चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1021–1030
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1021–1030
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६३२ चरकसंहिता पादपाः । पचते क्षीरिणो वृक्षाः ) वा कषाय रस वाले जैसे के महुआ, आंवला, जामुन आदि वृक्षों की छाल वा कोमल पत्ती के स्वरस में वख भिगोकर योनि के भीतर धारण करावे या न्यग्रोधादि गण की औषधियों में पकाए हुए दूध और घृन में कपड़ा भिगोकर योनि में धारण कराये । और इसी घृत को २ तोले की मात्रा में चटावे वा केवल दूध में घृत मिलाकर पिलाने प ( रक्त कमल ) उत्पल ( नील कमल ) और कुमुद ( कोई - बेरा ) के केशरों का कल्क बनाकर मधु और चीन से चाटने के लिए दे सीपाड़ा, कमल का बीज और कशेरू खाने के लिए दे ( इनका अलग - अलग या एक में हलुआ बनाकर खाने को देना चाहिए ) । गन्ध, प्रियङ्गु, नील कमल, शालूक ( कमल की जड़ ) गूलर का कच्चा फल, और वटवृक्ष का शुङ्ग ( टूसा ) इन सबको बकरी के दूध से पीसकर पिलावे । बला का मूल, अतिबला ( ककही ) का मूल, चावल ( धान ) का मूल, साठी के चावलका मूल, ईख का मूल और काकोली इन औषधियों के क्वाथ से पकाए हुए दूध के साथ लाल चावल के मान को जो कोमल एवं सुगन्धि युक्त और शीतल हो, उसे मधु और चीनी मिला कर खाने को दे । अथवा यदि गर्भिणी मांस खाने वाली है तो लाव ( लवा ), कपिञ्जल ( गौरैया ) कुरङ्ग ( मृग ), शम्वर ( बारहसिंघा ), शश ( खरहा ), हरिण, एण, कालपुच्छक ( जिस हरिण की पूंछ काली हो ), इनके मांस रस को घृत से संस्कारित कर, गर्भिणी स्त्रो को सुखकर शीतल स्थान में बैठाकर इसी घृत संस्कारित मांस रस से लाल चावल का भान खाने को दे । तथा क्रोध, शोक, परिश्रम, मैथुन, व्यायाम से उसकी रक्षा करता रहे अर्थात् ऐसा कोई कार्य न होने दे जो गर्मिणी को क्रोधादि से ग्रस्त करें । मन के अनुकूल मुन्दर कथा वार्ता से उसके मन को प्रसन्न रखते हुए उसकी सेवा का प्रबन्ध करे । इस प्रकार कार्य करने से गिरता हुआ रक्त बन्द होकर गर्भ स्थिर एवं पुष्ट हो जाता हैं ॥ २४ ॥
विमर्श - गर्भस्राव से गर्भिणी Shock की अवस्था प्राप्त करने लगती है उस समय पैर की तरफ शय्या ऊँचा रखने से उसमें सुधार होता है क्योंकि ऐसा करने से मस्तिष्कगत रक्तसंवहन में कमी नहीं आने पानी है । ऊपर बताई गई सारी क्रियायें रक्त को बन्द करती हैं, इनमें कुछ औषध प्रयोग है जो शीन और मधुर गुणभूयिष्ठ हैं - ' रक्तं स्यन्दयते हिमम् ' के अनुसार वे रक्तरोधक होकर गर्भ स्थापक होते हैं । वर्णित विहार मानसिक सन्तुलन को नियमित रखते हैं । * यस्याः पुनरामान्वयात् पुष्पदर्शनं स्यात्, प्रायस्तस्यास्तद्गर्भोपघातकरं भवति, विरुदोपक्रमत्वासयोः ॥ २५ ॥
और -भी चार मास के बाद भी होता है, तब प्रायः वह रज: स्त्राव गर्भ में चिकित्सा परस्पर विरुद्ध होती है ॥ २५ ॥
आमदोष के कारण यदि गर्भवती स्त्री का रजःस्राव बाधक होता है क्योंदि गर्भ खाव और आमदोष की विमर्श - आमदोष के कारण होने वाला गर्भपात ( Abortion ) चिकित्सा में कठिन स्थिति उत्पन्न कर देता है, यदि रजस्राव होने पर उसकी चिकित्सा मधुर गुण और शीतवीर्य वाली औषधियों से की जाय तो रक्तस्राव बन्द होकर वह गर्भस्थापक नहीं होता है, क्योंकि दोनों को चिकित्सा परस्पर विरुद्ध होती है । जैसे आमदोष की चिकित्सा लघु, रुक्ष, उष्ण द्रव्य से की जाती है, क्योंकि आम इसके विपरीत गुणयुक्त होता है, पुष्प ( रजःस्राव ) स्वभाव से रुक्ष, उष्णगुणभूयिष्ठ होता है, उसकी चिकित्सा मधुर और शीनवीये औषध से की जाती है । अनुश्य जब आम की चिकित्सा की जायगी तो रजःसाव की वृद्धि हो जायगी जब रजःसाव की चिकित्सा की जायगी तो आम की वृद्धि हो जायगी अतः विरुद्धोपक्रम होने से गर्भ में बाधा उत्पन्न हो जाती है । * यस्याः पुनरुष्णतीक्ष्णोपयोगादर्भिण्या महति संजातसारे गर्भे पुष्पदर्शनं स्यादन्यो
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जाति सूत्रीय शारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६३३ वा योनिस्रावस्तस्या गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात् स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं, तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपविष्टक रोग की सम्प्राप्ति और लक्षण - जिस समय गर्भिणी स्त्रां का गर्भ बड़ा और सार युक्त हो जाता है, उस समय जब उष्ण और तीक्ष्ण द्रव्यों के अधिक प्रयोग से या अन्य आवातादि किसी भी कारण वश रजःस्रान होने लगे या किसी प्रकार का योनि स्राव होने लगे तो गर्भ-पोषक वस्तु के निकल जाने से गर्भ बढ़ता नहीं है प्रत्युत सूख जाता है और वह सूखा हुआ गर्भ बहुत दिनों तक गर्भाशय में पड़ा रहता है । उस गर्भ को कुछ आचार्यगण उपविष्टक रोग कहते हैं । विमर्श - शरीर के दूसरे अध्याय में भी कहा है – ' आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समा-प्नोति परिस्रुतिं वा । तं स्त्री प्रसूते सुचिरंण गर्भ पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ॥ ' यहाँ परिस्रुति का नात्पर्य असंजातसार चार मास पूर्व के गर्भ से हैं । संजातसार का चार मास के बाद शोष होता है । यह तात्पर्य है । वाग्भट में इसका वर्णन अधिक स्पष्ट है, जैसे- ' संजातसारे महति गर्भे योनिरति-स्रवान् । वृद्धिमप्राप्नुत्रन् गर्भः कोष्ठे तिष्ठति सस्फुरः ॥ उपविष्टकमाहुस्तं वर्धते तेन नोदरम् । ’ ( वा. शा. अ. २ ), ' उपवेशनशीलत्वात् ' अतः इसका नाम उपविष्टक रखा गया है । उपवासव्रतकर्मपरायाः पुनः कदाहारायाः स्नेहद्वेषिण्या वातप्रकोपणोक्तान्यासेव-मानाया गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति परिशुष्कत्वात् स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रम्, अस्पन्दनश्च भवति, तं तु नागोदर मित्याचक्षते ॥ २६ ॥
नागोदर रोग की सम्प्राप्ति तथा लक्षण - उपवास तथा व्रतकर्म में रत रहने वाली, कुत्सिन ( अनिरूक्ष सड़े - गले, बासी ) आहार करने वालो, स्नेह से द्वेष रखने वाली अर्थात् भोजन में घृत, दुग्ध न खाने वाली, तथा वान प्रकोपक आहार और विहार का सेवन करने वाली गर्भिणी स्त्री का गर्भ सूख जाने के कारण वृद्धि को नहीं प्राप्त होता है । यह भी गर्भ अधिक काल तक जीवितावस्था में पड़ा रहता है । इस गर्भ में स्पन्दन नहीं होता है । इसे नागोदर कहा जाता है || २६ ॥ विमर्श - - यह भी रोग संजातसार गर्भ होने के बाद ( चौथे मास के बाद ) ही होता है जब वात कोपक वस्तु के सेवन से गर्भाशय में वायु की अधिक वृद्धि हो जाती है तब गर्भाशयगत धातुयें सूख जाती हैं, गर्भ को पोषक पदार्थ प्राप्त नहीं होता । वाग्भट में इसका वर्णन इस प्रकार है - ' शोको-पवारूक्षाद्यैरथवा योन्यतिस्रवात् । वाते क्रुद्धे कृशः शुष्येद्गर्भी नागोदरं तु तम् । उदरं वृद्ध-मध्यत्र हीयते स्फुरणं चिरात् ॥ ' ( शा. अ. २ ) । तथा सुश्रुत में - ' वाताभिपन्न एव शुष्यति गर्भः स मातुः कुक्षिं न पूरयति, मन्दं स्पन्दते च । ' ( शा. अ. १० ) । वाग्भट में ' स्फुरणं चिरात् ', सुश्रुत में ' मन्दं स्पन्दते ' इन दोनों पाठों के आधार पर गङ्गाधर ने ' अतिमात्रमस्पन्दनश्च ', पाठ करके बहुत कम स्पन्दन होता है ऐसा अर्थ किया है । ॐ नार्योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेच्यामः -- भौतिकजीवनीय बृंहणीयम-धुरवातहर सिद्धानां सर्पिषां पयसामामगर्भाणां चोपयोगो गर्भवृद्धिकरः; तथा संभोज -नमेतेरेव सिद्धैश्व घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्णं यानवाहनापमार्जनावजृम्भणैरुपपा-दनमिति ॥ २७ ॥
नागोदर और उपवेष्टक की चिकित्सा ।- इन दोनों रोगों से पीड़ित स्त्रियों की चिकित्सा का विशेष रूप से उपदेश कर रहे है । भौतिक ( भूताधिकार में बताए गये घृत ) जीवनीय १. ' कालान्तरम् ' इति पा ० । २. ' सुबुभुक्षायाम् ' इति पा ० ।
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६३४ चरकसंहिता बृंहणीय, मधुरगण और वानहर औषधियों से सिद्ध किये हुए घृतों का प्रयोग नागोदर और उपविष्टक रोग से पीड़ित स्त्रियों को देना चाहिये । नागोदर रोग से पीड़ित स्त्रियों के लिये योनिव्यापत् रोगों की चिकित्सा जो चिकित्सा के तीसवें अध्याय में बनायी है उसमें बनाये दूध का प्रयोग, और गर्भ को बढाने वाले अण्डे आदि आम गर्भ का प्रयोग करना चाहिये । भूख लगने पर इन्हीं जीवनीय आदि गणों से सिद्ध किए हुए घृतों के साथ भोजन देना चाहिये । और बार बार यान वाहन अवमार्जन ( स्नान ), अवजृम्भण ( बारवार जम्माई, लेना ) आदि उपायों से उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २७ ॥
विमर्श - सुश्रुत में भी इसकी चिकित्सा निम्न रूप में बताई गई है । ' तां मृदुना स्नेहादि-क्रमेणोपचरेत् । उत्क्रोशरससंसिद्धामनल्पस्नेहां यवागूं पाययेत् मापतिलविल्वशला सिद्धान् वा कुल्माषान् भक्षयेद्, मधुमाध्वीकं चानुपिवेत् सप्तरात्रम् । कालातीतत्वायिनि गर्भे विशेषतः सधा-न्यमुदूखलं मुसलेनाभिहन्याद्विषमे वा यानासने सेवेत ' ( शा. अ. १० ) अपेक्षाकृत सुश्रुत की चिकित्सा सष्ट एवं सुलभ है । वाग्भट ने भी केवल चिकित्सासूत्र का ही उल्लेख किया है— ' तयोर्बृह्णवातघ्नं मधुरद्रव्यसंस्कृतैः । वृक्षीररसैस्तृप्तिगमगर्भश्च खाइयेत् ॥ तेरेव सुनिक्षायाः क्षोभणं यानवाहनैः । ' ( शा. अ. २ ) । यहाँ भौतिक शब्द से भूतोन्मादाधिकार में बताये हुये घृतों का प्रयोग करना अभीष्ट है - जैसे महापैशाच घृत, पैशाच घृत, चैतस घृत, आदि । यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते तां श्येनमत्स्यगवयशिखिताम्रचूडतित्तिरीणा-मन्यतमस्य सर्पिप्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा मूलकयूषेण वा रक्तशालीना-मोदनं मृदुमधुरशीतलं भोजयेत् । तलाभ्यङ्गेन चास्या अभीक्ष्णमुदरवस्तिबंक्षणोरुकटी-पार्श्वपृष्ठप्रदेशानी पदुष्णेनोपचरेत् ॥ २८ ॥
लीन गर्भ के लक्षण और चिकित्सा - जिस गभिगी स्त्रो का गर्भ सुप्त रहता है और स्पन्दन नहीं करता ( उसे लीन गर्भ कहते हैं ) उस गभिगो को वाज, मछली, गवय ( नीलगाय ) नीतर, मुर्गा, और मोर इनमें किसी एक का मांसरस घृत के साथ, या अधिक घृत के साथ, या अधिक घृत मिली हुई उड़द की दाल के साथ, या मूली के यूष और घृत के साथ मृदु, मधुर और शीतल लाल चावल काभात खाने को दे । कुछ गरम किए हुये तिल के तैल या बलातैल से बार - बार उदर, वेक्षण, उम, कटि, पार्श्व, पृष्ट पर मर्दन कराने का प्रबन्ध करे ॥ २८ ॥
विमर्श - यहाँ लीन गर्भ का वर्णन और चिकित्सा दोनों का साथ ही उपदेश किया गया है । अष्टाङ्ग संग्रह में - ' यस्याः पुनर्वानोपसृष्टत्वात्स्रोतसि लीयते गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते तं लोन-मित्याहु: । ' तथा वाग्भट में - ' लीनाख्ये निस्फुरे ' से बताया है कि जिस गर्भ में स्पन्दन न हो और वा के द्वारा स्रोत ( गर्भाशय द्वार ) में छिपा लिया जाता है । सुश्रुत में - ' वातोपद्रव गृहीतत्वात् स्रोतसां लीयते गर्भः सोऽतिकालमवतिष्ठमानो व्यापद्यते । ' ( आ. अ. १० ) यस्याः पुनरुदावर्तविबन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं मन्येन ततस्तस्या-स्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम् । उदावर्ती छुपेक्षितः सहसा संगमां गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत् । गर्भिणी में उदावने रोग - जिस गर्भिगी स्त्री को आठवें मास में उदावर्त सम्बन्धी विबन्ध हो जाय और वह विवन्ध अनुवासन देने पर न ठीक हो सके तो उसे अनुवासन साध्य न समझ कर उस गर्भिणी के लिए तत्काल उपद्रवों को शान्त करने वाली औषधियों से निरूह बस्ति की कल्पना करके वस्ति है जिससे मलबन्ध शीघ्र नष्ट हो जाय । क्योंकि उदावर्त की उपेक्षा करने पर १. ' गर्भ सगर्भा गर्भिणीं वा निपातयेत् ' इति पा ० ।
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जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ शारीरस्थानम् ६३५ गर्भाशय में उदावर्त के कारण बाबु बढ़ कर सहता गर्भ के साथ गर्भिणी को अनदा केवल गर्भ को मार डालता है । तत्र वीरणशालिपष्टिककुशकाशेतुवालिकावेत सपरिव्याधमूलानां भूतकानन्ता-काश्मर्य परूषक मधुकमृोकानां च पयसाऽर्वोदकेनोद्गमय्य रसं प्रियालबिभीतकम-जतिलकल्कसंप्रयुक्तमीपत्र गमनन्युष्णं च निरूह दद्यात् । व्यपगतविबन्धां चैनां सुखसलिलपरिपक्ताङ्गीं स्थर्यकरमविदाहिनमाहारं भुक्तवतीं सायं मधुरकसिदेन तेंलेनानुवासयेत् । न्युब्जां त्वेनामास्थापनानुवासनाभ्यामुपचरेत् ॥ २ ९ ॥ उदावर्तनाशक निरूह - बोण ( खश ), शालि ( धान का मूल ), साठी का मूल, कुश का मूल, कास का मूल, इक्षुवालिका ( ईख का मूल ), वैन का मूल, जलवेंन का मूल, भूतिक ( गन्ध तुम ), अनन्तमूल, गम्भार का फल, फालन्ता का फल, मुलेठा, नुनका इन द्रव्यों को लेकर क्वाथ विधि से आधे जल और आये दूध मिलाकर पकायें, जब अष्टनाश शेष बचे तो छानकर उतो रस ( का ) चिरोजी, बहेरा मांगो, तिल का की कक और ननक पीतकर मिलाकर ( नथनी से नवकर ) कुछ गरम रहे तनां निरूह है । जब निल्ह प्रयोग से ( उदावर्त ) दूर हो जाय तो ईषत् गरन ( गुनगुना ) जल मे लान करने के बाद गर्भ को स्थिर करने वाले नविदाही ( शीतल ) आहार खिला कर उसी दिन सायंकाल ने जुलैटों से सिद्ध किए हुए तैल का अनुवासन दें । गर्भिणी को अनुवासनवस्ति या निरूहवस्ति, नीचे सुख शयन करा कर देना चाहिए ॥ २ ९ ॥ विमर्श - भित्री को नीचे मुख लिटाकर बस्ति देने से पक्काशय में दबाव कम हो जाता है अतन्त्र औषधि सरलता से बस्ति द्वारा यथास्थान पहुँचायी जा सकती है । अगर वह घुटने के बल नीचे मुख करके लेटती है तो इसे Chest Kree Position कहते है । यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीच्णोष्णातिमात्रसेवनाद्वा वातमूत्रपुरीषवेग-विधारणैव विषमाश ( स ) नशयनस्थानसंपीडनाभिघातेंर्वा क्रोधशोकभयत्रासादिभिर्वा साहसैर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तः कुक्षेर्गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमितं स्तव्धमुदरमाततं शीतमश्मान्तर्गतमिव भवत्यस्पन्दनो गर्भः, शूलमधिकमुपजायते, न चाव्यः प्रादुर्भवन्ति, योनिर्न प्रस्रवति, अक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतः, ताम्यति, व्यथते, भ्रमते, श्वसिति, अरतिबहुला च भवति, न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यते, इत्येवंलक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात् ॥ ३० ॥
गर्भ की मृत्यु के कारण और नृतगर्भा स्त्री के लक्षण — गर्भाशय या गर्भिणी स्त्री के शरीर में अधिक मात्रा में दोयों के संचय हो जाने से या अतिमात्र तीक्ष्ण और उष्ण द्रव्यों के सेवन करने से या वात, मूत्र, और पुरीप के वेगों को रोकने से या विपमाशन, विषमशयन, विषरूप से, उदर पर दबाव पड़ने से, उदर पर आवात लगने से या कोव, शोक, ईर्ष्या असूया ( पर निन्दा ), भय त्रास, आदि के द्वारा या अन्य किसी भी दुःसाहस से या किसी भी क्रूर कर्म के करने से जब गर्भाशय में गर्भ मर जाता है तब उस गर्भवती का उदर, स्तिमित, ( गीले वस्त्र से ढके हुए के समान ) स्तब्ध ( जकड़ा हुआ ) आतत ( तना हुआ ) शीतल और उदर के अन्दर पत्थर रखा हुआ है ऐसा कठोर और भारी प्रतीत होता है । गर्भ में स्पन्दन नहीं होता, उदर में शूल अत्यधिक बढ जाता है, आवी ( Labour Pains ) १. ' अन्तःकुक्षौ ' इति पा ० ।
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६३६ चरकसंहिता नहीं होती, योनि से स्राव नहीं होता, दोनों नेत्र शिथिल पड जाते हैं, नेत्रों के सामने अंधेरा छा जाता है, गर्भवती के शरीर में व्यथा बढ़ जाती है, शिर में चक्कर आता है, श्वास की गति बढ़ जाती है और गर्भवती की बेचैनी बहुत अधिक बढ़ जाती है । उस गर्भवती को यथावत् मल मूत्रादि के वेग की उत्पत्ति भी नहीं होती है । इन सब लक्षणों को गर्भवती स्त्री में देख कर यह मृतगर्भा है अर्थात् इसके पेट में बच्चा नर गया है ऐसा जानना चाहिए ॥ ३० ॥
विमर्श - अन्यत्र अधिक सष्ट लक्षण बनाये गये है । यथा - ' वा सोऽन्तर्नृतो गर्भो शूनो वस्तिरिवातनः । तेनावृताया नार्यस्तु कुक्षिरानह्यते भृशम् ॥ उत्क्षिन्यन्न इवाङ्गानि मूत्रवस्तिश्च भिद्यते । क्लोन प्लीहा यच फुप्फुसं हृदयं तथा ॥ गर्भेण पीडित दूर्ध्वं प्रक्रामति स्त्रियाः । साशयते ह्यति च कृच्छ्रोच्छ्वासा च जायते ॥ पूतिगन्धस्तथा स्वेही जिल्हा तालु च शुष्यति । वेपते भ्राम्यति तथा जीविनं चोपरुध्यते । एतैलिङ्गे विजानीयान्मृतं गर्भं चिकित्सकः ॥ ' तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म मंशमनमित्याहुरेके, मन्त्रादिकमथर्ववेदवि-हितमित्येके, परिदृष्टकर्मणा शल्यहत्र हरणमित्येके । मृनगर्भा की चिकित्सा उस गर्भशल्य की चिकित्सा जरायु - पानन ( जरायु को गिराना ) करना है, यह किसी एक आचार्य का मन है । अथर्ववेद में बताए हुए मन्त्रों के पाठ द्वारा या उन मन्त्रों से अभिमन्त्रित जल पिलाकर गर्भशल्य को निकालना चाहिए यह किसी एक आचार्य का मत है । ऐसे शल्यचिकित्सक से जो प्रत्यक्ष कर्म ( Operation ) देख चुका हो या कर चुका हो उससे उस गर्भशय को निकलवाना यह किसी एक आचार्य का मत है । विमर्श - ' मनःशरीरावाधकराणि शल्यानि ', मन और शरीर में जो बाधा उत्पन्न करना है । उसे शल्य कहा जाता है । जब गर्भ मृत हो जाता है तब उसका गर्भाशय में रहना दुःखदायी होता है । उसका शीघ्र निकालना परमावश्यक हो जाता है बनाया भी है था - ' नोपेक्षेत मृतं गर्भ मुहूर्तमपि पण्डितः । सह्याशु जननीं हन्ति निरुच्छवासं पशुं यथा ॥ ' आजकल प्राय: उदर मे शस्त्रकर्म ( Laparotomy ) का ही प्रयोग करना पड़ता है या Craniotomy की विधि से गर्भ के शिर के टुकड़े टुकड़े करके उसको योनिमार्ग से ही निकाल लिया जाता है । व्यपगतगर्भशल्यां तु खियमामगभां सुरासीध्वरिष्टमधुमदिरा सवानामन्यतमम सामर्थ्यतः पाययेद्गर्भकोष्ठशुद्धयर्थमर्तिविस्मरणार्थं प्रहर्षणार्थं च, अतः परं संप्रीणनैर्बला-नुरक्षिभिरस्नेह संप्रयुक्तैर्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेद्दोषधातुक्केद विशोषण-मात्रंकालम् । अतः परं स्नेहपानैर्वस्तिभिराहारविधिभिश्व दीपनीयजीवनीयबृंहणीय-मधुरवातहरसमाख्यातैरुपचरेत् । गर्भशल्योद्धरण के पश्चात् चिकित्सा - आमगर्भा स्त्रो को गर्भशल्य निकल जाने के बाद सर्वप्रथम गर्भाशय की शुद्धि के लिए, वेदना भुलाने के लिए, प्रसन्नता के लिए सुरा, सीधु, अरिष्ट, मधु, मदिरा, आसव इन मद्य भेदों में किसी एक को गर्भिणी के सामर्थ्य के अनुसार पिलाये । इसके बाद दोष धातु और क्लेद्र को सुखाने के लिए, वृंहण बल की रक्षा करने वाली स्नेहरहित यवागू आदि जो उस काल में गर्मी के लिए उपयोगी आहार हो वह खिलाते हुए चिकित्सा करे । इसके बाद जब डोप, धातु और क्लेद का शोषण हो जाय तो दीपनीयगण, जीवनीयगण, बृंहणीयगण, मधुरगण, वातहरगण आदि से आवश्यकतानुसार स्नेह सिद्ध कर स्नेहपान, स्नेहवस्ति ( अनुवासन बस्ति ) और आहार द्रव्यों के साथ इसी स्नेह का प्रयोग करे | परिपक्वगर्भशल्यायाः पुनर्विमुक्तमर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात् ॥ ३१ ॥
१. ' बृंहणै: ' इति पा ० ।
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जातिसूत्रीय शारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६३७ जिस गर्भवती स्त्री का परिपक्क गर्भ ( नवें मास में ) गर्भाशय में मर जाय तो उसे औषध, मन्त्र और शल्य कर्म द्वारा बाहर निकाल कर उसी दिन से स्नेह का प्रयोग आरम्भ कर देना चाहिए ॥ ३१ ॥
* परमतो निर्विकारमाप्याय्यमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदेच्यामः । प्रथमे मासे शङ्किता चेद्रर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृतं मात्रायच्छीतं काले काले पिवेत्, सात्म्यमेव ' च भोजनं सायं प्रातश्च भुञ्जीत; द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धं; तृतीये मासे क्षीरं मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य चतुर्थे मासे क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात्; पञ्चमे मासे चीरसर्पिः षष्ठे मासे क्षीरसर्पिर्मधुरौषधसिद्धं तदेव सप्तमे मासे । तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुविदाहं जनयन्तीति स्त्रियो भाषन्ते; तन्नेति भगवानात्रेयः, किन्तु गर्भारपीडनाद्वातपित्तश्लेष्माण उरः प्राप्य विदाहं जनयन्ति, ततः कण्डूरुपजायते कण्डू--मूला च किसावाप्तिर्भवति । गभिणी परिचर्या मासानुसार - अब इसके बाद विकाररहित बढ़ते हुए गर्भ के लिए प्रत्येक मास में जो कर्म करना चाहिए उसका उपदेश कर रहे है । प्रथम मास - यदि स्त्री को प्रथम मास में यह सन्देह हो जाय की गर्भ की स्थिति हो गई तो वह गर्भिणी समय - समय शीतल दूध मात्रा से पीवे, वह दूध किसी भी औषध से पकाया न हो । प्रातः सायं सात्म्य ही ( जो प्रकृति के अनुकूल हो ) भोजन करें । द्वितीय मास- मधुरगण ( काकोल्यादिगण ) औषधों से पकाया हुआ दूध ही दूसरे मास में समय - समय से पीवे । तृतीयमास - दूध में मधु और घृत मिला कर तीसरे मास में समय - समय से पीवे । चतुर्थ मास — दूध में मक्खन मिला कर या दूध से निकाला गया मक्खन चौथे मास में दो तोला की मात्रा में खाये । पञ्चम मास - दूध में घृन मिला कर या दूध से निकला घृत पाचवें मास में पीवे या खाये | छठवाँ मास — मधुरगण की औषधियों से सिद्ध किए दूध में घृत मिला कर पीवे या मधुरगण की औषधियों से पकाए हुए दूध से निकला हुआ घृत खाये । सप्तम मास - छठें मास में बताए हुए मधुरगण से सिद्ध क्षीरसर्पि का ही प्रयोग सातवें मास में भी करें । इस सातवें मास में गर्भ के शरीर पर केश उत्पन्न होते हैं अतः माता के शरीर में विदाह ( जलन ) उत्पन्न होता है, ऐसी बात स्त्रियाँ कहनी हैं । किन्तु भगवान् आत्रेय का मत हैं । कि यह बात नहीं है | परन्तु क्रमशः गर्भ के बढ़ने से पीड़ित वात, पित्त, कफ, उरोभाग में आकर दाह उत्पन्न करते है । तब दाह के बाद उरोभाग में ही खजुली ( खाज़ ) उत्पन्न होती है । खाज होने से किस रोग की प्राप्ति हो जाती है । विमर्श - प्रथम मास से सातवें मास तक इस प्रकार दूध का सेवन ( जहाँ दूध से निकला हुआ मक्खन बताया गया है वहाँ भी दूध में मक्खन मिला कर पीना ही उचित है ) करते हुए प्रति मास में सायं प्रातः सात्म्य आहार - विहारों का सेवन करना, गर्भिणी के लिए बलकारक है और गर्भ को भी पुष्ट करता है । किंक्किस ( Stria Gravidoram ) - ग्राम्य ( भूर्ख ) स्त्रियों का मत है कि गर्भादाय में जब सातवें मास में गर्भ के शरीर पर बाल उगते हैं तब माता के शरीर में विशेष कर उदर प्रदेश में दाह होता है । परन्तु आचार्य आत्रेय ने आदरपूर्वक उनके मतों का अपने ग्रन्थ में स्थान देकर, उनका खण्डन किया कि बाल उगने से दाह नहीं होता क्योंकि एक साथ ही तीसरे
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६३८ चरकसंहिता मास में अङ्ग - प्रत्यङ्ग की उत्पत्ति हो जाती है यह पहले कह आए है । तो केश भी तीसरे में ही होते हैं । यदि दाहका कारण केश होता तो नीलरे मास से न्यूनाधिक दाह होना चाहिए पर होता नहीं । अतः अपना मन बताया कि बात, पित्त, कफ इन तीनों पर गर्भ के कारण दवाव पड़ता है । आचार्य चक्रपाणि ने - ' किकिश्वर्मविवरणम् ' तथा अरुणदत्त ने - ' ऊरुस्तनोदरे बलिविशेषा रेख्लाकारास्तत्काले प्रायो ये जायन्ते तेषां विक्किलसंज्ञा । ' उदर पर रेखाओं का होना या फटना ही किकिस कहा जाता है । सातवें, आठवें, नवें मास में उदरप्राचीर में अधिक तनाव हो जाने के कारण ये दरारें उदर पर दिखाई पड़ती है । पहले जब ये रेखायें बनती है तो गुलाबी या बैंगनी रंग की होती है पर बाद में खेत हो जाती है । प्रायः ये दरारें या रेखायें नाभिनगास्थि रेखा के दोनों ओर समानान्तर समकेन्द्र पर एकत्रित होती है । गर्भावस्था के अतिरिक्त जलोदर बीजकोपग्रन्थि, गर्भाशयीय अर्बुद आदि उदरवृद्धिजनक रोगों में भी उदरप्राचीर में तनाव होने पर ये रखायें ( दरारें ) उत्पन्न हो जाती है । दोनों स्तनों के मध्य में दाह और कण्डू होना इस रोग का मुख्य लक्षण है, जैसे- ' गर्भेणोपोडिता दोषास्तस्मिन् हृदयमाश्रिताः । कण्डूं विदाहं कुर्वन्ति गर्भिण्यां किकिसानि तु ॥ ' ( वाग्भट ) और बाद में दरारें फटती हैं । ३ तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरौषधसिद्धस्य पाणितलमात्रं काले कालेऽस्यै पानार्थ दद्यात्, चन्दनमृणालककैश्वास्याः स्तनोदरं विमृहीयात् शिरीषधातकीसर्पपमधु-कचूर्णर्वा, कुटजार्ज बीज मुस्तहरिद्राकल्कैर्वा, निम्बकोलसुरसमञ्जिष्ठा कल्व, पृषत-हरिणशशरुधिरयुतया त्रिफलया वा करवीरपत्रसिद्धेन तैलेनाभ्यङ्गः परिपंकः पुनर्मा-लतीमधुकसिद्धेनाम्भसा; जातकण्डूश्च कण्डूयनं वर्जयेत्वग्भेदवरूप्य परिहारार्थम्, असह्यायां तु कण्ड्वामुन्मर्दनोद्वर्पणाभ्यां परिहारः स्यात्; मधुरमाहारजातं वातहरम-ल्पमस्नेहलवणमल्पोदकानुपानं च भुञ्जीत । किक्किस की चिकित्सा - १. मथुर गण की औपधियों से सिद्ध किया हुआ नवनीत ( मक्खन ) को २ तोले की मात्रा में कोल ( बेर ) काथ के अनुपान से समय - समय पर गर्भिणी स्त्री को पीने के लिए दे । २. गर्भिणी स्त्री के स्तन ( उर: प्रदेश ) और उदर प्रदेश में, चन्दन और मृणाल का कल्क बनाकर मर्दन करे । ३. शिरीष का छाल, धव का फूल, पीली सरसों और मुलेठी का सम भाग का चूर्ण बना कर उर: प्रदेश पर मर्दन करे । ४. कुरैया का छाल, वनतुलसा का बीज, खेत के मोथा की जड़ और हल्दी का कल्क बना कर उर: प्रदेश और उदर प्रदेश में मर्दन करे । ५. या नीम की पत्ती, बेर की पत्ती, तुलसी की पत्ती और मजीठ के कल्क से, ६. या पृत ( जिसके चमड़े पर बूंद बूंद का चिन्ह होता है ऐसा मृग ) और खरगोश का रक्त निला कर त्रिफला के कल्क से उरःप्रदेश और उदर प्रदेश पर मर्दन करे । ७. या कनेर की पत्ती के कल्क से तिल का तेल पकाकर दोनों स्थानों पर नालिश करे । ८. मालती फूल की पत्ती और यदि खाज़ उत्पन्न हो तो भा मुलेठी के क्वाथ से उर: प्रदेश और उदरप्रदेश पर परिषेक करे । चमड़े के फट जाने से विरूपता न होने पाए इसलिए खुजलाना बन्द कर दें । यदि भयंकर खुजली हो तो ऊपर बनाए हुए बल्क या चूर्ण से मदन या घर्षण करके खुजली को शान्त और करे भोजन । जो के द्रव्य बाद वातहर होते हुए मधुर हों ऐसे आहार, थोड़ा घृत और नमक मिलाकर करे जल भी अल्पमात्रा में ही पीए ॥ ३८ ॥
अष्टमे तु मासे क्षोरयवागूं समितीं काले काले पिबेत्; तन्नेति भङ्गकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति; अस्त्वत्र पैङ्गल्यावाध इत्याह भगवान् पुनर्वसु-
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जातिसूत्रीय शारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६३६ रात्रेयः, न त्वेवैतन्न कार्यम् एवं कुर्वती ह्यरोग iss रोग्यबलवर्णस्वरसंहननसंपदुपेतं ज्ञातीनामपि श्रेष्ठमपत्यं जनयति । आठवें मास का कर्तव्य - आठवें मास में यवागू को दूध में पका कर और उसी में घृत मिला कर समय - समय पर पांये । इस पर भद्रकाप्य ने कहा नहीं, घृतयुक्त क्षीर - यवागू खाने से गर्भिणी के गर्भ का भाग पिङ्गल वर्ग हो जाता है । अतः क्षीर यवागू नहीं देना चाहिए । इसपर भगवान् पुनर्वम् आत्रेय ने कहा कि पिङ्गल वर्ण होने पर भी क्षीर यवागू का प्रयोग अकार्य ( नहीं करना चाहिए ) हैं यह बात नहीं, उसे अवश्य करना चाहिए, इस प्रकार आहार करती हुई गर्निगी स्वयं रोग रहित होकर आरोग्य, वल, वर्ण, स्वर, मंहनन के सम्पत्ति ( उत्तमता ) से युक्त जाति-बन्धु वर्गों के मध्य में उत्तम सन्तान उत्पन्न करती है ॥ नवमे तु खत्वेनां मामे मधुरोपधसिद्धेन तैलेनानुवासयेत् । अतश्चैत्रास्यास्तैलात् पितुं योनी गर्भस्थानमार्गस्नेहनार्थम् । नवें मास का कर्तव्य — नौ मास में गर्मियों को मधुस्वर्ग की औषधियों से पकाए हुए तैल से अनुवासन दस्ति देना चाहिए और इसी तेल में कपड़े का फाहा भोगों कर गर्भ स्थान और गर्भमार्ग ( योनि ) को लंदन करने के लिए, योनि में धारण करना चाहिए ॥ ४० ॥
यदि कम प्रथमं मासं समुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात्तेन गर्भिण्या गर्भसमये गर्भधारिणीकुक्षिकटीपार्श्वदृष्टं मृदूभवति, वातश्चानुलोमः संपद्यते, सूत्रपुरपि च प्रकृतिभूने सुखेन मागमनुपद्यते, चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवणों चोपचीयेते; पुत्रं चेष्टं संपदुपेतं सुखिनं सुखेनैषा काले प्रजायत इति ॥ ३२ ॥
मासिक परिचय का प्रयोजन - यह जो प्रथम मास से लेकर नवम मास तक प्रत्येक मास का पृथक् पृथक् कर्म बताया गया है, इससे गर्भिणी के गर्भसमय ( गर्भप्रसव समय ) और गर्भ धारण समय ( गर्भिणी अवस्था में ) में कुक्षि, उदर, कमर, पार्श्व और पीठ मृदु हो जाते है और वायु अनुलोम हो जाता है । मूत्र और मल अपने स्वाभाविक रूप में रहते हुए मुखपूर्वक बाहर निकल जाते हैं । चर्म और नव कोमल हो जाते है । गर्भिणी के शरीर में बल और वर्ण की उत्तमता रहती है और वह गर्भिणी सुखपूर्वक समय पर अपने मन के अनुकूल, सर्वगुण सम्पन्न, एवं सुखी स्वस्थ पुत्र को जन्म देती है ॥ ३२ ॥
B प्राक् चैवास्या नवमात्मानात् सूतिकागारं कारयेदपहृतास्थिशर्कराकपाले देशे प्रशस्तरूपरसगन्धायां भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा वैल्वानां काष्टानां तैन्दुकेदकानां भल्लातकानां वार ( रु ) गानां खादिराणां वा; यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शंसेयुरथर्व-वेदविदस्तेषां वसनालेपनाच्छादनापिधान संपदुपेतं वास्तुविद्या हृदययोगाग्निसलिलो-दूग्वलवर्चःस्थानम्नानभूमिमहान समृतुमुखं च ॥ ३३ ॥
( ३ ) सूतिकागार, प्रसवविधि, एवं सूतिकोपचार ( Maternity Ward, Management of Labour & Puerperium ) मूतिकागार का निर्माण [ Construcion of Maternity Ward ] - नवन मास के पहले ही गर्भिणी के प्रसव समय में रहने लिए सूतिकागृह का निर्माण करावें । यह मूतिकागृह ऐसे स्थान पर बनाया जाना चाहिए हड्डियाँ, कङ्कण, बालू और कपाल ( टीकरे, मिट्टी के घड़े के १. ' गर्भधारणे ' इति पा ० ।
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६४० चरकसंहिता खपड़े आदि ) न हों । यदि अशक्यतावश ऐसे ही भूमिभाग में सूतिकागृह बनाना हो तोवहाँ से हड्डियाँ, कङ्कड, टीकरे आदि हटाकर साफ कर दें । ऐसी देखने में सुन्दर, रसवती एवं अच्छी गन्धवती भूमि पर पूर्वद्वार वाला, या उत्तर द्वार वाला सूतिकागृह बनवावें । बेल, निनिश, हिंगोट ( तापस वृक्ष ), भेलावा, वरना और खदिर की लकड़ी से या अन्य किसी भी काष्ठ से अथर्ववेद जानने वाले विद्वान् ब्राह्मण सूतिका गृह बनाने का जो विधान बनावें उसी के अनुमार सूतिकागार बनवाये | यह सूतिकागृह वस्त्र, आलेप ( गोबर या चुना से ), आच्छादन ( मुन्दर छत, या सुन्दर कपड़े की चाँदनी जो घर में ऊपर लगाई रहे जिससे छप्पर न दिखाई पड़े न ऊपर से मिट्टी गिरने पाये ), अपिधान ( पर्दा, जो प्रत्येक द्वार और खिड़कियों पर लगे रहें ) से युक्त रहे । वास्तुविद्या को जानने वाले विद्वान् की सम्मति से जहाँ बनाना उचित हो वहाँ अग्नि का स्थान ( २४ घण्टे अनि रखने का स्थान ), जल रखने का स्थान, उदूखल ( ओखल ) रखने का स्थान, वर्चः स्थान ( पाखाना ), स्नानागार, भोजनालय आदि बनवाये । यह सूतिकागृह प्रत्येक ऋतु में सुखकर हो इसका भी ध्यान रखे ॥ ३३ ॥
विमर्श - उपर्युक्त गद्य का ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि प्रसव के लिये चरक - काल में भी ( Maternity Home or Ward ) बनाये जाते रहे हैं, जिन्हें आजकल आधुनिक विचार की देन समझा जाता है । तत्र सर्पिस्तैलमधुसैन्धवसौवर्चलकालबिडलवणविडङ्गकुष्टकिलिमनागरपिप्पलीपिप्पली-मूलहस्ति पिप्पलीमण्डूकपर्ण्यलालाङ्गलीवचाचव्यचित्रक चिरत्रिल्वहिङ्गुसर्षपलशुनकतककण-कणि कानपातसीवल्वजभूर्जकुलत्थमैरेयसुरासवाः सन्निहिताः स्युः तथाश्मान हो, द्वे कु ( च ) ण्डमुसले, द्वे उदूखले, खरवृषभश्च द्वौ च तीक्ष्णौ सूचीपिप्पलको: सौवर्णराजती, शस्त्राणि च तीच्णायसानि, द्वौ च विल्दमयौ पर्यङ्कौ तेन्दुकैदानि च काष्ठान्यग्नि-सन्धुक्षगानि, स्त्रियश्च बह्वयो बहुशः प्रजाताः सौहार्दयुक्ताः सततमनुरक्ताः प्रदक्षिणा-चाराः प्रतिपत्ति कुशलाः प्रकृतिवत्सलास्त्यक्तविषादाः क्लेशसहिन्योऽभिमताः, ब्राह्मणा श्वाथर्ववेदविदः यच्चान्यदपि तत्र समर्थं मन्येत यच्चान्यच्च ब्राह्मणा ब्रूयुः स्त्रियश्च वृद्धा-स्तत् कार्यम् ॥ ३४ ॥
सूतिकागृह में प्रसव से पूर्व संग्रहणीय वस्तुयें [ Equipment of of Maternity Ward ] — प्रसूतिगृह में घृत, तेल, मधु, सेंधानमक, सोंचर नमक, काला नमक, वायविटङ्ग, कूठ, देवदारु, सौंठ, पीपर, पीपरामूल, गजपीपर, मण्डूकपर्णी, इलायची, कलिहारीमूल, वचा, चव्य ( चाभ ), चीते का मूल, करञ्ज, हींग, पीला सरसों, लहसुन, निर्मलीफल, कण ( जीरा ), कणिका ( अरनी ) नीप, ( कदम्ब ), अतसी ( तीसी ), वल्वज, भोजपत्र, कुलथी, मैरेय, सुरा, आसव इन द्रव्यों को प्रसव के पूर्व ही सूतिका गृह में एकत्रित कर ले और २ पत्थर के टुकड़े, दो बड़े मूशल, सुई और सुई रखने के पात्र जो सोना एवं चाँदी के बने दो ओखल, गदहा, बैल, दो तीक्ष्ण हों, अनेक प्रसवोपयोगां लोहे के बने तीक्ष्ण शस्त्र, दो बेल की लकड़ी के बने पलङ्ग, तेन्दुक ( तिनीश गाभ ) और इङ्गुदी की लकड़ी अग्नि प्रज्वलित करने के लिए, जिनको कई बार प्रसव ' चुका हो, सौहार्द ( प्रेम ) युक्त, लगातार सेवा में रहने वाली, सुन्दर आचरण वाली, प्रसव कराने में कुशल हों, स्वभावनः प्रम रखने वाली विषाद रहिन, क्लेश को सहन करने वाली, प्रसविनी के मन को अनुकूल रखने वाली ऐसी अनेक स्त्रियाँ, अथर्ववेद के ज्ञाता १. ' खरो वृषभश्च ' इति पा ० ।
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जातिसूत्रीय शारीराध्यायः प ] शारीरस्थानम् ६४१ ब्राह्मण और भी अन्य वस्तु जिसकी आवश्यकता समझे और जिसे ब्राह्मण और वृद्ध स्त्रियाँ कहें उन्हें भी रखे ॥ ३४ ॥
ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्रयोगमुपगते प्रशस्ते भगवति शशिनि कल्याणे कल्याणे च करणे मैत्रे मुहूर्ते शान्ति हुत्वा गोब्राह्मणमग्निमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदकं मधुलाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभ्योऽक्षतान् सुमनसो नान्दीमुखानि च फला-नष्टानि दवोदकपूर्वमासनस्थेभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत् । ततः पुण्या-हशब्देन गोब्राह्मणं समनुवर्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत् सूतिकागारम् । तत्रस्था च प्रस-वकालं प्रतीक्षेत || ३५ ॥ प्रसूतिगृह में गर्भिणी का प्रवेश [ Admission of Pregnant Women in Maternity Ward ] — इसके बाद नवम मास के प्रारम्भ हो जाने पर शुभ किसी दिन, जब चन्द्रमा का योग शुभ नक्षत्र के साथ हो और च द्रमा उच्च का हो, कल्याणकारी करण हो मंत्र मुहूर्त हो तब शान्ति पाठ करा कर उस सूनिका गृह में पहले गौ, ब्राह्मण, अग्निं एवं जल का प्रवेश करा कर, गौओं को खाने के लिए वास, भूसा, जल, मधु और धान का लावा देकर, आसनों पर बैठे हुए ब्राह्मणों को पहले जल ( हाथ पैर धोने के लिये दे या स्वयं जल देकर हाथ पैर ब्राह्मण का धो दे ), अक्षत, पुष्प और मङ्गलसूचक फल जो गर्भिणी को प्रिय हो या नान्दीमुख फल ( मृदङ्ग के समान फल छोहाग ) ब्राह्मण को दे और प्रणाम करे । बाद में स्वयं आचमन करके स्वस्तिवाचन करावे । तब आगे - आगे ब्राह्मण वर्ग पुण्याहवाचन का पाठ करते रहें और पीछे से गर्भवती गौ को आगे कर उनके दक्षिण पैर का अनुसरण करती हुई सूतिकागृह में प्रवेश करे । वहीं रह कर प्रसव काल की प्रतीक्षा करती रहे ॥ ४४ ॥
तस्यास्तु स्खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति तद्यथा - कुमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिवं वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनम्, अधोगुरुत्वं, वंक्षणबस्तिकटीकुक्षिपार्श्वपृष्ठनिस्तोदः, योनेः प्रस्रवणम्, अनन्नाभिलाषश्चेति; ततोऽनन्तरमावीनां प्रादुर्भावः, प्रसेकश्च गर्भोदकस्य ॥ ३६ ॥
प्रसव के पूर्वकालिक लक्षण [ Signs of Impending Labour ie, First stage of Labour ] - प्रजनन ( प्रसव ) काल के समीप आ जाने पर उस गर्भिणी स्त्री के शरीर में ये लक्षण उपस्थित होते हैं । जैसे- गात्रों में कम ( बिना श्रम के शरीर में धकावट ), मुख में ग्लानि अर्थात् उदासी, नेत्रों में शिथिलता, वक्षःस्थल का ऐसा प्रतीत होना मानो बन्धन से छूट गया है, कुक्षि में ढीलापन का अनुभव होना, कमर के अधोभाग में भारीपन का अनुभव होना, वंक्षण, मूत्राशय, कमर, उदर, पार्श्व और पीठ में वेदना का प्रादुर्भाव होना, योनि से स्राव निकलना, अन्न में रुचि का न रहना । इसके बाद आवी ( प्रसव वेदना ) का प्रादुर्भाव और गर्भोदक का स्राव होता है । विमर्श - प्रसव की अवस्थाएँ तीन होती हैं । ये ऊपर बनाये हुये लक्षण प्रथम अवस्था के ही हैं । प्रसववेदना आरम्भ होने से लेकर गर्भाशय ग्रीवा के पूरे चौड़े ( Full dilation of Cervix ) हो जाने तक प्रथम अवस्था मानी जाती है । प्रायः इस अवस्था के अन्त तक गर्भोदक थैली फटती है । कभी - कभी इस थैली को भेदन करना पड़ता है जबकि दृढता के कारण वह स्वयं नहीं फटती है । कभी - कभी प्रथम अवस्था के प्रारम्भ में ही यह थैली फट जाती है, ऐसी दशा में प्रसव कट से होता है । चरक के अनुसार प्रथमावस्था का प्रारम्भ से ही थकावट, मुख में उदासी, १. ' अन्वावमाना प्रविशेत् ' इति पा ० । २. ' अक्ष्णोविमुक्तबन्धनत्वमिव ' इति पा ० ।