छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 241–250
छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 241–250
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चतुर्थोऽध्यायः ८ ९ मृतसञ्जीवनी - अन्त्ये भवमन्त्यम् । दिगादित्वाद्यत् । अन्त्ये द्वितीयार्थे पञ्चमश्चेद्गणः ( IIII ) सर्वलघुर्भवति, तदा प्रथमादि पदं प्रवर्तते । तत्रोदाहरणम्-२ ३ ४ ५ ६. ७ I SIISSIISIIS ISIS IIS स जयति - वाक्पति - राजः सकला - र्थिमनोरथैक- कल्पतरुः । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ II 55 151 511 S 5 151 1 5 प्रत्य — र्भिभूत – पार्थिव - लक्ष्मी - हठहर - - दुर्ल - लि - तः ॥ शिवप्रसादिनी - अन्त में होने ( रहने ) वाले को अन्त्य कहते हैं “ अन्त ” शब्द से " होने ” अर्थ में यत् प्रत्यय होने पर अन्त्य शब्द निष्पन्न होता है । दिगादिगण पठित होने के कारण अन्त से यत् प्रत्यय का लाभ हुआ है ऐसा समझना चाहिए । सूत्रार्थ होगा — आर्याछन्द के आधे उत्तरवाले भाग में यदि पञ्चम गण सर्व लघु अक्षर ( III ) होता है, तो वहाँ पर पञ्चमगण के प्रथमाक्षर से आरम्भ करके पद प्रवर्तित होता है ॥२० ॥
षष्ठश्च ल् । ४ । २१ ॥
मृतसञ्जीवनी- - ' अन्त्ये ' इत्यनुवर्तते । अन्त्ये द्वितीयेऽर्धे मध्यगुरौ ( 151 ) सर्वलघौ ( ॥ ॥ ) वा षष्ठे गणे प्राप्ते तदपवादो लकारो विधीयते । पूर्वमेवोदाहरणम् ॥ शिवप्रसादिनी - यहाँ पर पूर्वसूत्र से " अन्त्ये " शब्द की अनुवृत्ति आती है । अन्त्ये = आर्या के द्वितीय अर्ध भाग के षष्ठगण में पि ० सू ० ४।१६-१७ सूत्र द्वारा मध्यगुरु ( ISI ) अथवा सर्व लघु मात्रिक अक्षरों के प्राप्त होने पर प्रकृत सूत्र के द्वारा उन दोनों सूत्रों को बाँध करके ल् = एक मात्रिक अक्षर का विधान किया जा रहा है । तदनुसार सूत्रार्थ का स्वरूप तो इस प्रकार होगा - आर्या छन्द में द्वितीयाऽर्ध भाग के षष्ठ गण केवल एक लघ्वक्षर ( १ ) का होगा । इस सूत्र के विषय में कुछ विचारकों का कथन यह है कि “ षष्ठश्च ल् ” ( ४।२१ ) यह सूत्र “ लः समुद्रा गणः " ( ४।१२ ॥ ) इसका अपवाद है, जिसके कारण द्वितीयाऽर्धभाग का षष्ठगण एक लघ्वक्षर ( १ ) मात्रा का
होगा, ऐसा जानना चाहिए । वृत्तिग्रन्थ में इसका उदाहरण पुनः ४ १ ९, अथवा ४।२२
में दिये छन्द के उत्तराऽर्ध में स्थित षष्ठ गण है । अतः वहीं देखना चाहिए ॥२१ ॥
त्रिषु गणेषु पादः पथ्याद्ये च । ४।२२ ॥
