चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 91–100
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 91–100
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( ४२ ) कुमारागार - वर्णन ( Pediatric Ward ) ९ ६० | बालकों में भय उत्पन्न करना उचित नहीं है बालक के योग्य शयनादि धूपन द्रव्य धारणीय मणियां बालकों के लिए खिलौने [ Entertainment of the Babies ] 29 ९ ६१ ( Aroid Fear Psycosis ) बालकों के रोग का चिकित्सा सिद्धान्त -युवावस्था तक अवश्य पालनीय कर्म नियम पालन का फल अध्याय उपसंहार शारीर स्थान की निरुक्ति " 33 ९ ६३ ९ ६४ " वर्णस्वयेन्द्रियाध्याय १ _ * opeçce-इन्द्रियस्थान ( 1 ) इन्द्रियस्थानविषयक सामान्य चर्चा ( General Consideration Regarding Prognosis ) ९ ६६ इन्द्रियस्थान में वक्तव्य विषयों की सूची " " ( २ ) रसाधिकार ( Prognosis based on Taste of the Body ) ९ ७७ रसगत अरिष्ट रस - विकृति के दो भेद " " प्रकृति विकृति से परीक्षा प्रकृति विकृति ( १ ) लक्षणनिमित्ता ( २ ) लक्ष्यनिमित्ता ९ ६७ रसारिष्ट अनुमानगम्य विरस के उदाहरण 23 " " ९ ६८ स्वादुरस के उदाहरण 99 " उपसंहार " " ९ ६ ९ ( ३ ) निमित्तानुरूपा 22 स्पर्शगम्य अरिष्ट की गणना ( २ ) वर्णाधिकार ( Prognosis based on Colour ) ९ ७० प्राकृत वर्ण " 2 परिमर्शनीयेन्द्रियाध्याय ३ स्पर्शगम्य अरिष्ट के उदाहरण ( १ ) उच्छ्वास विषयक अरिष्ट ( २ ) मन्याविषयक अरिष्ट ९ ७८ ९ ७ ९ " 73 वैकारिक वर्ण ( ३ ) दन्तविषयक अरिष्ट " " 73 वर्णपरीक्षा ( ४ ) पक्ष्मविषयक अरिष्ट मुखगत अरिष्ट ९ ७१ ( ५ ) नेत्रविषयक अरिष्ट नखादि परीक्षा में अरिष्ट ( ३ ) स्वराधिकार ( Prognosis based " ०८० " " ( ६ ) केश और लोमविषयक अरिष्ट 33 ( ७ ) उदर विषयक अरिष्ट " " on Voice ) स्वराधिकार प्राकृतिक स्वर वैकारिक स्वर उपसंहार पुष्पित केन्द्रियाध्याय २ ( १ ) गन्धाधिकार ( पुष्पवत् ) Prognosis based on Flower - like Smell ) पुष्प और अरिष्ट में साम्य " ( ८ ) नखविषयक अरिष्ट " " ( ९ ) अंगुलीविषयक अरिष्ट " " ९ ७२ " इन्द्रियानीकेन्द्रियाध्याय ४ इन्द्रियाँ अनुमानगम्य है । इन्द्रिय अरिष्ट के सामान्य सिद्धान्त नेत्रविषयक अरिष्ट " ९ ८१ " " नेत्र और आकाश ९ ७४ अरिष्ट में प्रज्ञापराध " नेत्र और जल ९ ७५ | नेत्र और वीभत्सरूप पुष्पित अरिष्ट नेत्र और अग्नि 39 एक वर्ष में मृत्युसूचक गन्ध ९ ७६ नेत्र और मेघ अनुक्त अरिष्ट 29 " 29 ९ ८२ नेत्र और सूर्य - चन्द्र 97 " "
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( ४३ ) नेत्र और प्रभा ९ ८२ नेत्र और वर्ण- रूप नेत्र और वस्तु शब्दविषयक अरिष्ट कर्णशब्दविषयक अरिष्ट गन्धविषयक अरिष्ट जिह्वाविषयक अरिष्ट त्वविषयक अरिष्ट इन्द्रियशक्तिविषयक अरिष्ट पूर्वरूपीयेन्द्रियाध्याय ५ ( १ ) पूर्वरूपीय अरिष्ट ( Prognosis based on Prodromal Facts ) ज्वरविषयक पूर्वपीय अरिष्ट यक्ष्माविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट रक्त - पित्तविषयक पूर्वरूपीच अरिष्ट 25 ९ ८३ " " " " " " 2 ९ ८५ " अध्याय उपसंहार पन्नरूपीयेन्द्रियाध्याय ७ प्रतिच्छायाविषयक अरिष्ट ( Shadew ) संस्थान [ Shope ] प्रतिच्छाया की परिभाषा छाया के ५ भेद ( १ ) नाभसी छाया ( २ ) वायवी छाया ( ३ ) आग्नेयी छावा ( ४ ) आम्भसी छाया ( ५ ) पार्थिवी छाया प्रभा की उत्पत्ति के कारण और भेद छाया और प्रभा में भेद छाया और प्रभा में अन्तर ( Difference between Reflection and Lustre ) १५ दिन का मारक अरिष्ट ९९ ४ ९९ ५ 31 27 " " 22 ९९ ६ ९९ ७ 29 गुल्मविषयक पूर्वरूपाय अरिष्ट कुष्ठविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट ९ ८६ प्रमेहविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट आहार तथा मलमूत्रविषयक अरिष्ट ९९ ८ " " उन्मादविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट श्वासविषयक अरिष्ट 99 " अपस्मारविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट ९ ८७ नेत्रविषयक अरिष्ट 29 स्वप्न के ७ भेड बहिरायाम - विषयक पूर्वपीय अरिष्ट 32 पूर्वरूप - विषयक अरिष्टों के ज्ञान का फल 29 ( २ ) स्वम - विषयक अरिष्ट ( Prog nosis based on Dreams ) " उदाहरणार्थं स्वप्न वर्णन स्वप्न और दोष के सम्बन्ध कत मानिशरीरी येन्द्रियाध्याय ६ विविध अरिष्ट " लिङ्ग तथा वृषणविषयक अरिष्ट ९९९ अवाक्शिरसीयेन्द्रियाध्याय म शिरप्रतिच्छायाविषयक अरिष्ट " " ९ ८८ नेत्रविषयक अरिष्ट " " ९ ८ ९ भ्रू तथा आवर्तविषयक अरिष्ट १००० 77 केशविषयक अरिष्ट " नासाविषयक अरिष्ट स्वप्नपरिणाम अध्याय उपसंहार ९९ ० दन्तविषयक अरिष्ट " जाविषयक अरिष्ट 77 १००१ अचिकित्स्य रोगो अतिसार तथा हिका की अविसूचकता ज्वरकासविषयक अरिष्ट ९९ १ श्वासविषयक अरिष्ट 22 " " विविध अरिष्ट मूत्रपुरीषविषयक अरिष्ट ९९ २ नेत्रविषयक अरिष्ट यस्यश्यावनिमित्तयेन्द्रियाध्याय ६ १००३ विविध अरिष्ट शोथविषयक अरिष्ट श्लेष्मा [ Sputnu ] विषयक अरिष्ट ज्वरकासविषयक अरिष्ट शोथ, ज्वर, अतिसारविषयक अरिष्ट विविध अचिकित्स्य रोगी राजयक्ष्माविषयक अरिष्ट अष्टमहारोगविषयक अरिष्ट ९९ ३ | आनाहविषयक अरिष्ट विविध अरिष्ट 39 19 १००४ " " " " " "
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( ४४ ) निष्ठत शुक्र और पुरीषविषयक अरिष्ट २००५ | ( १ ) दूताधिकार ( Prognosis based सद्योमरणीयेन्द्रियाध्याय १० १००७ " 7 शंखक रोग - विषयक अरिष्ट 27 विविध अरिष्ट " तीन पक्ष का अरिष्ट १००६ अरिष्ट का सम्पूर्ण रूप से ज्ञान आवश्यक 39 हृदयविषयक अरिष्ट विविध अरिष्ट वायुविषयक अरिष्ट विविध अरिष्ट सद्योमरणीय अरिष्टविषयक उपसंहार १०० ९ एक वर्ष का अर ज्योतीन्द्रियाध्याय ११ वलिविषयक अरिष्ट अरुन्धती नारा - विषयक अरिष्ट एक वर्ष का अरिष्ट " " ६ मास का अरिष्ट १ मास का अरिष्ट शुक्र मूत्रपुरीषविषयक अरिष्ट १ मास का अरिष्ट मसूरिकाविषयक अरिष्ट १००८ 99 " " " on Messenger ) वैद्यस्थिति - विषयक अरिष्ट स्वयंदूत - विषयक अरिष्ट १०१४ १०१५ ( २ ) पथ में अरिष्टसूचक लक्षण ( Prognosis based on Inauspi cious Omens Occurring in the Way ) १०१७ मार्ग में होने वाले अरिष्टों का विवेचन 17 ( ३ ) आतुर कुल में अरिष्टसूचक लक्षण ( Prognosis based on Inauspicious Omen in the Home of the Patient ) शयनादि विषयक अरिष्ट १०१६ ( ४ ) मुख्य अरिष्टों का संग्रह ( Resume of the Prognostic - Points ) २०१८ पूर्वोक्त अध्यायों का उपसंहार " " १०१० | मुमूर्षु व्यक्ति के अरिष्ट लक्षण इन्द्रिय शक्ति का हास १०१ ९ 99 १०२० " 27 स्मृति का नाश विषम बुद्धि " " विविध अरिष्ट विविध अरिष्ट " नेत्रविषयक अरिष्ट १०११ स्पन्दनशील स्थान में विपरीतता विविध अरिष्ट विविध अरिष्ट " " पञ्चमहाभूतविषयक अरिष्ट " औषधि प्रभावहीन अन्य अरिष्ट १०१२ प्रकृति - विकृति में परिवर्तन चतुष्पादविषयक अरिष्ट 93 पूर्वोक्त प्रसंग का उपसंहार १०२१ " " आयु परीक्षा आवश्यक 33 अरिष्ट के लक्षण १०१३ मरणासन्न स्थिति की घोषणा सावधानी से करें " " गोमयचूर्णीयेन्द्रियाध्याय १२ प्रशस्त दूत के चिह्न १०२२ एक मास का अरिष्ट शुभ शकुन द्रव्य १०२३ " गतिविषयक अरिष्ट उत्तम रोगी के लक्षण १०२४ अर्धमास का अरिष्ट आरोग्य का फल " औषधविषयक अरिष्ट १०१४ अध्याय का उपसंहार 22 आहारविषयक अरिष्ट इन्द्रिय स्थान के ज्ञान का फल 99
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: 11:11 चरकसंहिता सविमर्श ' विद्योतिनी ' हिन्दीव्याख्योपेता सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
भास्करं भारती देवीमिष्टं स्वं पार्थिवेश्वरम् ।
गणेशं विघ्नहर्तारं नौमि वाग्बुद्धिशुद्धये ॥
विषय - प्रवेश - अथ शब्द से मङ्गल कर लेने के बाद सर्वप्रथम दीर्घञ्जीवितीय नामक अध्याय
की व्याख्या कर रहा हूँ । ऐसा भगवान आत्रेय ने कहा ॥ १-२ ॥
विमर्श - ' ग्रन्थादौ ग्रन्थमध्ये, ग्रन्थान्ते च मङ्गलमाचरणीयमिति शिष्टाचारः ' इस आचार के अनुसार आस्तिक जन से निर्मित सभी ग्रन्थों में सर्वप्रथम मङ्गल करने की परम्परा अति प्राचीन काल से चली आ रही है । पौराणिक युग के पूर्वं अथ अथवा ओम् से ही मङ्गल किया जाता था क्योंकि ओंकार और अथ इन दोनों शब्दों को माङ्गलिक माना जाता है । जैसा कि - ' ओङ्कारश्चाथ शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तेन तौ मङ्गलौ स्मृतौ ' अर्थात् ओङ्कार और अथ शब्द सर्वप्रथम ब्रह्मा के कण्ठ का भेदन कर अर्थात् उनके मुख से अनायास उच्चरित होने के कारण माङ्गलिक माने गये हैं इसी नियमानुसार इस संहिता में अथ शब्द से मङ्गल किया गया है और यह भी देखा जाता है कि तत्काल में निर्मित ब्रह्मसूत्र या उससे पूर्व ब्राह्मण ग्रन्थों में अथ शब्द से ही ग्रन्थ का प्रारम्भ किया गया है । जैसे ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' या व्याकरण भाष्य में भी ' अथ शब्दानुशासनम् ' । अथ शब्द का अर्थ माङ्गलिक होते हुये यहाँ बाद, का भी अर्थ बतलाता है जैसा कि - ' अथ शब्दः आनन्तर्यार्थे ' ( शब्दस्तोम ) । इससे यह स्पष्ट है कि अग्निवेश
