ' प्रथमं छन्दस्त्रिपदा गायत्री ( १ ) पञ्चकाश्चत्वारः षट्कश्चैकः, चतुर्थश्चतुष्को वा पदपङ्क्तिः ( २ ) षट्सप्तैकादशा उष्णिग्गर्भा ( ३ ) त्रयः सप्तका: पादनिचृत् ( ४ ) मध्यमः षट्कश्चेदतिनिचृत् ( ५ ) दशकश्चेद्यवमध्या ( ६ ) यस्यास्तु षट्सप्तकाष्टकाः सा वर्धमाना ( ७ ) विपरीता प्रतिष्ठा ( ८ ) द्वौ षट्कौ सप्तकश्च हसीयसी ( ९ ) ' इति । ( ऋ ० सर्वा ० ४ शु ० य ० सर्वा ० ५।२ ) ( १ ) तत्र त्रिपदा गायत्री यथा-‘ अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं ( १ ) य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म् ( होता॑रं रत्न॒धात॑मम् ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० १ । १ । ( २ ) पदपङ्क्तिः पङ्क्तयधिकारे दर्शयिष्यते । ( ३ ) उष्णिग्गर्भा-' ता मे॒ अव्या॑नां॒ ( १ ) हरी॑णां नि॒तोश॑ना ( २ ) । उ॒तो नु कृ॒त्या॑नां नृ॒वाह॑सा ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० प्रथमतृतीयपादयोः संयोगव्यूहेनाक्षरसङ्ख्यापूर्तिः । ( ४ ) पादनिचृदुदाहृतैव ( ३।९ ) । ( ५ ) अतिनिचृत्— ‘ पु॒रू॒तम॑ पु॒रू॒णां ( १ ) स्ता॑तॄणां विर्वाचि ( २ ) । २ ) । १ | १ ) ६ २ २५/३ ) वाजे॑भिर्वाजय॒ताम् ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० ४।७।२६।४ ) ( ६ ) यवमध्या दर्शयिष्यते ( ३।५८ ) ( ७ ) वर्धमाना ( ८ ) प्रतिष्ठा चोदाहृते ( ३।१४, १५ ) यथास्थानम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 186

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३४ छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - यहाँ पूर्वसूत्र से " तृतीयम् " इसकी अनुवृत्ति आ रही है । ग्यारह अक्षर वाले तीन पादों से युक्त छन्द को “ त्रिपाद विराट् ” गायत्री छन्द कहा जाता है ॥१७ ॥

( इति गायत्र्याधिकार विहित कार्य का समापन हुआ । अथ उष्णिगधिकारः में विहित कार्य का आरम्भ किया जाता है । इस समय उष्णिग् छन्दोऽधिकार का आरम्भ सूचित किया जा रहा है— )

उष्णिग्गायत्री जागतश्च । ३ । १८ ॥

मृतसञ्जीवनी — यत्र गायत्रावष्टाक्षरौ पादौ, जागतश्च द्वादशाक्षरः, एवं त्रिभिः ‘ उष्णिग् ’

नाम छन्दो भवति । अत्र च क्रमो न विवक्षितः । पादसंख्यामात्रं विधीयते ॥

शिवप्रसादिनी - जहाँ पर अर्थात् जिस छन्द में अष्टाऽक्षर युक्त गायत्री का दो पाद तथा द्वादशाक्षर से युक्त जगती का एक पाद हो, उन तीनों पादों के परस्पर मिलने से “ उष्णिक् ” नामक छन्द होता है । ( उपर्युक्त छन्द में पादक्रम के नियम सन्निवेश की कोई व्यवस्था नहीं है, किन्तु अष्टाऽक्षर वाले गायत्री के दो पाद, तथा द्वादशाक्षर युक्त जगती के एक पाद की संख्या अवश्य होनी चाहिए, अर्थात् यहाँ पर पादक्रम में नियम न होकर पाद संख्या का नियम आवश्यक है ॥ १८ ॥

( ९ ) ह्रसीयसी – आर्चीत्वेनोदाहृतैव ( ऋ ० सं ० ६।७।१४।५ ) अत्राप्यनुसन्धेया । लक्षणे क्रमस्याविवक्षितत्वात्— ' इन्द्र॑ः सहस्रा॒दाव्नां॒ ( १ ) वरु॑ण॒ शंस्या॑नाम् ( २ ) । ऋतु॑र्भवत्यु॒क्थ्य॑ः ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० १ | १ | ३२ | ५ ) इत्यादीनामपि संग्रहः ॥ प्रातिशाख्येऽन्यदपि भेदद्वयं दृश्यते— ' अष्टको दशकः सप्तको विद्वांसाविति सा भुरिक् । ' ' स नो वाजेषु पादौ द्वौ जागतौ द्विपदोच्यते । ' ( पटल: १६ सू ० १७,२३ ) इति । आद्या यथा-‘ वि॒द्वांसा॒ विद्दुरैः पृच्छे ( १ ) दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ( २ ) । नूचिन्नु मर्ते अक्र ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० १।८।२२।२ ) कात्यायनस्त्विमां ककुभमुक्तवान् । द्वितीया यथा-‘ स नो॒ वाजे॑ष्ववि॒ता पु॒रूव॑सुः ( १ ) पु॑रस्था॒ता म॒घवा॑ वृत्र॒हा भु॑वत् ( २ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० ६ | ४ | ३ | ३ ) क्वचिदष्टाक्षरपादद्वयवत्यपि द्विपदा गायत्री दृश्यते । यथा-' ते सुतासो मदिन्तमा: ( १ ) शुक्रा वा॒युम॑सृक्षत ' । ( ऋ ० सं ० ६।२।१६।३ ) एवं शङ्कुमती - ककुद्मत्यादयोऽन्येऽपि गायत्रीभेदास्तत्र तत्र वक्ष्यमाणा इहानु-सन्धेयाः । दैव्यादयस्तूक्ता एवेति दिक् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 187

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तृतीयोऽध्यायः ( अब उष्णिक् छन्द के भेद को कहा जा रहा है- )

ककुम्मध्ये चेदन्त्यः । ३।१ ९ ॥

मृतसञ्जीवनी – गायत्रयोः पादयोर्मध्ये जागतश्चेत्पादो भवति ' ककुप् ' संज्ञां लभते । यथा— ' युष्माकै स्मा रथ अनु ( १ ) मुदे देधे मरुतो जीरदानवः वृ॒ष्टीद्या॑वो य॒तीरिव॑ ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० ४ अ ० ३ शिवप्रसादिनी - जिस छन्द का प्रथम एवम् अन्तिम पाद आठ - आठ अक्षरों वाला हो, तथा मध्य पाद ( जगती सम्बन्धी ) बारह इस प्रकार के उष्णिक् छन्द की " ककुप् ” सञ्ज्ञा होती है ॥१९ ॥

( पुर उष्णिक् छन्द का लक्षण कहा जा रहा है— )

पुरउष्णिक्पुरः । ३ ।२० ॥

३५ , तदेयम् उष्णिक् ( २ ) । व ० ११ मं ० ५ ) ( गायत्री सम्बन्धी ) मात्राओं वाला हो, स एव पादो जागतश्चेत् प्रथमो भवति, गायत्रो च परतः, तदा ' पुरउष्णिक् ' नाम भवति । यथा— " अ॒प्स्वन्तर॒मृत॑म॒प्सु भे॑ष॒ज ( १ ) म॒पामु॒त प्रश॑स्तये ( २ ) । देवा॒ भव॑त वाजिन॑ः ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० १ अ ० २ व ० ११ मं ० ४ ) शिवप्रसादिनी - जिस छन्द का प्रथम पाद जागत हो अर्थात् बारह मात्रा वाला हो, और शेष अन्त्य तथा मध्य का गायत्र दो पाद हों = आठ - आठ अक्षरों वाला हों, वह छन्द “ पर उष्णिक् ’ " छन्द कहलाता है ॥२० ॥

( परोष्णिक् छन्द का लक्षण कहते हैं— )

परोष्णिक्परः । ३ । २१ ॥

मृतसञ्जीवनी - एवं जागतः पादः परतश्चेद्भवति, पूर्वौ च गायत्रौ, तदा ' परोष्णिक् ’ नाम च्छन्दो भवति । ‘ उष्णिग्गायत्रौ जागतश्च ' ( पि ० सू ० ३।१८ ) इत्यनेन गतार्थमेतत् विशेषसंज्ञाभिधानार्थ पुनरुच्यते । प्रथमसूत्रे ( पि ० सू ० ३।२० ) उष्णिग्ग्रहणमधिकारार्थम् । यथा— ( १ ) अप्सु अन्तः इति व्यूहात् पादपूर्तिः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 188

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३६ छन्दः शास्त्रम् ‘ अग्ने॒ वाज॑स्य॒ गोम॑त॒ ( १ ) ईशा॑नः सहसो यहो ( २ ) । अ॒स्मे धैहि जातवेदो महि॒ श्रवः ( ३ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० १ अ ० ५ व ० २७ मं ० ४ ) शिवप्रसादिनी - जिस छन्द में अन्तिम पाद बारह अक्षरों वाला, तथा आदि में विद्यमान शेष दो पाद आठ अक्षरों वाला हो, उस छन्द को " परोष्णिक् ” कहते हैं ॥२१ ॥

( कहीं - कहीं पर सात - सात अक्षरों वाले चार पाद के होने पर भी उष्णिक् छन्द होता है, इसको दिखाने के लिए अग्रिम सूत्र अवतरित होता है— )

चतुष्पादृषिभिः । ३ । २२ ॥

मृतसञ्जीवनी– सप्ताक्षरैश्चतुर्भिः पादेः ' उष्णिक् ' एव भवति । यथा— न॒दं व॒ ओद॑तीनां ( १ ) नदं यो यु॑वती॒नाम् ( २ ) । पति॑ वो॒ ' अध्न्या॑नां ( ३ ) धेनु॒नाम॑षुध्यसि ( ४ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० ६ अ ० ५ ० ५ मं ० २ ) ' इत्युष्णगधिकारः । ( १ ) ‘ अघ्नीयानाम् ’ इतीयशब्देन पूर्ति । ( २ ) ' चतुरुत्तरवृद्ध्यारम्भादूर्ध्वं स्निह्यतीत्युष्णिक् । उष्णिगुत्स्नातां भवति । स्निह्यतेर्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । उष्णीषिणी वेत्यौपमिकम् ' इति यास्कः ( नि.अ.७ खं. १२ ) । अयमेव शब्द आकारान्तोऽपि यथा – ' उ॒ष्णहा॒ छन्द॑ इन्द्रि॒यम् ', ( यजुर्वेदे-अ ० २१ मं ० १३ ) ‘ बृह॒त्युष्णहा॑ क॒कुप्सूचीभ॑ः शम्यन्तु॒ त्वा ' ( यजुर्वेदे - अ ० २३ मं ० ३३ ) ‘ शृ॒णातु॑ गी॒वाः प्रश॑णातू॒ष्णहा॑ वृ॒त्रस्ये॑व॒ शची॒पति॑ः ' ( अथर्ववेदे - कां ० ६ अ ० १३४ सू ० १ ) । भगवता कात्यायनेन तूष्णिहोऽष्टौ भेदा उक्ता:, यथा— ' द्वितीयमुष्णिक्त्रिपदान्त्यौ द्वादशकः ( १ ) आद्यश्चेत्पुरउष्णिक् ( २ ) मध्यम-मेश्चेत्ककुप् ( ३ ) त्रैष्टुभजागतचतुष्काः ककुब् न्यङ्कुशिराः ( ४ ) एकादशिनोः परः षट्कस्तनुशिरा ( ५ ) मध्यश्चेत्पिपीलिकमध्या ( ६ ) आद्यः पञ्चक-स्त्रयोऽष्टका अनुष्टुब्गर्भा ( ७ ) चतुःसप्तकोष्णिगेव ( ८ ) इति ' ( सर्वा. खं. ५ ) एषु ( १ ) उष्णिक् — परोष्णिगेव ( ३।२१ ) । सा च दर्शिता । ( २-३ ) पुरउष्णिक् - ककुप् - चोदाहृते ( ३।२०,१ ९ ) ( ४ ) ककुब्न्यङ्कुशिरा: -' द॒दी रेक्ण॑स्त॒न्वे॑ द॒दिर्वसु॑ ( १ ) द्दिर्वार्जेषु पुरुहूत वा॒जिन॑म् ( २ ) । नुनमर्थ ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० ६ | ४ | ३ | ५ ) प्रथमपादे व्यूहात्पूरणम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 189

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तृतीयोऽध्यायः ३७ ( ५ ) तनुशिरा: -' प्र या घोषे॒ भृग॑व्राणे॒ न शोभे ( १ ) यया॑ वा॒चा यज॑ति पचि॒यो वा॑म् ( २ ) । प्रेषयुर्न विद्वान् ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० ११८।२२।५ ) ( ६ ) पिपीलिकमध्या-' हरी यस्य॑ सु॒युजा॒ विप्र॑ता॒ वे ( १ ) रर्व॒न्तानुशेष ( २ ) । उभा रजी न केशिना पतिर्दन् ( ३ ) ॥ ' ( ऋ ० सं ० ८।५।२६।२ ) ( ७ ) अनुष्टुब्गर्भा-' पि॒तुं न स्तो॑षं ( १ ) म॒हो ध॒र्माण॒ तवि॑षीम् ( २ ) । यस्य॑ त्रि॒तो व्योज॑सा ( ३ ) वृ॒त्रं वि प॑र्वम॒र्दय॑त् ( ४ ) || ' ( ऋ ० सं ० २।५।६।१ ) तृतीयपादे ' विओ ' इति विकर्षणेन पूर्तिः । ( ८ ) चतुष्पादुदाहृता ( ३।२२ ) प्राग्दर्शिता दैव्यादिभेदा ( २।३-८, १५ ) अप्यत्राऽनुसन्धेयाः ( १ ) दैवी - ' भुव: ' ( तै ० आ ० प्र ० १० अ ० २७ ) ( २ ) आसुरी - ' नम॑स्ते अस्तु पश्यत॒ पश्य॑ मा पश्यत । ' ( अथ ० सं ० कां ० १३ ( ३ ) प्राजापत्या – ' निर्दग्ध॒ रक्षो॒ निर्दग्धा॒ अरा॑तयः । ' ( तै ० सं ० कां ० ( ४ ) याजुषी — ' य॒ज्ञस्य॑ घ॒षदसि । ' ( तै ० सं ० कां ० १ प्र ० । तदुदाहरणानि तु— सू ० ४ सं ० ५५ ) १ ० १ अ ० ७ ) १ अ ० २ मं ० १ ) ( ५ ) साम्नी —— शुन्ध॑ध्व॒ दैव्या॑य॒ कर्म॑णे देवय॒ज्याये॑ । ' ( तै ० सं ० १।१।३।१ ) ( ६ ) आर्ची — ‘ तद॒ग्निरा॑ह॒ तद॒ सोम॑ आह पू॒षा मा॑ धात्सुकृ॒तस्य॑ १६।९ ।२ ) ( ७ ) ब्राह्मी — ' होता॑ यक्ष॒दिना॑भि॒रिन्द्र॑मीड॒तमा॒जुह्वा॑न॒मम॑र्त्यम् । दे॒वो दे॒वैः सर्वा॑यो॒ वज्र॑हस्तः पुरंद॒रो वेत्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑ । ' ( शु ० य ० वा ० सं ० अ ० यानि तूक्तेभ्य ईषत् विलक्षणानि-' ऊ॒र्ध्वा अ॑स्य स॒मिधॊ भव ( १ ) न्त्यूर्ध्वा शुक्रा शो॒चीय॒ग्नेः द्यु॒मत॑मा सुप्रतीकस्य सुनोः ( ३ ) ॥ ' ' तनूनपा॒दसु॑रो वि॒श्ववे॑दा ( १ ) दे॒वो दे॒वेषु॑ दे॒वः ( २ ) । प॒थ आन॑क्ति॒ मध्वा॑ घृ॒तेन ( ३ ) ॥ ' ' मध्वा॑ य॒ज्ञं न॑क्षसे ( १ ) प्रीणा॒नो नरा॒शस अग्रे ( २ ) । लोके । ( अथ ० सं ० २८ मं ० ३ ) इति । ( २ ) । सु॒कृद्दे॒वः स॑वि॒ता वि॒श्ववा॑रः ( ३ ) ॥ ' ( तै ० सं ० ४।१।४।१-३ ) इत्यादीनि छन्दांसि वेदेषूपलक्ष्यन्ते तेषां निचृदादिविशेषणवत्त्वकल्पनयोक्ते-ष्वेवान्तर्भाव ऊह्य इति दिक् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 190

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत, पृष्ठ 190 का मूल पृष्ठ
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३८ छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - सात अक्षर के चार पादों से युक्त छन्द को भी “ उष्णिक् ” छन्द कहा जाता है || २२ ॥ यहाँ तक ग्रन्थ से उष्णिक् छन्द से सम्बन्धित विचार समाप्त हुआ । ( अनुष्टुप् छन्द के कार्य से सम्बन्धित सूत्र आरम्भ किया जा रहा है— )

अनुष्टुब्गायत्रैः । ३ । २३ ॥

मृतसञ्जीवनी — ‘ चतुष्पाद् ' इत्यनुवर्तते । गायत्रैरष्टाक्षरैः पादैश्चतुष्पाच्छन्दः ' अनुष्टुप् ’ संज्ञं भवति । यथा — स॒हस्र॑शीषो॒ पुरु॑षः ( १ ) सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् ( २ ) । स भूमिं वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा ( ३ ) त्य॑तिष्ठद्दशाङ्गुलम् ( ४ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० ८ अ ० ४ व ० १७ मं ० १ ) शिवप्रसादिनी — यहाँ पूर्व सूत्र से " चतुष्पाद " की अनुवृत्ति आती है — गायत्र आठ अक्षरों से बने चारपादों वाले छन्द की " अनुष्टुप् ” सञ्ज्ञा होती है ॥२३ ॥

( अनुष्टुप् छन्द के भेद विशेष को आगे के सूत्र से कहते हैं— ) त्रिपात् क्वचिज्जागताभ्यां च । ३ । २४ ॥ मृतसञ्जीवनी - ' अनुष्टुब् ' इत्यनुवर्तते । चकाराद्गायत्रग्रहणं च । गायत्रेणैकेन ततो द्वाभ्यां जागताभ्यां क्वचित् ' त्रिपादनुष्टुब् ' भवति ॥ शिवप्रसादिनी - पूर्व सूत्र से यहाँ पर “ अनुष्टुप् ” की अनुवृत्ति होती है । सूत्र में " च " ग्रहण से तृतीया एकवचनान्त में विपरिणमित करके " गायत्रेण " इसकी भी अनुवृत्ति होती है । तदनुसार सूत्राऽर्थ का स्वरूप होगा - गायत्री छन्द के पाद के साथ-साथ उत्तरवर्ती जगती छन्द के दो पाद का जिस छन्द में सन्निवेश हो, वह “ त्रिपादनुष्टुप् ” छन्द कहा जाता है । इसका आशय यह है कि जिस छन्द में गायत्री छन्द के अष्ट अक्षर वाला प्रथम पाद, तथा बारह अक्षर वाला जगती छन्द का दो पाद विद्यमान हों, वह “ त्रिपादनुष्टुप् ” छन्द नाम से कहा जाता है ॥ २४ ॥

( त्रिपादनुष्टुप्छन्द के भेद विशेष को आगे के सूत्र से कहते हैं— )

मध्येऽन्ते च । ३ । २५ ॥

मृतसञ्जीवनी — जागतयोः पादयोर्मध्येऽन्ते च यदा गायत्रः पादो भवति, तदाप्य-नुष्टुवेव स्यात् । यथा-‘ पर्युषु ' प्रध॑न्व॒ वाज॑सातये॒ ( १ ) प॑रिवृ॑त्राणि॑ स॒क्षणि॑ ( २ ) । ( १ ) ' प्रधनुव ', ' अधिया ', इत्युवियशब्देन पादपूर्तिः, CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA