चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1041–1050
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1041–1050
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६५२ चरकसंहिता विमर्श - काश्यप ने जिस कुल परम्परा में जो आहार द्रव्य प्रचलित है वही देने का संकेत किया है । ' वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः । रक्तमांसस्य निर्यूहं कन्दमूल फलानि च ॥ कुलसात्म्यं च बुध्येत यस्मिन् यस्मिन् यथा यथा । औचित्यात् कुलमात्म्यस्य तत्त-थैवानुवर्तते ॥ अतो नैकान्तिकत्वाच्च सूतिकोपक्रमस्य च । देशं च जातिसात्म्यं च सम्प्रधार्य प्रयो-जयेत् ॥ ' ( सूतिकाचङ्कमणीयाध्याय ) तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा, गर्भवृद्धिक्षयित-शिथिलसर्वधातुत्वात् प्रवाहणवेदनाक्लेदनरक्तनिःस्रुतिविशेषशून्य शरीरत्वाच्च; तस्मात्तां यथोक्तेन विधिनोपचरेत्; भौतिकजीवनीय बृंहणीयमधुरवातहरसिद्धैरभ्यङ्गोत्सादनपरि-षेकावगाहनान्नपानविधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत्; विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥ ४ ९ ॥ सूतिकावस्था का चिकित्सा सूत्र - गर्भाशय में गर्भ की वृद्धि होने से, शरीर की सभी धातुओं के क्षीण एवं शिथिल हो जाने से और प्रवाहण तथा प्रसव वेदना के कारण क्लेद और रक्त के विशेष रूप में निकल जाने से सूतिका का शरीर विशेषकर शून्य हो जाता है । उस समय कोई भी रोग यदि सूतिका को हो जाय तो वह रोग कृच्छ्रसाध्य या असाध्य हो जाता है । इसलिए पहले बताए हुए नियमों के अनुसार विधिपूर्वक प्रसूता की सेवा शुश्रूषा करनी चाहिए । विशेषकर भौतिक ( प्राणिज ), जीवनीय, बृंहणीय, मधुरगण एवं वातहर औषधियों से सिद्ध स्नेहों का अभ्यङ्ग और इन्हीं औषध द्रव्यों से बने उबटन का उत्सादन ( मर्दन ), इन्हीं के क्वाथों से स्नान, अवगाह ( टब में बैठना ), इन्हीं द्रव्यों से पकाए हुए जल में सिद्ध अन्नपान का विधिपूर्वक प्रयोग कराना चाहिए | क्योंकि बालक उत्पन्न होने के बाद प्रसूता स्त्री का शरीर विशेष शून्य हो जाता है ॥ विमर्श - सूतिका को नियमपूर्वक रखना चाहिए । इस कथन से स्पष्ट किया गया है कि नियम का न पालन करना अर्थात् मिथ्या आहार - विहारों का सेवन करना रोगों का कारण होता है और वे रोग कष्टसाध्य या असाध्य होते हैं । सूतिका का कोई भी रोग सुखसाध्य नहीं होता है । निदान का न सेवन करना ही सूतिका रोग की चिकित्सा है । सामान्यावस्था में जो - जो रोग होते हैं वे ही रोग प्रसूता को भी होते हैं । पर सामान्य रोगों की चिकित्सा प्रसूता स्त्री को उन्हीं रोगों के होने पर कार्यकर नहीं होती । अतः भौतिक, जीवनीय आदि द्रव्यों का प्रयोग करना बनाय । है 1 सुश्रुत ने सूतिका रोग का वर्णन इस प्रकार किया है यथा - ' मिथ्याचारात् सूतिकाया यो व्याधरुप-जायते । स कृच्छ्रसाध्योऽसाध्यो वा भवेदत्यपतर्पणात् ॥ १. मिथ्याचार - मिथ्या आहार और विहार, २. अपतर्पण, सूतिका रोग होने के ये दो कारण बताये हैं । आयुर्वेद में सूतिकावस्था एक रोग माना जाता है, जिसमें अनेक लक्षण स्वतः या कारणान्तर से उत्पन्न होते हैं । वे सभी लक्षणमात्र ही होते हैं । रोग का नाम सूतिका रोग ही कहा जाता है, जिसमें साधारणतः ये लक्षण होते हैं । यथा - ' अङ्गमर्दो ज्वरः कम्पः पिपासा गुरुगात्रता । शोथः शूलातिसारौ च सूतिका रोगलक्षणम् ॥ ' काश्यप संहिता में - सूतिका रोगों की संख्या निर्धारण कर दी गई है, यथा - ' दुःप्रजानामयाः सन्ति चतुःषष्टिरिति स्थितिः । योनिभ्रंश, क्षता चैव विभिन्ना मूत्रसङ्गिनी । सशोफनाविण चैत्र नसुप्ता वेदनावती । पार्श्वपृष्ठकटीशूलं हृा शूलं विसूचिका || प्लीहा महोदरत्वं च शाखामालोकमदकः । क्षेपको हनुस्तम्भो मन्यास्तम्भोऽपतानकः ॥ मक्कल्लो विद्रधिः शोफः प्रलापोन्मादकामलाः । दौर्बल्यं भ्रमली कार्श्य भक्तद्वेषोऽविपाचकः ॥ ज्वरातिसारौ वै सर्परछदिस्तृष्णा प्रवाहिका । हिक्का श्वासश्च कासश्च पाण्डुर्गुल्मश्च रक्तजः ॥ आनाहाध्यापने चोभे वर्चोमूत्रग्रहावपि । मुखरोगोऽक्षि-
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जातिसूत्रीयशारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् ६५३ रोगश्च प्रतिश्यायगलग्रहौ || राजयक्ष्माऽर्दितं कम्पः कर्णस्रावः प्रजागरः । उष्णवातो ग्रहाबाधः स्तनरो-गोऽथ रोहिणी ॥ वाताष्ठीला बातगुल्मरक्तपित्तविचर्चिकाः । इत्येते सूतिका रोगाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः ॥ ’ ( खिलस्थान अ. ११ ) । १. चोनि ( गर्भाशय ) का स्थान भ्रंश होना, २. योनिक्षत, ३. योनि का फट जाना, ४ मूत्रसङ्ग ( मूत्राघात ), ५. शोध ६. योनिस्राव, ७. योनिप्रसुप्तता ( योनि में शून्यता ), ८. योनि में वेदना, ९ पार्श्वशूल, १०. पृष्ठ- शूल, ११. कटिशूल, १२. हृच्छूल, १३. विसूचिका, १४. प्लीहावृद्धि, १५. महोदर ( पेट का बढ़ जाना ), १६. शाखा वात, ( हाथ - पैर में बात का बढ़ जाना और तज्जन्य रोगों का होना ), १७. अङ्गमर्द, १८. भ्रक्षेप, १ ९. हनुस्तम्भ, २०. मन्यास्तम्भ, २१. अपतानक, २२. मक्कल, २३. विद्रधि ( आन्तर ), २४. शोफ ( व्रणनिमित्त शोफ ), २५ प्रलाप, २६. सूतिकोन्माद, २७ कामला, २८. दुर्बलता, २ ९. भ्रम, ( चक्कर आना ), ३० कृशता, ३१. भक्तद्वेष, ३२. अविपाकता, ३३. ज्वर, ३४. अतिसार, ३५. विसर्प, ३६. छर्दि, ३७. तृष्णा, ३८. प्रवाहिका, ३ ९. हिक्का, ४० श्वास, ४१ कास, ४२. पांडु, ४३. रक्तगुल्म, ४४. आनाह, ४५. आध्मान, ४६. मलबन्ध, ४७. मूत्रग्रह, ४८. मुखरोग, ४ ९. नेत्र रोग, ५०. प्रतिश्याय, ५१. गलग्रह, ५२. राजयक्ष्मा, ५३. अर्दित, ५४. कम्पन, ५५. कर्ण स्राव, ५६. निद्रानाश, ५७. उष्णवान, ५८. भूतादिग्रहों का आवेश, ५ ९. स्तनरोग, ६०. रोहिणी, ६१. वाताष्ठीला, ६२. वातगुल्म, ६३ रक्तपित्त ६४ विचचिका, इन ६४ रोगों को सूतिका रोग माना है । ये रोग प्रसव कष्ट के कारण या मिथ्याहारविहार के कारण होते हैं । अतः इन्हें दुष्टप्रजातामय भी कहा जाता है । संक्षेप में -- १. मिथ्याहारविहार, २. अत्यपतर्पण ( सुश्रुत ), ३. शरीर का शून्य होना ( शरीर दौर्बल्य ) ये तीन कारण सूतिका रोग होने के माने गये हैं । इसमें मिथ्याहारविहार को प्रधान कारण शेष दो को सहायक कारण मानना चाहिए । दशमे त्वहनि सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धौषधैगौर सर्वपलोधैश्च स्वाता लध्वहतशुचिवस्त्रं परिधायें पवित्रेष्टलघुविचित्रभूषणवती च संस्पृश्य मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवतां शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गांश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा कुमौरमहतानां च वाससां संचये प्राकशिरसमुद्रशिरसं वा संवेश्य देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमतीत्युक्त्वा कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च । तत्राभिप्रायिकं घोषवदाद्यन्तस्थान्त-मूष्मान्तं वाऽवृद्धं त्रिपुरुषानूकमनः प्रतिष्ठितं, नाक्षत्रिकं तु नक्षत्रदेवतासमानाख्यं द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा ॥ ५० ॥
( ४ ) कुमारनामकरण, धात्रीव्यवस्था, कुमारागार एवं कुमारपरिचर्या ( Proper - Name Ceremony, Arrangement of Wet Nursing, Pediatric Ward and Care of the Child ) बालक का नामकरण [ Proper Name - Ceremoney ] - दशवें दिन पुत्र के साथ प्रसूना स्त्री सुगन्ध की औषधियों, सफेद सरसों और लोध से संस्कारित जल से स्नान कर, हलके जो फटे न हों, अर्थात् नूतन पवित्र वस्त्र धारण कर, पवित्र, मन के अनुकूल, हलका, नाना प्रकार के आभूषणों को धारण कर, माङ्गलिक वस्तुओं का स्पर्श कर, उचित देवता की पूजा कर, १. ' दशम्यां निश्यतीतायाम् ' इति पा ० । २. ' लव्हतवस्त्र परिहिता ' इति पा ० । ३. ' कुमार महतेन वाससाऽऽच्छादयेद् प्राक्शिरसमुद्रशिरसं वा संवेश्य ' इति पा ० । ४. ' वृद्धत्रिपुरुषान्तरम् ' इति पा ० ।
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६५४ चरकसंहिता अर्थात् वालक का जिस नक्षत्र में जन्म हुआ हो उस नक्षत्र का जो देवता हो उसकी विधिवत् पूजा कर या जिस मनुष्य का जो कुलदेवता हो उसकी पूजा कर, शिखाधारी, श्वेत वस्त्रवारी, अभ्यङ्ग ( विकृत अङ्ग, न्यून, या अधिक अङ्ग से रहित ) ब्राह्मणों की पूजाकर, और युक्त ब्राह्मणों से स्वस्ति वचन कराकर, नूतन, पवित्र, बिना फटे हुए वस्त्र से कुमार को आच्छादित कर दिशा या उत्तर दिशा नें शिर कर शयन कराकर, पहले देवता को, बाद में द्विजातियों को प्रणाम करता है, ऐसा कह कर बालक का पिता बालक का दो नाम रक्से, एक नाक्षत्रिक नाम ( जिस नक्षत्र में जिस चरण में बालक का जन्म हुआ हो उस चरण के अक्षर के अनुसार जैसे अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म है तो चू, चे, चोला अश्विनी, चू अक्षर प्रथम चरण का है अतः ' चूडामणि, नाक्षत्रिक ( राशिनाम ) रखे । दूसरा नाम आभिप्रायिक ( जो नाम माता पिता को इष्ट हो ) वह नाम रखें । उसमें आभिप्रायिक नाम ऐसा रखना चाहिए जिसके आदि में घोष वर्ण का अक्षर हो, ( घोष वर्ण का तात्पर्य घोष प्रयत्न से है, हशः संवारा नादाः घोषाश्च हश प्रत्यहार -ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, ध, ढ, ध, ज, ब, ड, द, इन वर्गों का संचारनाद घोष प्रयत्न होता है, ये ही वर्ग नाम के आदि में आने चाहिए । मध्य में अन्तःस्थ वर्ग का अक्षर हो, ( यणोऽन्तस्थाः । यण् प्रत्याहार में य व र ल, वर्ण है ये वर्ण नाम के मध्य में आने चाहिए, और नाम के अन्त का अक्षर उष्मावर्ण का होना चाहिए ( शषसहा ऊष्माणः । श, ष, स, ह, को उष्मा कहा जाता है ये ही वर्ण नाम के अन्त में होने चाहिए । पर वह नाम वृद्ध रहित हो - ( वृद्धिर्य-स्याचामादिस्तद्वृद्धम् १ | ११६८३ ( पाणिनीयसूत्र ) जिस समुदाय के अचों के मध्य में आदि अच वृद्धि संज्ञक ( अ ऐ औ ) हो उसे वृद्ध कहा जाता है, तब नाम का प्रारम्भ आ, ऐ, औ से नहीं होना चाहिए ) तीन पुस्त ( पिता, पितामह प्रपितामह ) का अनुकरण करने वाला नाम हो - अर्थात् इन तीनों के कुछ अक्षर या अर्थ से मिलता - जुलता नाम हो और प्रसिद्ध नाम रखें । नाक्षत्रिक नाम जिस नक्षत्र में जन्म हो उस नक्षत्र के देवता के समान अर्थ का बोधक चरण के अनुकूल दो अक्षर या चार अक्षर का नाम रखना चाहिए ॥ ५० ॥
विमर्श - आचार्य चक्रपाणि ने दसवें दिन नामकरण का विधान बताया है, सुश्रुत ने भी दशवें दिन नामकरण बताया है । यथा- ' ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौनुको स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रेतं नक्षत्र नाम वा ' ( शा. अ. १० ) मनु भी दशवें या बारहवें दिन नामकरण करना बताते हैं -- ' नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् । पुण्ये तियों मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ वृत्ते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रमेतायुषः प्रमाणज्ञानहेतोः । तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति । तद्यथा - एकैकजा मृदवोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला स्वक्, प्रकृत्याऽतिसंपन्नमीष प्रमाणातिवृत्तमनु-रूपमातपत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं सुष्टिशङ्ख सन्ध्यूर्ध्वव्यञ्जन संपन्नमुपचितं वलिभ-मर्धचन्द्राकृतिललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ समौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽवनतौ सुश्लिष्टकर्ण-पुत्रको महाच्छिद्रौ कणों, ईषत्प्रलम्बिन्यावसंगते समे संहते महत्यो भ्रुवौ, समे समाहित-दर्शने व्यक्तभागविभागे बलवती तेजसोपपन्ने स्वङ्गापाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसंपन्नेपदवनताग्रा नासिका, महहजुसुनिविष्टदन्तमास्यम्, आयाम बिस्तारोपपन्ना लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, लक्षणं युक्तोपचयमूष्मोपपन्नं रक्तं तालु, महानदीनः १. ' कृते ' इति पा ० । २. ' प्रमाणातिरिक्तम् ' इति पा ० । ३. ' प्रकृतियुक्ता पाटलवर्णा ' इति पा ० ।
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जातिसूत्रीयशारीराध्यायः 1 शारीरस्थानम् ६५५ स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्थो घोरः स्वरः, नातिस्थूलौ नातिकृशौ विस्तारोपपन्नावास्य-प्रच्छादनौ रक्तावोष्ठौ महत्यौ हनू, वृत्ता नातिमहती ग्रीवा, व्यूढमुपचितमुरः, गूढं जत्रु पृष्ठवंशश्च विप्रकृष्टान्तरौ स्तनौ, असंपातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपरिपूर्णायतौ बाहू सथिनी अङ्गुलयश्च महदुपचितं पाणिपादं स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गाः कूर्माकाराः करजाः, प्रदक्षिणावर्ता सोत्सङ्गा च नाभिः, उरविभागहीना समा समुपचितमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमांसौ नात्युन्नतौ नात्यवनतौ स्फिचौ, अनुपूर्वं वृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्यु-पचिते नात्यपचिते गीपदे प्रगूढसिरास्थिसन्धी जङ्के, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फौ, पूर्वोपदिष्टगुणौ पादौ कूर्माकारौ, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषगुह्यानि तथा स्वप्रजागर-णायासस्मितरुदितस्तनग्रहणानि यच्च किञ्चिदन्यदप्यनुक्तमस्ति तदपि सर्व प्रकृतिसंपन्न -मिष्टं, विपरीतं पुनरनिष्टम् । इति दीर्घायुर्लक्षणानि ॥ ५१ ॥
दीर्घायु बालक के लक्षण - नाम करण कर देने के बाद बालक का आयु - प्रमाण जानने के लिए बालक की परीक्षा करना प्रारम्भ करें । आयुष्मान् कुमारों के ये लक्षण ( निम्ननिर्दिष्ट ) होते है । जैसे— बाल — अच्छे होते हैं ( जिससे दीर्घायु होना सम्भावित होता है ) जो एक - एक, अलग - अलग निकले हों, मृदु हों, अल्प हों, स्निग्ध हों, जिनका मूल दृढ़ हो और काले हों । त्वचा - स्थिर और मोटी अच्छी होती है । शिर - वह श्रेष्ठ होता है जो स्वाभाविक आकृति से युक्त हो, पर कुछ प्रमाण से बड़ा हो किन्तु देह के अनुसार ही बड़ा हो, ( इतना बड़ा न हो कि देखने में बुरा लगता हो ) और छाता के सदृश चढ़ाव उतार वाला हो । ललाट-- वह श्रेष्ठ होता है जो चौड़ा, दृढ़, समसुभिक्त हो, शंखास्थि की सन्धियाँ सुष्टि, ( इतनी दृढ़ और सटी हों जिसमें अलग न प्रतीत होनी हों ) ऊर्ध्वव्यञ्जन ( ललाट में उर्ध्वाकार रेखायें उभरी हुई हों ) से युक्त हो, मांसल हो, ललाट में वलि हो, ( जब भ्रू संकोच करें तब पड़ी रेखा सदृश प्रतीत हो ) और अर्द्ध चन्द्राकार हो । कान - दोनों कान स्थूल, बड़े, सनतल पृष्ठ वाले, समान रूप से नीचे की ओर बढ़े हुए, पीछे से आगे की ओर झुके हुए, जिसमें कर्ण पुत्रिका का बन्धन दृढ़ हो; और सटे हुए हों । जिनका कर्णगह्वर का छिद्र बड़ा होता है वे कान उत्तम होते हैं । - कुछ नीचे की ओर लटकी हुई आपस में दोनों भौंहें मिली हुई न हों, दोनों भौहें समसुगठित और लम्बायमान हों तो उत्तम मानी जाती है । नेत्र- दोनों नेत्र समान हो ( पहला बड़ा और दूसरा छोटा न हो ) दृष्टि - मण्डल नेत्र गोलक में समभाव से स्थित हो, नेत्र में कृष्णमण्डल, श्वेतमण्डल, दृष्टिमण्डल का विभाग स्पष्ट रूप से विभक्त हो, बलवान् हो ( थोड़ा देखने से थकने वाला न हो ), तेज से युक्त हो नेत्र के अङ्ग वर्त्म, पक्ष्म आदि और अपाङ्ग भाग सुन्दर हों तो प्रशस्त नेत्र माने जाते हैं । नाक - नासिका सरल, लम्बे - लम्बे श्वास प्रश्वास लेने वाली, नासावंश सुन्दर सम सुविभक्त, नासावंश का अग्रभाग कुछ झुका हुआ हो तो वह नाक उत्तम मानी जाती है । 1 मुख - मुख बड़ा हो, सीधा और जिसमें सुन्दरता के साथ दाँन लगे हों ( देखने में दाँत कुरूप न हों ) तो मुख उत्तम होता है । जीभ - जो जीभ उचित रूप में लम्बी चौड़ी हो, चिकनी हो, पतली हो, अपनी प्रकृति और वर्ण से युक्त हो वह उत्तम होती है ।
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३५६ तालु -- चिकना, उचित रूप में रक्तवर्ण की तालु का होना उत्तम है । चरकसंहिता मांसल ( न ज्यादा उठी न ज्यादा गहरी ) उष्मा युक्त और स्वर - महान, दीनता से शून्य ( क्षीण न हो ) स्निग्ध, ( कर्कश न हो ) प्रतिध्वनियुक्त, गम्भीर निकलने वाला और धीरतायुक्त स्वर का होना उत्तम है । ओष्ठ - अधिक मोटा न होना, अत्यन्त पतला न होना, आयाम विस्तार ओठ का उचित रूप में होना, मुख गहर को पूर्ण रूप में आच्छादन करने वाला, और ओठों का रक्तवर्ण का होना उत्तमता का द्योतक है । हनु - दोनों हनु का बड़ा होना उत्तम है । ग्रीवा - गरदन गोली हो किन्तु बहुत लम्बी न हो वह उत्तम है 1 उर- छाती विस्तृत और मांस पेशियों से भरी हुई होना उत्तम है । जब और पृष्ठवंश का मांस पेशियों से ढका रहना उत्तम है । स्तन - दोनों का दूर दूर रहना उत्तम है । पार्श्व --- जिसके दोनों पादर्व अंश भाग स्थूल मांसल होकर क्रमश: पतले और स्थिर होते हैं वे श्रेष्ठ हैं । बाहु, पैर और अङ्गुलियाँ - जिसके दोनों हाथ, दोनों पैर और अङ्गुलियाँ गोली, मांस से परिपूर्ण और लम्बी हो तो वे श्रेष्ठ होते हैं । हाथ पैर -पाद और हाथ ( करतल भाग ) का बड़ा एवं मांसल होना उत्तम है । नख - स्थिर, गोलाकार, चिकने, ताम्रवर्ण के लाल, ऊँचे उठे हुए, और कछुए की खोपड़ी की तरह चढ़ाव उतार युक्त नख का होना उत्तम है । नाभी - दक्षिण पार्श्व से आवर्त ( घेरा ) बना हो, और उत्सङ्ग ( किनारे का भाग उठा हो और मध्य में गहरा हो ) तो वह नाभि उत्तम है । कटी - छाती की अपेक्षा कटी भाग तृतीयांश कम हो, समतल हो, उचित रूप से मांसपेशियों से आच्छादित रहना कटिप्रदेश की उत्तमता का द्योतक है । स्किच- दोनों नितम्बों का गोला होना, स्थिर होना, मांसपेशियों से भरा हुआ होना, और न ज्यादा ऊँचा होना, न ज्यादा धँसा हुआ होना श्रेष्ठ होता है । ऊरु - दोनों ऊरु ( जानु का उपरी भाग ) का क्रमशः गोला और मांसल होना श्रेष्ठ हैं । जङ्घा हरिण के - पैर के समान हो, न मांसपेशियों से अधिक आच्छादित हो जिससे अधिक स्थूल हो गया हो, न हलकी मांसपेशियों से आच्छादित हो जिससे कृश प्रतीत होता है । और जिस जंबे में सिरा, अस्थि और सन्धियाँ गृह हो ( अर्थात् पुष्ट मांसपेशियों से आच्छादित होने के कारण छिपी हुई हो ) वह जङ्घा उत्तम होता है । शुल्क- न मांसपेशियों से अधिक भरा हो, न कम पेशियों से आच्छादित हो जिससे कृश न हो, वह गुल्फ श्रेष्ठ होना है । पाद का उपरिभाग - पहले बताए हुए लक्षणों के साथ कूर्माकार पैर के उपरिभाग का होना श्रेष्ठ है । वान, मूत्र, पुरीप, शयन, जागना, परिश्रम, मुस्कराना, रोना, स्तन से दूध पीना आदि-जिस बालक के स्वाभाविक अवस्था में होते हैं वह बालक उत्तम होता है और जो कुछ अन्य भाव जो यहाँ नहीं कहा गया और वह बालक के लिए स्वाभाविक रूप से हितकारी है तो उन सर्वो का स्वाभाविक रूप में होना उत्तम होता है । जो विपरीत ( यहाँ नहीं कहा गया ) है वह सभी वस्तु
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जाति सूत्रीयशारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् ६५७-अनिष्ट है अर्थात् हितकारित्वेन ग्रहण उसका नहीं होता । इस प्रकार दीर्घायु बालक का लक्षण बता दिया गया है ॥ ५१ ॥
अतो धात्री परीक्षामुपदेच्यामः । अथ ब्रूयात् - धात्रीमानय समानव यौवनस्थां निभृतामनातुरामव्यङ्गामव्यसनामविरूपामजुगुप्सितां देशजातीयामतुद्रामक्षुद्रकर्मिणीं कुले जातां वत्सलामरोगां जीवद्वत्सां पुंवत्सां दोग्ध्रीमप्रमत्तामनुच्चारशायिनीमनन्त्यावसा-यिनीं कुशलोपचारां शुचिमशुचिद्वेषिणीं स्तनस्तन्यसंपदुपेतामिति ॥ ५२ ॥
धात्री परीक्षा - अब इसके बाद धात्री ( Wet Nurse ) की परीक्षा का उपदेश किया जा रहा है । वैद्य धाय को लाने को कहे, जो धाय बालक के समान वर्ण ( जाति ) की हो ( ब्राह्मण वर्ण के बालक के लिए ब्राह्मण वर्ण की धाय, क्षत्रिय के लिए क्षत्रिया वैश्य के लिए वैश्या, शूद्र के लिए शूद्रा और अन्त्यज वर्ण के लिए अन्त्यजा धाय श्रेष्ठ होती है ) युवती हो, विश्वासपात्र हो, रोगरहित हो,. हीन अङ्ग या अधिक अङ्गवाली न हो, दुर्व्यमनों से युक्त न हो, कुरूप न हो, निन्दित स्वभाव या वेश वाली न हो, जिस देश का बालक हो उसी देश की हो, क्षुद्र न हो, क्षुद्र कार्य करने वाली न हो, उत्तम कुल में उत्पन्न हो, वालक पर स्नेह रखती हो, जिसका वालक जीता हो, जिसकी सन्तान पुरुष हो, जिसमें दूध पूर्णमात्रा में हो, मतवाली न हो, जो अधिक शयन न करती हो, बालक के मल, मूत्र परही शयन जोन करती हो, अर्थात् सर्वदा सावधान और जागरूक हो और मल - मूत्र का त्याग करते ही बालक को उससे दूर कर सफाई शीघ्र कर देने वाली हो, धर्म और आचरण से पतित न हो, बालक की सेवा करने में कुशल हो, पवित्र रहती हो, अपवित्र एवं गन्दे वस्तुओं से द्वेष करने वाली हो, जिसके स्तन और दूध दोनों अपने शुभ गुणों से युक्त हों तो वह धात्री श्रेष्ठ होती है अतः इसी प्रकार की धात्री लाओ ऐसा बालक के पिता, माता एवं हितैषी बन्धुओं से वैद्य कहे ॥ ५२ ॥
विमर्श - माता का ही दूध पीना बालक के लिए हितकर होता है, जैसा कि - ' मातुरेव पिवेत्स्तन्यं तत्परं देहवृद्धये । स्तन्यधात्र्यावुभे कार्ये तदसम्पदि वत्सले । ' पर विभिन्न परिस्थितिवश माता का दूध यदि न मिल सके तो ऐसी दशा में धाय रखी जाती है । सुश्रुत ने धाय का लक्षण कुछ-कुछ भिन्न बताया है — ' ततो यथावर्ण धात्रीमुपेयान्मध्यमप्रमाणां मध्यमवयस्कामगेगां शीलवतीम-चपलामलोलुपामकृशामस्थूलां, प्रसन्नक्षीरामलम्बौष्ठीमलम्बोर्ध्वस्तनीमव्यङ्गामव्यसनिनीं जीवद्वत्सां, द्रोग्ध्री, वत्सलामक्षुद्रकर्मिणां कुले जातामतो भूमिश्च गुणैरन्विता श्यामामारोग्य वलवृद्धये बालस्य ॥ ’ ( सु. शा. अ. १० ) उपर्युक्त गद्य में Wet Nursing का बड़ा ही विशद एवं मनोवैज्ञानिक वर्णन है । तत्रेयं स्तनसंपत् - नात्यूर्ध्वो नातिलम्बावनतिकृशावनतिपीनौ युक्त पिप्पलको सुखप्रपानौ चेति ( स्तन संपत् ) ॥ ५३ ॥
स्तन की उत्तमता - यहाँ यह स्तनसम्पत् है । स्तन अधिक ऊर्ध्व न हों, अधिक लम्बे न हों, अधिक कृश ( मांस रहित ) न हों, अधिक मोटे न हों और स्तन में स्तनचुचूक उचित रूप से कुछ ऊँचा उठा हुआ हो, एवं ऐसा स्तनचुचूक हो कि बालक अपने मुख में लगा कर सुखपूर्वक दूध पी सके । ऐसे स्तन उत्तम माने जाते हैं । इस प्रकार यह स्तनसंपत् ( उत्तमता ) कह दिया गया || विमर्श - सुश्रुत ने स्तन की उत्तमता न रहने से हानियाँ भी बताई हैं जैसे- ' तत्रोर्ध्वस्तनी करालं कुर्यात्, लम्बस्तनी नासिकामुखं छादयित्वा मरणमापादयेत । ' ( शा. अ. १० ) कराल अर्थात् बड़े - बड़े दांत वाला पुत्र को कर देती है अष्टांगसंग्रह में भी - ' पीनोऽतिकन्धरास्तम्भं कुर्यादूर्ध्वाक्ष-मूर्ध्वगः । उच्छ्वासरोधान लम्बोऽतिस्तनो जीवित संशयम् ॥ ' १. ' अविजुगुप्सामजुगुप्सिताम् ' इति पा ० ।
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६५८ चरकसंहिता स्तन्यसंपत्तु प्रकृतिवर्णगन्धरसस्पर्शम्, उदपात्रे च दुह्यमानमुदकं व्येति प्रकृतिभू-तत्वात् तत् पुष्टिकरमारोग्यकरं चेति ( स्तन्यसंपत् ) ॥ ५४ ॥
दूध की श्रेष्ठता - जिस दूध का वर्णे, गन्ध रस एवं स्पर्श प्रकृत रूप में हो, जो दूध जलयुक्त पात्र में दूहा जाय और वह दूध जल में मिल जाय तो वह उत्तम होने के कारण पुष्टिकर एवं आरोग्यकर होता है । यही दूध की सम्पत् ( उत्तमता ) है ॥ ५४ ॥
विमर्श - आधुनिक दृष्टिकोण से स्त्री के शुद्ध दूध में प्रोटीन १० %, वसा २०८ %, शर्करा ५० %, लवण • २४ % और जल ८ ९.८६ % पाया जाता है । सुश्रुत ने शुद्ध दूध की परीक्षा निम्न रूप में बताई है -- ' अथास्याः स्तन्यमप्सु परीक्षेत, तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्सु न्यस्त-मैकीभावं गच्छत्यफेनिलमतन्तुमन्नोत्प्लवते, न सीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात् । ' ( शा. अ. १० ) अतोऽन्यथा व्यापन्नं ज्ञेयम् । तस्य विशेषाः - श्यावारुणवर्ण कषायानुरसं विशद-मनालच्यगन्धं रूक्षं द्रवं फेनिलं लध्वतृप्तिकरं कर्शनं वातविकाराणां कर्तृ वातोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयं; कृष्णनीलपीतताम्रावभासं तिक्ताम्लकटुकानुरसं कुणपरुधिरगन्धि भृशोष्णं पित्तविकाराणां कर्तृ च पित्तोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम्, अत्यर्थशुक्कुमतिमाधुर्योपपन्नं लवणा-नुरसं घृततैलवसामजगन्धि पिच्छिलं तन्तुमदुदकपात्रेऽवसीदच्छ्लेष्मविकाराणां कर्तृ श्लेष्मोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् ॥ ५५ ॥
अशुद्ध दूध के लक्षण - ऊपर बताये हुए लक्षणों से भिन्न लक्षण वाला दूध विकृत समझना चाहिए । उसका यह भेद होता है १. बात से विकृत दूध का लक्षण - दूध श्याव या लाल वर्ग का हो, कषाय अनुरस हो ( पीने के अन्त में कषाय प्रतीत हो ) विशद हो, उसमें किसी भी गन्ध का परिज्ञान न हो, रूक्ष हो, अधिक पतला हो, फेनयुक्त हो, लघु हो, जिसके पीने से तृप्ति न हो, जो पीने पर बालक को कृश करता हो, सम्पूर्ण वात विकारों को उत्पन्न करने वाला हो ऐसे दूध को बात से दुष्ट समझना चाहिए । पित्तदुष्ट – जो दूध काला, नीला, पीला, ताम्र वर्ण का हो, जिसका अनुरस तिक्त, अम्ल और कटु हो, जिसमें सड़े मुर्दे की तरह और रक्त की तरह गन्ध आती है, अधिक गर्म हो और पित्तजन्य विकारों को उत्पन्न करने वाला हो, उस दूध को पित्त से दूषित जानना चाहिए । कफदुष्ट - जो अत्यन्त श्वेत हो, अत्यन्त मधुर हो, जिसका अनुरस लवण हो, जिसमें घृत, तैल, वसा, मज्जा की गन्ध आती हो, जो पिच्छिल हो, तन्तुयुक्त हो, जो जलयुक्त पात्र में छोड़ने पर नीचे बैठ जाय और जो कफजन्य विकार को उत्पन्न करने वाला हो, उसे कफ से दुष्ट जानना चाहिए ॥ ५५ ॥
तेषां तु त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं यथादोषं च वमन-विरेचनास्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रशमनाय भवन्ति । पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यवगोधूमशालिषष्टिकमुद्गह रेणुककुलत्थसुरासौवीर कमैरेय मेदकलशुनकरञ्जप्रायः स्यात् । तीरदोषविशेषांश्रावेदयावेच्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात् । पाठामहौषध सुरदारु-मुस्तमूर्वागुडूचीवत्सकफलकिराततिक्तककटुकरोहिणीसारिवाकपायाणां च पानं प्रशस्यते, तथाऽन्येषां तिक्तकषायकटुकमधुराणीं द्रव्याणां प्रयोगः क्षीरविकारविशेषानभिसमीच्य
मात्रां कालं च । इति क्षीरविशोधनानि ॥ ५६ ॥
क्षीरदोष की चिकित्सा - • उपर्युक्त तीनों प्रकार के दूध के दोषों के प्रत्येक भेद का विचार करके जिस दोष से जो दूध दुष्ट हो उस दोष की चिकित्सा विचार कर वमन, विरेचन, आस्थापन, १. ' क्षीरमिति ज्ञेयम् ' इति पा ० । २. ' तिक्तकषायकटुकप्रायाणाम् ' इति पा ० ।
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जाति सूत्रीयशारीराध्याय: ८ ] शारीरस्थानम् -६५६ अनुवासन इनका विभाग कर अर्थात् जिम धात्री के लिए दोषानुकूल जो उपयुक्त हो उसका विचार कर चिकित्सा करने से उसकी शान्ति होती है । दुष्ट दूध वाली धात्री का पान और आहार के लिए जौ, गेहूँ, शालि ( चावल ), साठी का चावल, मूँग, हरेणु ( मटर ), कुल्थी, सुरा, सौवीर, मैरेय, मेदक ( यह सब मंदिरा के भेद हैं ), लशुन और करंज देना चाहिए । इस खान - पान को दोषानुकूल दूषित दूध का विचार कर प्रयोग करना चाहिए । पाठा, सोंठ, देवदार, नागरमोथा मूर्वा, गुड़ची, इन्द्रयव, चिरायता, कुटकी और सारिवा इन द्रव्यों का काथ पान कराना चाहिए । तथा इससे अन्य द्रव्य जो तिक्त, कषाय, कटु और मधुर रस वाले हैं उनका भी प्रयोग करना चाहिए । पर दूध के विकार - विशेष को अर्थात् वात या पित्त या कफ से दूषित है इस बात को विचार कर और किस स्त्री के लिए किस मात्रा में प्रयोग करना चाहिए और किस औषध को किस काल में प्रयोग करना चाहिए इसका भी विचार कर लेना चाहिए ॥ ५६ ॥
क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवज्र्ज्यानि, ग्राम्यानूपौदकानि च शाकधान्यमांसानि द्रवमधुराम्ललवणभूयिष्ठाश्चाहाराः, श्रीरिण्यचौपचयः, क्षीरपानमनायासश्व, वीरष्टि-कशाली सुवालिकादर्भ कुशकाशगुन्द्रेत्कटमूलकपायाणां च पानमिति ( क्षीरजननानि ) ॥५७ ॥
दुग्धोत्पादक द्रव्य – सींधु नामक मदिरा को छोड़ कर जितनी मदिरा होती हैं वे सभी दुग्धोत्पादक होती हैं । ग्राम्य, आनून और औदक शाक, धान्य और मांस, दूध को उत्पन्न करने हैं और प्रायः द्रव, मधुर, अम्ल, लवण आहार एवं दूध वाली औषधियाँ ( जिन द्रव्यों में दूध की मात्रा अधिक होती है जैसे - क्षीरविदारी ), दूध का पीना, परिश्रम न करना सामान्यतः ये सभी दूध उत्पन्न करने वाली हैं विशेष कर वीरण ( रूस ), साठी का चावल, धान का चावल, ईख, इक्षु-वालिका, दर्भ, कुश, कास, गुनरा ( गोनरख ), इत्कट ( सुगन्धि तृण, हरद्वारी तृण ) इन औषवि
द्रयों के मूल का क्वाथ बना कर पिलाना चाहिए । इससे दुग्धोत्पत्ति होती है ॥ ५७ ॥
विमर्श -- काश्यप संहिता में दुग्धोत्पत्ति के लिए कुछ भिन्न बातों का वर्णन किया गया है । पर उनका चरक से ही मिलता - जुलता सिद्धान्त है, यथा- ' शोधनाद्वा स्वभावाद्वा यस्याः क्षीरं विशुध्यति । तस्याः क्षीरप्रजनने प्रयतेत विचक्षणः ॥ मधुराण्यन्नपानानि द्रवाणि लवणानि च । मद्यानि सीधुवर्ज्यानि शाकं सिद्धार्थका दृते ॥ वाराहमा हिषादूर्ध्वं मांसान्नान्यरसो हितः । लशुनानां पाण्डूनां सेवनं शयनं सुखम् ॥ क्रोधाध्वभयशोकानामायासानाञ्च वर्जनम् । आज - कल जिनका दूध बढ़ाने के लिए अधिक प्रयोग होता है उन द्रव्यों का प्रयोग योगरत्नाकर में वर्णन किया गया है । जैसे- ' भूमिकुष्माण्डमूलस्य क्षीरपिष्टस्य वा रसम् । पिबेत् सशर्करं तस्याः क्षीरं बहु विवर्धते ॥ शतावरी क्षीरपिष्टा पीता स्तन्यविवर्धिनी । वनकार्पासकेक्षूणां मूलं सौवीरकेण वा ॥ विदारिकन्दं सुरया, पिबेद् वा स्तन्यवर्धनम् । ' धात्री तु यदा स्वादुबहुलशुद्धदुग्धा स्यात्तदा स्नातानुलिप्ता शुक्लत्रस्त्रं परिधायैन्द्री ब्राह्मीं शतवीर्या सहस्रवीर्याममोघामव्यथां शिवामरिष्टां दाट्यपुष्पीं विष्वक्सेनकान्त वा वित्योषधिं कुमारं प्राङ्मुखं प्रथमं दक्षिणं स्तनं पाययेत् । इति धात्रीकर्म ॥ ५८ ॥
धात्रीकर्म - जब धात्री अधिक मधुर और शुद्ध दूध वाली मिल जाय तो दूध पिलाने के पूर्व स्नान कर ले अपने शरीर एवं स्तन मण्डल पर चन्दन का लेप कर ले और सफेद धुला हुआ वस्त्र धारण कर ऐन्द्री ( दिव्य औषधि ), ब्राह्मी, शतवीर्या ( नील दूब ), सहस्रवीर्या ( सफेद दूब ), अमोघा ( पाटला ), अव्यथा ( गुडूची ), शिवा ( हरें ), अरिष्टा, बाट्यपुष्पी ( महावला ), विश्व-१. ' विष्वक्सेनकान्तामिति विभ्रत्योषधीः ' इति पा ० ।
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६६० चरकसंहिता क्सेनकान्ता ( वाराही कन्द ) इन दस औषधियों को या जो उपलब्ध हो सकें उन औषधियों को धारण कर पूर्व मुख बैठकर बालक को पहले दक्षिण स्तन का दूध पिलावें । इस प्रकार धात्रीकर्म बताया गया है ॥ ५८ ॥
अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यास्यामः - वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं रम्यमत-मस्कं निवातं प्रवातैकदेशं दृढमपगतश्वापदपशुदंष्ट्रिमूषिकपतङ्गं सुविभक्तसलिलोलूखल-मूत्रवर्चः स्थान स्नानभूमिमहान समृतुसुखं यथर्तुशयनासनास्तरणसंपन्नं कुर्यात्; तथा सुविहितरक्षाविधानबलिमङ्गलहोमप्रायश्चित्तं शुचिवृद्ध वैद्यानुरक्तजन संपूर्णम् । इति कुमारागारविधिः ॥ ५ ९ ॥ कुमारागार - वर्णन ( Pediatric Ward ) 1- अब इसके बाद वालक के रहने वाले घर की विधि का व्याख्यान करेंगे । जो वास्तुविद्या में कुशल ( Engineer ) पुरुष, श्रेष्ठ, सुन्दर, अन्धकार-रहित अर्थात् जिसमें सूर्य की किरणें प्रवेश करती हों, निवात ( तेज हवा बालक के शरीर में लगने योग्य न हो ) पर एक स्थान में प्रवात ( प्रचुर वायु का प्रवेश हो ), ऐसा दृढ़ और जहाँ कुत्ता या अन्य हिंसक पशु, मच्छर, चूहा, पतंग ( टिड्डी या फतिंगी ) न जा सकें । जहाँ अलग - अलग विभागपूर्वक जल का स्थान, ऊखल रखने का स्थान, मूत्रालय, शौचालय, स्नाना-गार और रसोई घर अलग - अलग । प्रत्येक ऋतु में सुखकारी और ऋतु के अनुसार जहाँ शयन, आसन, विस्तरा रक्खा हो, ऐसा बालक के रहने के लिए घर बनावे और उस घर में विधि-पूर्वक रक्षाविधान, बलि, मङ्गल, होम प्रायश्चित्त हो चुका हो ऐसे कुमारागार में पवित्र, वृद्ध, वैद्य और प्रेम करने वाले हितैषी व्यक्तियों से भरा होना चाहिए । इस प्रकार कुमारागार विधि बताई गई है ॥ ५ ९ ॥ शयनासनास्तरणप्रावरणानि कुमारस्य मृदुलघुशुचिसुगन्धीनि स्युः स्वेदमलजन्तु-मन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः असति संभवेऽन्येषां तान्येव च सुप्रक्षालितो -पधानानि सुधूपितानि शुद्धशुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः ॥ ६० ॥
बालक के योग्य शयनादि - • कुमार की शय्या, आसन, विछौना, प्रावरण ( ओढ़ने का वस्त्र या पहनने का वस्त्र ), मृदु, लघु, पवित्र अर्थात् स्वच्छ और सुगन्धित होने चाहिए, जिस शयन, आसन, विस्तरा, ओढना आदि में पसीना सूख गया हो, गन्दा और जिसमें मल - मूत्र लग गया हो उसे बालक के व्यवहार में नहीं लाना चाहिए । ऐसे दूषित गन्दे वस्त्र को त्याग कर नूतन वस्त्र बालक के कार्य में लाना चाहिए । पर यदि परिस्थितिवश नूतन वस्त्रों का प्रबन्ध न हो सके तो उन्हीं वस्त्रों को अच्छी प्रकार धोकर सुखा लें और उसमें धूपन द्रव्यों का धूप लगायें और सूख जाने पर बालक के कार्य में लावे ॥ ६० ॥
विमर्श - गन्दे वस्त्र के प्रयोग से बालक को Contagious Disease होने का भय रहता है-विशेषकर चर्मरोग | अतएव जहाँ तक सम्भव हो तो शुद्ध वस्त्र का प्रयोग करना चाहिए । धूपनानि पुनर्वाससां शयनास्तरणप्रावरणानां च यवसर्षपातसीहिङ्गुगुग्गुलुवचा-चोरकवयःस्थागोलोमोजटिलापलङ्कषाशोकरोहिणीसर्पनिर्मोकाणि घृतयुक्तानि स्युः ॥ ६१ ॥
धूपन द्रव्य - कपड़े शय्या, विस्तरें और ओढ़ने के वस्त्रों को जौ, सरिसों, तीसी, हींग, गुग्गुलु, वचा, चोरपुष्पी, वयस्था ( ब्राह्मी ), गोलोमी ( इवेत दूब ), जटामांसी, पलङ्कषा ( सामान्य गुगुल ), अशोक, कुटुकी, सांप की केचुल इन द्रव्यों का चूर्ण बनाकर घृत मिलाकर धूपित करना चाहिए ॥ ६१ ॥
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जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६६१ विमर्श - उपर्युक्त द्रव्यों का Fumigation के लिए प्रयोग किया जाता है । इनसे संक्रामक रोगों के कीटाणुओं की मरने की संभावना रहती हैं । मणयश्च धारणीयाः कुमारस्य खड्गरुरुगवयवृषभाणां जीवतामेव दक्षिणेभ्यो विषाणे-ग्राणि गृहीतानि स्युः; ऐन्द्रयाद्याश्वोषधयो जीवकर्षभकौ च यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः प्रशंसेयुरथर्ववेदविदः ॥ ६२ ॥
धारणीय मणियां- — बालकों को मणियाँ धारण करानी चाहिए । जीते हुए गेड़ा, हरिण, नील गाय, सांड़ इनमें किसी एक का या सभी के दाहिने सींग के अग्रभाग को लेकर बालक को धारण कराना चाहिए । तथा ऐन्द्री आदि औषधियों और जीवक, ऋषभक को धारण कराना चाहिए | इन औषधियों के अतिरिक्त और जिन - जिन औषधियों का धारण करना अथर्ववेद के ज्ञाता ब्राह्मण ( पण्डित ) बतावें उन सभी औषधियों को धारण करावें ॥। ६२ ॥ विमर्श - मणियां अनेक प्रकार की होती हैं, ग्रह के अनुसार उसको धारण कराया जाता है । इसका वर्णन रसरत्नसमुच्चय में किया गया है यथा- ' माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमाणि, तार्क्ष्य च पुष्पं भिदुरं च नीलम् । गोमेदकं चाथ विदूरकं च क्रमेण रत्नानि नवग्रहाणाम् ॥ ' क्रीडनकानि खलु कुमारस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाणि चागुरूणि चातीच्णा-ग्राणि चानास्यप्रवेशीनि चाप्राणहराणि चावित्रासनानि स्युः ॥ ६३ ॥
बालकों के लिए खिलौने [ Entertainment of the Babies ] - शिशु के लिए खिलौने अनेक प्रकार के होने चाहिए । कुछ शब्द करने वाले, देखने में मनोहर, हल्के, जिसका अग्रभाग तेज न हों, जो मुख के अन्दर प्रवेश न कर सकें । ऐसे खिलौने न हों जो मृत्यु के कारण हों और जो बालक को भय उत्पन्न करने वाले हों, इस तरह अनेक प्रकार के खिलौने बालक को देने चाहिए ॥ ६३ ॥
* न ह्यस्य वित्रासनं साधु । तस्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र विधेयतामगच्छति राक्षसपिशाचपूतनाद्यानां नामान्याह्वयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥ ६४ ॥
बालकों में भय उत्पन्न करना उचित नहीं है ( Avoid Fear Psycosis ) यदि बालक रोता हो या भोजन न करता हो या और किसी आज्ञा का पालन न करता हो तो राक्षस, पिशाच, पूतना आदि ग्रहों का नाम लेकर पुकारते हुए कुमार को डराना नहीं चाहिए ॥ ६४ ॥
विमर्श - डर का प्रादुर्भाव वचपन से ही हो गया तो बच्चे के व्यक्तित्व ( Personality ) को ' बढ़ने का सम्भवतः पूरा अवकाश न मिले । यदि त्वातुर्यं किञ्चित् कुमारमागच्छेत् तत् प्रकृतिनिमित्त पूर्वरूपलिङ्गो पश्यविशेषै-स्वतोऽनुबुध्य सर्वविशेषानातुरौषधदेशकालाश्रयानवेक्षमाणश्चिकित्सितुमारभेतैनं मधुर-मृदुलघु सुरभिशीतशङ्करं कर्म प्रवर्तयन् । एवंसात्म्या हि कुमारा भवन्ति । तथा ते शर्म लभन्ते चिराय । अरोगे त्वरोगवृत्तमातिष्ठेद्देशकालात्मगुणविपर्ययेण वर्तमानः क्रमेणा-साम्यानि परिवत्र्योपयुञ्जानः सर्वाण्यहितानि वर्जयेत् । तथा बलवर्णशरीरायुषां संपद-मवाप्नोतीति ॥ ६५ ॥
बालकों के रोग का चिकित्सा - सिद्धान्त - यदि संयोगवश बालक को कोई रोग हो जाय तो बालक की प्रकृति या रोग की प्रकृति, दूष्य, निमित्त ( रोग का कारण ), पूर्वरूप, रूप, उपशय इन रोग परीक्षात्मक विधियों से रोग का निश्चय कर सभी विशेषताओं को ध्यान में रखते ६१ च ० सं ०