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२ चरकसंहिता आदि शिष्यों के पूछने पर ही भगवान आत्रेय ने आयुर्वेद का उपदेश किया है । अथ मङ्गल से यह भी स्पष्ट है कि यह संहिता पौराणिक काल के पूर्व में रची गयी है क्योंकि पौराणिक युग गणेश आदि देवता की ही वन्दना पायी जाती है इसके पूर्व अथ शब्द से मङ्गल की कामना की गयी है । यहाँ अतः शब्द से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि उत्तम कुल, शील, शौच, आचार, विनय आदि से सम्पन्न शिष्यों ने अपनी तथा प्राणिमात्र की दीर्घायु की इच्छा से भगवान आत्रेय के सामने इस वृत्त को प्रश्न रूप में उपस्थित किया है क्योंकि अतः शब्द किसी वृत्त के उपस्थित होने पर ही प्रयुक्त होता है जैसा कि ' अतः शब्दो वृत्तं किञ्चिदभिव्यञ्जयन् हेतुमर्थमभिधन्ते ' कहा है । इस प्रकार दीर्घ जीवन की इच्छा से अग्निवेश आदि शिष्यों के शिष्टाचारपूर्वक प्रश्न करने पर भगवान आत्रेय पुनर्वसु ने आयुर्वेद का उपदेश देने के लिये सर्वप्रथम दीर्घञ्जीवितीय नामक अध्याय का प्रारम्भ किया क्योंकि आगे यह बतलाया जायेगा कि मनुष्य की जीवन काल में ३ एषणायें ( इच्छायें ) होती हैं १ - प्राण- एषणा, २ - धन - पणा, ३ – परलोक - एषणा इन तीनों में सर्वप्रथम प्राण- एषणा ही आती है क्योंकि प्राण के अभाव में सभी इच्छाओं का अभाव हो जाता है इसलिये दीर्घ जीवन प्राप्त करने के लिये ऋषियों ने आयुर्वेद का उपदेश सुनना चाहा और भगवान आत्रेय ने उसी का प्रथम उपदेश किया । यहाँ आयु शब्द का अर्थ युग के अनुसार होनेवाले आयु - प्रमाण का बोधक है क्योंकि जीवित और आयु यह दोनों एकार्थवाचक हैं यह शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग स्वरूप है अर्थात् इन्द्रियादि - सम्पन्न शरीर और आत्मा के संयोगविशिष्ट काल का ही नाम आयु है । इस आयु का प्रमाण यद्यपि ' शतायुर्वै पुरुषः ' तथा ' शतं जीवेम शरद ' आदि युक्तियों से १०० वर्ष की ही मनुष्य की आयु मानी जाती है ऐसा कुछ लोगों का कथन है । पर यह उचित नहीं मालूम पड़ता क्योंकि वि ० स्था ० के दूसरे अध्याय में सतयुग में मनुष्यों की आयु ४०० वर्ष, त्रेता में ३०० वर्ष, द्वापर में २०० वर्ष और कलियुग में १०० वर्ष की बतलायी गयी है । उसके अनुसार तथा भगवान व्यास ने भी ' पुरुषाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षं शतायुषः कृते ', से कृतयुग में ४०० वर्ष की आयु मानी है अनः शतम् पद सर्वनाम शत - वाचक है अर्थात् सैकड़ों वर्ष जीने की कामना करता है या सैकड़ों वर्ष मनुष्यों की आयु होती है यह अर्थ किया जाना है इसलिये यहाँ अधिक दिन जीने की इच्छा का तात्पर्य युगानुसार पूर्ण आयु को प्राप्त करना है क्योंकि पुरुष धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इस पुरुषार्थ - चतुष्टय प्राप्ति के लिये ही भिन्न - भिन्न युगों में अवतरित होता है । वह पुरुषार्थ - चतुष्टय की प्राप्ति सारोग्य दीर्घ जीवन के विना कथमपि सम्भाव्य नहीं हो सकता है इसीलिए प्रथम अध्याय में पुरुषार्थ - चतुष्टय प्राप्ति के लिये दीर्घ जीवन का उपदेश किया गया है । इस ग्रन्थ में सूत्र, निदान, विमान, शारीर, इन्द्रिय, चिकित्सा, कल्प, सिद्धि यह ८ स्थान कहे गये हैं, इनमें सर्वप्रथम सूत्र स्थान का उपदेश किया गया है । सूत्र स्थान का अर्थ है आयुर्वेदीय सभी विषयों को सूचित करनेवाला स्थान या आयुर्वेद तन्त्र में प्रतिपाद्य विषय रूप पुष्पों की माला की तरह सून में गूंथनेवाला स्थान । अर्थात् इस सूत्र स्थान में सम्पूर्ण संहिता में बतलाये गये विषयों को गूंथ कर सूचित करने के लिये सुरक्षित किया गया हैं जैसा कि ' सूचनात् सूत्रणाच्चैव सन्धानादर्थसन्नतेः । सूत्रं तु सूचनाकारिग्रन्थे तन्तु व्यवस्थयोः ' । अल्पाक्ष-रमसन्दिग्धं सारवद् विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ' ( सुश्रुत ), श्लोकस्थानं समुद्दिष्टं तन्त्रस्यास्य शिरः शुभम् । चतुष्काणां महार्थानां स्थानेऽस्मिन् संग्रहः कृतः । ' ( सू. अ. ३० चक्रपाणि ) तथा ‘ अल्पार्थकत्वे सति वह्नर्थबोधकत्वं सूत्रत्वम् ' जो थोड़े अक्षर होते हुये कई अर्थों को बतलावे उसे सूत्र कहते है, के अनुसार सूत्र स्थान में थोड़े शब्दों से सम्पूर्ण आयुर्वेदीय विषयों का प्रतिपादन किया गया है । सभी प्रकार के ग्रन्थों में अनुवन्ध - चतुष्टय अभिधेय,
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सूत्रस्थानम् प्रयोजन, संबंध, अधिकारी इन चारों का निर्देश करना परम आवश्यक होता है जैसे -- अभिधेय-फलज्ञानविरहस्तिमितोद्यमाः । श्रोतुमल्पमपि ग्रन्थं नाद्रियन्ते हि साधवः ॥ ' तथा ' सिद्धार्थ सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥ ' इसके अनुसार इस ग्रन्थ का ( १ ) प्रयोजन -- धातुसाम्य क्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् । तथा ' आतुरस्य विकारप्रशमनेऽप्रमादः स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् ' है । ( २ ) अभिधेय - हेतु, दोष, द्रव्य स्वरूप स्कन्धत्रय तथा रोगों की उत्पत्ति रोकना यह अभिधेय है ( ३ ) सम्बन्ध - वाच्य वाचक लक्षण सम्बन्ध है ( ४ ) अधिकारी - जैसे ' बोधोपयुक्त शब्द तर्क- साहित्याद्यधीतविद्यैः स चाध्येतव्यो ब्राह्मणराजन्यवैश्यैः ' अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यही इस शास्त्र के अधिकारी हैं । इस प्रकार अनुबन्ध - चतुष्टय का उपदेश किया गया है । इस संहिता के सूत्र स्थान में ४ प्रकार के सूत्रों का निर्देश किया गया है - जैसे ( १ ) गुरुसूत्र - गुरु अपने अभिमत को जिन वाक्यों से कहता है यथा ' नैतद् बुद्धिमता द्रष्टव्यमग्निवेश । ' ( २ ) शिष्य सूत्र - गुरु के उपदेश के बाद शिष्य जिस सूत्र से अपनी शंकाओं को उपस्थित करता है उसे कहते हैं । जैसे— ' नैतानि भगवन् पञ्चशतानि पूर्यन्ते । ' ( ३ ) प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र - जो प्रतिसंस्कर्ता के द्वारा उपस्थित किये जाते हैं, जैसे ' तमुवाच भगवानात्रेयः । ' ( ४ ) एकीयसूत्र - प्रसंगवश जब कभी किसी स्थान पर अन्य आचार्य के सिद्धान्त का उदाहरण दिया जाता है उसे कहते हैं, जैसे- ' कुमारस्य शिरः पूर्वमभिनिवर्तते इति कुमारशिरा भरद्वाजः । ' यहाँ आत्रेय के लिये भगवान् शब्द का प्रयोग आया है । ' भगवान् ' शब्द सर्वशक्तिमान के लिये होता है, जैसा कि - ' ऐश्वर्यस्य समस्तस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङ्गना ॥ ' ' उत्पत्ति प्रलयं चैव भूतानामगतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्याञ्च स वाच्योभगवा-निति ॥ ' इस सूत्र स्थान में चार - चार अध्यायों का ७ वर्ग, ८ वाँ वर्ग दो अध्यायों का माना है । ( १ ) भेषजचतुष्क - इसमें १, २, ३ और ४ अध्यायों के विषय हैं । प्रथम अध्याय-दीर्घजीवन के विषय से युक्त है । इसमें दीर्घ जीवन के उपदेश के बाद दीर्घजीवन को कायम रखने के लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस पुरुषार्थ - चतुष्टय का मूल आरोग्य की जिज्ञासा की गयी है । आरोग्य ज्ञान के लिये आयुर्वेद का ज्ञान आवश्यक है अतः आरोग्य-ज्ञान - प्राप्ति के लिये आयुर्वेद की जिज्ञासा उत्पन्न हुई आयु का परिज्ञान ही आयुर्वेद है अतः इसमें आयु का वर्णन किया गया है । विदधातु ज्ञान, लाभ, विचार और सत्ता इस अर्थचतुष्टय में प्रयुक्त होता है । यहाँ आयु के ज्ञान, लाभ, विचार और सत्ता पर विचार - विमर्श किया गया है । आयु की सत्ता तथा उसकी प्राप्ति उसके ज्ञान, विचार पर ही है । जब आयु क्या है यह जान लिया जाता है तो उसके लाभ और सत्ता पर विचार प्रारम्भ किया जाता है । अतः इस अध्याय में षट् पदार्थों का दिग्दर्शन कराकर आरोग्य को प्रथम कारण द्रव्यों के स्वरूप अक्षुण्ण रखनेवाले द्रव्यों के गुण - कर्मों का विचार किया गया है । आदि का, बाद में कार्य द्रव्यों का वर्णन किया गया है । दूसरे एवं तीसरे अध्यायों में शरीर शुद्ध्यर्थ अन्तः परिमार्जन और वहि: परिमार्जन करनेवाले द्रव्यों का उपदेश ( अपामार्गतण्डुलीय तथा आरग्बधीय अध्यायों के अन्तर्गत ) किया गया है । चौथे अध्याय में ६०० कषाय- कल्पनाओं का वर्णन किया गया है । इस प्रकार भेषजों से परिपूर्ण प्रथम ४ अध्यायों को भेषजचतुष्क कहा जाता है । ( २ ) स्वास्थ्य चतुष्क - इसमें पाँच से आठ तक अध्याय हैं । आयुर्वेद दीर्घजीवन के लिये दो लक्ष्यों को अपने सामने रखता हैं । प्रथम स्वास्थ्य संरक्षण, दूसरा रोग प्रशमन | स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य का संरक्षण किस प्रकार हो सकता है, इसका उपदेश सर्वप्रथम आवश्यक
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चरकसंहिता है | अतः भेषजचतुष्क - वर्णन के बाद स्वास्थ्य चतुष्क का वर्णन परमावश्यक हुआ । मानव शरीर के प्राकृतिक कार्यों को प्राकृत कम में चलाने के लिये भोजन की आवश्यकता होती है । यदि यह भोजन उचित मात्रा एवं उपयुक्त रूप में न दिया जाय तो स्वास्थ्य कथमपि प्राकृतरूप में नहीं रह सकता है, अतः पाँचवे अध्याय में मात्राशितीय का वर्णन कर, छठें अध्याय में ' तस्याशितीय अध्याय ' का वर्णन किया गया है । भोजन के बाद शुक्त पदार्थों का परिवर्तन शरीर में अनेक-विभ होता है, जिससे प्रसाद धातु और विभाग का निर्माण होना है । प्रसाद भाग ( सार ) शरीर को पुष्ट करने के कारण उपादेय होता है । किट्ट भाग शरीर को दूषित करना है अतः हेय होता है । इन हेय पदार्थों का त्याग करने के लिए मानव शरीर के अन्दर एक प्रकार की संवेदना होती है जिसे आयुर्वेदाय में वेग कहा जाता है । शारीरिक क्रियाकलापजन्य अनेकविध संवेदनाएँ शरीर में होती रहती हैं । वे सभी संवेदनाएँ वेग शब्द के अन्तर्भूत होती हैं । इनमें बहुत से वेग ऐसे होते हैं जिनका शारीरिक स्वास्थ्य के लिए धारण करना परमावश्यक होता है और कुछ ऐसे भी वेग हैं जिनका धारण करना स्वास्थ्य के लिए हानिकर है । इन दोनों प्रकार के वेगों का वर्णन सातवें अध्याय में किया गया है । उपरिनिदिष्ट सभी क्रिया-कलाप इन्द्रियों द्वारा ही निष्पन्न होते हैं अतः आठवें अध्याय में इन्द्रियों के स्वरूप एवं कार्य आदि का वर्णन कर सद्वृत और उसके अनुष्ठान का वर्णन किया गया है । ( ३ ) निर्देश - चतुष्क - इसमें ९ से १२ अध्याय हैं । यह चतुष्क आयुर्वेद के दूसरे प्रयोजन ' रोगप्रशमन ' की पूर्ति का उपक्रम आरम्भ करता है । चिकित्सा के लिए वैध, रोगी, परिचारक एवं औषध किस प्रकार का होना चाहिए इसका ९ वें अध्याय में संक्षेप में वर्णन कर १० वें अध्याय में विस्तार से वर्णन किया गया है । मनुष्य की तीन इच्छायें होती है । उनका वर्णन कर चिकित्सा सम्बन्धी कुछ आवश्यक सिद्धान्तों का निर्देश ११ वें अध्याय में कर १२३ अध्याय में शरीर के मूलभून वान पित्त कफ के प्राकृत एवं कृत कार्यों का निर्देश किया गया है । ( ४ ) कल्पनाचतुष्क - इसमें १३ से २६ तक अध्याय है । इनमें क्रम से कल्पना स्वेदकल्पना, उपकल्पनीय चिकित्साप्राभूतीयकल्पना का वर्णन किया गया ( ५ ) रोगचतुष्क इसमें १७ से २० तक अध्याव है । क्रम से कियन्तः शिरसीय, त्रिशोफीय, अष्टोदरीय एवं गया है । इनमें रोगों का संक्षेप में वर्णन है, महारोगाध्याय का वर्णन किया ( ६ ) योजनाचतुष्क इसमें २१ से २४ तक अध्याय हैं । इनमें क्रम से ८ प्रकार के निन्दित पुरुषों का वर्णन, लंघन, वृंहण की कल्पना सन्तर्पणीय योजनाओं का वर्णन और विधिशोणितीय अध्याय का वर्णन किया है । ( ७ ) अन्नपानचतुष्क - इसमें २५ से २८ तक अध्याय है । इनमें क्रमशः जिस प्रकार मनुष्य एवं रोग की उत्पत्ति होती है उसका वर्णन, रसों के विषय में अनेक वाद - विवाद, अन्नपान आदि का निर्णय कर अन्नपान विधि के बाद विविध अशितपीत, अन्नपान के विभिन्न परिवर्तनों का गुण एवं दोष बनाया गया है । ( ८ ) संग्रह - इसमें २ ९ और ३० अध्याय हैं । २ ९वें में १० प्राणायतन का वर्णन कर चिकित्सकों के लक्षण और भेद का वर्णन तथा अध्यायों के विषय की सूची दी गई है । ३० वें अध्याय में हृदय, ओज का वर्णन कर आयुर्वेद और आयुर्वेदज्ञ के लक्षणों का वर्णन किया गया है । दीर्घ जीवितमन्विच्छन् भरद्वाज उपागमत् । इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम् ॥ ३ ॥
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सूत्रस्थानम् · ( १ ) आयुर्वेदावतरण ( इतिहास ) भरद्वाज का इद्र के यहाँ गमन - कठोर तपस्या करने वाला दीर्घ जीवन की इच्छा रखता हुआ भरद्वाज ऋषि इन्द्र को शरण्य समझ कर ' शरणं गृहरक्षित्रो: ' ( अमर: ) अर्थात् जो उसके शरण में जाता है उसकी रक्षा करना कर्तव्य है और वे कट को दूर करने में समर्थ हैं यह जानकर इन्द्र के पास गये ॥ ३ ॥
विमर्श - - इन्द्र के पास सर्वप्रथम युगानुरूप अधिक आयु की इच्छा रखने वाले भरद्वाज ही क्यों गये इसका वर्णन आगे १ ९ वें श्लोक में बताया जायगा । यहाँ दीर्घ जीवन से तात्पर्य जिस युग में मनुष्य की जो आयु होती है, उतनी आयु की कामना से है अर्थात् कृतयुग में ४०० वर्ष, ३०० वर्ष, द्वापर में २०० वर्ष, कलियुग में १०० वर्ष मनुष्य की आयु होती है । यह आयु का मान प्रत्येक युग के आदि में रहता है जैसा कि - ' पुरुषाः सर्वसिद्धाश्च चतुर्वर्ष-शतायुषः । कृते वैतादिकेऽप्येवं पादशो हसति क्रमात् ॥ ' इत्यादि भगवान् व्यास ने बताया है और ' वर्षशतं खल्वायुषः ' प्रनागमस्मिन् काले ( वि ० अ ० ३ ) अर्थात् कलियुग में १०० वर्ष की आयु होती है और वे आयु उस उस युग के १०० वें अंश के समाप्त होने पर एक वर्ष की आयु में न्यूनता आ जाती है । जैसा कि - संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुपः काले यत्र-यन्मानमिष्यते ॥ ( त्रि ० स्था ० अ ० ३ ) यहाँ संवत्सरशते का अर्थ १०० वें अंश के पूरे होने पर है । यह आयु कर्म के अनुसार नियत और अनियत होती हैं । आयु नियत हो इसलिए आयुर्वेद वाङ्मय में विहित विधियों का अनुष्ठान किया जाता है पर जिस समय भरद्वाज इन्द्र के पास पहुँचे हैं उस समय इन विवियों का लोप हो गया था अतः पूर्ण आयु की कल्पना से भरद्वाज इन्द्र के पास गये । इन्द्र स्वर्ग के देवताओं का राजा है । उसके पास मनुष्य शरीर से जाना बहुत कठिन है इसलिए यहाँ भरद्वाज को उमनपा शब्द से निर्देश किया गया है । क्योंकि तपस्या का प्रभाव अचिन्त्य होता है, तपस्या के प्रभाव से ही अगस्त्य ने समुद्र का शोषण कर लिया और नासिकेत हरिश्चन्द्र आदि मनुष्य शरीर से स्वर्गे गये थे इन बातों को ध्यान में रखकर तपस्वी भरद्वाज का इन्द्र के पास जाना सरल था, इसलिए यह विशेषण दिया गया है । भरद्वाज कौन था, इस विषय में कुछ लोग आत्रेय को ही भरद्वाज मानते हैं पर चक्रपाणि ने यह स्पष्ट किया है कि भरद्वाज के नाम से आत्रेय का संकेत कहीं भी संहिता में नहीं किया गया है । भरद्वाज की उत्पत्ति के विषय में भागवत में: - अन्तर्वन्यां भ्रातृपत्न्यां मैथुनाय बृहस्पतिः । प्रवृत्तो वारिनो गर्भं शप्त्वा वीर्यमवा-सृजत् ॥ तं त्यक्तुकामां ममतां भर्तृचागविशङ्किताम् । नाम निर्वचनं तस्य श्लोकमेनं सुरा जगुः ॥। मूढे भरद्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पते ॥ यानौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् || ( भा ० स्क ० ९ ) कहा है । इसके अनुसार ' द्वाजं भर इति भरद्वाज: ' इस निरुक्ति से भरद्वाज शब्द बना । संहिता में भरद्वाज का उल्लेख कई स्थानों में आया है पर वह भरद्वाज नहीं है जो इंद्र के पास अध्ययन करने गये थे क्योंकि जो भरद्वाज इंद्र के पास गये थे वे आत्रेय आदि के भी गुरु हैं, जैसा कि -* ऋपयथ भरद्वाजाज्जगृहस्तं प्रजाहितम् ' से स्पष्ट किया गया है । संहिता में जहाँ जहाँ भरद्वाज शब्द आया है, वहाँ वहाँ भरद्वाजगोत्रोत्पन्न भरद्वाज का ग्रहण किया गया है । ब्रह्मणा हि यथाप्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः । जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥४ ॥
अश्विभ्यां भगवाञ्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् । ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छुक्रमुपागमत् ॥५ ॥
आयुर्वेद के पठन - पाठन की परम्परा - जिस प्रकार सम्पूर्ण आयुर्वेद का उपदेश ब्रह्मा ने किया था, उसे उसी रूप में ठीक ठीक सर्वप्रथम दक्ष प्रजापति ने आयुर्वेद का ग्रहण किया था ।
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चरकसंहिता इसके बाद दक्ष प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने आयुर्वेद का अविकल ज्ञान प्राप्त किया था । इसके बाद अश्विनीकुमारों से केवल ( अर्थात् सम्पूर्ण ) आयुर्वेद का ज्ञान इंद्र ने प्राप्त किया था । इसलिए ऋषियों के परामर्शानुसार महर्षि भरद्वाज आयुर्वेद अध्ययन के लिए इन्द्र के पास गए ॥ ४-५ ॥ विमर्श -- आयुर्वेद शास्त्र अनादि है । यह सृष्टि के पूर्व था और ब्रह्मा भी सृष्टि के पूर्व थे, जैसा कि- ' अनुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्र मध्यायसहस्रं च कृतवान् स्वयम् ॥ ' ( सु ० सू ० अ ० १ ) तथा - ' ब्रह्मा स्मृत्वायुषो वेदं प्रजापतिमजीग्रहत् । ' ( वाग्भट सू ० अ ० १ ) से स्पष्ट है | अतः सर्वप्रथम आचार्य ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रवर्तक दक्ष प्रजापति को आयुर्वेद का उपदेश किया । जब स्वर्ग में आधि - व्याधियाँ उत्पन्न होने लगीं तो देवताओं की चिकित्सा के लिए स्वर्ग के वैद्य अश्विनी-कुमारों को आयुर्वेद का अध्ययन दक्षप्रजापति ने कराया । इसके बाद उसकी उपयोगिता को ध्यान में रख कर इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया । यद्यपि तपोबल से भरद्वाज आयुर्वेद के प्रथम और सर्वश्रेष्ठ आचार्य ब्रह्मा के पास भी अध्ययनार्थ जा सकते थे पर नहीं गये । इसका कारण यह था कि इंद्र आयुर्वेद का अध्ययन किये थे पर किसी शिष्य को पढ़ाये नहीं थे । उन्हें पढ़ाने की लालसा थी क्योंकि ' यो हि गुरुभ्यः सम्यगादाय विद्यां न प्रयच्छन्त्यन्तेवासिभ्यः सखल्वृणी गुरुजनस्य महदेनो विन्दति ' अध्ययन के बाद अध्यापन करना परमावश्यक होता है । जिसकी इच्छा पढ़ाने में प्रबल होती है वह शिष्यों के मनोनुकूल सारे प्रश्नों का उत्तर देता है । यह बात ध्यान से ऋषियों ने देखा था अतः ऋषियों के कथनानुसार इंद्र के पास भरद्वाज गये । विघ्नीभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम् । तपोपवासाध्ययनब्रह्मचर्यव्रतायु॑षाम् || ६ ॥ तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः । समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥ ७ ॥
महर्षियों के एकत्र होने में कारण-- तपस्या, उपवास, अध्ययन, ब्रह्मचर्य व्रत के द्वारा दीर्घ आयु को जिन लोगों ने प्राप्त किया है ऐसे देहधारी महर्षिगण हैं, तपस्या आदि न करने वाले पामरजन मनुष्यों को ही विघ्नकृत् ( अतः जुषि प्रीतिसेवनयोः से सिद्ध ' व्रताजुषाम् ' पाठ उचित है । ) रोग जब उत्पन्न हो गए तब प्राणधारियों पर दया भाव को आगे कर पुण्य कार्य करने वाले महर्षिगण हिमालय पर्वत के एक सुन्दर भाग में एकत्रित हुए । ६-७ ॥ विमर्श - अथवा देहधारियों के ' तपस्या ' जैसे -- चान्द्रायण आदि तप, ' उपवास ' -- जैसे क्रोध का परित्याग, सत्य वचनों का प्रयोग आदि उत्तम नियमों का पालन ( यहाँ उपवास से भोजन न करना यह अर्थ नहीं लेना चाहिए, क्योंकि उपवास का अर्थ यहाँ -- ' उपावृत्तस्य पापेभ्यः सहवासौ गुणे हि यः । उपवासः स विज्ञेयो न शरीरस्य शोषणम् ॥ ' किया जाता है ) । ' अध्ययन ' - वेदों का अध्ययन, क्योंकि तत्कालीन तपस्वी जन वेद का ही अध्ययन करते थे । जैसा कि ' शास्त्राणामध्यध्यनं तपः ' ' ब्रह्मचर्य ' ( ब्रह्मणे मोक्षाय वयं ब्रह्मचर्यम् ) उपस्थ आदि इन्द्रियों का निग्रह | ' व्रत ' अपने मनोनुकूल सिद्धि प्राप्त करने के लिए नियमों का आचरण, और पूर्ण आयु प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न करने वाले रोग जब अर्थात् कृतयुग के अन्त मे उत्पन्न हुए, तब दया के वशीभूत होकर महर्षिगण ने जनता के उन विघ्न स्वरूप रोगों की शान्ति के उपाय पर विचार करने के लिए हिमालय के एक सुन्दर स्थान पर सभा बुलायी । रोगों की उत्पत्ति एवं शान्ति पर विचार करने को यह सभा सर्वप्रथम कृतयुग के अन्त में हुई थी, यह बात - ' भ्रश्यति तु कृतयुगे केषां-चिदत्यादानात् ' इत्यादि ( वि. स्था. अ. ३ ) से सिद्ध हैं । यहाँ रोगों का प्रादुर्भाव लिखा है । पूर्वसिद्ध वस्तु का ही प्रादुर्भाव होता है इससे यह भी सिद्ध होता है कि कृतयुग के पूर्व भी रोग १. ' व्रताजुषाम् ' इति ग. ।
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सूत्रस्थानम् थे - अर्थात् जैसे युग अनादि, आयुर्वेद अनादि है वैसे ही रोगों का सम्बन्ध भी अनादि है पर रोगों की उत्पत्ति पूर्वजन्मार्जित पाप का फल है और कर्मविपाक का विषय है । प्राणिमात्र पर दया की भावना से ही यह सभा हुई थी, इसका तात्पर्य यह है कि जो अधिक तपोनिष्ठ महर्षिगण थे वे अपने यम नियम आदि के बल से स्वयं रोगरहित थे । प्रधानतया उन लोगों की सभा प्राणिमात्र के उपकार के लिए ही हुई थी । अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः । आत्रेयो गौतमः सांख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः ॥ अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ । पारीचिभिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्जलेः ॥ ९ ॥
विश्वामित्राश्वरथ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित् । गार्ग्यः शाण्डिल्य कौण्डिन्यौ वाक्षिर्देवलगालवौ ॥
साङ्कृत्यो वैजवापिश्च कुशिको बादरायणः । बडिशः शरलोमा च काप्यकात्यायनावुभौ ॥
काङ्कायनः कैकशेयो धौम्यो मारीचकाश्यपौ । शर्कराक्षो हिरण्याक्षो लोकाक्षः पैङ्गिरेव च ॥
शौनकः शाकुनेयश्व मैत्रेयो ममतायनिः । वैखानसा बालखिल्यास्तथा चान्ये महर्षणः ॥१३ ॥
ब्रह्मज्ञानस्य निधयो दमस्य नियमस्य च । तपसस्तेजसा दीप्ता हूयमाना इवाग्नयः ॥ १४ ॥
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम् । महर्षियों की गणना - अङ्गिरा, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, भृगु, आत्रेय, गौतम, सांख्य, पुलस्त्य, नारद, असित, अगस्त्य, बामदेव, मार्कण्डेय, आश्वलायन, पारीक्षिः, भिक्षुआत्रेय, भरद्वाज, कपिञ्जल, विश्वामित्र, आश्वरथ्य, भार्गव, च्यवन, अभिजित् गार्ग्य, शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, वाक्षि, देवल, गालव, सांकृत्य, वैजबापि, कुशिक, बादरायण, बडिश, शरलोमा, काप्य, कात्यायन, कांकायन, कैकशेय, धौम्य, मरीचि, काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लोकाक्ष, पैङ्गि, शौनक, शाकुनेय, मैत्रेय, ममतायनि, बैखानस, बालखिल्या और अन्य महर्षिगण जो ब्रह्मज्ञान, दम और नियम के निधि ( अक्षय कोष -खजाना ) थे एवं हवन से प्रज्वलित अग्नि के समान तपस्या के तेज से देदीप्यमान थे । ये महर्षि हिमालय के सुन्दर भूभाग में सुखपूर्वक सभा में बैठ कर इस ( वक्ष्यमाण ) पुण्यकथा ( लोकोपकार की चर्चा ) करने लगे ॥ ८ - १४३ ॥ विमर्श - इस प्रकार इन ऋषियों का नाम कीर्तन भी मङ्गल की कामना से किया गया है, अथवा इस प्रकार के बड़े - बड़े ऋषि महर्षि आयुर्वेद पर श्रद्धा रख कर इसका अध्ययन किए थे । अतः यह महाजन सेवित और उभय लोकहित होने से अवश्य पठनीय है, इसे सूचित करने के लिए इनका कीर्तन किया गया है । यहाँ दम का अर्थ- इन्द्रियदमन है, यथा- ' कुत्सितात्कर्मणो विप्र! यच्च चित्त निवारणम् । स कीर्तितो दमः ' अथवा ' यम ' पाठान्तर होने पर - दश यम शास्त्रों में बताया है, जैसे- ' आनृशंस्यं क्षमा सत्यमहिंसादानमार्जवम् । प्रांतिः प्रसादश्चाचौर्य मार्दवं च यमा दश ॥ ' इसी प्रकार नियम भी दश बताए गए है - यथा - ' शौचमिज्या तपो ध्यानं स्वाध्याये-न्द्रियनिग्रहौ । व्रतमौनोपवासाश्च स्नानञ्च नियमा दश । ' जो जो महर्षि इस विचार सभा में उपस्थित थे वे सभी इन ब्रह्माज्ञान आदि भावों से परिपूर्ण थे, उस विचार सभा से प्रचारित आयुर्वेद अति श्रेष्ठ है, यह यहाँ ध्वनित किया गया है । धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् । रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ॥१५ ॥
प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम् । कः स्यात्तेषां शमोपाय इत्युक्त्वा ध्यानमास्थिताः ॥
अथ ते शरणं शक्रं ददृशुर्ध्यानचतुषा । स वच्यति शमोपायं यथावदमरप्रभुः ॥ १७ ॥
१. ' कपिष्ठल: ' इति ग. । २. ' कौण्डिल्यौ ' इति ग. । ३. ' मारोचिकाश्पयौ ' इति ग. । ४. ' लोगाक्षि: ' पा ० । ५. वैखानसा वानप्रस्थाः । ६. यमस्येति पाठान्तरम् - अहिंसासत्यास्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहरूपस्य योगाङ्गस्य । ७. नियमस्य - शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानरूपस्य ।