छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत — पृष्ठ 421–430

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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अष्टमोऽध्यायः २६ ९ है जिसका स्वरूप इस प्रकार हुआ करता है ( 551 ) और उसी का दो गुरू आदि वाले तीन अन्य भेद लघु आदिवाला गुरू ( 1-5-1 ), गुरू आदि वाला दो लघु ( 5-1-1 ), दो लघु आदि वाला ( 1-1-1 ) इति इस प्रकार से सर्व गुरू वाले प्रथम ( S - S - S ) के सहित मध्यम के आठ भेदों के क्रमिकत्व में बीज कहा गया है । ) द्विकौ ग्लौ ॥८।२० ॥ मृतसञ्जीवनी - उपरिष्टाद् गकारं लिखित्वाधस्ताल्लकारं विन्यसेदित्येकाक्षरप्र-स्तारः । तस्य द्विकत्वाद् द्वौ ग्लौ द्विकौ स्थापयेत् । द्वे आवृत्ती प्रमाणमनयोरिति द्विकौ । ‘ संख्याया अतिशदन्ताया: कन् ' ( पाणि ०५।१।२२ ) इति कन्प्रत्ययः । ततश्च गकारं ततोऽधस्ताल्लकारं लिखित्वा विस्पष्टार्थमधस्तिर्यग्रेखां दद्यात् । अधस्ताच्च पूर्ववद् गकारलकारौ स्थापयेत् ॥ शिवप्रसादिनी - सूत्रकार “ द्विकौ ग्लौ ” इत्यादि सूत्रों के द्वारा प्रस्तार का निरूपण करने के क्रम में प्रथम एकाक्षर प्रस्तार प्रणाली को प्रथम सूत्र से दिखाने जा रहे हैं-यथा - एकाऽक्षर प्रस्तार के ऊपर के भाग में गकार लिखकर उसके बाद नीचे वाले भाग में लकार को लिखना चाहिए । द्वाऽक्षर प्रस्तार में पहले गकार और उसके नीचे लकार लिख कर एक रेखा को स्थापित किया जाना चाहिए । पुनः इस रेखा के नीचे भाग में पहले गकार लिख करके उसके नीचे लकार लिखना चाहिए । इसका सार यह है कि एकाऽक्षर प्रस्तार में ऊपर के भाग में गकार को लिखकर पुनः उसके नीचे लकार को स्थापित किया जाना चाहिए । द्विकौ = दो आवृत्ति प्रमाण है जिन दो ( ग् ल् = ह्रस्वदीर्घवर्णों का, अथवा ) गकार लकार का, वह " द्विकौ ” शब्द से कहा जाता है । अर्थात् दो गकार और दो लकार को स्थापित किया जाना चाहिए । “ द्वि ” शब्द से " संख्याया अतिशदन्ताया: कन् ” ( पा ० सू ० ५।१।२२ ) इस पाणिनि सूत्र से " कन् ” प्रत्यय होने पर " द्विक " प्रकृति बनती है, और प्रथमा द्विवचन में “ द्विकौ ” शब्द निष्पन्न होता है । इस प्रकार द्विकौ = दो बार उच्चरित, ग्लौ = दो गकार ( SS ) और दो लकार ( II ) को स्थापित किया जाना चाहिए । “ द्विकौ ग्लौ ” इत्यादि पिङ्गलप्रोक्त चार सूत्रों के द्वारा सूत्रकार प्रस्तारसञ्ज्ञकवृत्त के भेदों को प्रकाशित किये हैं । इन सूत्रों के अर्थों को उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया जा रहा है— ( एकाक्षरप्रस्तार:-) १ । ग २ । ल । इस प्रकार एकाक्षरप्रस्तार दो भाग के माध्यम से ऊपर - ऊपर में स्थापित करके छ ० शा१८-४.५१ Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 422

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२७० छन्दः शास्त्रम् उसके मध्य में रेखा लिखनी ( देनी चाहिए । इसके बाद प्रथम भाग के द्वितीय अक्षर स्थान में “ ग ” कार अक्षर को, तथा द्वितीय भाग के द्वितीय अक्षर स्थान में " ल " कार को स्थापित करना चाहिए । इस विषय का आगे के सूत्रों से सम्बन्ध है इसलिए आगे के सूत्राऽर्थों के साथ इस सूत्राऽर्थ का सम्बन्ध आकांक्षित है ॥२० ॥

अत्र किं कर्तव्यमित्याह-मिश्रौ च ॥ ८ । २१ ॥ मृतसञ्जीवनी — अनेन द्वितीयाक्षरप्रस्तारं दर्शयति । चकारः पूर्वप्रस्तारसमुच्चयार्थः । द्विकौ ग्लौ स्थापयित्वा अनन्तरं द्वितीयस्थानेषु मिश्रौ ग्लौ विन्यसेत् । गकारो गकारेण संश्लिष्टो मिश्र उच्यते, लकारश्च लकारेण । मिश्राविति गकारलकाराभ्यां प्रत्येकमभिसम्बध्यते । ' द्वन्द्वात्परो यः श्रूयत ' इति न्यायात् । ततश्च प्रथमायामावृत्तौ गकारौ मिश्रौ स्थापयेत् । द्वितीयायां लकाराविति । ततो मध्ये लेखामपनयेत् । एवं चतुः प्रकारो द्यक्षरप्रस्तारो भवति । तद्यथा - गौ लगौ ग्लौ लाविति ॥ शिवप्रसादिनी - पूर्व सूत्र के प्रतिपादित नियमानुसार “ ग ” एवं “ ल ” दो भाग में रखने से, उसके प्रथम भाग के द्वितीय अक्षर के स्थान में जहाँ " ग् " तथा द्वितीय भाग के द्वितीय अक्षर स्थान में " ल " अक्षर रखा गया है । वहाँ पर प्रथम भाग के द्वितीय अक्षर के स्थान में उपस्थित “ ग ” वर्ण के साथ पुनः प्रथम भागस्थ " ग " को मिला देने पर " ग - ग " एवं द्वितीय भाग के द्वितीय अक्षर " ल " के साथ " ग " को मिलाने पर " ल-ग ” तथा द्वितीय भागस्थ ' ल ' को “ ल ” के साथ मिलाने की स्थिति में " ल - ल " इस प्रकार द्वितीय भाग के द्वितीय स्थान में क्रमश: " ल - ग " और होगा, अतएव द्वाऽक्षर प्रस्तार चार प्रकार का हुआ करता है । ल, एवं " ल - ल ” । इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार समझना प्रथम भाग ( ग / ल ) + ग १ ) ग - ग द्वितीय भाग ( ग / ल ) + ल २ ) ल - ग ३ ) ग - ल ( ४ ) ल - ल, इदानीं द्यक्षरप्रस्तारपूर्वकमेकैकाक्षरवृध्या त्र्यक्षरादिप्रस्तारं " ल - ल ' दो स्वरूप सिद्ध यथा - ग - ग, ल - ग, ग-चाहिए-इति ।८।२१ ॥ दर्शयितुमाह-पृथग्ला मिश्राः ॥ ८।२२ ॥ मृतसञ्जीवनी – द्यक्षरप्रस्तारस्य पूर्वन्यायेन द्विकं लेखाविभक्तं स्थापयित्वा तृतीयाक्षरस्थानेषु प्रथमावृत्तौ गकारा मिश्रा दातव्याः । द्वितीयावृत्तौ लकारा मिश्रास्ततो CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 423

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अष्टमोऽध्यायः २७१ मध्यात् लेखामपनयेत् । एवं त्रिक: प्रस्तारः सिध्यति । पृथगिति विजातीयासंसर्गमाह । तेन प्रथमायामावृत्तौ न लकारप्रवेशः । द्वितीयायां न गकारस्य । एवं त्रिकप्रस्तारं द्विः स्थापयित्वा पृथग् ग्लौमिश्रा दातव्या इति चतुरक्षर: प्रस्तारः । एवं तत्पूर्वकः पञ्चाक्षरः प्रस्तारः । तथैव तत्पूर्वकः षडक्षरो गायत्रीसमवृत्तप्रस्तारः । एवमुष्णिगादीनामप्येकैकाक्षर-वृद्ध्या अयमेव न्यासः । तत्रेदं सूत्रं त्र्यक्षरात् प्रभृति पुनः पुनरावर्तनीयं यावदभिमत: प्रस्तारः २ ॥ शिवप्रसादिनी - पूर्व के समान द्वयक्षर प्रस्तार को दो भागों में स्थापित करके प्रथम भाग के तृतीय अक्षर के स्थान में " ग " कार को रखकर उस गकार के साथ गकार को मिलाना चाहिए । एवं द्वितीय भाग के तृतीय स्थान में लकार को स्थापित करके, उस लकार के साथ द्वितीय भाग को मिलावें । इस प्रकार अष्टविध प्रस्तार सिद्ध होता है । प्रस्तार के विषय में यहाँ पर यह नियम है कि प्रथम भाग के शेष में स्थित गकार को द्वितीय भाग के मध्य में प्रवेश नहीं कराना चाहिए । एवं द्वितीय भाग के शेष में विद्यमान लकार को भी प्रथम भाग के मध्य में नहीं दिया जाना चाहिए । इस प्रकार तीन अक्षरों के प्रस्तार को दो भागों में विभक्त करके, प्रथम भाग के चतुर्थ अक्षर के स्थान में गकार, एवं द्वितीय भाग के चतुर्थ अक्षर के स्थान में लकार को स्थापित करके, तथा उसको मिश्रित करने पर सोलह प्रकार का चतुरक्षर प्रस्तार होगा । इसी प्रकार चतुरक्षर प्रस्तार को दो भाग में विभाजन किये जाने पर बत्तीस ( ३२ ) प्रकार का पञ्चाऽक्षर प्रस्तार होगा । पञ्चाऽक्षर प्रस्तार का दो भागों में विभाग कर देने पर चौसठ ( ६४ ) प्रकार का षडक्षर प्रस्तार होगा । इस प्रकार एकाऽक्षर से लेकर षडक्षरपर्यन्त जो प्रस्तार संख्या दिखलायी गयी है, उसे समवृत्तसंख्या से सम्बन्धित " समवृत्त प्रस्तार " समझना चाहिए । इसी प्रकार सप्ताऽक्षराऽऽदिकों के विषय में भी प्रस्तार से सम्बन्धित नियम को समझना चाहिए ॥२२ ॥

वसवस्त्रिकाः ॥ ८।२३ ॥ मृतसञ्जीवनी - एवं पूर्वोक्ते त्र्यक्षरप्रस्तारे अष्टौ त्रिका जायन्ते । ते च मकारादयः शास्त्रादौ कथिता एव । प्रदर्शनार्थ चैतत्; तेन षोडश चतुष्का द्वात्रिंशत्पञ्चका भवन्ति । एवं चतुःषष्टिर्गायत्रीसमवृत्तानि सर्वगुरुलघ्वाद्यन्तानि भवन्ति । द्विगुणोत्तरमुष्णिगादीनाम्;

( १ ) प्रकारान्तरमुक्तं रत्नाकरे-' पादे सर्वगुरावाद्याल्लघु न्यस्य गुरोरधः ।

यथोपरि तथा शेषं भूयः कुर्यादमुं विधिम् ॥

ने दद्याद्गुरूनेव यावत्सर्वलघुर्भवेत् । प्रस्तारोऽयं समाख्यातश्छन्दोविचितिवेदिभिः ॥ ' CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 424

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२७२ छन्दः शास्त्रम् एकैकाक्षराधिक्यात् । विस्पष्टार्थमिदं सूत्रम् प्रस्तारादेव सङ्ख्यापरिच्छितेः ' ॥ शिवप्रसादिनी — इस प्रकार तीन अक्षरों के प्रस्तार में, तीन - तीन के समूहों का आठ समूह हुआ करता है, और वे त्रिक ( तीन - तीन ) के समूह से घटित अष्टत्रिक पुनः

( १ ) प्रस्तारस्य क्रमे बीजं नोचुः प्राञ्चोऽत्र यद्यपि ।

स्पष्टतायास्तथाप्यस्मि वदामि सुधियां मुदे ॥

सर्वगुरुपादस्य भेदाकाङ्क्षायां द्वितीयपङ्क्तौ प्रथमस्थान एवोपस्थितत्वात् गुरुनिरास-पूर्वं लघुप्रयोगेण सर्वगुरुपादो भिद्यत इति तस्यादौ कल्पनम्, - ( 1. 5. 5 ) । ततस्तृतीय-पङ्क्तौ द्वितीय स्थाने गुरुनिरासपूर्वं लघुप्रयोग इति द्वितीयो भेदः, – ( 5.1.5 ) । अस्यैव शेषभूतश्चतुर्थपङ्क्तिस्थस्तृतीयो भेद इति तस्य कल्पनभ्, – ( 1.1.5 ) ततः पञ्चमपङ्क्तौ तृतीयस्थाने तथैव लघुप्रयोगाच्चतुर्थस्य, - ( 5.5.1 ) । अस्यैव च द्विगु-र्वास्त्रयोऽन्ये भेदा: - लघुगुर्वादिः - ( 1.5.1 ), गुरुलघ्वादिः - ( S.I.1 ) लघुद्वयादिश्च ( ।.।.। ) इति । इत्थं सर्वगुरूणा प्रथमेन ( S.S.S ) सहितेषु मध्याया अष्टभेदेषु क्रमे बीजमुक्तम् । एवं प्रतिष्ठादिप्रस्तारक्रमेऽप्युन्नेयम् ॥ एकाक्षरादिषड्विंशत्यन्तजातिप्रस्तारपिण्डसङ्ख्योक्ता वृत्तमौक्तिके-' षििड्वंशतिः, सप्तशतानि चैव तथा सहस्राण्यपि सप्तपङ्क्तिः । लक्षाणि दृग्वेदसुसम्मितानि, कोट्यस्तथा रामनिशाकरैः स्युः ॥ ' ( १३,४२,१७,७,२६ ) इति वृत्तरत्नाकरसेतौ । एवमर्धसमवृतेऽर्धप्रस्तारः, विषमवृत्ते च श्लोकप्रस्तार इति ज्ञेयम् । मात्रा -वृत्तप्रस्तारोऽपि ग्रन्थान्तरोक्तो दर्शितः सेतुकृता-‘ तत्र प्रथमपङ्क्तौ स्याद्गुरुपादस्तु पूर्ववत् । द्वितीयपङ्क्तौ प्रथमादधो लेख्यो लघुर्गुरोः ॥

यथोपरि तथा शेषमूनस्थाने लघु न्यसेत् ।

तृतीयादिषु पङ्क्तिष्वप्येवमेव गुरोरधः ॥

लघु न्यस्यावशिष्टं तु पूर्ववत् परिकीर्तितम् ।

न्यूने मात्रात्रयं देयं तस्मिन्नादौ गुरूर्द्वयोः ॥

कलयोः स्यात्ततः पूर्वं लघुर्देयो भवेत्ततः ।

चतुर्थपङ्क्तावप्येवं पञ्चम्यां तु गुरोरघः ॥

लघुद्वयं लिखेत् पूर्वं शिष्टं तूपरिवद्भवेत् ।

एवं सर्वत्र विज्ञेयः कलाप्रस्तार उत्तमः ॥

तेन द्विगुरुपादस्य पञ्च भेदा भवन्त्यमी । सर्वान्तमध्यादिगुरुचतुर्लघुगणाः स्मृताः ॥ ' वृत्तप्रत्ययकौमुद्यामत्र कश्चिद्विशेष उक्तः-इति । ' एकमात्रे गुरुनैव त्रिपञ्चाऽऽदौ लशेषतः । आदावेव लघुः स्थाप्यस्ततः प्रस्तारजाः क्रियाः ॥ ' इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 425

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अष्टमोऽध्यायः २७३ मकाराऽऽदि आठ, जिन्हें प्रकृतशास्त्र के आरम्भ में ही संज्ञा विधान के माध्यम से व्यक्त किया जा चुका है । इस प्रकार चतुरक्षर प्रस्तार में सर्व गुरू आदि वाले तथा सर्व लघु अन्त सोलह चतुष्कों की ( चार - चार के सोलह समूहों की ), एवं पञ्चाऽक्षरप्रस्तार में पाँच-पाँच के बत्तीस समूहों की, एवं षडक्षर के प्रस्तार में छः - छः के चौंसठ समूहों की समवृत्त संख्या होगी । एक - एक अक्षर की वृद्धि के साथ प्रस्तार संख्या दो गुणे के क्रम से वर्द्धित होती है । इस प्रकार सप्ताऽक्षरछन्द के प्रस्ताराऽनुसार ( २२८ ) दो सौ अठाईस समवृत्त संञ्ज्ञाएँ होंगी । पूर्वोक्त प्रस्तार के नियम के अनुसार ही प्रस्तार संख्या का ज्ञान हुआ करता है । अतः प्रकृत सूत्र स्पष्ट ज्ञान के लिए प्रकट हुआ समझना चाहिए ॥२३ ॥

नष्टवृत्तपरिज्ञानार्थमाह-लर्द्धे ॥ ८।२४ ॥ मृतसञ्जीवनी - यदैवं विजिज्ञासेत - गायत्र्यां समवृत्तं षष्ठं कीदृशमिति, तदा त षट्सङ्ख्याविशेषमर्धयेत । तस्मिन्नर्धीकृते लघुरेको लक्ष्यते, स भूमौ विन्यास्यः ॥ गायत्री छन्द के समवृत्ताऽन्तर्गत षष्ठ ( छठा ) भेद किस प्रकार का है? इस प्रकार की जिज्ञासा होने पर उसके समाधानाऽर्थ प्रकृत सूत्र का अवतरण हुआ है । जिसका आशय यह है कि सर्वप्रथम इस षष्ठ भेद संख्या ६ को २ से भाग दिया जाना चाहिए ( ६ + २ = ३ ) भागफल दो और दो से अर्द्धकृत ( एक ) होने के कारण एक के स्थान में लकार को स्थापन करना चाहिए ॥ २३ ॥

पुनः द्वितीय भाग के " ३ तीन " में संख्याकृत इस विषम संख्या में संख्याकृत दो भाग का हो पाना सम्भव नहीं, अतः यहाँ पर क्या किया जाना उचित है? इसके समाधान के लिए आगे का सूत्र उपस्थित होता है । इदानीमवशिष्टा त्रिसंख्याविषमत्वादर्धयितुं न शक्यते । तत्र किं प्रतिपत्तव्यमित्याह—

सैके ग् ॥८।२५ ॥

मृतसञ्जीवनी - अर्ध इत्यनुवर्तते । विषमसङ्ख्यायामेकमधिकं निक्षिप्य ततोऽर्धयेत । तत्रैको गकारो लभ्यते । तं पूर्वलब्धाल्लकारात् परं स्थापयेत् । ततो द्विसंख्यावशिष्यते । पुनस्तामर्धयेत, ततश्चैकलकारं दद्यात् । ततश्चैकसंख्यावशिष्यते । तत्र तावत् सैके गिति लक्षण मावर्तनीयं यावद्वृत्ताक्षराणि षट् पूर्यन्ते । एवं सङ्ख्यान्तरेऽपि योज्यम् ' ॥ ( १ ) मात्रानष्टमुक्तं रत्नाकरसेतौ-संस्थाप्येह पृथङ्मात्रास्तत्र चाङ्कान् समालिखेत् । एकद्व्यङ्कतृतीयाङ्कानाद्यमात्रात्रये क्रमात् ॥ ततः पूर्वद्वयोन्मिश्रानन्त्ये पृष्टाङ्कलोपनम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 426

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२७४ छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - यहाँ पर पूर्वसूत्र से " अर्द्ध " शब्द की अनुवृत्ति आती है । इस ( एकाऽऽत्मक ) विषम संख्या में एक संख्या का प्रक्षेप ( बाहर ) से लाभ करके, अनन्तर उसको दो भागों में विभक्त करना चाहिए । पुनः पूर्व सूत्र के द्वारा बोध विषय रूप में उपलब्ध लकार के आगे लकार को स्थापित करें । अनन्त शेष रूप में उपस्थित दो संख्या को दो भाग करके, एक लकार स्थापन करें, वा लिखें । पुनः शेष बचे एक ( १ ) संख्या को दो गुणा करके और उस स्वरूप का ही दो विभाग के माध्यम से “ ग ” का स्थापन करें । इस प्रकार जब तक षडक्षर पूरा नहीं हो जाता है, तब तक अवशिष्ट विषम संख्या के साथ एक ( १ ) का योग देकर, तथा उसको दो भागों में विभक्त करके गकार को स्थापित करते रहना चाहिए । जिसके परिणामस्वरूप षडक्षरछन्द का षष्ठ भेद - " ल ग ल ग ग ग ” इस प्रकार होगा । इसी प्रकार का नियम अन्य स्थलों में भी जानना चाहिए । इस सूत्र का रहस्य इस प्रकार जानना चाहिए - इस सूत्र में पूर्व सूत्र से " अर्द्ध " की अनुवृत्ति आएगी, जिसके अनुसार त्रयाऽऽत्मक विषम संख्या में एक अधिक संख्या का प्रक्षेप करके पुनः उसका विभाजन किया जाना चाहिए ( पूर्वसूत्र में कहा गया था कि षष्ठ संख्या का विभाग करें, उसके आधे कर देने पर क्रमशः दो संख्या से एक गुरू लक्षित होता है, और अवशिष्ट एक संख्या से एक लघु लक्षित हो रहा है, जिसका गुरू सञ्ज्ञक " ग " के नीचे लेखन किया जाना चाहिए । ) जिससे वहाँ पर एक “ ग ” कार का लाभ होता है उस गकार को पूर्व लभ्य ( चर्चित ) लकार के आगे लिखना चाहिए । अनन्तर दो संख्या जो अभी बची रहती है उसका भी दो भाग किया जाना चाहिए । उस विभक्त एक संख्या लक्षित लकार को पुनः पूर्व स्थापित गकार के अनन्तर लिखना चाहिए । अब शेष रूप में एक संख्या बची है जिसमें " सैके ग् ” ( प्रक्षेप से लभ्य एक के सहित “ ग ” हो ) इस लक्षणाऽऽत्मक सूत्र की आवृत्ति की जानी चाहिए, उसकी आवृत्ति तब तक होगी, जब तक वे छ: अक्षरों में पूर्ण नहीं हो जाते हैं । इसी प्रकार संख्याऽन्तर में भी इस सूत्राऽर्थ की योजना करनी चाहिए ॥२५ ॥

उद्दिष्टवृत्तस्य सङ्ख्यापरिज्ञानार्थमाह-प्रतिलोमगणं द्विर्लाद्यम् ॥ ८ । २६ ॥ मृतसञ्जीवनी- -यस्य वृत्तस्य सङ्ख्यां जिज्ञासेत तद्भूमौ प्रस्तारयेत । ततस्यस्यान्ते यो लकारः सजातीयापेक्षया, तमादौ कृत्वा प्रातिलोम्येने द्विरावर्तयत । तत्र निराकाराया आवृत्तेरसम्भवात् प्रथमातिक्रमे कारणाभावादेकसङ्ख्या लभ्यते । ततश्चैकसङ्ख्याङ्क-पूर्वपूर्वतरस्यापि लोपः सम्भवतो भवेत् ॥ यस्य यस्य भवेल्लोपस्तदधो गुरुता भवेत् । परया मात्रयोत्यन्तग्मात्रानष्टं वदेत्सुधीः ॥ ' इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 427

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अष्टमोऽध्यायः २७५ मन्त्यलकारस्याधस्तात् स्थापयित्वा द्विगुणयेत् । ततस्तस्मादपनीय तत्पूर्वस्य वर्णस्याधस्ता-न्निधाय पुनर्द्विगुणयेत् । पुनस्तदपि पूर्वस्य । एवं यावन्ति वृत्ताक्षराणि प्रातिलोम्येन समाप्यन्ते । तत्र याः सङ्ख्या निष्पद्यन्ते, तावतिथं तद्वृत्तमिति ॥ शिवप्रसादिनी - जिस वृत्त की संख्या जाननी हो उस वृत्त के गण को स्थापित करना चाहिए । यथा— शङ्का षडक्षरगायत्री छन्द का " तनुमध्या " नाम का वृत्त कितनी संख्या के अन्तर्गत आएगा? समाधान — उपर्युक्त प्रश्न के समाधानार्थ सर्वप्रथम " तनुमध्या त्यौं ” इस सूत्र और इस सूत्र के अर्थ का अनुसन्धान करना चाहिए । तदनुसार तनुमध्या वृत्त में तगण और यगण इन दोनों गणों की उपलब्धि होती है । इन दोनों गणों से युक्त तनुमध्या वृत्त को सरलता से समझने के लिए प्रदर्शित किया जा रहा है— त य ग - ग - ल ल - ग - ग - ग 5 – S ७ + ४ + २ + १ ग — ग - ल लगग अब तृतीय स्थान में वर्त्तमान लकार को छोड़कर चतुर्थस्थान में रहने वाला जो अन्तिम लकार उस अन्त्य लकार के नीचे एक ( १ ) संख्या लिखें, पुन: इस एक संख्या को दोगुनी करके प्रतिलोम के क्रमाऽनुसार उपर्युक्त चतुर्थ लकार के पूर्व तृतीय लकार के नीचे लिखना चाहिए । पुनः दो संख्या को दो गुनी चार ( ४ ) करके उसके पूर्व गकार के नीचे स्थापित करें | अनन्तर पुनः चार संख्या को दो गुनी ( ८ ) आठ संख्या करके, और उन संख्या में से ‘ “ ततोऽप्येकं जह्यात् ” इस अग्रिम सूत्रानुसार एक ( १ ) संख्या को घटाकर शेष बचे सात ( ७ ) संख्या को प्रथम गकार के नीचे दिया जाना चाहिए । उपर्युक्त संख्या का पुनः १ + २ + ४ + ७ इस संख्या के साथ योग ( जोड़ ) कर देने पर कुल चौदह ( १४ ) संख्या होगी, उस चौदह की संख्या से भी एक संख्या का अपहार कर लिए जाने परं तेरह ( १३ ) शेष रहेगा । इस प्रकार से " तनुमध्यावृत्त ” “ ग - ग - ल - ल - ग - ग ” यह तेरह संख्या का भेद वाला होगा । इसी प्रकार से अन्यवृत्त स्थलों में भी समझना होगा || २६ || तत्र विशेषमाह-ततोग्यंकं जह्यात् ॥ ८।२७ ॥ मृतसञ्जीवनी - पूर्वोक्ते कर्मणि क्रियमाणे यदि सा सङ्ख्या · गकारस्थानमापद्यते, तदा तां द्विगुणयित्वा ततः सङ्ख्यासमुदायादेकं त्यजेत् । ततः पूर्वोक्तं कर्म कुर्यात् । ततः परिपूर्णत्वात्तद्वृत्तसङ्ख्या सिध्यति ' ॥ ( १ ) मात्रोद्दिष्टमुक्तं जानकीशरणेन-‘ विलिख्य रूपे क्रमकाङ्कमत्र गुरूर्ध्वमङ्कं चरमे विलुम्पेत् । शिष्टाङ्कमेवं प्रवदेद्विधिज्ञो मात्रीयमुद्दिष्टमिदं जगाद ॥ ' इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 428

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२७६ छन्दः शास्त्रम् शिवप्रसादिनी - इस सूत्र के अर्थ को लेकर पूर्व सूत्र में ही बहुत कुछ विचार हो चुका है । तथाऽपि जिज्ञासुओं की जिज्ञासा निवृत्ति के लिए प्रकृत सूत्र पर समग्रता के साथ विचार आरम्भ हो रहा है - पूर्वसूत्रस्थविचारानुसार अन्तिम लकार के अधस्थल से लेकर आरम्भिक आदि गकार के अधस्थल तक में प्रतिलोम ( विपरीत ) क्रम से आदिभूत एक ( १ ) संख्या को अन्त्य स्थान में रखकर — उससे पूर्व के स्थान में दो गुनी ( २ ) संख्या, पुनः उससे पूर्व चार संख्या, पुनः उससे पूर्व उत्तर संख्या के दो गुणा आठ संख्या, इसी क्रम से दो गुना करके उसके पूर्व के स्थान में अंकों का स्थापन तब तक उन - उन वृत्तों में करते रहना चाहिए, जब तक आदिभूत सर्वशेष गकार न मिल जाय । इस प्रकार अन्तिम संख्या को भी दो गुनी करके और उस दो गुनी संख्या में से एक संख्या का परित्याग कर शेष को वृत्त संख्या समझनी चाहिए ॥ २७ ॥

प्रस्ताराद्विना वृत्तसङ्ख्यापरिज्ञानार्थमाह— ( प्रस्तार के बिना वृत्त संख्या के परिज्ञान के लिए आगे का सूत्र कहा जा रहा है ) — द्विरद्धे ॥ ८।२८ ॥ मृतसञ्जीवनी – अपनीत इत्यध्याहारः । यदा जिज्ञासेत - षडक्षरे छन्दसि कति वृत्तानि भवन्ति? तदा तां छन्दोऽक्षरसङ्ख्यां भूमौ स्थापयित्वा ततोऽर्धमपनयेत । तस्मिन्नपनीते द्वौ लभ्येते । ततस्तां द्विसङ्ख्यां भूमौ पृथक् प्रस्तारयेत । ततः शेषास्त्रयोऽक्षरसङ्ख्यायां भवन्ति ॥ शिवप्रसादिनी - प्रकृत सूत्र में पूर्व सूत्र से अपनयनाऽर्थक ( = निवारणाऽर्थक ) " जह्यात् ” पद की अनुवृत्ति की जानी चाहिए । यहाँ पर जिज्ञासा होती है कि –षडक्षर छन्द में समवृत्त संख्या कितनी होती है? इस प्रकार की जिज्ञासा निवृत्ति के क्रम में सर्वप्रथम उस अक्षर संख्या ( ६ संख्या ) को भूमि पर रखकर के उसका दो भाग में विभाजन कर प्रथम आधे को हटाकर उसके स्थान में “ द्विरर्थे ” ( = अर्थात् अर्धे = आधे

भाग को हटा करके उसके स्थान में, द्विः = दो संख्याओं का लाभ किया जाना चाहिए ) ।

इस ( २ ) संख्या को पृथक् करके रखना होगा ॥ २८ ॥

तेषामर्धयितुमशक्यत्वात् किं कर्तव्यमित्याह-( यहाँ पर शेष बचा दूसरा जो अर्द्ध भाग है उनकी ( ३ ) तीन संख्याएँ हैं । विषम होने के कारण यह भाग के द्वारा विभाग के योग नहीं हैं । अतः इस संख्या के विषय में क्या किया जाना उचित है? इसके समाधानाऽर्थ अग्रिम सूत्र अवतरित हो रहा है ) } - -रूपे शून्यम् ॥ ८।२ ९ ॥ मृतसञ्जीवनी – विषमसङ्ख्यातो रूपमपनीय तस्मिन्नपनीते शून्यं लभ्यते । तत्र पूर्वलब्धाया द्विसङ्ख्याया अधस्तात् स्थापयेत्, ततो द्विसङ्ख्यावशिष्यते । ततोऽर्थेऽपनीते CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 429

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत, पृष्ठ 429 का मूल पृष्ठ
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अष्टमोऽध्यायः २७७ पुनर्द्विसङ्ख्या लभ्यते, तां शून्याधस्तात् स्थापयेत् । ततो रूपे शून्यं लभ्यते । तद् द्वि-सङ्ख्याया अधस्तात् स्थापयेत् ॥ शिवप्रसादिनी - पूर्व में समविभाग के अयोग्यरूप में विषमसंख्या उपस्थित हुई थी, अतः इससे सम्बन्धित व्यवस्था के विषय में प्रश्न उपस्थित हुआ था, प्रकृत सूत्र से उसी का समाधान किया जा रहा है - विषम संख्या से रूप का = अर्थात् एक संख्या का अपनयन ( निवर्तन ) करना चाहिए । एकाऽऽत्मक रूप हटते ही, शून्यम् = शून्य प्राप्त कर लेना चाहिए, और उस शून्य को पूर्व लभ्य दो ( २ ) संख्या के नीचे लिखना चाहिए । आगे दूसरे भाग की दो ( २ ) संख्या अवशिष्ट हैं, उन दो संख्या में से आधे को, अर्थात् एक संख्या को निकाल देने पर, वहाँ पर शेष बचे एक ( १ ) के स्थान में “ द्विरद्धे ” इस सूत्र के द्वारा दो ( २ ) संख्या का लाभ हो गया । इस दो ( २ ) संख्या को, पूर्व में स्थापित दो ( २ ) संख्या के निम्नभाग में जो शून्य लिखा गया है, ठीक उस के नीचे रखना होगा, अब द्वितीय भाग में अवशिष्ट एक ( १ ) संख्या बची है, जो कि विषम संख्या है, अतः “ रूपे शून्यम् ” इस सूत्र के माध्यम से एक ( १ ) संख्या को हटाकर उसके स्थान में शून्य ( ० ) का लाभ करना होगा, उस लब्ध शून्य को सबके नीचे स्थापित करें ॥२ ९ ॥ ततः किं कर्तव्यमित्याह-( इतना कर देने के उपरान्त आगे इस विषय की पूर्णांऽऽहुति किस प्रकार हो? इसकी जानकारी अग्रिम ( ३० ) एवं ( ३१ ) सूत्रों के विचाराऽनुसार प्राप्त होगी, इसी अभिप्राय से क्रमशः उन सूत्रों को अभिव्यक्त करते हैं-द्विः शून्ये ॥८ । ३० ॥ मृतसञ्जीवनी – शून्यस्थाने द्विरावृत्तिं कुर्यात् । तत्र निराकाराया आवृत्तेरसम्भवात्, प्रथमातिक्रमे कारणाभावादेकसङ्ख्या लभ्यते । तां शून्ये स्थापयित्वा द्विगुणयेत् । ततो द्वौ भवतः । तस्योपरिष्टादर्धस्थानं द्विसङ्ख्याकं तदपनीय तस्य स्थाने तं द्विसङ्ख्याकं स्थाप-येत् ॥ शिवप्रसादिनी - शून्य स्थान में दो आवृत्ति करें, किन्तु निराकाराऽऽत्मक शून्य की आवृत्ति का हो पाना सम्भव नहीं । अतः उसके स्थान में किसी संख्या को ही लानी पड़ेगी, किन्तु “ प्रथम संख्या के त्यागपूर्वक द्वितीयाऽऽदि संख्या के ग्रहण में प्रमाण का अभाव होने से प्रकृत में प्रथमोपस्थित एक ( १ ) संख्या का ही ग्रहण किया जाना चाहिए । उस एक ( १ ) संख्या को पुनः सबसे नीचे शून्य के स्थान में ही स्थापना करें । पुनः उस एक ( १ ) संख्या में “ द्विःशून्ये ” इस सूत्र के अनुसार दो ( २ ) संख्या से गुणा करना होगा ( १ × २ = २ ) इस दो ( २ ) संख्या को ऊपर में स्थापन करना चाहिए ॥ ३० ॥

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पृष्ठ 430

छन्दश्शास्त्र पिङ्गल ऋषिकृत, पृष्ठ 430 का मूल पृष्ठ
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२७८ छन्दः शास्त्रम् अनन्तरमिदं कर्तव्यमित्याह-( इसके अनन्तर कार्य विशेष सूचनाऽर्थ आगे का सूत्र कहा जा रहा है — ) तावदर्थे तद्गुणितम् ॥८।३१ ॥ मृतसञ्जीवनी – यदर्धस्थाने स्थितं सङ्ख्याजातं, तत्तावत् गुणितं कुर्यात् । एतदुक्तं भवति – स्वसङ्ख्ययैव गुणयितव्यमिति । ततो द्वौ द्वाभ्यां गुणितौ चत्वारो भवन्ति । तेषामुपरिष्टाच्छून्यस्थानं तत्र तानारोपयेत् । अनन्तरं द्विः शून्य इति द्विगुणिता अष्टौ भवन्ति । तानप्यर्धस्थाने निधाय तावद्गुणान् कुर्यात् । ततोऽष्टावष्टाभिर्गुणिताश्चतुःषष्टिर्भवन्ति गायत्रीसमवृत्तानि । अनेनैव न्यायेनाष्टाविंशत्यधिकशतमुष्णिह, षट्पञ्चाशदधिके द्वे शते अनुष्टुभः, द्वदशोत्तराणि पञ्चशतानि बृहत्याः, चतुर्विंशत्यधिकं सहस्रं पङ्क्तेः, अष्टचत्वारिंशदधिके द्वे सहस्रे त्रिष्टुभः, षण्णवत्यधिकानि चत्वारि सहस्राणि जगत्याः । एवमतिच्छन्दसां कृतीनां च द्रष्टव्यम् ॥ शिवप्रसादिनी - जिस - जिस अर्ध स्थान में संख्याएँ स्थित हुयी हैं, उन संख्याओं को द्विगुणित वा दो गुणी की जानी चाहिए । इसका भाव यह है कि संख्या के अपने-अपने स्वरूप में ही गुणा किया जाना चाहिए, जिससे तत्तत् स्थानाऽऽपन्न दो ( २ ) संख्या अपने स्वरूपभूत दो ( २ ) संख्या से ही गुणित होकर ( २ x २ = ४ ) चार ४ संख्या के स्वरूप को प्राप्त होगें । गुणनफल में परिणत उस ( ४ ) चार संख्या को उसके ऊपर में स्थित जो शून्य स्थान है, वहाँ पर स्थापन करें । पुनः “ द्विः शून्ये " इस सूत्र के द्वारा उस चार ( ४ ) संख्या को दो ( २ ) से गुणा करना होगा । अर्थात् ४ x २ = ८ । पुनः उस आठ ( ८ ) संख्या को उसके ऊपर में स्थित अर्द्धस्थान में स्थापित करके उस आठ ( ८ ) संख्या को आठ ( ८ ) से गुणा करें - ८ × ८ = ६४ इस प्रकार उष्णिक् छन्द की १२८ समवृत्त संख्या होगी । अनुष्टुप् छन्द की ( २५६ ), बृहती की ( ५१२ ), पंक्ति की ( १२०४ ) त्रिष्टुप् की ( २०४८ ) जगती की ( ४० ९ ६ ) समवृत्त संख्या होगी । इसी प्रकार अन्य छन्द: स्थल में भी वृत्तसंख्या का निश्चय किया जाना चाहिए ॥ ३१ ॥

( नोट — उपर्युक्त ( २८-२९ - ३०-३१ ) इन सूत्रों का विषय परस्पर एक दूसरे से बंधा है । इस विषय से सम्बद्ध संख्या स्थापन प्रकार के स्पष्ट प्रतिपत्ति के लिए विषय विवेक तालिका प्रस्तुत की जा रही है ) -२८ एवं २ ९ सूत्र के संख्या स्थापन प्रकार ( १ ) अर्द्धस्थान- २ ( २ ) शून्यस्थान— I ( ३ ) अर्द्धस्थान- २ ( ४ ) शून्यस्थान- I CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA