छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 231–240

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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चतुर्थोऽध्यायः ७ ९ ( ७ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे अ ० २ अ ० १ ० २२ मं ० ६ ) । अष्टषष्ट्यक्षरमत्यष्टिः । यथा-' अद॑र्शि गा॒तुरु॒रवे॒ वरी॑यसा॒ ( १ ) पन्था॑ ऋ॒तस्य॒ सम॑य॑स्त र॒श्मिभिः॒ ( २ ) श्चक्षु॒र्भग॑स्य र॒श्मिभि॑ः ( ३ ) । द्यु॒क्षं मि॒त्रस्य॒ साद॑न ( ४ ) मर्य॒म्णो वरु॑णस्य च ( ५ ) । अथा॑दधाते बृ॒हदु॒क्थ्य॑ते॒ वय॑ ( ६ ) उपस्तुत्यं बृहद्वर्यः ( ७ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे -अ ० २ अ ० १ व ० २६ मं ० २ ) । चतुःषष्ट्यक्षरमष्टिः । यथा— ' त्रिर्कद्रुकेषु महि॒षो यर्वाशिरं ( १ ) तुवि॒शुष्म॑स्तु॒पत्सोम॑मपिब॒ ( २ ) द्विष्णु॑ना सुतं यथाशत् ( ३ ) स ई ममाद् महि॒ कर्म॒ कर्तवे म॒हामुरुं ( ४ ) सैन॑ सश्चद्दे॒वो दे॒वं ( ५ ) स॒त्यमिन्द्र॑ स॒त्य ' इन्द्र॑ः ( ६ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० २ अ ० ६ व ० २८ मं ० १ ) । षष्ट्यक्षरमतिशक्वरी । यथा-‘ सा॒कं जा॒तः ऋतु॑ना सा॒कमोज॑सा ववक्षिथ ( १ ) सा॒कं वृद्धो वी॒र्य॑ः सास॒हिर्मृधा॒ विच॑र्षणि: ( २ ) । दाता॒ राध॑ः स्तुव॒ते काम्यं॒ वसु॒ ( ३ ) सै न सश्चद्दे॒वो दे॒वं ( ४ ) स॒त्यमिन्द्र॑ स॒त्य ' इन्द्र॑ः ( ५ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - - अ अ ० २ अ ० ६ व ० २८ मं ० ३ ) । षट्पञ्चाशदक्षरा शक्वरी । यथा-‘ प्रौष्व॑स्मै॑ पु॒रोर॒थ ( १ ) मिन्द्रा॑य शु॒षम॑र्चत ( २ ) । अ॒भीके॑ चिदु लोक॒कृत् ( ३ ) स॒ङ्गे स॒मत्सु॑ वृत्रहा ( ४ ) ऽस्माकं बोधि चोदि॒ता ( ५ ) नभ॑न्तामन्य॒केषा॑म् ( ६ ) ज्या॒का अधि॒धन्व॑सु ' ( ७ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० ८ अ ० ७ व ० २१ मं ० १ ) । द्विपञ्चाशदक्षरमतिजगती । यथा-' स भ्रात॑रं॒ वरु॑णमग्न॒ आव॑वृत्स्व ( १ ) दे॒वाँ अच्छ सुम॒ती य॒ज्ञव॑नसं॒ ( २ ) ज्येष्ठ॑ य॒ज्ञव॑न॒सम् ( ३ ) । ऋ॒तावा॑न॒मादि॒त्यं च॑र्षणी॒धृतं ( ४ ) राजा॑नं चर्षणी॒धृत॑म् ( ५ ) ॥ ' ( ऋग्वेदे - अ ० ३ अ ० ४ व १२ मं ० २ ) । अष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती । यथा-‘ इन्द्र॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमू॒तये॒ ( १ ) मारु॑तं॒ शर्धो अदि॑तिं हवामहे ( २ ) । ( १-३ ) एषु व्यूहान्यूनता परिहार्या । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 232

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८० छन्दः शास्त्रम् रथं न दु॒र्गाद्व॑सवः सु॒दानवो॒ ( ३ ) विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्षि॑पर्तन ( ४ ) ॥ ( ऋग्वेदे-: - अ ० १ अ ० ७ व ० २४ मं ० १ ) शिवप्रसादिनी - पूर्वोक्त दो स्वरूप में जिनके उच्चारण का विधान पूर्वसूत्र से हुआ है, वहाँ पर प्रत्येक प्रत्येक के द्वितीय उच्चारण का विषयीभूत जो “ धृति- अष्टि ’ आदि शब्दों में द्वितीय धृति - अष्टि आदि शब्द हैं, वे अति शब्द पूर्वक ही प्रयुक्त होगें । अर्थात् द्वितीय धृति आदि शब्दों को, अति शब्द के आगे प्रयोग में लाना चाहिए । जिसके परिणाम स्वरूप छिहत्तर ( ७६ ) अक्षरों वाला छन्द अतिधृति, तथा बहत्तर अक्षरों वाला छन्द धृति सञ्ज्ञक होगा, अड़सठ अक्षरों वाला अत्यष्टि, चौंसठ अक्षरों वाला अष्टि, साठ अक्षरों के छन्द का नाम अतिशक्वरी, छप्पन अक्षरों वाला छन्द शक्वरी, बावन ( ५२ ) अक्षरों से युक्त छन्द अतिजगती सञ्ज्ञक होगा, तथा अड़तालिस अक्षरों से युक्त छन्द जगती नाम वाला हुआ करती है ॥७ ॥

अथ लौकिकम् ।४।८ ॥

मृतसञ्जीवनी – अधिकारोऽयमाशास्त्रपरिसमाप्तेः । पूर्वेषां छन्दसां वैदिकत्वमेव । इतः प्रभृत्यार्यादीनां चूलिकापर्यन्तानां लौकिकत्वमेव । ' समान्यादीनामुत्कृतिपर्यन्तानां वैदिकत्वं लौकिकत्वं च । अत्र वैदिकच्छन्दसां प्रस्तावे प्रसङ्गाद्वेदवदनादिमुनिपारम्पर्यागतं

स्मृतिपुराणेतिहासादिषु दृश्यमानमार्यादिदण्डकपर्यन्तं लौकिकच्छन्दोजातमधिक्रियते ।

तन्मूलत्वात्काव्यस्य । काव्यं च कीर्तिरूपत्वादानन्दहेतुत्वाच्च पुरुषार्थः ॥

शिवप्रसादिनी - यहाँ से प्रकृत शास्त्र की समाप्ति पर्यन्त " लौकिक ” छन्द का अधिकार ( उत्तरोत्तर सूत्र में अनुवृत्ति ) जाएगा । इससे पूर्व में सूत्र द्वारा उपस्थापित छन्द केवल वैदिक ही हैं । यह बात यहाँ के लौकिकाऽधिकार से स्पष्ट होती है । जिसके परिणामस्वरूप इस’लौकिक छन्दाऽधिकार में आए सूत्रों से विहित आर्या से लेकर चूलिका पर्यन्त तक के छन्द लौकिक ही होंगे । किन्तु " ग्लिति समानी ” ( पि ० सू ० ५।६ ) इत्यादि सूत्र विहित “ समानी " आदि से लेकर उत्कृति पर्यन्त छन्दों तक लौकिकत्व के साथ - साथ वैदिकत्व भी रहता है । वैदिक छन्दों के प्रकाशक प्रकृत शास्त्र में लौकिक छन्दों के भी वर्णन करने का अभिप्राय यह है कि- वेद के समान अनादिमुनि परम्परा से प्राप्त स्मृति - पुराण - इतिहासाऽऽदि स्वरूप काव्य ग्रन्थों में, आर्या आदि से लेकर दण्डक पर्यन्त लौकिक छन्द समूह देखे जाते हैं । यतः काव्य छन्द मूलक ही हुआ करता है और कीर्ति तथा आनन्द का हेतु होने के कारण काव्य पुरुषाऽर्थ का साधन है तथा काव्य सृष्टि के माध्यम से छन्द भी पुरुषाऽर्थसाधक सिद्ध होता है ॥८ ॥

( वैदिक छन्द के समान लौकिक छन्द का भी ज्ञान करने के लिए अतिदेश सूत्र ( १ ) ' ग्लिति समानी ' ( पि ० सू ० ५।६ ) इति सूत्रबोधितं छन्दः CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 233

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चतुर्थोऽध्यायः ८१ कहा जा रहा है- ) अत्रैष्टुभाच्च यदार्षम् ' ।४।९ ॥ मृतसञ्जीवनी — आङभिविधौ । त्रिष्टुबेव त्रैष्टुभम् । स्वार्थे तद्धितः । गायत्र्यादित्रिष्टुपपर्यन्तं यदार्षं छन्दोजातं वैदिके व्याख्यातं, लौकिके च तत्तथैव द्रष्टव्यम् । किं तदार्षम्? चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री, अष्टाविंशत्यक्षरोष्णिक्, द्वात्रिंशदक्षरानुष्टुप् षट्त्रिंशदक्षरा बृहती, चत्वारिंशदक्षरा पङ्गिः, चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् । चः समुच्चये ॥ सूत्र में आ ( ङ् ) अभिविधि अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । " तेनसहितम् = अभिविधिः ”, अर्थात् जहाँ से कहा जाय उस अवधि को लेकर अभिविधि होती है । त्रैष्टुभ - शब्द में स्वार्थिक तद्धित अण् प्रत्यय हुआ है, जिससे त्रैष्टुभ शब्द का त्रिष्टभ् ( प् ) छन्द ही अर्थ होगा । इस प्रकार सूत्र का तात्पर्यार्थ होगा - गायत्री से लेकर त्रिष्टुप्पर्यन्त जो वैदिक छन्द पूर्व में व्याख्यान के विषय बनाए गये हैं । उन सभी छन्दों को उसी प्रकार लौकिक छन्द के रूप में भी ग्रहण किया जाना चाहिए । गायत्री आदि वे वैदिक छन्द किस प्रकार हैं? इसका वृत्तिग्रन्थ में इस प्रकार समाधान प्रस्तुत हुआ है — वेद में चौबीस अक्षरों वाला गायत्री छन्द, अठांईश ( २८ ) अक्षरों वाला उष्णिक्, बत्तीस अक्षरों का अनुष्टुप् छत्तीस अक्षरों वाला बृहती छन्द, चालिस अक्षरों का पंक्ति, तथा चौवालिस अक्षरों का त्रिष्टुप् छन्द हुआ करता है | सूत्र में " च " शब्द सम्मुच्चयाऽर्थ में प्रयुक्त हुआ है । जिसके परिणामस्वरूप वेद के छन्द से नियमाऽनुसार लौकिक छन्दों की अक्षर संख्या भी होगी ॥९ ॥

( अब पाद का लक्षण कहते हैं - )

पादश्चतुर्भागः'।४।१० ॥

( १ ) ' आर्षमा त्रैष्टुभात्स्मृतम् । त्रैष्टुप्पङ्क्तिश्च बृहती अनुष्टुबुष्णिगीरितम् ॥ गायत्री स्यात्सुप्रतिष्ठा प्रतिष्ठा मध्यया सह । अत्युक्तोक्ता आदितश्च एकैकाक्षरवर्जितम् ॥ ' ( ३३१।३-४ ) इत्याग्नेये । ( २ ) इदं च लक्षणं प्रायिकत्वात् । आर्यासु अर्धसमविषमेषु च न्यूनाधिकाक्षरदर्शनात् । विपुलाचूलिकादिषु विपुलायां यतिमात्रं निषिद्धं त्रिषु गणेषु; ' चूलिकार्धमेकोनत्रिंशत् ० ' ( छं ० शा ० ४।५ २ ) इत्यर्धस्य लक्षणकथनेऽपि एकाक्षरन्यूनाधिकभावेन पादः कल्पनीयः इति तरुणवाचस्पतिः । पादलक्षणं मन्दारमरन्दे - ' छन्दसा ग्रथितः शब्दः पाद इत्यभिधीयते । ' ( १।९ ) इति । इदमत्रावगन्तव्यम् - एकद्व्यादिवर्णघटितपादचतुष्ट-यात्मकवृत्ते वक्तुः श्रोतुर्वा पादत्वेन तात्पर्ये सति वृत्तमेव । एतदेकाक्षरमारभ्य चतुर्विंशतिवर्णपर्यन्तवर्णघटितवाक्य एव । पञ्चविंशतिषड्विंशतिवर्णात्मकवाक्ये पादत्वमेव । तत ऊर्ध्वं तु न पादत्वम् इति तद्व्याख्यायाम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 234

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८२ छन्दः शास्त्रम् मृतसञ्जीवनी – चतुर्भागश्चतुर्विंशत्यक्षराया गायत्र्याश्चतुर्थो भागः पादसंज्ञां लभते ।

गायत्र्याः षडक्षरपादः । एवमुष्णिगादिष्वपि द्रष्टव्यम् । समवृत्तविषयमेतत् ' ॥

शिवप्रसादिनी — चौबीस अक्षरों वाले गायत्री आदि छन्दों के चौथे भाग पाद नाम से कहे जाते हैं । यथा - गायत्री छन्द में एक पाद छः अक्षरों का होगा । इसी प्रकार अनुष्टुप् आदि छन्दों के विषय में पाद का निर्णय किया जाना चाहिए । पाद का यह लक्षण प्रायिक है । अर्धसम, विषम वृत्त के छन्दों में न्यूनाधिक अक्षर देखे जाते हैं । यद्यपि " गायत्र्या वसवः ” ( पि ० सू ० ३ | ३ || ) इससे गायत्री के प्रत्येक पाद में आठ अक्षर निर्धारित किये गये हैं, तथा यह तीन पादवाली ही होगी । तथाऽपि वह सूत्र वैदिक गायत्री छन्द के विषय में कहा गया है, किन्तु यहाँ लौकिक छन्दः प्रकरण को लेकर विचार चल रहा है । अतः लौकिक छन्दविषय में प्रकृत सूत्र के स्वरूप को समझना चाहिए । यह सूत्र समवृत्ति विषय में प्रवृत्त होता है । जहाँ पर सभी पाद समान अक्षर वाला हो वह समवृत्ति के छन्द कहलाता है और उसी को उद्देश्य करके पाद लक्षण किया गया है ॥ १० ॥

( विषम वृत्त छन्द को उद्देश्य करके पाद लक्षण किया जा रहा है—- )

यथावृत्तसंमाप्तिर्वा । ४ । ११ ॥

मृतसञ्जीवनी — यस्य वृत्तस्य यादृशैः पादैर्न्यूनाक्षरैरधिकाक्षरैर्वा समाप्तिर्दृश्यते, तस्य तादृशा एव पादा ग्रहीतव्याः । वाशब्दो व्यवस्थितविभाषा । उद्गतादिषु विषमवृत्तेषु चतुर्भागातिक्रमेणापि पादव्यवस्थादर्शनात् ।

आदौ तावद्गणच्छन्दो मात्राछन्दस्ततः परम् ।

तृतीयमक्षरच्छन्दश्छन्दस्त्रेधा तु लौकिकम् ॥

आर्याद्युद्गीतिपर्यन्तं गणच्छन्दः समीरितम् ।

वैताल्यादिचूलिकान्तं मात्राछन्दः प्रकीर्तितम् ।

समान्याद्युत्कृतिं यावदक्षरच्छन्द एव च ॥

तत्रादौ तावदार्यालक्षणसिध्यर्थ गणसंज्ञां करोति-शिवप्रसादिनी - जिस छन्द की न्यून वा अधिक जितने अक्षरोंसे अथवा जिस तरह के पादों से समाप्ति ( पूर्णता ) देखी जाती है । वहाँ उतने ही अक्षरों से युक्त पाद का ग्रहण किया जाना चाहिए । “ उद्गता ” आदि विषमवृत्तों के छन्द में चार भाग के अन्तर्गत रहने वाले एक भाग में पाद की व्यवस्था न होकर, निर्दिष्ट अक्षरों से ही पादव्यवस्था समझनी चाहिए ॥११ ॥

( १ ) ' गायत्र्या वसवः ' ( पि ० सू ० ३।३ ) इति यत्तृतीयाध्याये दर्शितं, तद्वैदिकविषयमात्रम् तेन लौकिकच्छन्दसां त्रिपञ्चषट्पदता निषिद्धा । यतो लौकिकविषमवृत्तेऽपि लौकिकविषम । एव भविष्यति न तु वैदिकोक्तः, किं तु चतुष्पदत्वं तत्राप्यक्षतमेव ज्ञेयम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 235

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चतुर्थोऽध्यायः ८३

लः समुद्रा गणः । ४।१२ ॥

मृतसञ्जीवनी- -ल इत्येकमात्रिकस्याक्षरस्य ग्रहणम् । समुद्र इति चतु: संख्योप-लक्षणार्थम् । चतुर्णां लकाराणां ' गणः ' इत्येषा संज्ञा विधीयते ॥ " ल: " इससे एक मात्रिक अक्षर का ग्रहण अभिप्रेत है । " समुद्राः " यह शब्द चार संख्या वाले वर्णों का लक्षणा वृत्ति से बोधन के लिए प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार सूत्रार्थ का स्वरूप होगा - लघुवर्णों की गण संख्या होती है । उपर्यालक्षण अर्थात् गायत्री आदि छन्दों के स्वरूप की निष्पत्ति होना ही गण सञ्ज्ञा के विधान का प्रयोजन है ॥ १२ ॥

गौ गन्तमध्यादिश्च । ४ । १३ ॥

मृतसञ्जीवनी – अनेन गणस्य विन्यासभेदं दर्शयति । स हि गणः कदाचिद्गुरुद्वयेन ( ऽऽ ) भवति, कदाचिदन्तेनैकेन गुरुणा ( 115 ), कदाचिन्मध्यमेन ( 151 ), कदाचिदाद्येन ( SII ), कदाचिच्चतुर्भिर्लघुभिः ( II II ) | षष्ठस्य भेदस्याभावाद् विस्पष्टार्थमिदं सूत्रम् । अन्तमध्यादिरिति प्रथमं द्वन्द्वसमासं कृत्वा पश्चाद्गकारेण बहुव्रीहिः । द्वन्द्वात् परो यः श्रूयते लभतेऽसौ प्रत्येकाभिसम्बन्धम् । द्वौ गकारौ चत्वारो लघवो भवन्ति, स एको ( SS ) गणः । गकारोऽन्ते यस्य स गन्तो द्वितीयो ( 115 ) गणः । गकारो मध्ये यस्य स गमध्यस्तृतीयो ( 1 ऽ । ) गणः । गकार आदौ यस्यासौ गादिश्चतुर्थो ( SII मिलितौ चत्वारो लघवो भवन्ति, स पञ्चमो ( III ) गणः ॥ एवं गणेषु सिद्धेष्विदानी ' मार्यालक्षणं करोति-शिवप्रसादिनी - इस सूत्र के माध्यम से गण के विन्यास रहा है । जिस कारण से वह गण कहीं पर आदि में दो गुरु ( SS है, किसी जगह दो लघुवर्णों के अन्त में एक गुरु वर्ण ( 115 ) से ( १ ) आर्यायाः प्रथमं लक्षणप्रयोजनमुक्तं वृत्तमणिकोशे-' घटिकासहस्रयुग्भिः शिवो जगौ पञ्चभिर्मुखैरार्याम् । त्र्यब्दान् द्वादश दिवसान् षोडश घटिकाश्च निर्निद्रः ॥ आर्याद्बोधः कठिनो ज्ञातुं व्यक्तानि वर्णवृत्तानि । ) गणः । नकारलकारौ भेदों को दिखाया जा ) अक्षरों से युक्त होता युक्त हुआ करता है । आदौ सलक्षणममूं तानि च परतः सलक्षणं ब्रूमः ॥ ' ( वि ० ३ श्लो ० १-२ ) ' पढमं बारहमत्ता वीए अट्ठादहेहिं संजुत्ता । जह पढमं तह तीअं दहपञ्चविहूसिआ गाहा ॥ ' इति प्रा ० पि ० सू ० ११४ ९ ' सब्बाए गाहाए सत्तावण्णइँ होन्ति मत्ताइं । पुब्बद्धम्मि अ तीसा सत्ताईसा परद्धम्मि । ' इति प्रा ० पि ० सू ० १।५१ ' गाथा ' इति नामान्तरमार्यायाः प्राकृतपिङ्गले । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 236

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८४ छन्दः शास्त्रम् एक जगह पुनः एक मध्य गुरुवर्ण तथा आदि अन्त के एक - एक लघु वर्णों वाले होते हैं । किसी स्थल में आदि गुरु वर्ण और अन्त के दो लघुवर्णों वाला होता है । किसी जगह चार लघु वर्णों से युक्त होते हैं । इस प्रकार से गण के गुरु वर्णों के विन्यास भेद के कारणों के सम्यग् ज्ञान के लिए प्रथमाऽध्याय के अन्तर्गत विद्यमान तेरहवाँ ( १३ ) सूत्र अवलोकनीय है । सूत्रस्थ " अन्त मध्याऽऽदिः " शब्द में प्रथम द्वन्द्व समास हुआ " अन्तश्च मध्यश्च आदिश्च इति = अन्तमध्याऽऽदयः । " इस प्रकार से द्वन्द्व समास करके पुनः गुरुसञ्ज्ञक “ ग ” वर्ण के साथ बहुव्रीहिसमास गः ( = गकाराः ) “ अन्तमध्याऽऽदयो यस्य सः = गन्तमध्याऽदिः ” ( = गण:) यहाँ पर " द्वन्द्वान्ते द्वन्द्व मध्ये द्वन्द्वौ च श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बद्ध्यतो " अर्थात् " द्वन्द्वसमास ” सञ्ज्ञा विषयीभूत समुदाय के अन्त में मध्य में अथवा आदि में श्रावणप्रत्यक्ष का विषयीभूत पद द्वन्द्वसमास घटक प्रत्येक पद के साथ सम्बद्ध होता है । इस शाब्दिकनियमानुसार प्रकृत में द्वन्द्व घटक आदि, मध्य और अन्त इन तीनों पदों के साथ सम्बद्ध होकर इस प्रकार के अर्थ को अभिव्यक्त करेगा – आदि गुरु, मध्य गुरु और अन्त गुरु वाला गण होता है । ग् = गुरु सञ्ज्ञक वर्ण, दो गुरु सञ्ज्ञक के चार लघु अक्षर होते हैं । इस प्रकार दो गुरु वर्णों के एकगण होते हैं । एक गकार ( गुरुसञ्ज्ञक = ( S ) अन्त में जिसके, वह गन्त ( IIS ) । गण कहलाता है, पुनः गकार मध्य ( ISI ) वाला तृतीयगण होता है 1 । इसी प्रकार गकार आदि वाला ( ऽ ॥ ) चतुर्थ गण सिद्ध होता है । एवं न कार ( " न ह स न् ' पि ० सू ० १।८ ॥ ) इस सूत्र से विहित न् = तीन लघु ( III ) अक्षरों के साथ एक ल = लघुवर्ण वाला गण, अर्थात् चार लघु वर्णों का पाँचवाँ गण होता है । इसी पञ्चम गण के बोधाऽभिप्राय से " न्लश्च " सूत्र का यह अन्तिम अंश कहा गया है । छठे प्रकार का गण भेद कोई अन्य होता ही नहीं है ।१३ ॥ ( इस प्रकार गणों के सिद्ध हो जाने पर अग्रिम सूत्र द्वारा इस समय आर्या ( = छन्द ) का लक्षण करते हैं— ) स्वरा अर्धं चाऽऽर्याऽर्धम् । ४ । १४ ॥ मृतसञ्जीवनी– गणग्रहणमनुवर्तते । स्वरा इति सप्तानां संज्ञा । यत्र प्रस्तारे गणाः सप्त भवन्ति, अर्धं च ' गणस्य, तदार्यार्धं निष्पद्यते । द्वितीयमप्यर्थं तादृशमेव । समप्र-विभागेऽर्धशब्दः । यद्येवमर्धशब्दस्य ' ' अर्धं नपुंसकम् ' ( पा ० सू ० २।२।२ ) इत्यनेनैकदेशि-( १ ) गुरुरूपो द्विमात्र इत्यर्थः । ( २ ) इदं सूत्रं श्रीमता भगवता पतञ्जलिना प्रत्याख्यातम् “ परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ” ( पा ० सू ० २।४।२६ ) इति सूत्रे भाष्ये, तथा च भाष्यम्‘एकदेशिसमासो नारप्स्यते । कथमर्धपिप्पलीति? | समानाधिकरणसमासो भविष्यति, अर्धं च सा पिप्पली CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 237

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चतुर्थोऽध्यायः ८५ समासे सति पूर्वनिपातः प्राप्नोति यथा - अर्धाढकम्, अर्धपलम्, अर्धखारीति । नैष दोषः; सत्यपि समप्रविभागत्वे सम्बन्धमात्रस्यात्र विवक्षितत्वात् । सम्प्रविभागस्याप्यर्धशब्दस्यैक-देशिसमासव्यभिचारदर्शनात् । यथा - तुलार्धेन गां क्रीणाति ।

पणार्धक्रीतताम्बूलचर्वणाद्गुर्विताननाः ।

अनभ्यासाद्गलल्लाला यान्त्येते वारयात्रिकाः ॥

तथात्रासमप्रविभागत्वेऽप्यर्धशब्दस्यैकदेशिसमासदर्शनाच्च ।

अर्धचन्द्रं दधन्मूर्ध्नि पातु वः पार्वतीपतिः ।

कालकूट विषं हन्तु सङ्गृहीतमिवामृतम् ॥

तथा च ।

तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् ।

अर्धराज्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥

अत्रार्धस्य लक्षणं कुर्वाण एवं ज्ञापयत्याचार्यो यदार्यायामवान्तरपादव्यवस्था नास्ति । तेन ‘ द्वीपादन्यस्मादपि ’ इत्यादौ गणत्रयस्यान्ते गुरुत्वं न स्यात् । ३ ४ ६ ७ 55 55 SIISS 151 5 5 S द्वीपा — दन्य - स्मादपि मध्यादपि जल -1 - निधेर्दि— शोऽप्यन्तात् । ३ ४ ६ ७ III 55 1 55 S आनी — य झटिति घटयति विधिरभि - मतमभि - मु — खीभूतः । ( रत्नावली - अं ० १ श्लो ० ६ ) शिवप्रसादिनी - प्रकृत सूत्र में पूर्व से “ गणः " की अनुवृत्ति होती है । स्वराः = लोक में संगीत के सात स्वर प्रसिद्ध हैं । अतः “ स्वर " शब्द लक्षणा द्वारा सात संख्याओं के गणों के बोधक हैं । इस प्रकार सूत्राऽर्थ पर्यवसित होगा - जिस छन्द में सात गण के साथ ही साथ एक गण ( 1111-55 ) का आधा ( 11-5 ) हो इस प्रकार के साढे सात गणों का आर्याऽर्ध ( = आधाछन्द ) होता है । " आर्याऽर्धम् " शब्द घटक अर्ध पन्द्रह गण वाले सम्पूर्ण छन्द का सम अर्ध, अर्थात् सूत्र में अर्ध शब्द समान समान अर्ध भाग वाले अर्थ चार्धपिप्पलीति । न सिध्यति, परत्वात्षष्ठीसमासः प्राप्नोति । अद्य पुनरयमेकदेशसमास आरभ्यमाणः षष्ठीसमासं बाधते । इष्यते च षष्ठीसमासोऽपि । तद्यथा - अपूपार्थं मया भक्षितम् । ग्रामार्धं मया लब्धमिति । एवं पिप्पल्यर्धमिति भवितव्यम् । ' इति अत एव ' प्रेम्णा शरीरार्धहराम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 238

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८६ छन्दः शास्त्रम् का वाचक है । इस प्रकार यदि सम प्रविभागाऽर्थक अर्धशब्द का सूत्र में प्रयोग किया गया है तो " आर्याऽर्ध ” घटक अर्ध के साथ आर्या शब्द का " आर्यायाः अर्धम् ' इस विग्रहाऽर्थ की विवक्षा में ( " समांश वाची नपुंसक लिङ्ग में विद्यमान " अर्धम् " इस शब्द का षष्ठयन्त पद के साथ समास हो " इत्यर्थक ) “ अर्धं नपुंसकम् " इस सूत्र से समास होगा और उस सूत्र में “ अर्धम् " शब्द प्रथमान्त पद बोध्य होने के कारण उपसर्जन सञ्ज्ञा और ‘ “ उपसर्जनं पूर्वम् " सूत्र से पूर्व प्रयोग आदेश होने पर जिस प्रकार अन्य स्थलों में “ अर्धाऽऽढकम् " ढाई शेर का आधा सवाशेर, " अर्द्ध पलम् " ( पल्ले का आधा भाग ) “ अर्धखारी ” इत्यादि प्रयोग अर्धाऽऽदि घटित ही साधु रूप में सुने जाते हैं, उसी M प्रकार प्रकृत में “ अर्धाऽऽर्या " ही होना चाहिए " आर्याऽर्धम् ' का प्रयोग व्याकरण-शास्त्राऽनुमोदित न होने से सूत्रकार के सूत्र में वैसा असाधु शब्द, प्रयोग में नहीं लाना चाहिए? उपर्युक्त प्रकार का दोष प्रकृत में नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध मात्र की विवक्षा में “ षष्ठी " सूत्र द्वारा ही उक्त विषय में समास का विधान होता है, और ऐसी स्थिति में “ आर्यायाः अर्धम् ” इस विग्रहार्थ की विवक्षा में " आर्याऽर्धम् " शब्द की सुकरता के साथ निष्कण्टक रूप से निष्पत्ति हो जाती है । अत एव " तुलाऽर्धेन गां क्रीणाति " इत्यादि प्रयोग स्थल में समास के उत्तर भाग में अर्ध शब्द का स्थान न्यायोचित सिद्ध होता है । प्रकृत सूत्राऽर्थ का समन्वय वृत्ति ग्रन्थ में स्पष्टरीति से प्रदर्शित किया गया है । अत: भ्रम-संशयाऽऽदि की दशा को हटाने के लिए प्रकृत सूत्र का वृत्ति ग्रन्थ देखना चाहिए । इसके अतिरिक्त “ आर्याऽर्धम् ” शब्द के प्रयोग से सूत्रकार का यह भी अभिप्राय व्यक्त होता है कि आर्या छन्द में जिस प्रकार साढ़े सात गण का पूर्व में आधा छन्द हुआ करता है उसी प्रकार उत्तर भाग की आधी आर्या भी साढे सात गणों का ही होगा । अतः आर्या छन्द में साढ़े सात गणों के भीतर भी पाद की व्यवस्था करना, या मानना सूत्रकार को स्वीकार नहीं है ॥१४ ॥

अत्रायुङ् न ज् । ४।१५ ॥

मृतसञ्जीवनी – अत्रार्याच्छन्दसि, अयुग्गणः, प्रथमस्तृतीयः पञ्चमः सप्तमश्च, न

जगणो ( ISI ) मध्यगुरुर्न कर्तव्यः । शेषास्तु कामतो भवन्ति ॥

शिवप्रसादिनी — ( अत्र ) इस आर्याछन्द में, ( अयुङ् = ) अयुग्गण = अयुग्मगण के रूप में स्थित हुए - प्रथम, तृतीय, पञ्चम एवं सप्तमगण न ज् ( गण:) = ( 151 ) मध्य गुरु सञ्ज्ञक अक्षर नहीं किया जाना चाहिए । शेष द्वितीय, चतुर्थ, आदि गणों में तो अपनी इच्छाऽनुसार जगण ( ISI ) = मध्य गुरुवर्णघटितगण अपनी इच्छाऽनुसार हुआ करते हैं, अर्थात् वहाँ पर जगण का प्रयोग किया जा सकता है ॥१५ ॥

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पृष्ठ 239

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चतुर्थोऽध्यायः ८७

' षष्ठो ज् ।४।१६ ॥

मृतसञ्जीवनी – अत्रार्याच्छन्दसि षष्ठो जगणो ( 151 ) मध्यगुरुरेव भवति । तत्रो-दाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ 511 ॥ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ॥ 5 1 5 1 ॥॥ S सा जय - ति जग — त्यार्या देवी दिवमुत्पतिष्णु — रतिरुचि — रा । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ S S ऽ ॥ ।ऽ ऽ ॥ 5 5 । ऽ । S या दृश्यते ऽम्बरतले कंसव - धोत्पा — तविद्यु - दि - व ॥ शिवप्रसादिनी - इस आर्या छन्द में होता है ॥१६ ॥

लौ वा । मृतसञ्जीवनी – ‘ षष्ठः ' इत्यनुवर्तते भवति । तत्रोदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ 55 ISISSSS S S छठवाँ जगण ( 151 ) | = ४ । १७ ॥ । आर्यायाः षष्ठो गण: ६ ) 6 ॥। मध्य गुरु वाला ही ( II 11 ) सर्वलघुर्वा 5 रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ SS ऽ ॥ ऽ ॥ ऽ ॥ IS । $ 5 5 पाद- - स्पर्शसु — खादिव मीलित — नयनो — ऽभ – वद्य — स्याः ॥ शिवप्रसादिनी — यहाँ पर पूर्व सूत्र से “ षष्ठः " की अनुवृत्ति आती है । तद्नुसार सूत्रार्थ होगा अथवा आर्या छन्द का छठवाँगण न् = ( 111 ) लघु, यथा ल् = एक लघु इन दोनों को मिलाकर चार लघु अक्षर होगें, अर्थात् षष्ठगण सम्पूर्ण लघु ( II II ) अक्षरों वाला ही होगा ॥१७ ॥

लौ चेत्पदं द्वितीयादि । ४ । १८ ॥

( १-२ ) एतदर्थानुवादकं प्राकृतपिङ्गलसूत्रम्. ' सत्तगणा दीहंता जो णलहू छट्ठ णेह जो विसमे । तह गाहे विअअद्धे छठ्ठे लहुअं विआणेहु । ' ( १।५० ) इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA.

पृष्ठ 240

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८८ छन्दः शास्त्रम् मृतसञ्जीवनी - षष्ठो ( ॥ II ) गणः सर्वलघुश्चेद्भवति, तदा द्वितीयाक्षरादारभ्य पदं

प्रवर्तते । पूर्वमेवोदाहरणम् ॥

यहाँ पर भी “ षष्ठः शब्द की अनुवृत्ति होती है, जिससे सूत्राऽर्थ होगा - षष्ठः = सर्वलघु सञ्ज्ञक अक्षर ( IIII ) वाला यदि छठवाँगण होगा, तो वहाँ पर द्वितीय लघु अक्षर से चतुर्थ लघ्वक्षर पर्यन्त, अर्थात् प्रथम लघ्वक्षर को छोड़कर शेष बचे उस गण का द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ लघ्वक्षर मिलकर पद स्वरूप में पर्यवसित होता है, अर्थात् तीनों लघ्वक्षरों को पद होना चाहिए ॥ १८ ॥

सप्तमः प्रथमादि । ४।१ ९ ॥

मृतसञ्जीवनी – षष्ठे गणे मध्यगुरौ ( ISI ) सर्वलघौ ( IIII ) वा जाते सप्तमो गणः ( III ) सर्वलघुश्चेद्भवति, तदा प्रथमाक्षरादारभ्य पदं प्रवर्तते । तत्रोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ 55 511 SSISI 55 । ऽ । | | | | S ब्रह्म - क्षत्रकु - लीन: समस्त - साम- -न्तचक्र— नुतचर - णः । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ । ऽ । 55 5 555 । ऽ ॥ S सकलसु — कृतैक – पुञ्जः श्रीमान् मुञ्ज – श्चिरं ज— य — ति ॥ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ । ऽ । ऽ ऽ ऽ ऽ S जयति भु – ॥॥ वनैक – वीरः सीरा — युधतुलि - तविपुल –बलविभ — वः । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ॥॥ । ऽ । ऽ ॥ S S । 5 5 S अनवर - तवित्त - वितरण — निर्जित – चम्पा -धि - पो मुञ्जः ॥ शिवप्रसादिनी - षष्ठगण में मध्यगुरु ( ISI ) अथवा सर्व लघुअक्षर ( IIII ) होने पर सातवाँ गण भी यदि सर्वलघ्वक्षर ( IIII ) होता है, तो वैसी स्थिति में सातवाँ गण के प्रथम अक्षर से आरम्भ करके साढे सात तक में पद हुआ करता है । इसका और इससे पूर्व सूत्र का उदाहरण वृत्ति ग्रन्थ में सरलता के साथ प्रस्तुत किया गया है, अतः सूत्राऽर्थ का स्पष्टीकरण पुनः उसी स्थल के अवलोकन से होगा ॥१ ९ ॥

अन्त्ये पञ्चमः । ४।२० ॥

( १ ) ' प्रलीनसामन्त ' इति लिखितोदाहरणपुस्तके । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA