छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 391–400

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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सप्तमोऽध्यायः २३ ९ मगण: रगण: भगणः नगणः यगणः भगणः ल ० गु ० 5 53 515 5 S SIII 5 या पीनो- गाढतु -ङ्ग ( ७ ) स्तन - जघन - घना ( ७ ) भो - गालस - ग - ति ( ६ ) -मगणः रगण: भगण: नगण: यगणः भगणः ल ० गु ० 5 S SIS डोडे S S र्यस्या: क - र्णावतं - सो ( ७ ) त्पल - रुचिज - यिनी ( ७ ) दी - घें च न - य - ने ( ६ ) । मगणः रगण: भगण: नगण: यगणः भगणः ल ० गु ० S 5 SSIS S SSIIIS श्यामा सी - मन्तिनी - नां ( ७ ) तिल - कमिव मुखे ( ७ ) या च त्रिभु - व - ने ( ६ ) मगण: रगणः भगणः नगण: यगण: भगणः ल ० गु ० 555 डोडे SIS S S 511 I S सम्प्राप्ता साम्प्रतं मे ( ७ ) नय - नपथ - मसौ ( ७ ) दै - वात्सुव - द - ना ( ६ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के हरेक पाद में क्रम से मगण ( 555 ) रगण ( SIS ) भगण ( SII ) नगण ( ॥। ) यगण ( ISS ) भगण ( 511 ) तथा लघु ( 1 ) गुरू ( 5 ) वर्त्तमान हो, वह वृत्त “ सुवदना ” नाम से कहा जाता है । जिसमें पुन: सात - सात अक्षरों पर एवं छह अक्षरों पर यति ( उच्चारण विराम ) का नियम होता है ॥ २३ ॥

ग्लिति वृत्तम् ॥७।२४ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे गकारलकारा: ( 5.1 ) क्रमेण भवन्ति, तद् ' वृत्तं ' नाम वृत्तम् । कृतिप्रकरणेन यावद्भिरेव विंशत्यक्षराणि पूर्यन्ते, तावतां ग्लां ग्रहणम् । तत्रोदाहरणम्— ( १२३४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १ ९ २० ) S । ऽ । ऽ ISISISISISISISI ज - न्तु - मा - त्र - दुः - ख - का - रि कर्म - नि - र्मि - तं भ - व - त्य - न - र्थ - हे - तु ( १२३४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १ ९ २० ) SISISISISISISISISISI ते न स र्व - मा - त्म - तु - ल्य - मी - क्ष - मा - ण उ - त्त मं सु - खं ल - भ - स्व । ( १२३४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १ ९ २० ) SISISISISISISISISISI वि - द्धि बुद्धि - पूर्व - कं म - मो - प - दे - श - वाक्य - मे - त - दा - द - रे - ण ( १ ) उक्तविंशत्यक्षरप्रस्तारस्यैकपञ्चाशदुत्तरनवनवतिसहस्राधिकषड्लक्षतमो ( ६ ९९ ०५१ ) भेदो ' वृत्तम् ' इति नाम्ना प्रसिद्ध: । ' वृत्तं रजौ रजौ पादे रजौ गो लः ' इति गारुडे १।२० ९ ।३५ अस्यैव ‘ मालवम् ' इति संज्ञा मं ० म ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 392

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२४० छन्दः शास्त्रम् ( १ ) ( २३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १ ९ २० ) SISISISISISISISISISI वृ - त - म - त - दु - त्त - मं म - हा - कु - ल - प्र - सू - त - ज - न्म - नां हि - ता - य । अत्र पादान्ते यतिः । शिवप्रसादिनी - जिस छन्द में गकार ( 5 ) एवं लकार ( 1 ) से विंश अक्षरों की पूर्ति होती हो, वह " वृत्त " नाम का वृत्त ( छन्द ) हुआ करता है । अलङ्कार के प्रकरण में जितने अक्षरों से बीस संख्या की पूर्ति होती हो, उतने गुरू लघु सञ्ज्ञक वर्णों का ग्रहण होता है || २४ || ( प्रकृतौर ) स्रग्धरा म्रौ भ्नौ यौ य् त्रिः सप्तकाः ॥७।२५ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे मगणरगणभगणनगणास्त्रयश्च यगणा: ( ऽऽऽ.ऽ।ऽ. ऽ ॥.॥।.। ऽऽ.।ऽऽ.।ऽऽ ) तत् ‘ स्रग्धरा ' नाम वृत्तम् । सप्तसु सप्तसु च यतिः । तत्रोदाहरणम्— मगण: रगणः भगणः नगण: यगणः यगणः यगणः 5535135111is sissis 153155 रेखा - भ्रूः शुभ्रदन्त ( ७ ) द्युति - हसित - शर ( ७ ) च्च - न्द्रिकाचा - रुमूर्ति ( ७ ) -( १ ) प्रकृतिच्छन्दः पादघटकीभूतानामेकविंशत्यक्षराणां प्रस्तारे कृते लक्षविंशतिः, सप्तनवतिसहस्राणि, एकशतद्विपञ्चाशच्च ( २० ९ ७१५२ ) भेदा जायन्ते । तेषु येऽत्र नोक्तास्ते ग्रन्थान्तरेभ्यः समुद्धृत्य लिख्यन्ते + नरेन्द्रच्छन्दः ( २१।४५०५१ ९ ) – ' आइहिँ जत्थ पाअगण पअलिअ जोहल अंत ठवीजे काहल सद्द गंध ऍम मुनिगण कंकणं जाह करीजे । सद्दइ एक्क तत्थ चल णरवइ पूरहु संख सुभव्वा चामरजुग्ग अंत जहि पअलिअ एहु णरेंदउ कव्वा ॥ ' प्रा ० पि ० सू ० २।२६३ ॥ सरसीच्छन्दः ( २१। ७११६०० ) -' नजभजजा जरौ यदि तदा गदिता सरसी कवीश्वरैः ॥ ' सरसीवृत्तमेव ' सलिलनिधि ' नाम्ना प्रसिद्धम् । अन्येषां मते ' सिद्धक ' मिति संज्ञितमेतत् । सुरनर्तकीच्छन्दः ( २१।७६५६१७ ) – ' सुरनर्तकी रनरना रनरा विरती रसर्तुशास्त्रगुणैः । ' मं ० म ० ( २ ) उक्तैकविंशत्यक्षरप्रस्तारस्य द्विसहस्रनवशतत्रिनवत्युत्तरत्रिलक्षतमो ( ३०२ ९९ ३ ) भेदः ' स्रग्धरा ' इति नाम्ना प्रसिद्धः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 393

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सप्तमोऽध्यायः २४१ मगणः रगणः भगण: नगण: यगणः यगणः यगणः 555 513 5 S 3155 मद्यन्मा - तङ्गली - ला ( ७ ) गति - रतिवि - पुला ( ७ ) भो - गतुङ्ग - स्तनी या ( ७ ) । मगणः रगण: भगणः नगणः यगणः यगण: यगणः 553 513 5 15 रम्भास्त - म्भोपमो - रू ( ७ ) रलि - मलिन - घन ( ७ ) स्निग्धधम्मिल्लहस्ता ( ४ ) मगणः रगणः भगणः नगण: यगण: यगणः यगण: 5555 S बिम्बोष्ठी रक्तक ' - ण्ठी ( ७ ) दिश - तु रति - सुखं ( ७ ) स्रग्धरा सु - न्दरीयम् ( ७ ) । शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रतिपाद में मगण ( 555 ) रगण ( SIS ) भगण ( ऽ ॥ ) नगण ( ॥। ) एवं तीन यगण ( ISS - ISS - ISS ) मिलते हों, तो वह वृत्त " स्रग्धरा ” कहलाता है । इस छन्द में सात - सात की तीन संख्याओं में, अर्थात् इक्कीस अक्षरों में पाद की समाप्ति होती है, और प्रत्येक सात अक्षरों के उपरान्त यति का नियम हैं । अतः स्रुग्धरा छन्द के इक्कीस अक्षरों वाले पाद में सात - सात अक्षरों पर तीन यति उपस्थित होगा । पाद चार और अक्षर संख्या ८४ होती है प्रत्येक पाद में तीन यति के क्रम से चारों पादों में कुल बारह यति होगें ॥२५ ॥

( आकृतौर ) मद्रकं भ्रौ न्रौ न्रौ न्गौ दिगादित्याः ॥७।२६ ॥ ( १ ) ' चारुकण्ठी ' लि ० पुस्तके । ( २ ) आकृतिच्छन्दः पादघटकीभूतानां द्वाविंशत्यक्षराणां प्रस्तारे कृते ( ४१ ९ ४३०४ ) भेदा जायन्ते । तेष्वत्र ये नोक्ताः, परत्र चोक्तास्ते तत आकृष्य लिख्यन्ते-हंसीच्छन्दः ( २२।१०४८३२१ ) -णेत्ताणंदा उग्गे चंदा धवलचमरसमसिअकरविंदा उग्गे तारा तेआ हारा विअसु कमलवण परिमलकंदा । भासा कासा सव्वा आसा महुरपवण लहलहिअ करता हंसा सहू फुल्लावंधू सरअ समअ सहि हिअअ हरंता ( प्रा ० मत्तेभच्छन्दः ( २२ । १ ९ १५७६५ ) -॥ ' पि ० सू ० २।२६८ ) ' मत्तेभाख्यं तभजजसरनगयुक्तं स्वरार्वफणिभिन्नम् । ' मं ० म ० । मदिराच्छन्दः ( २२।१७१७५५ ९ ) -‘ सप्तभकारयुतैकगुरुर्गदितेयमुदारतरा मदिरा । ' CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 394

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२४२ छन्दः शास्त्रम् मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे भगणरगणौ, ( 511.515 ) नगणरगण, ( 111.515 ) पुनर्नगणरगणौ ( III.SIS ) नगणो गकारश्च ( 111.5 ) भवतस्तद्वृत्तं ' मद्रकम् ' ' नाम । दशभिर्द्वादशभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्— भगणः रगणः नगणः रगणः नगण: रगण नगण: गु ० SIISIS 175 ॥। ऽ 15 S मद्रक - गीतिभिः सकृद - पि ( १० ) स्तुवन्ति भव! ये भव - न्तमभ - वं ( १२ ) भगणः रगण: नगणः रगणः नगण: रगण नगण: गु ० 51 जोडोडतो S 15 गोडोडे 513 117 भक्तिभ - रावन - प्रशिर - सः ( १० ) प्रणम्य तव पादयोः सुकृति - नः ( १२ ) । भगणः रगणः नगणः रगणः नगण: रगण नगण: गु ० SIISIS ॥। ऽ।ऽ डोडे ॥ तो ते पर - मेश्वर - स्य पद - वी ( १० ) मवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपु - लं भगणः रगणः नगण: रगणः नगण: रगण नगण: गु ० 515 is in sis in S मर्त्यभु - वं स्पृश - न्ति न पु - न ( १० ) र्मनो - हरसु - राङ्गना - परिवृ - ताः ( १२ ) ॥ शिवप्रसादिनी — जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में भगण ( SII ) रगण ( 515 ) नगण ( ॥। ) रगण ( 515 ) नगण ( ॥। ) एवं रग़ण ( 515 ) और अन्त में पुनः नगण ( ॥। ) तथा एक गुरु ( S ) वर्ण हो, वह वृत्त " मद्रक " कहा जाता है । चार पादों वाले इस छन्द के प्रत्येक पाद में ( २२ ) बाईस - बाईस अक्षर होते हैं, तथा ( १० ) दश अक्षरों के अनन्तर और बारह अक्षरों के उपरान्त इसमें यति का होने का नियम है ॥२६ ॥

( विकृतौर ) ( १ ) उक्तद्वाविंशत्यक्षरप्रस्तारस्य ( १ ९ ३०७११ ) तमो भेदो ' मद्रकम् ' इति नाम्ना प्रसिद्धः । अस्यैव ' प्रभद्रकम् ' इति नामान्तरं रत्नाकरे । ( २ ) अस्य छन्दसः त्र्यशीतिलक्षाणि, अष्टाशीतिसहस्राणि, अष्टोत्तराणि षट्शतानि ( ८३० ८६०८ ) च भेदा भवन्ति । तेषु भेदद्वयमेवात्र निर्दिष्टम् | परत्र च येऽधिका भेदास्ते यथा-सुन्दरीच्छन्दः ( २३।३५ ९ ००४४ ) – “ जहिँ आइहि हत्थो करअल तत्थो पाअ लहूजुअ वंक तिआ ठवि सल्ल पहिल्लौ चमरहिहिल्लौ सल्लजुअं पुणु वंकठिआ । पअअंतहि हत्थागण पभणिज्जे तेइस वण्ण पमाण किआ ऍहु मत्तहि पाआ पइ पभणिज्जे वण्णहि सुंदरिआ भणिआ ॥ ' ( प्रा ० पि ० सू ० २।२७१ ) CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 395

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सप्तमोऽध्यायः २४३ अश्वललितं न्जौ भुजौ भुजौ भूलौ मुद्राऽऽदित्याः ॥७।२७ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे नगणजगणौ ( III.151 ) भगणजगणौ ( SII.ISI ) पुन-र्भगणजगणौ ( 511.151 ) भगणो ( 511 ) लकारगकारौ ( 1.5 ) च भवतः, तद्वृत्तम् ' अश्वल-लितम् ' नाम । एकादशभिर्द्वादशभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्— नगण: जगण: भगण: जगणः भगण: जगण भगण: ल ० गु ० । ऽ । ऽ ॥ 15 । SIII SI SIII S पवन - विधूत - वीचि च - पलं ( ११ ) वि - लोकय - ति जीवि - तं तनु - भृ - तां ( १२ ) नगण: जगण: भगणः जगण: भगण: जगण भगणः ल ० गु ० S 15111515111 S वपुर - पि हीय - मान म - निशं ( ११ ) ज- रावनि - तया व - शीकृत - मि - दम् ( १२ ) । नगण: जगण: भगणः जगण: भगण: जगण भगणः ल ० गु ० III 115151115 ॥। 5 । सपदि निपीड - न व्यति - करं ( ११ ) य - मादिव नराधिपान्नर - प - शुः ( १२ ) नगण: जगण: जगण: जगण: भगण: जगण भगण: ल ० गु ० | | | | ॥ ।ऽ ऽ ॥ ।ऽ । ऽ ॥ । S परव - निताम - वेक्ष्य कु - रुते ( ११ ) तथापि हतबुद्धि - रश्वल - लि - तम् ( १२ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में नगण ( 111 ) जगण ( ISI ) भगण ( 511 ) जगण ( ISI ) पुनः भगण ( 511 ) जगण ( 151 ) भगण ( 511 ) एवं लकार ( 1 ) तथा गकार ( S ) उपस्थित हों, तो वह वृत्त " अश्वललित " नाम से कहा जाता है । यहाँ ग्यारह ( ११ ) एवं बारह ( १२ ) अक्षरों पर यति होता है ॥ २७ ॥

मत्ताक्रीडा मौ त्नौ नौ न्लौ ग् वसुपञ्चदशकौ ॥७।२८ ॥ मृतसञ्जीवनी- -यस्य पादे मगणौ, ( ऽऽऽ.ऽऽऽ ) तगणो, ( 551 ) नगणाश्चत्वारो ( ॥।.॥।.॥।.॥। ) लकारगकारौ ( 1.5 ) च तद्वृत्तं ' मत्ताक्रीडा ' नाम । अष्टभिः पञ्चदशभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्-सुधालहरीच्छन्दः ( २३।३५ ९ ४२४० ) -' नगणेन तर्कजलगै रुद्रर्तुरसैर्यतिः सुधालहरी । ' मं ० म ० अद्रितनयाच्छन्दः ( २३।३८६१४२४ ) – ' नजभजभा जभौ लघुगुरू बुधैस्तु गदितेयमद्रितनया । ' ( १ ) उक्तत्रयोविंशत्यक्षरप्रस्तारस्य ( २८१२८४८ ) तमो भेदः ' अश्वललितम् ' इति नाम्ना प्रसिद्धः । ( २ ) उक्तत्रयोविंशत्यक्षरप्रस्तारस्य ( ४२ ९ ४०४ ९ ) तमो भेदः ' मत्ताक्रीडा ' नाम्ना ख्यातः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 396

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२४४ छन्दः शास्त्रम् मगणः मगणः तगणः नगण: नगण: नगण नगणः ल ० गु ० 55 हृद्यं म - द्यं पीत्वा नारी ( ८ ) स्ख - लितग - तिरति - शय . मगणः मगणः तगणः नगण: नगण: नगण 553 555 55 मत्ताक्री - डा लोलै - रङ्गै ( ८ ) र्मु - दमखि - लविट - जनम -मगण: मगणः तगणः नगण: नगण: नगण 5 5 5 5 5 3 5 5 S - सिंकह - द - या ( १५ ) नगण: ल ० गु ० । ऽ नसि कु ेरु - ते ( १५ ) । नगण: ल ० गु ० S वीतव्री - डाश्लीला - लापै: ( ८ ) श्रवणसुखसुभ - ग सुल - लितव - च - ना ( १५ ) मगणः मगणः तगणः नगणः नगण: नगण नगण: ल ० गु ० 55555555 mis नृत्यैर्गी - तैर्भूवि - क्षेपैः ( ८ ) क- लमणि -त विवि - धविह- गकुल - रु - तैः ( १५ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस छन्द वा वृत्त के प्रतिपाद में दो मंगण ( SSS SSS ) तगण ( ऽऽ 1 ) चार नगण ( ॥।- 111-111-111 ) लकार ( 1 ) और गकार ( S ) क्रमशः उपस्थित हो, वह वृत्त ‘ “ मत्ताक्रीडा ” कहलाता है । यहाँ पर आठ एवं पन्द्रह अक्षरों पर यति हुआ करता है ॥२८ ॥

( संकृतौ ' ) ( १ ) अत्रापि प्रस्तारे चतुर्विंशत्यक्षरस्यैका कोटिः सप्तषष्टिलक्षाणि सप्तसप्ततिसहस्राणि षोडशोत्तरं शतद्वयं च ( १६७७७२१६ ) भेदाः । तेषु ग्रन्थान्तरे केचिद्दृश्यन्ते । यथा-स्वैरिणीक्रीडनवृत्तम् ( २४।४७ ९ ३४ ९ १ ) -‘ स्वैरिणीक्रीडनं प्रोक्तमष्टभी रगणैर्युतम् ।'- मं ० म ० । दुर्मिलाच्छन्दः ( २४।७१ ९ ०२६६ ) — ' दुमिलाइ पआसहु वण्ण विसेसहु दीस फणिंदह चारुगणा भणु मत्त बतीसह जाणिअ सेसह अट्ठहि ठाम ठई सगणा । गण अण्ण ण किज्जइ कित्ति मुणिज्जइ लग्गइ दोस अणेअ जही कही तिण्णि विरामहि पाअह ता दह अट्ठ चउद्दह मत्त सही ॥ ' ( प्रा ० पि ० सू ० २।२७७ ) ' मिला ' इत्याख्यान्तरं चन्द्रिकायामस्याः, ' घोटक'मिति मणिकोशे । वेश्याप्रीतिवृत्तम् ( २४।८४५१८५७ ) -‘ वेश्याप्रीतिर्मभयमनभनसयुक्ता हि फणिगजैश्छिन्ना । ' -मं ० म ० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 397

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सप्तमोऽध्यायः २४५ तन्वी भूतौ सौ भौ न्याविन्द्रियस्वरमासाः ' ॥७।२९ ॥ मृतसञ्जीवनी - यस्य पादे भगणतगणौ, ( 511.551 ) नगणसगणौ, ( 111.115 ) भगणौ ( ऽ II. ऽ ॥ ) नगणयगणौ ( III.155 ) च, तद्वृत्तं ' तन्वी ' नाम । पञ्चसु, सप्तसु, द्वादशसु च यतिः । तत्रोदाहरणम्— भगणः तगण: नगणः सगणः भगणः भगण नगण: यगणः 511 55 ऽ ॥ चन्द्रमुखी सु ( ५ ) न्द- रघन - जघना ( ७ ) कुन्दस - मानशि - खरद - शनाया ( १२ ) भगण: तगणः नगणः सगणः भगणः भगण नगण: ऽ 175 ॥ ऽ ऽ निष्कल - वीणा ( ५ ) श्रु - तिसुख - वचना ( ७ ) त्रस्तकु - रङ्गत - रलन -भगणः तगणः नगणः सगणः भगणः भगण नगणः 51155 SII निर्मुख - पीनो ( ५ ) न्न - तकुच - कलशा ( ७ ) मत्तग - जेन्द्रल - लितग भगणः तगणः नगणः सगणः भगणः भगण नगणः ॥ ऽ ऽ 1 निर्भर - लीला ( ५ ) नि - धुवन - विधये ( ७ ) मुञ्जन - रेन्द्र! भवतु त -यगणः 15. यनान्ता ( १२ ) । यगणः - मना च ( १२ ) यगणः व तन्वी ( १२ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में क्रमश: भगण ( SII ) तगण ( SSI ) नगण ( ॥। ) सगण ( ॥5 ) दो भगण ( 511-511 ) और नगण ( 111 ) यगण ( 155 ) उपलब्ध हों, वह वृत्त “ तन्वी ” इस नाम से कहा जाता है । यहाँ पर क्रमिक रूप से पाँच - सात एवं बारह अक्षरों पर यति हुआ करता है ॥२ ९ ॥ किरीटच्छन्दः ( २४ । १४३८०४७१ ) — ठावहु आइहि सक्कगणा तह सल्ल विसज्जहु वे वि तहापर उर सद्दजुअं तह णेउरए परिबारह सक्कगणा कर । काहलजुग्गल अंत करिज्जसु एपरि चौविस वण्ण आस बत्तिस मत्त पअप्पअ लेखउ अट्ठ अआर किरीट विसेसहु । ' ( प्रा ० पि ० सू ० २।२७ ९ ) ( १ ) ' द्विरादित्या ' इति वैदिकपाठः । ' द्विरादित्या ' इत्यपहायेन्द्रियस्वरमासा इति प्रतीच्याः पठन्ति, अग्निपुराणे च तथोपबृंहणं दृश्यते । ( व्यङ्कटाचलसूरिः ) ( ४१५५३६७ ) तमो भेदः ' तन्वी ' इति नाम्ना प्रसिद्धः । ( २ ) उक्तचतुर्विंशत्यक्षरप्रस्तारस्य CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 398

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२४६ छन्दः शास्त्रम् ( अभिकृतौ ' ) क्रौञ्चपदा भूमौ स्भौ नौ नौ ग् भूतेन्द्रियवस्वृषयः ॥७।३० ॥ मृतसञ्जीवनी- -यस्य पादे भगणमगणौ, ( SII.SSS ) सगणभगणौ, ( ॥5.511 ) नगणाश्चत्वारो ( ॥।.॥।.॥।.॥। ) गकार ( 5 ) श्च तद्वृत्तं ' कौञ्चपदा ' नाम । पञ्चभिः, पञ्चभिः, अष्टभिः, सप्तभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्--भगणः मगणः सगणः भगण: ऽ ॥ ऽ ऽ s 115 5 या कपि - लाक्षी ( ५ ) पि - ङ्गलके - शी ( ५ ) कलि-नगण: नगण: नगण: नगण: गु ० रुचिर - नुदिन ( ८ ) मनुन - यकठि — ना ( ७ ) । भगणः मगणः सगणः भगणः 51155 5 दीर्घत - राभि: ( ५ ) स्थू - लशिरा - भिः ( ५ ) परि— नगण: नगण: नगण: नगण: गु ० S वृतव - पुरति ( ८ ) शयकु - टिलग - ति: ( ७ ) भगणः मगणः सगणः भगणः SIISS 5 आयत - जङ्घा ( ५ ) नि - नकपो - ला ( ५ ) लघु-नगण: नगण: नगण: नगण: गु ० S तरकु - चयुग ( ८ ) परिचि - तहृद — या ( ७ ) ॥ ( १ ) अत्रापि प्रस्तारगत्या पञ्चविंशत्यक्षरस्य कोटित्रयम्, पञ्चत्रिंशल्लक्षाणि, चतुःपञ्चा-शत्सहस्राणि द्वात्रिंशदुत्तराणि चतुःशतानि च ( ३३५५४४३२ ) भेदाः । तेषु ग्रन्थान्तरेऽधिकम् यथा— कलकण्ठच्छन्दः ( २५ । १५५०० ९ ६० ) – ' कलकण्ठाख्यं सजनजभनरनगाश्चाहिभोगिनिधिभिन्ना । ' मं ० म ० ( २ ) उक्तपञ्चविंशत्यक्षरप्रस्तारस्य ( १६८७४४४७ ) तमो भेद: ' क्रौञ्चपदा ' इति नाम्ना प्रसिद्धः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 399

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सप्तमोऽध्यायः २४७ भगणः मगणः सगणः भगणः S 1155 31155 I सा परि - हार्या ( ५ ) क्रौञ्चपदा स्त्री ( ५ ) ध्रुव-नगण: नगण: नगण: नगण: गु ० 5 मिह नि - रवधि ( ८ ) सुखम - भिलष - ता ( ७ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस छन्द के हरेक पाद में क्रमानुसार भगण ( 511 ) मगण ( ऽऽऽ ) सगण ( 115 ) भगण ( 511 ) चार नगण ( 111-111-111-111 ) और एक गकार ( 5 ) उपलब्ध होता है, वह वृत्त " क्रौञ्चपदा " नाम से कहा जाता है । इसमें क्रमश: पाँच - पाँच, आठ एवं सात अक्षरों पर यति उपस्थित होता है ॥ ३० ॥

( उत्कृतौर ) भुजङ्गविजृम्भितं मौ नौ नौ सौ लगौ वसुरुद्रऋषयः ॥७।३१ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे मगणौ ( ऽऽऽऽऽऽ ) तगणनगणौ ( SSI.III ) नगणौ ( ॥।.॥। ) रगणसगणौ ( 515.115 ) लकारगकारौ ( 1.5 ) च तद्वृत्तं ' भुजङ्गविजृम्भितम् ’ नाम । अष्टभिरेकादशभिः सप्तभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्— ( १ ) अत्रापि प्रस्तारगत्या रसलोचन ( २६ ) वर्णस्य कोटिषट्कम्, एकसप्ततिलक्षाणि वसुसहस्राणि, चतुःषष्ट्युत्तराण्यष्टौ शतानि च ( ६७१०८८६४ ) भेदाः । तत्र ग्रन्थान्तरेषूपलब्धो विशेषो यथा— रञ्जनवृत्तम् ( २६।१४६६३५५१ ) -भ्रज्नस्नन्भगगैरर्वार्वार्वेषुभिदि रञ्जनम् । ' -मं ० म ० चेटीगतिवृत्तम् कमलावृत्तम् ( ( २६ । १ ९ १७०८ ९ ० ) — ‘ चेटीगतिश्च गायत्री या लगौ छिदिनैर्मृगैः । ' २६।५०३२३३ ९ ४ ) -‘ यस्यां नकारयुगलं परतो भकार-स्तस्मान्नजौ च नगणत्रयतो गलौ स्तः । खण्डैर्नगैर्दशभिरत्र यतिर्विशाला सा पिङ्गलेन कथिता कमलातिरम्या ॥ ' -मं ० म ० ( वृत्तचन्द्रिका २।१३ ९ ) ( २ ) उक्तषड्विंशत्यक्षरप्रस्तारस्य ( १३८३४७४ ९ ) तमो भेदः ' भुजङ्गविजृम्भितम् ' इति नाम्ना प्रसिद्धः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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२४८ छन्दःशास्त्रम् मगणः मगणः तगणः नगण: 55 55 3 5 5 1111 ये संन - द्धानेका - नीकै ( ८ ) र्न - रतुर -नगण: नगण: रगणः सगणः ल ० गु ० AA I S गकरि - परिवृ - तैः ( ११ ) समं - तव श - त्र - वो ( ७ ) मगण: मगणः तगणः नगण: SSS SSS SS युद्धश्र - द्धालुब्धा - त्मान ( ८ ) स्त्वं - दभिमु— नगण: नगणः रगणः सगणः ल ० गु ० A S ISIIS IS खमप - गतभि - यः ( ११ ) पत - न्ति धृता - यु - धा: ( ७ ) । मगणः मगणः तगणः नगण: 5 5 35 3355 s ते त्वां दृष्ट्वा संग्रा - माग्रे ( ८ ) नृर - पतिव— नगणः नगणः रगणः सगणः ल ० गु ० 15 13 1 13 1 s र! कृप - णमन - स ( ११ ) श्चल - न्ति दिगन्त - रं ( ७ ) मगणः मगणः तगणः नगणः S 5355355 किंवा सो - ढुं शक्यं भेकै ( ८ ) र्ब - हुभिर— नगणः नगणः रगणः सगणः ल ० गु ० 5 डि डि S पि सवि - षविष - मं ( ११ ) भुज - ङ्गविजृम्भि - तम्? ( ७ ) I अत्र कात्यायनेनाप्युक्तम्— मगणः मगणः तगणः नगणः ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽऽ ध्यानैका - ग्रालम्बा - दृष्टि: ( ८ ) क - मलमु — ( १ ) ' तुडिगनृप! कृपणमनसः पलन्ति दिगन्तरम् क ० मु ० पुस्तके, लिखितपुस्तके च CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA