चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 101–110
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 101–110
पृष्ठ 101
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५ चरकसंहिता रोग का धर्मादि प्राप्ति में बाधकत्व - आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ का उत्तम ( प्रधान ) मूल है । रोग उस परम कल्याणकारी आरोग्य और जीवन को नष्ट करने वाला है । यह रोग मानत्रजगत में बहुत बड़ा त्रिघ्नस्वरूप उत्पन्न हुआ है । इस रोग की शान्ति का उपाय क्या होगा, ऐसा कह कर महर्षिगण इस रोग की शान्ति का मार्ग निकालने के लिए ध्यानस्थ हो गए । जब महर्षिगण ध्यानस्थ हो गए तब ध्यानावस्था में ही वे दिव्यदृष्टि से यह देखें कि आयुर्वेद ज्ञान इष्टसिद्धि के लिए हैं और शक ( इन्द्र ) ही हम लोगों के लिए शरण हैं अर्थात् यदि उनके शरण में हमलोग जायेंगे तो वह अमरप्रभु ( देवताओं के स्वामी ) यथावत् उचित रूप में रोगों की शान्ति का उपाय बतायेंगे ॥ १५- १७ ॥ कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत् प्रष्टुं शचीपतिम् ॥ १८ ॥
अहमर्थे नियुज्येऽयमत्रेति प्रथमं वचः । भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः ॥ १ ९ ॥
स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । ददर्श वलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २० ॥
सोऽभिगम्य जयाशीभिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । प्रोवाच भगवान् धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम् ॥ व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयङ्कराः । तद् ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो ॥२२ ॥
तस्मै प्रोवाच भगवानायुर्वेदं शतक्रतुः । पदैरल्पेर्मति बुद्धा विपुलां परमर्षये ॥ २३ ॥
भरद्वाज की नियुक्ति तथा इन्द्र से वार्ता - जब यह निश्चित हो गया कि शान्ति का उपाय इन्द्र ही बताने में समर्थ है तो इन्द्र से पूछने के लिए इन्द्रभवन कौन जायगा, या जाने में समर्थ है ( क्योंकि अधिक तपोबल से हो इस मनुष्य शरीर से स्वर्ग में जाया जा सकता है, तो ' जो जाने में समर्थ हो वह स्वयं कहे ) ऐसे प्रश्न पर परम तपस्वी और इन्द्र के भवन तक जाने में समर्थ भरद्वाज महर्षि ने कहा कि इस कार्य में मैं लगाया जाऊँ, इस प्रकार उस सभा में सर्व-प्रथम वचन भरद्वाज ने ही कहा अतः सभी महर्षिगण भरद्वाज को ही इन्द्र के पास भेजे । वह भरद्वाज इन्द्र के भवन में जाकर, अग्नि के समान देदीप्यमान, देवता और ऋषियों के मध्यभाग में वर्तमान और जो बल नामक दैत्य को मार चुके है ऐसे भगवान इन्द्र को देखे । और वह • भरद्वाज ऋषि इन्द्र के पास जाकर आप की जय हो ऐसे आशीर्वाद से इन्द्र का अभिनन्दन करने के बाद बुद्धिमान् भगवान भरद्वाज ने ऋषियों के उत्तम वाक्यों को इन्द्र से कहा । सभी जीवधारियों के लिए भय देने वाले रोग उत्पन्न हो गए है अत: है अमरप्रभु! उचित रूप में उन रोगों की शान्ति का उपाय मुझ से कहिए । नव भगवान इन्द्र ने भरद्वाज को परम बुद्धिमान् समझ कर थोड़े ही शब्दों के द्वारा सम्पूर्ण आयुर्वेद का सूत्र रूप ( संक्षेप रूप ) में उपदेश कर दिया । वह कौन सा उपदेश है यह निम्न लोक से स्पष्ट है ॥ १८-२३ ॥ हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः ॥ २४ ॥
त्रिसूत्र आयुर्वेद का स्वरूप -- स्वस्थ एवं आतुरो ( रोगियों ) के लिए पर ( उत्तम ) अयन ( मार्ग ) बताने वाला, हेतु ( निदान ) लिङ्ग ( लक्षण ) औषध ज्ञान है । ऐसा त्रिसूत्र, शाश्वत ( नित्य ) पुण्य देने वाले और जिस आयुर्वेद को मह्मा ने स्वयं जाना था उसका उपदेश इन्द्र ने भरद्वाज के लिए किया था ॥ २४ ॥
विमर्श - इस शेक द्वारा संक्षेप के सम्पूर्ण अयुर्वेद का उपदेश किया गया है, आयुर्वेद-ज्ञान का दो ही प्रयोजन आयुर्वेद में बनाया है - जैसा कि ' स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं व्याधितानां १. बलनाम्नोऽसुरस्य हन्तारमिन्द्रम् । इस ग्रंथ में जो लोक परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण समझा गया है उस श्लोक में ऐसा चिह्न लगाया गया है ।
पृष्ठ 102
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्रस्थानम् Ε व्याधि - परिमोक्षः ', अतः यहाँ भी जो स्वस्थ [ जैसे- ' समदोषः समाग्निश्व समधातुमलक्रियः । प्रसन्नात्मे-न्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ] और आतुर ( रोगी ) है वे जो आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्तकर अपनी दिनचर्या उत्तम रूप से निर्वाह कर सके ऐसे आयुर्वेद का त्रिसूत्र रूप में उपदेश किया गया है । जैसे ( १ ) हेतुसूत्र - ' कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च । द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतु-संग्रह: ॥ ( २ ) लिङ्गसूत्र - ' लिङ्गयन्ते ज्ञायन्ते व्याधयोऽनेन ' इस निरुक्ति से पूर्वरूप, रूप, उपशय, अनुपशय, सम्प्राप्ति ये लिङ्ग सूत्र हैं अथवा ' रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ॥ ' दोषों का विषम होना ही रोग है, यही व्याधि का लिङ्ग है । वे लिङ्गसूत्र - ' वातपित्तकफैश्वोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः । मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च नम एव च । ' शारीरिक और मानसिक दो भेद होकर शारीरिक दोष का तीन भेद और मानसिक दोष का ढो भेद होता है । ( ३ ) औषधसूत्र - औषध द्रव्य को ही कहा जाता है । वह तीन प्रकार का होता है । यथा - ' किञ्चिद्दोपप्रशमनं किञ्चिद्धानुप्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चित्रिविधं द्रव्यमुच्यते । ' इस हेतु, लिङ्ग, द्रव्य, ( औषध ) संग्राहक सूत्रों में सभी आयुर्वेदशास्त्र में जानने योग्य विषयों का संक्षेप में संग्रह कर दिया गया है अतः इसे त्रिसूत्र कहा गया है । त्रिसूत्र आयुर्वेद हेतु सूत्र लिङ्गसूत्र द्रव्य ( औषध ) सूत्र काल इन्द्रियार्थ ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग ) कर्म अतियोग मिथ्यायोग हीनयोग अतियोग मिथ्यायोग हीनयोग अतियोग मिथ्यायोग हीनयोग परिणाम प्रज्ञापराध. जरा, भूखप्यास मृत्यु धीभ्रंश धृतिभ्रंश स्मृतिभ्रंश लिङ्गसूत्र पूर्वरूप रूप उपशय अनुपज्ञय सम्प्राप्ति शारीरिक मानसिक i बात पित्त कफ दोषशामक रज तम द्रव्य ( औषध ) सूत्र दोष प्रकोपक. स्वस्थ के लिए हितकारी
पृष्ठ 103
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१० चरकसंहिता सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः || २५ || वह महाबुद्धिमान् मुनि भरद्वाज शीघ्र ही जिस आयुर्वेद का आदि है न अन्त है ऐसे त्रिस्कन्ध ( हेतु - लिङ्ग औषधयुक्त ) सम्पूर्ण आयुर्वेद को ध्यानपूर्वक अध्ययन करते हुए ठीक ठीक ज्ञान प्राप्त कर लिये ॥ २५ ॥
तेनायुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् । ऋषिभ्योऽनधिकं तच्च शशंसानवशेषयन् ॥२६ ॥
आयुर्वेदशास्त्र का ज्ञान और उसका अनुष्ठान करके भरद्वाज ने सुखयुक्त अमित आयु को प्राप्त किया और जो आयुर्वेद का उपदेश इन्द्र से प्राप्त किए थे वे सभी उपदेश ऋषियों को सुना दिये ॥ २६ ॥
विमर्श - यहाँ सुखान्वित आयु की प्राप्ति हुई यह बनाया है - सुख आयु की परिभाषा -' शारीरमानसाभ्यां रोगाभ्यामनतिद्रुतस्य विशेषेण यौवनवतः समन्वागतवलवीर्य यशः पौरुष परा-क्रमस्य ज्ञानविज्ञानेन्द्रियार्थबलसमुदये वर्तमानस्य परमर्द्धिरुचिरविविधोपभोगस्य समृद्धसर्वारम्भस्य यथेष्टविचारिणः सुखमायुरुच्यते । ( सू. अ. ३० ) बतायी गयी है । अनधिकं - का तात्पर्य यह है कि जो इन्द्र से सुना था वहीं बताया न कि अपने मन से कल्पना करके कुछ अधिक बता दिया-अनवशेषयन् —का तात्पर्य यह है कि जो इन्द्र से सुना था उसमें से कुछ छिपाया नहीं अर्थात् सम्पूर्ण सुने हुए आयुर्वेद का उपदेश अविकल रूप में ऋषियों को दिया था । ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् । दीर्घमायुश्चिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः ॥ २७ ॥
दीर्घ जीवन की इच्छा करते हुए ऋषिगण प्रजाहितकर और आयु को बढ़ाने वाले वेद ( आयुर्वेद ) को भरद्वाज से ग्रहण किया ॥ २७ ॥
* महर्षयस्ते ददृशुर्यथावज्ज्ञानचचुषा । सामान्यं च विशेषं च गुणान् द्रव्याणि कर्म च ॥२८ ॥
समवायं च, तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विधिमास्थिताः । लेभिरे परमं शर्म जीवितं चाप्यनित्वंरम् ॥ ( २ ) षट् - पदार्थ विज्ञान त्रिसूत्र आयुर्वेद का तत्कालीन व्यावहारिक स्वरूप - उन महर्षियों को जब आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त हो गया तब वे ज्ञानचक्षु ( दिव्य दृष्टि ) से ठीक - ठीक रूप में - ( १ ) सामान्य ( २ ) विशेष ( ३ ) गुण ( ४ ) द्रव्य ( ५ ) कर्म ( ६ ) समवाय इन पदार्थों को देखे ( समझे ) । जब इन पदार्थों को समझ लिए तब आयुर्वेद शास्त्र में बताई हुई विधियों में अपनी आस्था विश्वास दृढ़ किया तब उन्हें परम शान्ति मिली और बाद में आयुर्वेद - विहिन उपदेशों का अनुष्ठान करने से अनश्वर ( नित्य ) आयु को प्राप्त किए ॥ २८-२९ ॥ विमर्श - महर्षियों ने जिन ६ सामान्यादि को ध्यानस्थ हो कर दिव्यदृष्टि से देखा उन्हे ही अन्य दर्शनकार पदार्थ मानते है । न्यायादि दर्शनों ने सात पदार्थ माने हैं, पर चरक के अनुसार ही वैशेषिक दर्शन भी ६ ही पदार्थ मानता है । वैशेषिक इस विषय में अपनी एक विशेष दृष्टि रखता है वह यह है कि देश में बौद्धों का साम्राज्य फैला हुआ था । उन्हीं के सिद्धान्तों का जगत में प्रचार एवं प्रसार था । उनका यह मत था कि संसार के सभी पदार्थ परस्पर संयोग से उत्पन्न होते है । पदार्थों का संयोग ही जीवन का मूल तत्त्व है । इनके यहाँ आत्मा, प्रकृति, पुरुष आदि कोई नहीं है । इसी मत का प्रचार बुद्ध युग में प्रबल रूप से था । उस समय वस्तुओं के परिणाम को देख कर उसका श्रेय उसी वस्तु को दिया जाता था, जिससे वह निष्पन्न होता था । इस वौद्धकालीन विचार १. ' तेनर्षयस्ते ' ग. । २. ' चाप्यनश्वरम् ' इति यो. ।
पृष्ठ 104
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्रस्थानम् ११ धारा का खण्डन कर वैशेषिको ने संसार के पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध, तथा उनके साधर्म्य और वैधर्म्य का विवेचन सरल और व्यापक ढङ्ग से किया है । इसका विशेष वर्णन वैशेषिक दर्शन में ही देखना चाहिए । आयुर्वेद अभाव पदार्थ को नहीं मानता है, इसका कारण यह है कि अभाव स्वतः सिद्ध है अभाव से कोई कार्य नहीं होता है । किसी भी भाव पदार्थ से ही रोग होते है उसकी चिकित्सा भी भाव पदार्थ से ही होती है अतः अभाव को नहीं माना जाता है । यदि यह कहा जाय कि भोजनाभाव से वात की वृद्धि और तज्जन्य वात रोग होते हैं और ' अक्षिकुक्षिभवा रोगाः प्रति-श्यायव्रणज्वराः । पञ्चैते विनिवर्तन्ते रोगाः केवललङ्घनात् ॥ ' अर्थात् ये रोग भोजनाभाव से शान्त होते हैं । अतः प्रत्यक्ष है कि जैसे भाव पदार्थ रोग और चिकित्सा में कारण है उसी प्रकार अभाव भी रोग एवं चिकित्सा में कारण है । अतः सातवाँ पदार्थ अभाव को स्वीकार करना चाहिए | इसका उत्तर यह कि अभाव के होने में कोई कारण नहीं होता है पर भाव पदार्थ सदा सकारण होता है । जिसका कारण नहीं है और जिसका इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं होता है, वह है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । भोजनाभाव से रोगों की उत्पत्ति और उसकी चिकित्सा होती है यह कहा गया है, वह भी ठीक नहीं है- क्योंकि उस स्थल में लघुता गुण का शरीर में भाव होने से ही रोगोत्पत्ति या रोग की शान्ति होती है । इसीलिए अभाव को पृथक् प्रमाण भी नहीं माना जाता क्योंकि जिस इन्द्रिय से जिस भाव पदार्थ का भान होता है उस पदार्थ के अभाव का भी उसी इन्द्रिय से ग्रहण होता है । इसी बात को - ' प्रवृत्तिहेतुभावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् । केचित्तत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ॥ ' ( सू. अ. १६ ) स्पष्ट किया है । यहाँ केचित् की युक्ति से अभाव का सकारण होना सिद्ध किया गया है । पर यह मत केचित् कहने से ही चरक को अभीष्ट नहीं है यह सिद्ध है । दूसरी बात यह है कि हेतु का न होना ही अभाव में कारण माना जाय तो गौरव होगा, जैसे किसी ने प्रश्न किया कि यहाँ घट क्यों नहीं है तब उत्तर होगा उसका यहाँ प्रयोजन नहीं है, पुनः प्रश्न किया यहाँ देवदत्त क्यों नहीं है तब पुनः उत्तर दिया उसका यहाँ प्रयोजन नहीं है इसी प्रकार जगत् के सारे पदार्थों का नामग्राह प्रश्न किया जाय और प्रत्येक के अभाव में प्रयोजन का न होना कारण बताया जाय तो प्रश्न एवं उत्तर कर्ता का जीवन समाप्त हो जायगा पर प्रश्न - उत्तर समाप्त न होगा अतः लाघन से यह कल्पना कर लेना कि सभी पदार्थों का अभाव सर्वत्र स्वतः सिद्ध रहता है, यदि उसका भाव होता है तो विना प्रयोजन नहीं होता है अतः स्वतः सिद्ध अभाव की गणना आयुर्वेद नहीं करता है । वैशेषिक अभाव पदार्थ में साधर्म्य - वैधर्म्य की कल्पना नहीं हो सकती केवल भावात्मक पदार्थ में ही साधर्म्य और वैधर्म्य की कल्पना की जा सकती हैं अतः अभाव को नहीं माना है । वैशेषिक ने तो द्रव्य, गुण कर्म इन तीनों को मुख्य पदार्थ और सामान्य, विशेष और समवाय को उपपदार्थ माना है । यद्यपि किरणावली में भी सात पदार्थ माना गया है पर मुख्यतया वे भी ६ पदार्थ ही मानते हैं यथा - ' एतेन भावपदार्था एव प्रधानतयोद्दिष्टा वेदितव्याः, अभावस्तु स्वरूपवानवपि पृथग् नोद्दिष्टः प्रतियोगिनिरूपणाधीनत्वान्नतु तुच्छत्वात् इति । अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः । शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥३० ॥
अग्निवेशश्च भेल ( ड ) श्व जतूकर्णः पराशरः । हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥३६ ॥
पुनर्वसु आत्रेय का अग्निवेशादि छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश - भरद्वाज ऋषि के शिष्य आत्रेय पुनर्वसु ने प्राणिमात्र पर मित्रता की बुद्धि रख कर और सभी प्राणियों पर अनुकम्पा ( दया ) रखते हुए पुण्यप्रद आयुर्वेद ६ शिष्यों को दिया अर्थात् अध्यापन किया । वे ( १ ) अग्निवेश ( २ ) भेल ( ३ ) जतूकर्ण ( ४ ) पराशर (: ) हारीत ( ६ ) क्षारपाणि ये ६ शिष्य मुनि आत्रेय पुनर्वसु से उपदिष्ट आयुर्वेद को यथावत् रूप में ग्रहण किए ॥ ३०-३१ ॥
पृष्ठ 105
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२ चरकसंहिता विमर्श -- भरद्वाज ऋषि के शिष्य पुनर्वसु आत्रेय थे यह बात हारीत संहिता में स्पष्ट की गई है यथा -- भरद्वाज ने स्वयं कहा है- ' शक्रादहमधीतवान् ' के बाद ' यत्तः पुनर संख्येयास्त्रिसूत्रं त्रिप्रयो-जनम् । अत्रात्रेयादिपर्यंन्ता विदुः सप्त महर्षयः । आत्रेयाद्धारीन ऋषिः ' इत्यादि । वाग्भट ने आत्रेय को इन्द्र का शिष्य माना है, यथा- ' ब्रह्मा स्मृत्वायुषो वेदं प्रजापतिमाग्रहत् । सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान् मुनीन् ॥ ' इसका तात्पर्य यह है कि आत्रेय शब्द से कृष्णात्रेय, भिक्षुआत्रेय पुनर्वसु आत्रेय इन तीन आत्रेयों का वर्णन संहिता ग्रंथों में आता है । जिस समय ऋषियों की सभा हिमालय पर हुई उस समय आत्रेय और भिक्षुआत्रेय वर्तमान थे । उनके मध्य से भरद्वाज ही इन्द्र के यहाँ गए, यह शब्इतः लिखा गया है । इन दो आत्रेयों का इन्द्र का शिष्य होना सम्भव नहीं है । बाद में कोई अन्य आत्रेय इन्द्र के शिष्य जिन्होंने आत्रेयसंहिता नामक पुस्तक की रचना की थी पर वह उतनी प्रसिद्ध नहीं हुई जितनी अनिवेशसंहिता प्रसिद्ध हो गई । यहाँ यह भी नहीं लिखा गया है कि पुनर्वसु आत्रेय ने, जिन ६ शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश किया उन्होंने अपने नाम से संहिता बनाई थी । अतः यह स्पष्ट है कि आत्रेय संहिता का कर्ता आत्रेय मुनि पुनर्वम् आत्रेय के बाद हुए है, जो इन्द्र के शिष्य थे । ' अभिगोत्रापत्यं पुमान् आत्रेय ' इस व्युपत्ति से आत्रेयों की संख्या अनेकों हो सकती है । पर यहाँ पुनर्वसु आत्रेय को भरद्वाज का शिष्य ही मानना चाहिए । बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुनेः । तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत् ॥ ३२ ॥
अथ भेला ( डा ) दयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च । श्रावयामासुरात्रेयं सर्पिसङ्घं सुमेधसः ॥ अग्निवेशादि के तन्त्रों का निर्माण - इन ६ शिष्यों में सबसे अधिक वुद्धिमान अग्निवेश थे क्यों कि सर्वप्रथम ग्रन्थनिर्माण इन्होंने ही किया । ग्रन्थ का निर्माण करना ही उत्तम बुद्धि का परिचायक है, सभी के साथ ही अग्निवेश भी अध्ययन किए थे, ऐसा नहीं था कि गुरु इन पर विशेष कृपा कर अलग अध्ययन कराते थे यह बात ' नोपदेशान्तरं मुनेः ' से स्पष्ट है । समान उपदेश होने पर भी ग्रंथनिर्माण शीघ्रता से सर्वप्रथम कर लिया अतः बुद्धिमान थे । और बाद में भेल आदि बुद्धिमान शिष्यों ने भी अपने - अपने नाम से संहिता की रचना की और उसे अन्य ऋषियों के साथ गुरु आत्रेय को सुनाया ॥ ३२-३३ ॥ श्रुत्वा सूत्रणमर्थानामृषयः पुण्यकर्मणाम् । यथावत्सूत्रितमिति प्रहृष्टास्तेऽनुमेनिरे ॥ ३४ ॥
सर्व एवास्तुवंस्तांश्च सर्वभूतहितैषिणः । साधु भूतेष्वनुक्रोश इत्युच्चैरब्रुवन् समम् ॥। ३५ ॥ आयुर्वेदतन्त्रों का समस्त मुनियों द्वारा अनुमोदन -- पुण्य है कर्म जिन लोगों का ऐसे अग्निवेश आदि ऋषियों द्वारा आयुर्वेदीय अर्थों का सूत्रण ( यथाक्रम निवन्धन ) सुन कर ऋषि-समुदाय ने प्रसन्न होकर उनके तन्त्रों का अनुमोदन किया और कहा कि आप लोगों ने विषयों का विन्यास बहुत ही उचित रूप में किया है और सभी प्राणियों का हित चाहने वाले उन अग्निवेश प्रमुख ऋषियों की प्रशंसा सभी ने का और सभी ने एक साथ ही उच्च स्वर से यह कहा कि आप लोगों ने प्रागधारियों पर साधु ( अच्छी प्रकार से ) दया की ॥ ३४-३५ ॥ तं पुण्यं शुश्रुवुः शब्दं दिवि देवर्षयः स्थिताः । सामराः परमर्षीणां श्रुत्वा मुमुदिरे परम् ॥३६ ॥
अहो साध्विति निघोषो लोकांस्त्रीनन्ववादयत् । नभसि सिग्धगम्भीरो हर्षाद् भूतैरुदीरितः ॥ शिवो वायुर्वी सर्वा भाभिरुन्मीलिता दिशः । निपेतुः सजलाश्चैव दिव्याः कुसुमवृष्टयः ॥३८ ॥
आयुर्वेदाय तन्त्रों का सर्वत्र स्वागत - स्वर्ग में स्थित देवताओं के साथ देवगण पर-मपियों के उच्च स्वर से कहे गए पुण्यमय उस शब्द को सुने और सुन कर परम प्रसन्न हुए और १. ' सर्वभूतेष्वनुक्रोशः इति पा ० । २. ' घोषश्च ' इति ग. ।
पृष्ठ 106
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' सूत्रस्थानम् १३ आकाश से हर्ष के साथ निकला हुआ स्निग्ध एवं गम्भीर अहो साधु ( अच्छा ) यह शब्द तीनों लोक में फैल गया, अर्थात् इतने उच्च स्वर से यह शब्द हुआ कि इसकी प्रतिध्वनि लोकत्रय में गूंज गई । उस समय कल्याणकारी वायु बहने लगा, सभी दिशायें प्रभा से प्रकाशित हो गई, जल के साथ फूलों की वृष्टि आकाश से होने लगी ॥ ३६-३८ ॥ अधाग्निवेशप्रमुखान् विविशुर्ज्ञानदेवताः । बुद्धिः सिद्धिः स्मृतिर्मेधा धृतिः कीर्तिः ' क्षमा दया ॥ तानि चानुमतान्येषां तन्त्राणि परमर्षिभिः । भवाय भूतसङ्घानां प्रतिष्ठां भुवि लेभिरे || ४० || और भी - जिस समय इन ऋषियों की प्रशंसा हो रही थी उसी समय इन ऋषियों के पास बुद्धि, सिद्धि स्मृति, मेधा, धृति, कीर्ति, क्षमा और दया स्वरूप ज्ञान के देवता चले गए, अर्थात् बुद्धि आदि की दृढ़ता उनमें विशेष रूप से हो गयी । इस प्रकार अग्निवेश आदि ऋषियों से निर्मित संहि-तायें परमषियों से अनुमोदित होकर प्राणियों के कल्याण के लिए जगत में प्रतिष्ठा को प्राप्त हो गर्दै ॥ हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् । मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥ आयुर्वेद की परिभाष: - जिस ग्रंथ में ( १ ) हित आयु ( २ ) अहित आयु ( ३ ) सुख आयु ( ४ ) दुःख आयु, इन चार प्रकार की आयु के लिए हित ( पथ्य ) अहित ( अपथ्य ), इस आयु का मान ( प्रमाण और अप्रमाण ) और आयु का स्वरूपं बताया गया हो, उसे आयुर्वेद शास्त्र कहा जाता है ॥ ४१ ॥
विमर्श - जो मनुष्य शारीरिक मानसिक रोगों से रहित है विशेषतः युवा है उसके शरीर में बलवीर्य है, वह यशस्वी, पुरुषार्थी, पराक्रमी है, ज्ञान - विज्ञान सम्पन्न है, जिसकी इंद्रियाँ अपने - अपने विषयों के ग्रहण में पूर्ण समर्थ हैं, जो सभी प्रकार की धन - सम्पत्ति से युक्त है, और इच्छानुसार प्रत्येक कार्य जिसके निष्पन्न होते हैं उस मनुष्य की आयु को सुख आयु कहा जाता है । इससे भिन्न आयु को अमुख ( दुःख ) आयु कहा जाता है । हित आयु - जो मनुष्य सभी प्राणिमात्र का हितकर्ता हो, दूसरे के धन की इच्छा न रखता हो, सत्यवादी हो, शान्तिप्रधान, विचारपूर्वक कार्य करने वाला हो, सावधानीपूर्वक धर्म, अर्थ, काम का पालन करना हो, पूज्य व्यक्तियों की पूजा करता हो, ज्ञान, विज्ञान एवं उपशम शील हो, वृद्धजनों का सेवक हो, क्रोध, राग, ईर्ष्या, मद और अभिमान-जन्य वेगों को धारण करने वाला हो, सदा अनेक प्रकार की वस्तुओं का दान करता हो, तप, ज्ञान और शान्ति में सदा तत्पर हो, आध्यात्मविद्या का ज्ञाता हो, उसका अनुष्ठान भी करता हो और जो भी कार्य करता हो उन सभी कार्यों को स्मरणपूर्वक इस मर्त्यलोक एवं परलोक को ध्यान में रख कर करता हो, तो ऐसे मनुष्य की आयु को हित आयु कहा जाता है । इससे भिन्न आयु को अहित आयु कहा जाता है । इन चारों प्रकार की आयु के लिये हित अर्थात् आयुष्य जो आयु को बढ़ाने वाला हो, अहित, अनायुष्य जो आयु का ह्रास करने वाला हो इन दोनों का वर्णन और उस आयु का • मान जैसे यह व्यक्ति कितने दिन तक जीवित रहेगा आदि, जिसका वर्णन इंद्रियाधिकार में किया जायगा इन सबका निर्देश जिस शास्त्र में हो उसे आयुर्वेद कहा जाता है । * शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारिजीवितम् । नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्य्यायैरायुरुच्यते ॥४२ ॥
आयु के लक्षण तथा पर्याय - शरीर, इंद्रिय, मन और आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं धारि, जीविन, नित्यग, अनुवन्ध और चेतना शक्ति का होना इन पर्यायों से आयु कहा जाता है ॥ विमर्श - अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन एवं आत्मा के संयोग का ही नाम आयु है और उसके -आयु के नामान्तर ( १ ) धारि ( अर्थात् शरीर को सड़ने नहीं देता है, अतः शरीर का धारण करता है ) ( २ ) जीवित ( प्राण को धारण करना है ) ( ३ ) नित्यग ( प्रतिदिन आयु जाती रहती १. ' कीर्तिः कीर्तनं वक्तुं ज्ञानमित्यर्थः, न तु कीर्तिर्यशीरूपा, तस्या अज्ञानरूपत्वात् ' चक्रः ।
पृष्ठ 107
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४ चरकसंहिता है ) ( ४ ) अनुबन्ध ( आयु का सम्बन्ध पर, अपर शरीर से था प्राण से सदा लगा रहता है । यहाँ चकार से चेतनानुवृत्ति का ग्रहण किया जाता है, क्योंकि आयु के लक्षण करते समय अर्थे दश महामूलीय अध्याय में - ' तत्रायुश्चेतनानुवृत्ति जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकोऽर्थं ' कहा गया है । यहाँ शरीर और आत्मा के ही संयोग को आयु मानना चाहिये, इन्द्रिय और मन का संयोग बताना व्यर्थ ही है, क्योंकि पञ्चमहाभूत से उत्पन्न २४ तत्त्वात्मक शरीर अचेतन होता है उसे ही शरीर कहा जाता है आत्मा को शरीरी कहा जाता है इसी बात को सुश्रुत ने कहा है, ' पञ्चमहाभूत-शरीरिसमवायः पुरुष इत्युच्यते ' इसका समाधान यह है कि जड़ और चेतन सभी सृष्टि मात्र की आत्मा होती है और शरीर भी होता है । उस अचेतन शरीर से आत्मा का संयोग होने पर भी वहाँ आयु शब्द का प्रयोग नहीं होता है, क्योंकि यहाँ धारि, जीवित, नित्यग, अनुबन्ध, चेतनानुवृत्ति इन पर्यायों का प्रयोग नहीं हो सकता । पर यदि शरीर आत्मा का ही संयोग आयु मानी जायगी तो अचेतन पाषाणादिमूर्ति सिल, छोटा, ऊस, - मुशल आदि में भी इस आयु का प्रयोग होने लगेगा । यद्यपि व्यवहार के लिये यह सिल १० वर्ष का है; यह ५ वर्ष की आयु का है ऐसा प्रयोग होता है तथा ' शिलापुत्रस्य शरीरम् ' ऐसा पाषाणमूर्ति लोढ़े के लिये प्रयोग भी होता है पर उस आयु की चिकित्सा आदि का वर्णन अभीष्ट नहीं है । अतः उसे भी जीवित न कहा जाय अथवा मरण के बाद लिङ्ग शरीर में आत्मा संयुक्त रहने के कारण उसे भी आयुष्मान् मानना पड़ेगा अतः शरीर, इन्द्रिय, आत्मा का संयोग ही आयु कही जाती है, ऐसा लक्षण करते हैं । सामान्यतः इन्द्रिय शब्द से बाह्येन्द्रिय और आभ्यन्तरेन्द्रिय दोनों का ग्रहण किया जाता है अतः लिङ्ग शरीर में बाह्य इन्द्रिय के अभाव होने से इसे आयुष्मान नहीं कहा जाता है और चतुर्विंशतितत्त्वात्मक शरीर भी बाह्येन्द्रिय का अभाव एवं शिलापुत्र आदि अचेतन में उभवविध इन्द्रियों के अभाव होने से आयुष्मत्ता उनमें नहीं समझी जाती है । यदि आत्मा, इन्द्रिय, शरीर के संयोग को आयु का लक्षण किया जाय, मन को लक्षण से निकाल दिया जाय तो वृक्षों में भी यह लक्षण चला जायगा, क्योंकि वृक्षों को बाहरी इन्द्रियाँ हैं जिससे खाद्य पेय और शुद्ध हवा Oxygen को लेते हैं । अतः इन्द्रियाँ भी हैं जिससे ज्ञान उन्हें होता है । अतः आत्मा, इन्द्रिय, मन, शरीर के संयोग को आयु कहा जाता है । यह लक्षण किया गया है । वृक्षों में मन नहीं होता है । अतः यह लक्षण इनमें नहीं जाता है । यदि इन्द्रिय, मन शरीर के संयोग को ही आयु का लक्षण माना जाय तो अचेतन चतुर्विंशति-तत्त्वात्मक शरीर में भी लक्षण जला जायगा अतः समानासमानजातीय व्यावर्तक उक्त लक्षण माना गया है || तस्यायुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः । वच्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् || ४३ || उभयलोकहित साधन में आयुर्वेद यह उस आयु का पुण्यतम वेद है इसलिए आयुर्वेद जानने वाले विद्वानों से पूजिन है 1 क्योंकि यह मनुष्यों के लिए इस लोक और परलोक में हितकारी है अतः इस आयुर्वेद का उपदेश कर रहे हैं ॥। ४३ ॥ विमर्श - आयुर्वेद को यहाँ पुण्यतम वेद बताया है, क्योंकि साम आदि चार वेदों में स्वर्गादि उत्तम लोक - प्राप्ति के लिए ही मार्ग बताए गए हैं अतः इसे पुण्य कहा जाता है । आयुर्वेद - विहित कर्मों का अनुष्ठान करने से इस लोक में आयु - आरोग्यादि की प्राप्ति होती है । और मनुष्य आयुर्वेदविहित कर्मों के अनुष्ठान करने से स्वस्थ रहते हुए धर्मादि का अनुष्ठान कर स्वर्ग की भी १. ' लोकयोश्मयोतिः ' म
पृष्ठ 108
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्रस्थानम् १५ प्राप्ति कर लेता है - जैसा कि ' धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ' बताया है । तथा सुश्रुत ने भी ‘ अत्रायत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेय ' इति । ( सु. सू. अ. १ ) बताया है । आयुर्वेद की स्तुति अन्यत्र भी पाई जाती है । यथा स्कन्दपुराण में - ' ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रान् रोगार्तान् परिपाल्य च । यत्पुण्यं महदाप्नोति न तत्सर्वैर्महामखैः ॥ तस्माद्भोगापवर्गार्थं रोगार्ते समुपाचरेत् । योऽनुगृहीत-मात्मानं मन्यमानो दिने दिने । उपसर्पेत रोगार्तास्तीर्णस्तेन भवार्णवः । ' इसी प्रकार नन्दिपुराण में कहा है – ' धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं साधनं यतः । अतस्त्वारोग्यदानेन नरो भवति सर्वदः ॥ ' * सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् । हासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥
सामान्य तथा विशेष की परिभाषा - सदा सभी भावों की वृद्धि करने वाला सामान्य होता है और हास ( कम करने वाला ) का कारण विशेष होता है । इस आयुर्वेदशास्त्र में सामान्य और विशेष दोनों की प्रवृत्ति की जाती है, अर्थात् इन दोनों की प्रवृत्ति ( क्रिया ) से दोष धातु एवं मलों की वृद्धि और ह्रास किया जाता है । विमर्श - यहाँ भावशब्द से ' सत्तामनुभवन्तीति भावा: ' से द्रव्य, गुण, कर्म ये तीन ही लिये जाते हैं, अर्थात् द्रव्य, गुण कर्म की जब तक स्थिति रहती है तब तक इन तीनों की वृद्धि सामान्य से होती है | और इनका हास विशेष के द्वारा होता है । सामान्य विशेष इन दोनों का संबन्ध शरीर से होता है, अर्थात् जब शरीर में किसी धातु विशेष की कमी पायी जाती है तो उसके सामान्य द्रव्य, गुण, कर्म का प्रयोग कर उसकी वृद्धि की जाती है । अर्थात् यह समझना चाहिये कि यह सामान्य तीन प्रकार का होता है । ( १ ) द्रव्यसामान्य ( २ ) गुणसामान्य ( ३ ) कर्म-सामान्य । द्रव्यसामान्य- मांस खाने से मांस बढ़ता है क्योंकि बकरे के मांस में जो मांसत्व है वह मनुष्य के मांस में भी पाया जाता है इसलिये मांस के खाने से मांस की वृद्धि होती है । उसमें भी मांस खाने वाले जो जन्तु होते हैं उसके मांस खाने से विशेष रूप से मांस की वृद्धि होती है । बताया भी है - ' नहि मांससमं किञ्चिदन्यद्देहबृहत्त्वकृत् ' तथा - ' शरीरबृंहणेनान्यदाद्यं मांसाद्विशिष्यते । ' इसी प्रकार जीव रक्त के अधिक निकल जाने पर रक्त का पान कराया जाता है । जैसा कि - ' मृगगोमहिषाजानां सद्यस्कं जीवतामसृक् । पिवेज्जीवाभिसन्धानं जीवं तद्धयाशु गच्छति । ' गुणसामान्य -- दूध एवं घी खाने से शुक्र की वृद्धि होती है । दूध और घी गुण में मधुर, स्निग्ध, शीत होते हैं इसी प्रकार अन्य जो भी द्रव्य मधुर, स्निग्ध, शीत होते हैं वे सभी द्रव्य शुक्रवर्द्धक होते हैं क्योंकि शुक्र गुण में मधुर, स्निग्ध, शीत होता है । इसी तरह स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र, पिच्छिल गुणयुक्त जो भी द्रव्य होते हैं वे कफ को बढ़ाने वाले होते हैं । जैसे दही, गुड़, घृत आदि । कर्म सामान्य - वायु का कर्म चंचल होता है अतः दौड़ने से वायु बढ़ता है । कफ का कार्य स्थिरता उत्पन्न करना है अतः सोने या बैठने से कफ की वृद्धि हो जाती हैं । इस सामान्य को क्रमशः ( १ ) अत्यन्त सामान्य, ( २ ) मध्य सामान्य और ( ३ ) एकदेश सामान्य भी माना जाता है । यह सामान्य वृद्धि करने वाला होता है यह बात भूयसा व्यपदेश न्याय से किया गया है यह बात सर्वत्र नहीं पाई जाती है । कहीं कहीं इससे विपरीतता भी मिलती है । जैसे आंवला गुण में अम्ल होता है । पित्त भी अम्ल है पर गुण सामान्य होने पर भी आंवला पित्त शामक ही होता है, वर्द्धक नहीं । यह बात अष्टांगसंग्रह में स्पष्टरूप से बतलाया गया है ' अम्लमप्यामलकं पित्तमम्लं न जनयति किन्तु जयति शीतवीर्यत्वात् तात्पर्य यह है कि आंवला का वीर्य शीत होता है पित्त वीर्य में उष्ण होता है । शीतवीर्य के कारण पित्त को नष्ट करता है । विशेष भी ३ प्रकार का होता है ( १ ) द्रव्यविशेष ( २ ) गुणविशेष ( ३ ) कर्म-१. योगीन्द्रनाथसेनस्तु ‘ सत्त्वमात्मा शरीरं चे ' त्याद्यायुर्वेदाधिकरणप्रतिपादकं ग्रन्थं प्राक् पठि-वाऽनन्तरं ' सर्वदा सर्वभावानामित्यादिग्रन्थं पठति ।
पृष्ठ 109
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६ चरकसंहिता विशेष | ( १ ) द्रव्यविशेष -- अस्थि मांस से विशेष ( भिन्न ) होता है । मांस की वृद्धि होने पर अस्थि का प्रयोग किया जाय तो वह हानिकारक होता है या वायुप्रधान जोन्हरी का सेवन करने से पार्थिवगुणविशिष्ट मांस का नाश करने वाला होता है । अतः स्थूल शरीर वाले मनुष्यों के मांस को कम करने के लिये जोन्हरी, वाजरा आदि द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है । अथवा तैजस क्षार से कफ की कमी की जाती है । ( २ ) गुणविशेष - वायु रूक्ष, लघु, शीत होता है । तेल स्निग्ध, गुरु, उष्ण युक्त होता है इसलिये तेल के प्रयोग से वायु का हास होता है । ( ३ ) कर्मविशेष - वायु चल होता है । बैठना, सोना यह कर्म स्थिरता उत्पन्न करने वाला विशेष होता है अतः बैठना, सोना आदि कर्म वायुनाशक होता है । इसी तरह कफ स्थिर होता है । उससे विशेष ( भिन्न ) दौड़ना, तैरना आदि क्रियाओं से कफ का नाश होता है । इन दोनों सामान्य और विशेष की प्रवृत्ति कर्मसामान्य एक में मिलानेवाला होता है और विशेष अलग करने वाला होता है । यह दोनों कार्य आयुर्वेदज्ञों को करना इष्ट है । क्योंकि ' रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ' अर्थात् दोष की विषमता रोग है और दोष का सम होना निरोगता का लक्षण है । यह दोष अपनी मात्रा से न्यून होते हैं तो सामान्य द्रव्य, गुण, कर्म के द्वारा उनकी वृद्धि की जाती है और जब यह अपनी मात्रा से बढ़ जाते हैं तो द्रव्य, गुण, कर्म, इन विशेष द्वारा इनका ह्रास कर इनको समावस्था में लाया जाता है ( यही चिकित्सा है ) इन दोनों की प्रवृत्ति आयुर्वेद शास्त्र में इष्ट है । * सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् । तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ एकत्वबुद्धि को उत्पन्न करने वाला सामान्य होता है जो विभिन्न बुद्धि को उत्पन्न करता है वह विशेष अर्थात् जो अलग करने वाली बुद्धि है उसे विशेष कहा जाता है । सामान्य तुल्य अर्थ को बतलाता है । विशेष इनसे विपरीत अर्थ का बोध कराता है ॥ ४५ ॥
विमर्श - ( १ ) न्याय वालों ने ' नित्यत्वे सति अनेकानुगतं सामान्यम् ' यह लक्षण माना है, अर्थात् नित्य होते हुए जो अनेकों में रहने वाला होता है उसे सामान्य कहा जाता है, जैसे- ' अयं गौः अयं गौः ' इसमें गोत्व सामान्य होता है क्योंकि यह संसार में रहने वाली सभी गायों में पाया जाना है । इसलिये गोत्व सामान्य गोत्व सामान्य की वृद्धि करने वाला होता है । इसी भाँति मांस में मांसत्व सामान्य, रक्त में रक्तत्व सामान्य पाया जाता है । अतः मांस से मांस की वृद्धि होती है और रक्त से रक्त की वृद्धि होती है । इसे गुण सामान्य का लक्षण कहा जा सकता है । ( २ ) तुल्य अर्थ को बताने वाले को सामान्य कहते हैं यह दूसरा लक्षण सामान्य का किया गया है यह कर्म सामान्य का लक्षण है यहाँ पर क्रमशः ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धि-कारणम् ' को द्रव्य सामान्य लक्षण माना जाता है । यदि द्रव्य ही द्रव्य का वर्धक हो तो मांस से मांस की वृद्धि होनी चाहिये, रक्त रक्त की वृद्धि होनी चाहिये, पर यह देखा जाता है कि मांसत्व मूसली आदि द्रव्यों से सामान्य द्रव्य से अतिरिक्त वृष्य औषध जैसे केवॉच का बीज, सतावरी, मांस की वृद्धि एवं लौह भस्म के प्रयोग से रक्त की वृद्धि होती है । इस बात को देख कर गुण सामान्य का लक्षण किया गया है कि ' सामान्यम् एकत्वकरम् ' । जो एकत्व करने वाला होता है उसे सामान्य कहते हैं । वृष्य औषधों में ऐसा गुण पाया जाता है जिनके द्वारा मांस बढ़ जाता है और एकाकार बुद्धि हो जाती है उसी प्रकार लौह भस्म के प्रयोग से रक्त की वृद्धि होती है और एकाकार बुद्धि भी हो जाती है । अर्थात् मांस और रक्त में जो गुण पाये जाते हैं वे ही गुण वृष्य औषध, केवॉच का बीज, मूसली आदि द्रव्यों में और रक्त में जो गुण होता है वह लौह भस्म में
पृष्ठ 110
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूत्रस्थानम् १७ भी पाया जाता है । इसी के आधार पर यह भी कलना की जाती है कि दुग्ध मधुर और शीत होने के कारण मधुर एवं शीत गुण वाले शुक्र को बढ़ाता है । ( ३ ) दौड़ने से वायु को वृद्धि हो जाती है । इस बात को देख कर ' तुल्यार्थता हि सामान्यम् ', यह कर्म सामान्य का लक्षण बताया है, वायु का कर्म चल होता है; दौड़ना- धूपना भी चल है इसलिये दौड़ने से वायु की वृद्धि होती है । न्याय वाले पर और अपर यह दो सामान्य मानते है । कोई - कोई एक परापर सामान्य भी मानते है इसके अनुसार जो अधिक वस्तुओं में पाया जाता है उसे परसामान्य, जो अय वस्तुओं में पाया जाता है उसे अपर सामान्य कहते हैं और जो अधिक और अल्प वस्तुओं के बीच में रहने वाला हो उसे परापर सामान्य कहते हैं । कुछ आचार्य उभयवृत्ति और एकवृत्ति यह दो प्रकार का सामान्य मानते हैं । उभयवृत्ति - जैसे मांस खाने से मांस बढ़ता है तो बकरे आदि के खाद्य मांस और मनुष्य शरीर के मांस इन दोनों में मांसत्व सामान्य एक है अतः उभयवृत्ति मांसत्व सामान्य एक होने से मांस से मांस की वृद्धि होती है । एकवृत्ति - यह केवल एक वस्तु में रहते हुए वृद्धिका कारण होता है, जैसे घृत अग्नि को बढ़ाने वाला होता है । घृत में घृतत्व अग्नि में अग्नित्व सामान्य भिन्न - भिन्न है । अथवा घृत का गुण स्निग्ध, शीत होता है अग्नि का गुण रूक्ष और उष्ण होना है यह दोनों परस्पर भिन्न हैं, घृत का कर्म शीतल करना है अनिका कर्म उष्ण करना है । इस प्रकार घृत और अग्नि में द्रव्य, गुण, कर्म कोई भी सामान्य नहीं पाया जाता, पर घृत से अग्नि की वृद्धि होती है । अत: इसे एकवृत्ति सामान्य कहते हैं । इस तरह समान और असमान दोनों प्रकार के द्रव्य वृद्धि में कारण होते है । यह बात देखकर ' सामान्यं वृद्धिकारणम् ' यह लक्षण निरर्थक हो जाता है? इसका यह समाधान करना चाहिये कि जहाँ-जहाँ सामान्य होता है वहाँ वहाँ वृद्धि अवश्य होती है पर सामान्य से अतिरिक्त स्थल में भी वृद्धि होती है यहाँ जहाँ ' - जहाँ सामान्य हो वहाँ वहाँ वृद्धि हो और जहाँ - जहाँ वृद्धि हो वहाँ वहाँ सामान्य ही हो ' ऐसी व्याप्ति नहीं बनाई जाती, पर सामान्य के अभाव में भी वृद्धि होती है । यह कोई आवश्यक नहीं है कि जहाँ सामान्य हो वहीं वृद्धि हो । इसीलिये अधिक दोपों से आक्रान्त सारी धातुएँ कम होती हैं तो समान गुण धर्म वाली औषधियों या आहार - विहार के सेवन करने परं भी धातुओं को वृद्धि नहीं होती है तथा गर्मी के दिनों में मधुर, स्निग्ध, गुरु द्रव्यों का यदि सेवन किया जाता है तो इन द्रव्यों के समान गुण वाला दोष कफ वृद्ध नहीं होता है किन्तु इन गुणों से होता । यह असमान वस्तु से वृद्धि होने का उदाहरण बनाया गया है पर कुछ वायु का संचय लोग इसका समाधान यह करते हैं कि यदि कोई बाधक कारण न हो तब सामान्य वृद्धि का कारण होता है । यहाँ अधिक दोषों का बिगड़ना, अधिक गर्मी का पड़ा, शरीर के धातुओं और कफ के वृद्धि को रोकने वाला प्रतिबन्धक कारण वर्तमान है । अतः असमान भी वृद्धि का कारण होता है, यह कहना उचित नहीं है । विशेष - यह ठीक सामान्य के विपरीत होता है । इसे भी द्रव्यविशेष, गुणविशेष और कर्मविशेष तीन प्रकार का माना जाता है । ' हासहेतुविशेषश्च ' यह लक्षण द्रव्यविशेष का, ' विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ' यह गुणविशेष का, ' विशेषस्तु विपर्यय: ' यह लक्षण कर्मविशेष का माना जाता है विशेष हास में कारण होता है । द्रव्यविशेष - जैसे किसी के शरीर में मांस बढ़ गया है तो मांस की कमी कराने के लिये हड्डी का प्रयोग कराया जाता है, जैसे शंख, शुक्ति, कौड़ी की भस्म आदि अथवा बाजरा, जोन्हरी आदि अन्न द्रव्य । गुणविशेष - शरीर में वायु की वृद्धि होने पर तेल का प्रयोग किया जाता है क्योंकि वायु गुण में रूक्ष, शीत, लघु होता है और तैल उष्ण, स्निग्ध, गुरु होता है । अपने विशेष गुणों के कारण निरन्तर अभ्यास करने से तेल वायु को दूर करता है । २ च ० सं ०