चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1071–1080
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1071–1080
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६८२ चरकसंहिता नेत्र और बीभत्सुरूप - जो रोगी जागते हुए प्रेतों को, विविध राक्षसों को अथवा और अन्य किमी अद्भुत ( भयानक वस्तु को देखना है ) वह रोगी जीने में असमर्थ होता है ॥ १० ॥
योऽग्निं प्रकृतिवर्णस्थं नीलं पश्यति निष्प्रभम् । कृष्णं वा यदि वा शुकं निशां व्रजति सप्तमीम् ॥ नेत्र और अग्नि- जो रोगी स्वाभाविक रूप वाली अग्नि को, नीली, प्रभा - हीन, काली या श्वेतवर्ण की देखता है तो वह सातवें दिन तक यमपुर को चला जाता है ॥। ११ ॥ मरीचीनसतो मेघान्मेघान् वाऽप्यसतोऽम्बरे । विद्युतो वा विना मेघैः पश्यन् मरणमृच्छति ॥ नेत्र और मेघ - जो रोगी बादलों के न रहने पर भी बादलों की छटा को देखता है, या आकाश में बादलों के न रहने पर भी बादलों को देखता हैं, या बादलों के न रहते भी बिजली की चमकाहट देखता है वह शीघ्र ही मरण को प्राप्त होता है ॥ १२ ॥
मृन्मयीमिव यः पात्रीं कृष्णाम्बरसमावृताम् । आदित्यमीक्षते शुद्धं चन्द्रं वा न स जीवति ॥ नेत्र और सूर्य चन्द्र - जो रोगी शुद्ध सूर्य या चन्द्रमा को काले कपड़े से ढकी हुई मिट्टी की थाली की तरह कान्तिहीन देखता है वह रोगी नहीं जीता अथवा काले कपड़े से आच्छादित मिट्टी की थाली की तरह सूर्य को प्रभाहीन देखता है और चन्द्रमा को शुद्ध कलङ्करहित देखता है वह रोगी नहीं जीता ॥ १३ ॥
अपर्वणि यदा पश्येत् सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहम् । अव्याधितो व्याधितो वा तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ औरभी - जो बिना पर्व के अर्थात् अमावस्या और पूर्णिमा को छोड़कर अन्य किसी दूसरी तिथि को सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण देखता है, वह चाहे रोगी हो या स्वस्थ हो उसके जीवन का अन्तकाल आ गया ऐसा समझना चाहिए ॥ १४ ॥
नक्तं सूर्यमश्वन्द्रमनग्नौ धूममुत्थितम् । अग्निं वा निष्प्रभं रात्रौ दृष्ट्वा मरणमृच्छति ॥ ९ ५ ॥ और भी - रोगी रात्रि में सूर्य को, दिन में चमकते हुए चन्द्रमा को बिना अग्नि के धूम को और रात्रि के समय अग्नि को प्रभाहीन देखकर ( देखने वाला ) मृत्यु को प्राप्त करता है ॥ १५ ॥
प्रभावतः प्रभाहीनान्निष्प्रभांश्च प्रभावतः । नरा विलिङ्गान् पश्यन्ति भावान् भोवाञ्जिहासवः ॥ नेत्र और प्रभा -- जो रोगी प्रभा ( कान्ति ) युक्त पदार्थो को कान्तिरहित और प्रभाहीन पदार्थों को प्रभायुक्त, देखता है और किसी भी पदार्थ को उसके स्वाभाविक रूप से विपरीत देखता है, तो समझना चाहिए कि यह अपने प्राणों को छोड़ने वाला है ॥ १६ ॥
व्याकृतीनि विवर्णानि विसंख्योपगतानि च । विनिमित्तानि पश्यन्ति रूपाण्यायुःक्षये नराः ॥ नेत्र और वर्ण - रूप xx आयु के क्षय हो जाने पर मनुष्य विकृत या विपरीत आकृति वाले, विकृत या विपरीत वर्ण वाले और विपरीत संख्या वाले रूप को बिना कारण ही देखा करते हैं । यश्च पश्यत्यदृश्यान् वै दृश्यान् यश्च न पश्यति । तावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमक्षयमसंशयम् ॥ नेत्र और वस्तु - जो रोगी अदृश्य वस्तु को देखता है और जो दृश्य है उसे नहीं देखता वे दोनों ही शीघ्र यमपुरी का दर्शन करते हैं इसमें सन्देह नहीं । अर्थात् निश्चिन मर जाते हैं ॥ १८ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि अदृश्य जैसे वायु, आकाश या दूरस्थ या आच्छादित वस्तु को तो देखता है और जो समीप में घटपटादि वस्तु है उसे नहीं देखता तो शीघ्र मर जाता है विजानता । ॥ अशव्दस्य च यः श्रोता शब्दान् यश्च न बुध्यते । द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयौ १. ' यः पश्यति स नश्यति ' इति पा. । २. ' प्राणानू ' इति पा. । ३. ' द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयौ विजानता ' इति पा. । ४. ' तावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमक्षयमसंशयम् ' इति पा ० ।
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इन्द्रियानीकेन्द्रियाध्यायः ४ ] इन्द्रियस्थानम् ६८३ शब्दविषयक अरिष्ट - जो रोगी शब्दों के न होने पर भी शब्दों को सुनता है और शब्दों के रहने पर नहीं सुनता इन दोनों को विज्ञ वैद्य जैसा मुर्दा होता है वैसा ही समझे । अर्थात् वे शीघ्र ही मर जाते हैं ॥ १ ९ ॥ 8 संवृत्याङ्गुलिभिः कर्णौ ज्वालाशब्दं य आतुरः । न शृणोति गतासुं तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ कर्णशब्दविषयक अरिष्ट -- जो रोगी अपने दोनों कानों को अङ्गुलियों से बन्द कर जठराग्नि के शब्द को नहीं सुनता हो उसे बुद्धिमान् वैद्य गतायु समझ कर उसकी चिकित्सा न करे ॥ २० ॥
विपर्ययेण यो विद्याद्गन्धानां साध्वसाधुताम् । न वा तान् सर्वशो विद्यात्तं विद्याद्विगतायुषम् ॥ गन्धविपयक अरिष्ट जो रोगी गन्ध के अच्छेपन और बुरेपन को विपरीत रूप से ग्रहण करता है अर्थात् सुगन्ध को दुर्गन्ध और दुर्गन्ध को सुगन्ध समझता है; अथवा गन्ध का उसे बिलकुल ही ज्ञान नहीं होता उसे मरणासन्न समझना चाहिए ॥ २१ ॥
यो रसान्न विजानाति न वा जानाति तत्त्वतः । मुखपाकाहते पक्कं तमाहुः कुशला नरम् ॥
जिह्वाविषयक अरिष्ट - जिस रोगी के मुख में पाक न हो और जो रसों का ठीक ठीक ज्ञान न कर सकता हो अथवा किसी भी रस का स्वाद न जान सकता हो; कुशल वैद्य उसे पक्क समझते हैं । अर्थात् काल ने उसे पका दिया है वह शीघ्र ही मर जायगा ॥ २२ ॥
विमर्श -- इसका संक्षेप में वर्णन अष्टांग्रसंग्रह में इस प्रकार किया है - ' तद्वद्गगन्धरसस्पर्शान्
मन्यते यो विपर्ययात् । सर्वशो वा न यो यश्च दीपगन्धं न जिघ्रति ॥
ॐ उष्णाच्छीतान् खराञ्छ्लक्ष्णान्मृदूनपि च दारुणान् ।
स्पृश्यन् स्पृष्ट्वा ततोऽन्यत्वं मुमूर्षुस्तेषु मन्यते ॥ २३ ॥
त्वग्विषयक अरिष्ट - उष्ण वस्तु को शीतल, रूक्ष को चिकना, कोमल वस्तु को कठिन आदि, स्पर्श योग्य वस्तु को स्पर्श कर विपरीत ज्ञान करने वाले अर्थात् जो वस्तु जैसी है स्पर्श करने पर उसका यथार्थं ज्ञान न कर विपरीत ज्ञान करने वाले रोगी को मुमूर्षु माना जाता है ॥ २३ ॥
अन्तरेण तपस्तीव्रं योगं वा विधिपूर्वकम् । इन्द्रियैरधिकं पश्यन् पञ्चत्वमधिगच्छति ॥ इन्द्रियशक्तिविषयक अरिष्ट --- तांत्र तपस्या अथवा निविपूर्वक किए गए योग के बिना जो पुरुष इन्द्रियों को शक्ति से अधिक ज्ञान करता है वह पञ्चत्व को प्राप्त हो जाता है || २४ || विमर्श -- यहाँ इन्द्रियों से अधिक देखना यह अर्थ ' इन्द्रियैरधिकं पश्यन् ' से स्पष्ट है । यदि बिना योग और तपस्या के ही ज्ञान होने लगे तो मृत्युसूचक है । आत्मा नित्य है उसे जन्म-जन्मान्तर की बातें और व्यापक तथा ईश्वर के अंश होने के नाते संसार की सभी वस्तुओं का ज्ञान रहता है पर सांसारिक माया के प्रपञ्च से उसके ज्ञान पर आवरण पड़ जाता है । जब सांसारिक माया को त्याग कर वह यहाँ से चलना चाहता है तो माया से रहित होने के कारण आत्मा शुद्ध, शान्त और निर्मल होती है अतः उसे अतीन्द्रिय वस्तुओं का ज्ञान होता है । इन्द्रियाणामृते दृष्टेरिन्द्रियार्थानदोषजान् । नरः पश्यति यः कश्चिदिन्द्रियैर्न स जीवति ॥ और भी - अदोषज इन्द्रियार्थो को बिना ज्ञान - शक्ति के ही जो मनुष्य इन्द्रियों से देखता है वह जीवित नहीं रह सकता ॥ २५ ॥
स्वस्थाः प्रज्ञाविपर्यासैरिन्द्रियार्थेषु वैकृतम् । पश्यन्ति येऽसद्व हुशस्तेषां करणमादिशेत् ॥ १. ' न चैतान् ' इति पा. । २. ' इन्द्रियाणामृते दृष्टरिन्द्रियार्थान्न पश्यति । विपर्ययेण यो विद्यात्तं विद्याद्विगतायुषम् ' इति पा ० ३. ' ये सुबहुशस्तेगाम् ' इति पा ० ।
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१८४ चरकसंहिता और भी - जो स्वस्थ पुरुष प्रज्ञापराध से इन्द्रियजन्य विषयों में अधिकतर विकृति देखते हैं उनकी मृत्यु शीघ्र हो जाती है ॥ २६ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि इन्द्रियों में कोई विकृति नहीं है पुरुष भी स्वस्थ है पर स्वस्थ रहते हुए केवल बुद्धि में दोष आ जाने के कारण ज्ञानेन्द्रियजन्य विषयों को उचित रूप में नहीं समझता । अर्थात् उन उन इन्द्रियजन्य विषयों को विपरीत समझता है यह बुद्धिजन्य अरिष्ट का लक्षण है । तत्र श्लोकः-एतदिन्द्रियविज्ञानं यः पश्यति यथातथम् । मरणं जीवितं चैव स भिषग् ज्ञातुमर्हति ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने इन्द्रियानी -कमिन्द्रियं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
-जो वैद्य यथार्थ रूप में बताये हुए इन्द्रियविज्ञान को समझता है । वह मृत्यु और जीवन इन दोनों को जानने में समर्थ होता है । अर्थात् इस अध्याय में इन्द्रियजन्य जिन - जिन अरिष्टों का वर्णन है यदि उनका ज्ञान उचित रूप में वैद्य को है तो रोगी अवश्य मर जायगा और बनाये हुए अरिष्ट लक्षणो के न होने पर यह रोगी अवश्य ही चिरायु है, यह वैद्य को ज्ञान हो जाता है || २७ || इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रियस्थान में इन्द्रियानीक इन्द्रिय नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः अथातः पूर्वरुपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद पूर्वरूपीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - यद्यपि इन्द्रियानीक के बाद क्रम प्राप्त सत्त्व भक्ति आदि का वर्णन करने का प्रसंग था पर सत्त्व आदि का वर्णन सुक्ष्म दुर्ज्ञेय और स्वरूप है अतः क्रमप्राप्त को छोड़ कर मुझेय और बहु वक्तव्य तथा रोग से पूर्व में होने वाले पूर्वरूप सम्बन्धी अरिष्ट को समझाने के लिए पूर्वरूपीय इन्द्रिय की व्याख्या पहले प्रारम्भ कर रहे हैं । पूर्वरूपाण्यसाध्यानां विकाराणां पृथक पृथक् । भिन्नाभिन्नानि वच्यामो भिषजां ज्ञानवृद्धये ॥ ( १ ) पूर्वरूपीय अरिष्ट ( Prognosis based on Prodromal Facts ) चिकित्सकों के ज्ञान की वृद्धि के लिए अलग - अलग असाध्य विकारों के भिन्न ( साधारण या रोगप्रकरण में कहे गए ), अभिन्न ( असाधारण या रोगप्रकरण में नहीं कहे गए ) पूर्वरूपों का वर्णन इस अध्याय में कर रहे हैं ॥ ३ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि इस अध्याय में उन सभी पूर्व रूपों का अलग - अलग रोगानुसार वर्णन किया जायगा जिनसे विभिन्न असाध्य रोगों का ज्ञान हो जाता है । इनमें सामान्य और विशिष्ट
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पूर्वरूपीयेन्द्रियाध्याय: ५ ] इन्द्रियस्थानम् ६६५ दोनों पूर्वरूपों का वर्णन किया गया है । भिन्न - भिन्न रोगों के प्रकरण में जो सामान्य पूर्वरूप कहे गए हैं उनमें अरिष्टसूचक जो लक्षण हैं उन्हें और जो विशिष्ट पूर्वरूप स्वप्नों से सूचित होते हैं उन्हें भी यहाँ कहा गया है । * पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया । यं विशन्ति विशत्येनं मृत्युर्ज्वरपुरःसरः || ४ || अन्यस्यापि च रोगस्य पूर्वरूपाणि यं नरम् । विशन्त्यनेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ज्वरविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट - सामान्यतः ज्वर प्रकरण में जितने ज्वर के पूर्वरूप बताये हैं वे सभी पूर्वरूप या अधिकतर पूर्वरूप के साथ ज्वर जिस मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होता है तो वह ज्वर मृत्यु को आगे कर स्वयं प्रवेश करता है । अर्थात् अधिक पूर्वरूप होने पर रोगी की ज्वर से मृत्यु हो जाती है । इसी प्रकार किसी भी अन्य रोग का अधिक पूर्वरूप के साथ शरीर में प्रविष्ट होना निश्चित मृत्यु का सूचक है ॥ ४-५ ॥ पूर्वरूपैक देशांस्तु वच्यामोऽन्यान् सुदारुणान् । ये रोगाननुबध्नन्ति मृत्युर्यैरनुबध्यते ॥६ ॥
और भा — अन्य भयंकर पूर्वरूपों के एक देश को भी कह रहा हू जो मृत्युकारक रोगों के साथ अवश्य अनुबन्ध ( पश्चात् सम्बन्ध ) रखते हैं और उन लक्षणों के बाद मृत्यु भी अवश्य ही अनुबन्ध रखती हैं अर्थात् उन लक्षणों के बाद मृत्यु अवश्य होती है ॥ ६ ॥
* बलं च हीयते यस्य प्रतिश्यायश्च वर्धते । तस्य नारीप्रसक्तस्य शोषोऽन्तायोपजायते ॥७ ॥
are aas पि याति यो दक्षिणां दिशम् । स्वते यदमागमासाद्य जीवितं स विमुञ्चति ॥
प्रेतैः सह पिवेन्मद्यं स्वमे यः कृष्यते शुना | सुघोरं ज्वरमासाद्य जीवितं स विमुञ्चति ॥९ ॥
यक्ष्माविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट - जिस यक्ष्मा के रोगीका बल घटता हूं और प्रतिश्याय बढ़ता जाना है और रोगी स्त्रीप्रसङ्ग में अधिक आसक्त होता है तो उस रोगी का यक्ष्मा रोग उसके नाश के लिए होता है । जो स्वस्थ मनुष्य या रोगी स्वप्नावस्था में कुत्ते, ऊँट और गदहे की सवारी पर या इनके साथ दक्षिण दिशा को गमन करता है तो वह स्वस्थ मनुष्य या रोगी मनुष्य यक्ष्मा रोग से पीडित होकर अपने जीवन का उत्सर्ग करता है, अर्थात् शीघ्र मर जाता है । जो यक्ष्मा का रोगी स्म में भूत प्रेतों के साथ मंदिरा पीता है और कुत्ते द्वारा दक्षिण दिशा में घसीटा जाता है ( स्वप्न हां वह यक्ष्मा का रोगी भयंकर ज्वर से पीडित हो कर मर जाता है ॥ ७ - ९ ॥ * लाक्षारक्ताम्बराभं यः पश्यत्यम्बरमन्तिकात् । स रक्तपित्तमासाद्य तेनैवान्ताय नीयते ॥१० ॥
रक्तस्रग्रक्तसर्वाङ्गो रक्तवासा मुहुर्हसन् । यः स्वप्ने हियते नार्या स रक्तं प्राप्य सीदति ॥११ ॥
रक्त - पित्तविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट – जो व्यक्ति अपने समीप से ही आकाश को लाख को रङ्ग से रंगे हुए वस्त्र के समान रक्तवर्ण का देखता है वह रक्त - पित्त रोग को प्राप्त कर उसी के द्वारा मारा जाता है । जो व्यक्ति स्वप्न में रक्तवर्ण की माला को धारण किया हुआ, सम्पूर्ण रक्त अङ्ग वाला, रक्तवर्ण के वस्त्र धारण किया हुआ, बार - बार हँसना हुआ, स्त्री के द्वारा दक्षिण दिशा में ले जाया जाता है वह मनुष्य रक्तपित्त रोग से पीड़ित होकर उसी रोग से मर जाना है ॥ १०-११ ॥ शूलाटोपशम्न्रकूजाच दौर्बल्यं चातिमात्रया । नखादिपु च वैवर्ण्य गुल्मेनान्तकरो ग्रहः ॥ लता कण्टकिनी यस्य दारुगा हृदि जायते । स्वप्ने गुल्मस्तमन्ताय क्रूरो विशति मानत्रम् ॥ गुल्मविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट – जिस व्यक्ति के उदर में शूल, आटोप, आन्त्रकूजन, अधिक मात्रा में दुर्बलता, नख, मूत्र, पुरीप, नेत्र आदि विवर्णना होने के बाद गुल्म रोग उत्पन्न होता है तो उसकी मृत्यु उसी रोग से होती है । जो व्यक्ति स्वप्न में यह देखता है कि १. ‘ मृत्युर्यैरवबुध्यते ' इति पा ० । २. ' नीयते ' इति पा ० ।
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६८६ चरकसंहिता मेरे हृदय के ऊपर भयङ्कर कांटेदार लता उत्पन्न हो गई है वह व्यक्ति क्रूर ( असाध्य ) गुल्म रोग से आक्रान्त होकर मर जाता है ॥ १२-१३ ॥ * कार्येऽल्पमपि संस्पृष्टं सुभृशं यस्य दीर्यते । क्षतानि च न रोहन्ति कुष्ठैर्मृत्युहिनस्ति तम् ॥ नग्नस्याज्यावसिक्तस्य जुह्वतोऽग्निमनचित्रम् | पद्मान्युरसि जायन्ते स्वप्ने कुष्ठैर्मरिष्यतः ॥ कुष्ठविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट - जिस मनुष्य के शरीर पर तृण आदि किसी भी वस्तु से थोड़ा भी कठिन स्पर्श नात्र से ही क्षत हो जाय और अधिक बढ़ जाय, यत्न से सुन्दर चिकित्सा करने पर भी क्षत स्थान भरे नहीं, इसके बाद होने वाला कुष्ठ उस व्यक्ति को मार डालता है । जो व्यक्ति स्वप्न में यह देखता है कि मैं नग्न हूँ, अपने सम्पूर्ण शरीर में घृत लगाया हुआ हूं और जिस अग्नि में ज्वाला नहीं है उस अग्नि में हवन कर रहा हूं, हवन करते समय मेरी छाती पर कमल का फूल उत्पन्न हो गया वह व्यक्ति कुष्ठ रोग से मर जाता है । १४–१५ ॥ विमर्श - कुष्ठ रोग में Trophic ulcers होते हैं । यह व्रण प्रायः पैर में होता है और काफी देर के बाद चिकित्सा करने पर ठीक होता है । * स्नातानुलिप्तगात्रेऽपि यस्मिन् गृध्नन्ति मक्षिकाः । स प्रमेहेण संस्पर्श प्राप्य तेनैव हन्यते ॥ स्नेहं बहुविधं स्वप्ने चण्डालैः सह यः पिबेत् । ब्रध्यते स प्रमेहेण स्पृश्यतेऽन्ताय मानवः ॥ प्रमेहविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट - जिस व्यक्ति के स्नान और चन्दन का लेप कर लेने पर भी मक्खियाँ आकर अधिक संख्या में उसके शरीर पर बैठती है तो वह व्यक्ति प्रमेह रोग से पीड़ित हो मर जाता है । जो व्यक्ति चाण्डालों के साथ अनेकों प्रकार के स्नेहों ( घृत, तेल, वसा, मज्जा आदि ) को स्वप्न में पीता है । उस व्यक्ति को प्रमेह होता है और वह प्रमेह रोग से ही मर जाता है ॥ १६-१७ ॥ ध्यानायासौ तथोद्वेगौ मोहश्वास्थानसंभवः । अरतिर्बलहानिश्च मृत्युरुन्मादपूर्वकः ॥ १८ ॥
आहारद्वेषिणं पश्यन् लुप्तचित्तमुदर्दितम् । विद्याद्धीरो मुमूर्षु तमुन्मादेनातिपातिना ॥१ ९ ॥ क्रोधनं त्रासबहुलं सकृत्प्रहसिताननम् । मूर्च्छापिपासाबहुलं हन्त्युन्मादः शरीरिणम् ॥२० ॥
नृत्यन्रक्षोगणैः साकं यः स्वप्नेऽम्भसि सीदेति ।
स प्राप्य भृशमुन्मादं याति लोकमतः परम् ॥ २१ ॥
उन्मादविषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट - जो व्यक्ति सर्वदा ध्यानावस्थित रहता हो, श्रम न करने पर भी श्रमयुक्त प्रतीत होता हो, बिना कारण उद्वेग ( बेचैन ) रहता हो और अस्थान में ( जहाँ मोह नहीं करना चाहिए वहाँ भी ) मोह करता हो, उसका चित्त कहीं भी स्थिर नहीं रहता हो और उत्तम भोजन करने पर भी जिसके बल की हानि क्रमशः होती जाती हो उस व्यक्ति की मृ यु उन्माद रोग होने से होती है । जो व्यक्ति आहार से द्वेष करता हो ( भोजन न करता हो ), जिसका चित्त लुप्त सा हो और वह उदर्द रोग से पीडित हो अथवा गङ्गाधर के मत से हर्ष की प्रबलता हो जाने से ही उसको कष्ट का अनुभव करना पड़ता ' मुदा हर्षभावेन अदितं -व्यथितम् ' इति गङ्गाधर ' हो, वह व्यक्ति अतिपाति ( भविष्य में होने वाले ) उन्माद रोग से मर जाता है । जो व्यक्ति पूर्व में क्रोधी न हो पर सहसा क्रोधी स्वभाव का हो जाय, सदा भयभीत रहता हो, एक बार जिसके मुख पर हँसी आती हो, मूर्च्छा एवं प्यास से अधिक पीड़ित रहता हो ऐसे व्यक्ति को होने वाला उन्माद मार डालता है । जो व्यक्ति स्वप्न में राक्षसों के साथ नाचता है और जल में डूब जाता है वह व्यक्ति भयंकर उन्माद रोग से आक्रान्त होकर इस मर्त्यलोक से यमलोक चला जाता है ( मर जाता है ) ॥ १८-२१ ॥ १. ' मज्जति ' इति पा ० ।
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पूर्वरूपीयेन्द्रियाध्यायः ५ ] इन्द्रियस्थानम्
असत्तमः पश्यति यः शृणोत्यप्यसतः स्वनान् ।
बहून् बहुविधाञ् जाग्रत् सोऽपस्मारेण बध्यते ॥ २२ ॥
६५७ * मत्तं नृत्यन्तमाविध्य प्रेतो हरति यं नरम् । स्वप्ने हरति तं मृत्युरपस्मारपुरःसरः ॥२३ ॥
अपस्मारविषयकं पूर्वरूपीय अरिष्ट - ' जो व्यक्ति जागते हुए अन्धकार के न रहने पर भी अन्धकार को देखना हैं और शब्दों के न रहने पर भी अनेक प्रकार के अनेक शब्दों को सुनता है । वह व्यक्ति अपस्मार रोग से मारा जाता है । जो व्यक्ति स्वप्न में देखता है कि मैं मनवाला होकर नाच रहा हूँ ऐसी दशा में मेरे शिर को नीचे करके प्रेत ले जा रहा है उस व्यक्ति के प्राण को अपस्मार उत्पन्न करने के बाद मृत्यु ले जाती है । अर्थात् अपस्मार रोग होने से उसकी मृत्यु होती है ॥ २२-२३ ॥ & स्तभ्येते प्रतिबुद्धस्य हनू मन्ये तथाऽक्षिणी । यस्य तं बहिरायामो गृहीत्वा हन्त्यसंशयम् ॥ शष्कुलीर्वाऽप्यपूपान् वा स्वप्ने खादति यो नरः । स चेत्ताहक छर्दयति प्रतिबुद्धो न जीवति ॥ वहिरायाम - विषयक पूर्वरूपीय अरिष्ट - जिस व्यक्ति का शयन करके उठने के बाद दोनों हनु, दोनों मन्या और दोनों नेत्र जकड़ जाते हों उस व्यक्ति की मृत्यु वहिरायाम रोग से आक्रान्त होने पर होती है, इसमें सन्देह नहीं । जो व्यक्ति स्वप्न में शष्कुली ( पूड़ी तद्रूप भोज्य पदार्थ ) अथवा अपूप ( मालपुआ ) खाता है और जागने पर वैसा ही अर्थात् शष्कुली और अनुपयुक्त वमन करता है तो वह रोगी जीवित नहीं रहता अर्थात् बहिरायाम रोग से मर जाता है ॥ २४-२५ ॥
एतानि पूर्वरूपाणि यः सम्यगवबुध्यते । स एषामनुबन्धं च फलं च ज्ञातुमर्हति ॥ २६ ॥
पूर्वरूप - विषयक अरिष्टों के ज्ञान का फल – जो चिकित्सक इन पूर्वरूपों को भली प्रकार जान लेना है वह इन पूर्वरूपों के अनुबन्ध ( बाद में होने वाले रोग ) और उनके फल ( मृत्यु ) को जानने में समर्थ होता है ॥ २६ ॥
इमांश्राप्य परान् स्वप्नान् दारुणानुपलक्षयेत् । व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ गेगियों के विनाश एवं अत्यन्त क्लेश करने वाले इन दारुण तथा अन्य स्वप्नों का ज्ञान वैद्य को कर लेना चाहिए ॥ २७ ॥
( २ ) स्वप्न विषयक अरिष्ट ( Prognosis tased on Dreams ) विमर्श - इसके पूर्व रोगों की पूर्वरूपावस्था में होने वाले स्वप्नों का वर्णन किया गया है, अब रोगावस्था में होने वाले स्वप्नों का वर्णन यहाँ से प्रारम्भ किया जाता है । आगे कहे गए इन स्वप्नों को यदि रोगी देखता है तो उसकी मृत्यु त्र होती है, नहीं तो बहुत ही कष्ट पाकर अच्छा होता है अथवा इन स्वप्नों को रोगी देखे तो उसकी मृत्यु होती है और स्वस्थ पुरुष देखे तो उसको अधिक कष्ट होता है । क्योंकि इस अध्याय में पूर्वरूपसम्बन्धी अरिष्टों का वर्णन है । रोगी इन स्वप्नों को देखता है तो मृत्यु का पूर्वरूप ज्ञान होता है । यदि स्वस्थ व्यक्ति इन स्वप्नों को देखता है तो उसे महान् कष्ट होता है । यह बात आगे की पक्तियों से स्पष्ट होगा जैसा कि -' इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् | अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेवाप्रमुच्यते ॥ ' इन प्रकार इन स्वप्नों का प्रयोजन स्वस्थ और रोगी इन दोनों व्यक्तियों के भविष्य फल ज्ञानके लिए है । यस्योत्तमाङ्गे जायन्ते वंशगुल्मलतादयः । वयांसि च विलीयन्ते स्वप्ने मौण्ड्यमियाच्च यः ॥ गृधोलूकश्वकाकाद्यैः स्वप्ने यः परिवार्यते । रक्षः प्रेतपिशाचस्त्रीचण्डालद्रविडान्ध्रकैः ॥ २ ९ ॥ १. ' स चेत् प्रच्छर्दयेत्तादृक ' इति पा० । २. " द्रवितान्धकैः ' इति पा ० ।
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हृदय चरकसंहिता वंशवेत्रलतापाशतृणकण्टकसङ्कटे । संसज्जेति हि यः स्वप्ने यो गच्छेन् प्रपतत्यपि ॥ ३० ॥
भूमौ पशुपधानायां वल्मीके वाऽथ भस्मनि । श्मशानायतने श्वभ्रे स्वप्ने यः प्रपतत्यपि ॥ कलुषेऽम्भसि पङ्के वा कूपे वा तमसाऽऽनृते । स्वप्ने मज्जति शीघ्रेण स्रोतसा हियते च यः ॥ स्नेहपानं तथाऽभ्यङ्गः प्रच्छर्दनविरेचने । हिरण्यलाभः कलहः स्वप्ने वन्धपराजयौ ॥ ३३ ॥
उपानद्यगनाशश्च प्रतापः पादचर्मणोः । हर्षाः स्वप्ने प्रकुपितैः पितृभिश्चावभर्त्सनम् ॥ ३४ ॥
दन्तचन्द्रार्क क्षेत्रदेवता दीपचक्षुषाम् । पतनं वा विनाशो वा स्वप्ने भेदो नगस्य वा ॥३५ ॥
रक्तपुष्पं वनं भूमिं पापकर्मालयं चिताम् । गुहान्धकारसंबाधं स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ॥३६ ॥
रक्तमाली हसन्नुच्चैदिग्वासा दक्षिणां दिशम् । दारुणामटवीं स्वप्ने कपियुक्तेन याति वा ॥ काषायणामसौम्यानां नग्नानां दण्डधारिणाम् । कृष्णानां रक्तनेत्राणां स्वप्ने नेच्छन्ति दर्शनम् ॥
कृष्णा पाप निराचारा दीर्घकेशनखस्तनी । विरागमाल्यवसना स्वप्ने कालनिशा मता ॥
इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् । अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥४० ॥
उदाहरणार्थं स्वम वर्णन जिस पुरुष को स्वप्न में उसके सिर पर बाँस, गुल्म ( झाड़ियों का समूह ) और लता आदि उत्पन्न हो जाती है, स्वप्न में ही जिसके सिर पर पक्षो अपना घोंसला बनाकर रहने लगते हैं । जिसका स्वप्न में सिर का बाल मुण्डित हो जाता है जो स्वप्न में गिड, उल्लू, कुत्ता, कौआ आदि से पराजय प्राप्त करता है और राक्षस, प्रेत, पिशाच, स्त्री, चाण्डाल, द्रविड़ और आन्ध्रक देशवासी मनुष्यों से पराजित होता है । बाँस, बेंत, लतापाश ( लताओं के समूह ), तृण और कंटकीय वृक्षों के समूह में चलते हुए मोह को प्राप्त होता है अर्थात् रास्ता भूल जाता है या चलते हुए इन बाँस आदि के समूह में गिर जाता है । धूलि से युक्त भूमि पर, वल्मीक मिट्टी पर राख के समूह पर, श्मशान भूमि पर, वधस्थान पर और गड्ढे में, कीचड़ में, अन्धकार से युक्त करें में और शीघ्र ही नदी आदे स्रोतों के द्वारा खींच लिया जाता है, या उसमें डूब जाता है । स्वप्न में स्नेह का पीना, स्नेह का अभ्यंग, बन्धन, पराजय, सुवर्ग की प्राप्ति, झगड़ा करना, वमन, विरेचन, दोनों जून का नाश हो जाना. धूलि और चमड़े का गिरना; स्वप्न में हर्ष और कुपित पितरों द्वारा धमकाया जाना, दाँत, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र ( तारा ), देवता, दीप और नेत्र का गिर जाना या नष्ट हो जाना या स्वप्न में पर्वतों का गिरना; स्वप्न में लाल पुष्प वाले वन में, रक्त भूमि में, पाप कर्म के स्थान में, चिता में, अन्धकार से युक्त गुफा में, जो व्यक्ति स्वप्न में प्रवेश करता है; रक्त माला पहने हुए, उच्च स्वर से अट्टहास करते हुए; वानरों के साथ नंगा होकर भयंकर जङ्गल में जो जाता है; स्वप्न में कषाय ( गेरुआ ) वस्त्र धारण करने वाले जो सौम्य न हों अर्थात् देखने में भयङ्कर हों ऐसे नग्न, हाथ में डण्डा लिए हुए, स्वरूप में काले और जिनका नेत्र लाल है ऐसे पुरुषों का देखना अशुभ होता है । स्वप्न में काली, पापाचरण वाली, भ्रष्ट आचार वाली, जिसके लम्बे केश, नख, और स्तन हैं ऐसी स्त्री का और जो गेरुए या लाल वर्ण की माला और वस्त्र पहने हुई हो ऐसी स्त्री का दर्शन कालरात्रि के समान गये है हैं । जिनको अर्थात् ऐसा स्वप्न देखने वाला रोगी मर जाता है । इस प्रकार ये द rom a बताये देखकर रोगी व्यक्ति मर जाता है यदि स्वस्थ व्यक्ति इन स्वप्नों को देखे तो उसके जीवन में भी संदेह हो जाता है और संदेह होने पर कोई - कोई ही व्यक्ति रोग से मुक्त होता है ॥ २८-४० ॥ १. ' प्रमुह्यति ' इति पा ० । ३. ' प्रविशत्यपि ' इति पा ० । ५. ' चन्द्रताराकनक्षत्र ० ' इति पा ० । २. ' लगति ' इति पा ० । ४. ' नीयते ' इति पा ० । ६. ' पापाननाचारा ' इति पा ० ।
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पूर्वरूपीयेन्द्रियाध्यायः ५ ] इन्द्रियस्थानम् ६८६ 8 मनोवहानां पूर्णत्वाद्दोषैरतिबलैस्त्रिभिः । स्रोतसां दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे ॥ स्वप्न और दोष के सम्बन्ध - दारुण समय ( मृत्यु काल ) में अति बलवान वात, पित्त, और कफ इन तीनों दोषों से जब मनोवाही स्रोत पूर्ण हो जाते है तब भयंकर ( मृत्यु दायक - या कष्टकारी ) स्वप्नों को देखता है ॥ ४१ ॥
विमर्शः - मनोवह स्रोतों का अलग कहीं पर वर्णन नहीं किया गया है । फिर भी मन सम्पूर्ण शरीर में चलते हुए सभी ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय पर अपना शासन करता है । आधुनिक दृष्टि से मन का स्वप्नों की उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण भाग है । नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलांस्तथा । इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥४२ ॥
मनुष्य जब पूर्ण रूप से निद्रा के वशाभूत नहा रहता तत्र इन्द्रियों के अधिष्ठाता मन की सहायता से सफल या विफल अनेक प्रकार के स्वप्नों को देखता है ॥ ४२ ॥
विमर्श - १. स्वप्न, २. सुपुप्ति और जाग्रत् ये तीन अवस्थायें होती हैं । १. स्वप्नावस्था में आत्मा तैजस ( राजस ) अहंकार से युक्त होता है और अनेक सुन्दर स्वप्नों को देखता है । जब स्वप्नावस्था में मनोवाही स्रोत त्रिदोष या किसी एक ही दोष से भयंकर रूप में पूर्ण हो जाता है तब दारुण स्वप्नों को देखता है । अर्थात् जब तक दोषों से या दोष से मनो-वहस्रोत पूर्ण नहीं होता तब तक दारुण स्वप्न नहीं देखा जाता, जो स्वप्न देखा जाता है वह सौम्य स्वप्न होता है । २. सुषुप्ति अवस्था में आत्मा तामस अहंकार से युक्त होता है, उस समय तमोगुण से सभी स्रोत आच्छादित रहते हैं, दोषों की गति मनोवह स्रोतों में नहीं जाती अतः कोई भी स्वप्न उस अवस्था में पुरुष नहीं देख पाता है । ३. जाग्रत अवस्था में आत्मा सात्विक अहंकार से युक्त रहता है, वह अहंकार शुद्ध एवं निर्मल दोषों से अनाक्रान्त रहता है, अतः इस अवस्था में भी स्वप्न नहीं देखे जाते हैं । तैजस अहंकार को राजस भी कहते हैं । यह रजोगुण प्रवर्तक होता है अतः मन को स्वप्नावस्था में कार्यों में प्रवृत्त रखता है पर जब शुद्ध रजोगुण होता है तो सौम्य और जब दोषाक्रान्त होता है तो दारुण स्वप्नों को मनुष्य देखता है । यह तम का निरोधक होता है अतः सुषुप्ति अवस्था में मन कार्य में प्रवृत्त नहीं होता । * दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं तथा । भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविधं विदुः ॥४३ ॥
स्वप्न के ७ भेद ( Serea types of Dreams ) - १. दृष्ट, २. श्रुत, ३. अनुभूत, ४. प्रार्थित, ५. कल्पित, ६. भाविक और ७. दोषज ये स्वप्न के सात प्रकार होते हैं ॥ ४३ ॥
विमर्श - १. दृष्ट - जिसे चक्षुरिन्द्रिय द्वारा देखा गया है, २. श्रुत - जो कान द्वारा सुना गया है । जैसे कृष्णचन्द्र श्यामवर्ण के हैं, ३. अनुभूत - जिसकी मन द्वारा चिन्ता या तर्क किया गया है या अभ्यास किया गया है, जैसे मन में परीक्षा पास करने की चिन्ता है, या परीक्षा समय में छात्र रात - दिन अध्ययन करता है - तो स्वप्नावस्था में पास हो गया या अध्ययन करता है । ४. प्रार्थित — मन से या बचन से जो वस्तु मांगी गयी हो, जैसे मुझे लाखों रुपैये मिलजाते । ५. कल्पित -- जो मन द्वारा कल्पना की गयी हो, जैसे मै चारोधाम तीर्थ करने जाऊँगा तो अमुक - अमुक कार्य करूंगा । ६. भाविक - जो स्वप्न शुभ या अशुभ फल को अवश्य देने वाले हों, जिनका वर्णन ऊपर के श्लोकों में किया गया है । ७. दोषज - वात, पित्त, कफ, दोषानुसार जैसे - वातज स्वप्न -- ' वियदपि गच्छति ससम्भ्रमेण सुप्तः ' - ( सु. शा. अ. ४ ) । पित्तज स्वप्न-
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Εξο चरकसंहिता ' सुप्तः सन् कनकपलाशकर्णिकारान् सम्पश्येदपि च हुताशविद्युदुल्काः । ' ( सु. शा. अ. ३ ) । कफज स्वप्न- ' सुप्तः सन् सकमलहंसचक्रवाकान् सम्पश्येदनि च जलाशयात् मनोज्ञान् । ' ( सु. शा. अ. ४ ) । * तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् । दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं चं बुद्धिमान् ॥ ४४ ॥
स्वप्नपरिणाम वैद्य प्रारम्भ के १. दृष्ट, २. श्रुत, ३ अनुभूत ४. प्रार्थित और ५. कल्लित इन पाँच स्वप्नों को विफल समझें अर्थात् ऐमे स्वप्नों का कोई फल नहीं होता । इसी प्रकार जो स्वप्न दिन में देखा गया हो, बहुत ही छोटा हो, या बहुत लम्बा स्वप्न को कभी भी देखें तो उसका फल नहीं होता ॥ ४४ ॥
* दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत् । नस्वपेद्यं पुनर्दृष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ॥ और भी - जो स्वप्न रात्रि के प्रथम पहर में देखा जाता है वह अल फल देने वाला होता है | जिस को देखकर पुनः शयन न किया जाय अर्थात् जो प्रातः काल का स्वन है वह महान् फल को देता है ॥ ४५ ॥
विमर्श - रात्रि के प्रथम प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल बहुत ही कम होता है या देर से फल देता है या विफल हो जाता है जैसा कि -- पूर्वरात्रे चिरात्फलम्, दृष्टः करोति तुच्छं च । ’ ( वाग्भट शा. अ. ६ ) । प्रातः काल स्वप्न देखने के बाद यदि पुनः शयन न किया जाय तब उसका फल सद्य: और महान् होता है जैसा कि - गोसर्गे ' तदहर्महत् । ' ( वा. शा. अ. ६ ) । ' सद्यः ' का अर्थ आचार्य गङ्गाधर ने तीन दिन के अन्दर किया है ।
अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः ।
पश्येत् सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ॥ ४६ ॥
अशुभ - स्वप्नों को देखने के बाद यदि उस समय पुनः सौम्य और शुभ स्वप्न देखा जाय तो उसका फल शुभ ही होता है ॥ ४६ ॥
विमर्श - यदि शुभ अशुभ ही होता है । तत्र श्लोकः-स्वप्नों के बाद उसी समय पुनः अशुभ स्वप्न देखा जाय तो उसका फल पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान् वेत्ति दारुणान् । न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यारभते भिषक् ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पूर्वरूपीयमिन्द्रियं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अध्याय उपसंहार - जो चिकित्सक इन दारुण पूर्वरूपों और दारुण स्वप्नों को जानता है, वह कभी भी मोहवश ( अज्ञानवश ) असाध्य रोगों में चिकित्सा का प्रारम्भ नहीं करता ॥ ४७ ॥
इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रियस्थान में पूर्वरूपी इन्द्रिय नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
१. ' तथैव च ' इति पा ० । २. ' अल्पबल: ' इति पा. ।
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कतमानिशरीरीयेन्द्रियाध्यायः ६ ] इन्द्रियस्थानम् अथ षष्ठोऽध्यायः अथातः कतमानिशरीरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
६६१ अब पूर्वरूपी इन्द्रिय के बाद कतमानिशरीरीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ कृतमानि शरीराणि व्याधिमन्ति महामुने! । यानि वैद्यः परिहरेद्येषु कर्म न सिद्ध्यति ॥३ ॥
इत्यात्रेयोऽग्निवेशेन प्रश्नं पृष्टः सुदुर्वचम् । आचचत्ते यथा तस्मै भगवांस्तन्निबोधत ॥ ४ ॥
हे महामुने! कौन ऐसे रोगयुक्त शरीर होते हैं जिनमें चिकित्सा कर्म की सिद्धि नहीं होती ( चिकित्सा सफल नहीं होता ) और किस रोगयुक्त शरीर को चिकित्सा कर्म में त्याग कर देना चाहिए । इस कठिन प्रश्न को अग्निवेश ने आत्रेय से पूछा, पूछे जाने पर आत्रेय ने जो उत्तर दिया वह ध्यान से सुनिये ॥ ३-४ ॥ विमर्श - पहले के अध्याय में पूर्वरूप द्वारा अरिष्टों का वर्णन किया गया है इस अध्याय में रोग के लक्षण ( रूपावस्था में ) अवस्था में होने वाले अरिष्टों का वर्णन किया जा रहा है । * यस्य वै भाषमाणस्य रुजत्यूर्ध्वमुरो भृशम् | अन्नं च च्यवते भुक्तं स्थितं चापि न जीर्यति ॥ बलं च हीयते शीघ्रं तृष्णा चातिप्रवर्धते । जायते हृदि शूलं च तं भिषक् परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
अचिकित्स्य रोगी - जिस व्यक्तिको बात चीत करने पर छाती के ऊपरी भाग में अधिक रूप से वेदना हो, भोजन किया हुआ अन्न बिना पचे हुए वमन के द्वारा निकल जाता हो, यदि आमाशय में खाया हुआ अन्न रुक भी जाय तो उसका परिपाक उत्तम रूप से न हो, उचित खाद्य पदार्थों के लेने पर भी प्रतिदिन बल घटता जाता हो, प्यास बढ़ती जाती हो और हृदय प्रदेश में शूरु होता हो तो ऐसे रोगियों की चिकित्सा का परित्याग कर देना चाहिए । अर्थात् वह मर जाता 11'3-211 * हिक्का गम्भीरजा यस्य शोणितं चातिसार्यते । न तस्मै भेषजं दद्यात् स्मरन्नात्रेयशासनम् ॥ अतिसार तथा हिक्का की अरिष्टसूचकता - हिक्का हो और रक्तज जिस व्यक्ति को गम्भीरजा अतिसार हो तो आत्रेय के शासन को स्मरण कर उसे औषधि नहीं देनी चाहिए ॥ ७ ॥
आनाहश्चातिसारश्च यमेतौ दुर्बलं नरम् । व्याधितं विशतो रोगौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥
आनाहश्चातितृष्णा च यमेतौ दुर्बलं नरम् । विशतो विजहत्यैनं प्राणा नातिचिरान्नरम् ॥१ ॥
और भी — किसी भी अन्य रोग से दुर्बल मनुष्य को आनाह और अतिसार ये दोनों रोग एक साथ हो जायँ उसका जीवित रहना दुर्लभ होता है । इसी प्रकार अन्य रोग से दुर्बल व्यक्ति आनाह और प्यास इन दोनों रोगों से सहसा पीड़ित हो जाय तो प्राण उसके पार्थिव शरीर को शीघ्र ही छोड़ देते हैं ॥ ८ - ९ ॥ ज्वरः पौर्वाह्निको यस्य शुष्ककासश्च दारुणः । बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः ॥१० ॥
ज्वरकासविषयक अरिष्ट - बल और मांस से हीन जिस व्यक्ति को दिन में १२ बजे के पूर्व ज्वर होता हा और साथ ही भयंकर सूखी खाँसी भी आती हो वह व्यक्ति जैसा प्रेत ( मुर्दा ) होता वैसा ही होता है अर्थात् शीघ्र ही मर जाता है ॥ १० ॥
विमर्श - किसी - किसी पुस्तक में यह श्लोक अधिक है - ' ज्वरो यस्यापराह्णे तु श्लेष्मकासश्च दारुणः । बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ ' बल मांस से हीन जिस व्यक्ति को दिन में १. ' इत्यग्निवेशेन गुरुः प्रश्नं पृष्टः पुनर्वसुः ' इति पा ० । २. ' यस्य ' इति पा ० ।