चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1011–1020

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1011–1020

पृष्ठ 1011

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६२२ चरकसंहिता वाले परिचारक वर्ग को चाहिये कि मन के अनुकूल सुन्दर - सुन्दर कथाओं से उसके मन को प्रफुल्लित रखें । जिन स्त्री और पुरुषों की आकृति, वचन, उपचार ( व्यवहार ), चेष्टाएँ सौम्य हों उनको, तथा और भी अन्य सौम्य इन्द्रियार्थों को ही वह स्त्री सदा देखे । उस स्त्री की सहेलियाँ उस स्त्री के लिये जो प्रिय और हितकर हो ऐसा ही व्यवहार उसके साथ करें । इस सात दिन के अन्दर मैथुन न करें । इस विधि से सात दिन बिता कर आठवें दिन पति के साथ जल में शिर से स्नान कर, सफेद नूतन जो कहीं से फटा न ऐसा वस्त्र और सफेद माला एवं सफेद ही आभूषणों को धारण करें ॥ ९ ॥

तत ऋत्विक् प्रागुत्तरस्यां दिश्यगारस्य प्राक्प्रवणमुदक्प्रवणं वा प्रदेशमभिसमीच्य, गोमयोदकाभ्यां स्थण्डिलमुपलिप्य, प्रोदय चोदकेन, वेदीमस्मिन् स्थापयेत् । तां पश्चि-मेनाहतवस्त्रसंचये श्वेतार्षभे वाऽप्यजिन उपविशेद् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वैयाघ्रे चर्मण्यानडुवा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे वास्ते वा । तत्रोपविष्टः पालाशीभिरेङ्गुदीभिरौ-दुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुशैः परिस्तीर्य, परिधिभिश्च परिधाय, लाजैः शुक्लाभिश्च गन्धवतीभिः सुमनोभिरुपकिरेत् । तत्र प्रणीयोदपात्रं पवित्रपूतमुप-संस्कृत्य सर्पिराज्यार्थं यथोक्तवर्णानाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत् ॥ १० ॥

और -भी इसके बाद ऋत्विक् गृह के पूर्व या उत्तर दिशा में जो भूमि पूर्व या उत्तर की और निम्न हो ऐसी भूमि को देख कर पूजन करने योग्य भूमि को गोवर और जल से लीप कर जल से भूमि का प्रोक्षण कर उसी भूमि पर वेदी की स्थापना करे । यदि यजमान ब्राह्मण हो तो ऋत्विक् उस वेद के पश्चिम भाग में बिना फटे ( नूतन ) वस्त्र के समूह से बनाये हुये आसन पर या इवेत बैल के चर्म के आसन पर बैठे । यदि क्षत्रिय पुत्रेष्टि यज्ञ करना चाहता है तो ऋत्विक् व्याघ्रचर्म या बैल के चर्म के आसन पर बैठे । यदि यजमान वैश्य है तो ऋत्विक् मृगचर्म या बकरे के चर्म के आसन पर बैठे । जाति क्रम से उन - उन आसनों पर बैठ कर ऋत्विक् पलाश, इङ्गुदी ( हिंगोट, तापसवृक्ष ) गूलर, या महुआ की समिधाओं ( लकडियों ) से अग्नि का उपसमाधान कर ( लाकर ) अर्थात् वेदी के ऊपर अग्नि की स्थापना कर कुशाओं को चारों दिशायों में विछाकर, वेदी को परिधि ( चारों कोने पर से सजाकर धान का लावा और सुगन्धित, श्वेत पुष्प वेदी के से ही पवित्र मन्त्र से शुद्ध किया हुआ, संस्कार किया हुआ हुआ जल पात्र और होम करने के लिये मन्त्र - पूत घृत वेदी के चार पलाश के दण्डे गाड कर आस - पास विखेर दे । तब स्वभाव अर्थात् मांज धोकर स्वच्छ किया पास रखे । सुन्दर - सुन्दर घोड़े आदि को जाति के अनुसार या पुत्र को चाहने वाली आकृति के अनुसार श्वेत वर्ण, श्याम वर्ण, काले वर्ण के घोड़े और अन्य आवश्यक सामग्रियों को जिससे वेदी को सजाना हो उसे चारों तरफ रखे ॥ १० ॥

ततः पुत्रकामा पश्चिमतोऽग्निं दक्षिणतो ब्राह्मणमुपविश्यान्वालभेत सह भर्त्रा यथेष्टं पुत्रमाशासाना । ततस्तस्या आशासानायः ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्याः कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टिं निर्वर्तयेद् ' विष्णुर्योनिं कल्पयतु ' इत्यनयच । ततश्चैवाज्येन स्थालीपाकमभिधार्यं त्रिर्जुहुयाद्यथाम्नायम् । मन्त्रोपमन्त्रितमुदपात्रं तस्यै दद्यात् सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति । ततः समाप्ते कर्मणि पूर्व दक्षिणपादमभिहन्ती प्रदक्षिणमग्नि-मनुपरिक्रामेत् सह भर्त्रा । ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वाऽऽज्यशेषं प्राश्नीयात् पूर्व १. ' ततोऽनुपरिक्रम्य ' इति पा ० । २. ' सह भर्त्राऽऽज्यशेषम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1012

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जाति सूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६२३ पुमान् पश्चात् स्त्री; न चोच्छिष्टमवशेषयेत् ततस्तौ सह संवसेयातामष्ट्ररात्रं, तथावि धपरिच्छदावेव च स्यातां, तथेष्टपुत्रं जनयेताम् ॥ ११ ॥

पुत्रेष्टियज्ञ - इसके बाद पुत्र को चाहने वाली, और अपने मन के अनुकूल पुत्रोत्पत्ति की आशा रखने वाली स्त्री पति के साथ, अग्नि के दक्षिण भाग में ब्रह्मा को बैठाकर स्वयं अग्नि के पश्चिम भाग में बैठे और ऋत्विक जैसी आज्ञा दे उसका पालन उसी रूप में करे | तब अपने मन के अनुकूल पुत्रोत्पत्ति की आशा रखने वाली उस स्त्री की योनि में प्रजापति का निर्देश कर, उस स्त्री के मनोरथ की पूर्ति के लिए ' विष्णुर्योनिं ' इस ऋचा ( मन्त्र ) से ‘ काम्य इष्टि ’ ( पुत्रेष्टि यज्ञ ) प्रारम्भ करे । उसके वाद स्थालीपाक किए हुए चर को संस्कार किए हुए. घृत से मिलाकर तीन आहुति दें । यथाशास्त्र अर्थात् जिसका जो वेद हो, शाखा हो उस वेद और शाखा में बनाए हुए मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके, पहले का लाया हुआ जल का पात्र उस स्त्री को दे दे । और उससे कह दें कि जो भी जल का कार्य हो वह कार्य इसी जल द्वारा करना । जब यज्ञ कर्म समाप्त हो जाय तत्र सर्वप्रथम दक्षिण पैर को उठाकर चलती हुई अग्नि की प्रदक्षिणा करे पर प्रदक्षिणा करते समय अपने दक्षिण भाग में अग्नि रहे इसका भी ध्यान रखे । इसके बाद ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर हवन से बचे हुए घृत को पति के साथ स्त्री प्राशन करे अर्थात पीए, पर पहले पति पीए बाद में स्त्री पीए, पात्र में उच्छिष्ट ( जूला ) घृत न छोड़े । इसके बाद दोनों स्त्री - पुरुष आठ दिन तक प्रतिदिन सहवास करे और जैसे पुत्र की इच्छा हो उसी प्रकार का खान पान, वस्त्र आदि का व्यवहार दम्पति करें । इस प्रकार कार्य करने से मन के अनु-कूल पुत्र उत्पन्न होता है ॥ ११ ॥

या तु स्त्री श्यामं लोहितानं व्यूढोरस्कं महाबाहुं च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्णमृदुदीर्घकेशं शुक्काक्षं शुकदन्तं तेजस्विनमात्मवन्तम; एष एवानयोरपि होमविधिः । किन्तु परिबर्हो वर्णवर्जं स्यात् । पुत्रवर्णानुरूपस्तु यथाशीरेव तयोः परिबर्होऽन्यः कार्यः स्यात् ॥१२ ॥

मनोनुकूल पुत्रोत्पत्ति के उपाय - जो स्त्री श्यामवर्ग, रक्त नेत्र वाले, चौड़ी और ऊँची छाती वाले, लम्बी बाहु वाले पुत्रोत्पत्ति की आशा रखती है, या जो स्त्री काले, तथा काले, कोमल और लम्बे केश वाले, श्वेत नेत्र वाले, श्वेत दांत वाले, तेजस्वी और जितेन्द्रिय पुत्र उत्पन्न करने की आशा रखती है, उसके लिए भी होम करने की यही विधि है । किन्तु परिवई अर्थात् आसनों में परिवर्तन किया जाता है । जिस प्रकार के गौर, श्याम, और कृष्ण आदि वर्ण की सन्तान की इच्छा करती है उसी के अनुसार श्वेत, श्याम और कृष्ण रूप वाले पान, अशन, बसन, भूषण, गृह, शयन आदि का सेवन किया जाता है अर्थात् आसनादि को छोड़कर शेष सभी विधियाँ एक - सी ही होती हैं ॥ १२ ॥

शूद्रा तु नमस्कारमेव कुर्यात् ( देवग्निद्विजगुरुतपस्विसिद्धेभ्यः ) ॥ १३ ॥

औरभी यदि शूद्र की स्त्री है तो अपनी इच्छा के अनुसार पुत्रोत्पत्ति होने के लिए पुत्र के गौर, श्याम, कृष्ण वर्ण और वीरता आदि गुणयुक्तता को ध्यान में रखकर और उसी के अनु-सार खान, पान, वस्त्र, आभूषण, घर, शयन आदि को अपने व्यवहार में लाती हुई देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, तपस्वी और सिद्धों को नमस्कार मात्र करे ॥ १३ ॥

या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां तां पुत्राशिषमनुनिशम्य तांस्ता-१. ' स्यातामि'ति हस्तलिखित पुस्तके न पठ्यते । २. योगीन्द्रनाथ से नस्त्वमुं पाठं न पठति ।

पृष्ठ 1013

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२४ चरकसंहिता ञ्जनपदान्मनसाऽनुपरिक्रामयेत् । ततो या या येषां येषां जनपदानां मनुष्याणामनुरूप पुत्रमाशासीत सा सा तेषां तेषां जनपदानां मनुष्याणामाहारविहारोपचारपरिच्छ-दाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात् । इत्येतत् सर्वं पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातं भवन्ति ॥ १४ ॥

और भी - जो स्त्री जिस प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने की आशा करती ही, उस स्त्री की उस प्रकार की पुत्रेच्छा को सुनकर जिस देश के अनुसार पुत्र की इच्छा स्त्री करे उस देश का मन से ध्यान करने को वैद्य कहे । उन उन देशों को मन में ध्यान कर जो स्त्रो जिन - जिन देश के मनुष्यों के अनुसार पुत्र उत्पन्न करने की आशा करे उस स्त्री से उन उन देशों के आहार - विहार, उपचार और परिच्छदों ( वस्त्र, वात - चीत, कथा, इतिहास आदि ) का सेवन करो ऐसा वैद्य च. हे । इस प्रकार पुत्र की इच्छाओं के समृद्धिकर ( प्राप्तिकर ) कर्म की व्याख्या हो गयी ॥ १४ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि स्त्री का मन जिस प्रकार की वस्तु की ओर आकर्षित होता है । उसी प्रकार की सन्तति को वह स्त्री जन्म देती है, यथा- ' गर्भोपपत्तौ तु मनः स्त्रियायं जन्तुं व्रजेत्तत्सदृशं प्रसूते ' ( शा. अ. २ ) । अतः यदि वीर, धार्मिक, धनी, मानी, सुन्दर पुत्र की इच्छा करे तो जिस देश में वीर, धार्मिक आदि मनुष्य रहते हैं उस देश का और उस देश के आहार - विहार का सेवन करे और वैसे ही पुरुषों का ध्यान और उनके समान आचरण करे । न खलु केवलमेतदेव कर्म वर्णवैशेष्यकरं भवति । अपि तु तेजोधातुरप्युदकान्त-रिक्षधातुप्रायोऽवदातवर्णकरो भवति, पृथिवीवायुधातुप्रायः कृष्णवर्णकरः, सर्व-धातुप्रायः श्यामवर्णकरः ॥ १५ ॥

पञ्च महाभूत की रूपोत्पत्ति में कारणता - केवल ये ऊपर बताए हुए कर्म ही वर्ण ( रूप ) विशेष की उत्पत्ति में कारण नहीं हैं किन्तु तेज ( पित्त ) धातु एवं जल और आकाश धातु प्रायः गौर वर्ण कारक होते हैं अर्थात् जब तेज, जल और आकाश में मिल जाता है तब गौर वर्ण की सन्तान उत्पन्न करता है । जब तेज, पृथिवी और वात धातु प्रधान होता है तब काले वर्ण की सन्तान उत्पन्न करता है । जब समरूप से सभी आकाश, वायु, और जल पृथिवी धातु से मिलते हैं तब श्याम वर्ण की सन्तान उत्पन्न होती है ॥ १५ ॥

विमर्श - यहाँ १. गौर, २. कृष्ण, ३. श्याम ये तीन वर्ण शरीर में तेज के कारण होते हैं यह बताया गया है । पर इन्द्रिय स्थान में - ' कृष्णः, कृष्णश्यामः, श्यामावदातोऽवदातश्चेति प्रकृति-वर्णाः शरीरस्य भवन्ति । ( अ. १ ) से ४ वर्ण बताया है । सुश्रुत ने भी - ' स ( तेजः ) यदा गर्भोत्य-तावन्धातुप्रायो भवति तदा गर्भ गौरं करोति, पृथिवीधातुप्रायः कृष्णं पृथिव्याकाशधातुप्रायः कृष्ण-श्यामं, तोयाकाशधातुप्रायो गौरश्याममिति ' ( शा. अ. २ ) से ४ वर्ष ही माना है, अर्थात् श्याम का दो भाग किया है गौरश्याम और कृष्णश्याम । चरक ने जल, आकाश की प्रधानता से और सुश्रुत ने केवल जल की प्रधानता से गौर वर्ण की उत्पत्ति मानी है । आकाश जल की प्रधानता से गौरश्याम, पृथिवी आकाश की प्रधानता से कृष्णश्याम वर्ण की उत्पत्ति सुश्रुत ने मानी है । सत्ववैशेप्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्वस्याः श्रुतय-वाभीषणं स्वोचितं च कर्म सच्चविशेषाभ्यासश्चेति ॥ १६ ॥

मन की विशेषता में कारण सन्तानों में मन उन - उन प्राणियों के माता और पिता के मन के गुणों से युक्त होता है । गर्भिणी स्त्री जिस प्रकार की कथा वार्ता बार - बार सुनती है उसी १. ' ताननुपरिक्रम्य ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1014

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जाति सूत्रीय शारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् ६२५ कथा के अनुरूप बालक का मन होता है क्योंकि बार - बार कथा वार्ता से माना का मन तद्रूप हो जाता है और माता के मन के समान ही वालक का मन होता है । पूर्वजन्म में जैसा कर्म कर आए हैं उसके अनुसार मन की कल्पना शरीर में की जाती है । जैसा अभ्यास किया जाता है उसके अनुसार सात्त्विक, राजस और तामस मन होता है ॥ १६ ॥

विमर्श - गर्भावस्था में बालक का मन माता - पिता के मन से, गर्भिणी के राजस और ताम्स कथाओं को सुनने से तथा जन्मान्तर में किए गए कर्मों के बार - बार सात्त्विक, आधार पर बनता हैं! जन्मोत्तरकाल में जैमी उसकी सङ्गति होती है, जिन सात्विक, राजस, तामस कार्यों का वह, बार - बार स्त्रयं अभ्यास करता है, उन्हीं अभ्यास किये हुये गुणों के अनुसार उसका मन हो जाता है अथवा जन्मान्तर में जिस गुण का बार - बार अभ्यास किये रहता है उसी गुग के अनुसार जन्मान्तर में गर्भावस्था में ही मन हो जाता है, जैसा कि बताया है- ' जन्मजन्म यदभ्यस्तं दान-मध्ययनं तपः । तेनैवाभ्यासयोगेन तच्चाप्यभ्यस्यते पुनः ॥ ' इस प्रकार गर्भावस्था में ही बालक में जैसा मन बन जाता है वही मन सदा बना रहता है, उसका परिवर्तन कभी नहीं होता । इसीलिए कहा है- ' न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनाम् । स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः ॥ ' पर जन्म-जन्मान्तर में अच्छे या बुरे कर्म का जो अभ्यास है, सङ्गति के द्वारा उस नित्य अभ्यस्त गुण में अश्रद्धा होती हैं और विपरीत गुण में श्रद्धा होती हैं । उस श्रद्धा के साथ जब प्राणान्त होता है तो उमी श्रद्धा के अनुसार मन अच्छा या बुरा होता है, यथा - वं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ' अतः अभ्यास के द्वारा भी मन अच्छा या बुरा बनाया जा सकता है किन्तु इसमें जन्म - जन्मान्तर का अभ्यास काम करता है । * यथोक्तेन विधिनोपसंस्कृतशरीरयोः स्त्रीपुरुषयोर्मिंश्रीभावमापन्नयोः शुक्रं शोणितेन सह संयोगं समेत्याव्यापन्नमव्यापन्नेन योनावनुपहतायामप्रदुष्टे गर्भाशये गर्भमभिनि-वर्तयत्येकान्तेन । यथा - निर्मले वाससि सुपरिकल्पिते रञ्जनं समुदितगुणमुपनिपातादेव रागमभिनिर्वर्तयति, तद्वत् यथा वा क्षीरं दनाऽभिषुतमभिषवणाद्विहाय स्वभावमापद्यते दधिभावं शुक्रं तद्वत् ॥ १७ ॥

शुक्र का गर्भ में परिणमन पूर्व में बताए हुए नियमों के अनुसार विधिपूर्वक शरीर का संस्कार करके स्त्री और पुरुष के सहवास करने पर जब दोषरहित आर्तव के माथ दोषरहित शुक्र मिलता है और योनिमार्ग दोषरहित रहता है एवं गर्भाशय में भी कोई विकृति नहीं रहती तो अवश्य हो गर्भ रह जाता है । जिस प्रकार अच्छे प्रकार से निर्मल ( स्वच्छ ) बनाये हुए वस्त्र पर सम्पूर्ण गुणों से युक्त रङ्ग जब डाला जाना है तब उस वस्त्र पर अवश्य उत्तम रंग चढ़ जाता है । अथवा जैसे दही स अभियुत ( मिला हुआ ) दूध, दही से मिश्रित होने पर अपना स्वभाव छोड़ कर दही बन जाता है उसी प्रकार वीर्य भी आर्तव से मिश्रित होकर अपने स्वरूप को छोड़ कर गर्भ वन जाता है ॥ १७ । विमर्श - १. शुद्ध शुक्र. २. शुद्ध आतंत्र, ३. शुद्ध योनि, ४. शुद्ध गर्भाशय के होने पर जीव का अवक्रमण अवश्य होता है । यदि इसमें किसी एक में भी विकृति हो जाती है तो गर्भात्पत्ति नहीं होती । एवमभिनिर्वर्तमानस्य गर्भस्य स्त्रीपुरुषत्वे हेतुः पूर्वमुक्तः । यथा हि वीजमनुपतप्तमुतं स्वां स्वां प्रकृतिमनुविधीयते व्रीहिर्वा व्रीहित्वं यवो वा यवत्वं तथा स्त्रीपुरुषावपि यथोक्तं हेतु विभागमनुविधीयेते ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1015

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६२६ चरकसंहिता स्त्री - पुरुष की उत्पत्ति में उदाहरण - इस प्रकार उत्पन्न होने वाले गर्भ में स्त्री और पुरुष होने का जो कारण है वह पहले कहा जा चुका है । जैसे दोषरहित सुन्दर बीज यदि खेत में बोया जाय तो वह अपनी - अपनी प्रकृति के अनुसार धान से धान, जौ से जौ रूप में अंकुरित होता है, वैसे ही स्त्री और पुरुष ये दोनों हेतु के अनुसार विभक्त होते हैं ॥ १८ ॥

विमर्श - -- स्त्री - पुरुष की उत्पत्ति में कारण पहले बताया गया है, देखें पृष्ठ ८४० । तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयुक्तेन सम्यक् । कर्मणां हि देशकालसंपदुपेतानां नियतमिष्टफलत्वं तथेतरेषामितरत्वम् । तस्मादापन्नगर्भा स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्तीभावाद्गर्भस्य पुंसवनमस्यै दद्यात् । पुंसवन संस्कार — उपर्युक्त दोनों में आयुर्वेद में बताए हुए कर्मों के सदनुष्ठान द्वारा तब तक परिवर्तन किया जा सकता है, जब तक गर्भ में स्त्रीलिङ्ग, पुंलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग की अभिव्यक्ति नहीं हो जाती । देश काल का विचार कर और देश काल की अनुकूलता देख कर आयुर्वेदोक कर्मों का समुचित प्रयोग करने पर अभीष्ट फल को प्राप्ति होती है । यदि यही कर्म अनुचित देश और अनुचित समय में किया जाय तो अनिष्ट फल होता है । इसलिए स्त्री गर्भवती हो गई है यह जान कर जब तक गर्भ में स्कोलिंग आदि की अभिव्यक्ति नहीं हुई हो, उसके पूर्व गर्भिणी को पुंसवन का प्रयोग कराया जाता है । विमर्श - ' पुमान् सूयते अनेन कर्मणा इति पुंसवनं कर्म ' अर्थात् जिस कर्म के द्वारा गर्भ में ही स्त्रीलिङ्ग का परिवर्तन कर पुरुष उत्पन्न किए जाते हैं, उस कर्म का नाम पुंसवन है । इसका प्रयोग गर्भधारण की निश्चित तिथि से दो मास तक किया जाता है, द्वितीय मास में घन पेशी और अर्बुद से पुंलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग की व्यक्तता प्रारम्भ हो जाती है । Chromosomes पर आजकल महत्त्वपूर्ण अनुसन्धान कार्य चल रहा है । आयुर्वेदोक्त पुंसवन कर्म का परीक्षण करने पर सम्भवतः इस दिशा में प्रकाश पड़े । अतएव इस दिशा में अनुसन्धान अपेक्षित है । गोष्ठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागुत्तराभ्यां शाखाभ्यां शुङ्गे अनुपहते आदाय द्वाभ्यां धान्यमाषाभ्यां संपदुपेताभ्यां गौरसर्षपाभ्यां वा सह दनि प्रक्षिप्य पुष्येण पिबेत्, तथैवा-पराञ्जीवकर्षभकापामार्ग सहचरकल्कांश्च युगपदेकैकशो यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्स्यं वोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्येण पिबेत्, तथा कनकमयान्, राजताना-यसांश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान् दनि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशेषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शालिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाघ्राय तस्यैव च पिष्टस्योदक-संसृष्टस्य रसं देहल्यामुपनिधायें दक्षिणे नासापुटे स्वयमासिञ्चेत् पिचुना । यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा स्त्रियः पुंसवनमिष्टं तच्चानुष्ठेयम् । इति पुंसवनानि ॥ १ ९ ॥ और भी - गौशाला में या चरती हुई गौयें जहाँ विश्राम करती हैं ऐसे स्थान में उत्पन्न हुये वट वृक्ष की पूर्व और उत्तर दिशा में गई दो शाखाओं के दो अनुपहत ( जो किसी भी प्रकार से विकृत न हो ) शुङ्ग ( टूसा ) लेकर रस - वीर्य से युक्त अविकृत दो उरद या रस - गुण - वीर्य से युक्त दो पीले सरिसों दही से पीस कर पुष्य नक्षत्र में स्त्री पीवे । इसी तरह अन्य जीवक, ऋषभक, अपामार्ग ( चिचिरी ), सहचर ( कटसरैया - पियावासा ) इन सभी द्रव्यों का या अलग-अलग एक - एक द्रव्य को अथवा जितना मिल सके या जिनका प्रयोग करना अभीष्ट हो उनका १. ' विवर्तनम् अन्यथात्वेन प्रवर्तनम् ' इति ग ० । २. ' देहलीमुपधाय ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1016

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जाति सूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६२७ कल्क बना कर दूध में मिला या पकाकर पुष्य नक्षत्र में पीवे । ये सभी द्रव्य गोष्ठ में ही उत्पन्न लेना चाहिए | कुड्यकीटक या एक शकरी ( सिधरी ) मछली को एक अञ्जलि जल में डाल कर पुष्य नक्षत्र में पीवे । ( कुड्य कीटक एक प्रकार का कीड़ा है जो घरों के कोने में गीली मिट्टी से अपना विना दरवाजे का बन्द घर बनाता है और उसके भीतर अन्य जीवित कीड़ों को चुन देता हैं । उसे विहार में ' घिनही ' कहते है । ऐसी किंवदन्ती है कि परिवार में यदि कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसमें ये कीड़े अवश्य अपना घर बनाते हैं और उस घर को नष्ट करने की आज्ञा वृद्धा स्त्रियाँ नहीं देतीं ) अथवा सुवर्णं या रजत ( चाँदी ) या लोहे की एक अत्यधिक छोटी पुरुषाकार प्रतिमा बना कर उसे अग्नि में तपावे । जब वह लाल वर्ण की हो जाय तब दही, दूध या एक अञ्जलि जल में छोड़ कर पुष्य नक्षत्र में सारा दही या दूध या जल प्रतिमा के साथ पी जाय कुछ भी शेष न छोड़े । पुष्य नक्षत्र में ही चावल के आटे को जल में पकावें । उससे जो ऊष्मा ( भाप ) निकले उसे स्त्री स्त्रयं सूंघे । इसके बाद पकते हुए उस आटे के साथ जल लेकर उसमें रुई का फाहा बना कर डाले । अपनी गरदन को देहली ( चौखट ) पर ऐसा रखे कि शिर पीछे की ओर लटक जाय । तब स्त्री स्वयं अपने हाथ से रुई का फाहा जो उस आटे के जल से तर है उसे दक्षिण नासा पुट में निचोड़ दे । इसके अतिरिक्त और भी जो गर्भ - परिवर्तन का उपाय ब्राह्मण या आप्तस्त्रियाँ बतावै, पुंसवन माना जाता है और उन सबका अनुष्ठान ( प्रयोग ) करना चाहिए । इस तरह पुंसवन विधियाँ समाप्त हुई ॥ १ ९ ॥ विमर्श -- सुश्रुत में भी पुंसवन क्रिया का वर्णन है, यथा - ' लब्धगर्भायाश्चैतेष्वहःसु लक्ष्मणा-चटशुङ्गसहदेवाविश्वदेवानामन्यतमं क्षीरेणाभिषुत्य त्रींश्चतुरो वा बिन्दून् दद्याद्दक्षिणनासापुटे पुत्र-कामायै न च तान्निष्ठीवेत् ' ( शा. अ. २ ), पर संक्षेप में है । ' एतेष्वहः सु ' कथन से यह स्पष्ट है कि पुंसवन का उपदेश सहवास के बाद गर्भ धारण हो जाने पर किया गया है अतः व्यक्त होने के पूर्व ही करना सुश्रुत को भी अभीष्ट है । अत ऊर्ध्वं गर्भस्थापनानि व्याख्यास्यामः - ऐन्द्री ब्राह्मी शतवीर्या सहस्रवीर्याम घाव्यथा शिवाऽरिष्टा वाट्यपुष्पी विष्वक्सेनकान्ता चेत्यासामोषधीनां शिरसा दक्षि मोन वा पाणिना धारणम्, एताभिश्चैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानम्, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नानं सदा च ताः समालभेत । तथा सर्वासां जीवनीयोक्तानामोषधीनां

सदोपयोगस्तैस्तैरुपयोगविधिभिः । इति गर्भस्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ २० ॥

गर्भस्थापक औषधियाँ - अब इसके बाद गर्भस्थापक औषधियों की व्याख्या कर रहे हैं । १. ऐन्द्री, २. ब्राह्मी, ३ शतवीर्या - शतावर या नीलदूर्वा, ४. सहस्रवीर्या - महाशतावर या श्वेतदूर्वा, ५. अमोवा - पाटला, ६. अन्यथा - गुरुची या गोरखमुण्डी, ७. शिवा - हरीतकी या हरदी, ८. बला - वरियरा का मूल, ९. अरिष्टा- नागवला, १०. वाट्यपुष्पी - महाबला, ११. विष्वक्सेन-कान्ता - वाराहीकन्द या प्रियङ्गु, इन ग्यारह औषधियों को शिर पर या दक्षिण हाथ में ( बाँध कर ) धारण करे | इन्हीं औषधियों से सिद्ध किये हुए दूध या घृत का पान करना चाहिए । इन्हीं औषधियों से पकाए हुए जल से प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में स्नान करना चाहिए । इस प्रकार इन औषधियों का प्रयोग सदा प्रत्येक कार्य में करे और धारण करे । जैसे इन औषधियों के धारण आदि प्रयोग बताये गये हैं उसी तरह जीवनीयगण में बताये हुये सभी औषधियों के प्रयोग सर्वदा करना चाहिए । इस प्रकार यह गर्भस्थापक औषधियों की व्याख्या हो गई ॥ २० ॥

१. ' सदा चैताभिः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1017

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६८ चरकसंहिता विमर्श - ऊपर बताई ११ औषधियाँ गर्भस्थापक हैं । इनका प्रयोग आर्तव स्त्राव के चौथे दिन से लेकर १६ दिन तक किया जाता है । इससे गर्भ धारण होता है । गर्भ धारण होने के बाद इनका प्रयोग गर्भ को स्थिर करता है । किसी भी कारणवश गर्भ का स्राव होने लगे तब भी इनका प्रयोग गर्भस्थापक होता है और गर्भाशय एवं योनि को दुर्बलता को दूर करता है । ये ही औषधियाँ प्रजास्थापन के नाम से सूत्रस्थान के चौथे अध्याय में आई हैं वहाँ दश औषधियाँ ' दशैमानि प्रजास्थापनानीति ' से बतायी गई है । * गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति; तद्यथा - उत्कट विषमकठिनासन सेविन्या वात-मूत्रपुरीषवेगानुपरुन्धत्या दारुणानुचितव्यायामसेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याः प्रमि-ताशनसेविन्या गर्भो म्रियतेऽन्तः कुक्षेः, अकाले वा स्रंसते, शोषी वा भवति तथाऽभि-घातप्रपीडनैः श्वभ्रकूपप्रपात देशावलोकनैर्वाऽभीक्ष्णं मातुः प्रपतत्यकाले गर्भः, तथाऽति-मात्रसंक्षोभिभिर्यानैर्यानेन, अप्रियातिमात्रश्रवणैर्वा । प्रततोत्तानशायिन्याः पुनर्गर्भस्य नाभ्याश्रया नाडी कण्ठमनुवेष्टयति, विवृतशायिनी नक्तंचारिणी चोन्मत्तं जनयति, अपस्मारणं पुनः कलिकलहशीला, व्यवायशीला दुर्वपुषमहोकं खैगं वा, शोकनित्या भीतमपचितमल्पायुषं वा, अभिध्यात्री परोपतापिनमीयुं खैगं वा, स्तेना स्वायासबहु-लमतिद्रोहिणमकर्मशीलं वा, अमर्षिणी चण्डमौपधिकमसूयकं वा स्वमनित्या तन्द्रालु-पावा, मद्यनित्या पिपासालुमल्पस्मृतिमनवस्थितचित्तं वा, गोधामांसप्रायो शार्करिणमश्मरिणं शनैर्मेहिनं वा, वराहमांसप्राया रक्ताक्षं कथनमति रुपमाणं वा, मत्स्यमांसनित्या चिरनिमेषं स्तब्धाक्षं वा, मधुरनित्या प्रमेहिणं मूकमतिस्थूलं वा, अम्लनित्या रक्तपित्तनं त्वगक्षिरोगिणं वा, लवणनित्या शीघ्रवलीपलितं खालित्यरोगिणं वा, कटुकनित्या दुर्बलमल्पशुक्रमनपत्यं वा, तिक्तनित्या शोषिणमबलमनुपचितं वा, कपाय नित्या श्यावमानाहिनमुदावर्तिनं वा यद्यच्च यस्य यस्य व्याधेर्निदानमुक्तं तत्त-दासेवमानाऽन्तर्वी तन्निमित्तविकार बहुलमपत्यं जनयति । पितृजास्तु शुक्रदोषा मातृ-जैरपचारैर्व्याख्याताः । इति गर्भोपघातकरा भावा भवन्त्युक्ताः । गर्भोपघातकर भाव - गर्भ का उपधात ( नाश ) करने वाले ये भाव हैं । जैसे - उत्कट आसन से बैठना, विषम ( नीच -ऊँच ) आसन पर बैठना, कठिन आसन पर लगातार बैठना, वात, मूत्र, पुरीष ( मल ) के वेगों को रोकना, कठोर या अनुचित रूप से व्यायाम करना, तीक्ष्ण और उष्ण द्रव्यों को अधिक मात्रा में सेवन करना, अल्प मात्रा में भोजन करना आदि । इनका जब गर्भिणी स्त्री सेवन करती है तो गर्भाशय में गर्भ मर जाता है या अकाल में उसका स्राव या पान हो जाता है, या गर्भाशय में ही गर्भ सूख जाता है । किसी भी प्रकार गर्भाशय पर आघात लगने से या दबाव पड़ने से, अधिक गहरे गढ़े या कूप में झाँकने से, प्रपात ( जहाँ बहुत ऊँचे स्थान से नदी का जल गिरता है उस स्थान को प्रपात कहते हैं ) को बार - बार देखने से अकाल में ही गर्भ का स्राव या पात हो जाता है । अधिक रूप में शरीर में क्षोभ उत्पन्न करने वाली सवारी ( जैसे एका आदि ) पर चलने से, अत्यन्त अप्रिय शब्दों के अधिक सुनने से गर्भ समय से पूर्व गिर जाता है । निरन्तर उत्तान शयन करने वाली स्त्री के गर्भस्थ बालक के कण्ठ को नाभि के आश्रित नाड़ी बाँध देती है ( जिससे बालक की मृत्यु का भय उपस्थित हो जाता है ) । जो गर्भवती स्त्री खुली जगहों में अकेले शयन करती है, या रात में अकेले इधर - उधर भ्रमण करती हैं वह १. ' उत्कट विषमस्थानकठिनासनसेविन्याः ' इति पा ० । ३. ' गोधामांसप्रिया ' इति पा ० । २. ' अभिध्यायिनी ' इति पा ० । ४. ' व्याख्याताः ' इति पा ० ।

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जातिमुत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६२६ उन्मत्त ( पागल ) सन्दान उत्पन्न करती है ( क्योंकि शून्य स्थान में भूत - प्रेतादि गर्भगो के पीछे लग जाते हैं ) । कलिप्रिय ( वचनमात्र से लड़ाकू ) या कलहप्रिय ( शरीर से लड़ाकू ) गर्भवती स्त्री अपस्मार रोग से युक्त सन्तान को उत्पन्न करती है । गर्भावस्था में भी जो स्त्री निरन्तर सहवास में रत रहती है उस स्त्री की सन्तानें विकृत शरीर वाली, निर्लज्ज और स्त्रैग ( स्त्री के वश में रहने वाली ) होती है । जो गर्भवती स्त्री निरन्तर शोकग्रस्त रहती है उस स्त्री की सन्तानें डरपोक, कृश ( पतली, विना डील - डौल की ) अथवा अल आयुवाली होती हैं । मन में सदा दूसरों के प्रति द्रोह रखने वाली गर्भवती स्त्रो की सन्तानें दूसरों को दुःख देने वाली ( दुष्ट ), ईर्ष्यालु अथवा स्त्री के वश में रहने वाली होती हैं । गर्भावस्था में चोरी करने वाली स्त्री की सन्तानें अधिक परिश्रम करने वाली, अत्यन्त द्रोहबुद्धि वाली, बुरा कर्म करने वाली होती हैं । क्रोध करने वाली गर्भवती स्त्री की मन्नानें कोबी, कपटी और परनिन्दक होती हैं । अधिक शयन करने वाली गर्भवती स्त्री की सन्नार्ने तन्द्रायुक्त, मूर्ख और मन्दाग्नि रोग से सदा पीड़ित रहने वाली होती हैं । निरन्तर शराब पीने वाली गर्भवती स्त्री अधिक प्यास से युक्त, अल्प स्मरण शक्ति से युक्त और चञ्चल मन वालो सन्तान को उत्पन्न करती है । जिस गर्भवती को गोवा ( गोह ) का मांस अधिक प्रिय हो और वह उसे खाती भी हो तो उसकी सन्तानें शर्करा, अश्मरी रोग और शनैर्मेह रोग से युक्त होती है । ' जिस गर्भवती को सूअर का मांस अधिक प्रिय हो और उसे वह गर्भकाल में खाती भी हो तो उसकी सन्तानें लाल नेत्र वाली, हकलाने वाली और अधिक खुरदरे रूसे केशवाली होती हैं । मछली, मांस निरन्तर खाने वाली गर्भवती स्त्री की सन्ताने चिरनिमेष ( जिस बालक के नेत्र की पलकें देर से गिरती हैं ) और स्तब्वाक्ष ( जिसके नेत्र जकड़े रहते हैं ) होती हैं । जो गर्भिणी लगातार अधिक मधुर रस का सेवन करती है वह प्रमेही, गूँगी और अधिक मोटी सन्तान को उत्पन्न करती है । जो गर्भिणी गर्भावस्था में अम्ल ( खट्टे ) रस का अधिक सेवन करती है उसकी सन्तानें रक्तपित्त रोग से तथा त्वचा और आँख के रोगों से युक्त होती हैं । जो गर्भवती लवण रस अधिक खाती है उसकी सनाने शीघ्र ही वली ( त्वचा में झुर्रियाँ पड़ना ), पलित ( बाल का पकना ) और खालित्य ( शिर के बाल का गिर जाना ) रोग से पीड़ित होती है । जो गर्भवती कटु रस का अधिक सेवन करती है उसकी सन्तानें दुर्बल ( बलहीन ), अल्प शुक्र वाली, तथा अनपत्य ( शुक्र की कमी के कारण सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति से हीन, नपुंसक अथवा अल्प मैथुन - शक्ति वाली होने से सन्तानरहित ) होती हैं । जो गर्भवती तिक्त रस को अधिक खाती है उसकी सन्नार्ने शोष ( सुखण्डी ) रोग या यक्ष्मा रोग से युक्त, बलहीन और बिना डील - डौल की ( कुरूप ) होती हैं । जो गर्भवती कषाय रस का अधिक सेवन करती है । वह स्त्री श्याम वर्णं वाली, आनाह और उदावर्त रोग से युक्त सन्तान को उत्पन्न करती है । जो - जो आहार एवं विहार जिस - जिस रोग का निदान ( कारण ) बताया गया है, उन उन आहार एवं विहारों को जब गर्भिणी स्त्री सेवन करती है तब उन उन रोगों से पीड़ित या भविष्य में पीड़ित होने वाली सन्तानें उत्पन्न करती है । इस प्रकार इन गर्भ के उपघात ( नाश ) या गर्भ में हानि करने वाले भावों की व्याख्या कर दी गई है । तस्मादहितानाहारविहारान् प्रजासंपदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेग वर्जयेत् । साध्वाचारा चात्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहारविहाराभ्यामिति ॥ २१ ॥

अहितकर भावों का त्याग आवश्यक - अतः उत्तम गुणयुक्त सन्तान की इच्छा रखनेवाली ५६ च ० सं ०

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६३० चरकसंहिता स्त्री अहित आहार एवं विहारों को विशेष रूप से त्याग दे । सुन्दर आचरणों से युक्त रहती हुई अपनी आत्मा ( शरीर ) की हितकारी आहार एवं विहारों से रक्षा करें ॥ २१ ॥

विमर्श - अहित आहार एवं विहारों का त्याग और हित आहार - विहारों का सेवन पुरुष के लिये भी आवश्यक है, पर स्त्री के लिये तो विशेष रूप से आवश्यक है । व्याधींश्चास्या मृदुमधुरशिशिर सुखसुकुमारप्रायैरौषधाहारोपचारैरुपचरेत् न चास्या वमनविरेचनशिरोविरेचनानि प्रयोजयेत् न रक्तमवसेचयेत्, सर्वकालं च नास्थापन-मनुवासनं वा कुर्यादन्यत्रात्ययिकाव्याधेः । अष्टमं मासमुपादाय वमनादिसाध्येषु पुन -विकारेष्वात्यकेिषु मृदुभिर्वमनादिभिस्तदर्थकारिभिर्वोपचारः स्यात् । पूर्णमिव तैलपा-न्रमसंक्षोभयतोऽन्तर्वत्नी भवत्युपचर्या ॥ २२ ॥

गर्भिणी की चिकित्सा - यदि गर्भिणी को कोई भी ज्वरादि रोग हो जाय तो उन - उन रोगों के अधिकार में जो जो औषधियाँ बतायी गई हैं उनमें जो औषध मृदुवीर्य, मधुर, शीतवीर्य, सुखकारक ( अर्थात् खाने में रुचिकर ) और सुकुमार ( अर्थात् क्लेशोत्पादक न हो ) ऐसे औषध और आहार द्वारा उसका उपचार ( चिकित्सा ) करना चाहिये । वमन, विरेचन और शिरोविरेचन ( नस्य ) का प्रयोग गर्भिणी स्त्री के लिये न करे । रक्तमोक्षण न करावे, और आत्ययिक रोग हो जाने पर अत् विना आस्थापन या अनुवसन के रोग अच्छा न हो सकता हो तब आस्थापन अनुवासन का हल्का प्रयोग किया जा सकता है, पर सामान्यावस्था में सर्वदा इनका प्रयोग न करावे | आठवें मास के बाद यदि कोई ऐसा रोग हो जाय जो वमन या विरेचन या शिरोविरेचन के बिना अच्छा न हो सकता हो तो मृदु वमन, विरेचन और नस्य का प्रयोग करावे अथवा वमन, विरेचन और नव का अनुकरण करने वाले अन्य किसी योग का प्रयोग करे, जिसमें वमनादि का लाभ तो हो जाय पर उसके दोष न होने पायें । जिस प्रकार किनारे तक भरे हुये तेल पात्र को सात से बिना हाथ कंपाए हुए इधर - उधर लाया जाता है अन्यथा थोड़ा भी कम्पन होने पर तेल गिर जाता है ठीक इसी प्रकार गर्भिणी स्त्री रक्षा करने योग्य होती है, अन्यथा गर्भस्राव या सपान का भय उत्पन्न हो जाता है ॥ २२ ॥

विमर्श -यहाँ बनाया है कि आठवें मास के पूर्व कथमपि वमनादि का प्रयोग नहीं करना चाहिये । सुश्रुत में भी बताया है- ' अथ गर्निणी व्याभ्युत्पत्तावत्यये छर्दयेन्मधुराम्ले नान्नोपहितेनानु-लोमयेच्च, संशमनीयं च मृदु दिव्यान्नपानयोः अश्नीयाच्च मृदुवीर्यं मधुरप्रायं गर्भाविरुद्धं च, गर्भा-विरुद्धाश्च क्रिया यथायोगं विदधीत नृदुप्रायाः ( सु. शा. अ. १० ) पर आठवें मास के बाद का नाम नहीं लिया है, अतः सुश्रुत का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि आवश्यकतावश यदि वमनादि का प्रयोग गर्भिणी के लिये करना हो तो मृदु और मधुर द्रव्यों से ही करना चाहिये | आठवें मास के बाद भी वमनादि का प्रयोग करना वैद्य उचित न समझें तो तदनुकारि औषध का प्रयोग करें, ऐसा आदेश दिया है । तदनुकारि का अर्थ है वमनादि के कार्यों को करना हो पर वमनादि द्रव्य से युक्त न हो, जैसे वमन के स्थान पर कवल ग्रह, गण्डूष, निष्ठीवन; विरेचन के स्थान पर गुद्रवति, या निरूहवस्ति का प्रयोग, नस्व के स्थान पर शिरोवस्ति का प्रयोग करना चाहिये । सा चेदपचाराद् द्वयोखिषु वा मासेषु पुष्पं पश्येन्नास्या गर्भः स्थास्यतीति विद्यात्; अजातसारो हि तस्मिन् काले भवति गर्भः ॥ २३ ॥

और भी-यदि अवश्य सेवन करने से १. ' असक्षीम्यान्तर्वला ' इति पा ० । दूसरे या तीसरे नाल में गर्भगी स्त्रां के रजःस्राव

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जातिमुत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६३१ को देखे तो यह समझ ले कि गर्म की स्थिति नहीं रहेगी । क्योंकि तीन मास तक गर्भ सारहीन होता है | २३ || विमर्श - तीन मास तक गर्भ के जो अङ्ग - प्रत्यङ्ग के विकास केन्द्र बनते है वे अतिसूक्ष्म और कोमल होते है अतः मारहीन होते हैं अतएव तीसरे मास के गर्भपात ( Abortion ) को रोकना कठिन होता है, यथा- ' आचतुर्थात्ततो मासात्प्रस्रवेद्गर्भविद्रवः । ततः स्थिरशरीरस्य पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ ' आधुनिक दृष्टि से तीसरे महीने में Placenta का निर्माण होता रहता है अतएव गर्भपात ( Abortion ) होने का सर्वाधिक भय रहता है । सा चेतुप्रभृतिषु मासेषु क्रोधशोकासूयेर्ष्याभयत्रासव्यवायव्यायामसंक्षोभसंधारण -विषमाशनशयन स्थान चुत्पिपासातियोगात् कंदाहाराद्वा पुष्पं पश्येत् तस्या गर्भस्थापन-विधिमुपदेच्यामः । पुष्पदर्शनादेवैनां ब्रूयात् — शयनं तावन्मृदुसुखशिशिरास्तरणसं-स्तीर्णमीपदवनतशिरस्कं प्रतिपद्यस्वेति । ततो यष्टीमधुसर्पिभ्यां परमशिशिरवारिणि संस्थिताभ्यां पिचुमालाव्यापस्थसमीपे स्थापयेत्तस्याः, तथा शतधौतसहस्रधौताभ्यां समिधानाभेः सर्वतः प्रदिह्यात्, सर्वतश्च गव्येन चैनां पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण वा परिषेचयेदधो नाभेः, उदकं वा सुशीतमवगाहयेत्, क्षीरिणां कषायद्रुमाणां च स्वरसपरिपीतानि चेलानि ग्राहयेत्, न्यग्रोधादिशुङ्गसिद्धयोर्वा क्षीरसर्पिषाः पिचुं ग्राहयेत्, अतश्चैवाक्षमात्रं प्राशयेत्, प्राशयेद्वा केवलं क्षारसर्पिः पद्मो-स्थलकुमुदकिञ्जल्कांचास्य समवुशर्करान् लेहार्थं दद्यात् शृङ्गाटकपुष्करवोजकशेरुकान् भक्षणार्थ, गन्धयवसितोलशालको दुम्बर शलाटुन्यग्रोधशुङ्गानि वा पाययेदेना-माजेन पयसा पयसा चैनां बलातिबलाशालिपष्टिकेतुमूलका कोलीश्टतेन समधुशर्करं रक्तशालीनामोदनं मृदुमुरभिशीतलं भोजयेत्, लावकपिञ्जल कुरङ्गशम्वरशशहरिणका-लपुच्छकरसेन वा घृतसुसंस्कृतेन सुखशिशिरोपवातदेशस्थां भोजयेत् क्रोधशोकाया-सव्यवायव्यायामेभ्यश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चनां कथाभिर्मनोनुकूलाभिरुपासीत; तथाऽस्या गर्भस्तिष्टति ॥ २४ ॥

और भी - चौथ मास से लेकर आठवें मास तक क्रोध, शोक, दूसरे की निन्द्रा, ईर्ष्या, भय, त्रास, मैथुन, व्यायान, शारीरिक क्षोभ, मल - मूत्रादि के वेगों को रोकना, विषनाशन, शयन स्थान ( अर्थात् ऊँचे - नीचे स्थान में सोना और बैठना ), भूख और प्यास के अतियोग और अति तीक्ष्ण, अनि रूक्ष, अति स्निग्ध, अत्युष्ण आदि दुष्ट सड़े - गले आहारों के सेवन मे यदि गर्भिणी स्त्री को रजःपात्र होते हुए दीख पड़े तो उस गर्भ की स्थापना हो जाय इसकी विधियां बतायी जा रही है । जिस समय रजःस्राव दिखाई पड़े उसी समय से कोमल, सुखकारक, शीतल विछौना बिछे हुए खाद पर शयन करने को कहे, और उस ग्वाट का पैर की ओर का भाग ऊंचा रखें, क्षिर कुछ नीचा रसे इस प्रकार शयन करने का आदेश है । इसके बाद पहले से ही अति शीतल जल में मुलेठी का चूर्ग और घृत डाला हुआ रहे, उसी जल में कपड़ा भिगोकर योनि के पास में वह भीगा हुआ कपड़ा रखने को कहे । तथा सौ बार या हजार वार जल से धोए हुए घृत से नाभि में लेप करें । शीतल गाय के दूध से या मुलेठी के क्काय से या न्ययोवादि गण के काथ से नाभि के नीचे सेवन करे । अथवा शीतल जल के व में अवगाहन करे, अर्थात् दव में दरीतल जल भरकर उसी में गर्मियों को बैठा दें । श्रीरी वृक्ष - ( न्यग्रोवोस्वराधन्यपरीष १. ' तैलानि ' इति पा ० ।