चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1001–1010

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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६१२ चरकसंहिता जानुकपालिके, द्वावूरुनलकौ द्वौ बाहुनलकौ द्वावंसौ, द्वे अंसफलके, द्वावक्षको, एकं जत्रु, द्वे तालुके, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पञ्चचत्वारिंशत् पृष्टगतान्यस्थीनि, पञ्चदश ग्रीवायां चतुर्दशोरसि, द्वयोः पार्श्वयोश्वतुर्विंशतिः पर्शुकाः, तावन्ति स्थालकानि, तावन्ति चैव स्थालकार्बुदानि एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, एकास्थि नासिकागण्डकूटललाटं, द्वौ शङ्खौ चत्वारि शिरः कपालानीति; एवं त्रीणि सपष्टीनि शतान्यस्त्रां सह दन्तोलूख-लनखेनेति ॥ ६ ॥

अस्थियों की संख्या - • दाँत, दाँत के उलूखल ( जबड़ों के गड्ढे Sockets of the teeth in the jaw ) और नख के साथ तीन सौ साठ ३६० अस्थियाँ होती है । दाँत ३२, दन्तो. लूखल ३२, नख २०, हाथ पैर की अङ्गुलियों की अस्थियाँ ६०, हाथ - पैर की शलकास्थियाँ २०, हाथ - पैर की अङ्गुलियों के आश्रयभूत ४, पाणि ( एड़ी ) की अस्थियाँ २, पैर में गुल्फ की अस्थियाँ ४, हाथ के मणिबन्ध में २, अरलि की अस्थियाँ ४, जङ्घास्थियाँ ४, जान्वस्थियाँ २, जानुकपाल २, ऊर्वस्थि ( नलिकास्थि ) २, बाहु की नलकास्थियाँ २, अंस की अस्थियाँ २, अंसफलक २, अक्षकास्थि २, जत्रु की अस्थि १, तालु की अस्थियाँ २, श्रोणिफलक २, भगास्थि १, पीठ की अस्थियाँ ४५, गरदन की अस्थियाँ १५, छाती की अस्थियाँ १४, दोनों पार्थो में पर्शुका-स्थियाँ २४, पर्शुकाओं के मूलस्थान में लगे हुए स्थालक २४, पर्शुकाओं के मूल भाग में जो अर्बुद के आकार के होते हैं वे स्थालकार्बुद २४, हन्वस्थि १, हनुमूल को बाँधने वाली अस्थियाँ २, नासिकास्थि १, गण्डकुटास्थि १ ललाटास्थि १, शंखास्थियाँ २, शिर की कपालास्थियाँ ४, इस प्रकार दाँत, दाँतों के उलूखल और नख के साथ अस्थियों की संख्या ३६० हो जाती है ॥ ६ ॥

विमर्श - सर्व शरीरव्यापी त्वचाओं के वर्णन के बाद शरीर में सारभूत अस्थियों का वर्णन अभीष्ट हुआ है । अतः अस्थियों का वर्णन कर रहे हैं । यहाँ बताया गया है कि दाँत, दाँत के उलूखल और नख को लेकर शरीर में ३६० अस्थियाँ हैं । सुश्रुत ने ३०० अस्थियों की संख्या बनायी है । वे उलूखल और नख को अस्थि नहीं स्वीकार करते हैं । काय चिकित्सा में अस्थियों के समान कठिन होने से और अस्थियों के समान वर्ण होने से उनका ग्रहण किया गया है । सुश्रुत ने इनकी अस्थि के मल में गणना की है । परन्तु कायचिकित्सक चरक का तात्पर्य यह है कि नख छेद्य और स्थाप्य भेद से दो प्रकार के होते हैं, छेद्य नख अस्थियों का मल है, पर स्थाप्य नख अस्थिसामान्य होने से अस्थि ही है । इस प्रकार शरीर में चरक ३६० और सुश्रुत ३०० हड्डियाँ मानते हैं । पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि तद्यथा - त्वगू, जिह्वा, नासिका, अक्षिणी, कर्णौ च । पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि तद्यथा - स्पर्शनं, रसनं, घ्राणं, दर्शनं, श्रोत्रमिति । पञ्च कर्मेन्द्रियाणिः तद्यथा - हस्तौ पादौ, पायुः, उपस्थः, जिह्वा चेति ॥ ७ ॥

पाँच इन्द्रियाधिष्ठान - इन्द्रियों के अविष्ठान ( रहने के स्थान ) पाँच हैं, जैसे --- १. त्वचा, २. जिह्वा, ३. नासिका, ४. चक्षु, ५. श्रोत्र । पाँच वुद्धीन्द्रियाँ होती हैं, जैसे- १. स्पर्शनेन्द्रिय, २. रसनेन्द्रिय, ३. घ्राणेन्द्रिय, ४. दर्शनेन्द्रिय, ५. श्रोत्रेन्द्रिय । पाँच कर्मेन्द्रियाँ होती हैं, जैसे--१. दो हाथ, २. दो पैर, ३. गुदा, ४. मूत्रेन्द्रिय, ५. वाक् ( जिह्वा ) ॥ ७ ॥

विमर्श - इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के रहने का स्थान ये दोनों दो वस्तुएँ हैं । इन्द्रियाँ स्वयं अतीन्द्रिय होती हैं, उन्हें शक्ति स्वरूप कहा जा सकता है, अतः नेत्र अधिष्ठान के रहते हुए यदि शक्तिस्वरूप चक्षुरिन्द्रिय नष्ट हो जाती है तो मनुष्य कुछ भी नहीं देख पाता । यहाँ इन्द्रियाविष्ठान में और कर्मेन्द्रिय में जिहा दो बार पढ़ी गयी है । कर्मेन्द्रिय में वागिन्द्रिय से

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शरीरसंख्याशारीराध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् १३ इसी जिड़ा का बोध किया जाता है । यह जिल्हा वागिन्द्रिय और रसनेन्द्रिय इन दोनों इन्द्रियों का समान रूप से अधिष्ठान है । हृदय -हृदयं चेतनाधिष्ठानमेकम् ॥ ८ ॥

हृदय चेतना का स्थान एक है ॥ ८ ॥

ॐ दश प्राणायतनानि; तद्यथा - मूर्धा, कण्ठः, हृदयं, नाभिः, गुदं, वस्तिः, ओजः,

शुक्रं, शोणितं, मांसमिति । तेषु पट् पूर्वाणि मर्मसंख्यातानि ॥ ९ ॥

प्राणायतन – दस प्राणों के आयतन ( घर ) हैं । जैसे - १. मूर्धा ( शिर ), २. कण्ठ, ३. हृदय, ४. नाभि, ५. गुद्दा, ६. वस्ति ( मूत्राशय ), ७. ओज, ८. शुक्र, ९. शोणित ( रक्त ), १०. मांस । इनमें पहले के ६ मर्म कहे जाते हैं ॥ ९ ॥

* पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि तद्यथा - नाभिश्च हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहाच, वृक्को च, वस्तिश्व, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्व, पक्वाशयश्च, उत्तरगुदं च अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्रं च, स्थूलान्त्रं च वपावनं चेति ॥ १० ॥

कोष्ठाङ्ग - कोष्ठ के अङ्ग ५. प्लीहा, ६. दोनों वृक, ७ पन्द्रह होने हैं, जैसे - १. नाभि, २. हृदय, ३. क्लोम, ४. यकृत, बस्ति, ८. पुरीषावार, ९. आमाशय, १०. पक्काशय, ११. उत्तरगुद, १२. अधरगुद, १३. क्षुद्रान्त्र १४. स्थूलान्त्र, १५. वपावन ॥ १० ॥

विमर्श - उपर्युक्त कोष्ठांगों के आधुनिक नामों के लिए तथा अन्य बातों के लिए देखें पृष्ठ ८५५ इन अवयवों में कुछ ऐसे भी अवयव हैं जिनके परिचय में मतभेद है । इसके अतिरिक्त कोष्ठांगों, में ' फुफ्फुस ऐसे महत्त्वपूर्ण अवयव का उल्लेख न होना भी खटकता है । इस विषय में अग्निवेश, के ही सतीर्थ्य मेल ने कोठांगों में पक्काशय न कह कर अवहनन नामक अवयव का उल्लेख किया है । याजवल्क्य स्मृति में भी ऐसा ही पाठ आया है, यथा- ' पावसावहननं नाभिः क्लोम यकृत-प्लिहा! क्षुद्रान्त्रं वृक्कवस्तिश्च पुरीषाधानमेव च || आमाशयोज्य हृदयं स्थूलान्त्र गुद एव च । उत्तरथ गुदः को विस्तारोऽयमुदाहृतः ॥ ' इसी प्रकार विष्णुसंहिता में भी पक्काशय का नाम नहीं आया है । ऐसी दशा में कुछ लोगों का मत है कि चरक में भी पक्काशय न पढ़ कर अवह्नन पढ़ा जाय और अवहन का अर्थ फुफ्फुस किया जाय । काश्यप में १३ ही कोष्ठाङ्ग माने गये हैं । यथा-‘ नाभिः प्लीहा यकृक्लोम हृद्वको गुदवस्तयः । क्षुद्रान्त्रमय च स्थूलमामपकाशयौ वपा | कोष्ठाङ्गानि वदन्ति ज्ञा: । ' ( का. श. ) । गङ्गाधर ने क्लोम शब्द से फुफ्फुस और उण्डुक इन दोनों का. ग्रहण किया है । षट्पञ्चाशत् प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेपूपनिबद्धानि यान्यपरिसंख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु, तान्यन्यैः पर्यायैरिह प्रकाश्यानि भवन्ति । तद्यथा - द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरुपिण्डिके, द्वौ स्फिचौ, द्वौ वृषणौ, एक शेफः, द्वे उखे, द्वौ वजगौ द्वौ कुकुन्दरौ, एक वस्तिशीर्षम्, एकमुदरं, द्वौ स्तनौ द्वौ श्लेष्मभुवौ द्वे बाहुपिण्डिके, चिवुकमेकं, द्वावोष्ठौ द्वे सृक्कयो, द्वौ दन्तवेष्टक, एकं तालु, एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्निके,, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रको द्वे अक्षिकूटे, चत्वार्य-विर्मानि द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकाऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि ॥ ११ ॥

१. ' प्रकाश्य व्याख्यातानि ' इति पा ० । २. ' द्वौ भुजौ ' इति पा ० । ५८ च ० सं ०

पृष्ठ 1003

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६१४ चरकसंहिता प्रत्यङ्ग - ६ भङ्गों में संलग्न ५६ प्रत्यङ्ग होते हैं, जिन प्रत्यङ्गों को अङ्गों की संख्या बनाते समय नहीं कहा गया है उन प्रत्यङ्गों को पर्यायों से यहाँ व्याख्या की जायगी, जैसे- दो जंघा - पिण्डिकायें ( Culf - Regions ), दो ऊरुपिण्डिकार्ये ( Thigh - Regions ), दो स्फिच् ( Gluteal Regions ), दो अण्डकोष ( Scrotum and Testes ), एक मूत्रेन्द्रिय ( Penis ), दो उखाएँ ( Axillae काँख ), दो वंक्षण ( Inguinal Regions ), दो कुकुन्दर, एक बस्तिशिर, उदर ( Abdomen ), दो स्तन ( Mammary Regions ), दो कफ के स्थान ( कण्ठ के दोनों बालों के कठिन भाग - ' श्लेष्मभुत्रौ कण्ठपार्श्वयोर्व्यवस्थितौ कठिनौ भागौ ' इति चक्रः, गङ्गाधर ने- ' डौ भुजौ ' ऐसा पाठ किया है ), दो बाहुपिण्डकाएँ ( Bicep- Muscles ' Regions ), एक चिबुक ( Chin ), दो ओठ ( Lips ), दो सृक्कणी ( Margin of the Lips ), दो दन्तवेष्ट ( Gums ), एक तालु ( Palate ), एक गलशुण्डी ( Uvula ), दो उपजिह्निकाएँ ( Tonsils ), एक गोजिडा ( गौर्वाक् तदर्था जिह्वा, रसनेन्द्रिय का अधिष्ठानभूत जिहा Tongue ), दो गण्डस्थल ( Cheek Regions ), दो कर्णशष्कुली ( कर्ण को उपर से घेरने वाला भाग — Pinnae ), दो कर्णपुत्रिका ( Tragi ), दो अक्षिकूट ( Orbits ), आँख के चार वर्त्म ( Four Eyes - Lids ), दो नेत्र कनीनिकार्ये ( Pupils ), दो भौंहें ( Two Eye Brows ), एक अवटु ( ग्रीवा का पिछला भाग ), २ हाथ और २ पैर ( Etremeties ) के तलुवे ये ५६ प्रत्यङ्ग हैं ॥ ११ ॥

नव महान्ति च्छिद्राणि सप्त शिरसि, द्वे चाधः ॥ १२ ॥

शरीर के छिद्र - - नौ बड़े - बड़े छिद्र हैं, सात शिर में और दो नीचे, अर्थात् २ आँख के छिद्र, २ नाक के छिद्र, २ कान के छिद्र, १ मुख का छिद्र, ये सात शिर में और १ गुदा का छिद्र, १ मूत्रमार्ग का छिद्र, ये दो नीचे हैं ॥ १२ ॥

विमर्श - अन्यत्र भी पुरुषों में नव ही छिद्र माने हैं, पर एक दशवाँ छिद्र मस्तक में ब्रह्मरन्ध्र को भी माना है और तीन छिद्र स्त्रियों में अलग माने हैं - ' नृदेहे दशरन्ध्राणि नारीदेहे त्रयो-दश । ' सुश्रुत ने भी — ' श्रवणनयनवदनघ्राण गुद मेद्राणि नव स्रोतांसि नराणां बहिर्मुखानि । एतान्येव स्त्रीणामपराणि च त्रीणि, द्वे स्तनयोरधस्ताद्रक्तवहं च ॥ ' ब्रह्मरन्भ का छिद्र त्वचा से आवृत रहता है अतः चरक एवं सुश्रुत ने नहीं माना है । काश्यप ने भी इन्हीं को छिद्र माना है - ' स्रोतांसि द्विविधान्याहुः सूक्ष्माणि च महान्ति च । महान्ति नव जानीयाद् द्वे चाधः सप्त चोपरि ॥ नाभिश्च रोमकूपाश्च सूक्ष्मस्रोतांसि निर्दिशेत् । ' एतावद्द्द्दश्यं शक्यमपि निर्देष्टुम् ॥ १३ ॥

दृश्यों का वर्णन ही अभिप्रेत - यह पूर्व में त्वचा से लेकर पाणिपद तल तक जो वर्णन किया गया है यह दृश्य ( प्रत्यक्ष ) है । इन्हीं का निर्देश ( वर्णन ) किया जा सकता है, अर्थात् जो अप्रत्यक्ष है वे तो केवल आप्तोपदेश एवं अनुमानगम्य ही होते हैं ॥ १३ ॥

अनिर्देश्यमतः परं तर्क्यमेव । तद्यथा - नवस्नायुशतानि सप्त सिराशतानि, द्वे धमनीशते, चत्वारि पेशीशतानि, सप्तोत्तरं मर्मशतं द्वे सन्धिशते, एकोनत्रिंशत्सहस्राणि नव च शतानि षट्पञ्चाशत्कानि सिराधमनीनामणुशः प्रविभज्यमानानां मुखाग्रपरिमाणं, १. ' पञ्च पेशीशतानि ' इति पा ० । २. ' एकोनत्रिंशच्छतसहस्राणि ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1004

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शरीरसंख्याशारीराध्यायः ७ } शारीरस्थानम् ६१५ तावन्ति चैत्र केशश्मश्रुलोमानीति । एतद्यथावत्संख्यातं स्वकप्रभृति दृश्यं, तर्क्यमतः परम् । ऐतदुभयमपि न विकल्पते, प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ॥ १४ ॥

स्नायु शिरा आदि की संख्या - इसके बाद जो कहा जायगा उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है । अतः उनका निर्देश भी नहीं किया जा सकता । इसलिए वे केवल तर्क ( अनुमान ) से जाने जा सकते हैं । जैसे ९ ०० स्नायु ( Ligaments ) है, ७०० सिरायें ( Veins ), २०० धमनियाँ ( Arteries ), ४०० पेशियाँ ( Muscles, १०७ मर्म ( Vital - spots ), २०० सन्धियाँ ( Joints ), २ ९९ ५६ सिरा और धमनियों के विभाजित हुए सूक्ष्म मुखाग्र हैं, इतने ( Capillaries ), ही केश, दाढ़ी, रोम हैं अर्थात् २ ९९ ५६ हैं । इस प्रकार दृश्य और अदृश्य की संख्या बता दी गई । इनमें त्वचा आदि दृश्य हैं, इसके बाद अर्थात् पाणिपाद तल के बाद सब अनुमानगम्य हैं 1 ये दृश्य और तर्क्स दोनों शरीर के स्वस्थ रहने पर अपनी - अपनी संख्या के अनुसार रहते हैं । पर यदि शरीर विकृत होता है तब इनमें भी विकृति आ जाती है ॥ १४ ॥

विमर्श - यहाँ वर्णित स्नायु आदि सभी तर्कगम्य हैं, इसका तात्पर्य यह है । नामतः ये सभी प्रत्यक्ष हैं पर इनकी संख्या तर्कगम्य है, सिराधमनियों की संख्या क्रमशः ७०० और २०० बतायी हैं | उन्हीं सिरा और धमनी का सूक्ष्म विभाग २ ९९ ५६ बनाया है, पहले स्थूल विभाग कर बाद में सूक्ष्म विभाग का निर्देश किया है । पर इनका सूक्ष्म विभाग भी तर्क द्वारा जानने योग्य है और तर्क परामर्शजन्य ज्ञान होने पर ही होता है, जो प्रत्येक सज्ञान व्यक्ति कर सकता है । यह बात आचार्य ने अपने ध्व से स्पष्ट की है, क्योंकि प्रमाणत्रय - प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तोपदेश में आप्तोपदेश का यहाँ नाम नहीं दिया है जब कि वस्तुओं के ज्ञान में एक आप्तोपदेश भी प्रमाण है । अतः आप्तोपदेश से— ' द्वासप्ततिस्तथा कोट्यो लोमानीह महामुने । ' तथा ' त्रिंशत्कोटयोऽर्द्धकोटी च सन्ति रोमाणि मानुषे । सन्ति यावन्ति रोमाणि तावन्तो लोमकूपकाः ॥ ७२ करोड़ या ३०३ करोड़ रोमों की संख्या बतायी है यह भी संख्या नियत एवं अतिरूप में है और अनुमान न होकर आप्तोपदेशगम्य है । यह ग्रन्थ कायचिकित्सा - प्रधान है अतः इनका स्थूल रूप से वर्णन कर दिया है । विशेष ज्ञान के लिए सुश्रुत के शारीरस्थान के ५, ६, ७, ९ वें अध्याय को देखना चाहिए । * यत्त्रञ्जलिसंख्येयं तदुपदेच्यामः तत् परं प्रमाणमभिज्ञेयं तच्च वृद्धिहासयोगि, तर्क्यमेव । तद्यथा - दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेनाञ्जलिप्रमाणेन, यत्तु प्रच्यवमानं पुरीषमनुवन्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून्, यत्तु सर्वशरीरचरं बाह्या स्वग्बभर्ति यत्तु स्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते यच्चोष्मणाऽनुबद्धं लोमकूपेभ्यो निष्पतत् स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणं; नवाञ्जलयः पूर्वस्याहार परिणाम-धातोः, यं ' रस ' इत्याच ज्ञते; अष्टौ शोणितस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेप्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्जायाः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य

तावदेव प्रमाणं, तावदेवे लैप्मिकस्यौजस इति । एतच्छरीरतत्वमुक्तम् ॥ १५ ॥

रसादि धातुओं के मान - जिन शरीर तत्त्वों का ज्ञान अञ्जलि प्रमाण के रूप में होता है उनका उपदेश किया जा रहा है । यहाँ अञ्जलि प्रमाण के रूप में जो कहा गया है वह ( अधिक ) प्रमाण के १. ' एके तदुभयमपि न विकल्पयन्ते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ' इति, ' त्वक्प्रभृति दृश्यं तर्क्यमेवे-त्येके, तदुभयमपि न विकल्पते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ' इति च पा ० । २. ' तावदेव चौजसः, स्त्रीणामार्तवस्य चत्वारोऽञ्जलयः ' इपि पा ० ।

पृष्ठ 1005

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६१६ चरकसंहिता रूप में ( अर्थात् Maximum Quantity है ) । इनके वृद्धि - हास होते रहते हैं, जिनका ज्ञान अनुमान से किया जाता है । जैसे शरीर में अपनी अञ्जलि से १० अञ्जलि जल का प्रमाण है जो जल का अतियोग, अर्थात् शरीर में दश अञ्जलि से अधिक रूप में स्थित हैं वह नीचे आकर पुरीष से सम्बन्ध स्थापित कर बाहर निकलता है तथा मूत्र एवं रक्त तथा अन्य शारीरिक धातुओं से सम्बन्ध स्थापित करता है, जो जल सम्पूर्ण शरीर में चलते हुए बाहरी त्वचा उदकधरा को धारण एवं पोषण करता है, जो जल त्वचा में व्रण होने पर लसीका नाम से कहा जाता है, जो जल गर्मी से सम्बन्धित होने पर लोनकूपों से निकलते हुए ' स्वेद ' नाम को प्राप्त करता है वह जल शरीर में १० अञ्जलि प्रमाण है । आहार के परिणाम ( पाक ) स्वरूप पहला जो धातु जिसे रस कहा जाता है वह शरीर में ९ अञ्जलि है, ८ अञ्जलि रक्त है, ७ अञ्जलि पुरीष है, ६ अञ्जलि कफ है, ५ अञ्जलि पित्त है, ४ अञ्जलि मूत्र है, ३ अञ्जलि वसा है, २ अअलि मेदा है, १ अञ्जलि मज्जा है, अञ्जलि मस्तिष्क हैं, ½ अञ्जलि शुक्र है, ई अञ्जलि कफ के समान गुण वाला ओज भी है । इस प्रकार ये शरीर तत्त्व यहाँ बता दिये गये है ॥ १५ ॥

विमर्श - स्वअञ्जलि प्रमाण सम्भवतः इस बात की तरफ संकेत करता है कि Individuak Norms अलग - अलग होने चाहिए क्योंकि सबकी अञ्जलियाँ प्रमाण एक सी नहीं है । * तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद्गुरुखरकठिनमङ्गं नखास्थिदन्तमांसचर्मवर्चः के-शश्मश्रुलोमकण्डरादि तत् पार्थिवं गन्धो घ्राणं च यद्रवसरमन्दस्निग्धमृदुपिच्छिलं रस-, रुधिरवसाकफपित्त मूत्रस्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च यत् पित्तमूक्ष्मा च यो या च भाः शरीरे तत् सर्वमाग्नेयं रूपं दर्शनं च यदुच्छ्वासप्रश्वासोन्मेष निमेषाकुञ्चनप्रसारणगमनप्रेरग-धारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च यद्विविक्तं यदुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च यत् प्रयोक्त तत् प्रधानं बुद्धिर्मनश्व । इति शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनावयवानां निर्दिष्टा ॥ १६ ॥

( १ ) पार्थिव शारीरभाव - शरीर में जो विशेष कर स्थूल, स्थिर, मूर्तिमान्, गुरु, खर तथा कठिन अवयव है जैसे - नख, अस्थियाँ, दाँत, मांसपेशियाँ, त्वचा, पुरीप, केश, दाढ़ी और लोम एवं कण्डरा आदि अङ्ग है वे सभी और गन्ध एवं नासिका पर्थिव हैं । ( २ ) जलीय शारीर - भाव - जो द्रव्य द्रव, सर, मन्द, स्निग्ध, मृदु और पिच्छिल हैं जैसे— रस, रक्त, वसा, कफ, पित्त, मूत्र और स्वेद आदि वे सभी और रस एवं जिह्वा जलीय हैं । ( ३ ) तैजस शारीर भाव - जो शरीर में पित्त हैं, जो ऊष्मा ( गर्मी ) है जो शरीर में भा ( चमक ) हैं ये सभी और रूप एवं नेत्र आग्नेय है । ( ४ ) वातज शारीर भाव - जो शरीर में उच्छ्वास, निश्वास, उन्मेष निमेष ( नेत्र खोलना और बन्द करना ), आकुञ्चन ( किसी वस्तु को अपनी ओर खींचना ), प्रसारण ( फैलाना ), गमन, प्रेरण, धारण आदि क्रियायें है वे सभी और स्पर्श एवं स्पर्शन इन्द्रिय ( त्वचा ), वायवीय है । ( ५ ) आकाशीय शारीर भाव - जो शरीर में विविक्त ( छिद्र ) कहा जाता है वह और बड़े और छोटे सभी स्रोत, शब्द और कान ये सभी आकाशीय हैं । ( ६ ) जो प्रयोक्ता है अर्थात् इन सभी भावों को प्रयोग में लाता है वह ( आत्मा ) प्रधान है और इस शरीर में मन एवं बुद्धि उसके भाव है । इस प्रकार यथास्थूल ( मोटे - मोटे रूप से ) अवयवों के भेद से शरीर अवयव की संख्या का भेद बता दिया गया है ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1006

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शरीरसंख्याशारीराध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् ६१७ उपर्युक्त गद्य में वर्णित पञ्चमहाभूत तथा आत्मा के भाव जो शरीर में पाये जाते हैं उनका संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा है -पधात्वात्मक पुरुष के भाव आग्नेय पित्त वायवीय आन्तरिक्ष आत्मजभाव उच्छ्वास विविक्त अवयव बुद्धि " उष्मा प्रश्वास वचन ( चक्र ० ) मन भा ( कान्ति ) उन्मेष स्रोतस ( महत् एवं २ 93 निमेष अणु ) आकुञ्चन शब्द ५ प्रसारण गमन प्रेरण धारण स्पर्श श्रोत्र ५ पार्थिव स्थूल अवयव स्थिर गुरु नख " आप्य द्रव अवयव सर मृदु 33 पिच्छिल " रस १५ नूर्तिमद् " II II मन्द 23 रूप कठिन खर अंग " II I दर्शन अस्थि II III रुधिर दन्त II II चर्म III I केश II II स्वेद लोम I II रसन मांस कफ चर्च मूत्र स्पर्शन ११ श्मश्रु कण्डरा गन्ध घ्राण १८ शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसंख्येया भवन्ति, अतिबहुत्वादतिसौक्ष्म्यादतीन्द्रि यत्वाच्च । तेषां संयोगविभागे परमाणूनां कारणं वायुः कर्मस्वभावश्च ॥ १७ ॥

अवयवों की असंख्यता - ऊपर बताए हुए शरीर के अवयव परमाणु भेद से असंख्येय ( अनगिनत ) होते हैं, क्योंकि परमाणुओं की संख्या अतिबहु ( अधिकाधिक ) है, अतिसूक्ष्म बुद्धि से जानने योग्य है, अथवा इतने अधिक छोटे होते हैं कि उनका प्रत्यक्ष नहीं होता और ये परमाणु अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से जानने के अयोग्य ) होते हैं । उन परमाणुओं के संयोग एवं विभाग में वायु और कर्म एवं स्वभाव कारण होते हैं ॥ १७ ॥

विमर्श - आधुनिक जगत् शरीर के सूक्ष्मतम घटक को ( Cell ) सेल कहता है । जो विना सूक्ष्म निरीक्षण यंत्र से देख नहीं जा सकते । ये शरीर में बढ़ते - बढ़ते असंख्य हो जाते हैं और बाद में सेल समूह को ही पुरुष मान जाता है । यहाँ देह परमाणु को अति बहुत और सूक्ष्म एवं अतीन्द्रिय बताया है और इनको असंख्य भी बताया है । इस प्रकार आधुनिक Cell और प्राचीन देह परमाणु एक ही पर्याय वाचक शब्द हैं । परमाणुवादी वैशेषिक जो कि ' न प्रलयोऽणुसद्भावात् ' का सिद्धान्त मानता है वह भी प्रलय काल में अणु की सत्ता स्वीकार करता है । जब सृष्टि का पुनः निर्माण प्रारम्भ होता

पृष्ठ 1007

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६१८ चरकसंहिता तब वह भी अणु से ही प्रारम्भ होता है इस प्रकार दोनों विचारों में कुछ साम्यता प्रतीत होती है । तदेतच्छरीरं संख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः पृथक्त्वेनापवर्गः । तत्र प्रधा-नमसक्तं सर्वसत्तनिवृत्तौ निवर्तते इति ॥ १८ ॥

अङ्गावयव ज्ञान का प्रयोजन - अनेक अवयवों से युक्त यह शरीर बताया गया है, अर्थात् अवयव समूह को शरीर माना जाता है, इन अवयव समूहों को एकत्वेन देखना सङ्ग ( आसक्ति ) है । इन अवयवों को अलग - अलग देखना अपवर्ग ( मोक्ष ) है । प्रधान ( प्रकृति ) जब असक्त ( सङ्गरहित ) होता है तब सर्व- सन्तान की निवृत्ति होने पर, अर्थात् संयोग विभाग की परम्परा का नाश होने पर आत्मा की निवृत्ति अर्थात् मोक्ष हो जाता है ॥ १८ ॥

तत्र श्लोकौ -शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक् । तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते ॥ १ ९ ॥ अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते । निर्दोषो निःस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः ॥२० ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरसंख्याशारीरं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

और भी - • जो वैद्य सभी अवयवों के साथ शरीर - संख्या ( अवयव - समूह शरीर ) को जानता है वह अज्ञान के कारण ( शरीर को तत्त्वतः न जानने के कारण ) उत्पन्न मोह ( अज्ञान ) से युक्त नहीं होता । सभी प्रकार से शरीर तत्त्वों को जानने वाला अमूड ( विद्वान् ) अज्ञान के कारण होने वाले दोषों से अभिभूत नहीं होता और सभी शरीर तत्त्वों को भली प्रकार जान लेने पर ' सर्वे कारणवद् दुःखम् ' को समझ कर राग - द्वेष से रहित हो जाने पर निर्दोष, स्पृहारहित, शान्त और पुनर्जन्म शून्य होकर शान्त हो जाता है ॥। १ ९ -२० ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के शारीरस्थान में शरीरसंख्याशारीर नामक सातवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः अथातो जाति सूत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद जाऩिसूत्रीय शारीर की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - जाति का अर्थ है जन्म ( प्रसव ) यथा - ' जातिर्जन्म तस्याः सूत्रमधिकृत्य कृतमिति जातिसूत्रीयम् ' । इस अध्याय में बालक की गर्भ में जैसे रचना होती है रचनाकाल में स्त्री ( माता ) की स्थिति, प्रसव, प्रसवोत्तर कर्म आदि सभी बालक के उत्पत्ति - सम्बन्धी विषयों का वर्णन किया जायगा । १. ' सर्वसंताननिवृत्तौ ' इति पा ० ।

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जाति सूत्रीय शारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् १६ स्त्रीपुंसयोरव्यापन्नशुक्रशोणितगर्भाशययोः श्रेयसीं प्रजामिच्छतोस्तदर्थाभिनिर्वृत्तिकरं कर्मोपदेच्यामः ॥ ३ ॥

( १ ) गर्भाधान ( Conception ) प्रकरण श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति प्रकरण - श्रेष्ठ प्रजा ( सन्तान ) की इच्छा रखने वाले, अदूषित शुक्र, आर्तव और गर्भाशय, योनि वाले स्त्री - पुरुष के लिए, श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न करने वाले कर्मों का उपदेश किया जाता है || ३ | अथाप्येतौ स्त्रीपुंस स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य, वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृ-तिमापादयेत् । संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्; उपाचरेच मधुरौषधसंस्कृ-ताभ्यां घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमाषाभ्याम् ॥ ४ ॥

पूर्व कर्म 1- अब इसके बाद इन स्त्री - पुरुषों को विधिवत् स्नेहन तथा स्वेदन कराकर वमन और विरेचन द्वारा शरीर की शुद्धि कराकर बाद में प्राकृतिक आहार करने की अवस्था में लावें । जब शरीर शुद्ध हो जाय तत्र विधिपूर्वक आस्थापन और अनुवासन वस्ति दें और विशेष कर मथुर औषध से संस्कृत घृत और दुग्ध का सेवन पुरुष को करावें । स्त्री को उड़द और तिल के तेल का सेवन अधिक करावें ॥ ४ ॥

• ततः पुष्पात् प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधः शायिनी, पाणिभ्यामन्नमजर्जर -पाना, न च काञ्चिन्मृजामापद्येत । ततश्चतुर्थेऽहन्येनामुत्साद्य सशिरस्कं स्त्राप-यित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत् पुरुषं च । ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्यो-न्यमभिकामौ संवसेयातां खानात् प्रभृति युग्मेष्वहःसु पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृकामौ ॥५ ॥

ऋतुकाल में कर्तव्य - इस प्रकार शरीर को शुद्ध कर लेने के बाद जिस दिन रजःस्राव हो उसी दिन से तीन दिन तक ब्रह्मचारिणी रहे, अर्थात् अष्टमैथुन का परित्याग करते हुए ब्रह्मचर्य के पूरे नियमों का पालन करे, भूमि पर शयन करे, बिना टूटे फूटे पात्र में भोजन करती हुई तीन दिन व्यतीत करे, किसी भी प्रकार शरीर का शृङ्गार और शुद्धि न करे । चौथे दिन इस स्त्री के शरीर में उबटन लगाकर शिर से स्नान कराकर श्वेत वस्त्र धारण करावे और पुरुष भी श्वेत वस्त्र धारण कर ले | इस प्रकार स्त्री पुरुष दोनों सफेद वस्त्र धारण कर, माला पहन कर प्रसन्न मन होकर, मैथुन की इच्छा से स्त्री - पुरुष को और पुरुष स्त्री को चाहने वाला हो तब वैद्य उन दोनों को इस स्थिति में जान कर सहवास करने की आज्ञा दे । यदि स्त्री और पुरुष दोनों पुत्र की इच्छा रखते हों तो खान के दिन से युग्म दिनों में जैसे चौथे, छठे, आठवें, दशवें, वारहवें दिन और पुत्री की इच्छा रखते हों तो अयुग्म दिनों में जैसे पाँचवें, नवें, ग्यारहवें दिन सहवास करें ॥ ५ ॥

विमर्श -- यहाँ संक्षेप में रजस्वला का नियम मैथुन, की विधि और अपनी इच्छा से पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि बताई गई है । प्रथम तीन दिन तक मैथुन करने में सुश्रुत ने हानियाँ बनाई है, यथा- ' अथ तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनगमनमनायुष्यं पुंसां भवति यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विमुच्यते, द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, चतुर्थे तु सम्पूर्णाङ्गो दीर्घायुश्च भवति । तस्मान्नियमवतीं त्रिरात्रं परिहरेत् ' । इसका कारण इस प्रकार बताय है-' न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति यथा नद्यां प्रतिस्रोतः प्लावि द्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रति-निवर्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेव द्रष्टव्यम् । ' १. ' तन्निर्वृत्तिकरम् ' इति पा ० । २. ' अजर्जरपात्रे ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1009

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६२० चरकसंहिता नच न्युब्जां पार्श्वगतां वा संसेवेत । न्युब्जाया वातो बलवान् स योनिं पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा स च्युतः पिदधाति गर्भाशयं, वामे पार्श्वे पित्तं तदस्याः पीडितं विदहति रक्तं शुक्रं च तस्मादुत्ताना वीजं गृह्णीयात्; तथाहि यथास्थानमवतिष्ठन्ते दोषाः । पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत् 1 । तत्रात्यशिता चुधिता पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्यं च पुमांसमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा न गर्भ धत्ते, विगुणां वा प्रजां जनयति । अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा विकारेणोपसृष्टां वर्जयेत् । पुरुषेऽप्येत एव दोषाः । अतः सर्वदोपवर्जितौ स्त्रीपुरुषौ संसृज्येयाताम् ॥ ६ ॥

सहवास की विधि- स्त्री अधोमुख रहे पुरुष उसके ऊपर हो या पुरुष नीचे ऊर्ध्वमुख हो स्त्री ऊपर से अधोमुख हो, स्त्री के वाम पार्श्व से, या दक्षिण पार्श्व से, या पुरुष वाम पार्श्व या दक्षिण पार्श्व से शयन करके सहवास न करे । यदि स्त्री अधोमुख होकर सहवास में प्रवृत्त होती है तो वायु बढ़कर योनि में पीडा उत्पन्न करती है, जिससे सारे वातज योनि के रोग हो जाते है । यदि दक्षिण पार्श्व से शयन की हुई स्त्री सहवास में प्रवृत्त होती है तो कफ च्युत होकर गर्भाशय के मुख को बन्द कर देता है । यदि वाम पार्श्व से शयन की हुई स्त्रां सहवास में प्रवृत्त होती है तो पीडित पित्त रक्त ( आर्तव ) और शुक्र को जो सन्तान के मूल हैं, उनको विदग्ध कर देता है | अतः उत्तान शयन की हुई स्त्री सहवास क्रिया में रत होकर सन्तान के बीज स्वरूप शुक्र का ग्रहण करे । इस प्रकार उत्तान होकर सहवास करने से वात, पित्त और कफ ये दोष अपने - अपने स्थान में स्थित रहते हैं अतः कोई हानि नहीं होती । सहवास समाप्त हो जाने पर शीतल जल से स्त्री को स्नान कराना चाहिए । इन सबके ठीक होते हुए भी यदि स्त्री ने अधिक भोजन किया हो, भूखी हो, प्यासी हो, डरी हो, उसका मन घबड़ाया हुआ हो, शोक से व्याकुल हो, क्रोध की हुई हो, दूसरे पुरुष को चाहती हो अर्थात् पति से प्रेम न करती हो, सहवास की प्रबल इच्छा वाली न हो ऐसी स्त्री गर्भ को ग्रहण नहीं करती । यदि कथंचित् गर्भ धारण हो गया तो विकृत सन्तान उत्पन्न करती है । जो स्त्री अतिवाला हो, अतिवृद्ध हो, बहुत दिनों से रोगिणी हो, या अन्य किसी भी रोग से पीड़ित हो तो उसके साथ सहवास नहीं करना चाहिए । पुरुष भी इन दोषों से युक्त हो अर्थात् अधिक भोजन किया हो, भूखा हो, प्यासा हो, डरा हो, उद्विग्न हो, शोकग्रस्त हो, क्रोधयुक्त हो, स्त्री से प्रेम न करता हो अर्थात् अन्य स्त्रां में आसक्त हो, तो ऐसी दशा में पुरुष गर्भ धारण कराने में असमर्थ होता है । पुरुष की आयु बहुत कम हो, अतिवृद्ध हो, चिररोगी हो या किसी भी रोग से पीड़ित हो तो सहवास का त्याग कर दे । अतः उत्तम सन्तान के इच्छुक स्त्री और पुरुष इन सभी दोषों से रहित होकर सहवास में प्रवृत्त हों ॥ ६ ॥

विमर्श - सहवास में बहुत से आसनों का विधान कामशास्त्र में बताया है, पर वह विभिन्न प्रकार के आनन्द के लिए केवल विषयी पुरुषों के लिए है, सन्तानोत्पत्ति की दृष्टि से वे आसन त्याज्य हैं, अत: उन आसनों का सकारण त्याग यहाँ बताया गया है । संजातहर्षौ मैथुने चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्ण सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितम-शनमशिवा नात्यशितौ दक्षिणपादेन पुमानारोहेद् वामपादेन स्त्री ॥ ७ ॥

और भी - जब स्त्री और पुरुष सहवास के लिए अनुकूल हों और मैथुन के लिये उन दोनों के शरीर और मन में हर्ष हो तब प्रिय गन्धों से युक्त, सुखकारक विछौने को खाट पर बिछा कर मन के अनुकूल हित ( पुरुष घृत - मधुर प्रधान, स्त्री तैल, उड़द प्रधान ) भोजन करे परन्तु - भोजन मात्रा से अधिक न करे ये ऐसा पुरुष दक्षिण पैर से तथा स्त्री वाम पैर से खाट पर-भारोहण करें ॥ ७ ॥

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जातिसूत्रीय शारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् तत्र मन्त्रं प्रयुञ्जीत -६२१ ' अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि धाता त्वा दधातु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भव ' इति । गर्भ! तुम ( अहि ) सूर्य के समान हो, तुम मेरी आयु हो तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो, धाता ( सबके पोषक ईश्वर ) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता ( विश्व के निर्माता ब्रह्मा ) तुम्हारी रक्षा करें । तुम ब्रह्म तेज से युक्त होओ । ' ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ । भगो s थ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम् ' ब्रह्मा, वृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनी कुमार और मित्रावरुण जो दिव्य शक्ति रूप हैं

वह मुझे वीर पुत्र प्रदान करें ।

इत्युक्त्वा संवसेयाताम् ॥ ८ ॥

खाट पर चढ़ कर पहले ' अहिरसि ', तब ' ब्रह्मा बृहस्पति ', ये दोनों मन्त्र पढ़ कर सहवास करे ॥ ८ ॥

* सा चेदेवमाशासीत - बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विनं शुचिं सत्वसंपन्नं पुत्रमिच्छेय-मिति, शुद्धस्नानात् प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिभ्य संसृज्य श्वेताया गोः सरूप-वत्सायाः पयसा ss लोड्य राजते कांस्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सततं प्रयच्छेत् पानाय । प्रातश्च शालियवान्न विकारान् दधिमधुसर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायम-वदातशरणशयनासनपानवसनभूषणा च स्यात् । सायं प्रातश्च शश्वच्छ्रतं महान्तं वृषभ-माजाने वा हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत् । सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोनुकूलाभिरुपासीत । सौम्याकृतिवचनोपचारचेष्टांश्व स्त्रीपुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत् । सह-चर्यश्चैनां प्रियहिताभ्यां सततमुपचरेयुस्तथा भर्ता । न च मिश्रीभावमापद्येयातामिति । अनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं सह भर्त्रा अहतानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि, अवदाताश्च स्रजो भूषणानि च बिभृयात् ॥ ९ ॥

( २ ) गर्भ एवं गर्भिणीचर्या प्रकरण ( Care of Product of Conception & Pregnant Women ) उत्तम सन्तान के लिए कर्तव्य यदि वह स्त्री चाहती हो कि मेरा पुत्र विशाल एवं पुष्ट शरीर वाला, अवदात ( गौर ) वर्ण वाला, सिंह के समान पराक्रमी, ओजस्वी, पवित्र मन वाला हो, तब आर्तव स्राव के चौथे दिन स्नान कर लेने पर शुद्ध शरीर होने के दिन से लेकर, सफेद जौ के मन्थ ( सत्तु ) को मधु और घृत में मिलाकर सफेद बछड़े वाली सफेद गौ के ही दूध में उसे आलोडित ( घोल ) कर चाँदी या कांसे के सफेद पात्र में रख कर समय - समय पर पीने के लिये सात दिन तक उस स्त्री को दे । प्रातःकाल वह स्त्री चावल या जौ के विभिन्न भोज्य पदार्थों को दही, घृत और मधु के साथ, या श्वेत बच्चे वाली श्वेत गौ के दूध के साथ भोजन करे । सायंकाल भी इसी प्रकार भोजन करे । वह स्त्री श्वेत वर्ण ( चूने से पोते हुए ) वाले घर में रहे, सफेद धुले हुये विछौना ( चादर ), आसन ( बैठने का स्थान ), सफेद सवारी, वस्त्र और आभूषण को धारण करे | सायंकाल और प्रातः काल प्रतिदिन सफेद बड़ा बैल, घोड़ा, सफेद चन्दन, सफेद अङ्गद, ( विजाईठ आभूषण जो बाहु में पहना जाता है ) को देखे । उस स्त्री के आस - पास रहने १. ' पुत्रं वीरं दधातु मे ' इति पा ० ) -