चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 111–120

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 111–120

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१८ चरकसंहिता कर्मविशेष - वायु च है जब उसकी वृद्धि हो जाती है तो उससे विपरीत रोगी को विश्राम कराया जाता है । अथवा स्थिर करु के बढ़ जाने पर उसे कम करने के लिये धावन क्रिया कराई जाती है । इसी दृष्टिकोण से सुश्रुत ने प्रमेह की चिकित्सा में ' अधनस्तु " योजनशनमधिकं वा गच्छेत् ' आदि कफनाशक कर्म बताये हैं । जिस प्रकार सामान्य के विषय में मत मतान्तर शंका - समाधान किया गया है सभी मत - मतान्तर शंका - समाधान सामान्य के विपरीत विशेष में भी समझना चाहिये । सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्रिदण्डवत् । लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥४६ ॥

लोक ( जीवात्मा ) का आधार -- तीन दण्ड के समान सत्व, आत्मा और शरीर है । इनके संयोग से यह लोक अर्थात् जीवात्मा युक्त शरीर रहता है और इसी शरीर में सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ४६ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार शंकर जी के ऊपर जलधरी पात्र रखने के लिये त्रिपादिका बनाई जाती है और वह त्रिपादिका अपने तीन पैरों के ऊपर ही स्थित रह कर - अपने ऊपर रखे सभी प्रकार के समर्थ भारों को वहन करती है । उसी प्रकार लोक के मन, आत्मा और शरीर ये तीन ही आधार स्तम्भ होते हैं और इन तीनों के समु-दाय को ही लोक अर्थात् संसार कहते हैं; ' पड् धातवः समुदिता लोक इति शब्दं लभन्ते ' ( च. शा. ५ ) अर्थात् पञ्चमहाभूत और आत्मा इन छ: धातुओं के संयोग को ही लोक कहते हैं । यहाँ शरीर से पञ्चमहाभूत- समुदाय और आत्मा से चेतना धातु ( आत्मायुक्त मन ) लिया गया है । मन और आत्मा इनका कभी पृथक् भाव नहीं होता, ये सदा एक साथ ही रहते हैं । इसलिये आत्मा- मन को अन्य तन्त्र वाले या अन्य स्थल में एक ही मानकर पञ्चमहाभूत से संयुक्त होने पर पडधातुज संयोग को लोक माना है । यद्यपि १६ विकार और ८ प्रकृति इस २४ तत्त्वविशिष्ट आत्मा को ही शरीर माना गया है पर यहाँ शरीर शब्द से दस इन्द्रियाँ पाँच महाभूत और आठ प्रकृतियाँ ली गयी है । मन के विना आत्मा की उपलब्धि नहीं होती है अतः मन और आत्मा का एक साथ उपादान किया गया है । यहाँ सत्त्व, आत्मा और शरीर संख्या में तीन बताये गये हैं जो गणना में तीन हैं ही फिर त्रयः ( तीन ) कहने का तात्पर्य यह है कि ये तीनों मिलकर ही लोक शब्द से व्यवहार्य हैं, यदि इनमें से एक भी अलग हो जाय तो वह लोकशब्दवाच्य नहीं होगा । लोक का अर्थ - लोकते ( आलोकते ) इति लोकः ( लोक-दीप्तौ धातु ) इस व्युत्पत्ति से जङ्गम मात्र का बोध किया जाता है । * स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् । वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥४७ ॥

आयुर्वेद का अधिकरण - उस सत्त्व, आत्मा और शरीर के संयोग को ही पुमान् ( पुरुष ) कहते हैं, वही सत्त्व, आत्मा और शरीरयुक्त चेतन है, वहीं मिलित रूप से सत्त्व, आत्मा और शरीर इस आयुर्वेद शास्त्र का अधिकरण ( चिकित्सा का विषय है । इसी सत्त्वादि विशिष्ट लोक के लिए इस आयुर्वेद शास्त्र का प्रकाश किया गया है ॥ ४७ ॥

विमर्श - यद्यपि ऊपर लोक शब्द से प्राणिमात्र का बोध किया गया है पर वहाँ आचार्य लोक शब्द से केवल पुरुष ( मनुष्य ) का ही ग्रहण किए हैं इसी लिए पुमान् शब्द का प्रयोग किए हैं । सुश्रुत ने भी चिकित्साशास्त्र में मनुष्य की ही प्रधानता बताई है यथा ' तत्र पुरुषः प्रधानं तस्योप-करणमन्यत्, तस्मात्पुरुषोऽधिष्ठानम् ' ( सु. सू. अ. १ ) । हिमालय के पार्श्व में ऋषियों की गोष्टो मनुष्यों के रोगातुर होने पर ही हुई थी यथा - ' प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम् ' कहा है ।

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सूत्रस्थानम् १६ इस आयुर्वेद का आश्रय मनुष्य है इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मनुष्येवर प्राणी रुग्ण हों तो अचिकित्स्य होते हैं किन्तु प्रदान आश्रय मनुष्य है, सामान्यतः प्राणिमात्र आयुर्वेद शास्त्र का आश्रय है | यहाँ ‘ संयोगः ' पुंल्लिङ्ग है अतः ' सः ' यह पुंलिङ्ग कहा गया है । चक्रपाणि ने ' आगे पुरुष का वर्णन किया जायगा ' उसे ही बुद्धि में रखकर पुंल्लिङ्ग का निर्देश किया गया है, ऐसा कहते हैं, ' सः ' का प्रयोग अतीन काल में ही होता है यहाँ भविष्य का बोधक कैसे? इसके उत्तर में बताया है कि ' तत् ' शब्द सर्वनाम है और सर्वनाम का प्रयोग - ' प्रत्यक्षे च परोक्षे च सामीप्ये दूर एव च । एतेष्वर्थेषु विद्वद्भिः सर्वनाम प्रयुज्यते । - इतने कालों में होता है । अथवा इस पक्ष में यह भी कहा जा सकता है कि ' तत् ' शब्द का प्रयोग सर्वदा बुद्धिस्थ वस्तु के लिये हो होना है यथा- ' बुद्धि-विषयत्वोरलक्षिततत्तदूर्भावच्छिन्ने तच्द्रव्यस्य शक्तिः यह बताया है । अतः वक्ष्यमाण पुरुष को बुद्धि में रखकर यहाँ पुंलिङ्ग का प्रयोग किया गया है । पर मेरे विचार से इस क्लिष्ट कल्पना से संयोग का ही विशेषण ' स ' को मानना न्याय एवं युक्तिसंगत है । यहाँ तीनों के संयोग में यद्यपि आत्मा प्रधान है सर्वमम सुत्व का ग्रहण किया गया है इसका तात्पर्य यह है कि विना सत्र ( मन ) के संयोग हुये व्यवहार दशा में आत्मा निरर्थक है, और अप्रत्यक्ष है-जैसा कि - ' अचेतनं क्रियाच मनश्चेतविता परः । युक्तम्य मनसा तस्य निदिशन्त्यात्मनः क्रियान् । ' ( शा. अ. १ ), अतः सर्वप्रथम सत्र का ही उपादान किया गया है । खादीन्यात्मानः कालो दिशश्च द्रव्य संग्रहः । सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं, निरिन्द्रियमचेतनम् || ४८ || द्रव्य गणना -ख आदि पाँच ( जैसे स [ आकाश ] वात, अग्नि, जल और पृथिवी ), आत्मा, मन, काल और दिशा यह द्रव्य का संग्रह संख्या में ९ है । इन द्रव्यों में दो विभाग होते हैं ( १ ) जो द्रव्य इन्द्रिययुक्त है उसे चेतन द्रव्य कहते हैं । ( २ ) जिन द्रव्यों में इन्द्रियाँ नहीं होतीं उन्हें अचेतन द्रव्य कहते हैं ॥ ४८ ॥

विमर्श - द्रव्यों के विभागों का संक्षेप में संग्रह यहाँ बताया गया है । ये ही नव द्रव्य न्याय में भी माने गये हैं- जैसा कि ' चित्यप्तेजोमरुद्वयोमकालदिग्देहिनो मन इति द्रव्याणि । ( कारिकावली ) संक्षेप में संग्रह का तात्पर्य यह है कि द्रव्य - सोंठ, पीपर, मरिच आदि भेद से अगणित है, सब का नाम निर्देश करना असम्भव है अतः यहाँ केवल संक्षेप में कारण द्रव्य का संग्रह किया गया है । द्रव्य के दो भेद होते हैं ( १ ) कारण द्रव्य । ( २ ) कार्य द्रव्य । कारण द्रव्य के ये नव भेद बताये गये है । यथा-( १ ) कारण द्रव्य पृथिवी जल तेज १ २ ३ वायु ४ आकाश ५ आत्मा ६ मन काल दिशा ७ ८ ९ कार्य द्रव्य – इसका वर्णन आचार्य ने श्लोक की दूसरी पंक्ति से प्रारंभ किया है । इसके एक चेतन औरदूसरा अचेतन दो भेद होते है, ( क ) पुनः चेतन का अन्तश्चेतन और वहिरन्तश्चेतन दो भेद होते हैं । ( १ ) अन्तश्चेतन उसे कहते हैं जिसमें ज्ञानशक्ति और सुख दुःख का अनुभव होता हो पर अपने पर आई हुई विपत्ति या आक्रमण का निराकरण करने में समर्थ नहीं होता हो, जैसे वनस्पति वर्ग आदि । इनमें अन्तश्चेतनता का प्रत्यक्षीकरण कुछ द्रव्यों में स्पष्ट पाया जाता है; जैसे लज्जावन्ती ( लजवनी ) स्पर्शं करने पर सिकुड़ जाती है और सूर्यमुखी का फूल सूर्य के अनुसार घूमता रहता है । हरफारेबड़ी ( हरपरवरी ) में मेघ गर्जन से फल लगता है । आम्र में मद्य डाल देने से अधिक

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२० चरकसंहिता फल की उत्पत्ति होती है । बीजपूर नीबू में श्रृंगाल आदि जन्तुओं की वसा के गन्ध से फल की उत्पत्ति अधिक होती है । अशोक वृक्ष के मूल पर कामिनी अपने पैर से मारती है तो उसके गुच्छे खिल जाते हैं । वकुल पेड़ के ऊपर रजस्वला स्त्री मुख में जल का कुल्ला लेकर डालती है तो उसमें फूल आ जाते हैं । इन उदाहरणों से वह स्पष्ट है कि वनस्पति वर्गों में अन्नश्चेतना विद्यमान रहती है जिससे इन क्रियाओं से उसमें चेतनता आती है और प्रसन्न होकर अपने - अपने विशेष कार्यों को उत्पन्न करते हैं । शास्त्रकारों ने भी बतलाया है कि ' वृक्ष-गुल्मं बहुविधं तत्रैव तृणजातयः । तमसाऽधर्मरूपेण च्छादिताः कर्महेतुना || अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः । ( २ ) वहिरन्तश्चेतन - उसे कहते हैं जिन्हें अन्तःज्ञान होता है और उनके ऊपर कोई आपत्ति या आक्रमण हो तो उसे निराकरण करने में भी समर्थ होते है, जैसे - मनुष्य, पशु - पक्षी आदि । ( ख ) अचेतन - ( भौम ) जिन्हें न अन्तःज्ञान होता है न वाह्य ज्ञान होता है जैसे-ईंट, पत्थर, मिट्टी, धातु ( सोना, चाँदी ) आदि । इसे संक्षेप में समझने के लिये निम्नचक्र देखिये! ( २ ) कार्य - द्रव्य चेतन बहिरन्तश्चेतन ( जाङ्गम ) अचेतन ( मौन ) अन्तश्चेतन ( औद्भिद ) प्राकृत कृत्रिम जरायुज अण्डज स्वेदज उद्भिज वनस्पति वीरुध वानस्पत्य ओषवि यहाँ सेन्द्रिय शरीर को चेतन माना गया है । यद्यपि चतुर्विंशति तत्त्वात्मक शरीर अचेतन है, फिर भी आत्मा के संयोग से वह चेतन होता है । क्योंकि यदि शरीर न हो तो आत्मा की उपलब्धि नहीं हो सकती । बतलाया भी है- ' आत्माज्ञः करणैर्योगात् ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते । तथा ' चेतनावान् यतश्वात्मा ततः कर्त्ता निरुच्यते । ( च ० शा ० १ ) अर्थात् जिस प्रकार गरम जल में अग्नि की अनुभूति होती है और जो अग्नि का कार्य दाह और पकाना है वह कार्य जल में पाया जाता है पर जल अग्नि नहीं है फिर भी अग्नि के सान्निध्य से उसमें अग्नि - गुण रहता ही है । उसी भाँति आत्मा के संयोग से अचेतन शरीर भी चेतन माना जाता है । साथ गुर्वादयो बुद्धिः प्रयान्ताः परादयः । गुणाः प्रोक्ताः-गुण गणना - अर्थ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) के साथ गुरु, मन्द आदि बीस, वुद्धि, जिसके अन्त में प्रयत्न है ऐसे सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न और परादि दस, इन्हें गुण कहा जाता है । इस प्रकार ४१ गुण हैं । विमर्श - यहाँ गुणों का परिगणन किया गया है । सामान्यतः गुणों में चार वर्गीकरण किये गये हैं । जैसे ( १ ) सार्था - इन्द्रियगुण, ये संख्या में पाँच होते हैं । ( २ ) गुर्वादि- शारीरिक गुण या द्रव्यगुण, ये संख्या में वीस होते है, जैसे गुरु, लघु, मन्द, तीक्ष्ण, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, श्लक्ष्ण, खर, सान्द्र, द्रव, मृदु, कठिन, स्थिर सर, सूक्ष्म, स्थूल, विशद और पिच्छिल । ( ३ ) अध्यात्म या आत्मगुण- ये संख्या में ६ होते हैं । जैसे बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ।

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सूत्रस्थानम् २१ ( ४ ) परादि या सामान्यगुण — ये संख्या में दस होते हैं । जैसे ' परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च । विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमयापि च ॥ संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणाः प्रोक्ताः परादयः । ( च ० सू ० २६ ) अर्थात् पर, अपर, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिमाण, संस्कार और अभ्यास ये दस है । इस प्रकार ( १ ) इन्द्रिय गुण ५ । ( २ ) द्रव्य गुण २० । ( ३ ) आत्म गुण ६ । ( ४ ) सामान्य गुग १०, कुल ४१ गुण चरक ने स्वीकार किये हैं । न्याय वालों ने केवल २४ गुण माने है, जैसे....... अथ गुणा रूपं, रसो गन्धस्ततः परम् । स्पर्शः संख्या परिमितिः पृथक्त्वं च ततः परम् || संयोगश्च विभागश्च परत्वं चापरत्वकम् | बुद्धिः सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो यलो गुरुत्वकम् ॥ द्रवत्वं स्नेहसंस्कारावदृष्टं शब्द एव च ॥ ' ( कारिकावली ) अर्थात् ( १ ) रूप, ( २ ) रस, ( ३ ) गन्ध, ( ४ ) स्पर्श, ( ५ ) संख्या, ( ६ ) परिमाण, ( ७ ) पृथक्त्व, ( ८ ) संयोग, ( ९ ) विभाग, ( १० ) परत्व, ( ११ ) अपरत्व, ( १२ ) बुद्धि, ( १३ ) सुख, ( १४ ) दु: ख, ( १५ ) इच्छा, ( १६ ) द्वेष, ( १७ ) प्रयत्न, ( १८ ) गुरुत्व, ( १ ९ ) द्रवत्व, ( २० ) स्नेह, ( २१ ) संस्कार, ( २२ ) धर्म, ( २३ ) अधर्म, ( २४ ) शब्द ये २४ गुण हैं । यहाँ अदृष्ट पद से धर्म और अधर्म लिया गया है । वस्तुतः ये २४ गुण ही प्रधान माने गए हैं, इन्हीं गुणों में ४१ गुणों का समावेश कर लिया जाता है । धर्म अधर्म ये दो गुण आयुर्वेद में नहीं माने गए हैं । शेष सभी गुणों को आयुर्वेद ने माना है | न्यायोक्त गुणों के अतिरिक्त गुर्वादि गुण और अभ्यास एवं युक्ति ये २२ गुण अधिक माने गए हैं । समन्वय इस प्रकार किया जा सकता है - अभ्यास को संस्कार में, युक्ति को संयोग में, गुर्वादि गुणों में गुरु, द्रव और स्नेह को गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह में, शेष गुणों को संस्कार और धर्म में समाविष्ट किया जा सकता है । ये गुर्वादि गुण ( १ ) सांसिद्धिक ( स्वभावसिद्ध ) और ( २ ) नैमित्तिक ( कारणजन्य ) ये दो प्रकार से प्राप्त होते हैं । जब इनकी प्राप्ति स्वभावतः होती हैं तब ' यह इस द्रव्य का धर्म हैं ' ऐसा कहा जाता है और वह औषध का धर्म ( स्वभावतः कर्म ) अदृष्टजन्य होता है ऐसी दशा में इनका धर्म में समावेश किया जाता है । जब निमित्तों के द्वारा इन गुणों की प्राप्ति होती है तब इनका समावेश संस्कार में कर लिया जाता है । इस प्रकार कुल गुण २४ ही माने जाते हैं । यदि ' साथ गुर्वादयः ' इस पद का अर्थ वैशेषिक सिद्धान्त से किया जाय तो २४ गुण चरक के सिद्धान्त से भी होते है । जैसे वैशेषिक दर्शन में ' रूप - रस- गन्ध - स्पर्शाः संख्या परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे बुद्धयः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ' ( वैशे ० १-१-६ ) ये १७ गुण बताए गए हैं । प्रशस्तपादभाष्य में ' प्रयत्नाश्च ' यहाँ पर ' च ' पढ़ा गया है, उससे ७ और गुण संगृहीत किए गए है । यथा ' चशब्दसमुच्चितास्तु गुरुत्व-द्रवत्व - स्नेह - संस्कार - धर्माधर्म - शब्दाः सप्तैवेत्येवं चतुर्विंशतिगुणाः । ' इस तरह २४ गुण होते हैं । इसी तरह ' सार्थाः ' से स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ४, गुर्वादि से गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म, अधर्म और शब्द ७, बुद्धि इच्छा द्वेष सुख दुःख प्रयत्न, परादि से सात ( चरक के परादि १० गुणों में संस्कार, युक्ति और अभ्यास छोड़ दिया जाता है ) इस प्रकार २४ गुण माने जा सकते हैं । ऐसा कुछ लोगों का मत है पर यह कल्पना निराधार एवं अयुक्ति युक्त है । क्योंकि ' सार्थाः ' से अन्यत्र पंचमहाभूतों के पाँच शब्दस्पर्शादि गुण लिए गए हैं, जैसा कि ' अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः । ' ( शा ० अ ० १ ) गुर्वादि २० गुण सर्वत्र आयुर्वेद में स्वीकार किये गये हैं । जैसे ' तस्य गुणाः शब्दादयो गुर्वादयश्च द्रवान्ताः । ' ( सू ० २६ ) ' दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेषां कर्मविशेषणैः । दशैवान्यान् प्रवक्ष्यामि द्रवादींस्तान्निबोध मे । ( सू ० सु ० अ ० ४६ ) ' गुरुमन्द हिमस्निग्धश्लक्ष्ण सान्द्रमृदुस्थिराः । ' ' गुणाः ससूक्ष्मविशदा विंशतिः सविपर्ययाः । ' ( वाग्भट सू ० १ ) परादि से १० गुण लिए जाते हैं जैसा

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२२ चरकसंहिता कि ‘ परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च । विभागञ्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ संस्का-रोऽभ्यास इत्येते गुणाः प्रोक्ताः परादयः । ' ( सू ० अ ० २६ ) इस प्रकार आयुर्वेद में बताए हुए गुणों को छोड़ कर खीचा - नानी कर वैशेषिक दर्शन के साथ समन्वय के लिए प्रयास करना व्यर्थ है । गुणों का साधर्म्य - जो गुण परस्पर भिन्न होते हुए कुछ अंशों में समानता रखते हैं उसे साधर्म्यं कहते हैं । साधर्म्य - ( १ ) सभी गुणों में गुगव जाति रहती है, ( २ ) सभी गुण द्रव्य में आश्रित रहते हैं ( ३ ) सभी गुण निर्गुण होने हैं ( ४ ) सभी गुणों में कोई क्रिया नहीं पायी जाती है । वैधर्म्य- ( १ ) रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परत्व, अपरत्व और गुर्वादि बीस गुण मूर्त हैं अर्थात् जिनका स्थूल स्वरूप होता है उन्हीं में पाए जाने है । जैसे पृथिवी, जल, तेज, वायु में । ( २ ) बुद्धि, सुख, दु: ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म संस्कार और शब्द ये अमूर्त गुण हैं । अर्थात् ये उनमें पाए जाते हैं जिनका स्थूल रूप नहीं होता है । जैसे आत्मा और आकाश । ( ३ ) संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये मूर्त और अमूर्त गुग है और सभी द्रव्यों में पाए जाते हैं । ( ४ ) संयोग - विभाग कभी भी एक द्रव्य में नहीं पाये जाते किन्तु संख्या कभी एक द्रव्य में और कभी अनेकों द्रव्यों में पायी जाती है । ( ५ ) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा द्वेष, प्रयत्ल, धर्म, अधर्म, संस्कार और गुर्वादि वीस गुण, इन्हें विशेष कहते हैं । क्योंकि इन गुणों के आधार पर ही एक वस्तु दूसरे वस्तु से अलग समझी जाती है, ' विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ' के अनुसार ये विशेष गुन है । ( ६ ) संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व और द्रवत्व ( नैमित्तिक > ) ये सामान्य गुण हैं । अर्थात् ये अनेकों द्रव्यों में एक साथ हो पाये जाते हैं । इनके द्वारा एक वस्तु दूसरे वस्तु से अलग नहीं की जा सकती है । इनके द्वारा अनेक द्रव्य एक साथ समझे जाते हैं । जैसे संयोग के द्वारा दो या अधिक संयुक्त द्रव्यों का ज्ञान होता है ॥ 8 - प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते ॥ ४ ९ ॥ कर्म का लक्षण - यलपूर्वक की गई चेष्टा को ही कर्म कहा जाता है ॥ ४ ९ ॥ विमर्श -- यत्नपूर्वक अर्थात् श्रमपूर्वक जो चेष्टा की जाती है उसे कर्म माना जाता है | चेष्टा का अर्थ है कर - चरणानुकूल व्यापार अर्थात् हाथ - पैर से जो भी क्रिया की जाती है उसे चेष्टा कहते हैं । इसी चेष्टा के आधार पर कणाद ने -- ' उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि -ये पाँच कर्म के भेद माने हैं ( १ ) उत्क्षेपण - ऊपर के देश से संयोग के कारणभूत कर्म को उत्क्षेपण ( २ ) अवक्षेपण - अधोदेश से संयोग के कारणभूत कर्म को अवक्षेपण, ( ३ ) आकुञ्चन ' शरीर के समीप देश से संयोग के कारणभूत कर्म को आकुञ्चन ( खींचना ), ( ४ ) प्रसारण - दूर देश से संयोग के कारणभूत कर्म को प्रसारण ( फैलाना ), ( ५ ) गमन - किसी भी प्रकार गतिशील होने वाले कर्म को गमन कर्म कहा जाता हैं । सामान्यतः सभी प्रकार की गतियाँ कर्म में समाविष्ट हो जाती है । जैसा कि - ' भ्रमणं रेचनं स्पन्दनोर्ध्वज्वलनमेव च । तिर्यग्गमनमप्यत्र गमनादेव लक्ष्यते ॥ ' ( कारिकावली ) | आयुर्वेद में पञ्चकर्म का विधान है । यथा ( १ ) वमन, ( २ ) विरेचन, ( ३ ) निरूहब [ स्त, ( ४ ) अनुवासनवस्ति, ( ५ ) नस्य, ये सभी इन वैशेषिक कर्म के अन्दर ही समाविष्ट हो जाते हैं । दूसरा चिकित्सा शास्त्र में ( १ ) पूर्वकर्म, ( २ ) प्रधानकर्म, ( ३ ) पश्चात्कर्म १. ' प्रयत्नादीनि प्रयतनं प्रयत्नः कर्मैवाद्यमात्मनः । अत्रादिशब्दः प्रकारवाची, तेन संस्कार गुणत्वादिजन्य कृत्स्त्रक्रियावरोधः ' चक्रः । ' प्रयत्लो नाम गुणविशेषः प्रकृतिगुणमध्ये पठितः, स चात्मन-इच्छाजन्या प्रवृत्तिद्वेषजन्या निवृत्तिः, स आदिः कारणं यस्य तत्कर्म ' इति गङ्गाधरः ।

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सूत्रस्थानम् २३ ये तीन कर्म माने गये हैं —- ये सभी उपरिनिर्दिष्ट लक्षण के द्वारा कर्मसिद्ध होते है । इसी लक्षण के अनुसार -- विमान स्थान में भी कर्म का लक्षण बताया गया है । यथा ' प्रवृत्तिस्तुः खलु चेष्टा कार्यार्थी सैव क्रिया कर्म यत्नः कार्यसमारम्भश्च । ( वि. अ. ८ ) । समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः । स नित्यो यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः ॥५० ॥

समवाय का लक्षण – पृथिवी आदि द्रव्यों के साथ गुणों का अपृथग्भाव ( अलग न होना ) ही समवाय माना जाता है । यह नित्य है क्योंकि जहाँ द्रव्य रहता है वहाँ समवाय सम्बन्ध नित्य रहता है | कभी भी द्रव्यों में गुण अनिश्चित नहीं रहना अर्थात् निश्चित ही रहता है ॥ ५० ॥

विमर्श -- दो वस्तुओं के मध्य के सम्बन्ध को ही समवाय सम्बन्ध कहा जाता है । जैसा कि उपरिनिदिष्ट श्लोक में कहा गया है कि पृथिवी आदि आवार द्रव्यों के साथ आधेय गुर्वादि गुण, उत्क्षेपणादि कर्म, सामान्य, विशेष का जो अपृथग्भाव ( अलन न रहना ) सम्बन्ध हैं, उसे ही सनवाय कहते है | श्राविश्वनाथ पञ्चानन भट्ट ने भी - ' घटादीनां कपालादी द्रव्येषु गुणकर्मणोः । तेषु जातेश्च सम्बन्धः समवायः प्रकीर्तितः ॥ ' ( कारिकावली ) | घट आदि का कपाल आदि के साथ और द्रव्यों का गुण - कर्मों के साथ जो सम्बन्ध होता है उसे समवाय कहते है । इसकी व्याख्या करते हुए मुक्तावली में ' अवयवावयविनोर्जातिव्यक्त्योर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रियावतो नित्य द्रव्य विशेषयोश्च यः सम्बन्धः स समदायः । ' समवाय का लक्षण स्पष्ट किया है । वैशेषिक दर्शन मे - ' अयुत सिद्धाना -माधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इहेतिप्रत्ययहेतुः स समवायः ॥ ' अर्थात् आधार और आधेय-भाव से अयुतसिद्ध ( अथग्भूत ) जो सम्बन्ध ' इह ' इस ज्ञान का कारण है वह समवाय है । ऐसा लक्षण किया है । यहाँ अयुतसिद्ध का तात्पर्य अपृथग्भाव हा है । इह प्रत्यय का दृष्टान्त ' इह तन्तु पट: ' है । यहाँ ' तन्तुओं का कपड़ा ' ऐसा अर्थ किया जाता है । कपड़े के निर्माण में तन्तु और कपड़ा अलग नहीं होता । इस प्रकार कपड़ा के निर्माण में तन्नु के बिना कपड़ा और कपड़े के बिना तन्तु अलग नहीं रह सकते । अतः इसे अयुनसिद्ध ( या अपृथग्भाव ) कहते हैं । इस प्रकार के ज्ञान का कारण जो अलग न होने वाला सम्बन्ध है वह समवाय है । कपड़े को देखकर ही हमें ' इह तन्तुषु पट: ' ऐसा ज्ञान हुआ । यहाँ तन्तु आधार है पट आधेय है । अतः तन्तुओं के विना कपड़े की स्थिति नहीं रह सकती है । दृष्ट कपड़े से तन्तुओं की स्थिति नहीं रह सकती, क्योंकि कपड़े में रहने वाले तन्तुओं को अलग कर दिया जाय तो कपड़े की सत्ता नष्ट हो जाती है । यद्यपि कपड़े से अलग तन्तुओं को सत्ता होती है, पर जिन तन्तुओं से कपड़े का निर्माण होता है उनकी सत्ता अलग नहीं होती, यदि अलग कर दिया जाय तो कपड़ा, कपड़ा नहीं रह जायगा । तात्पर्य यह है कि एक काल में कपड़ा और तन्तु पृथक नहीं रह सकते, इसलिये तन्तु और कपड़े का समवाय सम्बन्ध है और जब तक पटद्रव्य की सत्ता है तब तक यह सम्बन्ध नित्य है । इसी लिये मूल में जहाँ द्रव्य है वहाँ पर समवाय सम्बन्ध नित्य है ऐसा कहा है । सम्बन्ध के बिना कोई भी वस्तु किसी के साथ नहीं रहता है । यह संयोग दो प्रकार का होता है । एक संयोग, दूसरा समवाय; इनमें संयोग संबन्ध उन वस्तुओं में पाया जाता है जो संयोग के बिना भी अपनी सत्ता रखते है उनमें यह सम्बन्ध अनित्य होता है । जैसे- ' कपिसंयोग-वानयं वृक्षः ' यहाँ कपि और वृक्ष का संयोग सम्वन्ध है, इन दोनों की सत्ता अलग-अलग है । यद्यपि इस सम्बन्ध में भी आधाराधेयभाव तथा इह प्रत्यय का ज्ञान होता है । १. ' नित्यं इति शेषः ।

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२४ चरकसंहिता तथापि इनका अपृथग्भाव सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता । अतः यहाँ पर समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता । इसलिये अयुतसिद्ध वस्तुओं के कतिपय क्षणस्थायी वा सम्बन्ध को संयोग कहते है । समवाय सम्बन्ध इससे बिलकुल पृथक् होता है । यह दो वस्तु में रहने वाला नित्य सम्बन्ध है । इसी प्रकार में ग्रन्थ, जल में शीन, तेज में उष्ण, वायु में स्पर्श, आकाश में शब्द आत्मा में सुख - दुःख की अनुभूति, मन में रज और तम या अणु, एक काल में शीत, उष्ण, समशीतोष्ण, दिशा में पूर्वादि व्यवहार ( पूर्व पश्चिम आदि का व्यवहार ), ये गुण अपने - अपने द्रव्यों में समय सम्बन्ध से रहते हैं और नित्व है । यहाँ यह भी समझना चाहिये कि जब तक द्रव्य की सत्ता है तब तक ये गुण उनमें रहते है और इनका सम्बन्ध भी नित्य है । समवाय सम्बन्ध में समवायी द्रव्य के नाश होने पर भी समवाय का नाश नहीं होता है । यह बात ' यत्र हि द्रव्यं ' से रूष्ट किया गया है । आकाश द्रव्य नित्य है उसमें रहने चाला शब्द गुण का सम्बन्ध नित्य रहता है । इसी तरह नित्य आकाश में परिमाण भी नित्य है तथा नित्य आकाश में द्रव्य भी नित्य है और नित्य आकाश और गुण का समवाय सम्बन्ध भी नित्य है । इस प्रकार समवाय के नित्य सिद्ध होने पर अन्यत्र वर्तमान समान रूप होने से समवाय सम्बन्ध नित्य ही रहता है । यदि यह कहा जाय कि आश्रय द्रव्य के नाश होने पर समवाय सम्बन्ध का भी नाश हो जायगा तो यह कहना उचित नहीं है क्योंकि यह देखा जाता है कि गो व्यक्ति के नाश होने पर भी गोल्सामान्य का नाश नहीं होता है । जब गोव स्थायी रहता है गो उसमें रहने वाला समवाय सम्बन्ध भी नित्व है । कुछ लोग समवाय सम्बन्ध को नित्य और अनित्य दो प्रकार का मानते है, किन्तु यह सिद्धान्त सर्वतन्त्र सिद्धान्त नहीं है और आयुर्वेद के समान वैशेषिक दर्शन भी इसे नहीं मानता । इस लिये यहाँ नित्य समवाय सम्बन्ध का दी प्रतिपादन किया गया है, और यह बात ' न तत्रानियतो गुणः ' से स्पष्ट किया गया है, अर्थात् जहाँ द्रव्य होता है वहाँ गुण अनियत नहीं होता । यह द्रव्यों का स्वभाव है और वह नित्य है | ॐ यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत् । द्रव्य का लक्षण -- जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो कर्म और गुण का समवायि कारण है उसे द्रव्य कहते हैं । विमर्श - सामान्य, विशेष और समवाय का लक्षण पहले कहा गया है; अब द्रव्य, गुण और कर्म का लक्षण क्रम से बताये जाते हैं । इनमें प्राधान्यात् सर्वप्रथम द्रव्य का लक्षण कहा गया है । यह द्रव्यलक्षण कारण द्रव्य का है, जिस वस्तु में कर्म और गुण रहते हों जो कर्म और गुण का समवायिकारण हो उसे द्रव्य कहते हैं, समवायिकारण का तात्पर्य यह है कि ' या समवेतं कार्यमु त्पद्यते तत्समवायिकारणन् ' ( तर्कसंग्रह ) | अपने में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले कार्य का आरम्भक जो हो उसे समवायिकारण कहा जाता है । जैसे मिट्टी अपने में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले घट का उत्पादक होता है । इसी प्रकार द्रव्य अपने में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले कर्म एवं गुण का उत्पादक होता है । अतः द्रव को कर्म एवं गुण का समवायि कारण माना जाता है । ये गुण और कर्म द्रव्य के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी नहीं पाये जाते है । कर्म और गुण पदार्थान्तर होते हुये भी द्रव्य में ही उपलब्ध होते है । पदार्थ रूप से कर्म और गुण की स्वतन्त्र सत्ता रहने पर भी से सदा द्रव्य के ही आश्रित रहते हैं अर्थात् द्रव्य में आश्रित होकर ही कर्म निष्पन्न करते है । गुण और कर्म कभी भी द्रव्य से अलग नहीं होते है । द्रव्य का लक्षण - इसी लक्षण के अनुरूप ही अन्यत्र भी किया गया है ' यथा क्रियागुणवत् समवायिकारणं द्रव्यम् । ' ( सु.सू. ४० ) । द्रव्यमाश्रय लक्षणं

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सूत्रस्थानम् I पञ्चानाम् । ' तै ( ) । ' रसादीनां पञ्चानां भूतानां यदाश्रवभूतं सद् द्रव्यम् । ' ( भावप्रकाशः ) ' क्रियागुण-चत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणन् । ' ( वै. १११।१५ ) । कार्य का समवायिकारण तथा गुण और कर्म का अक्षयभूत पदार्थ को अन्य कहा जाता है, ऐसा क्षण वैशेषिक में किया गया है । इस प्रकार द्रव्य लक्षण करने पर ' खादीन्यात्मा मनःकालदिशश्च द्रव्यसंग्रह: ' ये नौ द्रव्य ही जगत में पाये जाते हैं जैसे ( * ) पृथिवी द्रव्य है क्योंकि पृथिवी का कर्म पद गन्धोपन करना आदि है, गुण गन्ध है, पृथिवी का कार्य घट है, घट का समवायि कारण घटकपाट है । ( २ ) जल, ' पिण्डीकरण जल का कर्म और गुण शांत है, किसी वस्तु कोद्रव करना जल का कार्य है या वरफ जल का कार्य है, उसका समवायिकारण जल है अतः जल द्रव्य है । ( ३ ) तेज इसका जलाना कर्म और उष्ण होना गुण है दोनों का समवायिकारण अग्नि ( तेज ) है अतः द्रव्य है । ( ४ ) वायु उसका -स्पर्श गुण है, सूखाना आदि कार्य है इनका समवायिकारण वायु है । ( ५ ) आकाश इसका शब्द गुण है, अप्रतिघात कर्म है, इनका समवायि कारण आकाश है अतः आकाश द्रव्य है । ( ६ ) आत्मा - इसका गुण निविकार, अनादि - मध्य - निधन होना, सुख, दु: ख, इच्छा, द्वेष, धर्म, अधर्म आदि है | कर्म - निमेषोन्मेष, गमनागमन आदि क्रिया है । बताया है भी ' यस्मात् समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः । न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ' ( शा. १ ) अतः आत्मा द्रव्य है । ( ७ ) मन का अणुत्व और एकत्व गुण है - यथा - ' अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ' तथा मन का कार्य ' चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च । किञ्चिन्मनसो यं तत् सर्वं ह्यर्थ-संग्रकम् । इन्द्रियनिग्रहः कर्म ( शा. अ. १ ) इनका समवाथि कारण मन है अतः मन द्रव्य है । ( ८ ) काल - ' कलयति कालयति वा भूतानि इति काल: ' प्राणियों को कवलित करना या अतीतादि व्यवहार को बताना काल का कर्म है और शीतोष्ण वर्षा का होना या एक, नित्य, व्यापक होना काल का गुण हैं, इनका समवायिकारण काल है अतः काल द्रव्य है । ( ९ ) दिशा - पूर्व-पश्चिम आदि का व्यवहार बताना दिशा का कर्म है और एक, विभु और व्यापक होना दिशा का गुण है इनका समवायिकारण दिशा है, अतः दिशा द्रव्य है तम का दस द्रव्यत्व - कुछ लोग कर्म और गुण का आश्रयभूत और कर्म - गुण का समवायि कारण द्रव्य होता है ऐसा द्रव्य का लक्षण करने पर तम को दसवाँ द्रव्य मानते हैं क्योंकि ' नीलं तमचलति ' इस वाक्य में नील गुण और चलन क्रिया का आश्रय तम है और इसका समवायिकारण भी तुम है अतः तम को भी द्रव्य मानना चाहिये, इसका अन्तर्भाव किसी भी द्रव्य में नहीं हो सकता है- यथा ( १ ) पृथिवी में इसका अन्तर्भाव नहीं होगा क्योंकि इसमें गन्ध और स्पर्श का अभाव है । ( २ ) जल में इसका अन्तर्भाव नहीं होगा क्योंकि तम में शीतस्पर्श और शुक्लरूपाभाव है । ( ३ ) तेज में इसका अन्तर्भाव नहीं होगा क्योंकि इसमें उष्णस्पर्शाभाव और भास्वररूपाभाव है । ( ४ ) वायु में इसका अन्तभव नहीं होगा क्योंकि इसमें स्पर्शाभाव और सदागतिमस्वाभाव है । ( ५ ) आकाश में इसका अन्तर्भाव नहीं होगा क्योंकि इसमें रूप है और आकाश में रूप का अभाव होता है । इसी प्रकार आत्मा, मन, काल और दिशा में इसका अन्तर्भाव नहीं होगा क्योंकि इसमें रूप है और आत्मादि चतुष्टय में रूप का अभाव होता है अतः तम को दसवाँ द्रव्य मानना चाहिये? उत्तर - पर यह उचित नहीं, क्योंकि तेज का ही अभाव तम होता है । यदि यह कहा जाय कि तम का अभाव तेज है तो यह कहना अनुभव विरुद्ध है तेज का अनुभव स्पष्ट एवं नेत्र, स्पर्शेन्द्रिय इन दो इन्द्रियों से ग्राह्य है तथा तेज का दहन पचन आदि कर्म प्रत्यक्ष सिद्ध है तम केवल एक चक्षु इन्द्रिय से ही ग्राम है तथा दूसरी बात यह है कि जब तम चक्षुचा है तब इसे रूपवान् द्रव्य कहा जा सकता है तो जो रूपवान् द्रव्य होता है उसका ज्ञान प्रकाश में अवश्य होता है पर तम प्रकाशशून्य स्थान में ही पाया जाता है, अतः

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२६ चरकसंहिता इसे रूपवान् द्रव्य भी नहीं कहा जा सकता है और नील तन की प्रतीति होने से रूपरहित द्रव्य भी नहीं कहा जा सकता है ऐसी दशा में प्रकाश का अभाव ही नम नाना जाता है । वस्तुतः नील रूप, चकिया का ज्ञान जाति है केवल दीप के अपसरण क्रिया का ही यहाँ भान होता है, अतः

नम दसवाँ द्रव्य नहीं है ।

8 - समवायी तु निश्रेष्ठः कारणं गुणः ॥ ५१ ॥

गुण का लक्षण - जो समवाय सम्बन्ध वाला हो, चेष्टा रहित हो और ग्रहण में कारण हो उसे गुग कहते है ॥ ५१ ॥

विमर्श - द्रव्य का निर्देश करने के बाद गुण का लक्षण बताया गया है । सम्बन्ध सदा द्विष्ठ ( दो में ) होता है । जैसे समावाय सम्बन्ध द्रव्य में पाया जाता है वैसे गुण में भी रहता है क्योंकि अन्य और युग का सन्वन्ध समवाय ( नित्य ) होता है अतः गुग समवाय सम्वन्ध वाला है । वह स्वयं व्यापार नहीं करता है पर जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु का ग्रहण करता है तो गुणों के ही कारन करता है अतः किसी कवि ने कहा है कि - ' गुणेषु यतः क्रियतां किमाटोपैः प्रयोजनम् । चिक्रीनं न घण्टाभिर्गावः क्षीरविवर्जिताः ॥ ' तथा ' के ग्राहक सहस नर विन गुज लहुँ न कोय ' । उदाहरण के लिए गुलाब के फूल को समझिए फूल में रूप एवं गन्ध गुग है, फूल द्रश्य है उसमें समवाय सम्बन्ध से रूप एवं गन्ध है क्योंकि यावत्काल फूल की स्थिति है तावत्काल रूप और अन्य उसमें रहेगा अतः रूप एवं गन्ध भी समवाय सम्बन्ध वाला है, यदि कोई व्यक्ति फूल का ग्रहण किया तो उसका रूप एवं गुग ने कोई चेष्टा ( व्यापार ) नहीं की, न यह कहा कि मुझे ले लो पर सुन्दर रूप और गन्ध के ही कारण फूल को लिया जाता है अतः रूप एवं गन्ध गुण कहा जाता है । बा द्रव्य की उत्पत्ति में तीन कारण होने है ( १ ) समाधि कारण, ( २ ) समवाथि कारण, ( ३ ) निमित्त कारण । ( १ ) सनवादि कारण उसे कहते हैं जो समवेत ( माय सम्बन्ध से ) रहते हुए कार्य का उत्पादक हो ( यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यने तत्समवायि-कारणम् यथा नस्तवः परस्य स्वरूपादे ) जसे तन्तु पर कार पर अपने में रहने वाले वन, हरा, नील आदि रंग का समवाथि कारण होता है । ( २ ) असमवाथि कारण - उसे कहते हैं जो कार्य के साथ वा कारण के साथ एक अर्थ में समवेत रहने हुए कारण हो जैसे पट का असाच कारण तन्तुओं का संयोग है अर्थात् पर समवाय सम्बन्ध से गन्तुओं में है तन्तुओं में समवायसम्बन्ध से गन्तुओं का संयोग भी है अतः कार्य पट के साथ एक अर्थ में ( अभिन्न तन्तु स्वरूप अधिकरण में ) समवाय सम्बन्ध से वर्तमान रहते हुए तन्तु संयोग भी कारण है । यह कारण पट के प्रति असमवाथि कारण है । यहाँ तन्तुओं में पर और तन्तुसंयोग, समवाय सम्बन्ध से रहता है कारण के साथ एकाधिकरण जैसे -- पट में रहने वाला रूप कारण पट के साथ एकाधिकरण तन्तु नें समवाय सम्बन्ध के साथ वर्तमान रहते हुए तन्तु का रूप पट रूप के प्रति असमवाथि कारण होता है । ( ३ ) निमित्त कारण - समवायि और असमवाथि कारण इन दोनों कारण से जो भिन्न होता है उसे निमित्त कारण कहते है जैसे पोत्ति के प्रति तुरी, म जुलाहा या घरोपत्ति के प्रति कुम्हार, दण्ड, आदि यहाँ गुण कारण है इसका तात्पर्य यह है कि गुगसमवायि कारण होता है कुछ लोग ' कार्येग कारणेन वा सहकस्मिन्नर्थे समवेतं १. ' समवाय समवायायः चक्रः । २. कार्येण कारणेन या सकस्मिन्नर्थे समवेतं सत् कारणमसमवायिकारणम् । यथा तन्तु-संयोगः परस्य, नन्तुरूपं परस्य ।

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सूत्रस्थानम् २७ सत् कारणभसमवायिकारणम् ' ( तक ० ) तथा ' द्रव्याश्रय्यगुणवान् संयोगविभागेष्वकारणमननेची गुणः ' ( क ) लक्ष के आधार पर सुन को असमदावि कारण मानते है, पर उनका यह कहना उचित है क्योंकि ' शिवगुण समवायिकारणं द्रव्यन् ' इस द्रव्यसक्षण से समवायि पर अध्या-हार करके ' द्रव्यादान् संयोगविभाष्यकारणमनपेक्षः समवायिकारणं गुणः ' ऐसा गुन का लक्षण माना गया है । इसलिए युग भी युग का समवाथि कारण होता है तथा कार ने भी ' गुणाश्च गुणान्तरमारभमे ऐसा बताया है । असमवाथि कारण मानने पर वह वचन असङ्गन हो जायगा । यद्यपि ' गुणा गुणाश्रया नोक्ताः ' के आधार पर गुण को गुणान्तर की उत्पत्ति में असमवाथि कारण माना गया है तथापि वह लक्षग सैद्धान्तिक नहीं माना जाता है क्योंकि एक रस, दोरम, बुद्धि, जो स्निग्ध होना है वह गुरु होता है आदि प्रयोग के अनुसार गुण गुण रहना है वह प्रतीति स्पष्ट होती है । इस लक्षग में समवाय का आधेय गुग माना जाना है और समवाय का आधार द्रव्य होता है, ऐसा मानने पर समवावि कहने पर भी आकाशादि भौ अन्यों में वह लक्षण नहीं जाता है क्योंकि आकाशादि अन्य समवाय का आधार है न कि आधेय है । ‘ निश्चेष्ट ' यह विशेषण देने से चेष्टा रूप कर्म नहीं लिया जाता है नहीं तो जैसा सुनवाय का होता है वैसे ही कर्म भी समयाय का आधेय है अतः इसमें भी गुण का लक्ष चला जाता । कारण है ऐसा कहने से अकारण समवाय, सामान्य और विशेष इनका ग्रहण नहीं होता है । द्रव्य - गुण, कर्म का आश्रय होता है पर गुण स्व समान गुण और कर्म का आश्रय नहीं होता है इसीलिए द्रव्य से गुण पृथक् कहा गया है । * संयोगे च विभागे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् । कर्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते ॥५२ ॥

कर्म का लक्षण - जो एक ही साथ संयोग और विभाग में कारण हो एवं अन्य के हो उसे कर्म कहते हैं । कय को किया की कर्म कहते हैं । यह कर्म संयोग एवं विभाग मैं किसी अन्य कारण की अपेक्षा नहीं करना अर्थात् कर्म केवल किया की अपेक्षा करता ई ॥ ५२ ॥

विमर्श - कर्म के दो भेद होते हैं ( १ ) पेहलीकिक ( २ ) पारलौकिक ऐहलौकिक कर्म का लक्षण पहली लाइन से किया है । दूसरी लाईन से दूसरे कर्म का लक्षण बताया है । कर्तत्र्य से सत्त लिया जाता है जब उसकी क्रिया अर्थात् उसका पालन किया जाता है तब उससे जो कर्म उत्पन्न होना है यह पारलौकिक कर्म होता है । दोनों कर्म केवल क्रिया की अपेक्षा करते हैं और दोनों संयोग एवं विभाग में एक साथ ही कारण होते हैं । जैसे उत्क्षेपण कर्म में जब ऊर्ध्वदेश से संयोग होता है तो उसी क्षण अपः देश से विभाग भी होता है । इसी तरह सरवृत्त कर्त्तव्य का पालन करने से जब शुभ कर्म से संयोग होता है तब उसी क्षण अशुभ कर्म से विभाग हो जाना है । वैशेषिक दर्शन में ' एकद्रयमगुणं संयोगविभागेनपेक्ष्यकारणमिति कर्मलक्षणम् ' । ( १११७ ) जो एक द्रव्याश्रित गुण से शून्य, संयोग एवं विभाग में अपने से उत्तरभावी किसी अन्य भाव पाने की अपेक्षा न करते हुए कारण होता है उसे कर्म कहते है । फर्म सर्वदा द्रव्य में रहना है, द्रव्य से अतिरिक्त इसकी अन्यत्र प्राप्ति नहीं होती है । द्रव्य संयोग एवं विभाग का समवायि कारण और कर्म निमित्त कारण होता है । कर्म संयोग - विभाग के उत्पन्न करने में समवायिकारण, द्रव्य का आश्रय लेते हुए अन्य किसी का आश्रय नहीं लेता है अतः संयोग-विभाग में अनपेक्ष्य कारण बताया गया है । जिस प्रकार समवाय सम्बन्ध से द्रव्य में गुग होता है उसी प्रकार समवाय सम्बन्ध से द्रव्य में कर्म भी आश्रित रहता है । पर गुण से कर्म भिन्न है इसे निम्र कोक से समझना चाहिए ।