चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1031–1040

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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III चरकसंहिता नेत्रों में शिथिलता और गर्भ के नीचे श्रोणि गुहा में उतर जाने से हृदय वन्धन - रहित प्रतीत होता है । वस्तुतः प्रथम और द्वितीय मास में गर्भ श्रोगहर में रहता है, इसके बाद गर्भ के बढ़ने से गर्भाशय शनैः शनैः बढ़ कर पारिपार्श्विक अङ्गी मे एवं महाप्राचीरा एवं उदरप्राचीरा मे तनाव पैदा करता है जिससे गर्भिणी श्वासकृच्छ्रता और हृदय पर बोश मा अनुभव करती है । पर नवें मास प्रारम्भ होते ही गुरुता के कारण श्रोणि गहर में गर्भ पुनः उतर जाता है जिससे श्वास लेनेमें गर्मियी को शान्ति मिलती है वह उदर में शिथिलता का अनुभव करती है और श्रोणिगडर में गर्भ के आ जाने से अधोभाग में भारीपन हो जाता है । इसके बाद आधुनिक प्रथम अवस्था प्रारम्भ होती है जो १२ से १८ घंटे तक होती है । इसमें गर्भाशय थोड़ी - थोड़ी देर के बाद संकुचित होने लगता है, जिससे वंक्षण, वस्ति, कटि कुश्चि, पार्श्व और पृष्ठ में वेदना प्रारम्भ होती है । तत्र योनि से ईषत् रक्त मिश्रित और श्लेष्मा का स्राव होने लगता है । यह त्राव गर्भाशय ग्रीवा फैलने के कारण गर्भोदक की थैली के पृथक्करण से होता है । तब ' आवी ' ( प्रसव वेदना Labour Pain ) पीठ से उत्पन्न होकर नीचे वंक्षण तक गर्भाशय के शीघ्र संकोच के कारण बढ़ जाती है । जब गर्भाशय ग्रीवा पूरी फैल जाती है तब गर्भोदक थैली फट जाती है और जो नरल बालक के सिर के आगे होता है वह बाहर निकल जाता है । इसी बात को ' प्रसेकञ्च गर्भोदकस्य ' से स्पष्ट किया गया है । आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम् । तदध्यासीत सा । तां ततः समन्ततः परिवार्य यथोक्त गुगाः खियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिग्रहणी-याभिः सान्त्वनीयामिश्र ॥ ३७ ॥

द्वितीयावस्था Second Stage of Labour ] - आवीको उत्पत्ति हो जाने पर मृदु विस्तरा, गहा आदि भूमि पर विद्या है, उस पर वह गर्निगी स्त्री बैठ जाय । पहले बनाये हुये गुणों से युक्त प्रजनन- कुशल स्त्रियाँ उसे चारों तरफ से घेर लें और हृदय को प्रिय लगने वाले एवं सान्त्वना देने वाले वचनों से आधासन देती हुई उसकी सेवा करें ॥ ३७ ॥

* सा चेदावीभिःसंक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात् उत्तिष्ठ, मुसलमन्यतरं गृह्णी, अनेनैतदुखलं धान्यपूर्ण मुहुर्मुहुरभिजहि मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व चङ्क्रमस्व चान्तरान्तरेति; एवमुप ' दशन्त्येके । तनेत्याह भगवानात्रेयः । दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमु-पदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसल-व्यायामसमीरितां वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारतमा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी; तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृपयो मन्यन्ते जृम्भणं चक्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति । अथास्यै दद्यात् कुष्ठेलालाङ्गलिकीवचाचित्रचिरविल्व-चव्यचूर्णमुपधातुं, सा तन्मुहुर्मुहुरुपजिघेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपासारधूमं वा । तस्याश्चान्तराऽन्तरा कटीपार्श्वपृष्ठस कथिदेशानीपणेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखम्वमृद्गीयात् । अनेन कर्मणा गर्भोऽवाक् प्रतिपद्यते ॥ ३८ ॥

अनागत प्रसव में कलेध्य [ Management of Uterine Inertia ] - प्रसवकालीन वेदनाओं के बार - बार होने से कष्ट पानी हुई गर्भिणी का प्रसव न हो तो उससे कहे कि ' उठो, कोई एक मूसल ले लो, उससे धान्य से भरे हुए ऊखल में बारम्बार चोट मागे अर्थात् धान कूटो, बार - बार १. ' तदध्यासीनां नां ततः ' इति पा ० । २. ‘ ग्राहणीयाभिरुपदिष्टवदर्थाभियायिनीभिः इति पा ० । ४. ' अवाग्गर्भः ' इति पा ० । ३. ' अनुमुखम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1032

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जाति सूत्रीयशारीराध्यायः = ] शारीरस्थानम् ६४३ जॅभाई लो, बारम्बार इधर - उधर बीच - बीच में चलती - फिरती रहो ' इससे प्रसव हो जाता है, ऐसा किसी - किसी आचार्य का मत है । पर भगवान् आत्रेय ने कहा, यह उचित नहीं है क्योंकि गर्भिणी स्त्री के लिए कठोर व्यायाम करना सर्वदा मना किया गया है । विशेषकर प्रसव काल में तो दामा व्यायाम नहीं करना चाहिए । धान कूटने रूपी व्यायाम से, जिस सुकुमारी स्त्री की धातु और दोष विचलित हो उठे है वायु बढ़ कर उसके प्राणों का घातक हो सकती है । विशेषकर प्रसव के समय गर्भगी की चिकित्सा करना अत्यन्त कठिन होती है, इसलिए मूसल से थान कूटने रूप व्यायाम को नहीं करना चाहिए ऐसा ऋषियों का मत है । पर जंभाई या बीच-बीच में चलना - फिरना रूप व्यायाम प्रसव न होने पर करना चाहिए । यदि इस पर भी प्रसव न हो तो उस गर्निणी के लिए कूठ, इलायची, कलिहारी, चित्रकमूल, करंज की गुद्दी का चूर्ण सूंघने के लिए दे । यह स्त्री बार - बार इस चूर्ण को सूपे और भोजपत्र के धूत्र को या शीशम की पत्ती का धूत्र सूघे । इसी बीच में कवि, पार्श्व पृष्ठ, सक्थि प्रदेश में कुछ गरम तेल लगा कर मर्दन करे । मर्दन करते समय इस बात का ध्यान रखे की गर्मिणी को कोई कष्ट न हो । ऐसे कार्यों के करने से बच्चा भूमिष्ठ हो जाता है ॥ ३८ ॥

