चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1051–1060

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1051–1060

पृष्ठ 1051

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६६२ चरकसंहिता हुए, आतुर ( रोगी ), औषध, देश, काल, रोग का आश्रय ( देश, स्थान ) आदि को देखते हुए चिकित्सा प्रारम्भ करे । बालकों की चिकित्सा में मधुर, मृदु, लघु, सुरभि ( सुगन्धि ), शीत और आनन्ददायक कर्म करते हुए बालकों की चिकित्सा प्रारम्भ करे । बालक मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीतात्मक द्रव्यों से सात्म्य रखने वाला होता है । इस प्रकार के द्रव्यों से चिकित्सा करने पर बहुत शीघ्र ही बालक स्वस्थ और कल्याणयुक्त हो जाता है । यदि बालक स्वस्थ है तो देश, काल और अपने गुण ( प्रकृति ) के विपरीत आहार - विहार का सेवन करते हुए स्वस्थ वृत्त का पालन करावें । यदि मधुरादि द्रव्यों से विपरीत द्रव्यों का सात्म्य बालक को हो गया हो तो भी वह अहितकर होता है । अतः इसे असात्म्य कहा जाता है । उस असात्म्य को क्रमशः त्याग करते हुए सात्म्य मधुरादि द्रव्यों का सेवन करते हुए सभी अहितकर आहार - विहार का त्याग करे । इस प्रकार असात्म्य आहार - विहार को क्रमशः छोड़ कर सात्म्य आहार - विहार का क्रमशः सेवन करने वाला बालक बल, वर्ण, शरीर और आयु की श्रेष्ठता को प्राप्त करता है । ६५ ॥ विमर्श - विस्तार से काश्यपसंहिता के वेदनाध्याय में बाल रोगों के ज्ञान करने का उपाय बताया गया है, जैसे- ' बालकानामवचसां विविधा देहवेदनाः । प्रादुर्भूताः कथं वैद्यो जानीया-लक्षणार्थतः ॥ ' इस प्रश्न के उत्तर में काश्यप ने बताया है-' भृशं शिरः स्पन्दयति निमीलयति चक्षुषी । अवकूजत्यरतिमानस्वप्नश्च शिरोरुजि || कर्णौ स्पृशति हस्ताभ्यां शिरो भ्रमयते भृशम् । अरत्यरोचकास्त्रमैर्जानीयात् कर्णवेदनाम् || लालास्रवण-मत्यर्थं स्तनद्वेषारतिव्यथाः । पीतमुद्रिरतिक्षीरं नासाश्वासी मुखामये ॥ पीतमुद्गिरति स्तन्यं विष्टभिश्लेष्म-सेवनम् । ईषज्ज्वरोऽरुचिग्लानिः कण्ठवेदनयाऽर्दिते । लालास्रावोऽरुचिग्लानिः कपोले श्वयथुर्व्यथा | मुखस्य विवृतत्वं च जानीयादधिजिह्विकाम् ॥ ज्वरारुचिमुखस्रावा निष्टनेच गलग्रहे । कण्डु ( ण्ठ ) के श्वयथुः कण्ठे ज्वरारुचिशिरोरुजः ॥ मुहुर्नमयतेऽङ्गानि जृम्भते कासते मुहुः । धात्रीमालीयतेऽकस्मात् स्तन्यं ( नम् ) नात्यभिनन्दति ॥ प्रस्रावोष्णत्ववैवर्ण्य ललाटस्यातितप्तता । अरुचिः पादयोः शैत्यं ज्वरे स्युः पूर्ववेदनाः ॥ देहवैवर्ण्यमरतिर्मुखग्लानिरनिद्रता । वातकर्मनिवृत्तिश्चेत्यतीसाराग्र-वेदनाः । स्तनं व्युदस्यते रौति चोत्तानश्चावभज्यते । उदरस्तब्धता शैत्यं मुखस्वेदश्च शूलिनः ॥ अनिमित्तमभीक्ष्णं च यस्योद्वारः प्रवर्तते । निद्राजृम्भापरीतस्य छर्दिस्तस्योपजायते ॥ निष्टनत्युरसाऽ-त्युष्णं श्वासस्तस्योपजायते । अकस्मान्मारुतोद्वारः कृशे हिक्का प्रवर्तते ॥ स्तनं पिबति चात्यर्थं न च तृषि ( o ) ति रोदिति । शुष्कोष्ठतालुस्तोयेप्सुर्दुर्बलस्तृष्णयाऽर्दितः ॥ विशालस्तब्धनयनः पर्वभेदारति-कुमी । संरुद्धमूत्रानिलविट् शिशुरानाहवेदनी ॥ अकस्मादट्टहसनमपस्माराय कल्पते । प्रलापारति-वैचित्यैरुन्मादं चोपलक्षयेत् ॥ रोमहर्षोऽङ्गहर्षश्च मूत्रकाले च वेदना । मूत्रकृच्छ्रे दशत्योष्ठौ बस्ति स्पृशति पाणिना | गौरवं बद्धता जाढ्यमकस्मान्मूत्रनिर्गमः । प्रमेहे मक्षिकाका ( क्रा ) न्तं मूत्रं श्वेतं घनं तथा । बद्धपक्कपुरीषत्वं सरक्तं वा कृशात्मनः । गुदनिष्पीडनं कण्डूं तोदं चार्शसि लक्षयेत् ॥ सशर्करातिमूत्रत्वं मूत्रकाले च वेदना । प्रततं रोदिति क्षामस्तं ब्रूयादश्मरीगदम् ॥ रक्तमण्डलकोत्प-तिस्तृष्णा दाहो ज्वरोऽरतिः । स्वादुशीतोपशायित्वं विसर्पस्याग्रवेदनाः ॥ दह्यन्तेऽङ्गानि सूच्यन्ते भज्यन्ते निष्टनत्यति । विसूचिकायां बालानां हृदि शूलं च वर्धते ॥ शिरो न धारयति यो भिद्यते जृम्भते मुहुः । स्तनं पिबति नात्यर्थं ग्रथितं छर्दयत्यपि ॥ विषादाध्मानारुचिभिर्विद्यादलसकं शिशोः । विसूचिकालसकयोर्दुर्ज्ञाने लक्षणौषधे ॥ दृष्टिव्याकुलता तोदशोथशूलाश्रुरक्तताः । सुप्तस्य चोपलिप्यन्ते चक्षुषी चक्षुरामये । घर्षंत्यङ्गानि शयने रोदितीच्छति मर्दनम् । शुष्ककण्डवर्दितं विद्यात्ततश्चार्द्रा प्रवर्तते ॥ सुखायते मृद्यमानं मृद्यमानं च शूयते । शूनं स्रवति सस्योढा ( १ ) मार्द्रायां शूलदाहवत् ॥ स्तैमित्यमरुचिनिंद्रा गात्रपाण्डुकताऽरतिः । रमणाशनशय्यादीन् धात्रीं च द्वेष्टि नित्यशः ॥ अस्त्रातः

पृष्ठ 1052

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जाति सूत्रीयशारीराध्यायः 1 शारीरस्थानम् स्नातरूपश्च स्नातश्चास्नातदर्शनः । आमस्यैतानि रूपाणि विद्याद्वैद्यो भविष्यतः ॥ नाभ्यां समन्ततः शोथः श्वेनाक्षिनखवक्रता । पाण्डुरोगेऽग्निसादश्च श्वयथुश्चाक्षिकूटयोः ॥ पीतचक्षुर्नखमुखविण्मूत्रः । कामलार्दितः । उभयत्र निरुत्साहो नष्टाग्निरुधिरस्पृहः ॥ मूर्च्छा प्रजागरच्छर्दिधात्रीद्वेषारतिभ्रमैः । वित्रासोद्वेगतृष्णाभिर्विद्याद्वाले मदात्ययम् || मुहुर्मुखेनोच्छ्वसिति पीत्वा पीत्वा स्तनं तु यः । स्रवतो नासिके चास्य ललाटं चाभितप्यते ॥ स्रोतांस्यभीक्ष्णं स्पृशति पीनसे क्षौति कासते । उरोघाते तथैव स्यान्निष्टनत्युरसाऽधिकम् || स्वस्थवृत्तपरो बालो न शेते तु यदा निशि । रक्तबिन्दुचिताङ्गश्च विद्यात्तं जन्तुकार्दितम् । इस प्रकार निज रोगों के ज्ञान का साधन बताया गया है । यद्यपि वयस्थ मनुष्यों में जो - जो रोग होते हैं वे प्रायः सभी बालकों में पाये जाते हैं किन्तु विशेषकर उपर्युक्त रोग ही बालकों में पाये जाते हैं । जैसा कि स्वयं काश्यप ने ही कहा है: - ' इत्येता विविधाः प्रोक्ता वेदना बाल-देहजाः । प्रायोद्भवानां रोगाणां काश्यपेन महर्षिणा || इसके अतिरिक्त आगन्तु कारणों में ग्रहबाधाजन्य रोग भी बालक को होते हैं जिसके कारण अग्रांकित ' असज्जनेन संसर्ग याति संभोजनं तथा । मृतापत्यावकीर्णीभिः परवृद्धयसहिष्णुभिः ॥ अमङ्गलानि घोराणि पश्यत्याचरतेऽपि च । सेवते विपरीतानि मृत्युं चोदयते शिशुः ॥ ' ग्रहबाधा के विशेष लक्षग बालकों में इस प्रकार पाये जाते हैं, यथा - ' रोदित्यकस्माद्धसति-च्छायाशीलविपर्ययः । अल्पा शितोऽतिविण्मूत्रस्त्वविण्मूत्रविपर्यये ॥ भविष्यतां निमित्तानि ग्रहाणां वेदनाश्च ताः । न शिरो धारयति स क्षिपत्यङ्गानि दुर्बल: || श्वासाध्मानपरीताभ्यामन्तवच्चोपल-क्ष्यते । विनोद मानो वहुधा विनोदं नाभिनन्दति ॥ तृट्प्रमीलकनिद्रार्त्तः कूजत्यपि कपोतवत् । ” ग्रहों का विशेष वर्णन सुश्रुत उत्तरतंत्र में और रावणकृत कुमारतंत्र में देखना चाहिए । वहाँ विस्तार से लक्षण और चिकित्सा बताई गई है । इस प्रकार बालकों के रोग का ज्ञान

करना चाहिए ।

एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थकौशलागमनाच्चानुपालयेत् ॥ ६६ ॥

युवावस्था तक अवश्य पालनीय कर्म - इस प्रकार कुमार को युवावस्था प्राप्ति तक ( सोलह वर्ष तक ) धर्म और अर्थ की कुशलता प्राप्त हो सके ऐसे नियमों का पालन कराते हुए उसकी रक्षा करे ॥ ६६ ॥

इति पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातम् । तदाचरन् यथोक्तैर्विधिभिः पूजां यथेष्टं लभतेऽनसूयक इति ॥ ६७ ॥

नियम पालन का फल - इस प्रकार पुत्र की शुभकामना के लिए बालक की सभी प्रकार के समृद्धिकर कार्यों की व्याख्या कर दी गयी है । उसका यथोक्त विधिपूर्वक आचरण करता हुआ, दूसरे के गुणों में दोष का आरोप न करने वाला अपने मन के अनुकूल उत्तम पूजा - प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ६७ ॥

विमर्श - उपर्युक्त गद्य में बालक के भावी जीवन के लिए कर्त्तव्य बताये हैं । यह भी आजकल Social Medicine का ही भाग माना जा रहा है 1

तत्र श्लोकौ -* पुत्राशिषां कर्म समृद्धिकारकं यदुक्तमेतन्महदर्थसंहितम् ।

तदाचरन् ज्ञो विधिभिर्यथातथं पूजां यथेष्टं लभतेऽनसूयकः ॥ ६८ ॥

पृष्ठ 1053

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६६४ चरकसंहिता अध्याय उपसंहार अर्थों ( प्रयोजनों ) के साथ बहुत श्रेष्ठ यह पुत्र की शुभकामनाओं का समृद्धिकारक कर्म कहा गया है । उसका नियम पूर्वक आचरण करने वाला दूसरे की निन्दा न करने वाला विद्वान् पुरुष अपनी इच्छा के अनुसार उत्तम प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ॥ ६८ ॥

* शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसंपदा । सर्वभावैर्यतस्तस्माच्छारीरं स्थानमुच्यते ॥ ६ ९ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने जाति-सूत्रीयं शारीरं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

इति शारीरस्थानं संपूर्णम् ॥ ४ ॥

शारीर स्थान की निरुक्ति - सभी सभ्य उपायों द्वारा देवसम्पत् ( परमात्मा आदि ) मनुष्यसम्पत् ( पुरुषार्थ ) इन दोनों सम्पदों से सभी प्राणिमात्र शरीर की चिन्ता ( विचार ) करते हैं अतः इस स्थान का नाम शारीर स्थान रखा गया है ॥ ६ ९ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के शारीर स्थान में जातिसूत्रीय शारीर नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥

इस प्रकार शारीरस्थान समाप्त हुआ ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1054

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इन्द्रियस्थानम् अथ प्रथमोऽध्यायः अथातो वर्णस्वरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेय ॥ २ ॥

अब दर्शस्वय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - शारीरस्थान के जातिसूत्रीय अध्याय में बालकों की दीर्घायुपरीक्षा का लक्षण बताया गया है । अरिष्ट के द्वारा भी आयु का ज्ञान किया जाता है अतः आयु परीक्षार्थ इन्द्रियस्थान का वर्णन किया गया है । या आगे चिकित्सास्थान का वर्णन किया जायगा । चिकित्सा साध्य रोगों की होती है न कि असाध्य रोगों की । अतः साध्यासाध्य - निर्णयार्थ इन्द्रियस्थान का वर्णन किया जाता है । इन्द्रिय शब्द का अर्थ - ' इन्द्रः प्राणस्तस्य लिङ्गमिन्द्रियम् । ' या ' इन्द्रोऽन्तरात्मा तस्य लिङ्गमिन्द्रियं रिष्टम् ' जीवात्मा या प्राण का लिङ्ग ( बोधक ) मृत्यु ही होती है, मृत्यु होने पर जब आत्मा शरीर से अलग हो जाती है तब शरीर निष्क्रिय हो जाता है अतः आत्मा की सत्ता अलग माननी पड़ती है । रिष्ट और अरिष्ट पर्यायवाचक शब्द हैं अतः ' इन्द्रियस्य रिष्टस्य स्थानमिन्द्रिय-स्थानमिति ' और ' नियतमरणख्यापकं लिङ्गमरिष्टम् ' जिसके द्वारा निश्चित मरण का ज्ञान हो उसे अरिष्ट कहा जाता है । जैसा कि सुश्रुत ने बताया है - ' फलाग्निजलवृष्टीनां पुष्पधूमाम्बुदा यथा । ख्यापयन्ति भविष्यत्त्वं तथा रिष्टानि पञ्चताम् ॥ तानि सौक्ष्म्यात् प्रमादाद्वा तथैवाशु व्यतिक्रमात् । गृह्यन्ते नोद्गतान्यज्ञैर्मुमूर्षोर्न त्वसंभवात् ॥ ध्रुवं तु मरणं रिष्टे ब्राह्मणैस्तत् किलामलैः । रसायनतपो-जप्यतत्परैर्वा निवार्यते ॥ नक्षत्रपीडा बहुधा यथाकालं विपच्यते । तथैवारिष्टपाकं च ब्रुवते बहवो जनाः ॥ असिद्धिमाप्नुयाल्लोके प्रतिकुर्वन् गतायुषः । अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिषक् ॥ ( सु. सू. अ. २८ ) इस स्थान में मृत्युसूचक वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श आदि की विकृतियों का उल्लेख किया जायगा । इनमें वर्ण और स्वर की विकृति अन्य विकृतियों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट होती हैं अतः सर्वप्रथम वर्णस्वरीय अध्याय का प्रारम्भ किया गया है इन्द्रियस्थान का महत्त्व चिकित्सा में Prognosis की दृष्टि से सर्वविदित है । इह खलु वर्णश्च स्वरश्च गन्धश्च रसश्च स्पर्शश्च चतुश्च श्रोत्रंच घ्राणंच रसनंच स्पर्शनं च सत्त्वं च भक्तिश्च शौचं च शीलं चाचारश्च स्मृतिश्चाकृतिश्च प्रकृतिश्च विकृतिश्च बलं च ग्लानिश्च मेधा च हर्षश्च रौक्ष्यं च स्नेहश्च तन्द्रा चारम्भश्व गौरवं च लाघवं च गुणाश्चा-हारश्च विहारश्चाहारपरिणामश्चोपायश्चापायश्च व्याधिश्व व्याधिपूर्वरूपं च वेदनाश्वोपद्रवाश्च च्छाया च प्रतिच्छाया च स्वप्नदर्शनं च दूताधिकारश्च पथि चौत्पातिकं चातुरकुले भावाव-स्थान्तराणि च भेषजसंवृत्तिश्च भेषजविकारयुक्तिश्चेति परीचयाणि प्रत्यक्षानुमानोपदेशै-रायुषः प्रमाणावशेषं जिज्ञासमानेन भिषजा ॥ ३ ॥

१. ' भेषजं च भेषजप्रवृत्तिश्च भेषजाधिकारे युक्तिश्च ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1055

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६६६ चरकसंहिता ( १ ) इन्द्रियस्थान विषयक सामान्यचर्चा ( General Consideration Regarding Prognosis ) इन्द्रियस्थान में वक्तव्य विषयों की सूची - इस स्थान में वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श, चक्षु, श्रोत्र ( कान ), घ्राण, रसन, स्पर्शन, ये ५ इन्द्रियाँ, मन, भक्ति ( अभिलाषा ), शौच ( पवित्रता ), शील ( सहज आचरण ), आचार ( आचरण ), स्मरणशक्ति, प्रकृति ( स्वभाव ), विकृति ( शरीर एवं मन की विकृति ), मैधा ( धारणाशक्ति ), बल, ग्लानि ( हर्षाभाव ), आकृति ( शरीर का आकार ), हर्ष ( प्रसन्नता ), रौक्ष्य ( शरीर में रूक्षता का होना ), स्नेह ( चिकनापन ), तन्द्रा ( निद्रा ), आरम्भ ( क्रियायों में प्रवृत्ति या अरिष्टोत्पत्ति का आरम्भ ), गौरव ( धातुओं में गुरुता ), लाघव ( शरीर में हलकापन ), गुण ( शारीरिक गुण मृदु, तीक्ष्ण, शीत, उष्ण आदि ), आहार ( चतुर्विध आहार ), विहार ( घूमना, फिरना, बैठना, शयन आदि ), आहार- परिणाम ( खाये हुए आहार का पाचन ), उपाय ( रोगों का संकर होना ), अपाय ( रोगनिवृत्ति ), व्याधि, व्याधिपूर्वरूप, वेदना, उपद्रव ( रोगों का ), छाया, प्रतिच्छाया स्वप्न देखना, दूताधिकार, मार्ग में औत्पनिक वस्तुओं का देखना, रोगी के घर की विभिन्न वस्तुओं को विभिन्न अवस्था में देखना, भेषजसंवृत्ति ( औषध का प्रभाव ), भेषजविकारयुक्ति ( औषधों का योग किस रोग में किस प्रकार करना चाहिए ), इन परीक्षा करने योग्य विषयों की परीक्षा आयु के प्रमाण विशेष जानने की इच्छा रखने वाले वैद्य को प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तोपदेश से करनी चाहिए ॥ ३ ॥

विमर्श - यहाँ इन्द्रियों के विषय और इन्द्रिय दोनों का वर्णन किया गया है । यद्यत्रि इन्द्रिय कहने से विषयों का बोध स्वत: हो जाता है तथापि इन्द्रियाँ सभी अतीन्द्रिय होती हैं उनमें होने वाले लक्षण भी अव्यक्त होते हैं अतः जो इन्द्रिय - विषय व्यक्त हैं उनका वर्णन पृथक् और पहले किया गया है, उनमें भी जो अधिक व्यक्त हैं उनका पहले और जो क्रमशः अल्प व्यक्त हैं उनका बाद में वर्णन किया है । यहाँ सभी वर्णादि शब्द असमस्त पढ़े गए हैं; जिससे यह स्पष्ट है कि वर्ण, स्वर आदि के अलग - अलग रिष्ट होते हैं, यदि समस्त रूप में सभी पढ़े गए होते तो वर्णादि का समुदाय निश्चितरिष्टसूचक होता । वर्णं शब्द से ग्लानि, हर्ष, रौक्ष्य और स्नेह का ग्रहण होता है, यथा — ' वर्णग्रहणेन ग्लानिहर्षरौक्ष्य स्नेहा व्याख्याताः । ' ( इन्द्रिय. अ. १ - १३ ) । स्वर से स्वराभाव का भी ग्रहण किया जाता है । इसी प्रकार गन्धाभाव और रसाभाव का भी अरिष्ट में ग्रहण किया जाता है । स्पर्श स्निग्ध, रूक्ष के ज्ञान के साथ मृदु एवं कठिन का भी ग्रहण किया जाता है । चक्षु आदि के अरिष्ट के कहने का तात्पर्य नेत्र आदि अधिष्ठान से जानना चाहिए । यद्यपि भक्ति, शील आदि मन के ही विकार है, मन के ही ग्रहण से इनका ग्रहण हो जाना चाहिए; जैसे, ' भक्तिः शीलं शौचं द्वेषः स्मृतिर्मोहस्त्यागोऽमात्सर्यं भयं क्रोवस्तन्द्रोत्साहस्तैक्ष्ण्यं मार्दवं गाम्भीर्यमनवस्थितत्वमित्येवमादयः सत्त्वविकारा: । ' ( शा. अ. ३ ) । तथापि इन भक्ति आदि का स्वतन्त्र रिष्ट होता है यह समझाने के लिए मन से पृथक् भक्ति आदि का वर्णन किया गया है । उपर्युक्त संस्कृत गद्य में आये हुए अरिष्ट - विषयों के निम्नलिखित उदाहरणों का संग्रह किया जा रहा है । तन्द्रा ( निद्रा ) - ' हीयतेऽसुक्षये निद्रा नित्या भवति वा न वा । ' ( च. इ. अ. ११-२४ ) आरम्भ – ‘ श्वयथुर्यंस्य कुक्षिस्थो हस्तपादं विसर्पति । ज्ञातिसङ्कं स संक्लेश्य तेन रोगेण हन्यते ॥ ( च. इ. अ. ६-१२ )

पृष्ठ 1056

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वर्णस्वरीयेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रस्थानम् गौरव - ' निष्ठयूतं च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति । ( च. इ. अ. ९ -१८ ) ६६७ लाघव ( क्षय ) - क्षयं मांसानि गच्छन्ति गच्छत्य सृगपि क्षयम्! ' ( च. इ. १२-५० ) गुण - ' गुणाः शरीरदेशानां शीतोष्णमृदुदारुणाः । विपर्यासेन लक्ष्यन्ते स्थानेष्वन्येषु तद्विधाः ॥ ' ( च. इ. अ. १२ - ५४ ) आहार - ' आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम् । यः फलं तस्य नाप्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ' ( च. इ. अ. १२-८ ) आहार - परिणाम - ' दुर्बलो बहु भुङ्क्ते यो प्रागभुक्त्वाऽन्नमातुरः । अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्त-थैव सः ॥ ' ( च. इ. अ. ७-२२ ) उपाय - ( संकर ) अनेक व्याधियों का लक्षण एकत्र उपस्थित होना जैसे - ' सहसा ज्वरसन्ताप-स्तृष्णा मूर्च्छा बलक्षयः । विश्लेषणं च सन्धीनां मुमूर्षोरुपजायते ॥ ( च. इ. अ. ८–२३ ) अपाय -'व्याध्यपगमनमपाय: ' व्याधिका छूट जाना अपाय कहा जाता है । जैसे, ' यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति । संशयप्राप्तमात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ ' ( च. इ. अ. ९ -१५ ) व्याधि - ' वाताष्ठीला सुसंवृत्ता तिष्टन्ती दारुगा हृदि । तृष्णयाऽभिपरीतस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ' ( च. इ. अ. १०-४ ) व्याधि - पूर्वरूप – ' पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया । यं विशन्ति विशत्येनं मृत्युर्ज्वरपुरःस्सरः ॥ ( त्र. इ. अ. ५-४ ) । ' अन्यस्यापि च रोगस्य पूर्वरूपाणि यं नरम् । विशन्त्यनेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ' ( च. इ. अ. ५-५ ) वेदना - ' विजानाति न चेद् दुःखं न स रोगाद्विमुच्यते । ( च. इ. अ. ८-१९ ) छाया -- ' वायवी तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा । ' ( च इ. अ. ७-१३ ) प्रतिच्छाया - ' छिन्ना भिन्नाकुलाच्छाया हीना वाऽप्यधिकापि वा । नष्टा तन्त्री द्विधाच्छिन्ना विकृता विशिरा च या । एताश्चान्याश्च याः काश्चित् प्रतिच्छाया विगर्हिताः ॥ ' ( च. इ. अ. ७।५-६ ) स्वप्नदर्शन- ' हिरण्य लाभः कलह: स्वप्ने बन्धपराजयौ इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् । ' ( च. इ. अ. ५ ) दूताधिकार - ' आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम् । दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम् ॥ ( च. इ. अ. १२-१८ ) पथि चौत्पातिक – ' पथच्छेदो विडालेन शुना सर्पेण वा पुनः । मृगद्विजानां............... इत्यौत्पातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम् ॥ ' ( च. इ. अ. १२ - २ ९ - ३१ ) आतुरकुले भावावस्थान्तराणि - ' अग्निपूर्णानि पात्राणि भिन्नानि विशिखानि च । भिषङ्मुमूर्षतां वेश्म प्रविशन्नेव पश्यति ॥ ' ( च. इ. अ. १२-३४ ) भेषजसंवृत्ति - ' यमुद्दिश्यातुरं वैद्यः संवर्तयितुमौषधम् । यतमानो न शक्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ' ( च. इ. अ. १२-६ ) भेषजविकारयुक्ति - ' विज्ञातं बहुशः सिद्धं विधिवच्चावचारितम् । न सिध्यत्यौषधं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ ' ( च. इ. अ. १२-७ ) इस प्रकार इन उपर्युक्त भावों की परीक्षा प्रत्यक्ष अनुमान और आप्तोपदेश से करनी चाहिए । तत्र तु खल्वेषां परीक्ष्याणां कानिचित् पुरुषमनाश्रितानि कानिचिच्च पुरुषसंश्रयाणि । तत्र यानि पुरुषमनाश्रितानि तान्युपदेशतो युक्तितश्च परीक्षेत, पुरुषसंश्रयाणि पुनः प्रकृतितो विकृतितश्च ॥ ४ ॥

प्रकृति विकृति से परीक्षा इन परीक्ष्य भावों में कुछ भाव पुरुषों में आश्रित नहीं होते, और कुछ भाव पुरुषों में आश्रित रहते हैं । इनमें जो भाव पुरुषों में आश्रित नहीं होते उनकी

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६६८ चरकसंहिता परीक्षा उपदेश ( आप्तोपदेश ) और युक्ति से करनी चाहिए । जो भाव पुरुषों में आश्रित रहते हैं उनकी परीक्षा प्रकृति से और विकृति से करनी चाहिए ॥ ४ ॥

विमर्श - पुरुषों में न रहने वाले भाव जैसे -- दूत के अधीन अरिष्ट ज्ञान, रास्ते में अशुभसूचक उत्पातों का दर्शन, आतुर के गृह में खाट का उत्तान रखे रहना, अग्नि का घर से बाहर निकलना, माङ्गलिक वस्तुओं का घर से बाहर निकलना आदि हैं । पुरुष में रहने वाले भाव जैसे छाया, प्रभा, वर्ण, स्वर, स्पर्श आदि भाव हैं । उपदेश का आप्तोपदेश अर्थ है । युक्ति का तात्पर्य अनुमान प्रमाण से है । उपदेश जैसे- ' आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम् । दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम् ॥ ' ( च. इ. अ. १२ १ ९ ) युक्ति जैसे- ' अत्यन्तरसिकं कार्यं भजन्ते नीलमक्षिकाः । " यदि शरीर पर अधिक मक्खियाँ बैठे तो अनुमान किया जाता है कि इसके शरीर में रस की अधिकता हो गई अतः इसका मृत्युकाल उपस्थित हो गया है । पुरुष में आश्रित भावों की परीक्षा प्रकृति एवं विकृति ज्ञान के द्वारा की जाती है । * तत्र प्रकृतिर्जातिप्रसक्ता च, कुलप्रसक्ता च, देशीनुपातिनी च कालानुपातिनी च, वयो s नुपातिनी च प्रत्यात्मनियता चेति । जातिकुलदेशकालवयः प्रत्यात्मनियता हि तेषां तेषां पुरुषाणां ते ते भावविशेषा भवन्ति ॥ ५ ॥

प्रकृति - इनमें प्रकृति १. जानिप्रसक्ता, २. कुलप्रसक्ता, ३. देशानुपातिनी, ४. कालानुपातिनी, ५. वयोऽनुपातिनी, ६. प्रत्यात्मनियता, इन ६ भेदों वाली होती हैं । उन उन पुरुषों के वे वे वर्णं स्वरादि भाव जाति, कुल, देश, काल, वय और प्रत्यात्मनियत ( प्रतिपुरुष में रहने वाली प्रकृति ) से विभिन्न पाए जाते हैं ॥ ५ ॥

विमर्श - किसी भी व्यक्ति की प्रकृति में उपर्युक्त भावों का प्रभाव पड़ता ही है । उन भावों की तुलना आधुनिक दृष्टि से इस प्रकार हो सकती हैं - जाति ( Race ), कुल ( Family Disposi. tion ), देश ( Land, & Patient ), काल ( Season ), वय ( Age ), प्रत्यात्मनियता ( Personal Habit ) * विकृतिः पुनर्लक्षणनिमित्ता च, लक्ष्यनिमित्ता च निमित्तानुरूपा च ॥ ६ ॥

विकृति - १. लक्षणनिमित्ता, २. लक्ष्यनिमित्ता, ३. निमित्तानुरूपा, यह तीन प्रकार की विकृति होती है ॥ ६ ॥

* तत्र लक्षणनिमित्ता नाम सा यस्याः शरीरे लक्षणान्येव हेतुभूतानि भवन्ति देवात्; लक्षणानि हि कानिचिच्छरीरोपनिबद्धानि भवन्ति, यानि हि तस्मिंस्तस्मिन् काले तत्राधि-ष्ठानमासाद्य तां तां विकृतिमुत्पादयन्ति ॥ ( १ ) ॥ ( १ ) लक्षणनिमित्ता - इनमें लक्षगनिमित्ता विकृति वह है जिसमें शरीर में पूर्वजन्मकृत कर्म के अनुसार कारण के सदृश अरिष्ट लक्षण ही उत्पन्न होते हैं । ये कुछ लक्षण शरीर से सम्बन्धित रहते हैं जो विकृति उत्पादक समय में शरीर के भिन्न - भिन्न प्रदेश में अपना स्थान बनाकर विकृति ( रोग ) उत्पन्न करते है ॥ ( १ ) ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि जो विकृति शरीर में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ही निर्धारित की जाती है उसे लक्षण निमित्त विकृति कहा जाता है । इस प्रकार की विकृति के ज्ञान का कारण लक्षण ही होते हैं । उदाहरण के लिए नख के ऊपर रेखाएँ और कमलपुष्पाकृति लक्षणों का प्रगट होना, राज्य, धन, गमन, बध, बन्धन रूप विकृति होने का सूचक है । ये लक्षण भाग्यवश होते हैं जिसका ज्ञापक सामुद्रिक शास्त्र है । इसी प्रकार अरिष्ट भी लक्षण निमित्त होते हैं । इसमें १. ' दशानुपातिनी ' इति गङ्गाधरसंमतः पाठः ।

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वर्णस्वरीयेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रस्थानम् ६६६ भी भाग्य ही कारण होता है । जब शरीर में लक्षण प्रगट होते हैं तो अरिष्ट का ज्ञान होता है । जैसे – ' भ्रुवोर्वा यदि वा मूर्ध्नि सीमन्तावर्तकान् वहून् । अपूर्वानकृतान् व्यक्तान् दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ त्र्यहमैतेन जीवन्ति लक्षणेनातुरा नराः । अरोगाणां पुनस्त्वेतत् षड्रात्रं परमुच्यते ॥ ' ( च. इ. अ. ८ । ६।७ ) * लक्ष्यनिमित्ता तु सा यस्या उपलभ्यते निमित्तं यथोक्तं निदानेषु ॥ ( २ ) ॥ ( २ ) लक्ष्यनिमित्ता - लक्ष्यनिमित्ता विकृति उसे कहते है जिसका कारण प्राप्त होता है । जैसा कि निदान स्थान में कहा है । ( २ ) ॥ विमर्श - लक्ष्यनिमित्ता विकृति उसे कहते हैं जो सकारण हो, अर्थात् जिसका कारण स्पष्ट हो । जैसे - रूक्ष, लघु, शीत, चञ्चल, विशद, खर वायु का गुण है, ऐसे आहार - विहार से वायु का कोप होता है । उसी प्रकार पित्त एवं कफ का भी ज्ञान करना चाहिए । * निमित्तानुरूपा तु निमित्तार्थानुकारिणी या, तामनिमित्तां निमित्तमायुषः प्रमाणज्ञान-स्येच्छन्ति भिषजो भूयश्चायुषः क्षयनिमित्तां प्रेतलिङ्गानुरूपां, यामायुषोऽन्तर्गतस्यै ज्ञानार्थ-मुपदिशन्ति धीराः । यां चाधिकृत्य पुरुषसंश्रयाणि मुमूर्षतां लक्षणान्युपदेच्यामः । इत्यु-देशः । तं विस्तरेणानुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥

( ३ ) निमित्तानुरूपा जो निमित्त ( हेतु ) के अर्थ ( कार्यजननरूप या कार्य- रोग - बोधन रूप ) को अनुकरण करने वाली हो उस विकृति को निमित्तानुरूपा कहते हैं । यह विकृति रोगोत्पत्ति की निमित्त नहीं होती पर आयु के प्रमाण- ज्ञान में वह निमित्त होती है, ऐसी बात चिकित्सक गण मानते हैं । और आयु के क्षय के कारणभूत, मरणोन्मुख पुरुष के मृत्यु की ज्ञापिका, शरीरान्तर्गत आयु के ज्ञान के लिए जिस विकृति का उपदेश धीर ( विद्वान् ) गण करते हैं और जिस विकृति का आश्रय लेकर मरणोन्मुख पुरुष के शरीर में उत्पन्न होने वाले लक्षणों का उपदेश किया जायगा वे सभी विकृतियाँ संक्षेप में निमित्तानुरूपा विकृति कही जाती हैं । इनकी विस्तृत रूप से व्याख्या आगे के अध्यायों में की जायगी ॥ ७ ॥

विमर्श - जो निमित्त न होते हुए निमित्त के कार्य को करने वाला हो जैसे रूक्षादि वस्तुएँ वात-कोपक होती हैं पर रूक्षादि वस्तुएँ वातशामक होने लगें अर्थात् किसी के शरीर में बात बढ़ा हुआ है और वातशामक औषधों से शान्त नहीं होता है पर यदि वातवर्द्धक रूक्षादि वस्तुओं का सेवन कराया गया तो उससे वात का शमन हो जाता है; इस प्रकार के कारण को निमित्ता-रूपा विकृति कहा जाता है । क्योंकि यहाँ वातशमन के लिए रूक्षादि निमित्त ( हेतु ) नहीं है पर निमित्त के अर्थ ( वातशमन रूप अर्थ ) का अनुकरण करता है । या नियमतः रोगवृत्त या स्वस्थ-वृत्त का पालन करते हुए भी और रोग वृद्धि के कारणों का सेवन नहीं करते हुए भी देव - वश वातादि दोष बढ़ कर उपद्रव उत्पन्न करते हैं । पित्तजन्य विकृति में शीत दुग्ध - घृतादि आहार और शीतल स्थानों में विहार करने पर भी पित्त और तज्जन्य विकृतियाँ बढ़ती जाती हैं, उसे निमित्तानुरूपा विकृति कहते हैं । क्योंकि पित्त के दढ़ने का कारण उष्ण आहार - विहार है पर यहाँ निमित्त उष्ण के अनुरूप ( अनुसार ) शीतल आहार - विहार भी पित्त को विकृत कर तज्जन्य रोग उत्पन्न करते हैं । इस विकृति से मृत्यु की सूचना मिलती है । कफज रोग भी अनिमित्त या अल्प निमित्त से होते हैं । जो कर्मज चिकित्सा १. ' यथोक्तेषु ' इति पा ० । २. ' अन्तर्गतस्य लक्षणलक्ष्याभ्यामविज्ञेयस्य ' इति गङ्गाधर: ' अन्तगतस्य ' इति पा ० ।

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६७७ चरकसंहिता और शान्ति द्वारा शान्त हो जाते हैं । उनमें निमित्तानुरूपा विकृति नहीं होती । पर उत्तम चिकित्सा से जिसमें लाभ न हो उसमें यह विकृति मानी जाती है । तत्रादित एव वर्णाधिकारः । यद्यथा - कृष्णः, श्यामः, श्यामावदातः, अवदातश्चेति प्रकृतिवर्णाः शरीरस्य भवन्ति; यांश्चानुपरापेक्षमाणो विद्यादनूकतोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः ॥ ८ ॥

( २ ) वर्णाधिकार ( Prognosis based on Colour ) प्राकृत वर्ण - सर्वप्रथम वर्ण का अधिकार अर्थात् वर्ण ( रूप ) के आश्रयीभूत, मरणोन्मुख मनुष्यों के शरीरगत वर्ण में होने वाली विकृतियों का वर्णन किया गया है । जैसे – १. कृष्ण ( काले ), २. श्याम ( सांवले ), ३. श्यामावदात ( श्याम गौर ), ४ अवदात ( गौर ) ये चार शरीर के प्राकृत वर्ण हैं । इन वर्षों से अतिरिक्त अन्य जो भी वर्ण इन वर्णों के सदृश हो या वर्ण विशेष को जानने वाले विद्वान् अन्य जिन वर्णों का निर्देश करें उन सभी वर्ण को प्रकृत वर्णं कहा जाता है ॥८ ॥

नीलश्यावताम्रहरितशुक्लाश्च वर्णाः शरीरस्य वैकारिका भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणो विद्यात् प्राविकृतानभूत्वोत्पन्नान् । इति प्रकृतिविकृतिवर्णा भवन्त्युक्ताः शरीरस्य ॥ ९ ॥

वैकारिक वर्ग - १. नील, २. श्याव, ३. ताम्र, ४. हरित और ५. शुक्ल ये शरीर के वर्ण ( रूप ) वैकारिक कहे जाते हैं । इन वर्गों के अतिरिक्त जो वैकृत वर्ण यहाँ नहीं कहे गए हैं जैसे- नील इयाव, नील ताम्र, नील हरित, नील शुक्ल आदि मिश्रित वर्ण, इन्हें भी वैकारिक वर्ण कहा जाता है । प्राग्विकृत अर्थात् शरीर में जो श्याम - गौरादि वर्ण पूर्व में जन्म से हों पर बाद में सहसा वर्ण का परिवर्तन हो जाय उसे भी वैकारिक वर्ग कहा जाता है । ' अभूत्दो -त्पन्नान् ' जो वर्णं पहले शरीर में न हों बाद में उत्पन्न हो जायें उन्हें वैकारिक वर्ण कहा जाता है । इस शरीर के प्रकृति और विकृति के वर्ण की व्याख्या कर दी गयी है ॥ ९ ॥

तत्र प्रकृतिवर्णमर्धशरीरे विकृतिवर्णमर्धशरीरे, द्वावपि वर्णों मर्यादाविभक्तौ दृष्ट्वा यद्येवं सव्यदक्षिणविभागेन, यद्येवं पूर्वपश्चिमविभागेन, यद्युत्तराधरविभागेन, यद्यन्त-र्बहिर्विभागेन, आतुरस्यारिष्टमिति विद्यात्; एवमेव वर्णभेदो मुखेऽप्यन्यत्र वर्तमानो मरणाय भवति ॥ १० ॥

वर्णपरीक्षा - यदि उपर्युक्त प्राकृतिक और वैकृतिक वर्ण आधे शरीर में पाये जाते हैं अर्थात् आधे शरीर में सीमा निर्धारित कर वैकारिक वर्णं हों तो इस प्रकार प्राकृतिक और वैकृतिक दोनों वर्णों का होना अरिष्ट समझा जाता है । आधे शरीर का विभाग वाम अङ्ग और दक्षिण अङ्ग के रूप में, या पूर्व, पश्चिम ( आगे और पीछे ) रूप में, या कटि के ऊपर और कटि के नीचे के रूप में, या आभ्यन्तर ( जैसे मुख, नासिका, कान के भीतरी भाग ) और बाह्य भाग त्वचा के रूप में ग्रहण किया जाता है । इस प्रकार सीमा से विभक्त प्राकृतिक और वैकृतिक वर्ण अरिष्ट होता हैं । इसी प्रकार प्रकृति और विकृति के वर्ण का भेद मुख में या अन्यत्र हाथ - पैर में सीमा से विभक्त प्रतीत हो तो मृत्यु के लिए होता है ॥ १० ॥

वर्णभेदेन ग्लानिहर्षरौचय स्नेहा व्याख्याताः ॥ ११ ॥

१. ' कृष्णश्यामः ' इति पा ० । ३. ' अवेक्ष्यमाणानपि ' इति पा ० । ५. ' मुखस्यान्तर्गत: ' इति पा ० । २. ' अवेक्ष्यमाणानपि ' इति पा ० । ४. ' प्राग्विकृतात् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1060

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वर्णस्वरीयेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रस्थानम् ६७१ औरभी - वर्णभेद की व्याख्या से ही ग्लानि हर्ष, रौक्ष्य और स्नेह की भी व्याख्या कर दी गयी ॥ ११ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार शरीर में सीमा से विभक्त वर्ण मृत्यु - सूचक अरिष्ट होता है उसी प्रकार सीमा से विभक्त ग्लानि, हर्ष और रौक्ष्य स्नेह का होना भी मृत्युसूचक है । तथा पिप्लुब्यङ्गतिलकालकपिडकानामन्यतमस्थानने जन्मातुरस्यैवमेवाप्रशस्तं विद्यात् ॥ मुखगत ---अरिष्ट रोगी के मुख में पिप्लु ( छोटी फुन्सियाँ ), व्यङ्ग, तिलकालक, बड़ी बड़ी फुन्सियों में किसी एक का होना अप्रशस्त अशुभ अरिष्ट होता है ॥ १२ ॥

नखनयनवदनमूत्रपुरीषहस्तपादौष्ठादिष्वपि च वैकारिकोक्तानां वर्णानामन्यतमस्य प्रादुर्भावो हीनबलवर्णेन्द्रियेषु लक्षणमायुषः क्षयस्य भवति ॥ १३ ॥

नखादि - परीक्षा में अरिष्ट - जिस रोगी के बल, वर्ण और इन्द्रियों की शक्ति न्यून हो गयी है उसके नख, नेत्र, मुख, मूत्र, पुरीष ( मल ), हाथ, पैर और ओष्ठ आदि अवयवों में सहसा बताए हुए वैकारिक वर्गों में किसी एक वर्ण की उत्पत्ति हो जाना आयु - क्षय का लक्षण है अर्थात् अरिष्ट है ॥ १३ ॥

यच्चान्यदपि किंचिद्वर्णवैकृतमभूतपूर्व सहसोत्पद्येतानिमित्तमेव हीयमानस्यातुरस्य

शश्वत्, तदरिष्टमिति विद्यात् । इति वर्णाधिकारः ॥ १४ ॥

और भी - ऊपर बतार हुए प्राकृतिक और वैकृतिक वर्णों के अतिरिक्त जो कोई भी वर्ण रोगी के शरीर में पहले न हो, वह वर्ण यदि रोगी के बल, मांस आदि के क्षीण होने पर सहसा विना कारण उत्पन्न हो जाय तो वह अरिष्ट है । इस प्रकार वर्णाधिकार समाप्त हुआ || १४ || विमर्श: - यद्यपि अभूतपूर्व वर्ण की उत्पत्ति अरिष्ट है यह बात ११ के गद्य में भी कह आए हैं परन्तु वहाँ प्राकृतिक एवं वैकृतिक इन दोनों वर्गों में ही अभूतपूर्व वर्ण कहा गया है । यहाँ समान्यतः वर्णमात्र का ग्रहण किया गया हैं । * स्वराधिकारस्तु — हंसक्रौञ्चनेमिदुन्दुभिकलविङ्ककाककपोतजर्जरानुकाराः प्रकृतिस्वरा भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणोऽपि विद्यादमूकतोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः । ( ३ ) स्वराधिकार ( Prognosis based on Voice ) स्वराधिकार - प्राकृतिक स्वर हंस, क्रौञ्च पक्षी, नेमि ( रथविषयक शब्द ), दुन्दुभि ( नगारा ), कलविङ्क ( चटक ), काक, कबूतर, झर्झर ( झांझ ) इनके स्वरों के तुल्य स्वर प्राकृतिक स्वर कहे जाते हैं । इनके अतिरिक्त भी जो शब्द यहाँ नहीं कहे गए हैं पर इन स्वरों के तुल्य हैं वे शब्द और इन स्वरों से सर्वथा भिन्न स्वर हैं पर स्वर - विशेषज्ञ विद्वान् उसका निर्देश करते हैं तो वे शब्द भी प्राकृतिक स्वर कहे जाते हैं ॥ * एडेककुलग्रस्ताव्यक्तगद्गदक्षामदीनानुकीर्णास्त्वातुराणां स्वरा वैकारिका भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणोऽपि विद्यात् प्राग्विकृतानभूत्वोत्पन्नान् । इति प्रकृतित्रिकृतिस्वरा व्या-ख्याता भवन्ति ॥ १५ ॥

वैकारिक स्वर - रोगियों के एडक ( भेड़ ), कल ( सूक्ष्म ), ग्रस्त ( सर्वथा अनुच्चारित ), अव्यक्त, गद्गद, क्षाम ( क्षीण ), दीन ( दुःखी की तरह ) अनुकीर्ण ( एक वाक्य के बाद १. ' अवेक्ष्यमाणान् ' इति पा ० । ३. ' अवेक्ष्यमाणानपि ' इति पा ० । २. ' शुकक लग्रहग्रस्ताव्यक्त ' इति पा ० । ४. ' प्राग्विकृतात् ' इति पा ० ।