छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 261–270

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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चतुर्थोऽध्यायः १० ९ रगण: ल. गु. १३४५६८ ९ १११२१४ IS IIISI 51 S इ - द भ - र - त - वं - श - भू - भृतां रगण: ल. गु. १३ ४५ ६८ ९ १११२१४ । ऽ ॥ । ऽ । ऽ । ऽ प - वि - त्र - म - धि - कं शु - भो - द - यं शिवप्रसादिनी - आभ्याम् = पूर्व दोनों छन्दों के लक्षणों से युक्त छन्द हैं ॥३ ९ ॥ रगणः ल. गु. h २ ३५ ६७८१०१११३१४१६ SISISISIS श्रूयतां श्रु - ति - म - नो - र - सा - य - नम् । रगणः ल. गु. २३ ५६७८१०१११३१४१६ 515 IIISISIS व्या - स - व - क्र - क - धि - तं प्र - वृ - त - कम् ॥ में कहे गये “ प्राच्यवृत्ति और उदीच्यवृत्ति " इन विशेष को “ प्रवृत्तक वैतालीय " छन्द कहते

' अयुक्चारुहासिनी । ४ । ४० ॥

मृतसञ्जीवनी- -यस्य सर्वे पादा अयुग्लक्षणयुक्तास्तद्वैतालीयं ' चारुहासिनी ' नाम । किं तल्लक्षणम्? चतुर्दशमात्रत्वं तृतीयेन पूर्वस्य योगः । तत्रोदाहरणम्— रगणः ल. गु. रगण: ल. गु. १३ ४५६८ ९ १११२१४ १३ ४ ५६८ ९ ११ १२ १४ 1 S IIISIS IS 1 S ॥। ऽ । ऽ । S म - ना - क्प्र - सृ - त - द - न्त - दी - धि - तिः स्म -रो - ल्ल - सि - त - ग - ण्ड - म - ण्ड - ला । रगण: ल. गु. रगणः ल. गु. १३ ४ ५ ६ ८ ९ ११ १२२४ १३४५६ ८ ९ १२ १२ १४ ISI ISIS IS ISIIIS ISIS क - टा - क्ष - ल - लि - ता तु का - मि - नी म - नो ह - र - ति चा - रु - हा - सि - नी ॥ शिवप्रसादिनी – जिस छन्द के सभी पाद अयुक् लक्षण से युक्त हो, अर्थात् प्रत्येक पाद के कुल चतुर्दश लकार हों तथा द्वितीय लकार, तृतीय लकार के साथ मिला हो ( = पूर्ववर्ती एक गुरु वर्ण उत्तर में क्रमशः उपस्थित तीन लघुवर्णों से मिले हों ) तो, उस छन्द को “ चारूहासिनी वैतालीय " छन्द कहते हैं ॥४० ॥

( १ ) तथैव चारुहासिन्यपि त्रिविधा । छ ० शा०-१७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 262

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११० छन्दः शास्त्रम्

' युगपरान्तिका । ४।४१ ॥

मृतसञ्जीवनी– युग्लक्षणयुक्तैश्चतुर्भिः पादैः ' अपरान्तिका ' नाम वैतालीयम् । किं तल्लक्षणम्? षोडशमात्रत्वम्, पञ्चमेन पूर्वस्य योगः, षण्णां मिश्राणां प्रयोगश्च 1 । तत्रो-दाहरणम्-रगण: ल. गु. रगण: ल. गु. १ २३ ५ ६ ७८१०१११३ १४१६ १२ ३ ५६८ १०१११३१४१६ ॥ ऽ ॥ । ऽ । ऽ । ऽ ॥ । ऽ । ऽ SISIS स्थिर - र - वि - ला - स - न - त- मौ - क्ति - का - व - ली क - म - ल- को - म - ला - ङ्गी मृ - गे - क्ष - णा । रगणः ल. गु. रगण: ल. गु. dachh १२३५ ६ ७ ८१०१११३१४१६ १२३५६७८१०१११३१४ १६ ॥। ऽ ॥। ऽ । ऽ । S ॥। ऽ ॥। ऽ।ऽ । ऽ ह - र - ति क - स्य हृ - द - यं न का मि - नः? सु - र - त - के - लि - कु - श - ला - प - रा - न्ति - का ॥ अपरस्यान्तिके समीपे स्थिता, परकीयेत्यर्थः ३ ॥ इति वैतालीयाधिकारः ४ । शिवप्रसादिनी - जिस छन्द में सभी पाद युग्लक्षणों से युक्त हों, अर्थात् प्रत्येक पद में कुल सोलह लकार ( लघुमात्रा ) हो एवं पञ्चम लकार के साथ चौथा लकार मिला हो, तो वह “ अपरान्तिका ” नामक वैतालीय छन्द होता है ॥४१ ॥

( यहाँ तक के ग्रन्थ से “ वैतालीय छन्द ” विषयक विचार समाप्त हुआ । ) गन्ता द्विर्वसवो ' मात्रासमकं ल् नवमः । ४।४२ ॥ मृतसञ्जीवनी – ‘ वैतालीयम् - ' ( पि ० सू ० ४।३२ ) इत्यादिसूत्रात्सप्तम्यन्तं ‘ पाद ’ ( १ ) अपरान्तिकापि त्रिधोपलभ्यते तत्रैव. अस्या एकपादिकेति संज्ञा गारुडे ( पू. २०८।९ ) । ( २ ) ‘ स्मितविलासरसोक्तिपेशला ' इति लि.पु. । ( ३ ) वस्तुतस्तु - ‘ वानवासिका ' ( ४।४३ ) वत् अपरान्तिका अपरान्तदेशोद्भवा स्त्री इत्येव युक्तम् । ( ४ ) छन्दःकौस्तुभवृत्तरत्नकरादिग्रन्थेषु नव वैतालीयभेदा उपलभ्यन्ते, तेष्वेकतमो ' दक्षि-णान्तिका ' इति नामा भेदोऽत्र नोपलभ्यते । गरुडपुराणे तु लक्षितोऽसौ ' ज्ञेयाथो दक्षिणान्तिका । पराश्रितो द्वितीयो लः पादेषु निखिलेष्वपि ॥ ( पू. २०८।७ ) इति । इयमपि पूर्ववत्रिविधैव । ( ५ ) ‘ मात्रासमकं नवमो ल् गोऽन्यः ' इति वृ ० र ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 263

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चतुर्थोऽध्यायः १११ ग्रहणमनुवर्तते । ' ल् ' इति च महानधिकारः । तेनायमर्थ:: -- - यत्र पादे गन्ताः सन्तः, षोडश लकारा भवन्ति, तत् ' मात्रासमकं ' नाम छन्दः । अन्ते द्वाभ्यामेको गुरुः ( S ) कर्तव्यः । नवमश्च लकार ( 1 ) एव । ' द्विर्वसवः ' इति द्विगुणिता वसवः, लकारा: षोडशेत्यर्थ: । ' शेषे परेण युङ् न साकम् ' ( पि ० सू ० ४।३५ ) इत्यनुवर्तनीयम् । तत्रोदाहरणम्-२ ४ ५६८ ९ १० १२१४१६ २४६८ ९ १०१२१४१६ SS IISIISSS SSS SIIS S S अ- श्मश्रु - मु - खो वि - र - लै - र्द - न्तै र्ग - म्भी - रा - क्षो न - त - ना - सा - प्रः । २४५६ ८ ९ १० १२१४१६ २ ४५६८ ९ १०१२१४ १६ 5 SIIS ॥ 555 SSIISIIS S S नि - र्मां - स - ह - नुः स्फु - टि - तै: के - शै र्मा - त्रा - स - म - कं ल - भ - ते दुःखम् ॥ ‘ गन्त- ’ ( पि ० सू ० ४।३२ ) इत्यनेनैवान्तस्य ' गुरुत्वे सिद्धे पुनर्गन्तग्रहणमातिदेशिक-गुरुत्वनिवृत्त्यर्थम् । तेनात्र द्वौ लकारौ ( II ) भङ्क्त्वा द्विमात्रिको गुरु: ( 5 ) क्रियत इति वाक्यशेषः || शिवप्रसादिनी - प्रकृत सूत्र में " वैतालीयम्. ( पि ० सू ० ४।३२ ) इससे “ पादे ” इस सप्तम्यन्त पद की अनुवृत्ति होती है । इसके अतिरिक्त “ ल् ” ( पि ० सू ० १।९ ) का अधिकार आ रहा है । जिसके अनुसार सूत्राऽर्थ का स्वरूप होगा - जिस छन्द के प्रत्येक पाद के अन्त में एक गुरु अक्षर के साथ - साथ सोलह लकार ( सोलहमात्रा ) हों, तथा नौवाँ लकार मिला न हो ( गुरु न हो ) उस छन्द को “ मात्रासमक " कहते हैं । जिस छन्द के प्रत्येक पाद के अन्त में दो लकारों से ( दो लघुमात्राओं से युक्त एक गुरु हो, और नवममात्रा उस पाद का लघु ही हो, इस प्रकार सोलह मात्रा वाले पादों से युक्त छन्द ‘ “ मात्रासमक ” कहलाता है । यहाँ पर “ शेषे परेण युङ् न साकम् ' ( पि ० सू ० ४।३५ ) इस समस्त सूत्र की अनुवृत्ति करनी चाहिए, और तदनुसार ही सूत्राऽर्थ योजना पूर्वोक्तरीति के अनुसार बनानी चाहिए ॥४२ ॥

द्वादशश्च वानवासिका । ४।४३ ॥

मृतसञ्जीवनी – यस्य मात्रासमकस्य पादे द्वादशो लकारः ( 1 ) स्वरूपेणावतिष्ठते चकारान्नवमश्च, तन्मात्रासमकं ' वानवासिका ' नाम । तत्रोदाहरणम्— २ ३ ४ ६ ८ ९ १०१११२१४१६ १ २३४६७८ ९ १०१११२१४ १६ S ॥ ऽ ऽ ॥ ॥ ऽ ऽ ॥॥ ऽ ॥॥॥ ऽ ऽ म - न्म - थ - चा - प - ध्व - नि - र - म - णी - यः सु - र - त - म - हो - त्स - व - प - ट - ह - नि - ना - दः । ( १ ) ' अन्त्यस्य ' इति लि ० पु ० । ( २ ) ' तद्युगलाद्वानवासिका स्यात् ' इति वृ ० र ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 264

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११२ छन्दः शास्त्रम् १२४६ ८ ९ १०१११२१४१६ २ ३ ४ ६८ ९ १०१११२१४१६ ॥ ऽ ऽ S ॥ ॥ ऽ ऽ S ॥ ऽ ऽ ॥ ॥ ऽ ऽ व - न - वा - सर - स्त्री - स्व - नि - त - वि - शे - षः कस्य न चित्तं र - म - य - ति पुं- सः ॥ शिवप्रसादिनी - जिस मात्रासमक छन्द के प्रत्येक पाद में बारह - बारह लकार हों और नवम मात्रा लघु स्वरूप ही हो, अर्थात् कहीं भी नवाँ अक्षर गुरु न हो, किन्तु लघुमात्रा का ही हो, ऐसे छन्द को “ वानवासिका ” छन्द कहते हैं ॥ ४३ ॥

विश्लोकः पञ्चमाष्टमौ । ४ । ४४ ॥

मृतसञ्जीवनी – द्वादशग्रहणं नवमग्रहणं च निवृत्तम् । यत्र चतुर्षु पादेषु पञ्चमाष्टमौ लकारौ ( । ) तिष्ठतः, शेषं यथाप्राप्तम्, तन्मात्रासमकं ' विश्लोका ' नाम । तत्रोदाहरणम्— २४५६७८१०१२ १४१६ २३४५६७ ८१०१११२१४१६ S SIIIISS 55 ऽ ॥ ॥ ॥ऽ ॥ ऽ S भ्रा - त - र्गु -ण - ण- - र - हि - तं वि- श्लोकं दु - र्न - य - क - र - ण - क - द - र्थि - त - लो - कम् । २४ ५ ६७८ १० ११ १२१४१६ २४५ ६ ७ ८१०१११२१४ १६ 55 ॥॥ ऽ ॥ ऽ ऽ ऽ ऽ ॥ ॥ ऽ ॥ ऽ ऽ जा - त े - म - हि - त - कु - ले - ऽप्य - वि - नी - तं मित्रं प - रि - ह - र सा - धु - वि - गीतम् ॥ शिवप्रसादिनी - इस सूत्र में ' द्वादश ' एवं ' नवम ' ग्रहण की अनुवृत्ति नहीं आती है । सूत्राऽर्थ - जिस मात्रासमक छन्द के प्रतिपाद पञ्चम और अष्टम संख्या वाला लकार स्वरूप से ही वर्त्तमान हो, अर्थात् लघुमात्रा को ही रहे, तो उस छन्द को “ विश्लोक ” नामक मात्रासमक छन्द कहते हैं ॥४४ ॥

चित्रा नवमश्च । ४।४५ ॥

मृतसञ्जीवनी – यस्य नवमो लकार ( 1 ) एवावशिष्यते चकारात्पञ्चमाष्टमौ च, तन्मात्रासमकं ‘ चित्रा ' नाम । तत्रोदाहरणम्-१२४ ५ ६ ७८ ९ १०१२१४१६ २४५६७८ ९ १०१११२१४१६ ॥ ऽ ॥॥॥ ऽ ऽ ऽ S SIIIIIIII SS य - दि वा - ञ्छ - सि प - र - प - द - मा - रो - ढुं मैत्री प - रि - ह - र स - ह व - नि - ता - भिः । ( १ ) कोङ्कणदेशात्पूर्वो भागो वनवासदेशः, ' सर्वंसहा मध्यमवेगभाजस्त्रियो रमन्ते वनवासदेश्या: । ' ( ५।१८ ) इति रतिरहस्ये । ( २ ) ' जो ल्नावथाम्बुधेर्विश्लोकः ' इति वृ ० र ० ( ३ ) ' बाणाष्टनवसु यदि लश्चित्रा ' इति वृ ० र ० ' चित्रा नाम च्छन्दश्चित्रं चेत्रयो मा CC यकारौ - 0. JK ' Sanskrit इति Academy च्छन्दोमञ्जर्यादिषूपलब्धं , Jammmu. Digitized चित्रा by sun चित्रं वाच्छ स्त्वन्यत् ।

पृष्ठ 265

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चतुर्थोऽध्यायः ११३ २३४५६७८ ९ १० १२१४ १६ २ ४५६ ७८ ९ १०१२१४१६ ऽ ॥ ॥॥ ॥ ऽ ऽ ऽ, ऽ ऽ ॥ ॥। 1 ऽ ऽ ऽ मु - ह्य - ति मु - नि - र - पि वि - ष - या - स - ङ्गा - च्चित्रा भ - व - ति हि म - न- सो वृत्तिः ॥। ‘ नवम: ' ( पि ० सू ० ४।४२ ) इत्यनुवर्तमानेऽपि पुनर्नवमग्रहणमुपचित्राप्रतिप्रसवार्थम् । शिवप्रसादिनी - सूत्र में " च " ग्रहण पूर्वसूत्रोक्त पञ्चम और अष्टम के अनुवर्त्तनाऽर्थ प्रयुक्त हुआ है । तदनुसार सूत्रार्थ का निर्धारित स्वरूप होगा - जिस छन्द का नौवाँ, पाँचवाँ एवम् आठवाँ लकार अपने लघुमात्रा स्वरूप ( 1 ) में वर्त्तमान रहे, उस छन्द विशेष को " चित्रा मात्रासमक " नाम से कहा जाता है ॥ ४५ ॥

परयुक्तेनोपचित्रा ' ।४।४६ ॥ मृतसञ्जीवनी – परयुक्तेन दशमेन पूर्वं लघुनियमेन लक्षणं प्रोक्तम् । इदं तु २ ४६ ७८ १०१११२१४१६ 5 ऽ ऽ ॥ ऽ ॥ ऽ ऽ, य - च्चि - त्तं गु - रु - स - क्त - मु - दा - रं २ ४६७८ १० १११२१४१६ S ऽ ऽ ॥ ऽ ॥ ऽ ऽ, पृथ्वी त - स्य गु - णै - रु - प - चि - त्रा शिवप्रसादिनी - जिस छन्द का सहैकीभूतेन नवमेन ‘ उपचित्रा ' नाम भवति । गुरुनियमेनोच्यते । तत्रोदाहरणम्— २४ ६ ७८१०१११२१४ १६ 5 5 SIISI 155 विद्या - भ्यास - म - हा - व्य - स - नं च । २ ३४६७८१०१११२१४१६ SIISIISIIS S चन्द्र - म- री - चि - नि - भै - र्भ - व - ती - यम् ॥ नौवा लकार ( लघुवर्ण ) दशम लकार ( लघुमात्रिक वर्ण ) से मिलता हो, अर्थात् जिस छन्द के प्रत्येक पाद से सम्बन्धित नौवाँ एवं दशवाँ अक्षर मिलकर दशवें स्थान में जाकर गुरु में एक हो जाता हो, वह छन्द “ उपचित्रा ” लघु मात्रासमक कहलाता है ॥४६ ॥

एभिः पादाकुलकम् । ४।४७ ॥

– एषां पञ्चानां मध्ये यैः कैश्चिदपि चतुर्भिः पादैः ‘ पादाकुलकं ’ नाम । मृतसञ्जीवनी मात्रासमकविश्लोकवानवासिकोपचित्राणां पादैरुदाहरणम्-( १ ) ' उपचित्रा नवमे परयुक्ते ' इति वृ ० र ० । अर्धसमवृत्तान्तर्गतमुपचित्रनामकं छन्द-स्त्वितोऽन्यत् । ( २ ) ' लहु गुरु एक्क णिम्म गहि जेहा, पअ पअ लेक्खह उत्तमरेहा । सुकइ फणिंदह कंठहवलअं, सोरहमत्ता पाआकुलअम् ॥ इति प्रा ० पि ० सू ० १।१०४ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 266

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११४ छन्दः शास्त्रम् १ २४ ६ ७ ८ ९ १०१११२१४१६ २ ४५६७८१०१११२१४१६ ॥ ऽ S ॥ ॥ ॥ ऽ ऽ ऽ ऽ ॥ ॥ ऽ ॥ ऽ ऽ अ - लि - वा - चा - लि - त - वि क -सि - त - चू - ते का ले म - द - न - स - मा - ग - म - दू - ते । २ ४ ६ ८ ९ १०१११२१४१६ २४५ ६८१०१११२१४ १६ S S SI III SS 551 । ऽ ऽ ॥ ऽ ऽ स्मृ - त्वा का - तां प - रि - हृ - त - सा - र्थ: पा - दा - कु - ल- कं धा - व - ति पा - न्थः ॥ तथा विश्लोकोपचित्रामात्रासमकोपचित्राणां पादैः ‘ पादाकुलकम् ' । तत्रोदाहरणम्— २ ४ ५ ६ ७ ८ १०१११२१४१६ २ ३ ४ ५६८१०१११२१४ १६ S S 1 ॥। ऽ ॥ ऽ ऽ ऽ ॥॥ ऽ ऽ ॥ ऽ ऽ पुं - स्को - कि - ल- कृ - त - शो - भ - न - गी - ते द- क्षि - ण - प - व - न - प्रे - रि - त - शी - ते । १२३४ ६८ ९ १०१२ १४ १६ २४५ ६८ १०१११२१४१६ ॥ ॥ 5 S ॥ ऽ S ऽ ऽ ऽ ॥ ऽ ऽ ॥ ऽ ऽ म - धु - स - म - ये - ऽस्मि - न्कृ - त - वि - श्लो - क: पा - दा - कु - ल - कं नृ - त्य - ति लो - कः ॥ मात्रासमकस्यैकेन पादेन, द्वाभ्यामुपचित्रायाः, विश्लोकस्यैकेन ‘ पादाकुलकम् ' । तत्रोदाहरणम्— २ ४ ६८ ९ १०१२१४१६ २ ४५६ ८ १०१११२ १४ १६ SSSS ॥ ऽ ऽ ऽ S SI । ऽ 5 1 15 S चि - तं भ्रा - म्य - त्य - न - व - स्था - नं पा - दा - कु - ल - क - श्लो - क - स - मा - नम् । २४ ६ ७ ८ १०१११२१४१६ १२३४५६ ७ ८१०१२१४ १६ 5 S ऽ ॥ ऽ ॥ ऽ S ॥॥॥॥ ऽ ऽ ऽ ऽ का - य: का - य - ति शा - य - ति शक्ति - स्त - द - पि न ममं प - र - लो- के भ - क्तिः ॥ यथा पादाकुलकनाम्नः श्लोकस्य पादेष्वस्थिरता ' तथेत्यर्थः । उपचित्रापादेनैकेन, वानवासिकापादेन, पुनरुपचित्रापादाभ्यां पादाकुलकम् । तत्रोदाहरणम्— १२३४ ६ ७ ८ १०१११२१४१६ ॥ ॥ ऽ ॥ ऽ ॥ ऽ प - रि - ह - त - स - र्व - प - रि - ग्र - ह - लो - कः १२३४ ६ ७ ८ ९ १०१११२१४१६ ॥॥ ऽ ॥॥॥ ऽ ऽ प्र - ति - दि - न - व - र्धि - त - गु - रु - त - र - शो - कः । ( १ ) ‘ यदतीतकृतविविधलक्ष्मयुतैर्मात्रासमादिपादैः कलितम् । अनियतवृत्तपरिणामसहितं प्रथितं जगत्सु पादाकुलकम् ॥ ' इति वृ ० र ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 267

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चतुर्थोऽध्यायः ११५ २ ३४ ६ ७ ८ १०१११२१४१६ ऽ ॥ ऽ । 15 ॥ ऽ ऽ दुःख - वि - व - र्धि - त - लो - च - न - वा - रि: २ ४५ ६८ १० ११ १२१४१६ 5 51 I S ऽ ॥ ऽ ऽ पा - दा - कु - ल- कं याति त - वा -: रि ॥ इति मात्रासमकाधिकारः १ । शिवप्रसादिनी - ( १ ) मात्रासमक ( २ ) वानवासिका ( ३ ( ५ ) उपचित्रा इन पाँचों प्रकार के छन्दों के मध्य में जो - जो भी वे सभी “ पादाकुलक ’ ” नामक मात्रासमक छन्द कहे जाते हैं ॥ ) विश्लोक ( ४ ) चित्रा चारपाद वाले छन्द है, ४७ || ( यहाँ तक के ग्रन्थ से सविशेष मात्रासमक छन्द का विचार समाप्त हुआ ॥ )

गीत्यार्या लः । ४ । ४८ ॥

मृतसञ्जीवनी - यत्र पादे द्विर्वसवः षोडश लकारा भवन्ति सा ' गीत्यार्या ' नाम जाति: । ‘ ल: ’ इत्यनुवर्तमाने पुनर्लग्रहणं द्विमात्रिकनिवृत्त्यर्थम् । तत्रोदाहरणम्— ( १ ) ' त्यक्त्वा दलयुगनियमं वृत्तानि चतुष्पदानि बहुधा स्युः । त्रयमधिकरणं तेषां मात्रासमकं च कुलकमथ तिलकम् ॥ ( २।४ )

' मात्रासमकपद्भेदाः शतोपर्यष्टविंशतिः ।

सर्वेषु योग्येष्वल्पानां निष्फलं नामकल्पनम् ॥

चतुर्धा यदि युक्तोऽङ्घ्रिर्मात्राभिः पञ्चभिर्यदि । षड्भिर्वा सप्तभिः पूर्णस्त्रिधाकुलकमीश्महे ॥ ' मात्रासमकद्वयघटितं यदि । तिलकमिति प्रथयन्तु – ( ३।१४, १५,

' चतुष्पादानां पादस्तु षोडशारभ्य मातृकाः ।

द्वात्रिंशद्भिः परिमितश्चरितार्थो विभाति नः ॥

यदि द्वात्रिंशतोऽप्यूर्ध्वं मात्राः पादे नियोजिताः । ध्वन्यादिसंज्ञं गीतं स्यान्न तद्वृतं प्रशस्यते ॥ ' ( २ ) ' द्विगुणितवसुलघुरचलधृतिः ' इति नामान्तरं वृ ० र ० ( ३ ) ' चउमत्ता अट्ठगणा पुव्वद्धे, उत्तरद्ध होइ समरूआ । पभणेइ मुद्धि बहुसं भेआ ॥ ' इति प्रा ० पि ० सू ० १।६३ संज्ञान्तरं भवेत् । महान्तः ॥,

१ ९ ) इति वृत्तमणिकोशे ।

( २।६, ७ ) इत्यपि तत्रैव ॥

सो खंधआ विआणहु पिंगल इत्यनुसारेण स्कन्धकमित्यपि CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 268

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११६ छन्द: शास्त्रम् १२३४५६७८ ९ १०१११२१३१४१५१६ ॥। म - द - क - ल - ख - ग - कु - ल - क - ल - र - व - मु - ख - रि - णि १२३४५६७८ ९ १०१११२१३१४१५१६ 1 ॥ ॥ 1 वि - क | - सि | - | त - | स - | र | - सि - ज - प - रि - म - ल - सु - र - भि ॥॥ - णि १२३४५६७८ ९ १०१११२१३१४१५ १६ ॥॥ ॥ ॥ गि - रि - व - र - प - रि - स - र - स - र - सि म - ह - ति ख - लु १२३४५६७८ ९ १०१११२१३१४१५ १६ | | | | | | | | | | | | | -र - ति - र - ति - श - य - मि - ह म म ह - दि वि - ल - स - ति ॥॥ ॥ सर्वलघुच्छन्दसि गीत्यार्याशब्दस्य प्रवेशयितुमशक्यत्वात्तन्नाम नोक्तम् ॥ शिवप्रसादिनी – जिस छन्द के प्रत्येक पाद में सोलह लघुवर्ण उपलब्ध हो, वह छन्द " गीत्यार्या ” नाम से कहा जाता है । ल् का अधिकार से लाभ होने पर भी जो पुनः सूत्र में ग्रहण किया गया है वह व्यर्थ होकर ज्ञापन करता है कि इससे पूर्व के स्थलों में जो एक गुरुवर्ण के रूप में दो लघु वर्णों के बदले में स्थापन किया गया है, वहाँ

पर दो लघुवर्ण ही होगें, दो लघु के स्थान पर एक गुरु वर्ण नहीं ।

' शिखा विपर्यस्तार्धा । ४ । ४ ९ ॥

मृतसञ्जीवनी – सैव गीत्यार्या विपर्यस्तार्धा यदा भवति तदा ' शिखा ' ' इत्याख्यां लभते । अयमर्थः– यत्रार्धं सर्वलघु भवति, अर्धं च सर्वगुरु, इति । एवं तस्या एव विन्यासभेदेन संज्ञाद्वयमाह-शिवप्रसादिनी — उपर्युक्त " गीत्यार्या ” ही यदि विपरीत अवस्था वाला हो जाय, अर्थात् एक अर्ध भाग बत्तीस लघुवर्णों से निबद्ध हो, और दूसरा अर्ध भाग सोलह गुरु ( १ ) ' मत्त अठाइस पढमे, बीए बत्तीस मत्ताइ । पअ पअ अंते लहुआ सुद्धा सिखा विहाणेहु । ' इति प्रा ० पि ० सू ० १।१२७ उक्तशिखाच्छन्दस्त्वन्यत् । वृत्तमणिकोशे तु - ‘ दशनगणोपरि गुरुयुतमलघुयुगं वा दलं पुरः परतः । उभयं द्वात्रिंशल्लघु सगुरु नवगणं च सम्मतास्ति शिखा ॥ ' ( ३।८ ) इत्यन्यथैव शिखा दृश्यते । सांच

' शिखा कलयते चतुर्विधान् भेदान् ' ( २।३ ) इति तत्रैव ।

( २ ) णंदउभछउसेससारंगसिवबंभवारणवरुण । ' णीलुमअणतालंकसेहरुसरुगअणुसरहुविमइरवीर ' ॥

इति प्रा ० पि ० सू ० १।६४ इति सूत्रोक्तस्कन्धकभेदान्तर्गतशरभाख्यं छन्दोनामान्तरम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 269

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चतुर्थोऽध्यायः ११७ युक्त हो, उस छन्द को " शिखा छन्द " कहते हैं ॥४ ९ ॥ ( अब इस चित्रा छन्द के दो भेदों को सूत्रकार द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है- ) लः पूर्वश्चेज्ज्योतिः ॥४।५० ॥ मृतसञ्जीवनी — पूर्वश्चेदर्धभागः सर्वलघुर्द्वात्रिंशल्लकारो ( ३२ ) भवति, उत्तरश्च सर्वगुरुः षोडश ( १६ ) गकारस्तदा ' ज्योतिः ' नाम शिखा भवति । तत्रोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१३१४१५१६ ॥॥॥॥॥॥॥ य - दि सु - ख - म - नु - प - म - म - प - र - म - भि - ल - ष - सि १७१८१ ९ २०२१२२२३२४२५२६२७२८२ ९ ३०३१३२ ॥॥॥॥ प - रि - ह - र यु - व - ति - षु १ २ ३ ४ ५ ६ 5 S 5 5 5 5 आ - त्म - ज्यो - ति - र्यो - गा -९ १० ११ १२ १३ १४ S S S S 55 दृष्ट्वा दुः - ख - च्छे - दं र - ति - म - ति - श - य - मि - ह ७ ८ S S भ्या - सा-१५ १६ 5 5 कुर्याः ॥ शिवप्रसादिनी - शिखा छन्द के विषय में जो कुछ विशेषता । है, वह विशेषता इस प्रकार की है— जिसका पूर्वभाग ( या पूर्वाऽर्धभाग ) बत्तीस लघुवर्णों से युक्त हो, किन्तु उत्तराऽर्ध भाग गुरु सञ्ज्ञक सोलह अक्षरों वाला हो, वह " ज्योतिचित्रा छन्द " कही जाती है ॥ ५० ॥

गश्चेत्सौम्या । ४ । ५१ ॥

मृतसञ्जीवनी - तस्या एव शिखायाः पूर्वार्धभागः सर्वगुरुः षोडश ( १६ ) गकारश्चेद्भवति, उत्तरश्च द्वात्रिंश ( ३२ ) ल्लकारो भवति, तदा ' सौम्या ' नाम शिखा भवति । तत्रोदाहरणम्-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ S SSSSSSS सौम्यां दृष्टिं दे - हि स्ने- हा. ( १ ) ' अनङ्गक्रीडा ' इति नामान्तरमस्य वृ ० र ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 270

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत, पृष्ठ 270 का मूल पृष्ठ
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११८ छन्दः शास्त्रम् ९ १० ११ १२ १३१४१५ १६ 55 S 5 5 5 5 S द्दे - हे - s स्माकं मानं मुक्त्वा । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० १११२१३१४१५१६ ॥॥। I 1 1 1 ॥॥॥ श - श - ध - र - मु - खि! सुख - मु - प - न - यम - मह - दि १७ १८ १ ९ २०२१२२२३२४२५२६२७२८२ ९ ३० ३१ ३२ 1 1 ॥॥ ॥॥॥॥॥ म- न- सि- ज - रु - ज - म - प - ह - र ल - घु - त - र - मि - ह ॥ शिवप्रसादिनी - उसी शिखाछन्द का य: पूर्वार्धभाग में सोलह गुरु अक्षर हो, तथा उत्तरार्ध भाग बत्तीस लघ्वक्षरों का हो, तो वह शिखा " सौम्या " नाम से जानी जाती है ॥५१ ॥

चूलिकैकोनत्रिंशदेकत्रिंशदन्ते ग् । ४ । ५२ ॥ मृतसञ्जीवनी– ' अर्ध ग्रहणम् ( पि ० सू ० ४।४ ९ ) अनुवर्तते । यत्र प्रथमेऽर्धे एकोनत्रिंश ( २ ९ ) ल्लकारा भवन्ति, द्वितीये चार्ध एकत्रिंशत् ( ३१ ), तयोश्चान्ते द्वौ ( II ) लकारावुन्मूल्य प्रत्येकमेको गुरु: ( 5 ) क्रियते, तत् ' चूलिका ' ' नाम छन्दः । ' अन्ते ग् ' इति विशेषो-पादानसामर्थ्यादन्येषां लघुत्वमुक्तं भवति । तेनाद्ये सप्तविंशति ( २७ ) लघवः, अन्ते गुरुरेको भवति । द्वितीयेऽप्येकोनत्रिंश ( २ ९ ) ल्लघवः,.. अन्ते गुरुश्चैकः १२३४५६७८ ९ १०१११२१३१४ ॥ 1111 र - ति - क - र - म - ल - य - म - रु - ति शु - भ - श - श- (? ) १५ १६ १७१८१ ९ २० २१२२२३२४ २५२६ २७ २ ९ ॥ ॥॥॥ ॥ ॥ । ऽ म - भि - ह - त - हि - म - म - ह - सि म - धु - स - म - ये । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१३१४ १५ १६

1 1 1 ॥। 1 1

प्र - व - स - सि प - थि - क! वि - र - हि - त! क - थ- मि - ह तु १७१८१ ९ २०२१२२२३२४२५२६ २७२८ २ ९ ३१ ॥॥ ॥ ॥ ऽ प - रि - ह - त - यु - व - ति - र - ति - च - प - ल - त - या ॥ ( १ ) ' अतिरुचिरा ' इति संज्ञान्तरं वृत्तरत्नाकरादिषु ॥ तत्रोदाहरणम्— CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA