छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 411–420
छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 411–420
पृष्ठ 411
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः २५ ९ सगणः जगणः सगणः जगण: गु ० कनक - प्रभा पृथुनितम्बशालि - नी सगणः जगणः सगणः जगण: गु ० S 51 5 विपुल - स्तनी ह - रिणशा - वकेक्ष - णा । सगणः जगणः सगणः जगण: ग् गु ० ० is is i iis is S इयम - ङ्गना न - यनयोः पथि स्थि - ता सगणः जगणः सगणः जगणः गु ० A
॥ ऽ । ऽ । 515
कुरुते न कस्य मदना - तुरं मनः? ॥
शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में क्रम से सगण( 115 ) जगण ( 151 ) पुनः सगण ( 115 ) जगण ( ISI ) और एक गुरू वर्ण उपस्थित हो, उस वृत्त को
" कनकप्रभा ' नाम वाली गाथा कहते हैं । यहाँ पर पाद के अन्त में यति लगती है ॥७ ॥
कुटिलगतिनौ तौ ग् स्वरर्तवः ॥ ८।८ ॥
मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे नगणौ ( IIIIII ) तगणौ ( SSI.SSI ) गकारश्च ( S ) भवति तद्वृत्तं ' कुटिलगतिर्नाम गाथा ( १३।२३६८ ) । सप्तभिः षड्भिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्— ( 121 ) 110 नगणः नगण: तगणः तगणः गु ० S 1 5515 अधर - किसल - ये ( ७ ) कान्त - दन्तक्ष - ते ( ६ ) नगणः नगण: तगणः तगण: गु ० S 5515 हरिण - शिशुदृ - शां ( ७ ) नृत्य - ति भ्रूयु - गम् ( ६ ) नगणः नगणः तगणः तगण: गु ० ॥ 11155155 15 ध्रुवमि - दमुचि - तं ( ७ ) यद्वि - पत्तौ स - ता ( ६ ) नगणः नगणः तगण: तगण: गु ०
।
मतिकु - टिलग - ते: ( ७ ) स्यान्म - हानुत्स - व: ( ६ ) ॥
CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 412
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६० छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में दो नगण ( III - III ) दो तगण ( ऽऽ I- ऽऽ । ) और एक गकार ( S ) हो, वह वृत्त " कुटिलगति " नामा गाथा के रूप में जाना जाता है । स्वर + ऋतवः = स्वरर्तवः = सात एवं छह अक्षरों पर यति की उपस्थिति होती है ॥८ ॥
( शक्वर्याम् ) वरसुन्दरी भुजौ स्नौ गौ ॥ ८।९ ॥ मृतसञ्जीवनी - यस्य पादे भगणजगणसगणनगणा ( 511. 151. 115. 111 ) गकारौ ( ऽ.ऽ ) च भवतस्तद्वृत्तं ‘ वरसुन्दरी ' नाम गाथा ( १४ | ३८२३ ) । पादान्ते यतिः । तत्रोदाहरणम्— ( 121 ) भगणः जगणः सगणः नगण: गु ० गु ० I स्वादुशि - शिरोज्ज्व - लसुग - न्धिजल - पू - र्णं भगणः जगणः सगणः नगण: गु ० गु ० 511 II II S S वीचिच - यचञ्च - लविचि त्रशत - प - त्रम् । भगणः जगणः सगणः नगण: गु ० गु ० S 15 हंसक - लकूजित मनो - हरत - टा - न्तं भगणः जगणः सगणः नगण: गु ० गु ० 5 11 157 1 13 ( 1 5 S पश्य व - रसुन्द - रि! सरो - वरमु - दा - रम् ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रतिपाद में क्रम से भगण ( सगण ( IIS ) नगण ( III ) और दो दीर्घ अक्षर ( SS ) आते हों, वह वृत्त के नाम से कही जाती है, जहाँ पादान्त में यति होती है ॥९ ॥
SII ) जगण ( ISI ) " वरसुन्दरी ” गाथा कुटिला म्भौ न्यौ गौ वेदरससमुद्राः ॥ ८।१० ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे मगणभगणनगणयगणा ( S ऽऽ.ऽ ॥.॥।.। ऽऽ ) गकारौ ( ऽ.ऽ ) च भवतस्तद्वृत्तं ' कुटिला ' नाम गाथा ( १४।१०० ९ ) चतुर्भिः षड्भिश्चतुर्भिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्-मगणः भगणः नगण: यगणः TUOS गु ० गु ० S S अध्वस्था - नां ( ४ ) जन - यति सु - ख ( ६ ) मुच्चै: - कू - ज ( ४ ) -CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 413
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः २६१ मगण: भगणः नगण: यगणः गु ० गु ० I555 SSS S न्दात्यूहो - ऽयं ( ४ ) पथि निचुलि- नि ( ६ ) तोयो - पा - न्ते ( ४ ) । मगण: भगणः नगण: यगणः गु ० गु ० निक 5 3 5 ॥ 5555 कर्णाट - स्त्री ( ४ ) रति - कुहरि - त ( ६ ) तुल्य - च्छे - दै ( ४ ) -मगणः भगणः नगण: यगणः गु ० गु ० 5 5 A 3 5 53 5 5 र्नादैः क - ण्ठ ( ४ ) स्खल - नकुटि - ल ( ६ ) मन्दा - व - र्तै: ( ४ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रतिपाद में क्रमश: मगण ( SSS ) भगण ( SII ) नगण ( ॥। ) यगण ( ISS ) और दो गुरू वर्ण ( SS ) आते हों, उस वृत्त को “ कुटिला ” गाथा कहते हैं, जहाँ पर क्रम से चार, छह, एवं चार अक्षरों पर यति उपस्थित होता है ॥१० ॥
( अष्टौ ) शैलशिखा भौ न्नौ भ्गौ भूतरसेन्द्रियाणि ॥ ८।११ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे भगणरगणौ ( 511.515 ) नगणभगणौ ( 1॥5 ॥ ) भगणो
( SI1 ) गकार ( S ) श्च भवति तद्वृत्तं ' शैलशिखा ' नाम गाथा ( १६।२८११ ९ ) ॥ पञ्चभिः षड्भिः पञ्चभिश्च यतिः । क्वचित् पादान्ते यतिं पठन्ति । तत्रोदाहरणम्-( दाट ) 1100 भगणः रगणः ऽ ॥ शैलशि - खानि ( ५ ) भगणः रगणः ऽ ॥ ऽ । जीर्णतृणं का ( ५ भगण: रगणः 51151 S क्षुद्रव - धाप ( ५ ) वा नगणः भगणः भगणः गु ० 5115 कु - ञ्जशयि - तस्य ( ६ ) ह - रे: श्रव णे ( ५ ) नगणः भगणः भगणः गु ० ) रेण निदधाति ( ६ ) क - पिश्चप - लः ( ५ ) । नगण: भगणः भगण: गु ० 511 S — दपरि — हार ( ६ ) विनीतम - ते ( ५ ) -भगणः रगणः नगणः भगणः भगणः गु ० ऽ ॥ स्तस्य न ताव ( ५ ) तै - व लघु - ता द्वि ( ६ ) प - यूथभि - द: ( ५ ) ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 414
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६२ छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में क्रमिक रूप से मगण ( SII ) रगण ( SIS ) नगण ( III ) भगण ( SII ) और अन्त्य गुरू अक्षर हो, वह वृत्त " शैलशिखा ” गाथा के नाम से कहा जाता है । यहाँ पर पाँच, छः एवं पाँच अक्षरों पर यति होता है ॥ ११ ॥
वरयुवती भ्रौ य्नौ न्गौ ॥८।१२ ॥ मृतसञ्जीवनी 1 – यस्य पादे भगणरगणौ ( SII.SIS ) यगणनगणौ ( 155. III ) नगणो ( III ) गकारश्च ( श्च ) भवति, तद्वृत्तं ' वरयुवती ' नाम गाथा ( १६ । ३२३४३ ) । पादान्ते यतिः । तत्रोदाहरणम्— भगणः 1. रगणः यगणः नगण: नगण: गु ० 15 S कुञ्जर - कुम्भपी - ठ - पीनो- -न्नतकु : - चयुग - ला भगणः रगणः यगण: नमणः नगण: गु ० I S पार्वण - शर्वरी - शगर्वा - पहमु - खकम - ला भगणः रगणः यगणः नगणः नगण: गु ० गिर पीननि - तम्बबि - म्बसंवा- हनशि - थिलग - ति-भगणः रगणः यगणः नगण: नगण: गु ० र्मुञ्ज न- राधिरा - ज! भूयात्तव व - रयुव - तिः ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रतिपाद में क्रमशः भगण ( 511 ) रगण ( SIS ) यगण ( I ऽऽ ) नगण ( III ) और अन्त में एक गकार ( S ) हो वह वृत्त " वरयुवति " गाथा
के नाम से कहा जाता है । पादान्त में यति का स्थान होता है ॥।१२ ॥
( अत्यष्टौ ) अतिशायिनी सौ ज्भौ ज्गौ ग् दिक्स्वराः ॥ ८।१३ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे सगणौ ( IIS.II5 ) जगणभगणौ ( 151.5 ॥ ) जगणो ( 151 ) गकारौ ( ऽ.ऽ ) च भवतस्तदद्वृतं ' अतिशायिनी ' नाम गाथा ( १७।२३ ९ ०० ) । दशभिः सप्तभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्— सगणः सगणः जगण: भगणः जगणः गु ० गुं ० S ' $ $ इति - धौ - तपुर - न्ध्रिमत्स - रा ( १० ) न्सर - सि मज्ज - ने - न ( ७ ) CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 415
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः २६३ सगणः सगणः जगणः भगणः जगण: गु ० गु ० 1515 A A श्रियमा- प्तवतो ऽतिशायिनी ( १० ) मप- मलाङ्ग - भा - सः ( ७ ) । सगणः सगणः जगणः भगणः जगण: गु ० गु ० is isi s is is s अवलो - क्य तदै - व याद - वा ( १० ) नप - रवारि - रा - शे: ( ७ ) सगणः सगणः जगणः भगणः जगण: गु ० गु ० SI 15 ॥ ऽि । ऽ ऽ शिशिरे - तररो - चिषाप्य - पां ( १० ) तति - षु मङ्क्तु - मी - षे ( ७ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रतिपाद में क्रमश: दो सगण ( 115-115 ) जगण-भगण ( ISI - SII ) पुनः जगण ( ISI ) और अन्त में दो गुरू वर्ण हो, उस वृत्त को " अतिशयिनी ” गाथा. कहते हैं । जहाँ पर दश अक्षरों एवं सात अक्षरों के अनन्तर यति का स्थान होता है ॥ १३ ॥
अवितथं नूजौ भ्जौ ज्लौ ग् ॥८।१४ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे नगणजगणौ ( 111.151 ) भगणजगणौ ( SII.151 ) जगण-लकारौ ( 151.1 ) गकारश्च ( S ) भवति तद्वृत्तम् ' अवितथम् ' नाम गाथा ( १७।६११४० ) भवति । यतिः पादान्ते । तत्रोदाहरणम्-नगण: जगणः भगण: जगण: जगण: ल ० गु ० 15 श्रुतिप— रिपूत — वक्रम - तिसुन्द — रवाग्वि - भ - वं नगण: जगण: भगण: जगण: जगणः ल ० गु ० 1 डि डी डी जि 15 तमखि — लजैमिनीयम — तसागरपार - ग - तम् । नगण: जगणः भगणः जगण: जगणः ल ० गु ० 1 11 151 31 151 IS 15 अवित — थवृत्त - विप्रज - नपूजि - तपाद - यु - गं नगण: जगणः भगण: जगणः जगण: ल ० गु ० पितर — महं न- -मामि ब- - हुरूप - मुदार - म - तिम् ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के हरेक पाद में क्रमिक रूप से नगण - जगण ( III-।ऽ । ) भगण - जगण ( SII - ISI ) पुनः जगण ( ISI ) तथा एक लघु अक्षर हो, उस वृत्त को CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 416
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६४ छन्दःशास्त्रम् " अवितथ " नामक गाथा कहते हैं ॥ १४ ॥
वस्विन्द्रियसमुद्राश्चेत्कोकिलकम् ॥८।१५ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे पूर्वोक्ता गणा भवन्ति, अष्टभिः पञ्चभिश्चतुर्भिश्च यतिर्भवति तद्वृत्तं ' कोकिलकम् ' इति गाथा ( १७।६११४० ) । तत्रोदाहरणम्— नगण: जगणः भगण: जगणः जगणः ल ० गु ० 151 S ॥ ऽ नवस — हकार — पुष्प ( ८ ) म - धुनिष्क - ल ( ५ ) कण्ठ - त - या ( ४ ) नगण: जगणः भगणः जगणः जगणः ल ० गु ० S मधुर -- तरख - रेण ( ८ ) प - रिकूज - ति ( ५ ) कोकि - ल - कः ( ४ ) । नगण: जगणः भगणः जगणः जगणः ल ० गु ० प्रथम — ककार — विद्ध ( ८ ) व - चनैर्ध - न ( ५ ) लुब्ध - म - ते ( ४ ) -नगण: जगणः भगणः जगणः जगणः ल ० गु ० S स्तव ग - मनस्य भङ्ग ( ८ ) मि - व संप्र - ति ( ५ ) कर्तु -म - ना: ( ४ ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में पूर्वोक्त चौदह ( १४ ) सूत्र के गण हों, एवं आठ अक्षरों, तेरह अक्षरों, तथा सत्रह अक्षरों पर यति उपस्थित होता हो, उसको " कोकिलक " गाथा कहते हैं ॥१५ ॥
( धृतौ ) विबुधप्रिया सौ जौ भ्रौ वसुदिशः ॥ ८।१६ ॥ यस्य पादे रगणसगणौ ( SIS.115 ) जगणौ ( 151.151 ) भगणरगणौ ( 511.515 ) च भवतस्तद्वृत्तं ' विबुधप्रिया ' नाम गाथा ( १८।९ ३०१ ९ ) भवति । अष्टभिर्दशभिश्च यति: । तत्रोदाहरणम्— रगणः सगणः जगण: जगणः भगणः रगणः 513 1151 511515 कुन्दकु— ड्मलको - मल ( ८ ) द्यु - ति दन्त- - पङ्क्तिवि - राजिता ( १० ) रगणः सगणः जगणः जगण: भगणः रगणः डोडे 15 डि डि डि डी डोडे हंसग - गदवा - दिनी ( ८ ) व - निता भ भ - - वे वेद्विबु – धप्रिया ( १० ) । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 417
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः २६५ रगणः सगणः जगण: जगण: भगण: रगणः डोडे 115 15 1 जि 511 515 पीनतु — ङ्गपयो — धर ( ८ ) द्व - यभार - मन्थर - गामिनी ( १० ) । रगणः सगणः जगण: जगण: भगणः रगणः 515 515 नेत्रका — न्तिविनि — र्जित ( ८ ) श्रवणाव - तंसित - कैरवा ( १० ) ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रतिपाद में रगण ( SIS ) सगण ( IIS ) दो जगण ( 151-151 ) भगण ( 511 ) एवं रगण ( 515 ) हों, वह वृत्त " विबुधप्रिया ” गाथा के नाम से कहा जाता है । इसमें आठ एवं दश अक्षरों पर यति की उपस्थिति होती है ॥ १६ ॥
नाराचकं नौ रौ रौ ॥ ८।१७ ॥ मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे नगणौ ( IIIIII ) रगणाश्चत्वारो ( SIS.SIS.SIS.515 ) भवन्ति तद्वृत्तं ' नाराचकं ' नाम गाथा ( १८ । ७४ ९ ४४ ) । दशभिरष्टभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम्— नगण: नगणः रगणः रगणः रगणः रगणः A 1351351 रघुप — तिरपि जातवे - दो ( १० ) विशुद्धां प्रगृह्य प्रियां ( ८ ) नगण: नगणः रगणः रगणः रगणः रगणः 13 5 13 513 प्रियसु — हृदि विभीषणे स ( १० ) क्रम - य्य श्रियं वैरिणः ( ८ ) । नगण: नगण: रगणः रगणः रगणः रगणः 17 1 513 5 4 13 5 15 515 रविसु — तसहि - तेन ते - ना ( १० ) नुयातः ससौमित्रिणा ( ८ ) नगण: नगणः रगणः रगणः रगणः रगणः 117 डोडेर्ड I 13 5 13 5 13 भुजवि - जितवि - मानर - त्ना ( १० ) धिरूढः प्रतस्थे पुरीम् ( ८ ) ॥ ( र ० वं ० १२ १०४ ) शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में क्रमशः दो नगण ( III - III ) और चार रगण ( 515 - ऽ।ऽ -5 IS - SIS ) होते हैं, उस वृत्त को " नाराचक " गाथा कहते हैं, जहाँ पर क्रमशः दश अक्षरों एवं आठ अक्षरों पर यति का विधान होता है ॥ १७ ॥
( अतिधृतौ ) विस्मिता य्मौ न्सौ रौ ग् रसर्तुस्वराः ॥ ८।१८ ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 418
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६६ छन्दःशास्त्रम् मृतसञ्जीवनी – यस्य पादे यगणमगणौ ( 155.555 ) नगणसगणौ ( 111.115 ) रग ( SIS.SIS ) गकारश्च ( S ) भवति तद्वृत्तं ' विस्मिता ' नाम गाथा ( १ ९ ।७५७१४ ) ॥ षड्भिः, षड्भिः, सप्तभिश्च यतिः । तत्रोदाहरणम् – यगणः मगणः नगणः सगणः रगणः रगण: गु ० । ऽ 55 55 S श्रिया जु - ष्टं दिव्यैः ( ६ ) सपट - हरवै ( ६ ) रन्वितं पुष्पवर्षे ( ७ ) -यगण: मगणः नगणः सगणः रगणः रगणः गु ० 155555 ॥ ऽ 513 515 5 र्वपुष्ट - श्चैद्यस्य ( ६ ) क्षणमृ - षिगणै: ( ६ ) स्तूयमा - नं निरी - य ( ७ ) । यगण: मगणः नगणः सगणः रगणः रगणः गु ० 155 55 5 1m 11s 513 513 $ प्रकाशे - नाकाशे ( ६ ) दिनक - रकरा ( ६ ) न्विक्षिप - द्विस्मिता - क्षै ( ७ ) -यगण: मगणः नगणः सगणः रगणः रगण: गु ० SI SSIS 513 S नरेन्द्रै - रौपेन्द्रं ( ६ ) वपुर - थ विश ( ६ ) द्धाम वी - क्षांबभू - वे ( ७ ) ॥ ( शि ० व ० २०।७१ ) शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में क्रमश: यगण - मगण ( 15 ऽ - ऽऽऽ ) नगण - सगण ( ॥।- ॥ 5 ) दो रगण ( SIS - SIS ) और एक गकार ( S ) हुआ करता है, वह वृत्त “ विस्मिता ” गाथा के नाम से कहा जाता है, जिसमें प्रतिपाद के छह - छह अक्षरों पर, तथा सात अक्षरों पर यति की उपस्थिति होती है ॥ १८ ॥
( कृतौ ) शशिवदना न्जौ भ्जौ ज् ज्रौ रुद्रदिशः ॥ ८ ।१ ९ ॥ मृतसञ्जीवनी - यस्य पादे नगणजगणौ ( 111.151 ) भगणो ( 511 ) जगणास्त्रयो ( ।5 ।.। 5 ।.। ऽ । ) रगणश्च ( SIS ) भवति, तद्वृत्तं ' शशिवदना ' नाम गाथा ( २१।५४११६०० ) एकादशभिर्दशभिश्च यतिः । ' पञ्चकावली'ति केचित् । तत्रोदाहरणम्— नगण: जगणः भगणः जगणः जगण: जगणः रगणः 513 तुरग - शताकु - लस्य प - रित: ( ११ ) प - रमेक - तुरङ्ग- जन्मन: ( १० ) नगण: जगणः भगणः जगण: जगण: जगणः रगणः 11 7 151 5 17 15 डिडिडीडे प्रमथितभूभृ - तः प्रति - पथं ( ११ ) म थितस्य भृशं महीभृता ( १० ) । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 419
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः २६७ नगण: जगण: भगणः जगण: जगण: जगण: रगणः 15 7 डी डि 5 1 ISIS परिच - लतो ब - लानुज - बल ( ११ ) स्य पुरः सततं धु - तश्रिय ( १० ) -नगण: जगणः भगणः जगणः जगण: जगणः रगणः IS श्चिरवि - गतश्रि- यो जल - निधे ( ११ ) श्च तदाभ - वदन्त - रं महत् ( १० ) ॥ ( शि ० व ० ३।८२ ) एवमादीनि वृत्तानि कोटिशः प्रस्तारेषु महाकविप्रयोगेषु च दृश्यन्ते । विशेषसंज्ञाभावात्तानि शास्त्रकारेण नामनिर्देशं कृत्वा नोक्तानि तानि गाथाशब्देन कथ्यन्ते । इदानीं प्रस्तारादीन् प्रत्ययानुपक्रमते । तत्र गायत्र्यादिप्रस्तारसिध्यर्थमेकाक्षरप्रस्तारपूर्वकं द्व्यक्षरप्रस्तारं सूत्रद्वयेनाह— शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में क्रमिक रूप से नगण ( ॥। ) जगण ( ISI ) भगण ( 511 ) तीन जगण ( ISI - 151-151 ) और एक रगण ( 515 ) होते हैं, और पाद में ग्यारह अक्षरों और दश अक्षरों पर यति लगती हो, तो उस वृत्त विशेष को " शशिवदना " गाथा कहते हैं ॥ ( इस प्रकार के करोड़ो वृत्त प्रस्तारों में, तथा महाकवियों के प्रयोगों में देखे जाते हैं । उन वृत्तविशेषों के शास्त्रप्रकार निर्दिष्ट विशेष सञ्ज्ञाओं के अभाव में, अर्थात् उन-उन विविध वृत्त विशेषों के शास्त्रकार द्वारा नाम विधान नहीं किये जा सके हैं, अतः उन अकथित वृत्तों को यहाँ पर सामान्य रूप से गाथा के नाम से व्यवहार किया जाता है ॥१९ ॥
अब आगे के ग्रन्थ से प्रस्तार आदि वृत्त भेदों को कहने के लिए सूत्र ग्रन्थ का आरम्भ होने जा रहा है । उन प्रस्ताराऽऽदि भेदों के अन्तर्गत सर्वप्रथम गायत्री, अनुष्टुप् आदि छन्दों के प्रस्तार सिद्धि के लिए एकाक्षर प्रस्तार पूर्वक द्वाक्षर ( द्वितीय अक्षरों की वृद्धि स्वरूप प्रस्तार ) को अग्रिम दो सूत्रों के माध्यम से व्यक्त किया जा रहा है-( भेद रचना को प्रस्तार कहा जाता है । ( १ ) प्रस्तार ( २ ) नष्ट ( ३ ) उद्दिष्ट ( ४ ) एक द्वाऽऽदिलगक्रिया ( ५ ) संख्यान ( ६ ) अध्वयोग, ये छः प्रकार के प्रस्ताराऽऽदिकों के प्रत्यय ( भेद ) “ वृत्तरत्नाकर ' आदि ग्रन्थों में केदार भट्ट आदि ग्रन्थकारों के द्वारा व्यक्त किये गये हैं । ( १ ) छन्दसां भेदादिप्रत्यायकत्वाप्रत्ययाः । ते च दर्शिताः केदारेण - ' प्रस्तारो नष्टमुद्दिष्ट-मेकद्व्यादिलगक्रिया । सङ्ख्यानमध्वयोगश्च षडेते प्रत्ययाः स्मृताः ॥ ' इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 420
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६८ छन्दः शास्त्रम् प्रस्तार का परिचय देने के लिए वृत्तरत्नाकर ग्रन्थ में इस प्रकार कहा गया है-.
पादे सर्व्व गुरावाद्याल्लघुं न्यस्य गुरोरधः ।
यथोपरि तथा शेषं भूयः भूयः कुर्यादमुं विधिम् ॥
" सर्वगुरौ पादे आद्यात् गुरोरधः लघुं न्यस्य उपरि यथा, तथा शेषं कुर्यात् । भूयोभूयः अमुंविधिं कुर्यात् ” । अर्थात् प्रस्तार वृत्तजाति के पाद में स्थित वर्ण संख्या से सम्बन्धित सर्वगुरू वाले पाद लिखे जाने पर वहाँ प्रथम गुरू नीचे लघु स्थापित करना चाहिए । प्रथमत्व भी यहाँ प्रथमगुरू के नीचे लघु स्थापित करना चाहिए । प्रथमत्व भी यहाँ पर गुरू की अपेक्षा ही ली जानी चाहिए, वर्ण की अपेक्षा से नहीं । पुनः दाहिनी ओर की रेखा का पंक्ति ऊपर की रेखा के समान भरना चाहिए, अर्थात् शेष स्थानों में ऊपर के अनुसार गुरू - लघु आदि भर दें । अर्थात् जहाँ ऊपर में गुरू है वहाँ पर नीचे में भी गुरू, और जहाँ ऊपर में लघु है वहाँ पर उसके नीचे में भी लघु लिखना चाहिए । पुनः इस पूर्वोक्त लेखन स्वरूप विधि को सम्पादित करना चाहिए तृतीयाऽऽदि पङ्क्ति में आदि गुरू के अनन्तर लघु होगा, और उसके बाद ऊपर के अनुसार गुरू होगा । पुनः प्रस्तार स्वरूप के पूर्ण बोध के लिए उपर्युक्त कारिका के अनन्तर एक
प्रकार कही गयी है-ऊने दद्यात् गुरूमेव यावत् सर्वलघुर्भवेत् ।
प्रस्तारोऽयं समाख्यात श्छन्दोविचितिवेदिभिः ॥
( वृर ० उपर्युक्त विधि को सम्पादित करते हुए रिक्त स्थान में, शेषस्थान में ही लिखें, यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी, जब प्राप्ति न हो जाय । छन्द शास्त्रियों ने इसी विधि को " प्रस्तार " उपर्युक्त रूप से प्रस्तार के विषय में जो विचार किया गया है और कारिका को इस अ ० ६ श्लोक ० ३ ) अर्थात् बाँयी ओर के तक कि सभी लघु की कहा है ॥ उसका सार इस प्रकार समझना चाहिए— सर्वगुरूअक्षर वाले पाद के भेद की आकांक्षा में द्वितीय पंक्ति के प्रथमस्थान में ही उपस्थित होने से गुरू मात्रा के निराशपूर्वक लघुमात्रा के प्रयोग द्वारा सर्वगुरूमात्रा वाले पाद अपने पूर्व स्वरूप से भिन्न हो जाता है । इसलिए द्वितीय पंक्ति के आदि में उसकी कल्पना की जाती है - ( 155 ) उसके बाद तृतीय पंक्ति के द्वितीय स्थान में गुरू मात्रा को निवृत्त करके वहाँ पर लघुमात्रा का प्रयोग होना चाहिए यह सर्वगुरूपाद का द्वितीय भेद कहा जाता है, जिसका स्वरूप पुनः ( SIS ) । इसी तृतीय पंक्ति के शेष भूत - चतुर्थ पंक्ति में विद्यमान तृतीय भेद है । इस कारण उसकी कल्पना इस प्रकरण में की गयी है— ( IIS ) । इसके अनन्तर पाँचवीं पंक्ति में तृतीय गुरू के स्थान में पूर्व के समान ही लघुमात्रिक का प्रयोग होने से चतुर्थ भेद की कल्पना सिद्ध होती CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA