चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 991–1000

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 991–1000

पृष्ठ 991

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 991 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०२ चरकसंहिता & परिणमतस्त्वाहारस्य गुणाः शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमविरुद्धाः; विरुद्धाश्च विहन्युर्विहताश्व विरोधिभिः शरीरम् ॥ १६ ॥

और -भी पचते हुए आहार के उचित गुण अपने गुण के अनुसार शरीर के गुणों को प्राप्त करता है । और आहार का विरुद्ध गुण या विरोधि पदार्थों द्वारा आहार के गुण नष्ट हो गये हो तो वे शरीर को नष्ट कर देते हैं ॥ १६ ॥

विमर्श - गुर्वादि २० गुण युक्त आहार अपने - अपने गुण के अनुसार शारीरिक २० गुणों को बढ़ाते है जैसे आहार का कठिन भाग, मांस, हड्डी आदि कठिन भाग को बढ़ाता और पुष्ट करता है आहार का द्रवांश रस, रक्तादि द्रव को पुष्ट एवं वृद्ध करता हैं । पार्थिव अंश शरीर के पार्थिव अंश को, आहार का जलीयांश शरीर के जलीयांश को पुष्ट एवं वृद्ध करता है, इसी प्रकार आहार के द्वारा ही सब धातुओं की वृद्धि और पुष्टि होती है । यदि शरीर के गुण के विरुद्ध आहार प्राप्त हुआ या मछली- दूध आदि विरुद्ध आहार का सेवन किया गया तो शरीर का नाश हो जाता है । * शरीरगुणाः पुनर्द्विविधाः संग्रहेण -- मलभूताः, प्रसादभूताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्याबाधकराः स्युः । तद्यथा - शरीर च्छिद्रेषूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः, परिपक्काश्च धातवः प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणः, ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपधातायोपपद्यन्ते, सर्वांस्तान्मैले संचक्ष्महे; इतरांस्तु प्रसादे, गुर्वादिश्च द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन ॥ १७ ॥

शरीर धातु के दो भेद - मल और प्रसाद - शरीर की धातुएं संक्षेप में दो प्रकार की होती है १. मलभूत, २. प्रसादभूत । उनमें मलभूत वे धातुयें हैं जो शरीर में वाधा करने वाली होती हैं । जैसे शरीर के छिद्रों में अलग - अलग उत्पन्न होकर बाहर निकलने वाले, आँख, कान, नाक आदि के मल, पकी हुई धातुयें ( रस रक्तादि धातुयें जो व्रण आदि में पूय बन गई हैं ), कुपित वात, पित्त, कफ और अन्य भी जो कोई भाव शरीर में रहते हुए शरीर में हानि उत्पन्न करने वाले होते हैं उन सभी भावों को मल कहा जाता है । इससे भिन्न जो गुर्वादि से लेकर द्रव तक २० भाव गुण शब्द से व्यवहार्य हैं वे और द्रव्य भेद से रस से लेकर शुक्र तक जो सात भाव हैं उन्हें प्रसाद कहा जाता है ॥ १७ ॥

विमर्श - यद्यपि मल, मूत्र, स्वेद को सामान्यतः मल कहा जाता है पर जो मल, मूत्र, स्वेद शरीर को धारण करने वाला है उसे मल नहीं माना जाता किन्तु जो बहिर्मुख अर्थात् बाहर निक-लने वाला होता है उसे ही मल कहा जाता है, कहीं - कहीं ' अपरिपक्का धानवः ' ऐसा पाठ हैं वहाँ पर सामधानुर्ये मल मूत्र - समझनी चाहिए । कुपित वात, पित्त, कफ से क्षीण और वृद्ध दोनों का ग्रहण किया जाता है । * तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति, दोषस्वभावात् । वातादीनां पुनर्धात्वन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टानां विविधाशितपीतीयेऽध्याये विज्ञाना-न्युक्तानि । एतावत्येव दुष्टदोपगतिर्यावत् संस्पर्शनाच्छरीरधातूनाम् । प्रकृतिभूतानां तु खलु वातादीनां फलमारोग्यम् । तस्मादेषां प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिरिति ॥१८ ॥

१. ' परिणामतः ' इति पा ० । ३. ' मलाख्यानू ' इति पा ० । २. ' शरीरधातव ' इति पा ० । ४. ' प्रसादाख्यान् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 992

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 992 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शरीरविचयशारीराध्यायः ६ ] शारीरस्थानम् ६०३ वातादि दोष ही रोगकर एवं अरोगकर - उन प्रसाद भूत या मल भूत सभी धातुओं को दुष्ट ( वृद्ध ) वात, पित्त, कफ दूषित करने वाले होते हैं क्योंकि इनका स्वभाव ही दूसरे को दूषित करने का है, ' दूषणात् दोषा ' इति । धातुओं के अन्दर जाकर और अपने - अपने पूर्वाह्ण, मध्याह्न, सायाह्न काल में दुष्ट होने वाले वात, पित्त, कफ का वर्णन विविधाशितपीतीय नामक सूत्र स्थान के २८ अध्याय में किया गया है । शरीर धातुओं के साथ स्पर्श ( संयोग ) होने से दुष्ट वातादि दोषों की गति इतनी ही है । अर्थात् दुष्ट दोष शारीरिक धातुओं को ही दूषित करते हैं न कि मन या आत्मा को । वातादि दोषों का अपने प्रकृति ( समभाव ) में रहने का फल आरोग्य होना होता है अत: बुद्धिमान को चाहिए कि ये वातादि दोष जिस प्रकार प्रकृति रूप में ( साम्यावस्था में रह सकें ऐसा उपाय करें ॥ १८ ॥

भवति चात्र-* शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक् । आयुर्वेदं स कात्स्न्र्त्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥ शरीर का महत्त्व – सर्वदा सव प्रकार से सम्पूर्ण शरीर को जो वैद्य जानता है वहां वैद्य लोक में सुख देने वाले आयुर्वेद शास्त्र को सम्पूर्ण रूप से जानता है ॥ १ ९ ॥ * एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - श्रुतमेतद्यदुक्तं भगवता शरीराधिकारे वचः । किन्नु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, कुतोमुखः कथं चान्तर्गत स्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति, कथंभूतश्च निष्क्रामति, कैश्वायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, कैरव्याधिरभिवर्धते, किं चास्य देवादिप्रकोप निमित्ता विकाराः संभवन्ति आहोस्विन्न, किंचास्य कालाकालमृत्य्वोर्भावाभावयोर्भगवानध्यवस्यति किंचास्य परमायुः, का चास्य परमायुषो निमित्तानीति ॥ २० ॥

( २ ) गर्भविषयक ९ प्रश्न ( Nine Questions Regarding Embryo ) गर्भ में अङ्गोत्पत्तिविषयक प्रश्न - शारीर विषय प्रकरण को समाप्त कर गर्भशरीर विषयक प्रकरण यहाँ से प्रारम्भ किया जाता है । इस प्रकार कहते हुए भगवान आत्रेय से अग्निवेश ने कहा कि शरीराधिकार में जो वचन आप ने कहे वे सब मैंने सुन लिये । इस सम्बन्ध में कुछ मेरे प्रश्न हैं । १. गर्भाशय में सबसे प्रथम कौन अङ्ग उत्पन्न होता है । २. गर्भ का मुख गर्भाशय में किधर रहता है और गर्भाशय के अन्दर कैसे रहता है । ३. किस आहार पर गर्भ का जीवन चक्र चलता रहता है और किस प्रकार वह गर्भाशय से बाहर निकलता है ४. किन आहारों के उपयोग से गर्भ उत्पन्न होकर सद्यः मर जाता है । ५. कैसे रोगरहित होकर बढ़ता है? ६. क्या! देवादि के प्रकोप से बालकों में रोग होते हैं या नहीं । ७. क्या! गर्भ की कालमृत्यु या अकालमृत्यु होती है इसमें आप का क्या सिद्धान्त है । ८. गर्भ की परमायु कितती होती है । ९. परमायु प्राप्त करने में क्या कारण होता है । ॐ तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच - पूर्वमुक्तमेतद्गर्भाक्रान्तौ यथाऽयमभिनिर्वर्तते कुक्षौ यच्चास्य यदा संतिष्ठतेऽङ्गजातम् । विप्रतिवादास्त्वत्र बहुविधाः सूत्रकृतामृषीणां सन्ति सर्वेषां तानपि निबोधोच्यमानान् - शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति कुमार शिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा; १. ' तमेवमुक्तवन्तम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 993

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 993 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०४ चरकसंहिता हृदयमिति काङ्कायनो बाह्रीकभिषक, चेतनाधिष्ठानत्वात्; नाभिरिति भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा; पक्वाशयगुदमिति भद्रशौनकः, मारुताधिष्ठानत्वात्; हस्तपा-दमिति वडिशः, तत्करणत्वात् पुरुषस्य; इन्द्रियाणीति जनको वैदेहः, तान्यस्य बुद्धय-धिष्ठानानीति कृत्वा परोक्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचिः कश्यपः सर्वाङ्गाभिनिर्वृत्तिर्युग-पदिति धन्वन्तरिः; तदुपपन्नं, सर्वाङ्गानां तुल्यकालाभिनिर्वृत्तत्वाद्धृदयप्रभृतीनाम् । सर्वाङ्गानां ह्यस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च केषाञ्चिद्भावानाम्, नच तस्मात् पूर्वाभिनि-वृत्तिरेषां; तस्माद्धृदयप्रभृतीनां सर्वाङ्गानां तुल्यकालाभिनिर्वृत्तिः सर्वे भावा ह्यन्यो-न्यप्रतिबद्धाः; तस्माद्यथाभूतदर्शनं साधु ॥ २१ ॥

( १ ) प्रश्न: गर्भाशय में कौन सा अङ्ग पहले उत्पन्न होता है | ( किन्नु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते ), उत्तर - इस प्रकार प्रश्न करते हुए अग्निवेश से भगवान आत्रय ने कहा । गर्भावक्रान्ति शरीराध्याय में पहले कहा जा चुका है कि किस प्रकार गर्भाशय में गर्भ उत्पन्न होता है । साथ ही यह भी कहा जा चुका है कि उसका कौन सा अङ्ग कब उत्पन्न होता है । परन्तु इस विषय में सभी सूत्रकार ऋषियों में बहुत प्रकार का मतभेद है । उसे भी मै कहता हूँ । सुनो । १. कुमार-शिरा भरद्वाज का मत है कि गर्भाशय में सबसे पहले शिर की उत्पत्ति होती है, क्योंकि शिर ही सभी इन्द्रियों का आश्रय है । २. बाह्रक देश के वैद्य काङ्कायन का मत है कि सत्र से पहले गर्भाशय में हृदय की उत्पत्ति होती है, क्योंकि हृदय ही शरीर में चेतना का आश्रय है । ३. भद्रकाप्य का मत है कि सर्वप्रथम गर्भाशय में नाभि की उत्पत्ति होती है, क्योंकि गर्भस्थ बालक को आहार की प्राप्ति नाभि से ही होती है । ४. भद्रशौनक का मत है कि सबसे पहले पक्काशय और गुदा, या पकाशय के समीप की गुदा अर्थात् उत्तर गुद की उत्पत्ति होती है क्योंकि वह वायु का अधिष्ठान ( रहने का मुख्य स्थान ) है । ५. वडिश का मत है कि सबसे पहले हाथ और पैर की उत्पत्ति होती है क्यों कि वह पुरुष का प्रधान करण है । ६. वैदेह जनक का मत है कि सब से पूर्व इन्द्रियाँ - ( इन्द्रियों के अधिष्ठान जैसे नयन गोलक आदि ) उत्पन्न होती हैं क्योंकि इन्द्रियाधिष्ठान में स्थित इन्द्रियों के ही द्वारा बुद्धि ( ज्ञान ) होती है अतः ज्ञान का भी अधिष्ठान इन्द्रियाधिष्ठान ही है । ७. मारीच काश्यप का मत है कि जब गर्भाशय में गर्भ दृष्टिगोचर नहीं होता तो परोक्ष के विषय में इस प्रकार का विचार करना व्यर्थ है अतः पहले कौन अङ्ग उत्पन्न होता है यह विषय अविचार्य है । ८. धन्वन्तरि का मत है कि सभी अङ्ग - प्रत्यङ्गों की उत्पत्ति एक साथ ही होती है । यही मत युक्तिसिद्ध है । क्योंकि हृदय आदि सभी अङ्गों की उत्पत्ति एक काल में ही होती है । ( विभिन्न ऋषियों के मत का दिग्दर्शन कराकर आचार्य आत्रेय पुनर्वसु अपना मन स्पष्ट कर रहे हैं ) गर्भ के सभी अङ्गों का, और कुछ भावों जैसे ओज, मन, आत्मा, बुद्धि का मूल अधिष्ठान ( आश्रय ) हृदय हैं अत: सबसे पहले गर्भाशय में हृदय को उत्पत्ति होती है यह काङ्कायन का मत ठीक नहीं है । अतः हृदयपूर्वक अर्थात् हृदय की उत्पत्ति के साथ साथ सभी अङ्ग प्रत्यङ्गों की एक ही काल में एक ही साथ उत्पत्ति होती है, क्योंकि शरीर के सभी भाव एक के साथ एक सम्बन्धित हैं, अतः सभी अङ्ग - प्रत्यङ्गों की उत्पत्ति साथ ही होती है यह मत ठीक है ॥ २१ । विमर्श - गर्भ में सभी अङ्गों की साथ ही उत्पत्ति होती है इसे वंशाङ्कुरवत् चूतफलवत् उदाहरण देकर सुश्रुत में समझाया गया है । सुश्रुत में सुभूतिगौतम का मत है कि मध्य शरीर सबसे १. ' हृदयपूर्वाणाम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 994

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 994 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शरीरविचयशारीराध्याय: ६ ] शारीरस्थानम् ६०५ पहले उत्पन्न होता है क्योंकि मध्य शरीर में ही सभी अङ्ग - प्रत्यङ्ग बनते हैं । यह मत एक अधिक कहा गया है । हृदय की पहले उत्पत्ति कृतवीर्य के मत से मानी हैं । * गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः सङ्कुच्याङ्गान्यास्तेऽन्तःकुक्षौ ॥ २२ ॥

( २ ) प्रश्न: गर्भाशय में गर्भ का मुख किधर रहता है और वह गर्भाशय के अन्दर कैसे रहता है ( कुनोमुखः कथं चान्तर्गतस्तिष्ठति ), उत्तर -- गर्भ गर्भाशय में माता की पीठ की ओर मुख करके और ऊपर शिर करके, अङ्गों को सङ्कुचित कर एवं जरायुओं से आवृत होकर रहता है ॥ २२ ॥

विमर्श - गर्भाशय में बालक के मुख की स्थिति माता की पीठ की ओर बतायी गयी है । आधुनिक दृष्टिकोण से गर्भाशय में गर्भ की चार स्थितियाँ मानी जाती हैं - १. गर्भ का पृष्ठ सामने और बांयी ओर, २. गर्भ का पृष्ठ सामने और दांयी ओर, ३. गर्भ का पृठ पीछे और बांयी ओर, ४. गर्भ का पृष्ठ पीछे और दांयी ओर । इनमें नं ० १ नं ० २ की स्थिति पृष्ठाभिमुख और नं ० ३ और ४ की स्थिति उदराभिमुख है । प्रायः यह प्रत्यक्ष है कि ८० % शिर से पैदा होने वाले गर्भों में पृष्ठाभिमुख स्थिति पायी जाती है । आधुनिक विचार से गर्भ का ऊर्ध्वशिरा होना गर्भकाल के पूर्वार्द्ध या बहुप्रजाताओं में होता है, प्रायः इन्हीं अवस्थाओं का वर्णन यहाँ किया गया है क्योंकि इसी अध्याय में आगे अवाक् शिरा का भी वर्णन किया गया है । सुश्रुत ने शिर कीस्थिति ऊपर या नीचे होती है इस विषय में कुछ चर्चा न कर कहा है -- ' आभुग्नोऽभिमुखः शेते गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः । स योनिं शिरसा यानि स्वभावात् प्रसत्रं प्रति ॥ ' ( सु. शा. अ. ५ ) जब उत्तरार्द्ध में शिर का परिवर्तन होने लगता है तो जैसे - जैसे प्रसवकाल समीप आना है वैसे - वैसे योनिद्वार पर गर्भ का शिर आता है इस अर्थ से सुश्रुत का मन आजकल के मन से साम्य रखता है । व्यपगतपिपासाबुभुक्षस्तु खलु गर्भः परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य वर्तयत्युपस्नेहोप-स्वेदाभ्यां गर्भाशये सदसद्भूताङ्गावयवः, तदनन्तरं ह्यस्य कचिल्लोमकूपाय नैरुपस्नेहः कश्चिन्नाभिनाड्ययनैः । नाभ्यां ह्यस्य नाडी प्रसक्ता नाड्यां चापरा, अपरा चास्य मातुः प्रसक्ता हृदये, मातृहृदयं ह्यस्य तामपरामभिसंप्लवते सिराभिः स्यन्दमानाभिः स तस्य रसो वलवर्णकरः संपद्यते, स च सर्वरसवानाहारः । स्त्रिया ह्यापन्नगर्भायास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते - स्वशरीरपुष्टये, स्तन्याय, गर्भवृद्धये च । स तेनाहारेणोपष्टब्धः ( परतन्त्र-वृत्तिर्मातरमाश्रित्य ) वर्तयत्यन्तर्गतः ॥ २३ ॥

( ३ ) प्रश्न: किस आहार पर गर्भ का जीवन चक्र चलता है ( किमाहारश्च वर्तयति ), उत्तर -- प्यास और भूख से रहित गर्भ परतन्त्रवृत्ति होता है ( अर्थात् माता के अधीन ही गर्भ का सारा कार्य होता है ) । माना के आश्रित होकर सूक्ष्म रूप में सत् ( वर्तमान ) स्थूल रूप में असत् ( अवर्तमान ) अङ्ग - प्रत्यङ्ग वाला गर्भ गर्भाशय में गर्भाशय के उपस्नेह और उपस्वेद से अपना जीवन निर्वाह करता है । इसके बाद जब सभी अङ्ग - प्रत्यङ्ग व्यक्त हो जाते हैं तब गर्भाशय में गर्भ को कुछ नह, लोमकूप है अयन मार्ग जिनका ऐसी रसवाहिनियों से और कुछ उपस्नेह नाभिनाल है अयन - मार्ग जिनकी ऐसी रसवाहिनियों से प्राप्त होता है । गर्भ की नाभि में नाड़ी लगी रहती है, नाड़ी में अपरा ( Placenta ) लगी रहती है और अपरा का सम्बन्ध माता के हृदय के साथ लगा रहता है । माता का हृदय उस अपरा को स्यन्दमान ( जिसमें रसरक्तादि का वहन होता है ) सिराओं द्वारा रसरक्त से आप्लावित किए रहता है । वह रस गर्भ के १. ‘ सङ्कुच्याङ्गान्यास्ते जरायुवृतः कुक्षौ ' इति पा ० । २. ' संस्पन्दमानाभिः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 995

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 995 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०६ चरकसंहिता बल - वर्ण को उत्पन्न करने वाला होता है । सभी रसों से युक्त वह आहार रस गर्भिणी स्त्री के शरीर में तीन भागों में विभक्त होता है - १. गर्भिणी के अपने शरीर की पुष्टि के लिए, २. दूध बनाने के लिए और ३. तीसरा भाग गर्भ शरीर की पुष्टि एवं वृद्धि के लिए । वह गर्भ इस आहार रंस से उपष्टब्ध ( उसी के सहारे जीवनचक्र चलाते हुए ) होकर, पराधीन होकर माता पर आश्रित रह कर गर्भाशय के अन्दर अपना जीवन व्यतीत करता है ॥ २३ ॥

स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूतिमारुतयोगात् परिवृत्त्या वाशिरो निष्क्रामत्यपत्य-पथेन, एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । परं स्वतः स्वतन्त्रवृत्तिर्भवति ॥ २४ ॥

( ३ क ) प्रश्न: प्रसव कैसे होता है ( कथं भूतश्च निष्क्रामति ) का उत्तर - वह गर्भ बुमाव खाकर नीचे शिर वाला होकर जन्म का समय प्राप्त होने पर प्रसवकारक वात से प्रेरित होकर योनिमार्ग से बाहर निकलता है । यह गभ के निकलने की प्रकृति ( स्वभाव ) है । इससे भिन्न अर्थात् शिर का योगि मार्ग में प्रथम न आना किन्तु जघन, हाथ, पैर, नितम्ब आदि का पहले आना विकृति कहा जाता है । इसके बाद जब गर्भ भूमिष्ठ हो जाता है तब वह स्वतन्त्र वृत्ति अर्थात् स्वयं श्वास - प्रश्वास तथा आहारादि क्रिया करने लगता है ॥ २४ ॥

विमर्श - कुछ लोग इसका अर्थ यह करते हैं कि जन्म काल उपस्थित होने पर गर्भ कुमाव खाकर नीचे शिर वाला होकर अपत्यपथ से बाहर आता है पर यह अर्थ उचित नहीं प्रतीत होता । क्योंकि गर्भ का उपने उत्तरार्द्ध में शिर के गुरुत्व और हस्तपाद की क्रिया का संचालन होने से स्वाभाविक प्रसव में नीचे शिर और ऊपर नितम्ब रहता ही है । कुछ अस्वाभाविक प्रसव में या बहुप्रजाता स्त्रियों में शिर ऊपर रहता है । जन्मकाल में अवाक्शिरा हो सकता है, पर इसमें भी शिर ऊपर रहने पर स्फिगुदय ही प्रायः होता है अर्थात् ऊपर शिर रहने पर सर्वप्रथम नितम्ब, पैर आदि अङ्ग निकलते हैं अतः पहला अर्थ उचित है । ताभ्यामेव च विषमसेविताभ्यां जातः सद्य उपहन्यते तरुरिव चिरव्यपरोपितो वाता-तपाभ्यामप्रतिष्ठितमूलः ॥ २५ ॥

( ४ ) प्रश्न: किन आहारों के उपयोग से गर्भ उत्पन्न होकर शीघ्र ही मर जाता हैं । ( कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते ), उत्तर् - विषमरूप से गर्भिणी द्वारा सेवन किये गये वे ही आहार और उपचार उत्पन्न वालक को या गर्भाशय में गर्भत्व प्राप्त गर्भ को शीघ्र वैसे ही नष्ट कर देते हैं जैसे शीघ्र रोपण किया गया, जिसका मूल प्रतिष्ठित ( बलवान् ) नहीं हुआ है ऐसा वृक्ष हवा से उखड़ कर और धूप से सूख कर शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । तात्पर्य यह है कि अहित आहार और विहार गर्भाशय से गर्भ का स्राव या पात करा देता है, या उत्पन्न होने पर शीत्र ही मार डालता है ॥ २५ ॥

तस्याहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धिकरौ भवतः ॥ २६ ॥

( ५ ) प्रश्न: कैसे रोग रहित होकर बढ़ना है? ( कैरव्याधिरभिवर्द्धते ) का उत्तर • जातिसूत्रीय नामक आठवें अध्याय में जो आहार और उपचार कहे जायेंगे वे ही आहार और उपचार गर्भ के लिए विकार ( हानि ) न करने वाले एवं गर्भवर्द्धक हैं ॥ २६ ॥

* आप्तोपदेशादद्भुत रूपदर्शनात् समुत्थानलिङ्गचिकित्सित विशेषाच्चादोषप्रकोपानुरूपा देवादिप्रकोपनिमित्ता विकाराः समुपलभ्यन्ते ॥ २७ ॥

१. ' परिवृत्यार्वाकुशिरा ' इति पा ० । २. ' परं ततः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 996

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 996 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शरीरविश्वयशारीराध्याय: ६ ] शारीरस्थानम् ६०७ ( ६ ) प्रश्न: क्या देवादिग्रहों के द्वारा बालकों में रोगोत्पत्ति होती है या नहीं ( किञ्चास्य देवादि प्रकोपनिमित्ता विकारा सम्भवन्ति आहोस्विन्न ), उत्तर - १. आप्तपुरुषों के उपदेश से, २. अद्भुत रूप ( लक्षण या कार्यों ) को देखने से, ३. कारण, लक्षण और चिकित्सा में विभिन्नता होने से, ४. दोषप्रकोपजन्य रोग के लक्षणों से विभिन्न लक्षण होने के कारण देवादिग्रहजन्य रोग होते हैं ॥ २७ ॥

विमर्श - आप्तोपदेश यथा - ' स्कन्दग्रहस्तु प्रथमः स्कन्दापस्मार एव च । शकुनी रेवती चैव पूतना चान्धपूतना ॥ ' ( सु. उत्त. अ. २७ ) आदि तथा ' धात्रीमात्रोः प्राक्प्रदिष्टापचाराद् ' इत्यादि । अद्भुतदर्शन जैसे - ' अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः । उन्मादकालोऽनियतश्च यश्च, भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तन् ॥ ' ( च. चि. ९ ) । कारण, लक्षण और चिकित्सा की विभिन्नता से अर्थात् वात के कुपित होने के कारणों का सेवन करने से वात न बढ़ कर पित्त या कफ की वृद्धि हो जाय, या शरीर में कुपित हो बात, पर शरीर में सभी लक्षण कफ या वित्त के मिलते हों, यदि लक्षण के अनुसार चिकित्सा की जाय तो रोग में कोई लाभ प्रतीत न हो या अविधि - चिकित्सा से लाभ और उचित चिकित्सा से हानि हो तो ये दोनों लक्षण भूतोन्माद के सूचक हैं । हैं । * कालाकालमृत्य्वोस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः - ' यः कश्चिद् म्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्ति ' इत्येके भाषन्ते । तच्चासम्यक् । न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षणस्वभावात् । तत्राहुरपरे - यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः; स सर्वभूतानां सत्यः समक्रियत्वादिति । एतदपि चान्यथा-S र्थग्रहणम् । न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः । कालो ह्यायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते । यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते स तस्य मृत्युकाल इति, तस्य सर्वे भावा यथास्वं नियतकाला भविष्यन्ति; तच्च नोपपद्यते, प्रत्यक्षं कालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं, विपर्यये चेष्टं; प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तिस्तासु तास्ववस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य, त-द्यथा - कालोऽयमस्य व्याधेराहारस्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य, अकालो वेति । लोके-ऽप्येतद्भवति - काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्य-काले तपति का पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति । तस्मादुभयमस्ति — काले मृत्युर-काले च; नैकान्तिकमत्र । यदि ह्यकाले मृत्युर्न स्यान्नियतकालप्रमागमायुः सर्वं स्यात्; एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्, प्रत्यक्षानुमानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमा-णभूताः सर्वतन्त्रेषु, यैरायुज्याण्यमनायुष्याणि चोपलभ्यन्ते । वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादमृषयो मन्यन्ते - नाकाले मृत्युरस्तीति ॥ २८ ॥

काल तथा अकाल मृत्यु प्रकरण ( Topic of Timely or Untimely Death ) ( ७ ) प्रश्न: काल और अकाल मृत्यु के विषय में क्या विचार है । --- ( किञ्चास्य कालाकाले-त्यादि ), उत्तर — काल मृत्यु का भाव ( होना ) या अभाव ( न होना ) और अकाल मृत्यु का होना और न होना इस विषय में मेरा यह अध्यवसित ( सिद्धान्त ) है । ऐसा कुछ विद्वानों का जो मत है कि ' जो कोई मरता है वह काल में ही मरता है, क्योंकि काल में कोई छिद्र ( व्यवधान ) नहीं होता ( अर्थात् ऐसा क्षण नहीं होता जब काल न हो । जब अकाल है ही नहीं तब अकाल ' मृत्यु में कैसे होगी? ) किन्तु यह मत ठीक नहीं है । काल का छिद्र युक्त होना या छिद्र रहित होना ये दोनों बातें संगत नहीं है क्योंकि काल अपने स्वाभाविक लक्षण वाला होता है ।

पृष्ठ 997

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 997 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०८ चरकसंहिता इस विषय में दूसरे आचार्य का मत है कि जो प्राणी जब मरता है वही उस प्राणी का नियत मृत्यु - काल होता है । प्राणिमात्र के लिए वह काल सत्य है क्योंकि समकित है ( अर्थात् सभी प्राणियों के लिए समान रूप से मृत्यु को देने वाला है, राग से किसी प्राणि-विशेष को न मारना या द्वेष से किसी को मारना यह काल नहीं करता है चक्र ० ) समक्रिय को हेतु देकर सबकी मृत्यु काल में ही होती है यह कहने वाले इसके भाव को ठीक न समझ कर अन्यथा ( विपरीत ) अर्थ समझते हैं । ऐसा कोई नहीं है जिसकी मृत्यु नहीं होती केवल इतने से ही काल को समक्रिय नहीं कहा जा सकता है । यहाँ काल का अर्थ है आयु का प्रमाण अर्थात् आयु का निश्चित प्रमाग लेकर काल का व्यवहार किया जाता है । जो वह कहते हैं कि जो अब गरता है तब उसका वह नियत मृत्युका होता है तब तो उसके सिद्धान्त में सभी कार्य नियत समय पर ही होने लगेंगे पर ऐसा देखा नहीं जाना यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि अकाल में प्रयुक्त आहार, वचन और कर्म का फल बुरा होता है । इससे विपरीत अर्थात् काल पर प्रयुक्त आहार, वचन और कर्म का फल अच्छा होता है । भिन्न-मित्र अवस्थाओं में भिन्न - भिन्न विषय को लेकर काल और अकाल की अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष पावी जाती है । जैसे इस रोग का यह काल है या अकाल, इस आहार का यह काल है या अकाल इस औषधि का यह काल है या अकाल, इस चिकित्सा ( प्रतिकर्म ) यह काल है या अकाल, इस व्याधि मोक्ष ( विसर्ग ) यह काल है या अकाल । इस न्यापि का यह काल है, यह आहार का समय है या यह काल इस अन्न या रस का है, यह औषध का काल है, या यह काल इस औषध का है, यह काल इस व्यावि की चिकित्सा का है, यह काल इस रोग के छूटने का है ( वहाँ काल से उचित काल और अकाल से अनुचित काल लिया जाता है ) । लोक में भी इस काल और अकाल शब्द का प्रयोग होता है, जैसे काल ( उचित काल ) पर देव वर्षा करते हैं, अकाल ( अनुचित समय ) पर देव वर्षा करते हैं । समय पर जाड़ा पड़ता है, असमय ( अकाल ) पर जाड़ा पड़ रहा है । उचित समय पर सूर्य तप रहा है, अकाल में सूर्य तप रहा है । इस वृक्ष पर समय से फूल और फल लगे हुये हैं, अकाल में फूल और फल लगे हुये हैं 1 जिस प्रकार लोक में काल और अकाल ये दोनों शब्द प्रयुक्त होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी काल मृत्यु और अकाल मृत्यु दोनों का प्रयोग है । एक निश्चित काल मृत्यु, या अकाल मृत्यु नहीं होती । यदि अकाल में मृत्यु न हो तब प्राणिमात्र की आयु नियत कालप्रमाण की होगी, नियत कालप्रमाण यदि सबकी आयु हो जाय तो हितकारी वस्तु और अहितकारी वस्तु का ज्ञान कराना निष्प्रयोजन हो जायगा ( क्यूँ कि अहित वस्तु विष आदि के सेवन से मृत्यु होती है किन्तु जब आयु का प्रमाण निश्चित मान लिया जायगा तो अदित वस्तु से हित वस्तु से लाभ होगा ) दूसरी बात यह होगी कि सभी शास्त्रों में कोई हानि न होगी और न प्रमाण स्वरूप बताए गए प्रत्यक्ष, अनुमान, आप्तोपदेश जिनके द्वारा आयुष्य ( आयु के लिए हितकारी ) एवं अनायुष्य ( आयु के लिए अहितकारी ) का उपदेश होता है वे सब निरर्थक हो जायेंगे | अकाल में मृत्यु नहीं होती इस बाद को ऋषि वाग्यस्तु मात्र ( Verbal display ) मानते हैं ॥ २८ ॥

विमर्श--इसका विशेष विवेचन विमानस्थान के तीसरे अध्याय में किया गया है, वहीं देते । वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन् काले ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 998

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 998 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शरीरविचयशारीराध्यायः ६ ] शारीरस्थानम् ६०६ ( ८ ) प्रश्न: गर्भ की परमायु कितनी होती है ( किञ्चास्य परमायुः ), उत्तर -- इस कलियुग के आरम्भ काल में आयु का प्रमाण सौ वर्ष है ॥ २ ९ ॥ तस्य निमित्तं प्रकृतिगुणात्मसंपत् सात्म्योपसेवनं चेति ॥ ३० ॥

( ९ ) प्रश्न: परमायु प्राप्त करने का क्या कारण हे ( कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति? ), उत्तर - प्रकृति, गुण और आत्मा की सम्पद् होना और साम्त्यसेवन परमायु का कारण है ॥३० ॥

विमर्श - प्रकृति सम्पत् अर्थात् बालक की उत्पत्ति के समय प्रकृति की उत्पत्ति का कारण माता का शोणित, पिता का शुक्र, आत्मा सात्म्य, सत्त्व, रस, व माता के उचित आहार - विहार से उत्पन्न होने वाले वात, पित्त, कफ का अपनी उचित मात्रा में वर्तमान रहना; गुणसम्पत् — सत्त्व, रज, तम में सत्त्व की प्रधानता, शरीर का सार संहनन आदि से गुणयुक्त होना, आत्मसम्पत्— आ के कारणभूत उत्कृष्ट धर्म - कर्म से युक्त होना; सात्म्योपसेवन - प्रकृति के अनुकूल और हितकारी वस्तुओं का सेवन ये परम आयु प्राप्त करने के साधन हैं, अर्थात् इन सभी गुणों से युक्त होना परम आयु का कारण होता है । कुछ लोग प्रकृतिगुणसम्पत् व आत्मसम्पत् व सात्म्यो-पसेवन ये तीन ही कारण मानते हैं अर्थात् प्रकृति के गुणों का ठीक होना, आत्मा का उत्कृष्ट होना और सात्म्य वस्तु का सेवन परमायु प्राप्त करने का कारण होता है ।

तत्र श्लोकाः-शरीरं यद्यथा तचैवर्तते क्लिष्टमा मयैः ।

यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः ॥ ३१ ॥

वृद्धिहासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत् ।

देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराश्च ये ॥ ३२ ॥

परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक् क्रिया ।

मलाख्याः संप्रसादाख्यो धातवः प्रश्न एव च ॥

aast fort विधिवत् संप्रकाशितः ।

तथ्यः शरीरविचये शारीरे परमर्षिणा ॥ ३४ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचयशारीरं नाम षष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अध्याय उपसंहार - शरीर किसे कहते हैं अर्थात् शरीर की क्या परिभाषा? वह शरीर शरीर का विनाश किस प्रकार रोगों से क्लेश पाता है, कैसे वह दुखी रहता है । और कैसे होता है, शरीर में जो धातुयें होती है उनका वृद्धि, हास, कैसे होता है, हास होने पर उनकी औषध क्या है, देहवृद्धि करने वाले भाव, जो बल वृद्धि करने वाले भाव हैं, आहार को परिणाम करने वाले भाव और उन भावों के अलग - अलग कर्म; मल धातु व प्रसाद धातु, तथा नव प्रश्न व इनका विधिपूर्वक निर्णय इस शरीर विचय नामक अध्याय में परमर्षि आत्रेय पुनर्वसु ने विधि-पूर्वक बताया है ॥ ३०-३४ ॥ इस प्रकार चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के शारिस्थान में शरीरविचयशारीर नामक छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥

१. ' यथावच्च ' इति पा ० । २. ' सप्रसादाख्या: ' इति पा ० । ३. ' दशक: ' इति पा ० ।

पृष्ठ 999

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 999 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१० चरकसंहिता अथ सप्तमोऽध्यायः अथातः शरीरसंख्याशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद शरीर संख्या नामक शारीर की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श -- पहले अध्याय में धातु भेद से शरीर का वर्णन है । इस अध्याय में शरीर के विभिन्न अवयवों की दृष्टि से वर्णन किया जायगा । * शरीसंख्यामवयवशः कृत्स्नं शरीरं प्रविभज्य सर्वशरीरसंख्यानप्रमाणज्ञानहेतोर्भ गवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ ॥ ३ ॥

शरीर विज्ञानाथे अग्निवेश का प्रश्न - सम्पूर्ण शरीर को अवयवों में विभाग कर सम्पूर्ण शरीर के ज्ञान और उन शरीरावयवों के प्रमाण को जानने के लिए अग्निवेश ने भगवान् आत्रेव से प्रश्न पूछा || ३ || तमुवाच भगवानात्रेयः - शृणु मत्तोऽग्निवेश! सर्वशरीरमाचक्षाणस्य यथाप्रश्नमेक-मना यथावत् । शरीरे षट त्वचः; तद्यथा - उदकधरा स्वग्बाह्या, द्वितीया त्वसृग्धरा, तृतीया सिमकिलाससंभवाधिष्टाना, चतुर्थी दङ्गूकुष्टसंभवाधिष्ठाना, पञ्चमी त्वलजीविद्रधिसम्भवा-ष्टाना, षष्ठी तु यस्यां छिन्नायां ताम्यत्यन्ध इव च तमः प्रविशति यां चाप्यधिष्ठायारूंषि जायन्ते पर्वसु कृष्णरक्तानि स्थूलमूलानि दुश्चिकित्स्यतमानि च इति षट् त्वचः । एताः षडङ्गं शरीरमवतत्य तिष्ठन्ति ॥ ४ ॥

त्वचाओं का वर्णन - अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा । हे अग्निवेश! तुमने जिस प्रकार प्रश्न पूछा है उसके अनुसार शरीर की व्याख्या एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनो । शरीर में ६ त्वचायें होती हैं । जैसे - १. बाहरी त्वचा, जल को धारण करने वाली, २. रक्त को धारण करने वाली, ३. सिध्म और किलास नामक कुष्ठ की उत्पत्ति का स्थान, ४. दाद और सभी कुष्ठों की उत्पत्ति का स्थान, ५. अलजी और विद्रधि की उत्पत्ति का स्थान, और ६. जिसके कट जाने पर मनुष्य अन्धे की तरह अपने को अन्धकार में प्रविष्ट हुआ अनुभव करता है, और जिस त्वचा के आश्रयभूत काली, लाल, स्थूलमूल वाली अत्यन्त दुश्चिकित्स्य फुंसियाँ पर्वों ( गाँठ - गाँठ ) पर उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार ये ६ त्वचायें होती हैं । ये त्वचायें षडङ्ग शरीर को व्याप्त किए रहती हैं ॥ ४ ॥

विमर्श - त्वचाएँ सम्पूर्ण शरीर को आच्छादित करती हैं और सर्वप्रथम शरीर में ये ही दृष्टि-गोचर होती हैं । अतः सबसे पहले त्वचा का वर्णन किया गया है । चरक के अनुसार त्वचाएँ ६ होती हैं, पर सुश्रुत ने सात त्वचायें मानी हैं, और उन त्वचाओं के नाम और मोटाई का भी उल्लेख किया है । इसकी उत्पत्ति के विषय में सुश्रुत और वाग्भट में एक मत है, जैसे -- ' तत्रासृजः पच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिकाः षट् त्वचो भवन्ति । ' ( वा. शा. अ. ७ ) । ' तत्र खल्वेवं प्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्या-भिपच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति । ' ( सु. शा. अ ४ ) चरक ने उत्पत्ति के विषय में अपना मत व्यक्त नहीं किया है । ६ और ७ त्वचाओं का एकीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है । १. ' शरीरसंख्यां नाम शारीरम् ' इति पा ० । २. ' सर्वशरीरमभिसंचक्षाणात् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1000

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1000 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शरीरसंख्याशारीराध्यायः ७ 9 ] शारीरस्थानम् ६११ ( १ ) चरकोक्त प्रथमा उदकधरा है, बाहरी त्वचा सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई उदक को धारण करने से उदकधरा कही जाती है । शरीर के काले, श्याम, गौर, आदि वर्गों की प्रतीति इसी त्वचा पर होती है इसीलिए सुश्रुत ने इसका नाम ' अवभासिनी ' रखा है । ( २ ) द्वितीय त्वचा रक्तधरा है, इसमें रक्तवाहिनियाँ संलग्न रहती हैं, इससे इस दूसरी त्वचा का वर्ण रक्त होता है, इसीलिए सुश्रुत ने इसका नाम ' लोहिता ' रखा है । ( ३ ) तीसरी त्वचा सिध्म और किलास रोग की उत्पत्ति का स्थान है, ऐसा चरक ने माना है । सुश्रुत ने पहली त्वचा पर सिध्म, पद्मकण्टक, दूसरी पर तिलकालक, न्यच्छ और व्यङ्ग का होना, तीसरी पर चर्मदल, अजगल्ली, मस्सों का होना माना है । सम्भवतः चरक के अनुसार ये सभी रोग तीसरी त्वचा पर ही होते हैं । इस त्वचा का नाम सुश्रुत ने ' श्वेता ' रखा है, क्योंकि इसका वर्ण श्वेत होता है । चौथी त्वचा को सुश्रुत ने विविध कुष्ठ का आश्रय माना है । इसका वर्ण ताम्र की तरह रक्त वर्ष का होता है, क्योंकि रक्तवाहिनियों द्वारा रक्त का प्रवाहित होना इसी त्वचा में माना जाता है । इसीलिये सुश्रुत ने इसका नाम ' ताम्रा ' रखा है । इस प्रकार सुश्रुत के तीसरी और चौथी त्वचा को चरक ने तीसरी त्वचा माना है गंगाधर का मन इस प्रकार -- ' अत्र सुश्रुतः प्रोवाच तृतीया श्वेता नाम व्रीहेः षोडश भाग द्वे त्वचे प्रोवाच तन्त्रेऽस्मिन् ते द्वे त्वेकत्वेन स्वीकृत्य तृतीया त्वगुक्ता । ' ( ४ ) दद्रु और कुष्ठ के आश्रय भूत स्थान को चौथी त्वचा कहते हैं । सुश्रुत ने इसे पाँचवीं त्वचा माना है, जैसा कि - ' पञ्चमी वेदिनी नाम व्रीहिपञ्चभागप्रमाणा कुठवीसर्पाधिष्ठाना ' इस वाक्य से स्पष्ट है । कुष्ठ का आश्रय चरक चौथे चर्म को और सुश्रुत ने पाचवें चर्म को माना है 1 ( ५ ) पाँचवीं त्वचा को चरक ने अलजी और विद्रधि का उत्पत्ति का स्थान माना है । सुश्रुत ने इन रोगों का स्थान छठीं ' रोहिणी ' त्वचा को माना है ( ' षष्ठी रोहिणी नाम व्रीहिप्रमाणा, ग्रन्थयपच्यर्बुदश्लीपदगलगण्डाधिष्ठाना । ' ) ये सभी रोग विद्रधि के स्थान पर ही होते है । सम्भवतः यदि ये पक जायँ तो विद्रधि ही हो जाते हैं । अतः चरक की पाँचवों और सुश्रुत की छठीं त्वचा एक है । ( ६ ) छठी त्वचा वह है जिसके कट जाने पर आँख के सामने अन्धकार हो जाता है और जो लाल, काली, स्थूलमूल वाली फुसियों का स्थान है । ये फुन्सियाँ पर्वों में होती हैं । सुश्रुत ने सातवीं त्वचा को भगन्दर, विद्रधि, अर्श का स्थान माना है । ये भगन्दर आदि स्थूल मूल वाले, फुंसी के रूप से प्रारम्भ होकर अपनी पूर्ण अवस्था को प्राप्त होते हैं अतः चरक की छठीं और सुश्रुत की सातवीं त्वचा एक है । तत्रीयं शरीरस्याङ्गविभागः; तद्यथा- - द्वौ बाहू, द्वे सक्थिनी, शिरोग्रीवम्, अन्तराधिः, इति षडङ्गमङ्गम् ॥ ५ ॥

अङ्गों का विभाग - यहाँ यह शरीर के अङ्गों का विभाग है । जैसे दो बाँह, दो पैर, शिर, ग्रीवा और मध्य शरीर, इस प्रकार ये ६ अङ्ग हैं ॥ ५ ॥

त्रीणि षष्टीनि शतान्यस्नां सह दन्तोलूखलनखेनं । तद्यथा - द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, षष्टिः पाणिपादाङ्गुल्यस्थीनि, विंशतिः पाणिपाद-शलाकाः, चत्वारि पाणिपादशलाकाधिष्ठानानि, द्वे पाण्योरस्थिनी, चत्वारः पादयो-गुल्फा:, द्वौ मॅणिक हस्तयोः, चत्वार्यरन्योरस्थीनि चत्वारि जङ्घयोः, द्वे जानुनी, द्वे १. ' अथ ' इति पा ० । २. ' दन्तोलूखलनखैः ' इति पा ० । ३. ' चत्वार्यधिष्ठानान्यासाम् ' इति पा ० । ४. ' मणिबन्धको ' इति पा ० ।