स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, वस्तिशिरोऽवगृह्णाति, स्वरयन्त्येनामाव्यः परिवर्ततेऽधो गर्भ इति; अस्यामवस्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहयितुमुपक्रमेत । कर्णे चास्या मन्त्रमिममनुकूला स्त्री जपेत् — ‘ क्षितिर्जलं वियत्तेजो वाथुर्विष्णुः प्रजापतिः । सगर्भात्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते ॥ प्रसृव त्वमविक्लिष्टमविक्लिष्टा शुभानने! | कार्तिकेयद्युतिं पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम् ' इति ॥ और भी - ब यह समझ ले हृदय को छोड़ कर नीचे की ओर उदर में गर्भ अ रहा है और बस्ति - शिर को पकड़ता है, प्रसववेदना से स्त्री आकुल हो गई है, गर्भ नीचे की ओर प्रवृत्त हो गया है तो ऐसी अवस्था में गमियों को खाद पर सुला कर प्रवाह करने के लिए कहे और परिचर्या करने वाली अनुकूल स्त्री उसके कान में उपर्युक्त ( मूल में लिखे ) मन्त्र कहें, जिनका अर्थ इस प्रकार है - पृथिवी, जल, आकाश, तेज ( आ ), वायु, विष्णु, प्रजापति ये सब गभयुक्त तुम्हारी साक्षा करें और वे तुम्हें वैशल्य ( गर्भ के भार से रहित ) करें । हे शुभ ( सुन्दर ) सुख वाली! तुम बिना कुंश पाये ही कार्त्तिकेय ( पानन ) के समान कान्ति वाले, उन्हीं से रक्षित पुत्र का सुख पूर्वक प्रसव करो ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - प्रसववेदना होने पर किसी विशेष कारणवश यदि गर्भ बाहर नहीं निकलना तो वैसी अवस्था में इन उपायों का अवलम्बन किया जाता है । द्वितीयावस्था गर्भाशय की ग्रीवा के पूरा चौड़ा होने से लेकर गर्भ के भूमि होने तक होती है । परिस्थितिवश जो प्रसव सुन्वपूर्वक नहीं होता उसे बाहर निकालने की सारी विवियों का द्वितीयावस्था के बीच में ही वर्णन किया है । हृदय को छोड़ कर उदर में गर्भ प्रवेश करता है. इसका तात्पर्य यह है कि जब गर्भ अपने गुरुत्व के कारण श्रोणि गहर में आता है तो गर्भिणों को श्वास - प्रश्वास में कोई कष्ट नहीं होता । गर्भ वस्ति - शिर का आश्रय लेना है अर्थात् गर्भ का भार वस्तिशिर पर ही ज्यादा पड़ता है इसीलिए बार - बार मूत्र प्रवृत्ति होती है । गर्भाशय के सङ्कोच के साथ - साथ महाप्राचीरा पेशी में भी जब नकोच प्रारम्भ होने लगता है तब आवी में शीघ्रता और वेदनाविक्य हो जाता है । १. ' अवाग्गर्भः ' इति पा ० । २. ' इन्द्रः ' इति पाठः ।

पृष्ठ 1033

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६४४ चरकसंहिता क्यों - क्यों प्रसमीप आता है त्यों - त्यों क्रमशः वेदनायें बढ़ जाती है । प्रथम अवस्था के अन्त में गर्भाशय का संकोच मिनट तक रहता है और यह संकोच १० वा २० मिनटरुक - रुक कर होता है परन्तु प्रसव के अति समीपकाल में १ से १३ मिनट तक होता रहता है । इसका अन्तर २ या ३ मिनट का होता है जिसने प्रजनन करती हुई नारी की व्याकुलता बढ़ जाती है । ऐसी दशा में खाट पर सुला कर प्रवाहण करने को कहा जाता है और उसके कान में ' क्षिनिर्जलन ' आदि मन्त्र कहा जाता है । * ताचैनां यथोकगुणाः खियोऽनुशिष्य: - अनागतावीमां प्रवाहिष्टाः यो हानागतावी: -प्रवाह व्यर्थमेवास्यास्तत् कर्म भवति प्रजा चास्या विहता विकृतिमापन्ना च श्वासकासशोपीप्रसन्ता वा भवति । यथा हि वधूद्रारवातमूत्रपुरः पवेगान् प्रयतमानोऽ-व्यप्राप्तकाला लभते कृच्छ्रेग वाऽप्यवाशोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा तथा चैषामेव यवादीनां सन्धारणमुपयातायोपपद्यते, तथा प्राप्तकालस्य गर्भस्था-प्रवाहणमिति । सा यथानिर्देशं कुरुप्येति वक्तव्या स्यात् । तथा च कुर्वती शनैः पूर्व प्रवाहेत, ततोऽनन्तरं बलवत्तरम् । तस्यां च प्रवाहमाणायां खियः शब्दं कुर्युःप्रजाता

प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्रम् ' इति । तथाऽस्या हर्षेणाप्याय्यन्ते प्राणाः ॥ ४० ॥

