छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 291–300
छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 291–300
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पञ्चमोऽध्यायः १३ ९ चतुर्थो वर्णः प्रायेण गुरुर्भवतीत्याम्नायः ॥ अतः परं विषमवृत्तान्याह-शिवप्रसादिनी - ( ५।१८ ) पूर्व सूत्र की निवृत्ति हो जाती है । " चपलाऽयुजो न् ” ( पि ० सू ० ५।१६ ) इस सूत्र से " अयुक् ” की अनुवृत्ति आएगी । यहाँ पर " विपुला युग्लः सप्तम ' ( पि ० सू ० ५/१७ ) सम्पूर्ण सूत्र अनुवर्त्तन करना चाहिए । छन्द के प्रथम, तृतीय पाद में चतुर्थ अक्षर से परे यगण ( ISS ) को बाधकर भगण ( 511 ) रगण ( SIS ) नगण ( ॥। ) एवं तगण ( ऽऽ । ) विकल्प से होते हैं । सार यह है कि जिस अनुष्टुप् छन्द के युक् पादों = द्वितीय एवं चतुर्थ पादों में सातवाँ अक्षर लघु हो, तथा अयुक्पादों में ( प्रथम एवं तृतीय पादों में ) चतुर्थ अक्षर के आगे में स्थित यगण ( 155 ) को बाधकर भगण ( SII ), रगण ( SIS ), नगण ( III ), अथवा तगण ( 551 ) उपस्थित होगा, वह छन्द “ विपुला " कहलाता है ॥१ ९ ॥ प्रतिपादं चतुर्वृद्ध्या पदचतुरूर्ध्वम् ' ।५।२० ॥ मृतसञ्जीवनी – चतुर्णामक्षराणां वृद्धिश्चतुर्वृद्धिः । अनुष्टुभः पादादूर्ध्वं प्रतिपादं चतुरक्षरवृध्द्या यद्वृत्तं निष्पद्यते, तत् ' पदचतुरूर्ध्व ' नाम । तत्रोदाहरणम्— १ २ ३४५६७८ त - स्या: क - टा - क्ष - वि - क्षे - पै: १ २ ३४५६७८ ९ १०१११२ क - म्पि - त - त - नु - कु - टि - लै - र - ति - दी - घैः । १२३४५६७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ त - क्ष - क - द - ष्ट इ - वे - न्द्रि - य - शून्यः क्ष - त - चै - त - न्यः १२३४५६७८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६१७ १८ १ ९ २० प - द - च - तु - रू - र्ध्वं न च - ल - ति पु - रु - षः प - त - ति स - ह - सै - व ॥ अत्र गुरुलघुविभागो नेष्यते ॥ शिवप्रसादिनी - चार अक्षरों की वृद्धि को चतुर्वृद्धिशब्द से कहा जाता है । आठ अक्षरों वाले चार पाद अनुष्टुप् छन्द में होते हैं । अनुष्टुप् छन्द के पाद से ऊपर प्रत्येक पाद में चार - चार अक्षरों की वृद्धि से जो वृत्त ( छन्द ) उत्पन्न होता है, वह वृत्त “ पदचतुरूर्ध्व ” नाम से व्यवहार का विषय बनता है । अर्थात् जिस छन्द का प्रथम पाद अनुष्टुप् छन्द के आठ अक्षरों वाला हो, द्वितीय पाद में चार अक्षरों की वृद्धि होकर बारह ( १ ) ' आद्यः पादोऽष्टभिर्वर्णैस्ततोऽन्ये चतुरक्षरैः क्रमादृद्धाः । पादा यस्य द्वितीयाद्याः षट्पञ्चाशद्वर्णा यत्र तदिह विबुधजनैरुक्तं पदचतुरूर्ध्वं नाम वृत्तम् ॥ ' इति छन्द: कौस्तुभे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१४० छन्दः शास्त्रम् अक्षर हों, तृतीय पाद में चार जुड़कर सोलह अक्षरों की संख्या हो, और चतुर्थपाद में पुनः चार अक्षरों की वृद्धि से युक्त हुआ वह बीस अक्षरों से युक्त होकर उपलब्ध हो, तो ऐसा वह वृत्त “ पदचतुरूर्ध्व " नाम से कहा जाएगा ॥ २० ॥
गावन्त आपीडः ' ।५।२१ ॥
मृतसञ्जीवनी – गकारौ ( SS ) द्वावन्ते चेद्भवतश्चतुर्णामपि पादानां तत् पदचतुरूर्ध्वं ‘ आपीड ' संज्ञकं भवति । अन्ते गुरुद्वयग्रहणादत्र शेषाणां लघुत्वमभ्यनुज्ञातं सूत्रकारेणेति मन्यामहे । तत्रोदाहरणम्— १२३४५६७८ ॥॥॥ ऽ ऽ कु -सु - मि - त - स - ह - का - रे १२३४५६७८ ९ | | | | | | | | | ह - त - हि - म - म - हि - म - शु - चि १२३४५६७८ ९ ॥॥। १०१११२ | 55 - श - शा - ङ्के । १०१११२१३१४१५ १६ ॥ ॥ । S S वि - क - सि - त - क - म - ल - स - र - सि म - धु - स - म - ये - ऽस्मिन् १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१३१४१५१६१७ | | | ॥॥॥॥॥ 1 १८ १ ९ २० 1 S S प्र - व - स - सि ॥। - प - थि - क - ह - त - क! यदि भ - व - ति त - व - वि - प - त्तिः ॥ शिवप्रसादिनी - दो गुरुवर्ण पादान्त में यदि उपस्थित होते हैं, तो चारपादों का वह “ पद चतुरूर्ध्व ’ ” नाम वाला वृत्त " आपीड " नाम से पुकारा जाता है । पादान्त में दो गुरुओं के ग्रहण से यहाँ पर शेष अक्षरों में सूत्रकार के द्वारा लघ्वक्षर प्रतिज्ञात होता है । ऐसा यहाँ पर हम स्वीकार करते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि पूर्व में प्रतिपादित पद “ चतुरूर्ध्व " वृत्त के प्रत्येक पाद के अन्त में यदि दो - दो अक्षर दीर्घ सञ्ज्ञक उपलब्ध हों, तो उस " पद चतुरूर्ध्व ” वृत्त की " आपीड ” सञ्ज्ञा हो जाती है । सूत्रकार के द्वारा पाद के अन्त में दो वर्ण मात्र के दीर्घ विधान किये जाने से शेष समस्त अक्षरों की ह्रस्ववर्णों के रूप में उपस्थिति ही स्वीकरणीय है । ” यह बात सिद्ध होती है ॥२१ ॥
( १ ) ‘ आपीड इदमेवान्त्यौ वर्णौ चेद्गौ ' इति छन्दःकौस्तुभे । ( २ ) ‘ आपीडः सर्वलः प्रोक्तः पूर्वपादान्तगद्वयः ' ( ग ० पु ० पू ० खं ० २११।२ ) CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चमोऽध्यायः १४१ गावादी ' चेत्प्रत्यापीडः । ५।२२ ॥ मृतसञ्जीवनी - गकारौ ( SS ) द्वावादौ चेद्भवतश्चतुर्णामपि पादानां, तदा तत् पदचतुरूर्ध्वं ' प्रत्यापीड ' संज्ञं भवति । अत्रापि पूर्ववच्छेषाणां लघुत्वमेव १ २ ऽ ऽ चित्तं १ २ S ऽ का - न्तं १ २ ऽ ऽ कू - ज -३ ४ ५६ ७८ ॥ ॥ ॥ मम र - म - य - ति ३ ४ ५ ६७ ८ ९ १० ११ १२ ॥ ।
व - न - मि - द - मु - प - गि - रि - न - दि ।
३ ४५६७ ८ ९ १० ११ १२ ॥॥॥। १३ १४ १५ १६
। 1 ॥॥॥
न्म - धु - क - र - क - ल - र - व - कृ - त - ज - न - धु - ति । तत्रोदाहरणम्-१ २ ३ ४५६७८ ९ १० ११ १२ १३ १४१५१६१७१८१ ९ २० S S I ॥ ॥॥॥॥॥॥॥। पुं - स्को - कि - ल - मु - ख - रि - त - सु - र - भि - कु - सु - म - चि - त - त - रु - त - ति । शिवप्रसादिनी - गौ = दो गकार ( = दीर्घ अक्षर ) यदि चारों पादों के आदौ = आदि में हो, तो वह “ पदचतुरूर्ध्व " नामक वृत्त " प्रत्यापीड ' नाम वाला सिद्ध होता है । यहाँ पर भी शेष अक्षर लघु ही रहेंगें ॥ २२ ॥
प्रत्यापीडो गावादौ च । ५।२३ ॥ मृतसञ्जीवनी — चकारोऽन्त इति समुच्चयार्थः । तस्यैव पदचतुरूर्ध्वस्यान्ते आदौ च यदि गकारौ ( ऽऽ ) भवतस्तदापि ' प्रत्यापीड ' एव भवति । तत्रोदाहरणम्-( १ ) अयं भेदश्छन्द: कौस्तुभवृत्तरत्नाकरादिषु नोपलभ्यते । मन्दारमरन्दे त्वस्ति । ( २ ) ' कुलकलरवकृतयति ' इति लि. पुस्तके । ( ३ ) अयं भेदश्छन्दः कौस्तुभ - वृत्तरत्नाकरादिषु नोपलभ्यते, नाग्नेये ( ३३२ ) ऽस्य सूत्रस्यानुवादो दृश्यते, न च वृत्तिकृदुत्तार्थसूचनार्थमेतावद्गुरुसूत्रकरणापेक्षास्ति, नापि नाम्नः पुनरुपादाने प्रयोजनमस्तीति पूर्वसूत्रस्यैव पाठान्तरमिदं लेखकप्रमादान्मूले प्रविष्टं वृत्तिकृता ' स्थितस्य गतिश्चिन्तनीये ' ति न्यायमनुसृत्य व्याख्यातमिति सम्भाव्यते । ' अत्यापीड ' इति पाठः कैश्चिदूह्यते । वैदिकैस्तु यथावस्थितमधीयत एवेत्यत्र तत्त्वे सुधिय एव प्रमाणम् । छ ० शा ० EQ & JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१४२ छन्दः शास्त्रम् १ २ ३४५६ ७ ८ ऽ ऽ ॥॥ ॥ का - न्ता - व - द - न - स - रो - जं १२३४५६७८ ९ १० ऽ ऽ ॥॥ ॥॥ हृद्यं घ - न - सु - र - भि - म - धु - र -१ २३४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ S S सा- ढ्यम् । ११ १२ १३ १४ १५ ऽ ऽ ॥ ॥॥॥॥ ॥ ऽ पा - तुं र - ह - सिस - त - त - म - भि - ल - ष - ति मनो १६ S मे १ २ ३ ४ ५६७८ ९ १० ११ १२१३१४१५१६१७१८१ ९ २० S S ॥ ॥॥॥ ॥॥॥॥ ऽ ऽ किं - चि - न्मु - कु - लि - त - न - य - न - म - वि - र - त - म- णि - त - र - म - णी - यम् ॥ तदेवं द्विप्रकारः प्रत्यापीडो भवति ॥ शिवप्रसादिनी – यहाँ पर " च " शब्द “ अन्त ” ( ५।२१ ) का परामर्शक ( बोधक ) है । उपर्युक्त " पदचतुरूर्ध्व " के प्रत्येक पादों के आदि - आदि में होने वाले दो अक्षर तथा प्रतिपादों के अन्तिम - अन्तिम दो अक्षर यदि दीर्घ रूप में उपलब्ध हों, तब भी वह वृत्त " प्रत्यापीड " नाम से ही अभिहित होंगा ॥ २३ ॥
प्रथमस्य विपर्यासे ' मञ्जरीलवल्यमृतधाराः । ५।२४ । मृतसञ्जीवनी – आपीडग्रहणं निवृत्तम् । तेनैव समं लघ्वक्षराभ्यनुज्ञानं च । तदेव पदचतुरूर्ध्वं प्रथमस्य विपर्यासे मञ्जरी - लवली - अमृतधाराभिधानं भवति । प्रथमस्य पादस्य द्वितीयेन विपर्यासे ' मञ्जरी ' । प्रथमस्य तृतीयेन विपर्यासे ' लवली ' । प्रथमस्य चतुर्थेन विपर्यासे ‘ अमृतधारा’२ ॥ तत्र मञ्जर्युदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ ६७८ ९ १० ११ १२ ज - न - य - ति म - ह- तीं प्री - तिं हृ - द - ये ( १ ) ' कलिका ' इति नामान्तरं गारुड - छन्द: कौस्तुभ - वृत्तरत्नाकरादौ । ' मण्डरी'त्यपि कृष्णीये | ‘ अथादिना । क्रमात्पादेन चेत्पादा द्वितीयाद्यास्त्रयस्तदा । कलिका लवली प्रोक्ताऽमृतधारा च सूरिभिः ॥ ' इति छन्दः कौस्तुभे । ( २ ) ‘ आपीडस्यादिमस्तुर्यस्तुरीयश्चेत्तृतीयकः । तृतीयोऽपि द्वितीयोऽङ्घ्रिर्द्वितीयः प्रथमो यदि । उक्ता साऽमृतधारेति मञ्जरीत्यपि कैश्चन ॥ ' इति मं ० म ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चमोऽध्यायः १४३ १ २ ३ ४५६ ७ ८ का - मि - नां चू - त - म - अ - री । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ मि - ल - द - लि - च - क्र - च - च - प - रि - चु - म्बि - त - के - स - रा १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३१४१५१६ १७ १८ १ ९ २० को - म - ल - म - ल - य - वा - त - प - रि - न - र्ति - तत - रु - शि - र - सि स्थि - ता ॥ लवल्युदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ वि - र - ह - वि - धु - र - हू - ण - का - ङ्ग - ना - क - पो- लो - प - मं १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ उप - रि - ण - ति - ध - रं पी - त - पा - ण्डु - च्छ - वि । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ल - व - ली - फ - लं नि - दा - घे १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३१४१५ १६ १७ १८ १ ९ २० भ - व - ति ज - ग - ति हि - म - क - र - शी - त - ल - म - ति - स्वा दूष्ण - ह - रम् ॥ अमृतधारोदाहरणम्— १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१३१४१५ १६ १७ १८ १ ९ २० यदि वाञ्छसि क र्ण र सा - य - नं स - त - त - म - मृ - त - धा - रा - भिः १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ यदि हृ - दिवा प - र - मा - न - द - र - सम् । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ चे - तः! शृणु ध - र - णी - ध - र - वा - णी - म - मृ - त - म - यीं १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ त- त्का - व्य - गुण - भू - ष - णम् ॥ केचिदापीडादिष्वपि पादविपर्यासे सति मञ्जर्यादिनामानीच्छन्ति ॥ इति पदचतुरूर्ध्वाधिकारः । शिवप्रसादिनी - प्रकृत सूत्र में पूर्व सूत्र से अनुवृत्ति लभ्य “ आपीड ” की निवृत्ति हो जाती है । यदि “ पदचतुरूर्ध्व " वृत्त में द्वितीयाऽऽदिपादों के सहित प्रथमपाद विपर्यास को प्राप्त होता है, तो वह क्रम से मञ्जरी, लवली, एवम् अमृतधारा के नाम से जानी ( १ ) ' कपोलावदातपरिणति आपीतपाण्डुच्छवि ' इति लि. पुस्तके । ( २ ) ' जयति हिमशीतलं खण्डवत्स्वादु तृष्णाहरं सुन्दरम् ' इति लि. पुस्तके । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१४४ छन्दः शास्त्रम् जाती है । इसका तात्पर्य यह है कि पदचतुरूर्ध्ववृत्त के प्रथम पाद स्थान में यदि द्वितीय पाद अवस्थित होता है, तथा द्वितीय पाद के स्थान में प्रथम पाद आ जाता है, तो उस पदचतुरूर्ध्व वृत्त की " मञ्जरी ' सञ्ज्ञा होती है । एवम् आदि पाद के स्थान में तृतीय पाद तथा तृतीय पाद के स्थान में प्रथम पाद की यदि प्रविष्टि होती है, तो वह वृत्त ‘ “ लवली ” सञ्ज्ञा को धारण करता है । इसी प्रकार चतुर्थ पाद के स्थान में प्रथम पाद तथा प्रथम पाद के स्थान में चतुर्थ पाद आरोहण करे, तो वह नाम से कही जाती है । 1 छन्दशास्त्र के कुछ तत्त्ववेत्तागण पदचतुरूर्ध्ववृत्त के भेद प्रत्यापीड ” में भी उपर्युक्त प्रकार से पादविन्यास की स्थिति में मञ्जरी होती हैं, ऐसा कहते हैं ॥ २४ ॥
' उद्गतामेकतः स्जौ स्लौ, न्सौ ज्गौ, भ्नौ
ग्, स्जौ स्जौ ग् । ५।२५ ॥
वृत्त " अमृत धारा " विशेष " आपीड, आदि सञ्ज्ञाएँ प्राप्त ज्लौ मृतसञ्जीवनी– ' पाद- ' ( पि ० सू ० ५।९ ) इति प्रकृतमनुवर्तते । यत्र प्रथमे पादे सकार ( IIS ) जकार ( 151 ) सकार ( 115 ) ल ( 1 ) कारैर्दशाक्षराणि भवन्ति, द्वितीये पादे नकार-( ॥। ) सकार ( ॥ 5 ) जकार ( 151 ) ग ( 5 ) कारैर्दशैव, तृतीये पादे भकार ( 511 ) नकार ( ॥। ) -जकार ( ।ऽ । ) लकार ( । ) ग ( S ) कारैरेकादशैव, चतुर्थे पादे सकार ( 115 ) जकार ( 151 ) सकार-( ॥ऽ ) जकार ( 151 ) ग ( S ) कारैस्त्रयोदश तद्वृत्तम् ' उद्गता ' नाम । तत्रोदाहरणम्— सगणः जगण: सगणः ल ० 1 S मृ - ग - लो - च - ना श - शि - मु - खी च ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) नगणः सगणः जगण: गु ० S रु - चि - र - द - श - ना नि - त - म्बिनी । ( १ २ ३ ४ ( ५ ( ६ ) ( ७ ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( १ ) ' प्रथमे सजौ यदि सलौ च नसजगुरुकाण्यनन्तरे । यद्यथ भनजलगाः स्युरथो सजसा जगौ प्रभवतीयमुद्गता ॥ ', ' प्रथमे सजौ यदि सलौ च नसजगुरुकाण्यनन्तरे । यद्यथ च भनभगाः स्युरथो सजसा जगौ भवतीयमुद्गता ॥ ' इति प्रा ० पि ० सू ० २।३२४, ३२२ एवं च प्राकृतपिङ्गले लक्षणद्वयमुक्तमुद्गतायाः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चमोऽध्यायः १४५ भगण: नगण: जगण: ल ० गु ० ऽ । 1 1 1 5 1 J 5 हं - स - ल - लि - त - ग - म - ना ल - ल- ना ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ( ६ ) ( ७८ ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) सगणः जगण: सगणः जगण: गु ० 5 S प - रि - णी - य - ते य - दि भ - वे- त्कु - लो - ग - ता ॥ ( २ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ १२ ) ( १३ ) यत्र सूत्रे गकारो ( 5 ) लकारो ( 1 ) वा श्रूयते, तत्र तेनैव वृत्तस्य पादः परिसमाप्यते । ‘ उद्गताम् ’ इति कर्मविभक्तिश्रवणात् पठेदित्यध्याहार्यम् । ' एकत: ' इति प्रथमं पादं द्वितीयेन सहाविलम्बेन पठेदित्यर्थः । ' उपस्थितप्रचुपितं पृथगाद्यम् ' ( पि ० सू ० ५।२८ ) इत्यतः सिंहावलोकितन्यायेन ‘ आद्य ’ ग्रहणमनुवर्तनीयम् । तेनाद्यमेव पादमेकतः पठेत् ' । ' एकतः ’ इति ल्यब्लोपे पञ्चमी ॥ शिवप्रसादिनी — इस सूत्र में ( पि ० सू ० ५१ ९ ) से " पाद ” की अनुवृत्ति आती है । जिस छन्द के प्रथम पाद में, क्रमिक रूप से सगण ( 115 ) जगण ( 151 ) सगण ( 115 ) और एक ह्रस्वअक्षर कुछ मिलकर दशअक्षर हों, द्वितीय पाद में नगण ( III ) सगण ( 115 ) जगण ( ISI ) तथा एक दीर्घ वर्णों को लेकर कुल दशअक्षर हों, तृतीय पाद में भगण ( ऽ ॥ ) नगण ( ॥। ) जगण ( 151 ) एक ह्रस्व, तथा एक गुरु ( दीर्घ ) अक्षरों को मिलाकर कुल ( ११ ) ग्यारह अक्षर हों, और चतुर्थपाद में पुनः सगण ( 115 ) जगण ( 151 ) सगण ( IIS ) जगण ( ISI ) के साथ - साथ एक दीर्घ तथा एक ह्रस्ववर्ण को मिलाकर कुल तेरह ( १३ ) अक्षर हों, चारों पाद वाले उस वृत्त को “ उद्गता " नाम से कहा जाता है । सूत्र में " एकत्रः " पद का तात्पर्य यह है कि प्रथम पाद को द्वितीय “ उपस्थित प्रचुपितं पृथगाद्यम् ” ( पि ० सू ० ५।२८ ) इस सूत्र से ( सिंहाऽऽवलोकन न्याय से “ आद्य ” शब्द का अनुकर्षण किया जाना चाहिए, जिससे अविलम्बोच्चारण के विषय में यह तत्त्वस्फुट होता है कि प्रथमपाद का ही द्वितीय पाद के साथ अविलम्ब उच्चारण किया जाना चाहिए । द्वितीय पाद एवं तृतीय पाद तो सन्धि और समास के कारण अविलम्बोच्चारण का विषय बनता है । अतः वहाँ के लिए यह नियम नहीं है ॥२५ ॥
( १ ) ' एकतः पठे ' दिति - अर्धद्वयमप्येकीकृत्य एकत उच्चारयेत् । द्वितीयपादस्तृतीयपादश्च सन्धिसमासवशादेकीभवतीत्यर्थः । उक्तं च जयदेवेन — तरसोदिता सजसलेष्वित्यादि । तत्र च तरसोदिता वेगेनोच्चारिता - अर्धान्ते विराममन्तरेणार्धद्वयमेकीकृत्यपठितेत्यर्थः-इति वृत्तरत्नाकरपश्चिका ( ५/६ ) । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१४६ छन्दः शास्त्रम् तृतीयस्य सौरभकं ' नौ भूगौ ।५।२६ । मृतसञ्जीवनी– ' तृतीयस्य ' इति ग्रहणात्तस्या उद्गताया एवान्ये त्रयः पादा गृह्यन्ते । तृतीयपादे तु विशेषः । तृतीये पादे रेफ ( SIS ) नकार ( III ) ' भकार ( 511 ) ग ( 5 ) कारैर्दशाक्षराणि भवन्ति तत ' सौरभकं ' नाम । तत्रोदाहरणम्-सगणः जगणः सगणः ल ० नगण: सगणः जगण: गु ० 51 5 । ऽ S । ऽ । S वि - नि - वा - रि - तोऽपि न - य - ने - न त - द - पि कि - मि - हा - ग - तो भवान्? । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) रगणः नगणः भगण: गु ० सगणः जगणः सगण जगणः गु ० । ऽ ॥ I 5 ऽ ॥ 5 1 S ए - त - दे - व त व सौ - र - भ - कं य - दु - दी - रि - ता - र्थ म - पि ना - व- बु- ध्य - ते ॥ ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ १२ ( १३ ) शिवप्रसादिनी - जिस उद्गताछन्द के तृतीयपाद में क्रमश: रगण ( SIS ) नगण ( III ) भगण ( SII ) और एक गुरु वर्ण को मिलाकर कुल दश अक्षर होते हों, तथा शेष बचे प्रथम - द्वितीय एवं चतुर्थ पादों में पुनः १०-१० और १३ अक्षर हों, अर्थात् तृतीय पाद के अतिरिक्त पाद पुनः उद्गता वृत्त के लक्षणों से युक्त हों, तो वह उद्गातावृत्त " सौरभक ” नाम को धारण करता है ॥२६ ॥
ललितं नौ सौ । ५।२७ ॥
मृतसञ्जीवनी – तस्या एव उद्गतायास्तृतीयपादस्थाने यदा नौ ( ॥।.॥। ) सौ ( ॥ 5.॥ 5 ) भवतस्तदा ‘ ललितं ’ नाम वृत्तम् । तत्रोदाहरणम्— सगणः जगण: सगणः ल ० 15 511 डे स - त - तं प्रि - यं - व - द - मु - दा - र ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( १ ) ' त्रयमुद्गतासदृशमेव पदमिह तृतीयमन्यथा । जायते रनभगैर्ग्रथितं कथयन्ति सौरभकमेतदीदृशम् ॥ ' इति प्रा ० पि ० सू ० २।३२७ । ' अन्ये सौरलकमूचिरे । ' इति कृष्णये । ( २ ) ' नयुगं सकारयुगलं च भवति चरणे तृतीयके । तदुदितमुरुमतिभिर्ललितं यदि शेषमस्य सकलं अधोद्गता ॥ ' इति प्रा ० पि ० सू ० २।३२ ९ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चमोऽध्यायः १४७ नगण: सगणः जगण: गु ० 1 5 15 1 S म - म - ल - ह - द - यं गुणो - त- रम् ' । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) 200 नगणः नगणः सगणः सगणः सु - ल - लि - त - म - ति - क - म - नी - य - त- नुं ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ११ १२ ) सगणः जगण: सगणः जगणः गु ० 5 S पु - रु- षं त्य- ज - न्ति न तु- जा- तु यो- षि- तः ॥ { __ ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ११ १२ १३ ) शिवप्रसादिनी - उसी उद्गता वृत्त के तृतीय पाद के स्थान में जब दो नगण ( ॥॥॥ ) दो सगण ( 115-115 ) होते हों, अर्थात् जब उद्गता वृत्त के तृतीय पाद में क्रमशः दो नगण और दो सगण मिलकर बारह अक्षर हों, और शेष तीनों पादों में पुनः १०-१० तथा १३, अक्षरों की संख्या हो, या शेष तीनों पाद उद्गता वृत्त के लक्षणों से युक्त हों, तो उस उद्गता को " ललित " वृत्त कहते हैं ॥ २७ ॥
उपस्थितप्रचुपितं पृथगाद्यं म्सौ ज्भौ गौ, स्नौ ज्रौ ग्,
नौ स्, नौ न् ज्यौ ।५।२८ ॥
मृतसञ्जीवनी - यत्र प्रथमे पादे मकार ( ऽऽऽ ) सकार ( 115 ) जकार ( 151 ) भकारा ( 511 ) गकारौ ( ऽऽ ) च भवतः, द्वितीये पादे सकार ( IIS ) नकार ( 111 ) जकार ( 151 ) रेफा ( 515 ) गकार ( 5 ) श्च, तृतीये नकारौ ( ॥ 1.111 ) सकार ( IIS ) श्च चतुर्थे त्रयो नकारा ( ॥॥॥॥। ) कार ( ।ऽ । ) ‘ यकारौ ( ISS ) च, तत् ‘ उपस्थितप्रचुपितं ' नाम वृत्तं भवति । तत्रोदाहरणम्— मगणः सगणः जगणः भगणः गु ० गु ० 5 5 S 1 S S रा - मा का - म - क - रे - णु का मृ - गा- य- त - ने - त्रा ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ११ १२ ) ( १३ ) ( १४ ) ( १ ) ' गुणोन्नतं ' इति लि. पुस्तके । ( २ ) ' म्सौ उभौ गौ प्रथमाङ्घ्रिरीक्ष्यते खलु यस्मित्रितयं सनजरगास्तथा ननौ सः । अथ नननयुजतयं प्रचुपितमिदमुदितमुपस्थितपूर्वम् ॥ ' इति छन्द: कौस्तुभे । कृष्णीये तूद्गतायाः सरलाख्योऽन्योऽपि भेद उपलभ्यते— ' उद्गतायाश्चतुर्थोऽङ्घ्रिर्ननन्गैः सरलं मतम् । ' इति । ' उपस्थितप्रकुपित ' मिति– कृष्णीये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१४८ छन्दः शास्त्रम् सगणः S ह - द- यं ( १ ) ( २ ) ( ३ ) नगण: नगण: जगण रगणः गु ० A. 5 ). 15. S 1 ह - र - ति प - यो - ध - रा - व - न- म्रा । ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ११ १२ ) ( १३ ) नगण: सगणः इ - य - म - ति - श - य - सु - भ - गा ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) नगणः नगण: नगण: जगणः यगणः 5 5 ब- हु - वि - ध - नि - धु- व -न - कु - श - ला ल - लि - ता - ङ्गी ॥ ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ११ १२ ) ( १३ ) ( १४ ) ( १५ ) ' पृथगाद्यम् ' इति उद्गतामेकतः पठेत् ' ( पि ० सू ० ५।२५ ) इत्यनुवृत्तिनिरासार्थम् ' । अत्र तृतीयपादव्यवस्था सकारस्य विभज्य पाठलिङ्गात् ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रथम पाद में क्रमिक रूप से मगण ( SSS ) सगण ( ॥5 ) जगण ( 151 ) भगण ( SII ) तथा दो गुरु अक्षरों से युक्त कुल चौदह ( १४ ) अक्षर हों, द्वितीय पाद में सगण ( 115 ) नगण ( 111 ) जगण ( ISI ) रगण ( 515 ) और एक दीर्घ अक्षर, अक्षरों से मिलकर कुल १३ ( तेरह ) अक्षर हों, तृतीयपाद में दो नगण ( 111-111 ) एवम् एक सगण ( ॥5 ) मिलकर नौ ( ९ ) अक्षर हों, तथा चतुर्थ पाद में जाकर तीन नगण ( ॥। - ॥। - ॥। ) एक जगण ( 151 ) यगण ( ISS ) कुल मिलाकर पन्द्रह ( १५ ) अक्षर हों, वह वृत्त पुनः “ उपस्थित प्रचुपित " नाम से कहा जाता है । इस सूत्र में “ पृथगाद्यम् ” इस अंश को दिये जाने से, ( उद्गतामेकतः पठेत् ( पि ० सू ० ५/२५ ) इस सूत्र से अधिकार रूप से आने वाले “ एकतः " शब्द की निवृत्ति प्रकृत सूत्र में समझना चाहिए । अर्थात् इस उपस्थित प्रचुपित “ छन्द " में, उद्गता छन्द के समान प्रथम पाद को द्वितीय पाद के साथ अविलम्ब उच्चारण नहीं करना चाहिए ॥२८ ॥
' वर्द्धमानं नौ स्नौ नूसौ । ५।२ ९ ॥ मृतसञ्जीवनी - ' तृतीयस्य ' ( पि ० सू ० ५।२६ ) इत्यनुवर्तते । तस्मिन्नपस्थितप्रचुपिते ( १ ) ' शङ्कानिरासार्थम् ' इति लि. पुस्तके । ( २ ) ' स्नौ ' इति सूत्रस्थपाठदेहे नकारात्सकारं दूरीकृत्येत्यर्थः । ( ३ ) ' वर्धमानं तृतीये नौ- ' इत्येव वैदिकपाठः । ' वर्द्धमानं तृतीयश्चेन्ननसैर्ननसैरिह ' इति छन्द: कौस्तुभे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA