चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1081–1090

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1081–1090

पृष्ठ 1081

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६६२ चरकसंहिता १२ बजे के बाद ज्वर होता हो और साथ ही कफज ( गोला ) कास भयंकर रूप से हो वह व्यक्ति प्रेत के समान है अर्थात् मरणासन्न है । * यस्य मूत्रं पुरीषं च ग्रथितं संप्रवर्तते । निरूप्मणो जटरिणः श्वसनो न स जीवति ॥११ ॥

मूत्रपुरीषविषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति का मूत्र ग्रपित ( गाढ़ा ) और मल गाँउदार निकलता हो, जिस व्यक्ति के शरीर में तापांझ की न्यूनता हो, जो उदर रोग से पीड़ित हो और श्वास की अधिकता हो, वह व्यक्ति जीवित नहीं रहता ॥ ११ ॥

श्वयथुर्यस्य कुन्तिस्थो हस्तपादं विसर्पति । ज्ञातिसङ्कं स संक्केश्य तेन रोगेण हन्यते ॥१२ ॥

श्वयथुर्यस्य पादस्थस्तथा स्रस्ते च पिण्डिके । सीदतश्चाप्युभे जैसे तं भिषक् परिवर्जयेत् ॥

शूनहस्तं शूनपादं शूनगुह्योदरं नरम् । हीनवर्णबलाहारमौषधैनोपपादयेत् ॥ १४ ॥

शोधविषयक अरिष्ट — • जिस व्यक्ति के उदर से प्रारम्भ होकर हाथ और पैर में शोथ फैलता है वह व्यक्ति उस रोग से अपने जाति बन्धुओं के समुदाय को कष्ट देकर मारा जाता है । जिस व्यक्ति के पैर में शोथ हो और पिण्डलियाँ शिथिल हों, दोनों जंघे अवसाद युक्त हों अर्थात् उसमें वेदना और भारीपन हो ऐसे रोगी की चिकित्सा वैद्य न करे क्योंकि वह मर जाता है । जिस व्यक्ति के हाथ, पैर, गुह्य प्रदेश और उदर में शोथ हो और उसका बल, वर्ग, आहार हीन हो गया हो ऐसे रोगी की चिकित्सा औषधों द्वारा नहीं करनी चाहिए ॥ १२-१४ ॥ विमर्श - - इस प्रकार के रोगियों की चिकित्सा करने पर भी कोई लाभ नहीं होता । प्रायः इस प्रकार का शोथ किसी भी रोग में उपद्रव स्वरूप होता है । यद्यपि मृत्यु का काल निश्चित नहीं होता पर कालान्तर में मृत्यु निश्चित होती है । रोगी अशक्तावस्था में बहुत दिनों तक खाट पर पड़ा रहता है । अतः उसके जाति एवं बन्धुओं को उसकी सेवा और शुश्रूषा में अधिक समय तक कष्ट झेलना पड़ता है । इसीलिए जाति समुदाय को कष्ट देकर रोग मार डालता है । यह आचार्य की उक्ति है । G उरोयुक्तो बहुश्लेष्मा नीलः पीतः सलोहितः । सततं च्यवते यस्य दूरात्तं परिवर्जयेत् ॥१५ ॥

श्लेष्मा [ Sputun ] विषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति के वक्ष प्रदेश में रहने वाला कफ अधिक मात्रा में नीला, पीला और रक्त मिला हुआ सर्वदा निकलता रहता है, ऐसे रोगी को वैद्य दूर से ही त्याग दे ॥ १५ ॥

विमर्श - इस वर्णन में Bronchiectasis की कुछ आभा मिलती है । * हृष्टरोमा सान्द्रमूत्रः शूनः कासज्वरौदितः । क्षीणमांसो नरो दूराद्वर्ज्या वैद्येन जानता ॥ ज्वरकासविषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति का मांस क्षीण हो गया हो, रोमांच अधिक होता हो, मूत्र गाढ़ा होता हो, शरीर में शोथ हो और प्रधान रूप से ज्वर और कास से पीड़ित हो तो ज्ञानी वैद्य को चाहिए कि उसे दूर से ही त्याग दे ॥ १६ ॥

विमर्श - उपर्युक्त श्लोक में Advanced stage of Tuberculosis का वर्णन प्रतीत होता है ।

त्रयः प्रकुपिता यस्य दोषाः कष्टाभिलक्षिताः ।

कृशस्य बलहीनस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ १७ ॥

जिस कृश और बलहीन व्यक्ति के कोष्ठ में अधिक मात्रा में कुपित हुए तीनों दोष लक्षित हों उस व्यक्ति की कोई चिकित्सा नहीं ॥ १७ ॥

१. ' श ' इति पा ० । २. ' उरोमुक्तः ' इति पा ० । ३. ' शुष्ककासज्वरार्दितः ' इति पा ० । ४. ' कोष्ठेऽभिलक्षिताः ' इति, ' कण्ठाभिलक्षिताः ' इति च पा ० ।

पृष्ठ 1082

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कतमानिशरीरीयेन्द्रियाध्यायः ६ ] इन्द्रियस्थानम् ६६३ * ज्वरातिसारो शोफान्ते श्वयथुर्वा तयोः क्षये । दुर्बलस्य विशेषेण नरस्यान्ताय जायते ॥ शोथ, ज्वर, अतिसारविषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति को शोध रोग होने के बाद ज्वर और अतिसार हो जाय अथवा ज्वर, अतिसार होने के बाद शोध हो जाय; यदि मनुष्य दुर्बल है तो यह रोग उसे मारने के लिए होता है ॥ १८ ॥

विमर्श - प्रायः प्रथम शोध के बाद ज्वरातिसार या शोत्र के नष्ट होने पर ज्वरातिसार मारक होता है । इसी प्रकार प्रथम ज्वरातिसार होने के बाद शोध का होना या ज्वरातिसार के नष्ट होने के बाद दुर्बलता बनी हुई है और शोध हो जाय तो उपर्युक्त दोनों अवस्थाओं में रोगी मर जाता है । पर दोनों अवस्थाओं के रहते हुए भी रोगी बलवान् है तो मृत्यु नहीं होती ।

पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थं तृष्णयाऽभिपरिप्लुतः ।

डम्बरी कुपितोच्छ्रासः प्रत्याख्येयो विजानता ॥ १ ९ ॥

विविध अचिकित्स्य रोगी - जो व्यक्ति पाण्डु वर्ण वाला हो गया हो, अत्यन्त कृश हो, प्यास से अधिक पीड़ित हो, स्तब्ध नेत्र वाला हो और जिसका उच्छवास कुपित हो अर्थात् उचित रूप से न निकलता हो तो अरिष्ट का ज्ञाता वैद्य उसका परित्याग कर दे ॥ १ ९ ॥ हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलहासोऽतिमात्रया । प्राणाश्वोरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत् ॥२० ॥

और भी - जिस पुरुष को हनुग्रह, मन्याग्रह रोग हो वह व्यक्ति अतिमात्रा में तृष्णा से पीडित हो, अतिमात्रा में उसका बल घट गया हो और प्राणवायु छाती में वर्तमान हो तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए ॥ २० ॥

तोम्यत्यायच्छते शर्म न किञ्चिदपि विन्दति । क्षीण मांसबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः ॥ २१ ॥

और भी —- जो रोगी थका हुआ प्रतीत हो या जिसकी आँख के सम्मुख अन्धकार दिखाई देता हो, अंगों में आक्षेप होता हो और किसी भी चिकित्सा से उसे कुछ भी शान्ति नहीं मिलती हो एवं उसका मांस, बल और आहार क्षीण हो गया हो, वह मनुष्य शीघ्र ही मुमूर्षु होता है ( अर्थात् मर जाता है ) ॥ २१ ॥्

विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम् । वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते ॥ और भी - जिस पुरुष में विरुद्धयोनि और विरुद्धोपक्रम भयंकर रोग शाघ्र बढ़त ह वह रोगी शीघ्र ही मर जाता है ॥ २२ ॥

विमर्श - विरुद्धयोनि तथा विरुद्धोपक्रम के प्रसिद्ध उदाहरण उभयमार्गी रक्तपित्त आमविष, इत्यादि रोग हैं । बलं विज्ञानमारोग्यं ग्रहणी मांसशोणितम् । एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्रं क्षिप्रं स हन्यते ॥ और भी - बल, विज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी की शक्ति, मांस और रक्त ये जिस पुरुष के शीघ्रता से नष्ट होते हैं वह व्यक्ति शीघ्र ही मर जाता है ॥ २३ ॥

* आरोग्यं हीयते यस्यै प्रकृतिः परिहीयते । सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम् ॥२४ ॥

और भी - जिस व्यक्ति की उचित चिकित्सा करने पर भी रोग सहसा बढ़ता ही जाता हो, प्रकृति ( स्वभाव ) गत गुणों की सहसा हानि होती जाती हो तो सहसा मृत्यु उस व्यक्ति के जीवन को समाप्त कर देती है ॥ २४ ॥

१. ' व्यायच्छते ताम्यति च शर्म किंचिन्न विन्दति ' इति पा ० । २. ' विकारा यस्य वर्धन्ते ' इति पा ० । ४. ' हीयन्ते ' इति पा ० । ६३ च ० सं ० ३. ' मांससारिणी ' इति पा ० । ५. ' विकारा यस्य वर्धन्ते ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1083

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६६४ तत्र श्लोकः— चरकसंहिता इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत् । न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात् ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने कतमानि शरीरीयमिन्द्रियं नाम पोऽध्यायः ॥ ६ ॥

* G अध्याय उपसंहार: - इन रोगों से युक्त शरीर की चिकित्सा का त्याग कर देना चाहिए । क्योंकि धीर विद्वान् इन रोगों में चिकित्सा करने से कुछ भी सिद्धि ( सफलता ) नहीं देखते ॥२५ ॥

इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के इन्द्रियस्थान में कतमानिशरीरीय इन्द्रिय नामक छटाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥

-अथ सप्तमोऽध्यायः अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद पन्नरूपीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - ' पन्नं गतं नष्टं रूपं यस्याः सा पन्नरूपा ' - नष्ट हो गया है रूप जिसका ऐसे इन्द्रिय का अधिकार लेकर इस अध्याय का वर्णन किया गया है । इसलिए इस अध्याय का नाम पन्नरूपीय कहा गया है । इस अध्याय में द्वाया और प्रतिच्छाया के आश्रित विकृतियों का वर्णन किया गया है ।

दृष्ट्यां यस्य विजानीयात् पन्नरूपां कुमारिकाम् ।

प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्ने नमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥

प्रतिच्छाया विषयक अरिष्ट ( Shadow ] - जिस व्यक्ति के नेत्र में प्रतिच्छाया स्वरूप कुमारिका नष्ट हो गई हो उसे देख कर चिकित्सक उसकी चिकित्सा करने की इच्छा न रखे ॥ ३ ॥

विमर्श - नेत्रगोलक में दूसरे व्यक्ति या वस्तु की जो छाया पड़ती है उसे कुमारिका कहा जाता है । ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि । अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः ॥ और भी - जिस व्यक्ति की छाया चन्द्रमा के प्रकाश में, धूप में, दीपक के प्रकाश में, जल में और शीशा में विकृत अंग वाली दिखाई दे उस व्यक्ति को मुर्दे के समान समझना चाहिए ॥ ४ ॥

छिन्ना भिन्ना ss कुला च्छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा ।

नष्टा तन्वी द्विधा च्छिन्ना विकृता विशिरा च या ॥ ५ ॥

एताश्चान्याश्च याः काश्चित् प्रतिच्छाया विगर्हिताः । सर्वा मुमूर्षतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः ॥ ६ ॥

और भी - चन्द्रमा के प्रकाश आदि में छाया की विकृति छिन्न ( दो टुकड़ों में विभक्त ), भिन्न ( फटे हुए की तरह ), आकुल ( एक ही छाया में अनेक छाया मिली हुई प्रतीत हो ), हीन ( अङ्गों से हीन छाया प्रतीत हो ), अधिका ( छाया अधिक दिखाई पड़े जैसे- दो शरीर, दो सिर, १. ' प्रेतस्तथाविधः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1084

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पन्नरूपीयेन्द्रियाध्यायः ७ ] इन्द्रियस्थानम् ६६५ चार हाथ या इससे अधिक अङ्ग प्रत्यङ्ग ), नष्ट ( छाया बिलकुल न दिखाई पड़े ), तन्वी ( पतली ), द्विधा ( दो भागों में विभक्त हो ), विशिरा ( छाया में शिर न दिखाई पड़ता हो ), यह ऊपर बनाई हुई विकृति या अन्य कोई भी विकृति प्रतिच्छाया में दिखाई पड़े तो वह अशुभ होती है । यह सभी विकृतियाँ मरणासन्न मनुष्यों में पाई जाती है । पर यह विकृति किसी लक्ष्य के कारण न हो ॥ ५-६ ॥ विमर्श - छाया ( Aura ) और प्रतिच्छाया ( Shadow ) दो भिन्न वस्तुएं हैं । जिसे आगे स्पष्ट किया जायगा । यहाँ यद्यपि छाया और प्रतिच्छाया दोनों शब्द आये हैं । उपर्युक्त सभी विकृतियाँ जब बिना कारण होती है तब अरिष्टसूचक होती है । संस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा । छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः ॥ यदि व्यक्ति स्वस्थ हो या रोगी हो और आकृति शरीर का परिमाण, वर्ण, प्रभा ( कान्ति ) एवं छाया में विकृति आ जाय, तो वह व्यक्ति प्रेत के समान होता है ( अर्थात् शीघ्र ही मर जाता है ) ॥ * संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च सा । मध्यमल्पं महच्चोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम् ॥८ ॥

संस्थान [ Shape ] — संस्थान शब्द आकृति ( आकार ) का बोधक है । वह आकृति सुषमा ( Symmetrical ) और विषमा ( Asymmetrical ) होती है । देह का प्रमाण तीन प्रकार का होता है. १. मध्यम ( Average or Medium ), २. अल्प ( Short ), ३. महान् ( Tall ) ॥ ८ ॥

8 प्रतिप्रमाणसंस्थाना जलादर्शातपादिषु । छाया या सा प्रतिच्छाया च्छाया वर्णप्रभाश्रया ॥ प्रतिच्छाया की परिभाषा - प्रत्येक देह के प्रमाण और आकृति के अनुसार जल में, शीशे में, और धूप आदि ( जैसे दीप प्रकाश चन्द्रमा के प्रकाश ) में जो छाया दिखाई पड़ती है उसे

प्रतिच्छाया कहा जाता है । छाया शरीरगत वर्ण और प्रभा के आश्रित होती है ॥ ९ ॥

खादीनां पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः । नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च ॥

छायाके ५ भेद - आकाश आदि पञ्चमहाभूतों की भिन्न - भिन्न लक्षण वाली पाँच प्रकार की छाया होती है जैसे- १. नाभसी छाया. २. वायवी छाया, ३. आग्नेयी छाया, ४. आम्भसं छाया, ५. पार्थिवी छाया । इनमें ( १ ) नाभमी छाया निर्मल ( स्वच्छ ), नीलवर्ण, चिकनी और प्रभा की तरह आभासित होती है ॥ १० ॥

* रूक्षा श्यावारुणा या तु वायवी सा हतप्रभा । विशुद्ध रक्ता त्याग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया ॥ ( २ ) वायवी छाया - जो छाया रूक्ष, श्याव ( काले ), अरुण वर्ण की प्रभाहीन होती है वह वायवी छाया है । ( ३ ) आग्नेयी छाया -- जो छाया शुद्ध रक्तवर्ण की चमकदार कान्तिवाली और देखने में प्रिय होती है वह आग्नेयी छाया होनी है ॥ ११ ॥

ॐ शुद्धवैदूर्यविमला सुस्निग्धा चाम्भसी मता ।

स्थिरा स्निग्धा घना लक्ष्णा श्यामा श्वेता च पार्थिवी ॥ १२ ॥

( ४ ) आम्भसी छाया — जो छाया शुद्ध वैदूर्यमणि की तरह स्वच्छ, चिकनी होती है वह आम्भसी ( जलीया ) छाया है । ( ५ ) पार्थिवी छाया - जो छाया स्थिर, चिकनी, धनी, श्लक्ष्ण, श्याम वर्ण और श्वेत होती है वह पार्थिवी छाया है ॥ १२ ॥

वायवी गर्हिता वासां चतस्रः स्युः सुखोदयोः ।

वायवी तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ १३ ॥

इन छायाओं में वायवी छाया अशुभ होती है और मृत्यु या क्लेश का कारण होती है ।

शेष चार छायाएँ शुभ फल देने वाली होती हैं ॥ १३ ॥

१. ' स्निग्धाऽऽयता ' इति पा ० । २. ' शुभोदयाः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1085

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६६६ चरकसंहिता विमर्श - स्वस्थावस्था में ये सभी छायाएँ मनुष्यों में पायी जाती हैं, पर जिसके शरीर में जन्म से ही वायवी छाया होती है वह व्यक्ति अभागा होता है और प्रत्येक अवस्था में कष्ट पाता रहता है । यदि सहसा वायवी छाया शरीर में उत्पन्न हो जाय तो मृत्युकारक होती है । जन्म से ही शेष चार छायाएँ सुख देने वाली होती हैं । पाँचों छायाओं का तुलनात्मक अध्ययन निम्नलिखित रूप में दिया जा रहा हैं--* छाया के पाँच भेद ( Five types of Aura or Reflection ) 1 नाभसी वायची आग्नेयी आम्भसी पार्थिवी निर्मल रूक्ष विशुद्ध रक्त विमल ( शुद्ध वैदूर्य स्थिर वर्ण के समान ) नीलवर्ण श्याववर्ण दर्शन प्रिय सुस्निग्ध स्निग्ध सस्नेह अरुणवर्ण दीप्ताभा घन लक्षण सप्रभा इतप्रभा

* स्यात्तैजसी प्रभा सर्वा सा तु सप्तविधा स्मृता ।

रक्ता पीता सिता श्यावा हरिता पाण्डुराऽसिता ॥ १४ ॥

तासां याः स्युर्विकासिन्यः स्निग्धाश्च विपुलाश्च याः ।

ताः शुभा रूक्षमलिनाः संक्षिप्तश्चाशुभोदयाः ॥ १५ ॥

श्याम वर्ण श्वेत वर्ण प्रभा की उत्पत्ति के कारण और भेद सभी प्रभाएँ तेज ( पित्त ) से उत्पन्न होती हैं और सात प्रकार की होती हैं । जैसे १. रक्त, २. पीत, ३. श्वेत, ४. श्याव, ५. हरित, ६. पाण्डुर, ७. काली । इन प्रभाओं में जो प्रभा विकसित, स्निग्ध होती है वह शुभ और जो प्रभा रूक्ष, मलिन और संक्लिष्ट या संक्षिप्त होती है वह अशुभ फल देने वाली होती है ॥ १४-१५ ॥

* वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी ।

आसन्ना लक्ष्यते च्छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते ॥ १६ ॥

* नाच्छायो नाप्रभः कश्चिद्विशेषाश्चिह्नयन्ति तु । नृणां शुभाशुभोत्पत्ति काले छायाप्रभाश्रयाः ॥ छाया और प्रभा में भेद - छाया वर्ण को आक्रामित ( आच्छादित ) करती है । प्रभा वर्ण को प्रकाशित करने वाली होती है । छाया समीप से दिखाई पड़ती है और प्रभा दूर से ही चमकती हुई दिखाई पड़ती है । कोई भी पुरुष छाया और प्रभा से रहित नहीं होता । मनुष्य की विशेषताओं को छाया और प्रभा ही स्पष्ट रूप से प्रकट करती है । समय पर छाया और प्रभा के आश्रित भेद शुभ और अशुभ की उत्पत्ति के सूचक होते हैं ॥ १६-१७ ॥ विमर्श - छाया की उत्पत्ति पञ्चमहाभूतों से पाँच प्रकार की होती है । पर प्रभा की उत्पत्ति केवल तेज से ही होती है । यह छाया और प्रभा में एक भेद है । जव प्रत्येक मनुष्य की उत्पत्ति पञ्चमहाभूत से मानी जाती है तो उनकी छाया अवश्य ही रहेंगी । प्रत्येक रूप की उत्पत्ति तेज २. ' प्रभा ' इति पा ० । १. संकिष्टाः ' इति पा ० । ३. ' विकृष्टा भाः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1086

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पन्नरूपीयेन्द्रिवाध्यायः ७ ] इन्द्रियस्थानम् ६६७ के अधीन होती है । कोई भी रूप हो उसमें तेज से उत्पन्न प्रभा का होना अनिवार्य है । मृत्यु के समय प्रभा और छाया इन दोनों में विकृति हो जाती है जिसे देखकर मृत्यु का ज्ञान पहले ही हो जाता है । छाया और प्रभा में अन्तर का संग्रह निम्नांकित रूप में किया जा सकता है-* छाया और प्रभा में अन्तर ( Difference between Reflection and Lustre ) छाया ( Reflection ) प्रभा ( Lustre ) १. प्रभा वर्ण को प्रकाशित ( स्पष्ट ) करती है । १. छाया वर्ग को आक्रामित ( आच्छादित ) करती है । २. छाया आसन्न ( नजदीक ) आने पर दिखाई पड़ती है । २. प्रभा प्रकृष्ट ( दूर ) से ही दिखाई पड़ती है । ३. छाया के नाभती, वायवी, आग्नेयी, आम्भसी तथा पार्थिवी ये ५ भेद होते हैं । ४. छाया की उत्पत्ति प्रत्येक महाभूत की प्रधानता से होती है । ५. छाया वर्ण और प्रभा पर आश्रित है । ( छाया वर्णप्रभाश्रया ) ३. प्रभा के रक्ता, पीता, सिता, ( श्वेता ), श्यावा, हरिता पाण्डुरा तथा असिता ( काली ) ये ७ भेद होते हैं । ४. प्रभा की उत्पत्ति तैजस महाभूत से होती है । ( तैजसी प्रभा सर्वा ) ५. प्रभा स्वतन्त्र है । * कामलाऽचगोर्मुखं पूर्णं शङ्खयोर्मुक्तमांसता । संत्रासश्वोष्णगान्रत्वं यस्य तं परिवर्जयेत् ॥१८ ॥

जिस व्यक्ति के दोनों नेत्र कामला रोग के समान पीले हों, मुख मण्डल मांस से उपचित प्रतीत होता हो, शङ्खप्रदेश में मांसहीनता हो गयी हो, वह सदा भयभीत रहता हो, शरीर उष्ण रहता हो तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए अर्थात् उसकी मृत्यु हो जाती हैं ॥ १८ ॥

विमर्श - - सम्भवतः उपर्युक्त श्लोक में यकृत के अर्बुद ( Cancer of the Liver ) होने की आमा मिलती है । * उत्थाप्यमानः शयनात् प्रमोहं याति यो नरः । मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकत्थनः ॥ संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः । व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमासं न जोवति ॥ १५ दिन का मारक अरिष्ट -- जो रोगी शय्या से उठाये जाने पर या नींद से जगाये जाने पर बार - बार मूच्छित हो जाता हो वह एक सप्ताह के भीतर मर जाता है । और जब तक जोता है तब तक अत्यधिक कष्ट पाता है । जिस व्यक्ति में प्रतिलोम और अनुलोम मार्ग में होने वाले अनेक रोग परस्पर मिल गये हों, ग्रहणी विकृत हो गयी हो, वह व्यक्ति पन्द्रह दिन के अन्दर मर जाता है ॥ १ ९ -२० ॥ विमर्श - प्रतिलोम और अनुलोम का तात्पर्य अधोमार्ग और ऊर्ध्व मार्ग है । जैसे रक्तपित्त में ऊर्ध्व भाग से और अधोभाग से रक्त अधिक मात्रा में निकलता हो । साथ ही रक्तपित्त के उपद्रवस्वरूप अनेक रोग भी हो गये हों । ग्रहणी के दुष्ट हो जाने से खाये हुए पदार्थ का परिपाक न होता हो और पतले दस्त बार - बार आते हों तो वह व्यक्ति पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । १. ' संत्रासश्वोष्णता चाङ्गे ' इति पा ० । २. ' कथंचन ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1087

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६६८ चरकसंहिता * उपरुद्धस्य रोगेण कर्शितस्याल्पमश्नतः । बहु मूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥

दुर्बलो बहु भुङ्क्तेयः प्राग्भुक्तादन्नमातुरैः । अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ २२ ॥

आहार तथा मलमूत्र विषयक अरिष्ट - जीर्ण रोग से कृश रोगी अग्नि की क्रिया रुक जाने से भोजन अल्प मात्रा में करता हो और मूत्र तथा पुरीष अधिक मात्रा में निकलता हो तो ऐसे व्यक्ति की चिकित्सा नहीं करनी चाहिए । जो दुर्बल रोगी रोग होने से पूर्व अर्थात् स्वस्थावस्था में जितना भोजन करता था उससे अधिक भोजन करता हो पर मूत्र और पुरीष की मात्रा अल्प निकलती हो तो जैसा प्रेत होता हैं वैसा ही उसे समझना चाहिए ॥ २१-२२ ॥ इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः । शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥

औरभी - जो स्वस्थ या रोगी व्यक्ति अच्छे रसों से युक्त उत्तम गुणों से सम्पन्न अन्न को खाना हैं पर निरन्तर बल और वर्ण की हानि होती जाती है, वह व्यक्ति जीवित नहीं रहता || २३ || प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते । बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ श्वासविषयक अरिष्ट - • जो गले से अव्यक्त शब्द निकालता है, श्वास अधिक जोर जोर से लेता है, जिसे अत्यधिक अतिसार होता है, यदि वह बल से हीन, पिपासा से पीड़ित हो और उसका मुख अन्दर से सूखा हो तो वह व्यक्ति जीवित नहीं रहता ॥ २४ ॥

हस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः । मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः ॥२५ ॥

और भी - • जिस रोगी का श्वास छोटे रूप में चलता हो, अर्थात् जिसे छिन्न श्वास हो गया हो, व्याविद्ध - ( सारा शरीर छेद दिया गया हो ) की तरह स्पंदन ( चेष्टायें ) करता हो अर्थात् कहीं भी शान्ति नहीं मिलती हो, उसके लिए आत्रेय पुनर्वसु का यह मत है कि उसे मरा हुआ ही समझना चाहिए ॥ २५ ॥

निश्चित रूप से

ऊर्ध्वं च यः प्रश्वसिति श्लेष्मणा चाभिभूयते । होनवर्णबलाहारो यो नरो न स जीवति ॥

और I भी • जिस व्यक्ति का ऊर्ध्व श्वास वेग से चलता हो, कण्ठ कफ से आवृत हो और उसका बल, वर्णं, आहार कम हो गया हो, वह रोगी जीवित नहीं रहता ॥ २६ ॥

विमर्श - उपर्युक्त दो इलोकों में Respiratory Failure की तरफ संकेत प्रतीत होता है ।

ऊर्ध्वा नयने यस्य मैन्ये चारतकम्पने । बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥

नेत्रविषयक अरिष्ट - जिस रोगी के दोनों नेत्र ऊपर की तरफ हों ( नेत्र की पुतलियाँ ऊपर पक्ष्म में प्रविष्ट होकर स्थिर हो गयी हों ), मन्यायें सदा काँपती हों ( उनमें फरकाहट हो ) और रोगी बलहीन, अधिक प्यास से पीडित और सूखे मुखवाला हो तो वह जीवित नहीं रहता || २७ || यस्य गण्डावुपचितौ ज्वरकासौ च दारुणौ । शूली प्रद्वेष्टि चाप्यन्नं तस्मिन् कर्म न सिध्यति ॥ विविध अरिष्ट -- • जिस व्यक्ति के कपोल का ऊपरी भाग उपचित ( मांस से भरा ) हो, उग्र रूप से ज्वर और कास का वेग हो, उदर में शूल हो और अन्न से द्वेष करता हो, ऐसे रोगी की चिकित्सा करने से सफलता नहीं मिलती ॥ २८ ॥

व्यावृत्तमूर्धजिह्वास्यो भ्रुवौ यस्य च विच्युते । कण्टकैश्चाचिता जिह्वा यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ और भी - जिस रोगी का मस्तक और जिह्वा विपरीत दिशा में घुस गई हो, भ्रू अपने स्थान से च्युत हो गए हों ( नीचे लटक गए हों ), कण्टकाकार अङ्कुरों से जिल्हा व्याप्त हो गई हो, उसे मृत की तरह ही समझना चाहिए ॥ २ ९ ॥ शेफश्चात्यर्थमुत्सिक्तं निःसृतौ वृषणौ भृशम् । अतश्चैव विपर्यासो विकृत्या प्रेतलक्षणम् ॥ १. ' प्रागभुक्त्वाऽन्नमातुरः ' इति पा ० । ३. ‘ यस्यानारतकम्पने ' इति पा ० । २. ‘ वर्धिष्णुगुणसंपन्नम् ' इति पा ० । ४. ' व्यावृत्तमुखजिह्वस्य ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1088

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अवाक्शिरसीयेन्द्रियाध्यायः ८] इन्द्रियस्थानम् ६६६ लिङ्ग तथा वृषणविषयक अरिष्ट - जिस रोगी का लिङ्ग अत्यन्त अन्दर प्रविष्ट हो गया हो, दोनों अण्डकोष बहुत अधिक बाहर निकलकर लटक गए हो अथवा इससे विपरीत दशा हो अर्थात् लिङ्ग बहुत अधिक बाहर निकल गया हो और अण्डकोष अन्दर प्रविष्ट हो गया हो, इन विकृतियों से उसे भूत ( मृनसम ) ही समझना चाहिए ॥ ३० ॥

* निचितं यस्य मांसं स्यात्वगस्थिष्वेव दृश्यते । क्षीणस्यानश्नतस्तस्य मासमायुः परं भवेत् ॥ जिस पुरुष के शरीर में मांस निचित अर्थात् एक स्थान में एकत्रित हुआ प्रतीत हो, अन्यत्र सारे शरीर में त्वचा और अस्थि मात्र शेष दिखाई पड़ता हो । यदि ' नि ' का अर्थ निषेधात्मक करते हैं ( जैसा कि ' नि निश्चयनिषेधयोः ' कहा है ) तो ऐसी दशा में मांस न हो अर्थ करते हैं, अर्थात् मांस क्षीण हो त्वचा और अस्थि का कंकाल मात्र शरीर में शेष दिखाई पड़ता हो, तो उसकी परम आयु १ एक मास की होती है ॥ ३१ ॥

तत्र श्लोकः-इदं लिङ्गमरिष्टाख्यमनेकमभिजज्ञिवान् । आयुर्वेदविदित्याख्यां लभते कुशलो जनः ॥३२ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पन्नरूपीय-मिन्द्रियं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

-ENG जो कुशल मनुष्य इन अनेक प्रकार के अरिष्ट लक्षणों को जान लेता है वह मनुष्य आयुर्वेदवित् ( आयुर्वेद शास्त्र के ज्ञाता ) की प्रसिद्धि को प्राप्त करता है ॥ ३२ ॥

इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रिय-स्थान में पन्नरूपीय इन्द्रिय नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः अथातोऽवाक्शिरसीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद ने कहा था ॥ १-२ ॥ अवाक्शिरसीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय

अवाक्शिरा वा जिह्मा वा यस्य वा विशिरा भवेत् ।

जन्तो रूपप्रतिच्छाया नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥

शिरप्रतिच्छायाविषयक अरिष्ट: - जिस प्राणी की ( वह रोगी हो या स्वस्थ हो ) परछाई में शिर नीचे की ओर और पैर ऊपर की ओर दिखाई दे या टेढ़ी - मेढ़ी हो, या परछाई बिना शिर की हो या परछाई में शिर घुमा हुआ प्रतीत होता हो उस रोगी की चिकित्सा करने की इच्छा न करे, क्योंकि इन लक्षणों के होने पर रोगी निश्चय ही शीघ्र मर जाता है ॥ ३ ॥

जीभूतानि पचमागि दृष्टिश्वापि निगृह्यते । यस्य जन्तोर्न तं धीरो भेषजेनोपपादयेत् ॥ ४ ॥

यस्य शूनानि वर्त्मनि न समायान्ति शुष्यतः । चतुषी चोपदिह्यते यथा प्रेतस्तथैव सः ॥

नेत्रविषयक अरिष्ट - जिस मनुष्य के नेत्र की पलकें विना कारण जटा की तरह बंध गई हों १. ' तु त्वगस्थि चैव ' इति पा ० । २. ' न गृह्यते ' इति पा ० । ३. ' चोपदह्येते ' इति पा ० ।

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१००० चरकसंहिता और सहसा दृष्टि बन्द हो गई हो अर्थात् दिखाई नहीं पड़ती हो तो धीर वैद्य के लिए उचित है कि उस रोगी की चिकित्सा औषधों द्वारा न करे । जिस पुरुष के शरीर में शोष हो पर वर्त्ममण्डल में शोध हो, शोथ के कारण दोनों पलकें आपस में न मिलती हों और नेत्रों में दाह होता हो उस पुरुष को मरे हुए के समान समझे ॥ ४-५ ॥ भ्रुवोर्वा यदि वा मूर्ध्नि सीमन्तावर्तकान् बहून् 1 । अपूर्वानकृतान् व्यक्तान् दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ त्र्यहमेतेन जीवन्ति लक्षणेनातुरा नराः । अरोगाणां पुनस्त्वेतत् षड्रात्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥

भ्रू तथा आवर्तविषयक अरिष्ट - भौहों में अथवा शिर में बहुत से सीमन्त ( माँग ) और आवर्त ( भौंरी ) पहले के न बनाये हों अथवा स्वाभाविक रूप से पहले से न हों पर स्पष्ट दिखाई पढ़ें तो रोगी का मरना निश्चित समझे । अवाक्शिरा से लेकर अब तक बताये गये इन अरिष्ठ लक्षणों के उत्पन्न होने पर तीन दिन के अन्दर रोगी मर जाता है । यदि स्वस्थ पुरुष के शरीर में ये अरिष्ट लक्षण उत्पन्न हुए दिखाई देते हैं तो वह छः दिन के अन्दर मरता है ॥ ६-७ ॥ * आयम्योत्पाटितान् केशान् यो नरो नावबुध्यते । अनातुरो वा रोगी वा षड्रात्रं नातिवर्तते ॥ यस्य केशा निरभ्यङ्गा दृश्यन्तेऽभ्यक्तसन्निभाः । उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ केशविषयक अरिष्ट --- जिस पुरुष के शिर का बाल स्वयं या दूसरे व्यक्ति के द्वारा खींच कर उखाड़ा जाय वह रोगी हो या स्वस्थ पुरुष हो यदि उसको उखाड़ने की वेदना का अनुभव न हो तो वह ६ दिन से अधिक जीवित नहीं रहता । जिस पुरुष के शिर में तेल न लगाया गया हो पर तेल लगाये हुए के समान बाल प्रतीत होते हों उस मनुष्य के जीवन काल की गात रुक गई है, यह समझ कर धीर वैद्य उसकी चिकित्सा न करे ॥ ८ - ९ ॥ ग्लायते नासिकावंशः पृथुत्वं यस्य गच्छति । अशूनः शूनसंकाशः प्रत्याख्येयः स जानता ॥ अत्यर्थविवृता यस्य यस्य चात्यर्थसंवृता । जिह्वा वा परिशुष्का वा नासिका न स जीवति ॥ नासाविषयक अरिष्ट - जिस पुरुष का नासिकावंश ग्लानि से युक्त हो, स्थूलता को प्राप्त हो गया हो और नासिकावंश शोथयुक्त न हो पर शोथ के समान प्रतीत होता हो तो अरिष्ट के लक्षणों का ज्ञाता वैद्य उस रोगी का प्रत्याख्यान कर दे ( असाध्य समझ कर चिकित्सा न करे ) | जिस रोगी की नासिका के द्वार अधिक खुले हुए या अधिक बन्द हुए प्रतीत हों अथवा नाक में टेढ़ापन प्रतीत हो या नाक सूखी हुई प्रतीत हो तो वह रोगी जीवित नहीं रहता ॥ १०-११ ॥ वमर्श - यह ऊपर नासिका में उत्पन्न होने वाले अरिष्टों का वर्णन किया गया है । सुश्रुत में भी इसका लक्षण इस प्रकार बताया गया है यथा - ' कुटिला स्फुटिता वापि शुष्का वा यस्य नासिका । अवस्फूर्जति मग्ना वा न स जीवति मानवः ॥ ' ( सू. अ. ३१ ) मुखं शब्दश्रवावोष्ठौ शुक्लश्यावातिलोहितौ । विकृत्या यस्य वा नीलौ न स रोगाद्विमुच्यते ॥ जिस व्यक्ति का मुख, कान और ओष्ठ शुक्ल, श्याव और अत्यन्त लाल हो जायं अथवा विकृति के कारण दोनों ओष्ठ नीले हो गये हों तो वह रोगी रोग से मुक्त नहीं होता ॥ १२ ॥

* अस्थिश्वेता द्विजा यस्य पुष्पिताः पङ्कसंवृताः । विकृत्या न स रोगंतं विहायारोग्यमश्नुते ॥ दन्तविषयक अरिष्ट — विकृति के कारण जिस व्यक्ति के दाँत हड्डी की तरह श्वेत हो गये हों अथवा फूलों का गन्ध दाँतों से निकलता हो और दाँतों पर पक्क के समान मैल चढ़ा हुआ हो, वह रोगी उस रोग से मुक्त होकर कभी भी स्वस्थ नहीं होता ॥ १३ ॥

१. ' नातिवर्तते ' इति पा ० । २. ' म्लायते नासिकावंशः ' इति पा ० । ३. ' मुखशब्दस्रवावोष्ठौ ' इति पा ० ।

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अवाक्शिरसीयेन्द्रियाध्यायः ८ ] इन्द्रियस्थानम्

स्तब्धा निश्चेतना गुर्वी कण्टकोपचिता भृशम् ।

श्यावा शुकाऽथवा शूना प्रेतजिह्वा विसर्पिणी ॥ १४ ॥

१००१ जिह्वाविषयक अरिष्ट - जिस पुरुष की जिह्वा निश्चल, चेतना -रहित ( स्पर्श और रस ज्ञान से शून्य ), भारी, कण्टकाकार अङ्कुरों से अधिक व्याप्त हो, श्याववर्ण, सूखी हुई अथवा शोथयुक्त हो और बार - बार जिह्वा निकाल कर रोगी ओष्ठों को चाटता हो तो इस प्रकार की विकृति प्रेत की जिह्वा अर्थात् मरणासन्न व्यक्ति की जिह्वा में होती है ॥ १४ ॥

विमर्श - विसर्पिणी का तात्पर्य गङ्गाधर ने बाहर निकली हुई किया है व्यक्तियों में जिह्वा का बाहर निकलना देखा भी जाता है । चक्रपाणि ने भी बाहर निकलना ही अर्थ किया है । पर विसर्पिणी का अर्थ सर्प के समान बार - बार निकालना और ओष्ठों को चाटना भी हो सकता है । * दीर्घमुच्छ्वस्य यो ह्रस्वं नरो निःश्वस्य ताम्यति । उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ श्वासविषयक अरिष्ट – जो मनुष्य पहले लम्बी श्वास लेकर पुनः छोटी श्वास को त्यागता हुआ मूच्छित हो जाता है । उसकी आयु की गति रुक गई है यह समझ कर धीर वैद्य उसकी चिकित्सा न करे ॥ १५ ॥

# हस्तौ पादौ च मन्ये च तालु चैवातिशीतलम् । भवत्यायुः क्षये क्रूरमथवाऽपि भवेन्मृदु ॥ आयु के क्षय हो जाने पर प्राणियों के दोनों हाथ, दोनों पैर, मन्याएँ और तालु अधिक शीतल हो जाते हैं और क्रूर ( कठिन ) अथवा मृदु ( कोमल ) हो जाते हैं ॥ १६ ॥

विमर्श - मृत्यु के समय प्रायः सभी व्यक्तियों में हाथ, पैर, मन्या, तालु इत्यादि की उष्णता नष्ट हो जाती है । इसमें Peripheral Circulatory Failure की तरफ संकेत प्रतीत होता है ।

घट्टयञ्जनुना जानु पादावुद्यम्य पातयन् । योऽपास्यति मुहुर्वक्रमातुरो न स जीवति ॥

विविध अरिष्ट - जो रोगी अपने जानु से दूसरे जानु को टक्कर मारता है और पैरों को उठाकर नीचे पटकता है, जो बार - बार विना कारण मुख को खोलता है वह आतुर जीवित नहीं रहता ॥ १७ ॥

विमर्श - प्रायः इस अरिष्ट लक्षण के रोगी शय्या पर शयन किये हुए अपने दोनों जानुओं को परस्पर टकराया करते है । खाट के ऊपर शयन किये हुए ही दोनों पैरों को उठाकर पटका करते हैं और बार - बार जम्हाई लेने की तरह मुख खोला करते हैं । गङ्गाधर और चक्रपाणि ने ‘ अपास्यति ' का अर्थं मुख का दूसरी ओर फेर लेना या मुख में आक्षेप का होना किया है । दन्तैश्छिन्दन्चखाग्राणि नखैश्छिन्दन्छिरोरुहान् । काष्ठेन भूमिं विलिखन्न रोगात् परिमुच्यते ॥ 1 और भी — जो रोगी दाँतों से अपने नखों के अग्र भाग को काटता है, नखों से शिर के बालों को काटता है ( उखाड़ना है ), लकड़ी से भूमि को कुरेदता है अर्थात् मिट्टी को खोदता है वह रोगी रोग से मुक्त नहीं होता ॥ १८ ॥

दन्तान् खादति यो जाग्रदसान्ना विरुदन् हसन् । विजानाति न चेद्दुःखं न स रोगाद्विमुच्यते ॥ और भी - जो रोगी जागते हुए दाँतों को कटकटाया करता है और जागते हुए ही अशान्ति के साथ कभी रोता और कभी हँसता है और किसी भी प्रकार उसे दुःख पहुँचाया जाय पर उसका अनुभव उसे न हो वह व्यक्ति रोग से मुक्त नहीं होता ॥ १ ९ ॥ मुहुर्हसन् मुहुः च्वेडञ् शय्यां पादेन हन्ति यः । उच्चैश्छिद्राणि विमृशन्नातुरो न स जीवति ॥ औरभी - जो रोगी बार - बार हँसता है और बार - बार विषादपूर्वक रोता है और अपने शरीरगत उच्च ( ऊपरी भाग के ) छिद्रों को जैसे नाक, कान, मुख, आदि को छूते हुए पैर से १. ' मुहुरिछद्राणि ' इति पा ० ।