छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 301–310

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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पञ्चमोऽध्यायः १४ ९ तृतीयस्य पादस्य स्थाने यदा नकारौ ( 111.111 ) सकार ( 115 ) नकारौ ( ॥। ) पुनर्नकार ( ॥। ) सकारौ ( 511 ) च भवतस्तदा ' वर्द्धमानं ' नाम वृत्तं भवति । तत्रोदाहरणम्-मगण: सगणः जगण: भगण: गु ० गु ० S ऽ । S S बिम्बोष्ठी क - ठि - नो - त्र - त - स्त - ना- व- न - ता- ङ्गी ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ( ५६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०१११२ ) ( १३ ) ( १४ ) सगणः नगण: जगण रगणः गु ० ॥ ऽ ॥ 15 1 S ह - रि - णी - शिशु- न - य- ना नि त म्ब- गुर्वी । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०१११२ ) ( १३ ) नगणः नगण: सगणः नगणः नगण: सगणः म - द - क - ल - क - रि - ग - म - ना प - रि - ण - त - श - शि - व द - ना ( २ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०१११२ ) ( १३ १४ १५ १६ १७ १८ ) नगणः नगणः नगणः जगण: यगणः S S ज - न - य - ति मम मनसि मुदं म - दि - रा- क्षी ॥ ( १२३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६७८ ) ( ९ १०१११२ ) ( १३ ) ( १४ ) ( १५ ) शिवप्रसादिनी -- प्रकृत सूत्र में तृतीयस्य ( पि ० सू ० ५।२६ ) की अनुवृत्ति होती है । तदनुसार जिस उपस्थित प्रचुपित वृत्त के तृतीय पाद के स्थान में जब दो नगण ( IIIIII ) एक सगण ( 115 ) दो नकार ( 111-111 ) और एक सकार ( 511 ) सब मिलकर अठारह १८ अक्षर होने की स्थिति प्रकट हो, एवम् शेष प्रथम, द्वितीय तथा चतुर्थ पाद उपस्थित प्रचुपित छन्द के लक्षण विद्यमान हो, तो वह वृत्त “ वर्द्धमान " नाम से व्यक्त होता है ॥२ ९ ॥

शुद्धविराडृषभं तज्राः । ५। ३० ॥

मृतसञ्जीवनी – तस्मिन्नेव उपस्थितप्रचुपिते यदा तृतीयस्य पादस्य स्थाने तकार ( ऽऽ । ) जकार ( 151 ) रेफा ( SIS ) भवन्ति, तदा ' शुद्धविराडृषभं ' नाम वृत्तं भवति । तत्रो-दाहरणम्-( १ ) लिखितपुस्तके सर्वत्रापि जंगणौ सगणनगणौ ' इत्यादि । ( २ ) ' तजरैस्तु शुद्धविराजर्षभम् ' ' इति छन्द: कौस्तुभे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 302

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१५० छन्दः शास्त्रम् मगणः सगणः जगणः भगणः. गु ० 5 5 ऽ ॥ S S 751 क- न्ये - यं क - न - को - ज्ज्वला म - नो - ह- र - दीप्तिः ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०१११२ ) ( १३ ) ( १४ ) सगणः नगणः जगण रगणः गु ० ॥ S । 15 5 S श - शि - निर्म - ल - व - द - ना वि - शा - ल- ने- त्रा । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४५ ( ६ ) ( ७८ ९ ) ( १०१११२ ) ( १३ ) तगणः जगण: रगणः जिर्ड S पी - नो - रु - नि - त - म्ब - शा - लि - नी ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) नगण: नगणः नगणः जगणः यगणः 15 S S सु - ख - य - ति हृ - द - य - म - ति - श - यं त – रु - णा - नाम् ॥ ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०१११२ ) ( १३ X १४ ) ( १५ ) उपस्थितप्रचुपितादीनामस्मिन्प्रवेशयितुं न शक्यन्ते संज्ञा:, इति नोक्ताः ॥ शिवप्रसादिनी — उसी उपस्थित प्रचुपित छन्द में जब तृतीय पाद के स्थान में तगण ( ऽऽ । ) जगण ( 151 ) रगण ( SIS ) नौ ( ९ ) अक्षर व्यक्त हों, और शेष पाद त्रय में ‘ “ उपस्थितप्रचुपित ” छन्द के लक्षण लक्षित हों, तब उस छन्द की " शुद्धविराट्ऋषभ ’ सञ्ज्ञा होती. है ॥३० ॥

अर्द्धे । ५।३१ ॥

मृतसञ्जीवनी - पूर्वमुच्चावचानि छन्दांस्युक्तानि । इदानीं नियमेनोच्यन्ते । ‘ अर्द्धे ' इत्यधिकारोऽयमाध्यायपरिसमाप्तेः । यदित ऊर्ध्वमनुक्रमिष्यामः, अर्द्ध एव तद्वेदितव्यम् ॥ शिवप्रसादिनी - यह अधिकार सूत्र है । इस पाँचवें अध्याय की समाप्ति पर्यन्त “ अर्द्धे ” यह सूत्र अधिकृत होगा, अर्थात् यहाँ से लेकर पाचवें अध्याय की समाप्ति पर्यन्त जितने छन्द विधायक सूत्र कहे जाएगें, उन सभी सूत्रों में " अर्द्ध " शब्द की अनुवृत्ति होगी, जिससे आने वाले लक्षण अर्द्धछन्द के ही होगें ॥३१ ॥

उपचित्रकं सौ स्लौग्, भौ भ्गौ ग् । ५ । ३२ ॥ ( १ ) ' विषमे यदि सौ सलगा दले भौ युजि भाद्गुरुकावुपचित्रम् ' इति प्रा ० पि ० सू ० २।३११ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 303

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पञ्चमोऽध्यायः १५१ मृतसञ्जीवनी- -यस्य प्रथमे पादे सकारास्त्रय: ( 115.115.115 ), लकार ( 1 ) गकारौ-( S ) च क्रमेण, द्वितीये भकारास्त्रयो ( 511.511.511 ) गकारौ ( 55 ) च भवतः, तत् ' उपचित्रकं ' नाम वृत्तम् । अर्द्धशब्दस्य समप्रविभागवचनत्वाद्वितीयमप्यर्द्ध तादृशमेव । तत्रोदाहरणम्-सगणः सगणः सगणः गु ० गु ०, 1 ॥ S ॥ 5 S S उ - प - चित्र - क - मत्र वि - राज- ते ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४५६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०११ ) भगणः भगणः भगणः गु ० गु ० 511 र्ड 1 5 । S चू - त - व - नं कुसुमैर्वि - क - स- द्भिः । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४५ ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०११ ) सगणः सगणः सगणः गु ० गु ० 1 S प - र - पु- ष्ट - वि - घु - ष्ट- म- नो - ह- रं ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०११ ) भगणः भगणः भगणः गु ० गु ० S S म - न्म - थ - के - लि - नि - के - त- न- मे तत् ॥ ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०११ ) शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रथम पाद में तीन सगण ( 115-115-115 ) एक लघु अक्षर ( 1 ) एक गुरु अक्षर क्रम से मिलकर कुल ( ११ ) अक्षर हों, द्वितीय पाद में लगातार तीन भगण ( 5 ॥- ऽ ॥- ऽ ॥ ) दो गुरु अक्षर ( 55 ) मिलकर ( ११ ) ग्यारह अक्षर हों, एवं तुल्य प्रविभागवाची अर्द्धशब्द के प्रयोग द्वारा प्रथमार्द्ध के समान ही द्वितीयाऽर्द्ध की भी अक्षर संख्या हो, अर्थात् तृतीय पाद प्रथमपाद के लक्षण से युक्त हो, और चतुर्थ पाद द्वितीय पाद के लक्षण से युक्त हो, तो वह छन्द “ उपचित्रक " नाम वाला होता है || ३२ || ' द्रुतमध्या भौ भूगौ ग्, न्जौ ज्यौ । ५।३३ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य प्रथमे पादे त्रयो भकारा ( 511.511.511 ) गकारौ ( 5.5 ) च, द्वितीये नकार ( 111 ) जकारौ ( 151 ) जकार ( 151 ) यकारौ ( 155 ) च, तद् ' द्रुतमध्या ' नाम वृत्तम् । अत्रापि प्रथमद्वितीयाविव तृतीयचतुर्थौ पादौ । तत्रोदाहरणम्-( १ ) ‘ भत्रयमोजगतं गुरुकौ चेत् युजि च नजौ ज्ययुतौ द्रुतमध्या ' इति छन्दः कौस्तुभे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA- -

पृष्ठ 304

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१५२ छन्दः शास्त्रम् भगणः भगणः भगणः ॥ S ॥ यद्यपि शीघ्र- -घ्र - ग - ति - मृ - दु -( १२ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) नगण: जगणः जगण 1 1 ॥ ऽ 1 I S 1 ब - हु - ध - न - वा - न - पि दुःख -( १ ) ( २ ) ( ३४ ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( भगणः भगणः भगणः S ॥ S ना - ति - श - य - त्व - रि - ता न च ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ नगणः जगणः जगणः S 5 गु ० गु ० गा - मी ( १०११ ) यगणः 1 S S मु- पै - ति । १०१११२ ) गु ० गु ० S S मृ- द्वी ) ( १०११ ) यगणः S S नृ - प - ति - ग - तिः कथिता द्रु - त - म - ध्या ॥ ( १२३ ) ( ४५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ १०१११२ ) शिवप्रसादिनी - जिसके प्रथम पाद में तीन भकार ( SII - SII - SII ) दो गुरु ( SS ) को मिलाकर ग्यारह ( ११ ) अक्षर हों, द्वितीय पाद में नगण ( III ) दो जगण ( 151-151 ) यगण ( 155 ) इन सबको मिलाकर बारह अक्षर हों, तथा तृतीय पाद प्रथम पाद के लक्षण युक्त हो और चतुर्थ पाद पुनः द्वितीय पाद के लक्षण से लक्षित हो, तो ऐसे वृत्त को " द्रुतमध्या " वृत्त के नाम से कहा जाता है ॥३३ ॥

' वेगवती सौ सगौ, भौ भ्गौ ग् । ५ । ३४ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य प्रथमे पादे त्रयः सकारा ( 115. 115.॥ 5 ) गकार ( 5 ) श्चैकः, द्वितीये भकारास्त्रयो ( 5 ॥. 511.511 ) गकारौ ( 55 ) च भवतः, तत् ' वेगवती ' नाम वृत्तम् । तत्रोदाहरणम्— सगणः सगणः सगणः 15 1 गु ० संत व मु - अन - रा - धि - प! से - नां ( १२३ ) ( ४५६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १० ) ( १ ) ' विषमे प्रथमाक्षरहीनं दोधकवृत्तमेव वेगवती स्यात् ' इति प्रा ० पि ० सू ० २।३१३ | CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 305

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पञ्चमोऽध्यायः १५३ भगणः भगण: भगणः गु ० गु ० 5115 1 वेग व तीं सह ते स - म- रे - षु । ( १२३ ) ( सगणः प्र - ल - यो-( १ ) ( २ ) ( ३ ) भगणः S ॥ कः स - क ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ४५ ) ( ६ ) ( ७ ( ८ ) ( ९ ) ( १० ( ११ ) सगणः सगणः गु ० ॥ 5 र्मि - मि - वा - भि - मु - खीं तां ( ४५ ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) भगणः भगणः गु ० गु ०

ऽ ॥। 5 5

- ल - क्षि - ति - भृन्त्रि - व- हे हे- षु? ॥

( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १०११ ) शिवप्रसादिनी - जिस छन्द के प्रथम पाद में तीन सगण ( 115-115-115 ) एक गुरु ( S ) कुर्ल दश अक्षर ( १० ) हों, द्वितीयपाद में तीन भगण ( SII - SII - SII ) और दो गुरु ( SS ) को मिलाकर ( ११ ) ग्यारह अक्षर हों, तथा तृतीयपाद प्रथम पाद के तुल्य एवं चतुर्थ पाद द्वितीयपाद के लक्षण से युक्त हो, तो वह छन्द या वृत्त " वेगवती ” सञ्ज्ञा को धारण करता है || ३४ || ' भद्रविराट् त्जौ गौं, म्सौ जगौ ग् । ५।३५ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य प्रथमे पादे तकार ( 551 ) जकारौ ( 151 ) रेफ ( 515 ) गकारौ ( 5 ) च, द्वितीये मकार ( ऽऽऽ ) सकार ( 115 ) जकारा ( 151 ) गकारौ ( 55 ) च, तद् वृत्तं ' भद्रविराट् ' नाम । तत्रोदाहरणम्-तगणः जगण: रगणः गु ० S IIS । S । 5 य - त्पा - द - त - ले च - का - स्ति च क्रं ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) मगणः सगणः जगण: गु ० गु ० 5 S 1 S S हस्ते वा कु - लि - शंस - रो - रु- हं वा । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १०११ ) ( १ ) ' ओजे तपरौ जरौ गुरुश्चेत् म्सौ ज्गौ ग् भद्रविराड् भवेदनोजे ' इति छन्द: कौस्तुभे CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 306

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१५४ छन्दः शास्त्रम् तगणः जगण: रगणः गु ० S 1 1 5 1 5 1 3 I राजा ज - ग - दे - क - च - क्र - व - र्ती ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) मगणः सगणः जगणः गु ० गु ० SS1 ( 5 ) } $ स्या - च्छं भ - द्र - वि - राट् स - म- श्नुते ऽसौ ॥ ( १ ) ( २ ) ( ३४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ९ ) ( १०११ ) अस्यौपच्छन्दसिकान्तः पातित्वेऽपि विशेषसंज्ञार्थमर्द्धसमाधिकारे पाठः ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रथम पाद में तगण ( 551 ) जगण ( 151 ) रगण ( SIS ) और एक गुरु मिलकर ( १० ) दश अक्षर हों, द्वितीय पाद में मगण ( SSS ) सगण ( IIS ) जगण ( 151 ) तथा दो गुरु अक्षर विद्यमान हो । इसके अतिरिक्त तृतीयपाद प्रथम पाद के लक्षण से लक्षित हो और चतुर्थ पाद द्वितीयपाद के लक्षण वाला हो, वह वृत्त " ' भद्रविराट " कहलाता है ॥३५ ॥

केतुमती सूजौ स्गौ, भरौ न्गौ ग् । ५ । ३६ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य प्रथमे पादे सकार ( 115 ) जकारौ ( 151 ) सकार ( 115 ) गकारौ ( S ) च, द्वितीये भकार ( SII ) रेभ ( SIS ) नकारा ( III ) गकारौ ( SS ) च, तत् ' केतुमती ' नाम वृत्तं भवति । तत्रोदाहरणम्— सगणः जगणः सगणः गु ० S ह - त - भू - रि - भूमि - प - ति - चि - ह्नां ( १२३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) भगणः रगणः नगण: गु ० गु ० 511513117 S S यु - द्ध - स - ह - स्र - ल - ब्ध - ज - य - लक्ष्मीम् । ( १२३४५६ ) ( ७८ ९ १०११ ) ( १ ) अत्र केषाञ्चिद्भद्भविराडादीनामौपच्छन्दसिकादिभ्योवैतालीयभेदेभ्योऽभेदेऽपि गणनियमानियमरूपोपाधिभेदाद्भेदो बोध्यः । अत एव केदारोऽपि औपच्छन्दसिकं विराड्वृत्तमप्याह स्म - ‘ वदन्त्यपरवक्त्राख्यं वैतालीयं विपश्चितः । पुष्पिताग्राभिधं केचिदौपच्छन्दसिकं तथा ॥ ' ( वृ ० २० ४।१२ ) इति माधुर्यरञ्जनी । ( २ ) ‘ विषमे सजौ सगुरुयुक्तौ केतुमती समे भरनगाद्गः ' इति छन्द: कौस्तुभे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA "

पृष्ठ 307

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पञ्चमोऽध्यायः १५५ सगणः जगण: सगणः गु ० 13 15 1 5 S सह ते न कोऽपि व - सु - धा - यां ( १ ) ( २३४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) भगण: रगणः नगण: गु ० गु ० 1 ऽ । 15 S के -तु - म - तीं न - रे - द्र! त - व से - नाम् ॥ ( १२ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ( ६ ) ( ७ ( ८ ) ( ९ ) ( १० ( ११ ) शिवप्रसादिनी - जिस छन्द अथवा वृत्त के प्रथम पाद जगण ( 151 ) सगण ( 115 ) एक गुरु अक्षर हो, द्वितीयपाद में क्रमशः सगण ( 115 ) में भगण ( 511 ) रगण ( SIS ) नगण ( III ) एवं दो गुरु ( S - S ) अक्षर हों । तथा तृतीयपाद प्रथमपाद के लक्षण वाला और चतुर्थपाद द्वितीय पाद के लक्षण से समन्वित हों, तो वह " केतुमती " वृत्त होता है ॥३६ ॥

' आख्यानकी तौ ज्गौ ग्, ज्तौ ज्गौ ग् । ५। ३७ ॥ यस्य प्रथमे पादे तकारौ ( 551.551 ) जकारो ( 151 ) गकारौ ( 55 ) च, द्वितीये जकार ( I ऽ । ) तकारौ ( ऽऽ । ) जकार ( 151 ) गकारौ ( 55 ) च, तत् ' आख्यानकी ' नाम वृत्तम् । तत्रोदाहरणम्— तगणः भृङ्गा - व -( १ ) ( २ ) ( ३ ) जगणः S 1 - न - स्य ( १ ) ( २ ) ( ३ ) तगणः जगणः गु ० गु ० S ऽ । 5 S S ली म ङ्ग - ल - गी - त - ना- दै ( ४ ) ( ५६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०११ ) तगणः जगणः गु ० गु ० S S ॥ ऽ । ऽ 5 चि - ते मु - द - मा - द - धा - ति । ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १०११ ) ( १ ) ' अख्यानिकी ' इति कलिकातामुद्रितपुस्तके पाठः । एवं वृत्तावपि तत्र । ' आख्यातकी’ति रत्नाकरे । ‘ आख्यानकी तौ जगुरू गमोजे जतावनोजे जगुरू गुरुश्चेत् ' इति छन्दःकौस्तुभे । उपजातिचतुर्दशभेदान्तर्गतप्राकृतपिङ्गलोक्त भद्राख्यदशमभेदरूपत्वात् ' भद्रा ' इत्यपरं नाम । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 308

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१५६ छन्दः शास्त्रम् तगणः तगणः जगण: गु ० गु ० A. S S 1 ऽ ऽ । 15 I S आ - ख्या - न - की - व स्म - र - ज - न्म - वार- र्ता ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १०११ ) जगणः तगणः जगण: गु ० गु ० S । s S । S S म - हो- - त्स - व - स्या म्र - व - णे क्व - ण - न्ती । ( १२ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) आख्यानकी वार्ताहारिकोच्यते ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रथम पाद में दो तकार ( SSI - SSI ) एक जकार ( ISI ) दो गुरु ( S - S ) अक्षर हो, तथा द्वितीय पाद में पुन: एक कार ( 151 ) एक तकार ( ऽऽ 1 ) एक जकार ( 151 ) और दो गुरु ( S - S ) वर्ण हों । साथ ही तृतीय पाद प्रथम पाद के और चतुर्थ पाद द्वितीय पाद के लक्षण से लक्षित हो, तो वह " आख्यानकी ” वृत्त होता है ॥३७ ॥

विपरीताख्यानकी ज्तौ ज्गौ ग्, तौ ज्गौ ग् । ५।३८ ॥ यस्य प्रथमे पादे जकार ( 151 ) तकारो ( 551 ) जकारो ( 151 ) गकारौ ( 55 ) च, द्वितीये तकारौ ( ऽऽ।.ऽऽ । ) जकारो ( 151 ) गकारौ ( 55 ) च वृत्तम् । तत्रोदाहरणम्— जगणः तगणः जगणः गु ० गु ० 1515 5 ऽ । अ - लं त - वा - ली - क - व - चो- भिं - रे- भिः ( १ ) ( २ ) ( ३४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) तगणः तगणः जगण: गु ० गु ० ऽ ऽ । 5 15 15 स्वार्थं प्रिये! सा - ध - य कार्य - म - न्यत् । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) , तद् ' विपरीताख्यानकी ' नाम ( १ ) ' यात्रामहोत्सवस्य श्रवणे क्वणन्ती ' इति लिखितोदाहरणपुस्तके ( २ ) ‘ विपरीताख्यानिकी इति क.मु.पु. ' जतौ जगौ गो विषमे समे तौ जगौ ग एषा विपरीतपूर्वा ' इति छन्द: कौस्तुभे । प्राकृतपिङ्गलोक्तोपजातिचतुर्दशभेदान्तर्गतहंसी-नामकपञ्चमभेदरूपत्वात्पञ्चमोऽयं भेद उपजाते:, अतो ' हंसी ' इति नामान्तरम् ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 309

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पञ्चमोऽध्यायः १५७ जगण: तगण: जगण: गु ० गु ० 5 S 1 5 1 S 5 क - थं क - थां - क - र्ण - न - कौ - तु - कं स्या-( १ ) ( २३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) तगणः तगणः जगण: गु ० गु ० S I S ऽ ॥ 5 । S 5 दा - ख्या - न - की चे - द्वि - प - री - त- वृ- त्तिः? ॥ ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७८ ९ ) ( १० ) ( १२ ) एतयोश्च वक्ष्यमाणोपजात्यन्तर्गतत्वेऽपि विशेषसंज्ञार्थमर्द्धसमाधिकारे पाठः । शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रथम पाद में क्रमशः जकार ( 151 ) तकार ( 551 ) जकार ( ISI ) और दो गुरु ( S - S ) अक्षर हो, द्वितीय पाद में दो तकार ( 551-551 ) जकार ( 151 ) तथा दो गुरु ( S - S ) हो, इसी प्रकार तृतीय पाद प्रथम पाद के समान एवं चतुर्थपाद द्वितीयपाद के समान लक्षण वाला हो, वह “ विपरीताऽऽख्यानकी " वृत्त होता है । उपर्युक्त आख्यान की और विपरीताऽऽख्यानकी नाम वाले दो छन्दों का आगे कहे जाने वाले “ उपजाति छन्द ” के अन्तर्गत परिगणन होने पर भी यहाँ पर विशेष सञ्ज्ञा के विधानाऽर्थ अर्द्धसम के अधिकार में सूत्रकार के द्वारा पढ़ा गया है, ऐसा जानना चाहिए ॥ ३८ ॥

' हरिणप्लुता सौ स्लौ ग्, न्भौ भौ । ५ । ३ ९ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य प्रथमे पादे सकारास्त्रयो ( 115. 115.115 ) लकार ( 1 ) गकारो ( 5 ) च, द्वितीये नकार ( III ) भकारौ ( 511 ) भकार ( 511 ) रेफौ ' हरिणप्लुता ' नाम । तत्रोदाहरणम्— सगणः सगणः सगणः ल ० गु ० S त - व - मु - ज्ञ्ज - न - रा - धि - प! वि - द्वि - षां ( १ ( २ ) ( ३४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ १०११ ) नगण: भगणः भगणः रगणः 51 1 5 भ - य - वि - व - र्जि - त - के - तु - ल - घी - य - साम् । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ९ ) ( १० ) ( १११२ ) ( १ ) ' अयुजि प्रथमेन विवर्जितो द्रुतविलम्बिततो हरिणप्लुता ' इति ( २ ) " भयविसर्जितहेतिलघीयसाम् ' इति लि. पुस्तके । छ ० शा०-२० ( 515 ) च, तद् वृत्तं प्रा ० पि ० सू ० २।३१५ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 310

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१५८ छन्दः शास्त्रम् सगणः सगणः सगणः ल ० गु ० P 1 । 5 I S S 1 5 र - ण - भू - मि - प - राङ्मुख - व- र्त्म - नां ( १२ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) नगणः भगणः भगणः रगणः IS 1 ऽ । S S भ - व - ति शीघ्र - ग - ति - ह - रि - ण- प्लु- ता । ( १२ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( १११२ ) शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रथम पाद में तीन सकार ( IIS ( 1 ) और एक दीर्घ वर्ण ( 5 ) हों । पुनः द्वितीय पाद में नकार ( III - IIS - 115 ) एक लघु ) भकार ( 511 ) और रेफ ( SIS ) रहते हों, और शेष तृतीयपाद प्रथमपाद का लक्षण वाला और चतुर्थपाद द्वितीयपादीय लक्षण से समन्वित हो, तो वह “ हरिणप्लुता ” वृत्त होता है ॥३ ९ ॥ ' अपरवक्रं नौ लौ ग्, न्जौ ज्रौ । ५।४० ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य प्रथमे पादे नकारौ ( IIIIII ) रेफ ( 515 ) ( S ) श्च, द्वितीये नकार ( 111 ) जकारौ ( 151 ) जकार ( 151 ) रेफौ ‘ अपवक्रं ’ नाम । तत्रोदाहरणम्— नगणः नगणः रगणः ल ० ग ० ऽ 15 S स- कृ - द - पि कृ - प - णे न च - क्षुषा ( १ ) ( २ ) ( ३ नगण: 1 न र व ( १२ ) ( ३ ) नगणः ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) जगणः जरगणः रगणः S S I S र! पश्यति य - स्त - वा- न - नम् । ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १०१११२ ) नगणः रगणः ल ० गु ० 513 1 • न - पु - न - र - प - र- व - क्र - मी - क्ष-( १२ ) ( ३ ) ( ४ ) ( ५ ) ( ६ ) ( ७ ) ( ८ ) ( ९ ) ( १० ) ( ११ ) लंकार ( 1 ) गकारा ( 515 ) च, तद्वृत्तम् ( १ ) ' अयुजि ननरला गुरुः समे यदपरवक्रमिदं नजौ जगौ ' इति प्रा ० पि ० सू ० २।३।१८ अस्यैव ' पल्लविताय ' मिति नामान्तरं वृ ० म ० को ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA