चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1061–1070

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1061–1070

पृष्ठ 1061

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1061 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

II चरकसंहिता दूसरा वाक्य बोलते रहना, कहीं भी रुकना नहीं ), स्वर वैकारिक कहे जाते है । इन स्वरों के अतिरिक्त स्वर जो यहाँ नहीं कहे गए हैं, पर इन विकृत स्वरों के तुल्य हैं और जो स्वर पहले कभी भी नहीं रहे हों उन सभी स्वरों को विकृत स्वर कहते है । इस प्रकार प्रकृत एवं विकृत की व्याख्या हो गई ॥ १५ ॥

विमर्शः--- यहाँ प्रायः प्राकृतिक और प्रायः वैकारिक होने वाले स्वरों का वर्णन किया गया है । वस्तुत: जो स्वर प्रारम्भ में होते हैं चाहे वे शब्द प्राकृतिक स्वर हों या वैकारिक स्वर हों यदि सहसा उनमें परिवर्तन हो जाय तो वे शब्द वैकारिक कहे जाते हैं और अरिष्ट होते है । तत्र प्रकृतिवैकारिकाणां स्वराणामाश्वभिनिर्वृत्तिः स्वरानेकत्वमेकस्य चानेकत्वम-शतम् । इति स्वराधिकारः ॥ ६६ ॥

स्वरगत अरिष्ट प्राकृतिक स्वरों का वैकारिकस्वर के रूप में भेड़ आदि वैकारिक या हंस, क्रौञ्च आदि प्राकृतिक शब्दों का प्रकार के शब्द का अनेकत्वेन ज्ञान होना अप्रशस्त अर्थात् अरिष्ट स्वराधिकार समाप्त हुआ ॥ १६ ॥

शीघ्र उत्पन्न हो जाना, अनेक एकत्वेन ज्ञान होना या एक माना जाता है । इस प्रकार इति वर्णस्वराधिकारौ यथावदुक्तौ मुमूर्षतां लक्षणज्ञानार्थमिति ॥ १७ ॥

उपसंहार -- मुमूर्षु मनुष्यों के ज्ञान के लिए वर्णाधिकार और स्त्रराधिकार का वर्णन उचित रूप में कर दिया गया है ॥ १७ ॥

भवन्ति चात्र-यस्य वैकारिको वर्णः शरीर उपपद्यते । अर्धे वा यदि वा कृत्स्ने निमित्तं न च नास्ति सः ॥ जिसके शरीर के आधे भाग में अथवा सम्पूर्ण भाग में वैकारिक वर्ण ( रूप ) बिना कारण उपस्थित हो जायँ वह मनुष्य नहीं बचता ॥ १८ ॥

विमर्श: • तात्पर्य यह है कि शरीर के आधे भाग में वैकारिक रूप हो और आधे भाग में प्राकृतिक रूप हो पर वह सीमा विभक्त हो अर्थात् आगे पीछे, कटि से नीचे, कटि से ऊपर, दक्षिण या वाम भाग या मुख भाग में प्राकृतिक और वैकृतिक वर्ण होने पर रोगी की मृत्यु अवश्य हो जाती है । नीलं वा यदि वा श्यावं ताम्रं वा यदि वाऽरुणम् । मुखार्धमन्यथा वर्णो मुखार्धेऽरिष्टमुच्यते ॥ और भी --- यदि मुख का आधा भाग नीला या श्याव या ताम्र या अरुण वर्ण का हो और आधे भाग में इससे भिन्न वर्ण हो या प्राकृतिक वर्ण हो तो उसे अरिष्ट कहा जाता है ॥ १ ९ ॥ हो मुखा सु o यो रौच्यंमर्धमुखे भृशम् । ग्लानिरर्धे तथा हर्षो मुखार्धे प्रेतलक्षणम् ॥ और भी -- यदि मुख के आधे भाग में स्पष्ट रूप से चिकनापन प्रतीत हो और मुख के आधे भाग में अधिक रूक्षता हो या मुख के आधे भाग में ग्लानि ( क्षीणता ) और आधे भाग में हर्ष हो तो यह प्रेत का लक्षण है अर्थात् वह व्यक्ति मृत व्यक्ति के समान हो जाता है ॥ २० ॥

तिलकाः पिप्लवो व्यङ्गा राजयश्च पृथग्विधाः । आतुरस्याशु जायन्ते मुखे प्राणान् मुमुत्ततः ॥ औरभी -- मुमूर्षुप्राणी के मुख पर तिल, पिप्लु ( सूक्ष्म पिडकाएँ ), व्यंग और अनेक प्रकार की रेखाएँ शीघ्र ही उत्पन्न हो जाती हैं । ( तात्पर्य यह है कि जिस मनुष्य के मुख में पहले तिल आदि न हों पर सहसा रोगावस्था में दिखाई पड़े तो रोगी के लिए अरिष्ट है । पर यदि १. ' स्वराणामेकत्वम् ' इति पा ० । २. ' रौक्ष्यमर्धे तथा भृशम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1062

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1062 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वर्णस्वरीयेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् III स्वस्थ पुरुष है और उसके मुख पर सहसा तिल आदि दिखाई पड़े तो वह मृत्युसूचक नहीं होते ) ॥ २१ ॥

पुष्पाणि नखदन्तेषु पङ्को वा दन्तसंश्रितः । चूर्णको वाऽपि दन्तेषु लक्षणं मरणस्य तत् ॥ और भी - यदि रुग्ण व्यक्ति के नख एवं दन्त पर फूल के समान ( श्वेत चिह्न ) दिखाई दें या दाँतों पर कीचड़ के समान क्लेदयुक्त या चूने के सदृश श्वेत पदार्थं प्राप्त हो जायँ तो उसे मृत्यु का लक्षण मानना चाहिए ॥ २२ ॥

ओष्ठयोः पादयोः पाण्योरक्ष्णोर्मूत्रपुरीषयोः । नखेष्वपि च वैवर्ण्यमेतत् क्षीणबलेऽन्तकृत् ॥ और भी - यदि रोगी के बल क्षीण होने पर ओष्ठ, पाद, हस्त तथा नेत्र और मूत्र, पुरीष वा नखों में विवर्णता हो जाय तो मृत्युसूचक लक्षण समझे ॥ २३ ॥

यस्य नीलावुभावोष्ठौ पक्वजाम्बवसन्निभौ । मुमूर्षुरिति तं विद्यान्नरो धीरो गतायुषम् ॥२४ ॥

और भी - जिस रोगी व्यक्ति के दोनों ओष्ठ पके हुए जामुन के फल सदृश नील वर्ण के हों उसे धीर मनुष्य गतायु होने से मृत्यु के मुख में समझे ॥ २४ ॥

विमर्श - ओष्ठ का नीलवर्ण का होना Severe Cynosis का द्योतक है । यह लक्षण जब Respiratory Failure होने लगता है तब उत्पन्न होता है । एको वा यदि वाऽनेको यस्य वैकारिकः स्वरः । सहसोत्पद्यते जन्तोर्हीयमानस्य नास्ति सः ॥ और भी - यदि क्षीण रोगी के सहसा एक या अनेक प्रकार के विकृत स्वर उत्पन्न हों तो मृत्यु सन्निकट समझनी चाहिए ॥ २५ ॥

यच्चान्यदपि किञ्चित् स्याद्वैकृतं स्वरवर्णयोः । बलमांसविहीनस्य तत् सर्वं भैरणोदयम् ॥ और भी -- जिस रोगी का बल एवं मांस क्षीण हो गया हो तथा स्वर और वर्ण में सहसा और दूसरी कोई भी विकृति उत्पन्न हो तो वह मृत्यु का सूचक है ॥ २६ ॥

तत्र श्लोकः-इति वर्णस्वरावुक्तौ लक्षणार्थं मुमूर्षताम् । यस्तो सम्यग्विजानाति नायुर्ज्ञाने स मुह्यति ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने वर्णस्वरीय-मिन्द्रियं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

और भी -- आसन्न मृत्यु को जानने के लिए हमने आयु के संसूचक वर्ण और स्वर ( लक्षण ) कह दिये हैं । जो भी चिकित्सक इन्हें अच्छी प्रकार जानता है वह आयु के ज्ञान में भ्रम को नहीं प्राप्त होता ॥ २७ ॥

इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रियस्थान में वर्णस्वरीय इन्द्रिय नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ॥

१. ' तद्गतायुषः ' इति पा ० । २. ' मरणाय हि ' इति पा ० । ३. ' यस्तु ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1063

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1063 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

II चरकसंहिता अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातः पुष्पितकमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब पुष्पितक इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ पूर्व अध्याय में गंध का वर्णन किया गया है । गन्धपुष्प में भी पाया जाता है । प्राप्त गन्धाश्रय पुष्पित अध्याय प्रारम्भ किया गया है । अतः क्रम पुष्पं यथा पूर्वरूपं फलस्येह भविष्यतः । तथा लिङ्गमरिष्टाख्यं पूर्वरूपं मरिष्यतः ॥ ३ ॥

( १ ) गन्धाधिकार ( पुष्पवत् ) ( Prognosis based on Flower - like Smell ) पुष्प और अरिष्ट में साम्य - जिस प्रकार होने वाले फल का पूर्वरूप फूल होता है, उसी प्रकार मरने वाले मनुष्य के शरीर में अरिष्ट नामक लक्षण पूर्वरूप होता है ॥ ३ ॥

विमर्श – फल के निश्चित आगमन की सूचना फूल से मिलती है, ठीक उसी प्रकार मृत्यु के आगमन की सूचना अरिष्ट के लक्षणों से प्राप्त होती है । सुश्रुत ने भी इसी बात को स्पष्ट किया है । यथा - ' फलाग्निजलवृष्टीनां पुष्पधूमाम्बुदा यथा । ख्यापयन्ति भविष्यत्वं तथा रिष्टानि पञ्चताम् ॥ ' ( सू. अ. २८ ) * अप्येवं तु भवेत् पुष्पं फलेनाननुबन्धि यत् । फलं चापि भवेत् किञ्चिद्यस्य पुष्पं न पूर्वजम् ॥ न वरिष्टस्य जातस्य नाशोऽस्ति मरणाहते । मरणं चापि तन्नास्ति यन्नारिष्टपुरःसरम् || ५ || और भी - किन्तु ऐसे भी बहुत से फूल होते हैं जिनके बाद फल भी नहीं लगता ( जैसे ( चमेली ) तथा ऐसे बहुत से फल भी होते हैं, जिनके पूर्व फूल नहीं आते ( जैसे गूलर ) । पर शरीर में उत्पन्न हुए अरिष्ट का नाश मृत्यु के बिना नहीं होता । तथा ऐसी कोई मृत्यु भी नहीं होती जिसके पूर्व में अरिष्ट लक्षण नहीं होते ॥ ४-५ ॥ विमर्श - आचार्य चक्रपाणि ने ' जातस्य ' का भाव सम्पूर्ण रूप से स्पष्ट किया है अर्थात् पूर्णरूप से उत्पन्न अरिष्ट निश्चित मारक होता है या ' जातस्य ' का तात्पर्य नियत भारक होता है, ऐसा बताया है । अरिष्ट के - १. नियत और २. अनियत दो भेद होते हैं । १. नियत अरिष्ट-' हस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः । मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः ॥ ' ( च. इ. अ. ७ ) २. अनियत अरिष्ट - ' इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् । अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥ ' ( च. इ. अ. ५ ) या ' यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति । संशयप्राप्त-मात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ ' ( च. इ. अ. ९ ) इसी बात का समर्थन सुश्रुत ने भी किया है, यथा - ' ध्रुवं तु मरणं रिष्टे, ब्राह्मणैस्तत् किलामलैः । रसायनतपोजप्यतत्परैर्वा निवार्यते । ' ( सू. अ. २८ ), अरिष्ट के आ जाने पर निश्चित मृत्यु होती है, यह नियत अरिष्ट का सूचक वाक्य है । और ' रसायनतपोजप्यतत्परैरमलैः किल । ब्राह्मणैस्तन्निवार्यते ' यह अनियत सूचक अरिष्ट वाक्य है, वाग्भट ने भी – ' अरिष्टं नास्ति मरणं दृष्टरिष्टं च जीवितम् । अरिष्टरिष्टविज्ञानं न च रिष्टेऽप्य-नैपुणात् । केचित्तु तद्द्द्विधेत्याहुः स्थाय्यस्थायिविभेदतः । दोषाणामपि बाहुल्याद्रिष्टाभासः समुद्भवेत् ॥ सदोषाणां शमे शाम्येत्स्थास्यवश्यं तु मृत्यवे ॥ ' ( सु. शा. ५ ) १. ' जायते ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1064

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1064 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुष्पितकेन्द्रियाध्यायः २ ] इन्द्रस्थान १७५ कुछ आचार्य अरिष्ट आ जाने पर नियत मृत्यु होती है ऐसा मानते हैं । संशय - प्राप्त का तात्पर्य भङ्गयन्तर से मृत्युकारक ही कहते हैं । सुश्रुत भी ' ध्रुवं त्वरिष्टे मरणम् ' बताया है । तपस्या, जप और रसायन प्रयोग से जो अरिष्ट का नाश होता है, वह तो तपस्या आदि की महत्ता है । जैसे शंकर जी ने कामदेव को भस्म कर पुनः जीवन - दान दिया, रामचन्द्र जी ने मृत ब्राह्मण - पुत्र को पुनः जीवित किया, मार्कण्डेय तपस्या के बल से अमर हो गए आदि । कुछ आचार्य अरिष्ट - लक्षण काल - मृत्यु में नियत मारक होता है और अकाल - मृत्यु उपस्थित होने पर उचित चिकित्सा, तपस्या, जप आदि से उसका नाश होता ऐसा मानते हैं । अरिष्ट होते हैं या पर उनका कहना उचित नहीं है क्योंकि कालमृत्यु या अकालमृत्यु में नहीं होते हैं, ऐसा कोई विशेष वचन प्रमाण में नहीं मिलता है । अकालमृत्यु उपस्थित होने पर अपचार जनित व्याधि में चिकित्सा विफलीभूत होती है तब रिष्ट आते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है । इसी लिए कहा गया है, ' क्षणेन हि रिष्टानि प्रादुर्भवन्ति । यदि यह बात न मानी जाय तो नियत आयु वाले पुरुष के अपचारजन्य रोग असाध्यता को कभी भी प्राप्त न होगें । पर अपचार से कुपित दोषों द्वारा उत्पन्न रोग अतिशय प्रमाद से असाध्यावस्था के उत्पादक होते

हैं । अतः कालाकाल के दोनों प्रकार के अरिष्ट होते हैं ।

* मिथ्यादृष्टमरिष्टाभमनरिष्टमजानता । अरिष्टं वाऽप्यसंबुद्धमेतत् प्रज्ञापराधजम् ॥

६ ॥

अरिष्ट में प्रज्ञापराध - अज्ञानी वैद्य, जो वस्तुतः अरिष्ट नहीं है पर अरिष्ट सदृश है उसे यदि अरिष्ट समझ लें तो उनके ज्ञान को मिथ्या समझना चाहिए । अथवा रोगी की मृत्यु हो गई पर अरिष्ट का ज्ञान वैद्य को न हुआ ये दोनों प्रज्ञापराधजन्य ज्ञान हैं; यह समझना चाहिए || ६ || विमर्श - इस श्लोक से भगवान आत्रेय ने स्पष्ट कर दिया है कि नियत और अनियत ये अरिष्ट के भेद नहीं होते । अरिष्ट आ जाने पर मृत्यु न हुई, और अरिष्ट के बिना मृत्यु हो गई ये दोनों ज्ञान भ्रान्त एवं प्रज्ञापराधज हैं । अरिष्ट न होने पर जो अरिष्ट की प्रतीति होती है उसे ही ' अरिष्टाभ ' यहां कहा गया है, जो – ' दोषाणामपि बाहुल्याद्रिष्टाभासः समुद्भवेत् । स दोषाणां शमे शाम्येत् । ' ( अ. ह. शा. ३५ ) इसी रिष्टाभास या अरिष्टाभ को अज्ञानवश कोई अनियत और अस्थायी, अरिष्ट मानते हैं । पर उनका ज्ञान भ्रान्त है । अतः ' नियतमरणख्यापकं लिङ्गमरिष्टम् ' अर्थात् निश्चित मृत्यु को बताने वाले लक्षण को अरिष्ट कहा जाता है, यह अरिष्ट का लक्षण निश्चित किया गया है । * ज्ञानसंबोधनार्थं तु लिङ्गैर्मरणपूर्वजैः । पुष्पितानुपदेच्यामो नरान् बहुविधैर्बहून् ॥ ७ ॥

पुष्पित अरिष्ट: - मृत्यु के पूर्व उत्पन्न होने वाले बहुत प्रकार के लक्षणों द्वारा रिष्टज्ञान को ठीक - ठीक समझने के लिए अरिष्ट गन्ध से युक्त बहुत प्रकार के पुष्पित रूपों का उपदेश किया जाता है ॥ ७ ॥

विमर्श - ' ज्ञायते मरणमनेन इति ज्ञानं रिष्टं तस्य सम्बोधनमिति - ज्ञानसम्बोधनम् ' अर्थात् अरिष्ट को ठीक ठीक समझना । जिस प्रकार फूल लगने पर वृक्ष गन्ध युक्त हो जाते हैं और बाद में फल लगता है, उसी प्रकार मनुष्य के पुष्पित होने पर उसके शरीर से गन्ध निकलने लगता और बाद में फलस्वरूप उसकी मृत्यु हो जाती है । पुष्पित का अर्थं ' पुष्पं सञ्जातमस्य इति पुष्पितः ’ --- जिसमें फूल लग गए हैं । १. ' बहुविधान् बहून् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1065

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1065 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७६ चरकसंहिता

* नानापुष्पोपमो गन्धो यस्य भौति दिवानिशम् । पुष्पितस्य वनस्येव नानाद्रुमलतावतः ॥

तमाहुः पुष्पितं धीरा नरं मरणलक्षणैः । स ना संवत्सराद्देहं जहातीति विनिश्चयः ॥ ९ · एक वर्ष में मृत्युसूचक गन्ध - नाना प्रकार के वृक्ष और लताओं से युक्त फूले हुए जङ्गल ( पुष्पवाटिका ) की तरह जिस पुरुष के शरीर से रात - दिन नाना प्रकार के पुष्पगन्ध के समान गन्ध निकलता रहता है, धीर ( विद्वान् ) पुरुष उस गन्धयुक्त पुरुष को मृत्यु के लक्षणों से युक्त होने के कारण पुष्पित कहते हैं । यह निश्चित है कि वह मनुष्य एक वर्ष के अन्दर इस शरीर को छोड़ देता है अर्थात् मर जाता है ॥ ९ ॥

एवमेकैकशः पुष्पैर्यस्य गन्धः समो भवेत् । इष्टैर्वा यदि वाऽनिष्टैः स च पुष्पित उच्यते ॥ और भी - इसी प्रकार जिस पुरुष के शरीर से एक एक फूल के समान भी सुगन्ध या दुर्गन्ध निकलता है वह पुरुष भी पुष्पित कहा जाता है ॥ १० ॥

समासेनाशुभान् गन्धानेकत्वेनाथवा पुनः । आजिघ्रेद्यस्य गात्रेषु तं विद्यात् पुष्पितं भिषक् । और भी - संक्षेप में जिस पुरुष के शरीर में मिले हुए या अलग अलग अशुभ गन्ध की प्रतीति हो उसे भी पुष्पित कहा जाता है ॥ ११ ॥

विमर्श - पुष्प या अन्य अशुभ गन्ध जैसे सड़न या मल - मूत्र का गंध शरीर में अलग - अलग या एक में मिले हुए अनेक अशुभ गन्धों का सम्मिश्रण प्रतीत हो तो उसे भी पुष्पित कहते हैं ।

आप्लुतानाप्लुते काये यस्य गन्धाः शुभाशुभाः ।

व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते ॥ १२ ॥

और भी -- जिस मनुष्य के शरीर पर गन्ध द्रव्यों का लेप किया जाय या न किया जाय पर शुभ तथा अशुभ गन्धों की प्रतीति विपरीत रूप से बिना कारण ज्ञात हो उसे भी पुष्पित कहा जाता है || * तद्यथा - चन्दनं कुष्ठं तगरागुरुणी मधु । माल्यं मूत्रपुरीषे च मृतानि कुणपानि च ॥ १३ ॥

ये चान्ये विविधात्मानो गन्धा विविधयोनयः । तेऽप्यनेनानुमानेन विज्ञेया विकृतिं गताः ॥ और -भी जैसे चन्दन, कूठ, तगर, अगर, मधु और माला आदि का गन्ध शुभ है । मूत्र-पुरीष ( मल ), मरे हुए गाय बैल आदि पशु की गन्ध, कुणप ( मरे हुए मनुष्य की गन्ध ) अशुभ है । इन गन्धों के अतिरिक्त और दूसरे जो नानाविध योनियों से उत्पन्न शुभ या अशुभ गन्ध हैं, उन्हें भी इसी प्रकार अनुमान से विकृति को प्राप्त हुई समझें ॥। १३-१४ ॥ इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षणं गन्धसंश्रयम् । वच्यामो यदभिज्ञाय भिषङ्मरणमादिशेत् || १५ || अरिष्ट - • यह भी गन्ध - सम्बन्धी अरिष्ट लक्षण अतिदेश के लिए कह रहा हूँ, जिसे अनुक्त समझ कर वैद्य मृत्यु का ज्ञान कर सकता है ॥ १५ ॥

विमर्श - जो कहा जाता है । अभी तक कहा नहीं गया है ऐसे अनुक्त लक्षणों के संग्रह करने को अतिदेश

* वियोनिर्विदुरो गन्धो यस्य गात्रेषु जायते ।

इष्टो वा यदि वाऽनिष्ट न स जीवति तां समाम् ॥ १६ ॥

एतावद्गन्धविज्ञानम् -और भी - जिस मनुष्ष के शरीर से वियोनि ( विना करण ) विदुर ( स्थायी ) शुभ या अशुभ गन्ध निकलती है वह मनुष्य उस पूर्ण वर्ष तक नहीं जीवित रहता । यहाँ तक गन्ध के आश्रित अरिष्ट लक्षणों का वर्णन किया गया है ॥ १६ ॥

२. ' स वै ' इति पा ० । १. ' वाति ' इति पा ० । ३ ' धृतानि ' इति पा ० । ४. ' वित्वरो यस्य गन्धो गात्रेषु ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1066

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1066 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुष्पित केन्द्रियाध्यायः २ ] इन्द्रियस्थानम्

- रसज्ञानमतः परम् ।

आतुराणां शरीरेषु वच्यते विधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥

६७७ ( २ ) रसाधिकार ( Prognosis based on Taste of the Body ) रसगन अरिष्ट - अब गन्धज्ञान के बाद रोगियों के शरीर में अरिष्टज्ञान के लिए विधि पूर्वक रसाश्रयीभूत अरिष्ट लक्षणों को कहा जायगा ॥ १७ ॥

* यो रसः प्रकृतिस्थानां नराणां देहसंभवः । स एषां चरमे काले विकारं भजते द्वयम् ॥१८ ॥

रस - विकृति के दो भेद प्रकृतिस्थ ( स्वस्थ ) मनुष्यों के शरीर में जो रस उत्पन्न होता है वही रस अन्तकाल में ( मृत्यु के समय ) दो प्रकार से विकृति को प्राप्त होता है ॥ १८ ॥

* कश्चिदेवास्यवैरस्यमत्यर्थमुपपद्यते । स्वादुत्वमपरश्चापि विपुलं भजते रसः ॥ १ ९ ॥ और भी - एक विकार वह है जिसमें मुमूर्षु पुरुष का रस अत्यन्त विरस ( अनिष्ट रस ). हो जाता है और दूसरा विकार वह है जिसमें वही रस किसी के शरीर में अत्यन्त मधुर हो जाता है ॥ १ ९ ॥ तमनेनानुमानेन विद्याद्विकृतिमागतम् । मनुष्यो हि मनुष्यस्य कथं रसमवाप्नुयात् ॥२० ॥

रसारिष्ट अनुमानगम्य - एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के शरीरगत रस का प्रत्यक्षीकरण कैसे कर सकता है । ( अर्थात् नहीं कर सकता क्योंकि रसज्ञान जिड़ा के द्वारा होता है और वैद्य रोगी के शरीर को जिड़ा से चाट नहीं सकता ) अतः निम्न निर्दिष्ट अनुमान से विकृति प्राप्त रस का ज्ञान करना चाहिए ॥ २० ॥

मक्षिकाचैव यूकाश्च दंशाश्च मशकैः सह । विरसादपसर्पन्ति जन्तोः कायान्मुमूर्षतः || २१ || विरस के उदाहरण - • मरणोन्मुख मनुष्य का शरीर जब विरस हो जाना है तो उसके शरीर से मच्छरों के साथ मक्षिका, यूका ( जूं, लीख ) दंश ( बर्रे, खटमल आदि काटने वाले जन्तु ) अलग हो जाते है, अर्थात् उसके शरीर पर नहीं बैठते ॥ २१ ॥

* अत्यर्थर सिकं कार्यं कालपक्कस्य मक्षिकाः । अपि स्नातानुलिप्तस्य भृशमायान्ति सर्वशः ॥ स्वादुरस के उदाहरण -- जिसका शरीर काल से पक गया ह ( मृत्युकाल समीप आ गया है ) ऐसे मनुष्य का जब शरीर अत्यन्त मधुर हो जाता है तब यदि उसे स्नान करा कर सुगन्धित चन्दन, केशर आदि का लेप उसके शरीर पर किया जाय तो भी मक्खियाँ सम्पूर्ण शरीर पर लगने लगती हैं ॥ २२ ॥

तत्र श्लोकः-* सामान्येन मयोक्तानि लिङ्गानि रसगन्धयोः । पुष्पितस्य नरस्यैतत्फलं मरणमादिशेत् ॥ stefan तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पुष्पितकमिन्द्रियं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

-G उपसंहार — जो मैंने सामान्य रूप से पुष्पित पुरुष के रस और गन्ध सम्बन्धी अरिष्ट लक्षणों को बताया है उनका फल मृत्यु का ज्ञान करना है, ऐसा समझना चाहिए ॥ २३ ॥

इस प्रकार चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तंत्र ( चरकसंहिता ) के इन्द्रियस्थान में पुष्पितक इन्द्रिय नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ २ ॥

६२ च ० सं ०

पृष्ठ 1067

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1067 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७८ चरकसंहिता अथ तृतीयोऽध्यायः अथातः परिमर्शनीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद परिमर्शनीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ वर्णे स्वरे च गन्धे च रसे चोक्तं पृथक पृथक् । लिङ्गं मुमूर्षतां सम्यक् स्पर्शेष्वपि निबोधत ॥ वर्ण, स्वर, गन्ध और रस के आश्रित अरिष्टों का लक्षण अलग अलग बता दिया गया है । अत्र मुमूर्षु प्राणियों के शरीर में स्पर्श द्वारा जानने योग्य अरिष्ट लक्षणों को समझो || ३ || * स्पर्शप्राधान्येनैवातुरस्यायुषः प्रमाणावशेषं जिज्ञासुः प्रकृतिस्थेन पाणिना शरीरमस्य केवलं स्पृशेत्, परिमर्शयेद्वाऽन्येन । परिमृशता तु खल्वातुरशरीरमिमे भावास्तत्र तत्राव-बोद्धव्या भवन्ति । तद्यथा - सततं स्पन्दमानानां शरीरदेशानामस्पन्दनं, नित्योमां शीतीभावः, मृदूनां दारुणत्वं ज्णानां खरत्वं सतामसद्भावः, सन्धीनां संसभ्रंशच्यव-नानि; मांसशोणितयोर्वीतीभावः, दारुणत्वं स्वेदानुबन्धः, स्तम्भो वा यच्चान्यदपि किञ्चि-दीदृशं स्पर्शानां लक्षणं भृशविकृतमनिमित्तं स्यात् । इति लक्षणं स्पृश्यानां भावानामुक्तं समासेन ॥ ४ ॥

सगम्य अरिष्ट की गणना - स्पर्श की प्रधानता से रोगी की आयु प्रमाण को जानने की इच्छा रखने वाले चिकित्सक को अपने प्रकृतिस्थ ( स्वाभाविक ) हाथ से रोगी के सम्पूर्ण शरीर का स्पर्श करना अथवा किसी अन्य पुरुष के द्वारा स्पर्श कराना चाहिए । रोगी के शरीर का स्पर्श करते हुए निम्नलिखित भाव भिन्न - भिन्न शरीर प्रदेश में ज्ञान करने योग्य होते हैं । जैसे सर्वदा स्पन्दन करने वाले शरीर प्रदेशों का स्पन्दन न होना, सर्वदा उष्ण रहने वाले शरीर प्रदेश का शीतल होना, मृदु प्रदेशों का दारुण होना, लक्ष्ण प्रदेशों का खर होना, जो अङ्ग या लक्षण जिस प्रदेश में वर्तमान रहते हैं उनका उन स्थानों में न रहना, सन्धियों का स्रंस, भ्रंश, च्यवन ( अपने स्थान से च्युत हो ( जाना ) और सन्धियों का मांस और रक्त से शून्य हो जाना, कठिन हो जाना, स्वेद का अधिक हो जाना, उनमें जकड़ाहट अधिक हो जाना जो कुछ इस प्रकार दूसरे के स्पर्श करने योग्य स्थानों में अधिक विकृत लक्षण बिना कारण विकृत हों उन्हें अरिष्ट समझना चाहिए । इस प्रकार स्पर्श के द्वारा जानने योग्य भावों का वर्णन संक्षेप में कर दिया गया ॥ ४ ॥

सदा स्पन्दन करने वाले स्थान अग्रांकित हैं - Carotid Artery, Radial artery, Brachial artery, Femoral artery, Popliteal artery इत्यादि में स्पन्दन न होना और उष्णप्रदेश का शीतल होना इन दोनों लक्षणों का Peripheral circulatory Collapse से कुछ साम्य प्रतीत होता है । तद्व्यासतोऽनुव्याख्यास्यामः - तस्य चेत् परिमृश्यमानं पृथक्त्वेन पादजङ्कोरुस्फि-गुदरपार्श्वपृष्ठेषिकापाणिग्रीवातात्वोष्टललाटं स्विन्नं शीतं स्तब्धं दारुणं वीतमांसशोणितं का स्थात्, परासुरयं पुरुषो न चिरात् कौलं मरिष्यतोति विद्यात् । तस्य चेत् परिमृश्य-१. ' स्पर्शप्रामाण्येन ' इति पा ० । २. ' प्रमाणविशेषम् ' इति पा ० । ३. ' स्थूलानां वृषगादीनां सतामसद्भावः ' इति पा ० । ५. ' कालं करिष्यति ' इति पा ० । ४. ' प्रसुप्तम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1068

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1068 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिमर्शनीयेन्द्रियाध्यायः ३ ] इन्द्रस्थान ६७६ मानानि पृथक्त्वे गुल्फजानुवङ्खगगुदवृष गमेढूनाभ्यं सस्तनमणिकपर्शुका हनुनासिका-कर्णाक्षिभ्रूशङ्खादीनि स्त्रस्तानि व्यस्तानि च्युतानि स्थानेभ्यः स्केन्नानि वा स्युः, परासुरयं पुरुषोऽचिरात् कालं मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ५ ॥

स्पर्शगम्य अरिष्ट के उदाहरण - अब पुनः उन भावों की व्याख्या विस्तार से की जा रही है । रोगी मनुष्य के अलग अलग स्पर्श करने पर यदि पैर, जङ्घा, ऊरु, स्फिक् ( नितम्ब ) उदर, पार्श्व, पृष्ठ - वंश, हाथ, गर्दन, तालु, ओष्ठ और ललाट स्वेदयुक्त, शीतल, स्तब्ध, कठोर और मांस, रक्त से शून्य प्रतीत हों तो समझना चाहिए कि वह पुरुष परासु है ( अर्थात् उसका मृत्यु काल आसन्न है ) वह पुरुष अधिक देर में नहीं मरेगा ( अर्थात् बहुत शीघ्र ही मर जायगा ) । यदि रोगी मनुष्य के अलग - अलग गुल्फ, जानु, वंक्षण, गुदा, अण्डकोष, मूत्रेन्द्रिय, नाभि, अंस, कन्धा, स्तन, मणिबन्ध, पर्शुकायें, हनु, नासिका, कान, आँख, भ्र और शंख आदि प्रदेशों का स्पर्श करने पर वे शिथिल जान पढ़ें, अपने सन्धि स्थान से अलग अलग प्रतीत हों या अपने स्थान से बिलकुल अलग प्रतीत हों, तो यह पुरुष परासु है, शीघ्र ही मर जायगा, ऐसा ज्ञान करना चाहिए ॥ ५ ॥

तथाऽस्योच्छ्वासमन्यादन्तपचमचक्षुः केशलोमोदरनखाङ्गुलीरालक्षयेत् । तस्य चेदु-च्वासोऽतिदीर्घौऽतिस्वो वा स्यात्, परासुरिति विद्यात् । तस्य चेन्मन्ये परिमृश्यमाने न रुपन्देयानां परासुरिति विद्यात् । तस्य चेद्दन्ताः परिकीर्णाः श्वेता जातशर्कराः स्युः, परासुरिति विद्यात् । तस्य चेत् पचमाणि जटाबद्धानि स्युः, परासुरिति विद्यात् । तस्य चेचक्षुषी प्रकृतिहीने, विकृतियुक्ते - अत्युत्पिण्डिते, अतिप्रविष्टे, अतिजिह्मे, अतिविषमे, अतिमुकबन्धने, अतिप्रस्रुते, सततोन्मिपिते, सततनिमिषिते, निमिषोन्मे पातिप्रवृत्ते, विभ्रान्तदृष्टिके, विपरीतदृष्टिके, हीनदृष्टिके, व्यस्तदृष्टिके, नकुलान्धे, कपोतान्धे, अला-तवर्णे, कृष्णपीतनीलश्यावताग्रह रितहारिद्रशुक्ल वैकारिकाणां वर्णानामन्यतमेनातिप्लुते वा स्यातां तदा परासुरिति विद्यात् । अथास्य केशलोमान्यायच्छेत्, तस्य चेत् केशलोमा-न्यायम्यमानानि प्रलुच्येरन् न चेद्वेदयेयुस्तं परासुरिति विद्यात् । तस्य चेदुदरे सिराः प्रकाशेरज श्यावताम्रनीलहारिद्रशुक्ला वा स्युः, परासुरिति विद्यात् तस्य चेन्नखा वीत-मांसशोणिताः पक्कजाम्बववर्णाः स्युः, परासुरिति विद्यात् । अथास्याङ्गुलीरायच्छेत्; तस्य चेदङ्गुलय आयम्यमाना न स्फुटेयुः, परासुरिति विद्यात् ॥ ६ ॥

तथा रोगी का उच्छ्वास ( श्वास ), मन्या ( गलपार्श्वगत दो धमनियाँ ), दाँत, पक्ष्म ( नेत्र की पलक ), चक्षु, केश, रोम, उदर, नख और अङ्गुलियों को अरिष्ट ज्ञान के लिए देखे । ( १ ) उच्छ्वास - विषयक अरिष्ट तो गतप्राण समझना चाहिए । ( २ ) मन्याविषयक अरिष्ट – हो तो गतायु समझें । ( ३ ) दन्तविषयक अरिष्टI -• यदि रोगी का उच्छ्वास बहुत लम्बा या बहुत छोटा हो स्पर्श करने पर यदि दोनों मन्याओं में स्पन्दन क्रिया न यदि रोगी के दाँत मल से लिप्त हों, अधिक श्वेत हों तथा दाँतों पर शर्करा ( बालू ) जमी हुई प्रतीत हों तो गतायु समझना चाहिए । ( ४ ) पक्ष्म विषयक अरिष्ट यदि रोग की नेत्रपलकें जटाओं के समान बिना कारण बँधी हुई प्रतीत हों तो गतायु समझना चाहिए । १. ' स्कन्नानि ' इति हस्तलिखित पुस्तके न पठ्यते । २. ' करिष्यति ' इति पा ० । ३. ‘ व्यस्तदृष्टिके ' इत्यनन्तरं ' विस्तृत दृष्टिमण्डले ' इत्यधिकः पाठः क्वचिदुपलभ्यते ।

पृष्ठ 1069

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1069 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६८० ( ५ ) नेत्रविषयक अरिष्ट-चरकसंहिता रोगी के नेत्र यदि प्रकृतिहीन हों ( अपने स्वाभाविक रूप में न हों ), विकारों से युक्त हों, अधिक ऊपर पिण्डाकार निकले हुए हों, अधिक रूप में भीतर धँसे हुए हों, अधिक टेढ़े हों, अधिक विषम हो गए हों ( एक नेत्र छोटा और दूसरा बड़ा प्रतीत हो ), नेत्रो से अधिक आँसू का स्राव होता हो, नेत्र के बन्धन अधिक खुले हुए हों ( जिससे नेत्र विस्फारित हो गए हों ), सदा नेत्रों की पलकें खुली रहती हों ( कभी भी पलकें बन्द न होती हों ), सदा नेत्रपलकें बन्द रहती हों, नेत्र का खुलना और बन्द होना अतिशीघ्रता से हो रहा हो, दृष्टि विभ्रान्त हो ( कभी इधर देखे कभी उधर देखे ), विपरीत दृष्टि हो ( वस्तु कुछ हो और उसे दह कुछ समझे ), दृष्टिहीन हो गई हो ( दूर से वस्तु को नहीं देखता हो ), दृष्टि व्यस्त हो ( किसी वस्तु को निश्चित रूप से न देख सकता हो, या द्रष्टव्य वस्तु जिस दिशा में हो उधर न देखकर विपरीत दिशा में देखता हो ( दृष्टि घूम जाती हो ), नकुलान्ध दृष्टि या कपोतान्थ दृष्टि हो ( ' नकुलान्धस्तु रूपाणि दिवाशुक्लानि पश्यति । कपोतान्धस्तु रूपाणि दिवाकृष्णानि पश्यति ॥ ) अलात वर्ग की दृष्टि हो ( जलते हुए अङ्गार के समान ) अथवा दृष्टि का वर्ण काला, नीला, पीला, श्याव, ताम्रवर्ग, हरा, हल्दी को तरह पीला और श्वेत इन विकृत वर्णों में से कोई एक वर्ण अधिक रूप में नेत्र को आच्छादित कर लिया हो तो रोगी की आयु समाप्त हो गई हैं, ऐसा समझना चाहिए । ( ६ ) केश और लोम विषयक अरिष्ट - • रोगी के केश और रोम को पकड़ कर खींचे यदि खींचने पर केश और रोम उखड़ जायँ पर वेदना न हो तो गतायु समझना चाहिए । ( ७ ) उदर विषयक अरिष्ट - यदि रोगी के उदर पर श्याव, ताम्र की तरह लाल, नीली, हल्दी की भाँति पीली और श्वेतवर्ण की सिराएँ दिखाई पड़ें तो रोगी को मुमूर्षु समझना चाहिए । ( ८ ) नखविषयक अरिष्ट - ' हुए जामुन के सदृश नीले वर्ण के रोगी के नख यदि मांस और रक्त से शून्य प्रतीत हों और पके हो गए हों तो रोगी को गतप्राण समझना चाहिए । ( ९ ) अंगुलीविषयक अरिष्ट - रोगी की अंगुलियों को खीचे, यदि खींचते समय अंगुलियों की सन्धियाँ न बर्जे ( उसमें शब्द न हो ) तो आयु समाप्त समझनी चाहिए ॥ ६ ॥

तत्र श्लोकः-एतान् स्पृश्यान् बहून् भावान् यः स्पृशन्नवबुध्यते । आतुरे न स संमोहमायुर्ज्ञानस्य गच्छति ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने परिमर्श-नीयमिन्द्रियं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इन बहुत से स्पर्श करने योग्य भावों को स्पर्श कर जो वैद्य आतुर शरीरगत लक्षणों को जान लेता है, वह वैद्य रोगी की आयु के ज्ञान में कभी भी मोह को नहीं प्राप्त होता ॥ ७ ॥

इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के इन्द्रियस्थान में परिमर्शनीय इन्द्रिय नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1070

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 1070 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इन्द्रियानीकेन्द्रियाध्यायः ४ इन्द्रियस्थानम् अथ चतुर्थोऽध्यायः अथात इन्द्रियानीकमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

६८१ अब इसके बाद इन्द्रियानीक नामक इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - ' इन्द्रियाणामनीकं समूहः तमधिकृत्य कृतमिन्द्रियानीकम् ' । अनीक समूह को कहा जाता है । इस अध्याय में सम्पूर्ण इन्द्रियों के पृथक् पृथक् रूप में विकृतिजन्य अरिष्ट लक्षणों का निर्देश किया जायगा । * इन्द्रियाणि यथा जन्तोः परीक्षेत विशेषवित् । ज्ञातुमिच्छन् भिषड्यानमायुषस्तन्निबोधतं ॥ अनुमानात् परीक्षेत दर्शनादीनि तत्त्वतः । अद्धा हि विदितं ज्ञानमिन्द्रियाणामतीन्द्रियम् ॥ इन्द्रियाँ अनुमानगम्य है - आयु का प्रमाण जानने की इच्छा रखने वाले विशेषज्ञ वैद्य को जिस प्रकार प्राणियों की इन्द्रियों की परीक्षा करनी चाहिए वह मैं कह रहा हूँ उसे आप लोग समझें । नेत्र आदि इन्द्रियों की परीक्षा तत्त्वतः ( सिद्धान्ततः ) अनुमान द्वारा करनी चाहिए क्योंकि इन्द्रियों का तत्वतः ज्ञान अनीन्द्रिय होता है । अर्थात् इन्द्रियों द्वारा गम्य नहीं है और जाना हुआ ज्ञान ही सत्य होता है, इसलिए इन इन्द्रियों की परीक्षा अनुमान से करनी चाहिए || * स्वस्थेभ्यो विकृतं यस्य ज्ञानमिन्द्रियसंश्रयम् । आलक्ष्येतानिमित्तेन लक्षणं मरणस्य तत् ॥ इन्द्रिय अरिष्ट के सामान्य सिद्धान्त - रोगी की इन्द्रियों के स्वस्थ रहने पर भी इन्द्रियजन्य ज्ञान का बिना कारण ही विपरीत प्रतीत होना मृत्यु का लक्षण है । अर्थात् इन्द्रियों में दोष न होने पर भी इन्द्रियग्राह्य वस्तु विपरीत दिखाई पड़े तो अरिष्ट होता है ॥ ५ ॥

इत्युक्तं लक्षणं सम्यगिन्द्रियेष्वशुभोदयम् । तदेव तु पुनर्भूयो विस्तरेण निबोधत ॥ ६ ॥

इस प्रकार इन्द्रियों में अशुभसूचक लक्षण ठीक - ठीक कह दिया है उसे ही विस्तार से कहा जाता है उसे पुन: समझे ॥ ६ ॥

ॐ घनीभूतमिवाकाशमाकाशमिव मेदिनीम् । विगीतमुभयं ह्येतत् पश्यन् मरणमृच्छति ॥७ ॥

नेत्रविषयक अरिष्ट - जो रोगी आकाश को घनीभूत ( कठोर मूर्तिमान ) और पृथ्वी को आकाश की तरह शून्य देखता है, ये दोनों ज्ञान विपरीत हैं इस तरह विपरीत देखने वाले रोगी मर जाते हैं ॥ ७ ॥

यस्य दर्शनमायाति मारुतोऽम्बरगोचरः । अग्निर्नायाति चादीप्तस्तस्यायुःक्षयमादिशेत् ॥८ ॥

नेत्र और आकाश - जिस रोगी को आकाश में चलने वाली वायु मूर्तिमान बनकर दिखाई । पड़ती है और प्रकाशयुक्त अग्नि दृष्टिगोचर नहीं होती, उसकी आयु क्षीण हो गई है ऐसा समझना चाहिए ॥ ८ ॥

जले सुविमले जालमजालावतते नरः । स्थिते गच्छति वा दृष्ट्वा जीवितात् परिमुच्यते ॥९ ॥

नेत्र और जल - जिस जल में जाल नहीं फैलाया गया है और जो जल स्वच्छ और स्थिर है या बहता है यदि उसमें जाल दिखाई पड़े तो वह पुरुष जीवन से छुटकारा पा जाता है ॥ ९ ॥

जाग्रत् पश्यति यः प्रेतान् रक्षांसि विविधानि च । अन्यद्वाऽप्यद्भुतं किञ्चिन्नस जीवितुमर्हति ॥ १. ' आयुः प्रमाणं जिज्ञासुभिषक् तन्नो निबोधत ' इति पा ० । २. ' वितथम् ' इति पा ० । ३. ' ज्ञानमिन्द्रियसंभवम् ' इति पा. । ४. ' किञ्चिज्जीवितात् स विमुच्यते ' इति पा. ।