गर्भिणी को शिक्षा [ Instructions to Pregnant Women ] - पहले बतायी हुई अनेक गुणों से युक्त तथा बच्चा पैदा कराने में कुशल परिचारिकाएँ गर्भिणी को इस प्रकार शिक्षा दें । यदि ' बी ' ( प्रसव वेदना ) उत्पन्न न हो तो प्रवाहण ( Strain ) मत करो क्योंकि जो खिय प्रसववेदना प्रारम्भ होने के पूर्व प्रवाहण करती हैं उनका प्रवाहण करना व्यर्थ जाता है ( अर्थात् प्रसववेदना के बीच में जब - जब एक मिनट या दो मिनट का अम्बर होता है उस समय प्रवाहण न करना चाहिए । आत्री का प्रारम्भ और प्रवाहण दोनों क्रिया साथ हों तो उसका फल अच्छा होता है । यदि आयी के पूर्व समय में प्रवाद करती है तो उसकी सन्तति विकृत होती है स्वयं गर्भिणी श्वास, कास, शोध और प्लीहा रोग से पीड़ित होती है । जिस प्रकार छींक, उद्वार, बान, मूत्र, मल के वेगों के प्रवृत्त न होने पर यदि प्रवृत्त करने को पेश करे तो आदि का वेग नहीं आता है अथवा कठिनता से आता है उसी प्रकार प्रसव के पूर्व प्रवाहण करने से गर्भ बाहर नहीं आता हैं और यदि आता भी है तो बहुत कष्ट से । जिस प्रकार छींक आदि के प्रवृत्त वेग को रोक लिया जाय तो हानिकर होता है उसी प्रकार बार - बार प्रसववेदना के उत्पन्न होते हुए गर्भ को बाहर निकालने में सहायक कार्य प्रवाहण न किया जाय तो गर्भ में विकृति आ जाती है । इसलिए वह परिचारिका श्री गर्भिणी से कहे कि जिस प्रकार में निर्देश करती है उसी प्रकार कार्य करो इस प्रकार आदेश का पालन करती हुई गर्मिणी प्रथम धीरे - धीरे प्रवाहण करे, उसके बाद जोर से, जब गर्भ योनिमुख में आ जाय तो जद तक बाहर न निकल जाय त तक नीमवर प्रवाण करती रहे । जब प्रवाहण क्रिया में वर्मिणी रत रहे उस समय परिचारिकाएँ इस प्रकार शोर करें ' उत्पन्न हुआ उत्पन्न हुआ ' ' धन्य हो धन्य हो ' ' पुत्र उत्पन्न हुआ है इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक पुत्रोत्पत्ति सुन कर अधिक वेदना के कारण जो उसे शक्ति का हास प्रतीत होना है । वह इन शब्दों को सुन कर हर्षित होने से भूल जाता है और प्राण, बल युक्त हो जाता है ॥ ४० ॥।

विमर्श - नुश्रुत ने आवी के साथ - साथ प्रवाहण करने को बनाया है । वालक शीघ्र उत्पन्न हो इसलिए प्रसववेदना के पूर्व प्रवाह करने का निषेध किया है । २ से ३ घंटे १. ' बचनामनावीर ' इति पा ० । २. ' वा लभते ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1034

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जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६४५ तक रहती है पर यदि मूढ़ गर्भ या अन्य किसी कारणवश प्रसव में बाधा उत्पन्न होती है तो दो दिन तक यह अवस्था बनी रहती है । इस अवस्था में जब स्त्री तीव्रतर प्रवाहण प्रारम्भ करती है और अपने श्वास को रोक कर खाट के बाजू को पकड़ कर या अन्य किसी वस्तु का सहारा लेकर प्रवाहण करती है तो अधिक सहारा मिलता है । प्रसववेदनाविक्य और प्रवाणजन्य श्रम के कारण शरीर एवं मस्तक पर स्वेदकणों का प्रादुर्भाव हो जाता है प्रवाहण के फलस्वरूप गर्भाशय के साथ-साथ उदर का भी संकोच होने लगता है जिससे गर्भ का सिर आगे की ओर बढ़ता जाता है । इससे गर्भाशय ग्रीवा के साथ - साथ योनिद्वार खुलने लगता है । जब जब ' आवी ' उत्पन्न होती है तब तब बालक का सिर आगे की तरफ बढ़ता जाता है और सिर की पश्चात् अस्थि से भग - सन्धि पर अधिक दबाव पड़ता है । उसके बाद ही तीव्रतर आवी से सिर का सबसे बड़ा व्यास बाहर निकलता है अर्थात् क्रम से ब्रह्मरन्ध्र, ललाट, मुख निकलते हैं । और जब सामने की ओर का कन्धा भग - सन्धि पर दबाव डालता है और पिछला कन्धा शीघ्रता से बाहर निकल आता है तो इसी समय बालक का पूर्ण शरीर शाखाओं के साथ बाहर हो जाता है । यदि गर्भाशय में कुछ गर्भोदक शेष रहता है तो वह भी इसी समय बाहर निकल जाता है । सुश्रुत ने - ' जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघने नारी ज्ञेया सा तु प्रजायिनी ॥ ' से प्रसव काल सामीप्य और ' तत्रोपस्थित प्रसवायाः कटी पृष्ठं प्रति समन्तात् वेदना भवत्यभीक्ष्णं पुरीषप्रवृत्तिर्मूत्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च ' से प्रथमावस्था उसके बाद वेदना के अधिक बढ़ जाने पर ' सुभग प्रवाहस्व ' आदि से द्वितीय अवस्था का कार्य बताया है । यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनामवेक्षेत- काचिदस्या अपरा प्रपन्ना न वेति । तस्या-वेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नाभेरुपरिष्टाद्दलवन्निपीड्य सव्येन पाणिना पृष्टत उपसंगृह्य तां सुनिर्धूतं निर्धुनुयात् । अथास्याः पार्या श्रोणीमा कोटयेत् । अस्याः स्फिचावुपसंगृह्य सुपीडितं पीडयेत् । अथास्या बालवेण्या कण्ठतालु परिमृशेत् । भूर्जपत्रकाचमणिसर्पनियों कैश्वास्या योनिं धूपयेत् । कुष्ठतालीस कल्कं बल्व-जयूषे मैरेयसुरामण्डे तीक्ष्णे कौलस्थे वा यूपे मण्डूकपर्णीपिप्पलीसंपाके वा संप्लाव्य पाययेदेनाम् । तथा सूक्ष्मेलाकिलिमकुष्ठनागरविडङ्गपिप्पलीकालागुरुचन्य चित्रकोप कुञ्चि-काकल्कं खरवृषभस्य वा जीवंतो दक्षिणं कर्णमुत्कृत्य दृषदि जर्जरीकृत्य बल्वजक्वाथादी-नामाप्लावनानामन्यतमे प्रक्षिप्याप्लाव्य मुहूर्तस्थितमुद्धृत्य तदाप्लावनं पाययेदेनाम शतपुष्पाकुष्ठमदनहिङ्गुसिद्वस्य चैनां तैलस्य पिचुं ग्राहयेत् । अतश्चैवानुवासयेत् । एतैरेव चाप्लावनैः फलजीमूतेचवाकुधामार्गव कुटजकृत वेधनहस्ति पिप्पल्युपहितैरास्थापयेत् । तदा-· स्थापनमस्याः सह वातमूत्रपुरीषैर्निर्हरत्यपरामासक्तां वायोरेवाप्रतिलोम गत्वात् । अपरां हि वातमूत्रपुरीषाण्यन्यानि चान्तर्बहिर्मार्गाणि सज्जन्ति ॥ ४१ ॥

तृतीयावस्था [ Third Stage ] - जब गर्भ उत्पन्न हो जाय तब उन परिचारिका स्त्रियों में एक कोई स्त्री ध्यान से देखे कि कहीं अपरा ( Placenta ) बाहर आ गई अथवा नहीं । यदि अपरा बाहर न निकली हो, गर्भाशय में ही रुक गई हो तो इन परिचारिका स्त्रियों में कोई १. ' बल्वजक्काथे ' इति पा ० । २. ' खरस्य वृषस्य वा जस्तो दक्षिणं कर्णमुत्कृत्य ' इति पा ० । ३. ' बल्गजयूषादीनामन्यतमे ' इति पा ० । ४. ' वायोरनुलोमगमनात् ' इति पा ० । ५. ' चान्तर्बहिर्मुखानि ' इति पा ० । ६० च ० सं ०

पृष्ठ 1035

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६४६ चरकसंहिता एक स्त्री दक्षिण हाथ से प्रसूता की नाभि के ऊपरी भाग में बलपूर्वक दवा कर बाम हाथ से पीठ पर दबाव दे जिससे पूरे शरीर में कम्पन हो जाय या उसकी कमर पर पाष्णि ( एड़ी ) के सहारे चढ़ कर दबावे अर्थात् इस प्रकार परिचारिका स्त्री उसकी कटि पर पैर रखें जिससे कि कमर में दबाव के कारण संकोच हो जाय या प्रसूता के नितम्ब को पकड़कर बलपूर्वक दबा दे या बालों के गुच्छों से कण्ठ और तालू का स्पर्श करे अर्थात् परिचारिका स्त्री अपनी अँगुली या किसी लकड़ी में बालों को बाँधकर उसी के सहारे कण्ठ और तालु में घर्षण करें । भोजपत्र, काँच, साँप की केंचुल का धूप योनि में लगावे । कूट, तालीसपत्र इन दोनों का कल्क, बल्बज क्वाथ में, मैरेय और सुरामण्ड में, कुलधी के यूप में, मण्डूक पर्णी और पिप्पली के काथ में मिलाकर अर्थात् इन किसी भी द्रव्य के क्वाथ में कल्क मिलाकर प्रसूता को पिलावे तथा छोटी इलायची, देवदार, कूठ, सोंठ, वायविडंग, काला अगर, चव्य, पिप्पली, चित्रकमूल, मँगरैला इनका कल्क बनाकर या जीवित गदहा या वेल का दक्षिण कान काट कर सील पर पीस कर ऊपर बनाए हुए वल्वज ( बाई घास ) के यूष आदि किसी भी एक द्रव में घोलकर मूहूर्त भर रखने के बाद उस द्रव को धीरे - धीरे निथार कर या छान कर स्त्री को पीने को दे । सौंफ, कूठ, होंग, मदनफल, इनके कला और काथ से पकाया गया तैल को कपड़े में भिगोकर बनाये हुए पिचु को योनि के अन्दर रखें । और इसां तैल से अनुवासन वस्ति दे I | पहले बताये हुए आप्लावन द्रव्य, वल्लज यूष, मैरेय सुरामण्ड आदि में मदनफल, जीमून ( देवदाली ) इक्ष्वाकु ( तितलौकी ) धामार्गव ( पीली तरोई ) कृतवेधन ( कडुई तदोई ) हस्तिपिप्पली ( गजपीपर ) इनका क्वाथ मिलाकर आस्थापन वस्ति दे । इस प्रकार दी हुई आस्थापन बस्ति, वात, मूत्र, पुरीष के साथ रुकी हुई अपरा को बाहर निकाल देती है और वायु का अनुलोम करती है । प्रधान रूप से आस्थापन वस्ति वायु का ही अनुलोमन करनी है उसके फलस्वरूप अपरा बाहर निकल जाती है । यदि वायु अनुलोम न हो, अपरां बाहर न निकले तो अधोमार्गं से निकलने वाले वात, मूत्र, पुरीष इनका भी वेग रुक जाता है ॥ ४१ ॥

विमर्श - तृतीयावस्था में बच्चा के उत्पन्न हो जाने के बाद गर्भाशय थक जाने के कारण कुछ विश्राम करता है, उसमें आकुञ्चन क्रिया नहीं होती है पर प्रायः आध घंटे के बाद पुनः गर्भाशय में अपरा को निकालने के लिए संकोच प्रारम्भ होता है और अपरा बाहर निकल आती है । अपरा दो तरह से बाहर आती है उलटे छाते की तरह अर्थात् वह भाग जिस भाग पर भ्रूण लगा रहता पहले बाहर आता है और झिल्ली बाद में आती है या अपरा का एक किनारा पहले निकलता है शेष भाग बाद में निकल जाता है । यदि आधे घंटे के भीतर अपरा बाहर न निकल जाय तो उसे रुका हुआ समझ कर निकालने के लिए प्रयत्न करे । इसके लिए उदरभित्ति से गर्भाशय को इस प्रकार पकड़ा जाय कि अंगुलियाँ गर्भाशय के पीछे रहें और अँगूठा सामने की ओर रहे और दबाव देता रहे । जब गर्भाशय में आकुंचन होने लगे तो सामने से पीछे की ओर ' पीडन करे । इस क्रिया गर्भाशय में आकुंचन प्रारम्भ होता है जिससे अपरा बाहर निकल आती है । इसे ( Dublin Method or Crede's Method ) कहते हैं । यदि अपरा का निष्कासन इन क्रियाओं द्वारा नहीं होता है तो उसे छोड़ दिया जाता है कुछ समय के बाद गर्भाशय में संकोच होने से वह योनिमार्ग में चली आती है । पर योनि में स्वाभाविक संकोच नहीं होता है इसलिए हाथ से उसे बाहर खींच लिया जाता है । यदि गर्भाशय से अपरा को पृथक करने के लिए शीघ्रता में अन्य उपाय किये जाते हैं तो उसके टुकड़े अन्दर रह • जाने का भय रहता है और प्रसवोत्तर रक्तस्राव ( Post Partum Haemorrhage ) होने का

पृष्ठ 1036

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जाति सूत्रीयशारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् ६४७ भय रहता है । अतः गर्भाशय से अपरा को पृथक् करने के लिए वलान् कोई उपाय नहीं किया जाता । कृत्रिम उपायों द्वारा जो कि ऊपर मूल में वर्णित है उसी के द्वारा गर्भाशय में उत्तेजना उत्पन्न कर उसका पृथक्करण किया जाता है और योनि में आने पर अपरा हाथ से निकाल दी जाती है । अपरा के बाहर निकल जाने पर भली भाँति यह देख लिया जाता है कि अपरा का कुछ भाग योनि के अन्दर तो नहीं रह गया । यदि कुछ भाग रुक जाता है तो उससे माता के शरीर में अनेकों हानियाँ होती हैं । तस्यास्तु खल्वपरायाः प्रपतनार्थे कर्मणि क्रियमाणे जातमात्रस्यैव कुमारस्य कार्या-येतानि कर्माणि भवन्ति तद्यथा - अश्मनोः संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतोदकेनोष्णोदकेन वा सुखपरिषेकः, तथा स क्लेशविहतान् प्राणान् पुनर्लभेल । कृष्णकपालिका शूर्पण चैनमभिनिष्पुणीयुर्यद्यचेष्टः स्याद् यावत् प्राणानां प्रत्यागमनम् ( तत्र्त्तत् सर्वमेव कार्यम् ) । ततः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिभूतमभिसमीच्य स्नानोदकग्रहणाभ्यामुपपादयेत् ॥ ४२ ॥

सद्यः प्रसूत बालक की परिचर्या [ Care of Child just after Delivery ] उस प्रसूता स्त्री की अपरा गिराने के लिए कार्य करते हुए उत्पन्न होने के बाद कुमार के लिए निम्नलिखित कार्य करने चाहिए जैसे- दो पत्थर के टुकड़ों को लेकर बालक के कान के मूल में अर्थात् कान के पास में बजाना चाहिए, और गरम या शीतल जल से बालक के मुख पर सिचन करना चाहिए । इन क्रियाओं से प्रसत्र में उत्पन्न हुए कष्टों से पीड़ित प्राण पुनः बलिष्ट हो जाते है । यदि बालक के भूमिष्ठ होने पर उसमें चेष्टा का अभाव हो तो सींक से निर्मित सूप के द्वारा तब तक वायु करे जब तक कि श्वास प्रश्वास और अन्य चेष्टाएँ न हो जाँय । यह सभी कार्य करना चाहिए । इसके बाद श्वास प्रश्वास के समुचित और प्रकृतिभूत बालक को देख कर स्नान करावे और अन्य जलाय कार्यों को जल से करावे ॥ ४२ ॥

विमर्श - स्वाभाविक प्रसव में यद्यपि बालक को कष्ट होता है पर वह कष्ट नगण्य होता है । उससे बालक के शरीर पर कोई अनिष्ट प्रभाव नहीं पड़ता, पर १ यदि प्रसत्र में रक्त स्राव पूर्व में हो जाता है, २. गर्भाशय जकड़ा रहता है, ३. नाल पर दबाव पड़ जाता है या ४. उसमें गाँठे पड़ जाती हैं, ५. सहसा झटका के साथ बालक निकलते समय सिर में चोट खा जाय, ६. योनि द्वार के संकुचित होने से या मूढ़ गर्भ के कारण यंत्र द्वारा जो बालक कष्ट पाते हैं वे प्रायः जन्म के तुरन्त बाद श्वास - प्रश्वास क्रिया नहीं करते, इसको Asphyxia कहते हैं । इसमें दो भेद किया जाता है १. श्याम प्राणावरोध ( Asphyxia Livida ) २. श्वेत प्राणावरोध ( Asphyxia Pallida ) । प्रथम प्रकार अधिक पाया जाता है । इसमें बालक का मुख मण्डल श्याम वर्ण हृदय का स्पन्दन मन्द, नाल रक्त से परिपूर्ण माँसपेशियाँ दृढ़ तथा चेष्टाएँ प्रतिक्षिप्त होती है । द्वितीय प्रकार - यह कम पाया जाता है । इसमें बालक का मुखमण्डल श्वेत, हृदय और नाल का स्पन्दन बहुत मन्द जो बहुत ही कठिनता से अनुभव गम्य होता है । नाल रक्त से खाली, माँसपेशियाँ शिथिल, प्रतिक्षिप्त चेष्टाओं का अभाव रहता है । यदि प्रथम अवस्था की उचित चिकित्सा नहीं होती है तो वह भी दूसरी अवस्था में परिवर्तित हो जाती है । चिकित्सा - प्रथम प्रकार में जब तक नाल का स्पन्दन भही प्रकार से हो रहा है तब तक नाल को काटने की आवश्यकता नहीं होती । वालक को पैरों से पकड़ कर उलटा करे और अपनी छोटी अँगुली पर स्वच्छ कपड़ा लपेट कर मुख तथा गले को साफ करे । इसके बाद १. ' मुखेन परिषेकः ' इति पा ० । २. अयं पाठो हस्तलिखित पुस्तके नोपलभ्यते ।

पृष्ठ 1037

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६४८ चरकसंहिता बालक के पीठ तथा नितम्ब पर थपथपावे, छाती को मले उसके शरीर पर शीतल जल की छींटा दे ऐसा करने से प्रायः बालक श्वास लेने लगता है । यदि नाल काटने के समय बालक का रंग नीला हो तो नाल के कटे हुए सिरे से लगभग ३ छटाँक रक्त बाहर निकल जाने पर नाल में गाँठ लगावे । दूसरी अवस्था में नाल को दो स्थानों पर क्लीप ( Clip ) से दबाकर नाल को बीच से शीघ्र ही बाँध कर काट दे । बालक को पृथक कर लें । फिर बालक को उलटा लटका कर मुख और गला साफ करे । उसे गले से नीचे गरम पानी में रक्खे । छानी को भली प्रकार मले और कुछ - कुछ अन्तर से छाती को दबाते रहे । यदि मुख में कुछ कफ दिखाई पड़े तो साफ करे । इससे श्वास क्रिया होने लगती है । साथ में ही ( Lobelin ) इत्यादि औषधियाँ जो श्वास-केन्द्र को उत्तेजित करती हैं, इनका भी प्रयोग करना चाहिये । यदि इससे भी श्वासप्रश्वास नहीं आता तो कृत्रिम श्वास ( Artificial Respiration ) विधियाँ प्रयोग की जाती हैं । कृत्रिम श्वास की विधि में मुख और नासिका में वायु प्रवेश कराना भी है जिसका सूप से हवा करने से संकेत किया है । शांत और उष्ण जल से परिषेक का तात्पर्य ऋतु अनुसार अर्थात् जाड़े में गरम और गरमी में शीतल जल से परिषेक करना चाहिए । बालक के अचेष्ट होने पर दो पत्थर के टुकड़ों के शब्दों को कान में पहुँचाने या पुत्रोत्सव के समय शीघ्र ही अनेक प्रकार के बाजे और तोप आदि का शब्द होने का उद्देश्य यह है कि इन शब्दों से बालक का मन आश्चर्यचकित हो जाय, जिससे चेष्टाएँ और श्वासप्रश्वास होने लगे । अथास्य ताल्वोष्ठकण्ठजिह्वाप्रमार्जनमारभेताङ्गुल्या सुपरिलिखितनखया सुप्रक्षालितो-पधानकार्पासपिचुमत्या । प्रथमं प्रमार्जितास्यस्य चास्य शिरस्तालु कार्पासपिचुना स्नेहगर्भेण प्रतिसंछादयेत् । ततोऽस्यानन्तरं सैन्धवोपहितेन सर्पिषा कार्यं प्रच्छर्दनम् ॥४३ ॥

और भी - अब बालक के तालु, ओष्ठ, कंठ, जिड़ा को नख कटे हुए अंगुली के ऊपर स्वच्छ एवं श्वेत रुई को लपेट कर साफ करना प्रारम्भ करे । पहले तालु पर कपास का फाया स्नेह में भिगों कर रख दे । इसके बाद सैंधा नमक और घी चटाकर वमन करावे ॥ ४३ ॥

विमर्श: - यद्यपि श्वास - प्रश्वास क्रिया के पूर्व ही मुख एवं गले को साफ कर लिया जाता है पर वह सफाई नाम मात्र की होती है और शीघ्रता से की जाती है जिससे श्वास-प्रश्वास में बाधा न उत्पन्न हो । पर जब श्वासप्रश्वास क्रिया चालू हो जाती है तो फिर उसके बाद भली प्रकार नख काट लेने के बाद अँगुली के सिरे में रुई लपेट कर सफाई की जाती है । जब स्नान कराकर शरीर की शुद्धि एवं गले आदि की सफाई हो जाती है तब सेंधा नमक, घी मिलाकर चटाया जाता है । ततः कल्पनं नाड्याः । अतस्तस्याः कल्पनविधिमुपदेच्यामः -- नाभिबन्धनात् प्रभृत्यष्टाङ्गुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा तीक्ष्णेन रौक्म-राजतायसानां छेदनानामन्यतमेनार्धधारेण छेदयेत् । तामग्रे सूत्रोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत् । तस्य चेन्नाभिः पच्येत तां लोध्रमधुकप्रियङ्गुसुरदारुहरिद्राकल्क-सिद्धेन तैलेनाभ्यज्यात्, एषामेव तैलौषधानां चूर्णेनावचूर्णयत् । इति नाडीकल्पन-विधिरुक्तः सम्यक् ॥ ४४ ॥

नालछेदन [ Cection of Umbilical Cord ] - इसके बाद नाल ( नाड़ी छेदन ) की विधि का उपदेश किया जा रहा है । नाल में नाभि बन्धन से आठ अंगुल छोड़कर चिह्न लगा दे और जिस स्थान पर छेदन करना हो उसे दोनों ओर पकड़कर तीक्ष्ण सुवर्ण, १. ' ऊर्ध्वधारेण इति पा ० ।

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जातिसूत्रीयशारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् ६४६ चाँदी, लोहा किसी एक धातु के बने हुए अर्ध धार वाले चाकू से काट दे । कटा हुआ जो भाग नाभि से संलग्न रहता है उसके अग्र भाग में सूत्र बाँध कर बालक के कंठ में बाँध दे । यदि नाभि पकने लगे तो लोध, मुलेठी, प्रियंगु, देवदारु, और हल्दी के कल्क से विधिपूर्वक बनाए हुए तेल का अभ्यंग करे । तेल सिद्ध करने वाले इन्हीं द्रव्यों वाले चूर्ण का पके हुए भाग पर अवचूर्णन करे यह नाड़ी काटने की विधी उचित रूप से बतायी गयी है ॥ ४४ ॥

विमर्शः -- वस्तुतः नाभिनाल काटने के पूर्व आठ अंगुल नाप कर बाँध दिया जाता है । ऐसा न करने से रक्तस्राव होने का भय रहता है । कभी - कभी रक्तस्राव अधिक होने से बालक की मृत्यु भी हो जाती है । इसी लिए सुश्रुत ने ' तनो नाभिनाडीमष्टाङ्गुरुमायस्य सूत्रेण बद्ध्वा छेदयेत् ', ( शा. १० ) का आदेश दिया है । पर चरक ने बाँधने का स्पष्ट आदेश नहीं दिया है पर आठ अंगुल नापना, उस छेदन स्थान पर चिह्न करना और छेड़न करने योग्य स्थान के दोनों तरफ पकड़ कर काटना बताया है! जब उसे दोनों हाथ से पकड़ा जायगा तो रक्त निकलने का भय ही नहीं रहता और बाद में सूत्र से दृढ बन्धन कर बालक के गले में लटका दिया जाता है । सुश्रुत की विधि अच्छी और सरल है, क्योंकि बाँध देने पर रक्त निकलने का भय कथमपि नहीं रह जाता । आजकल नाभिबन्धन से थोड़ी दूरी पर गँठ लगाते हैं जब बालक की श्वास प्रश्वास क्रिया उत्तम रीति से होने लगती है तो बालक को मृदु विस्तरे पर सीधे सुला देते हैं । जब यह देख लेते है कि नाभिनाल का स्पदन बन्द हो गया है तो नाभि मूल से थोड़ी दूरी पर नाभि नाड़ी को खींच कर कसकर सूत्र से बाँध देते हैं । यदि संभावना होती है कि गर्भाशय में दूसरा बालक भी है तो स्त्री के भग प्रदेश से ३ इञ्च की दूरी पर दूसरी गाँठ लगा दी जाती है । ऐसा करने से दूसरे बालक के शरीर से रक्त बाहर नहीं निकलता और उसके प्राण सुरक्षित रहते हैं अन्यथा रक्तस्राव होने से उसकी मृत्यु हो जाने की सम्भावना रहती है । सामान्यतः प्रत्येक प्रसव में यदि ३ इञ्च की दूरी पर दूसरी गाँठ लगा दी जाय तो एक बालक होने में कोई हानि नहीं होती और यदि दूसरा बालक है तो उसकी रक्षा हो जाती है । पहली गाँठ से ई इञ्च आगे की ओर तेज स्वच्छ और शुद्ध चाकू से नाल काट देते हैं । असम्यकल्पने हि नाड्या आयामव्यायामोतुण्डिका पिण्डलिका- विनामिका - विजृ-म्भिकावाभ्यो भयम् । तत्राविदाहिभिर्वातपित्तप्रशमनैरभ्यङ्गोत्सादनपरिषेकः सर्पिभि वोपक्रमेत गुरुलाघवमभिसमीक्ष्य ॥ ४५ ॥

अनुचित नावच्छेदन से होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा [ Treatment of Diseases Caused by Improper Section of Umbilical Cord ] यदि नालच्छेदन ठोक रूप से न हुआ तो लम्बाई व चौड़ाई से उत्तण्डित अर्थात् मोटी और बाहर निकली हुई, पिण्डलिका ( पिण्ड के आकार का गोला व कठिन ), विनामिका ( किनारों से ऊँची व मध्य में हुई ), विजृम्भिका ( बढ़ने वाली ) नाभि होने का भय रहता है । अर्थात् अनुचित छेदन से उण्डिका, पिण्डलिका, विनानिका, विजृम्भिका यह चार उपद्रव होते हैं । यदि इनमें कोई भी विकार हो जाये तो रोग की गुरुना व लघुता का विचार कर अविदाही वात - पित्त को शान्त करने वाला अभ्यङ्ग, उत्सादन, परिषेचन और अन्य वात - पित्त प्रशानक घृतों से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४५ ॥

विमर्श - अनुचित नाल छेइन Sepsis के उपद्रव और Umbilical Hernia होने की सम्भावना बनी रहती है । अतएव इसी दृष्टिकोण से चिकित्सा करनी चाहिये ।

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६५० चरकसंहिता अतोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा - मधुसर्पिषी मन्त्रोपमन्त्रि यथाम्नायं प्रथमं प्राशितुं दद्यात् । स्तनमत ऊर्ध्वमेतेनैव विधिना दक्षिणं पातुं पुरस्तात् प्रयच्छेत् । अथार्तः शीर्षतः स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम् ॥ ४६ ॥

जात - कर्म -- • इसके बाद जैसे शास्त्र में कहा गया है । कुमार का जान - कर्म करना चाहिये । अर्थात् जिस वर्ण जाति का जो शास्त्र है, वेद है, उन मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर पहले बालक को मधु एवं घृत चाटने के लिये दे । इसके बाद इसी विधि से अर्थात् मन्त्र से अभिमन्त्रित कर दक्षिण स्तन में दूध ' पीने के लिए बालक को लगाये । इसके बाद कलश में रखे हुए जल को मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित कर शिर से स्नान कराये ॥ ४६ ॥

विमर्श -- बालक के उत्पन्न होने पर मधु एवं घी असम मात्रा में चाटने को दी जाती है । क्योंकि भूमिष्ठ होने पर माता के शरीर में जो आहार प्राप्त होता था उसका सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है और माता का दूध प्रथम दिन प्राप्त नहीं होता क्योंकि - ' धमनीनां हृदिस्थानां विवृत-त्वादनन्तरं चतूरात्रात्रिरात्राद्वा स्त्रीणां स्तन्यं प्रवर्तते । ' अर्थात् तीन अथवा चार दिन के बाद प्रसूता के स्तन में दूध आता है, क्योंकि पहले स्तनवाही धमनियाँ संकुचित रहती हैं । बालक जन्म के बाद तीन - चार दिन पर वे विस्तृत होती हैं । अतः सुश्रुत ने प्रथम दिन मधु व घी के साथ सुवर्ण भस्म दिन में तीन बार, दूसरे व तीसरे दिन लक्ष्मणा से पकाया घी तीन बार देने को बताया है । नवजात शिशु को मधु तथा घृत देने में प्रारम्भ से ही Glucose, Carbohydrate तथा Fats की प्राप्ति होने लगती है और उसके बाद क्रमशः उसे अपनी माता का दूध मिलने लगता है । अथास्य रक्षां विदध्यात् - आदानीखदिरकर्कन्धुपीलुपरूषकशाखाभिरस्या गृहं समन्ततः परिवारयेत् । सर्वतश्च सूतिकागारस्य सर्षपातसीतण्डुलकण कणिकाः प्रकिरेयुः । तथा तण्डुलवलिहोमः सततमुभयेकालं क्रियेतानामकर्मणः । द्वारे च मुसलं देहलीमनु तिरश्वीनं न्यसेत् । वचाकुष्ठक्षौमक हिङ्गु सर्पपातसीलशुनकणकणिकानां रक्षोघ्नसमाख्यातानां चौषधीनां पोहलिकां वा सूतिकागारस्योत्तरदेहल्यामवसृजेत्, तथा सूतिकायाः कण्ठे सपुत्रायाः, स्थाल्युदककुम्भपर्यङ्केण्वपि तथैव च द्वयोर्द्वारप-क्षयोः । कणककण्टकेन्धनवानग्निस्तिन्दुककाष्ठेन्धनचाग्निः सूतिकागारस्याभ्यन्तरतो नित्यं स्यात् । स्त्रियश्चैनां यथोक्तगुणाः सुहृदश्चानुजागृयुर्दशाहं द्वादशाहं वा । अनुपरतप्रदानमङ्गलाशीः स्तुतिगीतवादित्रमन्नपानविशदमनुरक्तप्रहृष्टजनसंपूर्ण च तद्वेश्म कार्यम् । ब्राह्मणश्चाथर्ववेदवित् सततमुभयकालं शान्ति जुहुयात् स्वस्त्ययनार्थं कुमारस्य तथा सूतिकायाः । इत्येतद्वक्षाविधानमुक्तम् ॥ ४७ ॥

वालक का रक्षाविधान [ Protection of the New born and Maternity Ward ] —— इसके बाद वालक की रक्षा विधान का अनुष्ठान करे । आदानी ( कड़ई तरोई ), खैर, बेर, पीलू, फालसा इन वृक्षों की शाखा लेकर जिस घर में बालक हो उस घर के चारों ओर लटका दे । सूतिका गृह के चारों ओर पीली सरसो, तीसी, चावल का दाना विखेर दे और नामकरण के पूर्व अर्थात् १० दिन तक लगातार दोनों समय तण्डुल वलि नानक होम करे । द्वार पर चौकठ के ऊपर तिरछा मूसल रखे । वचा, कूट, क्षौमवस्त्र, हींग, पीली सरसो, तींसी, लहसुन १. ' अथास्य ' इति पा ० । २. ' उभयतः कालम् ' इति पा ० । ३. ' प्राङ्गामकर्मणः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1040

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जाति सूत्रीय शारीराव्याय: ८ ] शारीरस्थानम् ६५१ का दाना और चावल का कण एवं भूत - प्रेत को दूर करने वाली अन्य गुग्गुलादि औषधियों की पोटली बना कर सूतिकागृह के दरवाजे के ऊपर लटका दे तथा इसे ही पुत्र के साथ प्रसूता स्त्रो के कण्ठ में भी बांध कर लटका दे । प्रसूता के व्यवहार में आने वाली स्थाली ( पात्र ), जल रखने वाले घड़े एवं खाट में भी इस पोटली को बांध दे । इसी प्रकार दोनों द्वार के पल्लों के ऊपर इनकी पोटली बाँध कर लटका दे । सूतिकागृह के भीतरी भाग में कणकण्टक की आग और तिदुक लकड़ी की आग सदा प्रज्वलित रखे । ऊपर बनाए हुए अनुकूल प्रियबोलने वाली स्त्रियाँ जो सूतिका के सेवा में लगी हुई हैं वे और अन्य सूतिका के हितैषी सखियाँ दस या बारह दिन तक जागनी रहें अर्थात् रात या दिन में कभी भी सूतिका को अकेले न छोड़े और लगातार दान, मङ्गलपाठ, आशीर्वाद, स्तुतिपाठ, गीतगायन, बाजा बजाना आदि कार्य करना चाहिए | और इन दिनों में सूतिकागार में खान पान की सभी सामग्रियाँ साफ और स्वच्छ रखनी चाहिए । उस समय सूतिकागृह, सूतिका से प्रेम करने वाले, प्रसन्नचित्त स्त्रीसमुदाय से पूर्ण ( भरा ) रखना चाहिए । कुमार एवं सूतिका की कल्याण कामना से अथर्ववेद को जानने वाले ब्राह्मण सायं प्रातः प्रतिदिन शान्ति के लिए होम करें या शन्तिपाठ और होम करें । इस प्रकार रक्षा विधान बता दिया गया है ॥ ४७ ॥

विमर्श - उपर्युक्त वर्णन का वैज्ञानिक अभिप्राय यह निकाला जा सकता हैं कि Maternity Ward को हर सम्भव उपायों से Iufection से बचाना चाहिये । साथ में माता ( Mother ) को मानसिक रूप से प्रसन्न रखने के लिये मनोरंजन की भी व्यवस्था करनी चाहिए । सूतिकां तु खलु बुभुक्षितां विदित्वा स्नेहं पाययेत् परमया शक्या सर्पिस्तैलं वसां मज्ञानं वा साम्यीभावमभिसमीक्ष्य पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्य चित्रकशृङ्गवेरचूर्णसहितम् । स्नेहं पीतवत्याश्च सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टयेदुदरं महताऽच्छेन वाससा; तथा तस्या न वायुरुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात् । जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धां यवागूं सुस्निग्धां द्रवां मात्रशः पाययेत् । उभयतःकालं चोष्णोदकेन च परिषेचयेत् प्राक् स्वागूपानाभ्याम् । एवं पञ्चरात्रं सप्तरात्रं वाऽनुपालय क्रमेणाध्याययेत् । स्वस्थवृत्त-मेतावत् सूतिकायाः ॥ ४८ ॥

सूतिका स्वस्थ वृत्त [ Management of Puerperium ] ~ • सूतिका को भूख लगी है यह जानकर सूतिका के सात्म्य का ध्यान रखते हुए पेपली, पीपरामूल, चव्य, चित्रकमूल और सौंठ का चूर्ण मिलाकर घृत, तेल, वसा और मज्जा इन चारों स्नेहा में से किसी एक स्नेह को सूतिका की शक्ति के अनुसार पूर्ण मात्रा में सर्व प्रथम पिलावे । स्नेह पी लेने के बाद सूतिका के उदर पर घृत और तैल का मन करा कर एक बड़े कपड़े से उदर को बाँध दें । जब उदर पर कपड़े से बन्धन कर दिया जाना है तो दबाव पड़ जाने से भीतर अवकाश ( रिक्त स्थान ) नहीं रह जाता । अतः सूतिका स्त्री के उदर में वायु किसी प्रकार कीविकृति नहीं उत्पन्न करती । स्नेह के पच जाने पर पिप्पली, पीपरामूल आदि ऊपर बनाए हुए द्रव्यों से सिद्ध किया हुआ यवागू जिसमें पूर्ण मात्रा में घृत आदि स्नेह मिलाया गया हो और वह द्रव हो, मात्रा से अर्थात् सूतिका की शक्ति का ध्यान रखकर प्रातः सायं पिलावे । किन्तु स्नेह और यवागू पान के पहले सूतिका को ईषन गरम जल से परिसेचन ( स्नान ) करा ले । इस प्रकार पाँच दिन या सात दिन तक इन नियमों का पालन करने के बाद क्रम से सूतिका के शरीर में बल बढ़ाने का

यत्न बृंहण अन्न पान से करे । इतना ही सूतिका का स्वस्थवृत्त है ॥ ४८ ॥

१. ' मात्राम् ' इति पा ० ।