( १ ) इदं सूत्रं ' लः समुद्रा गण: ' ( पि ० सू ० ४।१२ ) इत्यस्यापवादभूतम्, तेन द्वितीयार्धे एकेनापि लघुना षष्ठो गणो भवतीति बोध्यम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ० छन्दः शास्त्रम् मृतसञ्जीवनी – चकारोऽन्त्य इत्यनुकर्षणार्थः । यस्या आर्याया अन्त्येऽर्धे आद्ये च त्रिषु गणेषु पादः समाप्यते, सा आर्या ' पथ्या ' नाम भवति । तद्यथा-२ ३ ४ ५ ६ ७ I r 55 S S ऽ ऽ ऽ ॥ S SISISS S पथ्या - शी व्या - यामी स्त्रीषु जि - तात्मा नरो न रोगी स्यात् । १ २ ३ ४ ५ ६ S ॥ 5 5 51155 । ऽ ऽ S यदि वच - सा मनसा वा - - द्रुह्यति नित्यं न भूते —भ्यः ॥ पादग्रहणं यत्युपलक्षणार्थम् ॥ शिवप्रसादिनी - सूत्र में " च " का उपादान अन्त्य शब्द के अनुवर्त्तनार्थ प्रयुक्त हुआ है । जिस आर्या छन्द के प्रथम भाग में विद्यमान ( १२ वारह मात्राओं वाले ) तीन गणों में, तथा उसी प्रकार उत्तरार्ध भाग में भी चार - चार के क्रम से तीन गणों में ( बारह मात्राओं वाला ) पादपूर्ण होता हो, तो उस आर्या छन्द को " पथ्या " नाम से कहा जाता है । विशेष – ( १ ) पथ्या ( २ ) विपुला ( ३ ) चपला ( ४ ) मुखचपला ( ५ ) जघन चपला ( ६ ) गीति ( ७ ) उपगीति ( ८ ) उद्गीति एवम् ( ९ ) आर्या गीति के ये नौ भेद आर्याछन्द के स्वीकार किये गये हैं, उन नवों प्रकार के आर्या छन्द में जहाँ पर पूर्वाऽर्द्ध और उत्तराऽर्ध भाग के अन्तर्गत विद्यमान आरम्भिक दोनों पादों में चार - चार मात्रा वाले ( १२ मात्राओं ) तीन - तीन गणों के अनन्तर उच्चारण की विश्रान्ति होती हो, तो उस आर्या छन्द को " पथ्या " कहा जाता है ॥२२ ॥
विपुलाछन्द का लक्षण करते हैं-विपुलान्या । ४ । २३ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य आर्याया अन्त्येऽर्धे, आद्ये वोभयोर्वा त्रिषु गणेषु पादो न विश्राम्यति, सा आर्या ‘ विपुला ' नाम । सा चाद्यन्तोभयपूर्वकत्वात्रिधा भवति । सामान्येन विधानमेतत् ॥ तत्रादिविपुला-२ ३ ४ S S S S SS ।ऽ । 5 5 55 S स्निग्ध - च्छाया लावण्यलेपि - नी किं- चिदवन —तम्रा —णा । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ॥॥ 55 S S ॥ ऽ ऽ S । S S S मुखविपु – ला सौ — भाग्यं लभते स्त्रीत्या —ह माण्डव्यः ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अन्त्यविपुला-२ ३ SSIS IIIS चित्तं हरन्ति हरिणी १ २ h 55 151 चतुर्थोऽध्यायः ९ १ ४ ५ ६ ७ r 511 5 S । ऽ । 5 S S - दीर्घदृशः कामिनां क — लाला -पैः । ३ ४ ५ ६ ७ S S 1 S नीवी — विमोच – नव्या - जकथित - जघना जघनवि - पु - लाः ॥ उभयविपुला -१ २ ३ ४ ५ ६ ७ S ऽ ॥॥ 115 151 5 S 151 ऽ ॥ S या स्त्री कुचकल - शनित - म्बमण्ड - ले जा - यते मह - हाविपुला । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ 5 5 151 ॥5 151 S 1 S 1 1 S गम्भी — रनाभि — रतिदी— पलोच – ना भव - ति सा सु — भ — गा । अत्रोच्यते — पथ्याविपुलालक्षणयोः सहानवस्थानलक्षणो विरोध:, तेन मिश्रीभावो नास्ति । य एवांशो विपुलयाभिस्पृष्टस्तेनैव पथ्यात्वं नष्टं भवति, उभयाश्रयत्वाच्च पथ्या-लक्षणस्य विपुलायास्तत्रांशेनापि प्रवेशो दुर्लभः । ततश्च पथ्यालक्षणैकांशवैकल्येऽपि तद-न्यमात्रविषयत्वाद्विपुला भवत्येव । पथ्याचपलोश्च विरोधाभावाद्बाध्यबाधकभावो नास्ति ।
तत्रायं संग्रह: -‘ एकैव भवति पथ्या तिस्रो विपुलाश्चतस्र एवं ताः ।
चपलाभेदैस्त्रिभिरपि भिन्ना इति षोडशार्याः स्युः ॥
गीतिचतुष्टयमित्थं प्रत्येकं षोडशप्रकारं स्यात् । साकल्येनार्याणामशीतिरेवं विकल्पाः स्युः ॥ ' तेषामनुक्तोदाहरणान्यूह्यानि ॥ ( १ ) उक्ता आर्याभेदाः सुखावबोधमय क्रमेण प्रदर्श्यन्ते-१ पयार्या ६ मुखचपलादिविपुला २ आदिविपुला ७ मुखचपलान्तविपुला ३ अन्तविपुला ८ मुखचपलोभयविपुला ४ उभयविपुला ९ जघनचपला पथ्या ५ मुखचपला पथ्या १० जघनचपलादिविपुला CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ २ छन्दः शास्त्रम् ११ जघनचपलान्तविपुला १२ जघनचपलोभयविपुला १३ महाचपला पथ्या १४ महाचपलादिविपुला १५ महाचपलान्तविपुला १६ महाचपलोभयविपुला १७ गीतिपथ्या १८ गीत्यादिविपुला १ ९ गीत्यन्तविपुला २० गीत्युभयविपुला २१ मुखचपला गीतिपथ्या २२ मुखचपला गीत्यादिविपुला २३ मुखचपला गीत्यन्तविपुला २४ मुखचपला गीत्युभयविपुला २५ जघनचपला गीतिपथ्या २६ जघनचपला गीत्यादिविपुला २७ जघनचपला गीत्यन्तविपुला २८ जघनचपला गीत्युभयविपुला २ ९ महाचपला गीतिपथ्या ४६ महाचपलोपगीत्यादिविपुला ४७ महाचपलोपगीत्यन्तविपुला ४८ महाचपलोपगीत्युभयविपुला ४ ९ उद्गीतिपथ्या ५० उद्गीत्यादिविपुला ५१ उद्गीत्यन्तविपुला ५२ उद्गीत्युभयविपुला ५३ मुखचपलोद्गीतिपथ्या ५४ मुखचपलोद्गीत्यादिविपुला ५५ मुखचपलोद्गीत्यन्तविपुला ५६ मुखचपलोद्गीत्युभयविपुला ५७ जघनचपलोद्गीतिपथ्या ५८ जघनचपलोद्गीत्यादिविपुला ५ ९ जघनचपलोद्गीत्यन्तविपुला ६० जघनचपलोद्गीत्युभयविपुला ६१ महाचपलोद्गीतिपथ्या ६२ महाचपलोद्गीत्यादिविपुला ६३ महाचपलोद्गीत्यन्तविपुला ६४ महाचपलोद्गीत्युभयविपुला T ३० महाचपला गीत्यादिविपुला ६५ आर्यागीतिपथ्या ३१ महाचपला गीत्यन्तविपुला ३२ महाचपला गीत्युभयविपुला ३३ उपगीति पथ्यार्या ३४ उपगीत्यादिविपुला ३५ उपगीत्यन्तविपुला ३६ उपगीत्युभयविपुला ३७ मुखचपलोपगीतिपथ्या ३८ मुखचपलोपगीत्यादिविपुला ३ ९ मुखचपलोपगीत्यन्तविपुला ४० मुखचपलोपगीत्युभयविपुला ४१ जघनचपलोपगीतिपथ्या ४२ जघनचपलोपगीत्यादिविपुला ४३ जघनचपलोपगीत्यन्तविपुला ४४ जघनचपलोपगीत्युभयविपुला ४५ महाचपलोपगीतिपथ्या CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. ६६ आर्यागीत्यादिविपुला ६७ आर्यागीत्यन्तविपुला ६८ आर्यागीत्युभयविपुला ६ ९ मुखचपलार्यागीतिपथ्या ७० मुखचपलार्यागीत्यादिविपुला ७१ मुखचपलार्यागीत्यन्तविपुला ७२ मुखचपलार्यागीत्युभयविपुला ७३ जघनचपलार्यागीतिपथ्या ७४ जघनचपलार्यागीत्यादिविपुला ७५ जघनचपलार्यागीत्यन्तविपुला ७६ जघनचपलार्यागीत्युभयविपुला ७७ महाचपलार्यागीतिपथ्या ७८ महाचपलार्यागीत्यादिविपुला ७ ९ महाचपलार्यागीत्यन्तविपुला ८० महाचपलार्यागीत्युभयविपुला Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्थोऽध्यायः ९ ३ शिवप्रसादिनी - जिस आर्या के पूर्वार्ध भाग तथा उत्तराऽर्ध भाग के आदि में वर्तमान तीन गणों ( बारह मात्राओं ) के अंशों को छोड़कर शेष के मात्राओं द्वारा दो पादों का निर्माण होता हो, उसे “ विपुला ” कहते हैं । वैसे प्रकृत सूत्र का सीधा एवं सरल अर्थ है कि जिस आर्या छन्द के उत्तराऽर्ध भाग में, अथवा पूर्वाऽर्धभाग में विद्यमान बारह मात्रा वाले तीन गणों में पाद का विश्राम नहीं हो, किन्तु दोनों आर्याऽर्थों के प्रथमांऽश बारह - बारह मात्राओं को छोड़कर ही पादव्यवस्था होती हो, वह छन्द विपुला कहलाती है । वह छन्द पुनः आदि विपुला, अन्त्य “ विपुला ” एवम् उभय विपुला के भेद से तीन प्रकार के होते हैं, इनके उदाहरण के लिए वृत्ति ग्रन्थ अवलोकनीय हैं ॥ २३ ॥
इस समय आर्या के भेद विशेष चपला का लक्षण कहते हैं-चपला द्वितीयचतुर्थी मध्ये जौ ।४।२४ ॥ मृतसञ्जीवनी – अधिकारोऽयम् । द्वितीयचतुर्थी गणौ मध्यगुरु ( ISI ) भवतः । प्रथमश्चान्तगुरु ( IIS ), तृतीयो द्विगुरु: ( SS ), पञ्चमश्चादिगुरुः ( 511 ) । शेषं यथाप्राप्तम् । एवं गकारयोर्मध्ये द्वितीयचतुर्थौ जकारौ भवतः, सा आर्या ' चपला ' नाम । उदाहरणमग्रतः ॥ शिवप्रसादिनी - यह अधिकार सूत्र है, अतः यहाँ से आगे के सूत्रों में इसकी अनुवृत्तिधारा चलेगी । जिस आर्या छन्द के दोनों भाग में विद्यमान द्वितीय चतुर्थी द्वितीयगण एवं चतुर्थ गण, ग् मध्ये = दो लघुवर्ण के मध्य गुरु मात्रा वाला हो ( 151 ) उस आर्या को " चपला " कहते हैं । इसका सरल अभिप्राय इस प्रकार है— जिस आर्या छन्द के पूर्वाऽर्ध भाग, एवम् उत्तरार्ध भाग के प्रथम चार मात्रा के अनन्तर द्वितीय और तृतीय गण गुरुमध्य वाले जगण ( ISI ) हों, उस छन्द को चपला कहते हैं ॥ २४ ॥
मुखचपला छन्द का लक्षण किया जा रहा है-पूर्वे मुखपूर्वा ।४।२५ ॥ मृतसञ्जीवनी - पूर्वेऽर्धे चपलालक्षणं चेद्भवति, तदासौ ' मुखचपला ' आर्या । पथ्यापूर्वकं मुखचपलोदाहरणम्-२ ३ ४ ५ ६ ७ ॥ऽ । ऽ । SSISIS S 151 ऽ ॥ 5 अतिदारुणा द्वि - जिह्वा परस्य रन्ध्रा - नुचारिणी कुटिला । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ II 55 55 55 SS 1 ॥ 1 S दूरा— त्परिहर — णीया नारी नागी - व मुखच - प - ला ॥ ( १ ) ‘ मर्मानुसारिणी ' इति लिखितोदाहरणपुस्तके । छ ० शा०-१६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ४ छन्दः शास्त्रम् 28 आदिविपुलापूर्वकं मुखचपलोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ 5 SISI 55 151 S S ' यस्या विलोचने पिङ्गले भु– वौ सं– १ २ ३ ४ ५ III ॥ ऽ ISISS SS S ६ ७ ।ऽ । 5 5 ऽ गते मुखं दीर्घम् । ६ ७ S विपुलो - नताश्च दन्ताः कान्ता – सौ भवति मुखच - प 1 - ला ॥ २ अन्त्यविपुलापूर्वकं मुखचपलोदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ ६ ७ 115 । ऽ । 55 151 55 151 55 S विपुला — भिजात - वंशो — द्भवापि रूपा – तिरेक — रम्या – पि ।. १ २ ३ ४ ५ ६ ७ 55 । ऽ । 55 । ऽ । ऽ । L S ३ निर्वा — स्यते गृ — हाद्व — ल्लभापि चेद्भव - ति मुखच — प — ला ॥ शिवप्रसादिनी — जिसके पूर्वे = पूर्वोऽर्ध में " चपला ” का लक्षण हो और उत्तराऽर्ध
में सामान्यरूप से आर्या का लक्षण घटता हो, उसे " मुख चपला आर्याछन्द " कहते हैं ।
उदाहरण के लिए वृत्तिग्रन्थ द्रष्टव्य है ॥२५ ॥
जघनचपला का लक्षण कहा जाता है—
जघनपूर्वेतरत्र । ४ । २६ ॥
मृतसञ्जीवनी – द्वितीयेऽर्धे चपलालक्षणं चेद्भवति, सार्या ' जघनचपला ' नाम । तत्र पथ्यापूर्वकं जघनचपलोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ६ 5 S ऽ ॥ S SSII ॥ ऽ । ऽ । S S S यत्पा — दस्य क - निष्ठा न स्पृशति मही- मनामिका वा - पि । ( १ ) ' यस्याश्च ' इत्यपि तत्रैव । ( २ ) ' उभयविपुलापूर्व ' इति क ० मु ० पुस्तके । ( ३ ) ' निःसार्यते ' इत्यपि च तत्रैव । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्थोऽध्यायः ९ ५ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ 5 5 151 55 ISISS 1 S सास - धूर्त - भोग्या भवेद - वश्यं जघनच - प - ला ॥ अन्त्यविपुलापूर्वकं जघनचपलोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ 5 S SS SSIS ISS III 151 5 5 S यस्याः पादा — ङ्गुष्ठं व्यतीत्य याति प्रदेशि - नी दीर्घा । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ + III ॥ ऽ । ऽ । 55 । ऽ । ऽ ॥ 1 IIS S विपुले कुले प्र - सूता – पिसा ध्रुवं जघन - चपला स्यात् ॥ महाविपुलापूर्वकं जघनचपलोदाहरणम् १ २ ३ ४ ५ ६ ७
115 ॥ ऽ ॥ ऽ । ऽ । ऽ ॥ 151 55
मकर – ध्वजस — द्मनि दृश्यते स्फु — टं तिल- - कलाञ्छनं यस्याः । १ २ ३ ॥ ऽ । ऽ । 55 1 ( विपुला - न्वयप्र - जाता — पि शिवप्रसादिनी - जिस छन्द के और उत्तरार्ध में चपला का लक्षण हो जाता है ॥२६ ॥
४ ५ ६ ) 6 A 51 S । S जाय - ते जघन - चपला - सौ ॥ पूर्वार्द्ध में आर्याछन्द का सामान्य लक्षण हो, , तो वह आर्या " जघन चपला " नाम से कहा महाचपला का लक्षण-उभयोर्महाचपला । ४।२७ ॥ मृतसञ्जीवनी --- यस्या उभयोरर्धयोश्चपलालक्षणं भवति, सार्या ' महाचपला ' नाम । तत्र पथ्यापूर्वकं महाचपलोदाहरणम्— २ ३ ४ ५ ६ ७ ॥ऽ । ऽ । ऽ ऽ 1 ऽ । ऽ S 15 1 SS S हृदयं हरन्ति नार्यो मुनेर - पि थ्रू - कटाक्ष - विक्षेपैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ६ छन्दः शास्त्रम् २ ३ ४ ५ ६ ७ SS । ऽ । 55 S 1 S S दोर्मू — लनाभि — देशं निदर्श- यन्त्यो विपुलापूर्वकं महाचपलोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ॥ ऽ।ऽ । SS । ऽ । 5 चिबुके कपोल - देशे - ऽपि कूपिका २ ३ ४ ॥ ऽ । ऽ । 5 5 1 S 1 151 S महाच - प - लाः ॥ ६ ७ ' 5 । ऽ ISS S दृश्यते स्म -ते यस्याः । ५ ६ ७ h S S ।ऽ । I S विपुला - न्वयप्र – जाता — पि जायते सा महाच- प - ला ॥ शिवप्रसादिनी - जिस आर्या छन्द के पूर्वार्ध एवम् उत्तरार्ध भाग में ( पि ० सू ० ४।२४ ॥ ) सूत्र निर्दिष्ट चपला आर्या का लक्षण घटित ( लक्षित ) होता हो, वह आर्या छन्द " महाचपला " कहलाता है ॥२७ ॥
। ( गीति = छन्द का लक्षण— )
आद्यर्धसमा गीतिः ।४।२८ ॥
मृतसञ्जीवनी — आद्यर्धेन सममन्त्यमर्ध यस्याः साद्यर्धसमा ' गीति: ' नाम । अन्त्यपदलोपी समासः । एतदुक्तं भवति - द्वितीयेऽप्यर्धे षष्ठो गणो ( 151 ) जकारो न्लौ ( 11 ॥ ) वा कर्तव्यः ॥ तत्र पथ्यागीत्युदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ॥ ऽ ऽ ऽ ॥ ऽ ऽ ॥ 115 ।ऽ । 5 5 S मधुरं वीणा - रणितं पञ्चम- - सुभग - श्च कोकिलाला —पः । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ III 5 5511 SSSS115 । ऽ । ऽ ॥ S गीतिः पौरव - धूनां सुप्तं कुसुमा — युधं प्र - बोधय - ति ॥ आदिविपुलागीत्युदाहरणम्—– ३ ४ ६ ७ ऽ ॥ S S SI S S 151 115 S इयमप - रा विपु - लागी - तिरुच्यते सर्वलोक — हितहे — तोः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्थोऽध्यायः ९ ७ २ ३ ४ ५ ६ ७ III 115 15 1 55 15 ॥। ऽ 1 SI 5 5 S यदनि — ष्टमात्मनस्त -- त्परेषु भवता - पि मा क्वचित्का – रि ॥ पथ्यामहाचपलागीत्युदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ III SSIS I 5 5 151 S 151 115 5 कामं चकास्ति — गीति — र्मृगीदृशां सीधुपान – चपला –नाम् । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ 11 ऽ । ऽ । 5 5151 S 5 115 5 सुरतंच मुक्त - लज्जं निरर्ग - लोल्ला – पमणित - रमणी - यम् ॥ महाविपुलामहाचपलागीत्युदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५
ऽ ऽ । ऽ । 55 15 1 S S ॥॥
पञ्चे – षुवल्ल — भः प— ञ्चमध्व — निस्त — त्र भवति १ २ ३ ४ ५ ६. 115 ISISS ISIS S । ऽ । चपलं - करोति कामा- - कुलं मनः कामिनाम-शिवप्रसादिनी - जिस आर्या ( छन्द ) का उत्तरार्ध भाग वाला हो, उस आर्या को " गीति " कहा जाता है । भाव यह ७ ॥ S –यदि विपु — लः । ७ SS S -सौ गी -- तिः ॥ प्रथमाऽर्धभाग के समानमात्रा है कि जिस आर्या छन्द के उत्तराऽर्ध भाग प्रथमाऽर्ध भाग के समान षष्ठ ( छः ) गण, मध्य गुरु, अथवा सर्वगुरु वाला हो, उस आर्या को “ गीति " कहते हैं ॥२८ ॥
( उपगीतिछन्द का लक्षण — )
अन्त्येनोपगीतिः । ४।२ ९ ॥
मृतसञ्जीवनी - ' समा ' इत्यनुवर्तते । अन्त्येनार्धेन सममाद्यमर्धं यस्याः, सार्या ‘ उपगीति: ’ नाम । तत्र पथ्योपगीत्युदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ A S S S ॥ 511 55 5 S 151 । S गान्धर्वं मकरध्वज - देव — स्यास्त्रं जगद्विज – यि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ८ छन्दःशास्त्रम् ३ ४ ५ ६ ७ h ऽ ॥ 15 S S 1 55 n इति सम- - वेक्ष्य मुमुक्षुभि - रुपगी — तिस्त्य —ज्य - — ते देशः ॥ महाविपुलोपगीत्युदाहरणम्— २ ३ ४ ॥ ऽ । ऽ । ऽ ऽ विपुलो - पगीति झङ्का - रमुखरि -१ २ ३ ४ s ऽ ॥ ऽ ॥ ऽ ऽ । ऽ । रैवत — कोपव — ने व — स्तुमस्तु पथ्यामहाचपलोपगीत्युदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ ५ ६ ७ ऽ ॥ 55 ते भ्रम – र माला -५ ६ ७ ॥ऽ । 5 5 सततं मम प्री -६ ७ ॥ ऽ 151 55151SSISI 1 S विषया— मिषाभि - लाषं करोति चित्तं सदा च - प - लम् १ २ ३ ४ ५ ६ ७ SS 1 ऽ । 55 15 । 5 51 5 5 S S नाम् । S तिः ॥
।
वैरा — ग्यभाव — नानां ‘ तथोप – गीत्या भवेत्स्व — स्थम् ॥
महाविपुलामहाचपलोपगीत्युदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ॥ ऽ । ऽ । ऽ ऽ । ऽ । ऽ S 1 S S S विपुलो – पगीति संत्य - ज्यतामिदं स्थान - कं भिक्षो २ ३ ४ ५ ६ ७ I ॥ ऽ 151 SS I S 55 1 5 5 S विषया — भिलाष — दोषेण बाध्य - ते च - च - लं चित्तम् ॥ शिवप्रसादिनी - प्रकृत सूत्र में पूर्व से “ समा " की अनुवृत्ति आ रही है । उत्तराऽर्धभाग के समान पूर्वाऽर्ध भाग हो जिस पद्य का, वह पद्य ( आर्या छन्द ) “ उपगीति ’ ” नाम से कही जाती है ॥२ ९ ॥ ( उद्गीतिछन्द का लक्षण — )
' उत्क्रमेणोद्गीतिः । ४।३० ॥
( १ ) व्युत्क्रमेणेति क्वचित्पाठः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA